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राहुल गाँधी की ‘वोट चोरी’ वाली थ्योरी के फिर से फूट गए गुब्बारे, कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा के पास मिले 2 एक्टिव वोटर ID: मतदाता सूची में मृत सदस्य का भी नाम

कॉन्ग्रेस पार्टी के सांसद राहुल गाँधी की ‘वोट चोरी’ की बातें उनकी पार्टी के लिए शर्मिंदगी का सबब बन गईं। बीजेपी के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने 2 सितंबर 2025 को खुलासा किया कि कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा के पास दो एक्टिव EPIC नंबर हैं। एक निजामुद्दीन ईस्ट में जंगपुरा विधानसभा क्षेत्र में और दूसरा नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र के काका नगर में।

खेड़ा के नाम पर दो एक्टिव EPIC नंबर

मालवीय द्वारा साझा की गई जानकारी सार्वजनिक है। OpIndia ने इन जानकारियों को चुनाव आयोग की वेबसाइट पर मिलान किया है, जिसमें ये दावा सच पाया गया है। वोटर लिस्ट के रिकॉर्ड दिखाते हैं कि खेड़ा का नाम जंगपुरा में EPIC नंबर XHC1992338 के साथ दर्ज है।

Source: Amit Malviya/ECI

पवन खेड़ा का नाम न सिर्फ जंगपुरा में है, बल्कि नई दिल्ली में EPIC नंबर SJE0755967 के साथ भी है। वोटर लिस्ट में एंट्री अभी भी एक्टिव हैं।

Source: Amit Malviya/ECI

खेड़ा का वोटर लिस्ट में डुप्लिकेट नाम होना एक गंभीर सवाल उठाता है कि चुनाव आयोग को इसकी जाँच करनी चाहिए कि उनके पास दो एक्टिव वोटर आईडी कैसे हैं। इसके अलावा मालवीय ने अपने पोस्ट में कहा कि अधिकारी इस बात की जाँच कर रहे हैं कि क्या खेड़ा ने कभी एक से ज्यादा बार वोट डाला है।

मृत परिवार के सदस्य का नाम अभी भी वोटर लिस्ट में

उसी पते पर अन्य वोटरों की जाँच करने पर OpIndia को पता चला कि रूपम खेड़ा का नाम अभी भी वोटर लिस्ट में एक्टिव है। खास बात ये है कि रूपम का निधन 2021 में कोविड-19 की वजह से हो गया था।

Source: Amit Malviya/ECI

इसके अलावा एक व्यक्ति श्रावण कुमार प्रजापत का नाम दोनों वोटर लिस्ट में दिखा। दिलचस्प बात ये है कि जंगपुरा क्षेत्र से खेड़ा की पत्नी का नाम लिस्ट से हटा दिया गया है।

Source: Amit Malviya/ECI

कॉन्ग्रेस नेताओं के बार-बार ‘वोट चोरी’ के दावों के बावजूद, उनके अपने मृत परिवार के सदस्यों के नाम वोटर लिस्ट से हटाने जैसे बेसिक काम भी नजरअंदाज किए गए हैं।

पाखंडी राजनीति की खुल गई पोल

कॉन्ग्रेस नेता पवन खेड़ा दूसरों को चुनावी ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं और जब किसी का नाम अलग-अलग जगहों पर चार बार वोटर लिस्ट में दिखा तो हंगामा मचाया। बाद में वह व्यक्ति कैमरे पर आया और साफ किया कि उसने पहले जहाँ रहता था, वहाँ से नाम हटाने की अर्जी दी थी, लेकिन वोटर लिस्ट अपडेट नहीं हुई।

इसमें विडंबना ये है कि उनके अपने रिकॉर्ड ही गड़बड़ियों से भरे हैं। मालवीय ने ये भी बताया कि सोनिया गाँधी का नाम भारत की वोटर लिस्ट में तब दर्ज था, जब वो भारत की नागरिक भी नहीं बनी थीं। उन्होंने ये भी कहा कि राहुल गाँधी ने बेंगलुरु के महादेवपुरा में चुनावी गड़बड़ी के अपने आरोपों के बारे में कोई औपचारिक शपथपत्र शिकायत नहीं दी है और सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में गड़बड़ी के आरोप वाले केस को पहले ही खारिज कर दिया है।

इससे पहले, पवन खेड़ा ने CSDS-Lokniti के संजय कुमार के X पर एक पोस्ट के आधार पर डेटा शेयर किया था, जिसमें महाराष्ट्र में वोटर लिस्ट में गड़बड़ी का दावा था। हालाँकि बाद में संजय कुमार ने वो पोस्ट डिलीट कर दी और कहा कि उनकी टीम ने टेबल्स को ‘गलत पढ़ा’। राहुल गाँधी और अन्य नेताओं के चुनाव आयोग के खिलाफ किए गए हर दावे पिछले कुछ महीनों में खोखले साबित हुए हैं।

यूट्यूबर ने एयरबेस-सेना की जानकारी पाकिस्तान भेजी, फोन में मिले 120 ISI एजेंट के नंबर: 1700 पन्नों की चार्जशीट, ज्योति मल्होत्रा के साथ दिखता था जसबीर सिंह

पाकिस्तान के लिए जासूसी के आरोप में पकड़ी गई यू्ट्यूबर ज्योति मल्होत्रा के साथ गिरफ्तार जसबीर सिंह के खिलाफ पुलिस ने 1700 पन्नों की चार्जशीट दायर की है। इसमें जसबीर सिंह के पाकिस्तान को भारत के फाइटर जेट एयरबेस, आर्मी बेस और भाखड़ा नांगल डैम की जानकारी भेजने के सबूत हैं।

चार्जशीट के मुताबिक, जसबीर पाकिस्तान के 120 लोगों से संपर्क में था। इसमें ISI के भी लोग शामिल थे। ISI के शाकिर का नंबर उसके फोन में जट रँधावा के नाम से सेव मिला। जसबीर के पाकिस्तान के होटलों में भी ISI के लोगों से मिलने की जानकारी सामने आई है।

जसबीर के पास 2 पासपोर्ट, 4 बार गया पाकिस्तान

जसबीर के पास 2 पासपोर्ट थे और वह चार बार पाकिस्तान जा चुका है। वह पाकिस्तानी यूट्यूबर नासिर ढिल्लो के जरिए पाकिस्तान दूतावास का अधिकारी और ISIS का सदस्य दानिश से भी मिला। पुलिस ने यह भी बताया कि जसबीर कई बार ज्योति मल्होत्रा के साथ भी पाकिस्तानी दूतावास गया था। ज्योति मल्होत्रा को भी पाकिस्तान की जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया गया है।

चार्जशीट में सामने आया कि दूतावास में दानिश ने उससे भारत के सिम माँगे थे, जिसे वह उपलब्ध नहीं करा पाया था। साथ ही जसबीर सिंह ने अपना लैपटॉप भी दानिश को दिया था। बाद में जसबीर ने लैपटॉप और मोबाइल का डाटा भी डिलीट कर दिया। इस डाटा को वापस लाने की कोशिश की जा रही है।

बता दें कि दानिश वही है, जिसकी ज्योति मल्होत्रा के साथ नई दिल्ली के पाकिस्तानी दूतावास में आयोजित पार्टियों में ली गई तस्वीरें वायरल हुई थी। ज्योति मल्होत्रा को पाकिस्तान की जासूसी के आरोप में पकड़े जाने के बाद दानिश को भी दूतावास से निलंबित कर दिया गया था।

कौन है यूट्यूबर जसबीर सिंह?

यूट्यूबर जसबीर सिंह को जून 2025 में पाकिस्तान के लिए जासूसी के आरोप में पकड़ा गया था। अधिकारियों के मुताबिक, जसबीर सिंह पाकिस्तान की ISI के लिए जासूसी कर रहा था। जसबीर के समान आरोप में पकड़ी गई हरियाणा की यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा के साथ लिंक जुड़े थे।

जसबीर सिंह के मूलरूप से पंजाब के रूपनगर स्थित महलान गाँव का रहने वाला है। वह ‘जानमहल वीडियो’ नाम से यूट्यूब चैनल चलाता था, जिसके 11 लाख सब्सक्राइबर थे। जसबीर ट्रैवलिंग और फूड व्लॉगिंग से जुड़ा कन्टेन्ट वीडियो में डालता था। इसी चैनल पर उसके पाकिस्तान से जुड़े कुछ वीडियो भी मिले थे।

यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा की चार्जशीट में भी खुले थे कई राज

इससे पहले यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा, जिसे पाकिस्तान के लिए जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, उसके खिलाफ भी पुलिस ने 14 अगस्त 2025 को चार्जशीट दायर की थी। इस चार्जशीट में ज्योति मल्होत्रा के पाकिस्तान के कई एजेंटो से संपर्क की बात सामने आई थी।

2500 पन्नों की चार्जशीट में बताया गया कि ज्योति मल्होत्रा लंबे समय से पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के जासूसों के संपर्क में थी। वह पाकिस्तान उच्चायोग में तैनात एहसान-उर-रहीम उर्फ दानिश के अलावा हसन अली, शाकिर और नासिर ढिल्लों से भी लगातार बातचीत करती थी।

‘भारत की चिप से बदलेगी दुनिया की तस्वीर’: सेमीकॉन इंडिया 2025 के उद्घाटन पर बोले PM मोदी, सेमीकंडक्टर के 1 ट्रिलियन डॉलर के वैश्विक बाजार में होगा अहम हिस्सा

पीएम मोदी ने नई दिल्ली की यशोभूमि में मंगलवार (2 सितंबर 2025) को सेमीकॉन इंडिया 2025 (Semicon India 2025) का उद्घाटन किया। इसका मकसद भारत को सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में सुपर पावर बनाना और तकनीक के क्षेत्र में आगे ले जाना है। इस सबसे बड़े सेमीकंडक्टर इलेक्ट्रोनिक्स शो में 33 देशों से आए करीब 350 से अधिक कंपनियाँ शामिल हुई हैं।

इस मौके पर पीएम मोदी ने कहा, “साल के पहले तिमाही पर जीडीपी में भारत ने हर उम्मीद, हर अपेक्षा, हर आकलन से बेहतर प्रदर्शन किया है। एक तरफ दुनियाभर में इकोनोमी की चिंताएँ हैं, उस हालत में भारत ने 7.1 फीसदी ग्रोथ दिखाई है। ये ग्रोथ मैन्युफैक्चरिंग, एग्रीकल्चर, कंस्ट्रक्शन समेत हर क्षेत्र में दिख रहा है। इससे देश में नई ऊर्जा का संचार हो रहा है। इसके साथ ही भारत तीसरी अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है।”

छोटे से चिप में दुनिया सिमटी- पीएम

पीएम ने कहा कि पहले दुनिया का भाग्य तेल की कुओं से तय होता था, इस आधार पर ग्लोबल इकोनॉमी ऊपर नीचे होती रहती थी। लेकिन 21वीं शताब्दी की इकोनॉमी छोटे से चिप में सिमट कर रह गयी है। ये चिप भले छोटी सी है लेकिन इसमें दुनिया की प्रगति को गति देने की ताकत है। इसीलिए आज सेमीकंडक्टर का वैश्विक बाजार 600 अरब डॉलर तक पहुँच रहा है और अगले कुछ वर्षों में यह 1 ट्रिलियन डॉलर को भी पार कर जाएगा, इसमें अहम हिस्सा भारत का होगा।

सेमीकॉन इंडिया 2025 कार्यक्रम में उन्होंने कहा, “वह दिन दूर नहीं जब भारत की सबसे छोटी चिप दुनिया में सबसे बड़ा बदलाव लाएगी। बेशक, हमारी यात्रा देर से शुरू हुई, लेकिन अब हमें कोई रोक नहीं सकता।”

इससे पहले पीएम ने निवेशकों का स्वागत करते हुए कहा कि वह दिन दूर नहीं जब दुनिया कहेगी, भारत में डिजाइन, भारत में निर्मित, दुनिया द्वारा विश्वसनीय चिप भारत का है। ये कार्यक्रम जिस क्षेत्र पर फोकस किया गया है, उनमें सेमीकंडक्टर फैब्स, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, रिसर्च एंड इनवेस्टमेंट और एडवांस्ड पैकेजिंग शामिल हैं।

ट्रंप ने पाकिस्तान में फैमिली बिजनेस डील के लिए भारत के साथ संबंधों की दी कुर्बानी: अमेरिका के पूर्व NSA ने अपने ही राष्ट्रपति को घेरा, PM मोदी की RIC कूटनीति से होश उड़े

चीन में SCO शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी, शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन की दोस्ती देख बौखलाए बैठे डोनाल्ड ट्रंप ने अब भारत पर लगाए 50 प्रतिशत टैरिफ को लेकर सफाई दी है तो वहीं अमेरिकी के ही पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने पाकिस्तान के साथ ट्रंप के रिश्ते को लेकर झिड़की दी है।

अमेरिका में जो बाइडन सरकार के दौरान NSA रहे जेक सुलिवन ने आरोप लगाया कि ट्रंप ने अपने परिवार पाकिस्तान के साथ फैमिली बिजनेस को बढ़ावा देने के लिए भारत के साथ दशकों पुराने रिश्तों को ठुकरा दिया है।

इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के साथ व्यापारिक संबंधों को पूरी तरह से एकतरफा आपदा बताया था। ट्रंप ने यह भी दोहराया कि भारत ने जीरो टैरिफ की पेशकश की थी।

ट्रंप ने एक्स हैंडल ट्रुथ सोशल पर किए एक पोस्ट में लिखा, “वे (भारत) हमें भारी मात्रा में सामान बेचते हैं लेकिन हम उन्हें बहुत कम सामान बेचते हैं। अब तक यह पूरी तरह से एकतरफा रिश्ता रहा है और यह कई दशकों से चला आ रहा है। इसकी वजह यह है कि भारत ने अब तक हमसे इतने ऊँचे टैरिफ वसूले हैं, जो किसी भी देश से ज्यादा हैं। हम भारत में सामान नहीं बेच पा रहे हैं। यह पूरी तरह से एकतरफा आपदा रही है।”

इसके साथ अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक बार फिर अपने उस दावे को दोहराया, जिसे नई दिल्ली पहले ही खारिज कर चुकी है। ट्रंप ने दावा किया कि भारत ने अपने टैरिफ को ‘जीरो’ करने की पेशकश की थी लेकिन इसमें देर हो चुकी थी, जबकि भारत को सालों पहले ऐसा कर लेना चाहिए था।

ट्रंप का यह बयान ऐसे समय पर आया है जब अमेरिका ने पिछले महीने रूस से तेल खरीदने पर भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दी थी। ट्रंप ने अपने पोस्ट में फिर से दोहराया कि रूस से भारत तेल और हथियार खरीद रहा है। लेकिन अब भारत और रूस के बीच रिश्ते और भी बेहतर देखकर ट्रंप बौखला गए हैं।

चीन में आयोजित SCO शिखर सम्मेलन में पीएम नरेंद्र मोदी, शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन के बीच गहरी दोस्ती देखी गई थी। इसके कुछ घंटों बाद ही ट्रंप ने टैरिफ पर सफाई देनी शुरू कर दी। ट्रंप को यह परेशानी है कि उन्होंने भारत और रूस के रिश्ते खराब करने के लिए देश पर भारी भरकम टैरिफ लगाया जबकि नतीजा इससे उलट दिखने को मिला।

भारत को रूस से दूर करने के प्रयास ध्वस्त: अमेरिकी के पूर्व NSA

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) जॉन बोल्टन, जिन्होंने 2018 से 2019 तक डोनाल्ड ट्रंप के साथ काम किया। उन्होंने भी ट्रंप को भारत-रूस के रिश्ते खराब करने के कारण देश पर लगाए टैरिफ को लेकर घेरा। उन्होंने कहा कि अमेरिका की टैरिफ नीति ने भारत को रूस से दूर करने और चीन से बढ़ते खतरे से निपटने के प्रयासों को ध्वस्त कर दिया है।

जॉन बोल्टन ने डोनाल्ट ट्रंप की टैरिफ नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि इससे भारत के साथ रणनीतिक संबंधों को गहरा करने के अमेरिका के दशकों के प्रयासों को झटका लगा है जबकि चीन को एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिल गया है।

पूर्व NSA ने कहा- पाकिस्तान से बिजनेस के लिए तोड़ा रिश्ता

इसके साथ ही अमेरिकी पूर्व NSA जेक सुलिवन ने भी डोनाल्ड ट्रंप की पोल खोली। जेक सुलिवन ने यूट्यूब चैनल मेदासटच (MeidasTouch) को दिए एक इंटरव्यू में कहा, “भारत के साथ हमें तकनीक, टैलेंट, अर्थव्यवस्था और कई अन्य क्षेत्रों में साथ काम करना चाहिए, खासकर चीन से रणनीतिक खतरे का मुकाबला करने के लिए।”

सुलिवन कहते हैं कि लेकिन ट्रंप ने पाकिस्तान के साथ अपने फैमिली बिजनेस को बढ़ाने के लिए भारत के साथ रिश्तों को ‘दरकिनार कर दिया।’ उन्होंने इसे अमेरिका के लिए ‘बड़ा रणनीतिक नुकसान’ बताया है।

भारत की दोस्ती 21वीं सदी की साझेदारी: अमेरिकी दूतावास

चीन में SCO सम्मेलन के बाद जहाँ डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर लगाया 50 प्रतिशत टैरिफ को लेकर सफाई देने पर उतर आए। वहीं इससे पहले अमेरिकी दूतावास ने भी नरम लहजे में भारत के साथ दोस्ती को याद किया। अमेरिकी दूतावास ने कहा कि भारत-अमेरिका की दोस्ती 21वीं सदी की ‘परिभाषित साझेदारी’ है।

दूतावास ने कहा था कि दोनों देशों की साझेदारी लगातार नई ऊँचाइयों को छू रही है और इसकी असली वजह दोनों देशों के लोगों के बीच की दोस्ती है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी बयान जारी कर कहा था कि भारत और अमेरिका के लोगों के बीच की गहरी दोस्ती ही उनके संबंधों का आधार है। उन्होंने यह भी माना कि यही दोस्ती उन्हें आर्थिक संबंधों की अपार संभावनाओं को पूरा करने के लिए प्रेरित करती है।

पीटर नवारो के ‘ब्राह्मण’ वाले बयान पर उदित राज का समर्थन, विदेशी झूठ को घरेलू हथियार बना रही कॉन्ग्रेस

हाल ही में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सलाहकार पीटर नवारो ने भारत के ख़िलाफ कई तीखे बयान दिए हैं। उन्होंने भारत की व्यापार नीतियों पर निशाना साधते हुए उसे ‘टैरिफ का महाराजा’ बताया और रूस से तेल ख़रीदने को लेकर भी आलोचना की। पीटर नवारो ने आरोप लगाया कि रूसी तेल से ‘ब्राह्मण’ मुनाफ़ा कमा रहे हैं। वहीं, इस बात का समर्थन कॉन्ग्रेस के नेता उदित राज ने किया है।

कॉन्ग्रेस नेता उदित राज का बयान

जहाँ एक तरफ भारत में पीटर नवारो के बयान की चौतरफा निंदा हो रही थी, वहीं कॉन्ग्रेस के नेता उदित राज ने उनके बयान का समर्थन किया। उदित राज ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में नवारो की बात को ‘तथ्यात्मक रूप से सही’ बताया। उदित राज ने कहा कि भारत में ऊँची जाति के कारोबारी ही रूस से तेल खरीदकर फ़ायदा कमा रहे हैं और आम भारतीयों को इससे कोई लाभ नहीं हो रहा है। उन्होंने यह भी दावा किया कि पिछड़ी जातियों और दलितों को कॉर्पोरेट जगत में स्थापित होने में 100 साल लग जाएँगे।

पीटर नवारो का बयान या तो अज्ञानता से भरा था या फिर जानबूझकर भारत के सामाजिक ढाँचे पर हमला करने की रणनीति का हिस्सा था। लेकिन उदित राज ने उस बयान से सहमत होकर एक तरह से गलती से सच बोल दिया। उदित राज को ‘बोस्टन ब्राह्मण’ शब्द का अर्थ जरूर पता होगा। वो इतने बेवकूफ़ नहीं, जितने लगते हैं। सच ये है कि कॉन्ग्रेस और अमेरिका अब एक जैसी भाषा बोल रहे हैं।

‘बोस्टन ब्राह्मण’ का संदर्भ और भारतीय संदर्भ में भ्रम

पीटर नवारो के बयान की तह तक जाएँ तो, उन्होंने संभवत अमेरिकी राजनीतिक संदर्भ में इस्तेमाल होने वाले शब्द ‘बोस्टन ब्राह्मण‘ का गलत इस्तेमाल किया है। अमेरिका में यह शब्द एक अभिजात वर्ग के लिए इस्तेमाल होता है, जो अपनी सामाजिक और आर्थिक हैसियत के कारण राजनीति और व्यापार में प्रभावी माने जाते हैं।

कुछ लोग इसी अभिजात्य, शक्तिशाली, पढ़े-लिखे और खुद को बहुत हद तक बाहरियों से दूरी बनाकर चलने वाले वर्ग पर खीझ उतारने और फब्तियाँ कसने के लिए ‘बोस्टन ब्राह्मण’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में ट्रंप के साथी का भी रेफरेंस यही था। कॉन्ग्रेसियों ने भी भारतीय कंपनियों को इसी टर्म की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश की है, क्योंकि दोनों की मानसिकता एक जैसी है।

इसका किसी जाति विशेष से कोई लेना-देना नहीं है। पीटर नवारो ने इस शब्द का इस्तेमाल कर भारत की सामाजिक संरचना को बिना समझे, राजनीतिक फायदा लेने की कोशिश की।

ब्रिटेन में फिर से हिंदुओं को निशाना बनाने में जुटे इस्लामी कट्टरपंथी, गणेश चतुर्थी पर भगवा झंडे को बताया ‘कट्टरवाद’: एकजुट बोले- ये शांति-साहस और सच्चाई का प्रतीक, कार्रवाई की माँग

ब्रिटेन के लीसेस्टर में एक बार फिर हिंदू विरोधी माहौल खड़ा करने की कोशिश हो रही है। गणेश चतुर्थी की शोभायात्रा में भगवा झंडे लगाने पर मुस्लिम काउंसिल ऑफ ब्रिटेन (MCB) ने आपत्ति जताई है। इसे ‘हिंदुत्व कट्टरवाद’ बताकर कार्रवाई की माँग की गई है। हिंदू संगठनों ने इसे न सिर्फ गलत बताया है, बल्कि चेतावनी दी है कि इससे नफरत को बढ़ावा मिल सकता है। 2022 में लीसेस्टर हिंसा के जख्म अभी भरे नहीं हैं, और एक बार फिर वही स्क्रिप्ट दोहराई जा रही है।

भगवा झंडे पर क्यों हुआ विवाद?

गुरुवार (28 अगस्त 2025) को मुस्लिम काउंसिल ऑफ ब्रिटेन (MCB) ने एक बयान जारी किया। इसमें उन्होंने कहा कि गणेश चतुर्थी की शोभायात्रा में भगवा झंडों का इस्तेमाल ‘हिंदुत्व अतिवाद’ को दिखाता है। उन्होंने प्रशासन से इस पर तुरंत कार्रवाई करने की माँग की।

इसके बाद लीसेस्टर की 40 हिंदू संस्थाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले हिंदू कम्युनिटी ऑर्गनाइजेशन ग्रुप (HCOG) ने इसका कड़ा विरोध किया। HCOG के संयोजक विनोद पॉपट ने कहा कि भगवा झंडा सदियों से हिंदू धर्म में पूज्य है। यह शांति, साहस और सच्चाई का प्रतीक है, न कि कट्टरता का। उन्होंने कहा कि ऐसे आरोप हिंदुओं का अपमान हैं और इससे समाज में नफरत फैल सकती है।

2022 में भी हुआ था ऐसा ही विवाद

यह पहली बार नहीं है कि लीसेस्टर में इस तरह का विवाद हुआ हो। 2022 में, भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच के बाद भी यहाँ हिंसा भड़की थी। उस समय भी झूठी खबरें और अफवाहें फैलाई गई थीं। झूठे दावे किए गए कि हिंदुओं ने मुस्लिमों के खिलाफ नारे लगाए और मस्जिद को तोड़ा।

पुलिस ने इन दावों को बाद में गलत बताया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। झूठी खबरों के कारण एक महीने तक हिंसा हुई, जिसमें हिंदू घरों और मंदिरों पर हमले हुए, भगवा झंडों का अपमान किया गया और लोगों को चाकू तक मारा गया।

2022 की हिंसा के पीछे कई तरह की अफवाहें थीं। जैसे, हिंदूओं द्वारा मुस्लिम लड़की को अगवा करना या कुरान का अपमान करना, जिसे पुलिस ने झूठा पाया। कुछ सोशल मीडिया पर कट्टरपंथियों ने वीडियो फैलाए और भीड़ को भड़काया। उन्होंने ‘मुस्लिम पेट्रोल इन लीसेस्टर’ जैसे नारे भी लगाए।

नवंबर 2022 में आई एक रिपोर्ट ने साफ कर दिया कि हिंसा ‘हिंदुत्व आतंकवाद’ से नहीं, बल्कि इस्लामी दुष्प्रचार से भड़की थी। इस रिपोर्ट ने यह भी बताया कि कई मीडिया संस्थानों ने इन झूठी खबरों को बढ़ावा दिया, जिससे हिंदुओं के लिए ख़तरा पैदा हुआ।

आगे क्या?

लीसेस्टर की घटना एक बड़ा सबक है। यह दिखाती है कि जब झूठे दावे और अफवाहें समाज और मीडिया द्वारा फैलाए जाते हैं, तो वे एक समुदाय के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं। भगवा झंडे को ‘कट्टरपंथ’ बताना केवल एक अपमान नहीं है, बल्कि यह हिंदुओं को अलग-थलग करने और डराने की एक सोची-समझी कोशिश है।

जब तक ब्रिटिश सरकार और मीडिया इस तरह के झूठे आख्यानों को रोकना नहीं सीखेगी, तब तक ब्रिटेन में हिंदुओं को ऐसी राजनीति का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

SCO में मोदी-जिनपिंग-पुतिन की दोस्ती देख वॉशिंगटन के तेवर पड़ने लगे नरम: रिश्तों की दुहाई देकर बोला अमेरिकी दूतावास- 21वीं सदी में भारत-अमेरिका की साझेदारी सबसे अहम

भारत, चीन और रूस के राष्ट्राध्यक्ष जब चीन में एक साथ आए, तो इसका सीधा असर अमेरिका पर देखने को मिला। चीन में चल रहे शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच हुई गर्मजोशी भरी मुलाकात से अमेरिका की चिंता बढ़ गई है।

इस दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर 50% का भारी टैरिफ लगाने और उनके सलाहकारों के सख्त बयानों के बावजूद, भारत में अमेरिकी दूतावास का लहजा एकदम बदल गया है। अमेरिकी दूतावास ने तुरंत सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया, जिसमें भारत के साथ अपनी दोस्ती और साझेदारी की तारीफ कर कहा कि भारत-अमेरिका की दोस्ती 21वीं सदी की ‘परिभाषित साझेदारी’ है।

अमेरिका के लहजे में बदलाव की वजह

भारत, चीन और रूस के बीच बढ़ती नजदीकी ने अमेरिका पर दबाव बढ़ा दिया है। SCO सम्मेलन में मोदी, जिनपिंग और पुतिन का एक साथ आना और खासकर प्रधानमंत्री मोदी का रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ एक ही कार में बैठकर मीटिंग स्थल तक जाना, ये सब अमेरिका के लिए एक बड़ा संकेत है। अब अमेरिका को यह अहसास हो गया है कि अगर उसे एशिया में अपने हितों की रक्षा करनी है, तो भारत के साथ अपने रिश्ते मजबूत करने ही होंगे।

ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में भारत पर कई तीखे बयान दिए थे, जिसमें रूस से तेल खरीदने को लेकर भी आलोचना की गई थी। लेकिन SCO सम्मेलन में जो तस्वीरें और संदेश सामने आए हैं, उसने अमेरिकी सरकार को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है। अब वे भारत के साथ अपने रिश्तों को ’21वीं सदी की निर्णायक साझेदारी’ कह रहे हैं, जो पहले के बयानों से एकदम अलग है।

अमेरिकी दूतावास का नया रवैया

चीन में हो रहे सम्मेलन के बीच, भारत में अमेरिकी दूतावास ने एक बेहद खास पोस्ट किया। इस पोस्ट में उन्होंने भारत और अमेरिका की दोस्ती को ’21वीं सदी का एक निर्णायक रिश्ता’ बताया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों की साझेदारी लगातार नई ऊँचाइयों को छू रही है और इसकी असली वजह दोनों देशों के लोगों के बीच की दोस्ती है।

इस पोस्ट में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का भी एक बयान था, जिसमें उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के लोगों के बीच की गहरी दोस्ती ही उनके संबंधों का आधार है। उन्होंने यह भी माना कि यही दोस्ती उन्हें आर्थिक संबंधों की अपार संभावनाओं को पूरा करने के लिए प्रेरित करती है। यह बयान दिखाता है कि अमेरिका अब भारत के साथ रिश्तों को सिर्फ सरकार के स्तर पर नहीं, बल्कि लोगों के बीच की दोस्ती के नजरिए से भी देख रहा है।

चीन और रूस का कड़ा रुख

SCO सम्मेलन में चीन और रूस ने भी अपनी बात खुलकर रखी। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सीधे तौर पर अमेरिका का नाम लिए बिना ‘चौधराहट’, ‘शीत युद्ध की मानसिकता’ और ‘धमकाने वाली प्रथाओं’ का विरोध किया। उन्होंने दुनिया को एक समान और बहुध्रुवीय बनाने की वकालत की।

वहीं, रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने भी शी जिनपिंग की बातों का समर्थन किया और पश्चिमी देशों के गठबंधनों के विकल्प के तौर पर एशिया और यूरोप में एक नई सुरक्षा प्रणाली बनाने का आह्वान किया। इन बयानों ने यह साफ कर दिया कि चीन और रूस मिलकर पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका के प्रभाव को कम करना चाहते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी का साफ संदेश

प्रधानमंत्री मोदी ने भी SCO के मंच से दुनिया को एक साफ संदेश दिया। उन्होंने कहा कि ‘ग्लोबल साउथ’ की उम्मीदों को पुराने तौर-तरीकों में बांधकर रखना गलत है। उन्होंने कहा, “नई पीढ़ी के सपनों को हम पुराने जमाने की ब्लैक-एंड-व्हाइट स्क्रीन पर नहीं देख सकते, इसके लिए स्क्रीन बदलनी होगी।”

पीएम मोदी ने संयुक्त राष्ट्र (UN) में बदलाव लाने की भी माँग की और कहा कि इसकी 80वीं वर्षगांठ पर इस काम की शुरुआत की जा सकती है। प्रधानमंत्री का यह बयान सीधे तौर पर उन वैश्विक संगठनों और ढाँचों पर सवाल उठा रहा है, जिन पर अमेरिका और पश्चिमी देशों का दबदबा है।

कुल मिलाकर, SCO सम्मेलन ने भारत के लिए एक मजबूत स्थिति बनाई है, जिसने अमेरिका को अपनी विदेश नीति पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। अमेरिकी दूतावास का बदलता रवैया इसी सोच का नतीजा है।

रूसी तेल की खरीद से भारत ने बचाई ₹1.05 लाख करोड़ की रकम, इंटरनेशनल मार्केट में भी कीमतें रही नियंत्रित: सितंबर में इंपोर्ट बढ़ाएँगी भारतीय कंपनियाँ

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में रूस से कच्चा तेल खरीदना काफी बढ़ा दिया है और इसका सीधा फायदा भारतीय रिफाइनरियों और देश की तेल खरीद पर पड़ा है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 2022-23 से लेकर अब तक भारत ने रूसी तेल से कम से कम 12.6 बिलियन डॉलर (1.046 लाख करोड़ रुपए) की बचत की है।

यह बचत केवल रूसी तेल की कीमतों में मिलने वाली छूट से ही नहीं, बल्कि इस बात से भी जुड़ी है कि अगर भारत ने रूस से तेल नहीं खरीदा होता, तो वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें और अधिक बढ़ जातीं और देश का तेल आयात बिल और भारी हो जाता।

शुरू में रूसी तेल पर मिलने वाली छूट काफी अधिक थी, जो 2022-23 में लगभग 13.6 प्रतिशत थी और इसने भारत को 4.87 अरब डॉलर (40,421 करोड़ रुपए) की बचत करने में मदद की। हालाँकि समय के साथ यह छूट कम हुई और वित्त वर्ष 2024-25 में यह केवल 2.8 प्रतिशत रह गई। इसके बावजूद यह भारत के लिए महत्वपूर्ण साबित हुई।

रूसी तेल से भारत को हुआ काफी फायदा

रूसी तेल की खरीद का भारत में सबसे बड़ा फायदा रिफाइनरी कंपनियों को हुआ, जिसे सस्ते कच्चे तेल मिले। 2023-24 में रूस से तेल की मात्रा 373 मिलियन बैरल (59.3 बिलियन लीटर) से बढ़कर 609 मिलियन बैरल (96.83 बिलियन लीटर) हो गई, जिससे बचत भी बढ़ी और कुल 5.41 अरब डॉलर (44,903 करोड़ रुपए) की बचत दर्ज हुई।

इस दौरान रूसी तेल की औसत पहुँच मूल्य 76.39 डॉलर (6,340 रुपए) प्रति बैरल रही, जबकि अन्य आपूर्तिकर्ताओं से तेल की औसत पहुँच मूल्य 8.89 डॉलर (738 रुपए) अधिक थी। 2024-25 में छूट घटने के बावजूद, भारत की रिफाइनरियों ने रूसी तेल खरीदना जारी रखा, क्योंकि यह आर्थिक दृष्टि से फायदेमंद था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, वास्तविक लाभ केवल कीमत में छूट तक सीमित नहीं है, भारत की तेजी से बढ़ती माँग ने वैश्विक तेल की कीमतों को नियंत्रण में रखने में मदद की, जिससे तेल पर देश का कुल खर्च कम हुआ।

इस पूरे मुद्दे में अमेरिकी दबाव भी एक अहम पहलू है। डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने रूस से तेल आयात पर भारत को दबाव में लाने के लिए अतिरिक्त टैरिफ लगाए। अगस्त में ट्रम्प ने भारतीय आयात पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ की घोषणा की, जिससे कुल टैरिफ 50 प्रतिशत तक पहुँच गया। यह कदम अमेरिकी नीति का हिस्सा था, ताकि भारत रूस से तेल खरीदना कम करे और मास्को को यूक्रेन युद्ध में दबाव में लाया जा सके।

भारत ने इस दबाव के आगे झुकने का कोई संकेत नहीं दिया। भारत सरकार ने स्पष्ट किया कि देश अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखेगा और अमेरिका यह तय नहीं करेगा कि भारत किस देश से व्यापार करे। भारतीय रिफाइनरी कंपनियों ने कहा कि वे रूसी तेल खरीदना जारी रखेंगे।

रूस के लिए भारत का महत्व भी लगातार बढ़ा है। फरवरी 2022 में, जब रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण किया, भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 2 प्रतिशत से भी कम थी। पश्चिमी देशों ने रूसी तेल से दूरी बनानी शुरू की और रूस ने इच्छुक खरीदारों को छूट देना शुरू कर दी।

भारतीय रिफाइनरियों ने इस मौके का तुरंत लाभ उठाया और रूस कुछ ही महीनों में भारत के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा स्रोत बन गया। पारंपरिक पश्चिम एशियाई आपूर्तिकर्ताओं भी इस दौर में पीछे छूट गए।

अब भारत के कुल तेल आयात में रूस का हिस्सा एक तिहाई से अधिक है और यह दुनिया में रूस का दूसरा सबसे बड़ा ग्राहक बन गया है। इसके अलावा, रूसी तेल मास्को के लिए राजस्व का सबसे बड़ा स्रोत है और भारत की लगातार बढ़ती खरीद ने क्रेमलिन को वित्तीय मदद भी दी।

वैश्विक आपूर्ति को स्थिर रखने में मिली मदद

रूसी तेल खरीद में समय के साथ छूट घटने के पीछे कई कारण हैं। इसमें मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में सामान्य गिरावट और माल ढुलाई और बीमा लागत में वृद्धि शामिल है। पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूसी तेल की ढुलाई और बीमा महंगा हुआ है, जिससे वास्तविक लैंडेड कीमत पर छूट कम हो गई है।

भारत के लिए लैंडेड मूल्य ही मायने रखता है, क्योंकि यही वह राशि है जो रिफाइनिंग कंपनियाँ वास्तव में चुकाती हैं। व्यापारियों के अनुसार, रूस से तेल की बढ़ती खरीद ने न केवल भारतीय रिफाइनरियों को सस्ता तेल उपलब्ध कराया, बल्कि वैश्विक आपूर्ति को स्थिर रखने में भी मदद की, जिससे भारत को अन्य स्रोतों से महंगा तेल खरीदने की जरूरत नहीं पड़ी।

सप्लाई की स्थिति और भविष्य की संभावनाओं की बात करें, तो सितंबर में भारत की रूसी तेल की खरीद अगस्त से 10-20 प्रतिशत बढ़ने की संभावना है, यानी प्रतिदिन लगभग 1.5 लाख से 3 लाख बैरल तक। रूस ने यूरोप और अमेरिका की खरीद सीमित होने के कारण अपनी आपूर्ति बढ़ाई है।

हाल ही में यूक्रेन ने रूसी रिफाइनरियों पर हमला किया, जिससे देश की रिफाइनिंग क्षमता का 17 प्रतिशत हिस्सा बंद हो गया है। इसके बावजूद रूस के पास अगले महीने निर्यात करने के लिए पर्याप्त तेल हैं।

भारत की दो सबसे बड़ी रिफाइनरियाँ, रिलायंस और नायरा एनर्जी ने संकेत दिया है कि वे तेल खरीदना जारी रखेंगी। ये कंपनियाँ मुख्य रूप से रूसी तेल पर निर्भर हैं।

वैश्विक बाजार पर प्रभाव

वैश्विक बाजार पर इसका असर भी महत्वपूर्ण है। अगर भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया होता, तो वैश्विक आपूर्ति में लगभग दस लाख बैरल प्रतिदिन की कमी होती और कीमतें अल्पकालिक रूप से लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ सकती थीं।

इसके अलावा, भारत रूस का सबसे बड़ा खरीदार बनकर वैश्विक तेल बाजार में संतुलन बनाए रखने में भी योगदान दे रहा है। अमेरिका और यूरोप के प्रतिबंधों के बावजूद भारत की माँग रूस को अपनी आपूर्ति बनाए रखने में मदद कर रही है।

हाल के वर्षों में भारत द्वारा रूसी तेल की बढ़ती खरीद ने देश को सस्ते कच्चे तेल का लाभ दिया है। 2024 में OPEC का हिस्सा बढ़ा और पेट्रोलियम निर्यातक देशों से महंगी आपूर्ति के कारण भारत की रणनीति और महत्वपूर्ण हो गई।

सितंबर में रूस ने यूराल क्रूड को ब्रेंट के मुकाबले 2-3 डॉलर प्रति बैरल की छूट पर बेचा, जो अगस्त के 1.50 डॉलर से सस्ता था। इसका मतलब है कि भारत आर्थिक रूप से लाभ उठा रहा है और अमेरिकी टैरिफ के बावजूद अपने तेल मिश्रण में रूसी तेल को प्रमुख बनाए रखेगा।

अगले कुछ महीनों में भारत का रूसी तेल आयात बढ़ते रह सकता है, क्योंकि न केवल यह सस्ता है, बल्कि वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता बनाए रखने में भी मदद करता है। भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तेल पर प्रतिबंध नहीं होने तक वह जहां से सबसे अच्छा सौदा मिलेगा, वहाँ से तेल खरीदेगा।

अमेरिकी टैरिफ और दबाव के बावजूद, देश ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखी है और रूसी तेल की खरीद को प्राथमिकता दी है। इस वजह से भारतीय रिफाइनरियों को आर्थिक लाभ मिला है और वैश्विक तेल बाजार में भारत का प्रभाव भी मजबूत हुआ है।

हमें सैयदा हमीद की ‘इंसानियत’ न बताओ द वायर और अपूर्वानंद, हमने ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ का हिंदू नरसंहार देखा है

सैयदा हमीद, आज से करीब एक हफ्ते पहले तक देश का बड़ा वर्ग इस नाम को नहीं जानता होगा। अब हालात बदल गए हैं, सैयदा वामपंथी और अर्बन नक्सल गिरोह की ‘पोस्टर गर्ल’ बन गई हैं। आपको लगेगा उन्होंने कोई क्रांतिकारी काम किया है लेकिन ऐसा है नहीं।

उन्होंने भारत में घुसपैठियों की वकालत की है, उनका मानना है कि असम में बांग्लादेशियों को रहने देना चाहिए क्योंकि ये धरती अल्लाह ने इंसानों के लिए ही बनाई है। गैर-कानूनी घुसपैठ की इस वकालत को अपूर्वानंद जैसे अर्बन नक्सल गिरोह के लोग ‘इंसानियत’ बता रहे हैं।

अपूर्वानंद ने ‘द वायर’ में एक लंबा लेख लिखकर सैयदा हमीद को विक्टिम बनाने की पूरी कोशिश की है, उनकी नजर में असली दिक्कत भारत के लोग हैं ना की सैयदा। उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों की वकालत करने वाली सैयदा असल में मासूम हैं, जो लोग नहीं समझ पा रहे हैं।

अपूर्वानंद का विक्टिम कार्ड

अपूर्वानंद ने लिखा, “वह वीडियो देखा जिसमें वे बांग्लादेशियों के बारे में कुछ कह रही हैं, देखा कि वे कैमरेवालों से घिरी हुई हैं। जाहिरा तौर पर उनसे बांग्लादेशियों के बारे में कुछ पूछा जा रहा है। सवालों की बौछार से आजिज़ आकर सैयदा कहती हैं।

द वायर के लेख का हिस्सा

यानी, अपूर्वानंद बता रहे हैं कि सैयदा ने जो कह दिया सो ठीक है क्यों पत्रकारों ने उन्हें परेशान कर दिया था, जाहिर है कि जब कोई किसी दौरे पर किसी राज्य में एक प्रोपेगेंडा के तहत जाएगा तो सवाल तो पूछे ही जाएँगे।

सैयदा का पूरा बयान सुनकर कहीं आपको नहीं लगेगा कि वो परेशान हैं, तनाव में हैं या उन्हें कोई समस्या है। इसके अल्ट वो आक्रामक लहजे में अपनी बात कह रही हैं। अपूर्वानंद द्वारा सैयदा को विक्टिम बनाने की शुरुआत यहीं से हो जाती है।

दरअसल, सैयदा हमीद, प्रशांत भूषण और हर्ष मंदर जैसे वामपंथियों का एक गुट 2 दिन के लिए असम के दौरे पर ‘बेदखली’ का अध्ययन करने गया था। यह गुट घुसपैठियों को पीड़ित बनाने पर तुला हुआ था, लगे हाथ सैयदा ने बांग्लादेशी घुसपैठियों को भी पीड़ित ही बना दिया।

भारतीयों पर ही अपूर्वानंद का निशाना

खैर, वापस अपूर्वानंद पर लौटते हैं। वह सैयदा के बयान का आशय खुद ही समझाते हुए लिखते हैं, “भारत में बांग्लादेशियों का अपराधीकरण कर दिया गया है। उनके साथ किसी इंसानी बर्ताव की कल्पना भी नहीं की जा सकती। सैयदा सिर्फ इतना कह रही थीं कि बांग्लादेशियों को इंसान की तरह देखने की जरूरत है। उनके किसी लफ्ज से यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि वे भारत में गैर-कानूनी तरीके से बांग्लादेशियों के रहने की वकालत कर रही हैं।

द वायर का लेख

हालाँकि, जब आपने सैयदा का बयान सुना तो स्पष्ट था तो वो बांग्लादेशियों के भारत में रहने की वकालत कर रही हैं। कोई बांग्लादेशी घुसपैठ करने भारत में आता है और यहाँ कब्जा कर लेता है तो वो किस तरह से रहना हुआ। बांग्लादेशी किस नियम का पालन कर भारत में घुसपैठ करता है? घुसपैठिए का भारत में कानून रहना कैसे संभव है?

अपूर्वानंद प्रोफेसर हैं तो, शब्दों के जाल से लोगों को उलझाने की कोशिश कर रहे हैं। जब बात घुसपैठ पर हो रही हो, और कोई कहे कि ‘बांग्लादेशी भी यहाँ रह सकते हैं’ तो इसका मतलब यही होता है।

बहुत चालाकी से अपूर्वानंद ने इसमें यह भी कहने की कोशिश की है कि बांग्ला बोलने वाले मुसलमानों पर भारत में हमले हो रहे हैं। जैसे उन्होंने सैयदा के बयान का खुद आशय निकाला है, उनका आशय भी साफ है कि वो बंगाल को निशाना बनाने की कोशिश कर रहे हैं। यह महीन सोच देश के भीतर ही यह बताने की कोशिश है कि भारत में बांग्ला भाषियों को मारा-पीटा जा रहा है।

पूरा देश ही अपूर्वानंद के निशाने पर है

अब इस लेख में आगे बढ़ते हैं। अपूर्वानंद ‘द वायर’ में लिखते हैं, “सैयदा अपने भोलेपन में भूल गईं कि आज के हिंदुस्तान और असम में उनकी इस इंसानियत की माँग का जवाब हिंसा ही हो सकता है। वह हमला मुख्यमंत्री ने शुरू किया। बाकी सब उस हमले में शामिल हो गए। लेकिन इस हमले के लिए उनके इस बयान की ज़रूरत भी न थी

अब इसे महीनता से समझें तो इसमें दो बाते हैं एक ‘सैयदा का भोलापन और असम के मुख्यमंत्री की हिंसा’। अपूर्वानंद ने सैयदा के सारे बयानों को उनके भोलेपन के आवरण में ढंक दिया। अब शब्दों पर गौर करिए ‘आज के हिंदुस्तान और असम’…’इंसानियत की माँग का जवाब हिंसा’…’हमला मुख्यमंत्री ने शुरू किया’। इन शब्दों के जरिए महीन तरीके से माहौल बनाया जा रहा है। वो भी देश के खिलाफ, असम के सीएम के खिलाफ और यह साबित करने की कोशिश है कि आज के भारत में इंसानियत की कोई जगह नहीं बस हिंसा की जगह है।

आगे बढ़िए, ‘हमले के लिए उनके इस बयान की ज़रूरत भी नहीं थी’ यानी बयान को भूल जाओ और बस यह याद रखो कि इस बयान के बाद जो सवाल उठ रहें हैं वो तो बेमानी ही हैं। ये कोशिश है कि कैसे लोगों को आरोपी बनाया जाए और सैयदा को क्लीन चिट दे दी जाए।

द वायर का लेख

याद रखिए कि अपूर्वानंद जैसे लोग जो आज इंसानियत की दुहाई दे रहे हैं वो CAA के खिलाफ भर-भरकर बयानबाजी कर रहे थे। इनका यह इंसानियत का चोला सुविधा के अनुसार ओढ़ा जाता है। जब पीड़ितों में अधिकतर हिंदू थे तो इन्हें ना इंसानियत याद आई, ना भोलापन याद आया।

जिस CAA के खिलाफ यह गिरोह लिख रहा था, उसमें तो प्रताड़ितों को भारत की नागरिकता मिलनी थी। वो लोग तो घुसपैठ करके किसी दूसरे देश पर ‘कब्जा’ करने की नियत से नहीं आए थे। उनकी तो पुण्यभूमि भी यही थी। तब भी इस गिरोह के पेट में दर्द था।

घुसपैठियों पर दर्द से दिक्कत में क्यों अपूर्वानंद?

अपूर्वानंद ने लिखा, “पिछले 11 साल भारतीय जनता पार्टी और भारत का बड़ा मीडिया ‘घुसपैठियों’ के खिलाफ युद्ध कर रहा है। उस युद्ध में सैयदा, हर्ष और प्रशांत जैसे भारतीयों को गद्दार ठहराया जा रहा है जो दुश्मन के साथ मिले हुए हैं।”

द वायर का लेख

अगर, घुसपैठियों के खिलाफ युद्ध चल भी रहा है तो इससे अपूर्वानंद जैसे लोगों को क्या दिक्कत हो सकती है। कल को ये लोग हत्यारों, बलात्कारियों के समर्थन में भी उतर आएँगे कि इन पर कार्रवाई क्यों? इनके खिलाफ युद्ध क्यों? कोई अगर गैरकानूनी काम करेगा तो उसकी पूजा तो नहीं की जाएगी। उसके खिलाफ कार्रवाई ही होगी। वहीं, सरकार कर रही है।

भारत के लिए खतरा हैं घुसपैठिए

ये घुसपैठिए भारत की डेमोग्राफी के लिए इतना बड़ा खतरा है कि खुद पीएम मोदी को लाल किले की प्राचीर से घुसपैठ के खिलाफ मिशन की शुरुआत करने की बात कहनी पड़ी है। ये घुसपैठिए आज भारत में गली-नुक्कड़ से लेकर बड़े-बड़े शहरों में क्राइम में लिप्त हैं।

पिछले दिनों एक बांग्लादेशी द्वारा सैफ अली खान पर हमले की खबर सुर्खियों में रही थी, इसके अलावा भी ये घुसपैठिए हत्या से लेकर बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों में लिप्त हैं। ये घुसपैठिए अब केवल सीमावर्ती इलाकों तक सीमित नहीं है बल्कि देश के भीतरी इलाकों में भी फैल गए हैं।

ये ना केवल हमारी डेमोग्राफी को बदल रहे हैं बल्कि हमारे मठ, मंदिर, जंगल हर जगह जमीन पर कब्जा कर रहे। यहाँ तक की देश में ये घुसपैठिए संगठित हिंसा में भी शामिल हैं। ये दंगा फैलाने में भी सबसे आगे नज़र आते हैं।

खुद बांग्लादेश में किस तरह अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहे हैं यह किसी से छिपा नहीं है। ये लोग महिलाओं, नाबालिग बच्चियों को निशाना बना रहे हैं। हिंदू धर्म स्थलों को तोड़ा जा रहा है। हिंदुओं की चुन-चुनकर हत्याएँ की जा रही हैं।

कल इनमें से ही कोई भारत में घुस आएगा तो ये आज जो इंसानियत का रोना रो रहे हैं, घुसपैठियों की वकालत कर रहे हैं। ये खुद भी उनके निशाने पर होंगे। यह बात समझने की जरूरत है कि देश विरोधी बातें कर ‘कूल’ बनने का जो नया चलन शुरू हुआ है, यह असल में बेहद खतरनाक है। यह क्रूरता है।

घुसपैठियों की वकालत ‘कूल’ नहीं ‘क्रूर’

आज अपूर्वानंद भारत के लोगों को इंसानियत सिखाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन भारत के लोगों ने कट्टरपंथी सोच के जख्म सदियों तक झेले हैं। ये घुसपैठिए जो भारत में आकर भारत को खोखला कर अपनी कट्टरपंथी सोच को आगे बढ़ाना चाहते हैं, भारत को उससे बचने की जरूरत है।

16 अगस्त 1946 को ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के नाम पर कोलकाता की सड़कों पर हिंदुओं के कत्लेआम कोई कैसे भूल सकता है। हजारों हिंदुओं को मुस्लिम कट्टरपंथी ने सिर्फ अपनी मानसिकता की वजह से मार गिराया था।

भारत ने ऐसी ही कट्टरपंथी सोच के चलते अपना बड़ा भू-भाग खो दिया है। देश ने इसी सोच के कारण बँटवारे का दंश झेला है। यही बांग्लादेश, जिससे आज लोग भारत में जबरन घुसपैठ कर रहे हैं, कभी भारत का हिस्सा हुआ करता था। फिर यहाँ कट्टरपंथी सोच आती गई, जिहादियों के इलाके बन गए और देश बँट गया।

बँटवारे के दौरान लाखों लोगों की हत्याएँ हुई, बहन-बेटियों के बलात्कार हुए और चोरी-डकैती की घटनाओं की बाढ़ आ गई। ये आज के ‘कूल’ दिखने वाले लोग देश को वापस उसी दौर में ले जाने पर आमादा है।

पर, अपूर्वानंद और ‘द वायर’ कितनी भी कोशिश कर लें लेकिन ये देश, देश के लोग एक बार फिर भारत को नहीं बँटने देंगे। भारत घुसपैठियों के खिलाफ मजबूती से खड़ा है और खड़ा रहेगा। भारत को इंसानियत का सबक सीखने के लिए अपूर्वानंद की जरूरत नहीं है। भारत ने इस दुनिया को इंसानियत और मानवता का पाठ पढ़ाया है।

भारत-रूस-चीन की दोस्ती से क्यों बौखला रहा अमेरिका: टैरिफ विवाद के बीच क्या ट्रंप को है दुनिया के हृदय परिवर्तन का डर?

चीन के शहर तियानजिन में रविवार (31 अगस्त 2025) को हुए शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बढ़ती दोस्ती ने वैश्विक राजनीति में एक नया समीकरण खड़ा कर दिया है।

जहाँ एक ओर तीनों देशों के एक साथ आने से दुनिया नई संभावनाओं की ओर देख रही है तो वहीं, दूसरी तरफ ये साझेदारी अमेरिका के लिए कई स्तरों पर चुनौती के तौर पर सामने आ सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई नीतियों और रणनीतिक दृष्टिकोण को यह गठजोड़ असहज कर रहा है।

पीएम मोदी के साथ पुतिन और शी जिनपिंग की मुलाकात जियोपॉलिटिकल मसले के आधार पर कभी अहम मानी जा रही है। ट्रंप पहले से ही BRICS समूह के लिए खरी-खोटी सुना चुके हैं। अब SCO को लेकर भी उनकी बेचैनी साफ तौर पर देखा जा सकती है।

गौरतलब है कि ट्रंप ने अपनी धौंस और सत्ता की हनक दिखाने के लिए दुनियाभर में टैरिफ जंग छेड़ दी। अपनी मनमर्जी पर अलग-अलग देशों से अमेरिका में आयातित सामानों पर लगाए टैरिफ से हर देश किलस उठा। इसका नतीजा ये हुआ कि टैरिफ के कारण भारत, चीन और रूस के बीच नजदीकियाँ बढ़ गई। तीनों देश मिलकर अमेरिका की ‘टैरिफ धमकियों’ का जवाब देने की रणनीति बना रहे हैं।

भारत को घुटनों पर लाने की हर कोशिश रही नाकाम

ट्रंप ने पहले भारत-पाकिस्तान के बीच चले सैन्य संघर्ष में संघर्षविराम का श्रेय लेने की कोशिश की। इसे भारत की ओर से नकार दिया गया। उन्हें लगा था कि इसके जरिए वे नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामिक किए जा सकेंगे। लेकिन ये हुआ नहीं।

इसके बाद अमेरिका ने ट्रेड डील के तहत पहले भारत के कृषि और डेयरी समेत उन बाजारों में घुसने की कोशिश की जिसमें भारत का प्रभुत्व कहीं अधिक है। लेकिन भारत की ओर से इस पर मंजूरी नहीं मिल पाई और अमेरिका की खुद के मुनाफा कमाने की चाहत धरी की धरी रह गई।

इसके बाद ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत को उलाहना देना शुरू किया। इसके बाद ही भारत पर 25% टैरिफ लगाया और रूसी तेल की खरीद पर अपनी खीझ उतारने के लिए अतिरिक्त 25% टैरिफ लगाकर इसे दोगुना कर दिया।

असल में तो भारत और चीन, दोनों ही रूस से बड़े पैमाने पर तेल खरीद रहे हैं। इसे अमेरिका यूक्रेन युद्ध को फंड करने के रूप में देखता है। हालाँकि इस पर अपना पक्ष भारत ने मजबूती से रखा है। साथ ही अमेरिका को भी रूस के साथ कर रहे व्यापार के लिए पलटवार किया।

SCO सम्मेलन में न केवल पीएम मोदी, जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति पुतिन मिले हैं बल्कि संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेस, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन, तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी शामिल हैं। इस लिहाज से दुनिया को स्पष्ट संदेश मिला है कि चीन इस मंच को ग्लोबल साउथ की एकता के रूप में दिखाने की कोशिश में है।

BRICS असल में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका देशों का समूह है तो वहीं SCO शंघाई सहयोग संगठन है। हाल के वर्षों में ब्रिक्स एक बड़ा आर्थिक संगठन बनकर उभर रहा है, जिसकी अर्थव्यवस्था 20 ट्रिलियन डॉलर (लगभग ₹1,763 लाख करोड़) से ज्यादा है।

अमेरिका को क्या है खतरा?

भारत, रूस और चीन जैसे बड़े राष्ट्र जब BRICS और SCO जैसे बड़े मंच पर साथ आते हैं तो यह अमेरिका की एकध्रुवीय ताकत को चुनौती देता है। असल में तीनों देशों का यह गठजोड़ एक नया पावर सेंटर बना सकता है जो पश्चिमी देशों पर अपना प्रभाव बढ़ा सकता है।

SCO जैसे मंचों पर इन देशों के बीच सैन्य अभ्यास और सुरक्षा सहयोग बढ़ रहा है, जिससे अमेरिका की एशिया में रणनीतिक पकड़ कमजोर हो सकती है।

दूसरी ओर देखा जाए तो BRICS देशों की ओर से एक वैकल्पिक वित्तीय ढाँचे को लेकर चर्चा की जा रही है। इसके तहत डॉलर के बजाय स्थानीय या साझा करेंसी का उपयोग हो सकता है। इससे अमेरिका की आर्थिक ताकत को सीधा झटका लग सकता है।

ट्रंप की क्यों बढ़ रही बेचैनी?

ट्रंप की टैरिफ नीतियों ने भारत और चीन जैसे देशों को अमेरिका से दूर कर दिया है। साथ ही भारत और चीन के बीच की दूरियों को भी खत्म करने का में भूमिका निभाई है। अब जब ये देश रूस के साथ मिलकर एक मंच साझा कर रहे हैं तो यह अमेरिका के लिए कूटनीतिक सिरदर्द बन गया है।

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने साफतौर पर कहा है कि उनके रिश्तों से ‘किसी तीसरे देश को टेंशन लेने की जरूरत नहीं’, ये ट्रंप के लिए एक सीधा और कड़ा संदेश था।

अमेरिका की कोशिश थी कि भारत को चीन के खिलाफ अपने खेमे में बनाए रखे, लेकिन अब भारत चीन और रूस के साथ सहयोग बढ़ाकर संतुलन की राजनीति अपना रहा है।

इस लिहाज से ये दोस्ती न केवल अमेरिका की विदेश नीति को चुनौती दे रही है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को भी एक नई परिभाषा देने की कोशिश कर रही है।