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TV पत्रकार बनकर बात करता था पाकिस्तानी अधिकारी, CRPF जवान से गुप्त जानकारी लेता था: मिलते थे ₹3500-12 हजार, हमले से 5 दिन पहले पहलगाम से हुआ था ट्रांसफर

पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किए गए सीआरपीएफ के एएसआई मोतीराम जाट से पूछताछ में NIA को कई नई बातें पता चली हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई है कि एक पाकिस्तानी अधिकारी ने चंडीगढ़ की एक न्यूज जर्नलिस्ट बनकर उससे भारत की कई अहम जानकारियाँ ली थी।

हनीट्रैप में फँसा CRPF जवान मोतीराम जाट बीते 2 सालों से भारत की कई खुफिया जानकारियाँ साझा कर रहा था। पहलगाम हमले से सिर्फ 5 दिन पहले ही उसका ट्रांसफर दिल्ली हुआ था।

TV जर्नलिस्ट बन जवान को फाँसा

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जाँच में सामने आया कि एक महिला खुद को चंडीगढ़ का TV जर्नलिस्ट बताते हुए CRPF जवान के संपर्क में आई थी। उसने जवान से कुछ जानकारियाँ साझा करने की गुजारिश की। इसके बाद महिला लगातार जवान के संपर्क में बनी रही। नजदीकियाँ बढ़ाने के लिए मैसेज, कॉल्स और वीडियो कॉल्स तक किए।

मोती राम ने इसके बाद महिला से कई खुफिया जानकारियाँ साझा करनी शुरू कर दी थी। दो से तीन महीने तक बातचीत के बाद महिला ने एक अन्य व्यक्ति को उसी न्यूज चैनल का पत्रकार बताकर संपर्क करवाया। असल में वह एक पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी का अधिकारी था।

CRPF जवान के फोन की भी जाँच की गई है। इसमें पता चला कि उसकी तरफ से कोई भी मैसेज डिलीट नहीं किया गया था। पर साथ में ये भी मिला कि मोती राम ने सुरक्षा एजेंसियों की आवाजाही की न्यूज की कुछ क्लिप्स भी साझा की थी। इस पर पत्रकार बने अधिकारी ने उससे उन जानकारियों को भेजने से मना कर दिया जो पहले से ही लोगों को पता हो।

पहलगाम हमले के बाद भी दी जानकारी

रिपोर्ट्स के अनुसार, मोतीराम ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद भी कई जानकारियाँ पाकिस्तानी जासूसों को दी थी। इसके एवज में पत्रकार बने अधिकारी ने उसे ₹3500 महीने और किसी एक्सक्लूसिव और अहम जानकारी के लिए ₹12000 अतिरिक्त दिए थे। ये पैसे उसने अपनाे और अपनी पत्नी के बैंक खाते में लिए थे।

जवान की ओर से साझा की गई जानकारियों में आतंकी हमले के बाद गृहमंत्री अमित शाह का कश्मीर दौरा, सीआरपीएफ जवानों की आवाजाही की संख्या, आतंकियों के ठिकानों की जानकारी और 50 पर्यटन स्थलों के बंद होने की बात शामिल है।

CRPF में सहायक उपनिरीक्षक (ASI) मोती राम जाट ट्रांसफर से पहले पहलगाम में ही 116 बटालियन में तैनात था। NIA ने उन्हें सोमवार (26 मई 2025) को उसे दिल्ली से गिरफ्तार किया था। 2023 से वह पाकिस्तान के अधिकारियों (PIO) को भारत की खुफिया जानकारी शेयर कर रहे थे। जवान को 6 जून 2025 तक NIA की कस्टडी में भेजा गया है।

शिक्षा की ब्रेनवॉशिंग इंडस्ट्री, ब्रेनवॉश्ड बच्चे व अभिभावक… आपके ही घर की कहानी है ‘His Story Of इतिहास’, समझा देती है सरकार और ‘सिस्टम’ में अंतर

इन सवालों के हमने अपनी पाठ्यपुस्तकों में क्या जवाब पढ़ा है, ये हमें भी मालूम है और आपको भी। लेकिन, क्या वो जवाब सही हैं? या फिर सच्चाई कुछ और है, जिसे व्यवस्थागत ढंग से हमसे छिपाया गया? कई पीढ़ियों को भ्रम में रखा गया? हमारे बच्चों में अपने ही देश और उसकी संस्कृति के प्रति हीन भावना भर दी गई? ‘His Story Of इतिहास’ एक ऐसी फ़िल्म है जो इन्हीं सवालों के जवाब तलाशती है।

आगे बढ़ने से पहले फ़िल्म के बारे में बता दें। फ़िल्म में सुबोध भावे मुख्य भूमिका में हैं, सारी कहानी इन्हीं के द्वारा निभाए गए फिजिक्स के शिक्षक के किरदार पर आधारित है। मराठी में सुबोध भावे लंबे समय से सक्रिय हैं, कई अवॉर्ड्स जीत चुके हैं। थिएटर बैकग्राउंड से आते हैं, ऐसे में उनके अभिनय को लेकर बहुत कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। उनके अलावा वरिष्ठ अभिनेता योगेंद्र टीकू इस फिल्म में इतिहास के प्रोफेसर के किरदार में हैं। उन्हें कई फ़िल्मों में हम और आप देख चुके हैं। हम चाहेंगे कि आप थिएटर में जाकर ही इस फ़िल्म को देखें, इसीलिए इस समीक्षा व विश्लेषण में हम कहानी नहीं खोलेंगे। कम बजट की फ़िल्म है, काफ़ी संघर्ष और मेहनत करके बनाई गई है – हमारा कर्तव्य है इसका मान रखना। संघर्ष इसीलिए, क्योंकि इस फ़िल्म का विषय ऐसा है कि लगभग 60 एक्टर्स ने इसे रिजेक्ट कर दिया था। फ़िल्म के निर्देशक व निर्माता हैं मनप्रीत सिंह धामी, जिन्होंने ‘पंचकर्मा फिल्म्स’ के बैनर तले इसे बनाया है।

एक बड़ी समस्या को खँगालती है ‘His Story Of Itihaas’

फ़िल्म सच्ची घटनाओं पर आधारित है, लेखक व विश्लेषक नीरज अत्री की पुस्तक ‘ब्रेनवॉश्ड रिपब्लिक’ अगर आपने पढ़ी है, तो आपको पता है कि फ़िल्म में आप क्या देखने वाले हैं। नीरज अत्री लंबे समय से हमारे पाठ्यपुस्तकों में हुई मिलावट के विरुद्ध आवाज़ उठाते रहे हैं। उन्होंने बच्चों को पढ़ाए जा रहे कई तथ्यों को लेकर NCERT से सवाल पूछा, जवाब में बोर्ड कोई भी सबूत या स्रोत पेश नहीं कर पाया। उन्होंने एक पूरी की पूरी किताब लिख डाली। YouTube पर अपने चैनल ‘पॉलिटिकली इनकरेक्ट’ के जरिए भी वो जागरूकता फैलाते रहते हैं।

चलिए, वापस लौटते हैं फ़िल्म पर। एक संवेदनशील विषय और वास्तविक घटनाओं पर आधारित होने के बावजूद ये कभी भी आपको बोर नहीं होने देती है। वामपंथी इतिहास प्रोफेसरों व लेखकों के जो किरदार हैं, वो आपको वास्तविक व देखे-सुने हुए लगेंगे। हाँ, कई लोगों को ये पहली बार पता चलेगा कि कैसे बच्चे और अभिभावक इनके जाल में फँसते चले जाते हैं। फ़िल्म में 2 परिवारों और उनके बच्चों की कहानी समानांतर चलती रहती है – एक समृद्ध परिवार है और एक अपेक्षाकृत ग़रीब। फ़िल्म ये दिखाने में सफल रही है कि जिस समस्या को उसने एक्स्प्लोर किया है, उससे प्रभावित होने वालों में क्लास या लिंग का कोई भेद नहीं है।

फ़िल्म व्यवस्था के ख़िलाफ़ संघर्ष है, ललकार है, व्यवस्था बदलने के बाद जो व्यवस्था बनती है – उस नई व्यवस्था की लाचारी है। ‘His Story Of Itihaas’ आपके घर की कहानी है। बच्चों को ‘Sit करो’ और ‘Eat करो’ कहने वाली ब्रेनवॉश्ड माँओं की कहानी है। बैंक से ऋण का बोझ अपने सिर पर लादकर बच्चों को मिशनरी स्कूल में पढ़ाने वाले उन ब्रेनवॉश्ड पिताओं की कहानी है, जो इस तनाव में अपने ऊपर BP और शुगर जैसी बीमारियों को हावी कर लेते हैं। स्वस्तिक को नाजी प्रतीक समझकर इससे घृणा करने वाली ब्रेनवॉश्ड बच्ची की कहानी है। कूल दिखने के चक्कर में पश्चिमी सभ्यता के आगोश में जाकर ईसाई धर्मांतरण की तरफ बढ़ रहे ब्रेनवॉश्ड किशोर की कहानी है। ये अपने ही देश व समाज को हीन भावना से देखने वाले एक ब्रेनवॉश्ड IAS अधिकारी की कहानी है।

ये एक ब्रेनवॉशिंग इंडस्ट्री की भी कहानी है। वो इंडस्ट्री, जिसमें बड़ी बिंदी वाले गैंग की महिला एक्टिविस्ट है जो अपने लिखे को ही अकाट्य सत्य मानती है और उसे कोई काट दे तो इसे ‘Rant’ कहती है। वो इंडस्ट्री, जिसमें मौलानाओं के नैरेटिव को बनाए रखने के लिए मंदिर की जगह को मस्जिद बताने वाला इतिहासकार होता है। वो इंडस्ट्री, जिसमें सही इतिहास पढ़ाने वाले एक प्रोफेसर को उसकी भाषा को लेकर बेइज्जत किया जाता है। वो इंडस्ट्री, जिसमें तमाम बदलावों की बात करके सरकार में पहुँचने वाले नेता भी लाचार हो जाते हैं। वो इंडस्ट्री, जिसने सरकार पर दबाव बनाने के लिए सड़क से लेकर संसद और विश्वविद्यालयों तक तमाम तिकड़म ढूँढ रखे हैं।

अछूत माने जाने वाले विषयों पर अब बन रही हैं फ़िल्में

मैं कोई तकनीकी समीक्षा नहीं करने जा रहे, क्योंकि बहुत हद तक ये फ़िल्म इससे परे है। कहानी दिल्ली-नोएडा में सेट है, ऐसे में विज़ुअल्स के मामले में बहुत अधिक स्कोप बनता भी नहीं है। कहानी घरों, स्कूलों और विश्वविद्यालयों के भीतर ही घूमती रहती है, यदा-कदा एक गुरुद्वारे में पहुँचती है। इसके पीछे भी एक सन्देश है।

पहले जिन विषयों को अछूत माना जाता था, आज उनपर फ़िल्में बन रही हैं – ये अपने-आप में बहुत बड़ी बात है। 2019 में ‘द कश्मीर फाइल्स’ के साथ जो सिलसिला शुरू हुआ था, वो अब ‘छावा’ और ‘हिज स्टोरी ऑफ इतिहास’ तक पहुँच चुकी है। शायद अगर हमें इतिहास सही से पढ़ाया जाता, तो ‘द कश्मीर फाइल्स’ और ‘छावा’ जैसी फ़िल्मों की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। ये फिल्म उसी ‘ब्रेनवॉशिंग इंडस्ट्री’ की पोल खोलती है।

“सरकार उनकी है, पर सिस्टम आज भी हमारा है” – ‘The Kashmir Files’ का ये डायलॉग ‘His Story Of Itihaas’ देखने के बाद और प्रासंगिक लगने लगता है। ख़ासकर अकादमिक व क्रिएटिव जगत में आज भी उनका कब्ज़ा है, जो भारत से जुड़े हर सकारात्मक पक्ष को छिपाने या धूमिल करने की जुगत में लगे रहते हैं। इस विषय पर सिर्फ़ एक फ़िल्म से काम नहीं चलेगा, हमें कई फ़िल्में चाहिए। समस्या इतनी बड़ी है कि शायद एक प्रयास से काम न चले।

मौलवी बन मोहम्मद कासिम कर रहा था जासूसी, भारतीय सिम कार्ड के साथ ISI को खुफिया जानकारियाँ दी, दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने राजस्थान से किया गिरफ्तार

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने राजस्थान के भरतपुर से 34 साल के एक पाकिस्तानी जासूस को गिरफ्तार किया है। बताया जा रहा है कि यह जासूसी पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) के इशारे पर की जा रही थी। आरोपित की पहचान मोहम्मद कासिम के रूप में हुई है, जो एक मुस्लिम मौलवी है। अधिकारियों के मुताबिक, कासिम के संबंध जयपुर से भी हैं और वह एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप और सोशल मीडिया के ज़रिए पाकिस्तान में अपने हैंडलर्स से जुड़ा हुआ था।

ISI को सिम कार्ड पहुँचाने का आरोप

जानकारी के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने कासिम को जासूसी की गतिविधियों के लिए भारतीय मोबाइल सिम कार्ड मुहैया कराकर ISI की मदद करने के आरोप में गिरफ्तार किया है। कासिम दो बार पाकिस्तान गया था– पहली बार अगस्त 2024 में और फिर मार्च 2025 में। वह दोनों बार करीब 90 दिनों तक वहाँ रहा था।

जासूसी की ट्रेनिंग और फरार भाई

जाँच से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, कासिम को ISI ने जासूसी की खास ट्रेनिंग दी थी। उसे सिखाया गया था कि कैसे खुफिया जानकारी इकट्ठा करनी है और उसे सुरक्षित तरीके से ISI के अधिकारियों तक पहुँचाना है। कासिम का एक भाई भी है, जो अभी फरार है और उस पर भी ISI के लिए काम करने का आरोप है।

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने बताया कि पाकिस्तानी खुफिया ऑपरेटिव (PIO) भारतीय मोबाइल सिम कार्ड का इस्तेमाल व्हाट्सएप के ज़रिए कर रहे थे। वे इन सिम का उपयोग करके भारतीयों से बातचीत कर रहे थे ताकि सेना और अन्य सरकारी कार्यालयों की खुफिया जानकारी निकाल सकें।

यह जानकारी जासूसी के इस बड़े नेटवर्क के बारे में और भी गंभीर सवाल खड़े करती है। दिल्ली पुलिस ने इस मामले में कानून की उपयुक्त धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया है। अब पुलिस PIO और उनके साथियों द्वारा रची गई जासूसी की पूरी साज़िश का पता लगाने के लिए आगे की जाँच कर रही है।

इस खुलासे से पता चलता है कि कैसे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियाँ भारतीय सिम कार्ड का इस्तेमाल कर आसानी से भारतीय नागरिकों से जुड़कर देश की सुरक्षा से खिलवाड़ कर रही थीं। सुरक्षा एजेंसियाँ अब इस पूरे नेटवर्क को तोड़ने और इसमें शामिल सभी लोगों का पता लगाने की कोशिश कर रही हैं।

900 अवैध घुसपैठियों की हो रही पहचान, किए जाएँगे डिपोर्ट: ऑपरेशन पुश-बैक के साथ देशभर में चल रहा अभियान, दिल्ली में रहते हैं सबसे अधिक बांग्लादेशी

अलग-अलग राज्यों की सीमाओं से अवैध तरीके से भारत में घुसे बांग्लादेशी घुसपैठियों की खैर अब मुश्किल है। दिल्ली में 900 अवैध घुसपैठियों की पहचान हो गई है। उनकी कानूनी प्रक्रिया पूरी कर अवैध बांग्लादेशियों को डिपोर्ट किया जाएगा।

अवैध घुसपैठियों को पकड़ने और उनके मुल्क वापस भेजने के लिए सरकार ने ‘ऑपरेशन पुश-बैक’ चलाया। इसके तहत दिल्ली में लगभग 700 अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को पकड़ कर डिपोर्ट किया जा चुका है। सीमा सुरक्षा बल (BSF) के आंकड़ों की मानें तो दिल्ली में सबसे अधिक अवैध घुसपैठिए रहते हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दिल्ली पुलिस के अपराध शाखा के विशेष पुलिस आयुक्त देवेश चंद्र श्रीवास्तव का कहना है कि दिल्ली में घुसपैठियों की पहचान और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के लिए क्राइम ब्रांच और स्पेशल सेल की यूनिट अपना काम तेजी से कर रही है।

देवेश ने पहचाने गए प्रवासियों की वर्तमान स्थिति के बारे में जानकारी साझा की। उन्होंने कहा, “इस वर्ष अब तक लगभग 900 बांग्लादेशियों की पहचान की गई है। जिनके दस्तावेजों को वैध पाया गया, उन्हें छोड़ दिया गया, जबकि अन्य की जाँच अब भी चल रही है। अवैध पाए गए लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है। इसमें हिरासत, निर्वासन और आपराधिक कार्यवाही शामिल हैं।”

रिपोर्ट्स बताती हैं कि अवैध घुसपैठियों का सिंडिकेट है। इनसे जुड़े लोग घुसपैठियों को अवैध तरीके से भारत में एंट्री करवाने से लेकर उनके फर्जी दस्तावेज बनवाने, उन्हें दिल्ली तक पहुँचाने और यहाँ तक की नौकरी दिलवाने तक में भी मदद करते हैं। पुलिस जाँच के अनुसार, इन घुसपैठियों की नौकरियाँ प्राइवेट से लेकर एयरलाइन तक में लगी हुई पाई गई है। इसके साथ ही उनके बच्चे EWS कोटे के साथ बड़े-बड़े स्कूलों में पढ़ाई कर रहे हैं।

देवेश के अनुसार, “घुसपैठियों की पहचान के अभियान को नवंबर 2024 में शुरू किया गया था। अब तक के इसके परिणाम सराहनीय हैं। हम स्थानीय लोगों से भी अपील करते हैं कि कोई भी अपने आसपास किसी संदिग्ध व्यक्ति जानकारी 112 हेल्पलाइन के जरिए पुलिस को या अपने क्षेत्र के SHO, ACP या DCP को लिखित या फोन के माध्यम से दे सकता है। इसके बाद उचित कानूनी कार्रवाई की जाएगी।”

बांग्लादेशी अवैध प्रवासियों पर कार्रवाई कई राज्यों में तेज हो गई है। इसमें दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और गोवा से बड़ी संख्या में अवैध प्रवासी पकड़े गए हैं। उनकी पहचान प्रक्रिया पूरी करने के बाद डिपोर्टेशन के लिए एक्शन लिया जा रहा है।

दिल्ली में कहाँ-कहाँ मिले घुसपैठिए

रिपोर्ट के अनुसार, अवैध घुसपैठियों की पहचान करने के लिए दिल्ली के 15 जिलों के पुलिस अधिकारियों ने टीमें बनाकर अभियान चलाया था। इसके तहत पूरी दिल्ली से अवैध घुसपैठिए पकड़े गए थे। इनमें दक्षिणी दिल्ली से 67, दक्षिण-पश्चिम से 60, दक्षिण-पूर्वी जिले से 64, उत्तर-पूर्वी जिले से 9, दिल्ली के बाहरी क्षेत्र से 99, नई दिल्ली से 4, रोहिणी से 15, सेंट्रल दिल्ली से 58, उत्तरी से 68, पूर्वी से 7, पश्चिम से 27, शाहदरा से 6, द्वारका से 48, उत्तर-पश्चिम से 31 और उत्तर-बाहरी दिल्ली से 127 अवैध बांग्लादेशी डिपोर्ट किए जा चुके हैं।

इनके साथ-साथ दिल्ली में अब भी लगातार ये अभियान चल रहा है। इसके तहत घुसपैठियों की धर-पकड़ अब भी जारी है।

कॉलेज डायरेक्टर की डिमांड- पास होना है तो अकेले में मिलो: भोपाल में 4 छात्राओं ने की शिकायत, ‘मुस्लिम गैंग’ ने यहीं बनाया था हिंदू लड़कियों को अपना शिकार

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में स्थित टीआईटी कॉलेज एक बार फिर यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों के कारण सुर्खियों में है। पहले से ही कई गंभीर शिकायतों का सामना कर रहे इस कॉलेज में अब चार और छात्राओं ने कॉलेज के डायरेक्टर अरुण पांडे पर ‘बैड टच’, अश्लील बातें करने और अकेले में मिलने का दबाव बनाने का आरोप लगाया है। इन छात्राओं ने पिपलानी पुलिस थाने में अलग-अलग शिकायतें दर्ज कराई हैं, जिसके बाद पुलिस ने मामले की गहन जाँच शुरू कर दी है।

नए आरोप और छात्राओं की आपबीती

कॉलेज की एक पीड़िता, जो टीआईटी कॉलेज में BA LLB की फोर्थ ईयर की छात्रा है, ने अपनी शिकायत में बताया कि उसकी कक्षा में बायोमैट्रिक्स प्रणाली में खराबी के कारण उसकी उपस्थिति कम बताई जा रही थी। इस वजह से उसका परीक्षा फॉर्म आगे नहीं बढ़ पा रहा था।

जब उसने इस संबंध में विभाग प्रमुख से बात की, तो उसे कॉलेज के डायरेक्टर अरुण पांडे से मिलने के लिए कहा गया। छात्रा के अनुसार, पांडे से मिलने पर उन्होंने उससे अश्लील बातें कीं और उसे ‘बैड टच‘ करते हुए ‘खुश करने’ पर परीक्षा फॉर्म आगे बढ़ाने की बात कही।

छात्रा ने बताया कि जब उसने यह बात अपनी एक सहेली को बताई, तो उसने भी इसी तरह की माँग किए जाने की पुष्टि की। इसके बाद, भोपाल के अलावा मंडीदीप और रायसेन से आने वाली तीन अन्य छात्राओं ने भी अरुण पांडे द्वारा इसी तरह के यौन उत्पीड़न का शिकार होने की बात स्वीकार की।

इन चारों छात्राओं ने एकजुट होकर शिकायत दर्ज कराने का फैसला किया। उन्होंने पहले कॉलेज कमेटी से संपर्क किया, लेकिन वहाँ से कोई कार्रवाई न होने पर वे पिपलानी पुलिस थाने पहुँचीं। छात्राओं ने आरोप लगाया है कि शिकायत दर्ज कराने के बाद से कॉलेज प्रबंधन उन पर शिकायत वापस लेने का दबाव बना रहा है, उन्हें करियर खराब होने और बदनामी का हवाला दिया जा रहा है।

टीआई चंद्रिका यादव ने बताया कि चारों छात्राओं की शिकायतों की अलग-अलग जाँच की जा रही है। डायरेक्टर अरुण पांडे के बयान दर्ज किए जाएँगे और जल्द ही उनके बयानों के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।

कॉलेज का पुराना विवादित इतिहास

यह पहली बार नहीं है जब TIT कॉलेज विवादों में फँसा है। इससे पहले, कॉलेज में मुस्लिम गैंग गिरोह द्वारा हिंदू छात्राओं को प्रेम जाल में फँसाकर उनके साथ रेप करने और अश्लील वीडियो बनाने का मामला सामने आया था। इन वीडियो का इस्तेमाल छात्राओं और उनकी सहेलियों को ब्लैकमेल करने के लिए किया जाता था।

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए भोपाल पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की थी। बागसेवनिया, अशोका गार्डन और जहांगीराबाद थानों में 3 FIR दर्ज की गई थीं, जिनमें कई गंभीर धाराएं शामिल थीं। पुलिस ने इस मामले में मुख्य आरोपित फरहान खान (TIT कॉलेज का छात्र) और मोहम्मद साद को गिरफ्तार किया था। आरोपितों के मोबाइल फोन से 10 से 15 अन्य युवतियों के अश्लील वीडियो भी बरामद हुए थे।

111 का रेप, 188 का यौन शोषण… ऑपरेशन टेबल पर 299 बच्चों से डॉक्टर ने की दरिंदगी: कोर्ट ने 20 साल की सजा सुनाई, 5 साल की भतीजी को भी नहीं छोड़ा

फ्रांस की अदालत ने डॉक्टर जोएल ले स्कॉरनेक को 20 साल की सजा सुनाई है। 74 साल के इस सर्जन को 299 बच्चों के यौन शोषण का दोषी ठहराया गया है। इनमें से 111 मामले रेप के है।

पीड़िताओं में स्कॉरनेक की खुद की भतीजी भी है। उसने दरिंदगी की इन घटनाओं को तब अंजाम दिया जब पीड़ित एनेस्थीसिया के कारण बेहोश थे या फिर दवा के असर से उबर रहे थे। ऐसे में ज्यादार को ऑपरेशन टेबल पर खुद के साथ हुई इस दरिंदगी की खबर तक नहीं थी।

स्कॉरनेक ने 1989 से 2014 के बीच फ्रांस के 9 अस्पतालों में काम करते हुए इन घटनाओं को अंजाम दिया। लेकिन खुलासा 2017 में हुआ जब उसने पड़ोस की एक 6 साल की बच्ची से अश्लील हरकत की। इसके बाद उसके घर की तलाशी ली गई, जिसमें वह डायरी भी मिली जिसमें दरिंदगी की हर घटना का विवरण दर्ज था।

दो दशकों तक करता रहा रेप

स्कॉरनेक ने दो दशक से अधिक समय तक रेप और यौन शोषण की इन घटनाओं को अंजाम दिया। पीड़ितों में से 256 की उम्र 15 वर्ष से कम थी। 111 के साथ रेप हुआ। 189 का यौन शोषण किया गया। इस मामले की सुनवाई में 60 वकीलों ने दलीलें पेश की। उसके बाद उसे 20 साल की सजा हुई है।

पीड़ितों और बाल अधिकार अधिवक्ताओं का कहना है कि यह केस फ्रांस की व्यवस्था की कमियों को भी उजागर करता है। इसके कारण ही वह इतने लंबे समय तक यौन अपराध करता रहा और किसी को पता नहीं चला। रिपोर्ट्स के अनुसार, स्कॉरनेक पहले एक गैस्ट्रिक सर्जन था।

5 साल की भतीजी से रेप में काट रहा सजा

स्कॉरनेक ने सबसे पहले 1985 में अपनी ही 5 साल की भतीजी का रेप किया था। इस मामले में उसे 2020 में 15 साल की जेल हुई। फिलहाल वह इसी मामले में जेल में बंद है।

2017 में 6 साल की बच्ची से अश्लील हरकत का मामला सामने आने के बाद जब पुलिस ने स्कॉरनेक के घर की तलाशी ली तो अश्लील तस्वीरें बरामद हुई थी। उसके घर से सेक्स टॉयज और गुड़ियों से भरे बक्से, कंप्यूटर और दो दर्जन से ज्यादा हार्ड ड्राइव मिली, जिनमें बच्चों के यौन शोषण की तस्वीरें थीं। साथ ही सैंकड़ो पन्नों की डायरी भी मिली थी, जिसमें वह अपराध नोट किया करता था।

डायरी में पीड़ितों के नाम, उम्र, पता और कृत्य का प्रकार लिखा गया था। स्कॉरनेक ने शुरुआत में आरोपों से इनकार किया था। उसका कहना था कि डायरी में लिखी ज्यादातर बातें काल्पनिक हैं और कुछ उसके काम से जुड़ी हुई हैं। बाद में उसने कबूल किया कि डायरी में लिखी हर बात सच है। उसने कहा, “मैं अदालत से नरमी की माँग नहीं कर रहा हूँ। सिर्फ मुझे बेहतर इंसान बनने का मौका दिया जाए।”

रिटायर्ड सर्जन ने यह भी कहा कि वह दो पीड़ितों की मौत के लिए खुद को ‘ज़िम्मेदार’ मानता है। सुनवाई के दौरान रिटायर्ड सर्जन ने पीड़ितों से माफी भी माँगी। लेकिन कई लोगों ने माफीनामे की ईमानदारी पर सवाल उठाते हुए अस्वीकार कर दिया।

कमाल अतातुर्क ने जिस तुर्की को बनाया सेकुलर, उसे एर्दोगन ने इस्लामी कट्टरपंथ के मरकज में बदला: जानिए – 100 साल में कैसे बदल गया एक मुल्क

तुर्की (अब तुर्किये) एक ऐसा देश है जो यूरोप और एशिया दोनों महाद्वीपों में फैला हुआ है। यह देश आठ देशों की सीमाओं से घिरा हुआ है और इसमें पहाड़, मैदान, तथा कालासागर, एजियनसागर और भूमध्य सागर के किनारे विस्तृत समुद्र तट शामिल हैं, जो इसके विविध भौगोलिक परिदृश्य को दर्शाते हैं। हालाँकि, राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन की खिलाफत को पुनर्जीवित करने और स्वयँ को खलीफा के रूप में स्थापित करने की अघोषित लेकिन प्रबल इच्छा के चलते तुर्की तेजी से अपनी सांस्कृतिक विविधता और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों को इस्लामी कट्टरवाद की ओर खोता जा रहा है।

इस्लामी खिलाफत का उन्मूलन और एक धर्मनिरपेक्ष तुर्की का उदय

तुर्की गणराज्य की स्थापना 29 अक्टूबर 1923 को मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने लॉज़ेन संधि के बाद, ओटोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात की थी। एक सैन्य कमांडर और प्रभावशाली नेता के रूप में अतातुर्क ने तुर्की को एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और आधुनिक राष्ट्र-राज्य के रूप में आकार देने की परिकल्पना की थी, जो पश्चिमी मूल्यों पर आधारित हो।

अतातुर्क के सुधारों को कमालिज्म कहा जाता है। कमालिज्म का उद्देश्य ओटोमन अतीत और इस्लामी कट्टरता से तुर्की को दूर ले जाना था। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता, उदारगणतंत्रवाद और इस्लाम के आधुनिक संस्करण को अपनी विचारधारा का केंद्र बनाया, जो तुर्की की नई पहचान की नींव बनी। इन्हीं कारणों से उन्हें ‘अतातुर्क’ यानी तुर्कों के पिता की उपाधि दी गई।

1925 में हैट क्रांति के तहत, उन्होंने पारंपरिक धार्मिक परिधानों जैसे फेज़, हेडस्कार्फ़ और हिजाब पर प्रतिबंध लगाया। 1926 में उन्होंने स्विट्जरलैंड से प्रेरित नागरिक संहिता लागू की, जिसने इस्लामी कानून की जगह ली। साथ ही उन्होंने जातीयता के आधार पर एकीकृत तुर्की पहचान को भी प्रोत्साहित किया।

20वीं सदी के अधिकांश भाग में तुर्की ने मुस्तफा कमाल अतातुर्क द्वारा स्थापित कमालवादी सिद्धांतों का पालन किया। अतातुर्क की मृत्यु के बाद भी तुर्की की सेना ने धर्मनिरपेक्षता की रक्षा की और यह सुनिश्चित किया कि महजब का राजनीति और सार्वजनिक जीवन में प्रभाव न्यूनतम रहे। अतातुर्क के नेतृत्व और उनके बाद कमालवाद के प्रभाव में तुर्की ने तीव्र औद्योगिकीकरण, आर्थिक विकास और शहरीकरण का अनुभव किया, साथ ही 1952 में नाटो जैसे पश्चिमी गठबंधनों में भी वह शामिल हुआ।

हालाँकि अतातुर्क और उनके विचार इस्लाम के विरोधी नहीं थे और इस्लाम तुर्की में एक सांस्कृतिक शक्ति बना रहा, लेकिन राज्य की नीति यह सुनिश्चित करने की रही कि मजहब सरकारी और सार्वजनिक निर्णयों पर हावी न हो। अतातुर्क के प्रमुख सुधारों में शामिल थे, नागरिक स्वतंत्रता और लोकप्रिय संप्रभुता की स्थापना (1921), खिलाफत का उन्मूलन (1924), धार्मिक मामलों के निदेशालय की स्थापना (1924), अंकारा को नई राजधानी बनाना (1923), प्रेस की स्वतंत्रता को बढ़ावा देना (1925), सरकारी सांख्यिकी और जनगणना विभाग की स्थापना (1926), चर्च और राज्य को अलग करने वाले कदम (1934), महिलाओं की राजनीति में भागीदारी और लैंगिक समानता की शुरुआत (1926 और 1934)।

इसके अतिरिक्त उन्होंने नामकरण प्रणाली में परिवर्तन कर इस्लामी नामों की जगह पश्चिमी शैली के नामों को प्रोत्साहित किया। ग्रेगोरियन कैलेंडर को अपनाया (1925–26), सह-शिक्षा और महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा दिया (1927), और औद्योगीकरण तथा बैंकिंग प्रणाली का विकास किया (1927–1931)। यद्यपि ये सुधार तुर्की को आधुनिकता और प्रगति की ओर ले गए, फिर भी देश के सामाजिक और राजनीतिक ताने-बाने में एक गहरी इस्लामवादी प्रवृत्ति दबे स्वर में बनी रही, जो समय आने पर फिर से उभरने को तत्पर थी।

एर्दोगान, खलीफा का सपना और तुर्की का अपने धर्मनिरपेक्ष आधार से धीरे-धीरे दूर होना

बीते कुछ सालों में तुर्की ने एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र से धीरे-धीरे एक ऐसे राज्य की ओर रुख किया है, जहाँ इस्लामी तत्वों का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है। यह परिवर्तन राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन के नेतृत्व में हुआ है और यह देश के संस्थापक मुस्तफा कमाल अतातुर्क के धर्मनिरपेक्ष और आधुनिक दृष्टिकोण से एक स्पष्ट विचलन को दर्शाता है।

साल 2003 में एर्दोगन के नेतृत्व में न्याय और विकास पार्टी (AKP – अदालत वे कलकिनमा पार्टी) का सत्ता में आना एक निर्णायक मोड़ था। एर्दोगन की राजनीतिक पृष्ठभूमि इस्लामवादी आंदोलनों से जुड़ी रही है, जो ओटोमन साम्राज्य के गौरव को पुनर्जीवित करने और इस्लाम को राज्य नीति में पुनः स्थापित करने की कोशिश करते रहे हैं।

एर्दोगन की जड़ें उन प्रतिबंधित इस्लामवादी पार्टियों में रही हैं जैसे वेलफेयर पार्टी (रेफाह पार्टीसी), जिसे 1998 में देश की धर्मनिरपेक्षता के विरोध में प्रतिबंधित कर दिया गया था। उसकी उत्तराधिकारी सदाचार पार्टी (फाज़िलेत पार्टीसी) को भी इसी कारण बैन कर दिया गया। इन पार्टियों का उद्देश्य तुर्की की धर्मनिरपेक्ष राजनीति में इस्लाम को अधिक सक्रिय भूमिका दिलाना था, एक ऐसा लक्ष्य जो कमालवादी सिद्धांतों के खिलाफ था। एर्दोगन इन्हीं विचारधाराओं से उभरकर सामने आए और आज तुर्की की राजनीति को एक नई दिशा में ले जा रहे हैं, जिसमें मजहब का प्रभाव लगातार बढ़ता दिख रहा है।

इस्लामवादी विचारधारा से प्रेरित एक चतुर और रणनीतिक राजनेता के रूप में रेसेप तैयप एर्दोगन ने अपने इस्लामवादी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए टकराव से बचने वाली, धीरे-धीरे आगे बढ़ने की नीति अपनाई। उन्होंने तुर्की के धर्मनिरपेक्ष प्रतिष्ठान से सीधे संघर्ष करने के बजाय एक क्रमिक और योजनाबद्ध दृष्टिकोण अपनाया।

राजनीतिक रूप से एक बड़ा आश्चर्य तब हुआ जब एर्दोगन ने इस्तांबुल के मेयर का चुनाव जीत लिया, जबकि उनकी जीत की संभावना बेहद कम मानी जा रही थी। लेकिन 1998 में धार्मिक घृणा फैलाने के आरोप में दोषी पाए जाने के बाद उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। यह आरोप उस वक्त लगा जब उन्होंने ज़िया गोकलप की एक कविता का पाठ किया, जिसमें मस्जिदों को सैन्य बैरकों और मुसलमानों को सैनिकों की तरह बताया गया था।

इस मामले में एर्दोगन को 10 महीने की सजा सुनाई गई, जिसमें उन्होंने चार महीने जेल में बिताए। इसके साथ ही उन पर राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने पर प्रतिबंध भी लगा दिया गया। हालाँकि न्याय और विकास पार्टी (AKP) की सरकार, जिसमें उनके सहयोगी और सह-संस्थापक अब्दुल्ला गुल प्रधानमंत्री थे, उन्होंने यह प्रतिबंध हटाया। इससे एर्दोगन को 2003 में सिर्ट प्रांत के उपचुनाव में भाग लेने की अनुमति मिल गई, जहाँ वे विजयी हुए।

उनकी जीत के बाद अब्दुल्ला गुल ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और 14 मार्च 2003 को एर्दोगन तुर्की के 25वें प्रधानमंत्री बने। इसके साथ ही तुर्की में धर्मनिरपेक्ष परंपराओं से हटकर एक ‘नव-ओटोमनवादी’ सोच की ओर धीरे-धीरे परिवर्तन की शुरुआत हुई, एक ऐसा युग जिसमें इस्लाम को फिर से सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में प्रमुखता मिलने लगी।

अपने शासन के शुरुआती वर्षों में रेसेप तैयप एर्दोगन ने न्याय और विकास पार्टी (AKP) को एक उदारवादी, लोकतंत्र समर्थक दल के रूप में प्रस्तुत किया, जिसने आर्थिक विकास, पारदर्शी शासन और यूरोपीय संघ में तुर्की के एकीकरण का वादा किया। इन सुधारवादी वादों ने उन्हें व्यापक जनसमर्थन दिलाया। हालांकि, समय बीतने के साथ एर्दोगन की नीतियाँ बदलने लगीं और उनका इस्लामवादी एजेंडा धीरे-धीरे स्पष्ट होता गया।

एक ओर जहाँ उन्होंने आर्थिक विकास और लोकतांत्रिक मूल्यों की बात की, वहीं दूसरी ओर उन्होंने देश में इस्लामी शिक्षा को बढ़ावा दिया, हज़ारों इमामों की नियुक्ति की और अभूतपूर्व स्तर पर मस्जिदों के निर्माण को प्रोत्साहित किया। इन परियोजनाओं में इस्तांबुल की भव्य कैमलिका मस्जिद भी शामिल है।  द न्यू यॉर्क टाइम्स की 2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार, एर्दोगन के शासनकाल में अब तक लगभग 9,000 मस्जिदों का निर्माण किया जा चुका था, और यह संख्या अब और भी अधिक हो चुकी है।

एर्दोगन ने 2003 से 2014 तक तुर्की के प्रधानमंत्री और 2014 से सीधे निर्वाचित राष्ट्रपति के रूप में कार्य किया है। उनके नेतृत्व में 2015 में एक अंतरराष्ट्रीय मस्जिद-निर्माण कार्यक्रम भी शुरू किया गया, जिसके तहत अल्बानिया, अमेरिका, रूस, किर्गिज़स्तान, फिलीपींस, यूनाइटेड किंगडम, फिलिस्तीनी क्षेत्र और सोमालिया सहित कई देशों में 10 विशाल मस्जिदों का निर्माण कराया गया।

इन कदमों ने न केवल तुर्की के भीतर धार्मिक पहचान को प्रमुखता दी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी एर्दोगन की नव-ओटोमनवादी सोच और इस्लामी प्रभाव बढ़ाने की मंशा को उजागर किया।

तुर्की के तेजी से इस्लामीकरण की प्रक्रिया के पीछे राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन का ओटोमन साम्राज्य के प्रति गहरा लगाव और उस गौरवशाली अतीत को पुनर्जीवित करने की महत्वाकांक्षा प्रमुख कारण रही है। इतिहास में ओटोमन साम्राज्य ने 13वीं शताब्दी से लेकर प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति तक मुस्लिम दुनिया या उम्माह का नेतृत्व किया था। इस साम्राज्य के विघटन के बाद मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने एक धर्मनिरपेक्ष तुर्की राज्य की स्थापना की, लेकिन एर्दोगन उस विरासत को उलटकर एक नया इस्लामी नेतृत्व स्थापित करना चाहते हैं। माना जाता है कि वे खुद को आधुनिक खलीफा के रूप में देखना चाहते हैं, एक महत्वाकांक्षा जो 1994 में इस्तांबुल का मेयर पद जीतने की उनकी पहली कोशिश से ही उनके भीतर मौजूद रही है।

देश के भीतर एर्दोगन ने इस्लामवादी एजेंडे को लागू करने के लिए सत्ता को चतुराई से केंद्रीकृत किया। 2016 में एक असफल तख्तापलट के प्रयास से बचने के बाद उन्होंने सेना, न्यायपालिका और शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव किए। धर्मनिरपेक्ष और विरोधी तत्वों को इन संस्थानों से हटाकर उनकी जगह अपने वफादारों को नियुक्त किया गया। इससे उन्हें शासन में पूरी तरह से नियंत्रण स्थापित करने का अवसर मिला।

साथ ही एर्दोगन ने मीडिया की स्वतंत्रता पर भी गंभीर अंकुश लगाए। कई आलोचनात्मक मीडिया आउटलेट्स को या तो बंद कर दिया गया या फिर उन्हें सरकार के नियंत्रण में ले लिया गया। यह कदम न केवल उनकी आलोचना को दबाने के लिए था, बल्कि एक सुसंगत और नियंत्रित खलीफा की छवि को गढ़ने के लिए भी जरूरी था, एक ऐसी छवि जो धार्मिक राष्ट्रवाद और रूढ़िवादी इस्लामवादी मूल्यों को मजबूत करती है।

कुल मिलाकर एर्दोगन की यह रणनीति केवल घरेलू सत्ता मजबूत करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका उद्देश्य तुर्की को फिर से इस्लामी दुनिया के नेतृत्व में लाना और ओटोमन साम्राज्य की खोई हुई विरासत को पुनर्स्थापित करना भी रहा है।

एर्दोगन के शासनकाल में तुर्की की शिक्षा प्रणाली में इस्लामवादी एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए व्यापक बदलाव किए गए हैं। विशेष रूप से, उनकी सरकार ने इमाम हातिप स्कूलों, जो पारंपरिक रूप से इस्लामी इमामों और उपदेशकों को प्रशिक्षित करने के लिए स्थापित किए गए थे उनको बड़े पैमाने पर वित्तीय समर्थन दिया है।

2018 में राष्ट्रपति एर्दोगन ने स्वयँ इस नीति के पीछे की सोच स्पष्ट करते हुए कहा कि उनका उद्देश्य एक पवित्र पीढ़ी (Religious Generation) तैयार करना है, जो तुर्की में एक ‘नई सभ्यता के निर्माण’ की दिशा में काम करे। यह बयान उनके इस्लामवादी दृष्टिकोण को खुलकर दर्शाता है।

 रेउटर्स  की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, तुर्की सरकार ने 14 से 18 वर्ष की आयु के छात्रों के लिए इमाम हातिप हाई स्कूलों का बजट दोगुना कर 6.57 बिलियन लीरा (लगभग 1.68 बिलियन डॉलर) तक बढ़ाने की योजना बनाई थी। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि जबकि इमाम हातिप स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र तुर्की की कुल हाई स्कूल आबादी का केवल 11 प्रतिशत हैं, फिर भी उन्हें कुल शिक्षा बजट का 23 प्रतिशत हिस्सा मिलता है, यह स्पष्ट करता है कि एर्दोगन सरकार का प्राथमिक ध्यान इन मजहबी स्कूलों पर है।

ये नीतियाँ न केवल शिक्षा प्रणाली का इस्लामीकरण करने की दिशा में हैं, बल्कि तुर्की की युवा पीढ़ी को धार्मिक और रूढ़िवादी मूल्यों की ओर मोड़ने की रणनीति का हिस्सा भी हैं, जो एर्दोगन की नव-ओटोमनवादी और इस्लामी पहचान को पुनः स्थापित करने की व्यापक परियोजना से जुड़ी हुई है।

पिछले कुछ वर्षों में तुर्की के मजहबी मामलों के निदेशालय, डायनेट, का प्रभाव उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। यह संस्थान अब राष्ट्रपति एर्दोगन की इस्लामवादी नीतियों का एक केंद्रीय उपकरण बन चुका है। डायनेट विशेष रूप से सुन्नी इस्लामी पहचान को बढ़ावा देने पर केंद्रित है, जिससे एलेवी जैसे गैर-सुन्नी मुस्लिम समुदायों को सामाजिक और धार्मिक रूप से हाशिए पर डाल दिया गया है। यह प्रवृत्ति तुर्की में धार्मिक एकरूपता और राज्य द्वारा नियंत्रित इस्लाम को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी एर्दोगन की नीतियाँ तेजी से इस्लामी एकजुटता और पश्चिम विरोधी रुख की ओर मुड़ी हैं। 7 अक्टूबर 2023 को इज़राइल और इस्लामिक आतंकी समूह हमास के बीच शुरू हुए युद्ध के बाद तुर्की ने खुलकर फिलिस्तीन का समर्थन किया। इस संघर्ष के जवाब में नवंबर 2024 में राष्ट्रपति एर्दोगन ने घोषणा की कि तुर्की अब इज़रायल के साथ सभी राजनयिक संबंध समाप्त कर रहा है।

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “तैयप एर्दोगन के नेतृत्व में तुर्की गणराज्य की सरकार इज़राइल के साथ संबंध जारी नहीं रखेगी या उन्हें विकसित नहीं करेगी। हमारा सत्तारूढ़ गठबंधन इस निर्णय पर अडिग है, और हम भविष्य में भी यही रुख अपनाए रखेंगे।”

इस बयान के साथ एर्दोगन ने यह सुनिश्चित कर दिया कि तुर्की ने इज़राइल के साथ सभी आधिकारिक संबंध समाप्त कर दिए हैं। यह कदम न केवल तुर्की की विदेश नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव है, बल्कि यह एर्दोगन के व्यापक इस्लामवादी दृष्टिकोण और मुस्लिम दुनिया में नेतृत्व की उनकी आकांक्षा को भी दर्शाता है।

एर्दोगन की विस्तारवादी कार्रवाइयाँ इस्लामवाद और मिसक-ए-मिल्ली में निहित हैं

तुर्की को वैश्विक मुस्लिम उम्माह (इस्लामी समुदाय) का नेता बनाने की राष्ट्रपति एर्दोगन की महत्वाकांक्षा ने देश की विदेश नीति को उसके ओटोमन अतीत से गहरे रूप से जोड़ दिया है। यह दृष्टिकोण नव-ओटोमनवाद के रूप में जाना जाता है, जिसमें तुर्की की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सीमाओं को वर्तमान सीमाओं से परे मानते हुए क्षेत्रीय और मजहबी नेतृत्व स्थापित करने की कोशिश की जाती है।

हालाँकि AKP की लगातार चुनावी सफलताओं ने पार्टी नेतृत्व को और अधिक राष्ट्रवादी बना दिया है, फिर भी इस्लामवादी एजेंडे को धीरे-धीरे लागू किया गया। 2007 के चुनाव अभियान के दौरान एर्दोगन ने वादा किया था कि वे सिविल सेवा में महिलाओं पर लगे हेडस्कार्फ़ (हिजाब) प्रतिबंध को हटाएँगे। इस वादे को उन्होंने 2013 में पूरा किया, जब AKP सरकार ने दशकों पुराना यह प्रतिबंध हटा दिया, एक प्रतीकात्मक और वास्तविक रूप से महत्वपूर्ण कदम, जिसने धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था की नींव को और अधिक कमजोर किया।

नव-ओटोमनवादी सोच AKP नेतृत्व के अन्य प्रमुख नेताओं में भी स्पष्ट रही है। 2003 में तुर्की के तत्कालीन प्रधानमंत्री और एर्दोगन के करीबी सहयोगी अब्दुल्ला गुल ने खुले तौर पर इस विस्तारवादी विचारधारा की घोषणा की थी। उन्होंने एक धार्मिक स्थल पर कहा, “तुर्की को केवल अनातोलिया तक सीमित नहीं किया जा सकता, इसकी वास्तविक सीमाएँ आधिकारिक सीमाओं से कहीं आगे तक फैली हुई हैं।”

यह बयान स्पष्ट रूप से दिखाता है कि AKP नेतृत्व तुर्की को न केवल एक राष्ट्रीय शक्ति के रूप में, बल्कि एक ऐतिहासिक और धार्मिक नेता के रूप में पुनर्स्थापित करना चाहता है, एक ऐसा दृष्टिकोण जो धार्मिक पहचान, क्षेत्रीय प्रभाव और ओटोमन विरासत को समेटे हुए है।

तुर्की के नव-ओटोमनवादी दृष्टिकोण के तहत, बाल्कन, मध्य पूर्व और मध्य एशिया को देश की विदेश नीति में ‘सीधे चिंता के क्षेत्र’ के रूप में देखा जाता है। तुर्की के पूर्व प्रधानमंत्री अब्दुल्ला गुल ने स्पष्ट रूप से कहा था कि ‘तुर्की को केवल अनातोलिया के भीतर सीमित नहीं किया जा सकता’। उन्होंने 1920 की मिसाक-ए-मिली (राष्ट्रीय संधि) का हवाला दिया, यह ओटोमन युग का एक क्षेत्रीय दावा था, जिसके तहत तुर्की की सीमाओं को सीरिया और इराक तक विस्तारित माना गया था। इस दावे वाले क्षेत्रों में कुर्द, अरब, सीरियाई, असीरियन, अर्मेनियाई, तुर्कमेन और अन्य जातीय समुदायों का मिश्रण निवास करता है।

यह विस्तारवादी सोच बाद की घटनाओं में भी स्पष्ट रूप से झलकती है, 2011 में जब अरब दुनिया में हिंसा और अराजकता फैल रही थी, विशेष रूप से सीरिया में तो तुर्की ने इसे हस्तक्षेप का अवसर माना। नव-ओटोमनवादियों के अनुसार, सीरिया मिसाक-ए-मिली के दायरे में आता है और इसलिए उसके घटनाक्रम तुर्की के लिए घरेलू महत्व रखते हैं। इस सोच को राष्ट्रपति एर्दोगन ने 8 अगस्त 2011 को खुले तौर पर स्वीकार किया जब उन्होंने कहा, “सीरिया हमारे लिए एक विदेशी मुद्दा नहीं है, हम इसे एक घरेलू मामला मानते हैं।”

यह बयान न केवल तुर्की की सीरिया नीति को वैध ठहराने का प्रयास था, बल्कि यह भी दर्शाता है कि एर्दोगन सरकार ओटोमन साम्राज्य की सीमाओं और प्रभाव क्षेत्र को आधुनिक तुर्की की विदेश नीति का आधार बनाना चाहती है।

राष्ट्रपति एर्दोगन की नव-ओटोमनवादी नीति के तहत तुर्की न केवल सीरिया में सैन्य और राजनीतिक रूप से हस्तक्षेप कर रहा है, बल्कि वह सीरियाई शरणार्थियों को तुर्की की नागरिकता भी प्रदान कर रहा है। इस कदम को वैध ठहराते हुए, 2019 में तत्कालीन गृह मंत्री सुलेमान सोयलू ने कहा था, “वे मिसाक-ए मिल्ली की सीमाओं के भीतर की भूमि से आते हैं, जो उन्हें तुर्क बनने का एक उचित दावा देता है।”

यह बयान दर्शाता है कि तुर्की सरकार सीरियाई शरणार्थियों को केवल मानवीय संकट के तहत नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और वैचारिक तर्कों के आधार पर तुर्की की सामाजिक संरचना में शामिल कर रही है।

सीरिया में एर्दोगन सरकार ने बशर अल-असद शासन के खिलाफ सैन्य हस्तक्षेप किया और सीरियन नेशनल आर्मी जैसे असद विरोधी समूहों का समर्थन किया। तुर्की ने इन प्रॉक्सी बलों के ज़रिए देश में अपने प्रभाव का विस्तार किया है और उत्तरी सीरिया के कई महत्वपूर्ण शहरों, जैसे जाराब्लस, अल-बाब, अज़ाज़, अफ़रीन, रास अल-ऐन (सेरे कनिये) और तेल अब्याद (गिरे स्पी) पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है।

इसके अलावा तुर्की ने इन क्षेत्रों में स्थायी सैन्य उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए सैन्य अड्डे स्थापित करने की भी योजना बनाई है। यह रणनीति न केवल सीरिया में तुर्की के भू-राजनीतिक प्रभाव को मजबूत करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि एर्दोगन शासन मिसाक-ए मिल्ली की अवधारणा को 21वीं सदी की नीतियों में सक्रिय रूप से लागू कर रहा है।

एर्दोगन के राजनीतिक जीवन का एक सबसे विवादास्पद और आलोचना से भरा पहलू तुर्की में कुर्दों के दमन से जुड़ा है। आतंकवाद से लड़ने के नाम पर उनकी सरकार ने कुर्द कार्यकर्ताओं, राजनेताओं और मीडिया संस्थानों को व्यवस्थित रूप से निशाना बनाया है। इसमें मनमानी गिरफ्तारियाँ, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कठोर प्रतिबंध, और निर्वाचित कुर्द अधिकारियों को उनके पदों से बर्खास्त करना शामिल है। ये कार्रवाइयाँ तुर्की के लोकतांत्रिक ढाँचे और मानवाधिकारों पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।

हाल ही में एर्दोगन ने इस्तांबुल में सीरिया के अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शारा से मुलाकात की। शारा पूर्व में अल-कायदा से जुड़े रहे हैं और अब सीरियन नेशनल आर्मी के प्रमुख नेता माने जाते हैं, जिसे तुर्की समर्थन देता है। इस बैठक में शारा ने सीरिया पर लगे पश्चिमी प्रतिबंधों को हटवाने में मदद करने के लिए एर्दोगन को धन्यवाद दिया।

गौर करने वाली बात यह है कि मार्च 2025 में अहमद अल-शारा ने एक अनंतिम संविधान पर हस्ताक्षर किए, जिसने सीरिया को एक इस्लामवादी शासन के अधीन कर दिया। हालाँकि संविधान में यह दावा किया गया कि संक्रमण काल के दौरान पाँच वर्षों तक सभी सीरियाई नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की जाएगी, लेकिन संविधान का इस्लामवादी स्वरूप चिंता का विषय बना हुआ है।

इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि एर्दोगन न केवल घरेलू स्तर पर कुर्द विरोधी अभियान चला रहे हैं, बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर भी ऐसे इस्लामवादी गुटों और नेताओं का समर्थन कर रहे हैं, जिनका इतिहास अतिवाद से जुड़ा रहा है। यह दोहरा रवैया तुर्की की लोकतांत्रिक छवि को लगातार कमजोर करता जा रहा है।

दिसंबर 2024 में अल-कायदा से संबद्ध कट्टरपंथी सुन्नी संगठन हयात तहरीर अल-शाम (HTS) ने सीरियाई राष्ट्रपति  बशर अल-असद  की 24 साल पुरानी तानाशाही के खिलाफ एक सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व किया। इस विद्रोह के चलते सीरिया की सरकार के लिए देश के बड़े हिस्सों पर नियंत्रण बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो गया है।

यह स्थिति एर्दोगन सरकार के लिए रणनीतिक रूप से फायदेमंद साबित हुई है, क्योंकि तुर्की का उद्देश्य लंबे समय से मुस्लिम उम्माह को एकजुट करना और खुद को उसका नेता स्थापित करना रहा है। HTS जैसे समूहों के उभार से सीरिया में सत्ता अस्थिर हुई है, जिससे तुर्की को क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिला है।

हालाँकि सीरिया अभी संक्रमणकालीन चरण में है, लेकिन तुर्की और सीरिया के बीच कई द्विपक्षीय समझौतों पर हस्ताक्षर की तैयारी चल रही है। इन प्रस्तावित सौदों में गैस और बिजली के निर्यात जैसे आर्थिक सहयोग शामिल हैं, जो यह संकेत देते हैं कि एर्दोगन शासन न केवल राजनीतिक रूप से, बल्कि आर्थिक रूप से भी सीरिया पर अपना प्रभाव जमाने की दिशा में सक्रिय है।

यह घटनाक्रम एर्दोगन की नव-ओटोमनवादी और इस्लामवादी विदेश नीति के व्यापक एजेंडे का हिस्सा है, जिसमें तुर्की को मुस्लिम विश्व का केंद्र बनाने की दीर्घकालिक रणनीति स्पष्ट रूप से झलकती है।

एर्दोगन की इस्लामवादी और नव-ओटोमनवादी नीतियों का विस्तार इराक और लीबिया तक भी पहुँच चुका है। 2016 में उन्होंने मोसुल पर तुर्की का दावा पेश करते हुए सेल्जुक और ओटोमन इतिहास तथा मिसाक-ए-मिल्ली (1920 की राष्ट्रीय संधि) का हवाला दिया, यह तुर्की की ऐतिहासिक सीमाओं को पुनः परिभाषित करने की एक और कोशिश थी।

इसके अलावा तुर्की ने इराक के कुर्दिस्तानक्षेत्र में सैन्य अड्डों की स्थापना के ज़रिए वहाँ अपनी स्थायी सैन्य उपस्थिति बढ़ाई है। यह कदम आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर उठाया गया, लेकिन वास्तव में यह तुर्की की क्षेत्रीय विस्तारवाद की रणनीति का हिस्सा है, जिसका मकसद कुर्द गतिविधियों को दबाना और क्षेत्र पर रणनीतिक पकड़ मजबूत करना है।

तुर्की की यही आक्रामक विदेश नीति लीबिया में भी देखने को मिली। अगस्त 2024 में तुर्की और लीबिया की संसदों के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हुआ, जिसने तुर्की की सेना को लीबिया में व्यापक सैन्य परिचालन स्वतंत्रता और कानूनी संरक्षण प्रदान किया। यह तुर्की को लीबिया में सैन्य और राजनीतिक रूप से गहरी पकड़ बनाने की अनुमति देता है।

इसके साथ ही एर्दोगन सरकार का मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे इस्लामी संगठनों और जिहादी गतिविधियों के साथ स्पष्ट और सार्वजनिक जुड़ाव यह दिखाता है कि तुर्की अब इस्लामवादी कारणों के लिए अपने समर्थन को छिपाने की ज़रूरत नहीं समझता। यह सब मिलाकर एर्दोगन की सरकार की उस व्यापक रणनीति को दर्शाता है, जिसका उद्देश्य तुर्की को मुस्लिम दुनिया का केंद्र और इस्लामी नेतृत्व का ध्वजवाहक बनाना है।

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि तुर्की के पड़ोसी देशों ग्रीस, आर्मेनिया और साइप्रस के साथ उसके लंबे समय से चले आ रहे तनावपूर्ण संबंध एर्दोगन के शासनकाल में और भी अधिक उग्र हो गए हैं। जनवरी 2024 में, एकेपी की बैठक को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति एर्दोगन ने एक भड़काऊ बयान देते हुए कहा, “हमारा संघर्ष दुश्मनों (यूनानियों) को हमारी भूमि से खदेड़ने और उन्हें इज़मिर से समुद्र में फेंकने के साथ समाप्त नहीं हुआ है।”

यह बयान सीधे तौर पर 1922 के स्मिर्ना (अब इज़मिर) नरसंहार की ओर इशारा करता है, जिसमें तुर्की सेना द्वारा अनातोलिया में 1 लाख से अधिक ग्रीक ईसाई और कई अर्मेनियाई नागरिकों की हत्या  कर दी गई थी। यह घटना उस समय की त्रासदी का प्रतीक मानी जाती है जब ओटोमन साम्राज्य के पतन के बाद तुर्क राष्ट्रवाद और जातीय हिंसा ने चरम रूप लिया था।

चौंकाने वाली बात यह है कि एर्दोगन ने न केवल इस इतिहास को संदर्भित किया, बल्कि उसकी प्रशंसा भी की। तुर्की के कई इस्लामवादी गुट आज भी ‘यूनानियों को समुद्र में फेंकने’ की इस ऐतिहासिक घटना को गर्व की बात मानते हैं, एक ऐसा रवैया जो क्षेत्रीय तनावों को भड़काने और पड़ोसी देशों के साथ शांति प्रयासों को कमजोर करने का कार्य करता है।

इस प्रकार एर्दोगन का बयान न केवल अतीत की विभाजनकारी राजनीति को पुनर्जीवित करता है, बल्कि यह दिखाता है कि उनकी सरकार राष्ट्रवादी-इस्लामवादी विचारधारा को क्षेत्रीय शक्ति-प्रदर्शन और ऐतिहासिक प्रतिशोध के उपकरण के रूप में इस्तेमाल कर रही है।

तुर्की की क्षेत्रीय विस्तारवादी नीतियों के तहत, एजियन सागर में भी विवाद गहराता जा रहा है। तुर्की 152 द्वीपों और टापुओं पर दावा कर रहा है, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय समझौतों के तहत ग्रीस को सौंपा गया था, विशेष रूप से 1923 की लॉज़ेन संधि, 1932 में तुर्की और इटली के बीच हुआ समझौता और 1947 की पेरिस संधि। इन दावों ने तुर्की और ग्रीस के बीच तनाव को और बढ़ा दिया है।

इसी तरह एर्दोगन आर्मेनिया के खिलाफ़ इस्लामिक राष्ट्र अज़रबैजान का खुलकर समर्थन करते हैं। जबकि अज़रबैजान ने 2020 से अब तक लगभग 215 वर्ग किलोमीटर  (83 वर्ग मील) अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त अर्मेनियाई क्षेत्र पर कब्जा किया हुआ है, एर्दोगन ने इस आक्रामकता को खुला समर्थन दिया।

पिछले साल एर्दोगन ने 2020 के दूसरे नागोर्नो-करबाख युद्ध में अज़रबैजान की जीत का श्रेय स्वयं को देते हुए कहा कि तुर्की के समर्थन से ही यह जीत संभव हुई। हालाँकि अज़रबैजान ने एर्दोगन के इस दावे पर कड़ी आपत्ति जताई, क्योंकि वह इसे घरेलू राजनीति में तुर्की की छवि चमकाने का प्रयास मानता है।

यह सब मिलाकर दिखाता है कि एर्दोगन की ‘खलीफा’ बनने की महत्वाकांक्षा और नव-ओटोमनवादी सोच तुर्की की विदेश नीति को आक्रामक बना रही है, चाहे वह ग्रीस के साथ समुद्री सीमा विवाद हो या दक्षिण काकेशस में अज़रबैजान और आर्मेनिया के बीच जारी संघर्ष में धार्मिक और राजनीतिक पक्षपात है।

तुर्की ने भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले पाकिस्तान का समर्थन किया

खुद को मुस्लिम उम्माह का नेता स्थापित करने और इस्लामी दुनिया में तुर्की के प्रभाव को मजबूत करने की महत्वाकांक्षा के चलते राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन  ने ऐतिहासिक रूप से भारत के खिलाफ पाकिस्तान का खुलकर समर्थन किया है। यह समर्थन उस स्थिति में भी बना रहा है जब पाकिस्तान के खिलाफ वर्षों से यह दस्तावेजी प्रमाण मौजूद हैं कि वह सीमा पार जिहादी आतंकवाद को संगठित रूप से प्रायोजित करता है।

एर्दोगन की सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मंचों, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र और ओआईसी (इस्लामिक सहयोग संगठन) में, कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के पक्ष को आगे बढ़ाने की बार-बार कोशिश की है। तुर्की की यह रणनीति भारत की संप्रभुता के खिलाफ जाती है और इस्लामवादी एकता के नाम पर जिहादी नैरेटिव को वैधता देने का काम करती है।

इसके अलावा तुर्की ने पाकिस्तान को हथियारों और सैन्य तकनीक की आपूर्ति कर उसे रणनीतिक रूप से सशक्त किया है। इस सहयोग में ड्रोन, रक्षा उपकरण और सैन्य प्रशिक्षण शामिल हैं। यह साझेदारी एर्दोगन की उस सोच को दर्शाती है, जिसमें वह एक ओटोमन-शैली की खिलाफत को पुनर्जीवित करने के आत्मघोषित मिशन पर हैं।

इस्लामी आतंकवाद को राज्य नीति के रूप में उपयोग करने वाले देश के साथ गठबंधन कर एर्दोगन यह संकेत देते हैं कि उनका उद्देश्य केवल तुर्की की सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वे खुद को एक वैश्विक इस्लामी नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं, भले ही इसके लिए उन्हें कट्टरपंथी और आतंकवाद-समर्थक तत्वों के साथ खड़ा क्यों न होना पड़े।

कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के बयानों का समर्थन करने से आगे बढ़कर तुर्की ने भारत के खिलाफ आतंकी हमलों के संदर्भ में भी बार-बार पाकिस्तान का पक्ष लिया है। इसमें 2016 काउरी हमला, 2019 का पुलवामा आत्मघाती हमला और हालिया 2025 का पहलगाम हमला शामिल हैं, तीनों हमले पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद से जुड़े रहे हैं। इन घटनाओं के बावजूद, एर्दोगन सरकार ने खुलेआम पाकिस्तान का समर्थन किया, जिससे उसकी इस्लामवादी प्राथमिकताएँ और रणनीति उजागर होती है।

साल 2019 में जब भारत ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35A को निरस्त किया, तब तुर्की के मीडिया और सरकारी संस्थानों ने पाकिस्तान के झूठे दावों और दुष्प्रचार को बढ़ावा दिया। इस कदम को भारत का आंतरिक मामला मानने के बजाय, तुर्की ने पाकिस्तान के इस्लामी नैरेटिव का समर्थन किया, जिससे यह साफ हुआ कि एर्दोगन सरकार कश्मीर को मुस्लिम उम्माह के मुद्दे के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है।

इसी तरह पुलवामा हमले के बाद जब भारत ने पाकिस्तान के बालाकोट में आतंकी ठिकानों पर एयरस्ट्राइक की, तब भी तुर्की ने आतंकवाद के खिलाफ भारत की कार्रवाई की आलोचना करते हुए पाकिस्तान का पक्ष लिया।

इस तरह का लगातार समर्थन यह दर्शाता है कि एर्दोगन अपने वैश्विक इस्लामी नेतृत्व की आकांक्षा को साकार करने के लिए ऐसे देशों के साथ भी गठबंधन करने को तैयार हैं जिनका आतंकवाद को समर्थन, वित्तपोषण और संरक्षण देने का स्पष्ट इतिहास रहा है। तुर्की की यह विदेश नीति भारत विरोधी रुख के साथ-साथ इस्लामवादी एजेंडे को भी मजबूती से आगे बढ़ाती है।

पाकिस्तान को तुर्की का धार्मिक और वैचारिक समर्थन अब केवल राजनीतिक या कूटनीतिक सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सैन्य सहयोग और आक्रामकता के क्षेत्र में भी प्रवेश कर चुका है। तुर्की अब पाकिस्तान को भारत के खिलाफ इस्तेमाल की जाने वाली घातक हवाई सैन्य संपत्तियाँ, विशेष रूप से ड्रोन और उन्नत हथियार प्रणाली, सक्रिय रूप से प्रदान कर रहा है।

केवल हथियार ही नहीं, रिपोर्टों के अनुसार – तुर्की के सैन्य सलाहकार भी पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर इन ड्रोन और हवाई संपत्तियों का  भारतके खिलाफ रणनीतिक रूप से उपयोग  शामिल रहे हैं।  भारत द्वारा की गई जवाबी कार्रवाई  में कथित रूप से दो तुर्की ड्रोन ऑपरेटर मारे गए, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि तुर्की न केवल पाकिस्तान का समर्थक है, बल्कि सैन्य संघर्ष में भी उसकी सहभागीता है।

इसके अलावा, संघर्ष के दौरान तुर्की की सैन्य गतिविधियाँ और भी उजागर हुईं, जहाँ कराची हवाई अड्डे पर 27 अप्रैल, 2025 को  तुर्की का एक विमान C-130 हरक्यूलिस सैन्य परिवहन विमान उतरा, जो संभावित रूप से हथियार और सैन्य सामग्री लेकर आया था। यह घटना पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत की संभावित जवाबी कार्रवाई की आशंका से जुड़ा माना जा रहा है।

इसके अलावा 2 मई, 2025 को कराची बंदरगाह पर एक तुर्की Ada-Class एंटी-सबमरीन कोरवेट ने भी डॉक किया, जो तुर्की की नौसैनिक भागीदारी और क्षेत्रीय सैन्य सहयोग का संकेत देता है। इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि एर्दोगन की तुर्की सरकार न केवल वैचारिक रूप से भारत विरोधी रुख अपनाए हुए है, बल्कि वह जमीनी और सामरिक स्तर पर भी पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत के खिलाफ सैन्य गतिविधियों को बढ़ावा दे रही है। यह तुर्की-पाकिस्तान गठजोड़ भारत की सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है।

तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने रविवार (25 मई 2025) को इस्तांबुल में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से मुलाकात की, जिसमें दोनों नेताओं ने विशेष रूप से रक्षा, ऊर्जा और परिवहन क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देने पर सहमति जताई। यह साझेदारी ऐसे समय में हो रही है जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर है, और पाकिस्तान लगातार भारत-विरोधी गतिविधियों में शामिल पाया गया है।

विडंबना यह है कि एर्दोगन के कार्यालय ने इस बैठक के बाद बयान दिया कि तुर्की आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान के साथ सहयोग करेगा। वही पाकिस्तान जहाँ, संयुक्त राष्ट्र द्वारा नामित और प्रतिबंधित आतंकवादी हाफिज अब्दुर रऊफ खुलेआम भारत द्वारा मारे गए आतंकवादियों के अंतिम संस्कार करता है, जबकि पाकिस्तानी सैनिक वहाँ मौजूद रहते हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित एक अन्य आतंकवादी के बेटे को पाकिस्तानी आँड (आर्म्ड) फोर्सेस के PR विंग के डीजी के रूप में नियुक्त किया गया है।

इससे पहले, जब भारत ने 100 से अधिक आतंकवादियों को मार गिराया था, तो एर्दोगन ने पाकिस्तान के प्रति एकजुटता जताते हुए कहा “मैं हमलों में जान गँवाने वाले हमारे भाइयों के लिए अल्लाह से दया की प्रार्थना करता हूँ और पाकिस्तान के भाईचारे वाले लोगों और उनकी सरकार के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त करता हूँ।”

एर्दोगन का यह रुख स्पष्ट रूप से दिखाता है कि तुर्की, एक ओर तो आतंकवाद विरोधी सहयोग की बात करता है और दूसरी ओर ऐसे देश का समर्थन करता है जो खुद आतंकवादियों को आश्रय और सम्मानदेता है। इस तरह तुर्की की विदेश नीति उसकी इस्लामवादी प्राथमिकताओं और भारत विरोधी झुकाव को उजागर करती है।

यह अब स्पष्ट हो चुका है कि रेसेप तैयप एर्दोगन का पाकिस्तान के प्रति मजबूत समर्थन उनके व्यापक इस्लामवादी एजेंडे और मुस्लिम उम्माह के नेता बनने की महत्वाकांक्षा से जुड़ा हुआ है। एर्दोगन खुद को एक आधुनिक खलीफा के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो ओटोमन शैली के इस्लामी साम्राज्य का पुनरुत्थान करना चाहता है।

उन्होंने न केवल अतातुर्क की धर्मनिरपेक्ष विरासत से दूरी बना ली है, बल्कि तुर्की को एकउचित इस्लामी राष्ट्र में रूपांतरित करने के लिए घरेलू नीतियों में व्यापक इस्लामीकरण भी किया है। इसके साथ ही, एर्दोगन इस्लामी दुनिया में प्रभाव और नेतृत्व हासिल करने के उद्देश्य से मुस्लिम राष्ट्रोंके समर्थन को बयानबाजी और रणनीतिक कार्रवाइयों के ज़रिए जुटा रहे हैं।

हालाँकि, पारंपरिक रूप से सऊदी अरब को मुस्लिम उम्माह का नेता माना जाता रहा है, एर्दोगन ने पाकिस्तान के साथ गठजोड़ करके एक वैकल्पिक नेतृत्व केंद्र की भूमिका निभाने का प्रयास किया है। लेकिन पाकिस्तान को खुला समर्थन दिया है, भारत में तीव्र आक्रोश का कारण बना है, खासकर आतंकवाद के संदर्भ में, और साथ ही, एक नाटो सदस्य के रूप में तुर्की की विश्वसनीयता और उसकी प्रतिबद्धताओं पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इस तरह, एर्दोगन की नीतियाँ तुर्की की परंपरागत धर्मनिरपेक्षपहचान से इस्लामी विस्तारवाद की दिशा में एक सुनियोजित परिवर्तन का संकेत देती हैं।

लोकतांत्रिक वैधता की आड़ में, राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने इस्लामवाद, लोकलुभावन राष्ट्रवाद, और ओटोमन साम्राज्य के गौरवशाली अतीत के पुनरुद्धार की विचारधारा को बढ़ावा देते हुए एक विशिष्ट इस्लामवादी शासन मॉडल विकसित किया है। उनके नेतृत्व में तुर्की धीरे-धीरे मुस्तफा कमाल अतातुर्क के धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण से इस्लामी राष्ट्रवाद की दिशा में बढ़ता गया है।

एर्दोगन की नीति तीन प्रमुख पहलुओं में स्पष्ट होती है, आतंक-प्रायोजक पाकिस्तान के लिए निरंतर समर्थन दिया भले ही पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जिहादी आतंकवाद से जुड़ा रहा हो, एर्दोगन ने उसे राजनयिक, रक्षा और वैचारिक समर्थन दिया है, जिससे भारत और कई अन्य देशों के साथ तुर्की के संबंधों में तनाव बढ़ा है।

तुर्की के भीतर धर्मनिरपेक्ष और असहमत आवाज़ों का दमन सेना, न्यायपालिका, मीडिया और शिक्षा संस्थानों में इस्लामवादियों की नियुक्ति और आलोचनात्मक संस्थानों को बंद करना, देश की धर्मनिरपेक्ष पहचान पर सीधा हमला है। वही एक आधुनिक ‘खलीफा’ और नव-ओटोमन साम्राज्य की वैश्विक महत्वाकांक्षा एर्दोगन खुद को मुस्लिम उम्माह के नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं, जिससे वे पारंपरिक रूप से सऊदी अरब द्वारा निभाई गई भूमिका को चुनौती दे रहे हैं। इस तरह की नीतियाँ न केवल तुर्की की धर्मनिरपेक्ष विरासत का गंभीर क्षरण हैं, बल्कि देश को  राजनयिक अलगाव, क्षेत्रीय संघर्ष, और भविष्य में सैन्य टकराव की दिशा में भी धकेल सकती हैं।

यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे।

जिस प्रोफेसर अली खान ने ऑपरेशन सिंदूर पर की विवादित टिप्पणी, उसके दादा के बनाए होटल को पार्किंग बनाएगी BJP सरकार: पाकिस्तान चला गया था राजा महमूदाबाद

नैनीताल में बना होटल मेट्रोपोल अब पार्किंग के लिए इस्तेमाल होगा। शत्रु सम्पत्ति घोषित किया गया मेट्रोपोल होटल केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी की सरकार को सौंप दिया है। यह होटल महमूदाबाद के उस राजा का था, जो पाकिस्तान चला गया था। उसी राजा के वंशज अली खाना महमूदाबाद को लेकर वर्तमान में विवाद छिड़ा हुआ है।

इस होटल की जमीन को अब अब नैनीताल की पार्किंग समस्या के निदान के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सीएम पुष्कर सिंह धामी को इस होटल को स्थानांतरित किए जाने की जानकारी पत्र लिख कर दी है।

नैनीताल की जिलाधिकारी वंदना ने बताया है कि मेट्रोपोल होटल में सरफेस पार्किंग की अस्थाई अनुमति गृह मंत्रालय से मिली है। उन्होंने बताया शासन की हरी झंडी मिलने के बाद पार्किंग निर्माण शुरू हो जाएगा। मेट्रोपोल होटल करीब 9 एकड़ जमीन में फैला हुआ है। इसका निर्माण 1880 में गौथिक शैली में हुआ था।

इसमें 75 कमरे, 16 काटेज, 24 सर्वेंट क्वाटर और 5 टेनिस लॉन हैं। 1947 के बाद भी ये महमूदाबाद रियासत के नवाब के पास इसका मालिकाना हक था। देश के बंटवारे के बाद ये लोग पाकिस्तान चले गए। महमूदाबाद परिवार के लोगों ने पाकिस्तान की नागरिकता ले ली थी।

1963 में शत्रु संपत्ति अधिनियम लागू होने के बाद इसे शत्रु संपत्ति घोषित कर दिया गया, तब से यह गृह मंत्रालय के अधीन है।

जिन्ना ने मनाया था हनीमून

इतिहासकार प्रो अजय रावत के मुताबिक 1919 में मोहम्मद अली जिन्ना अपनी बीवी रतीबाई के साथ हनीमून मनाने मेट्रोपोल होटल आया था। जिन्ना और उसकी बीवी ने नैनी झील में बोटिंग भी की थी। जिन्ना की बायोग्राफी में भी लेखक स्ट्रेनले वाल्पार्ट ने उसके नैनीताल प्रवास का जिक्र किया है।

महमूदाबाद के राजा ने उसकी मेहमानवाजी की थी। राजा महमूदाबाद का मेट्रोपोल होटल उस वक्त काफी मशहूर था जहाँ देश-विदेश से लोग आते थे।

कौन है राजा महमूदाबाद?

भारत में रहने वाले अली खान महमूदाबाद के दादा मोहम्मद आमिर अहमद खान महमूदाबाद का अंतिम राजा था। उसका पाकिस्तान बनाने में बड़ा रोल था। मुस्लिम लीग को चलाने के ली पैसा वही दिया करता था। साल 1947 में भारत के बंटवारे के समय राजा महमूदाबाद इराक में रह रहा थे।

1957 में उसने पाकिस्तान की नागरिकता ले ली और अपनी सारी संपत्ति पाकिस्तान को दान में दे दी। इस वजह से भारत में उनकी संपत्तियों को शत्रु संपत्ति के तौर पर सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया। 1966 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर महमूदाबाद का किला उसके परिवार को वापस मिला। 1973 में राजा महमूदाबाद की लंदन में मौत हो गई।

राजा महमूदाबाद का बेटा मुहम्मद अमीर मुहम्मद खान (अली खान का अब्बू) बँटवारे के बाद पाकिस्तान नहीं गया। वह उत्तर प्रदेश में रहा और अपनी संपत्तियों पर कब्जा बनाए रहा। 1981 में इंदिरा गाँधी सरकार ने उसकी 25% संपत्ति लौटाने की पेशकश की, लेकिन वह नहीं माना।

उसने लखनऊ सिविल कोर्ट में केस लड़ा और 2001 में जीत गया। हालाँकि 2002 में सरकार ने अपील की और यह मामला अभी भी कोर्ट में चल रहा है। सुलेमान 1985 और 1989 में कॉन्ग्रेस के टिकट पर महमूदाबाद से विधायक बन चुका है।

राजा महमूदाबाद के पोते प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद ने हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की थीं। इसके बाद उसके खिलाफ केस दर्ज किया गया था। उसे गिरफ्तार किया गया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसे अंतरिम जमानत दे दी थी।

भारत का ‘ब्लैक टाइगर’, पाकिस्तानी फौज में बन गया मेजर नबी अहमद शाकिर: कहानी उस जासूस की जो लाहौर यूनिवर्सिटी में पढ़ा, सैकड़ों जिंदगी बचाई, मियाँवाली में सहे जुल्म

बीते कुछ समय में जब भारतीयों ने पैसे, झूठे प्यार या दूसरी चीजों के लालच में आकर पाकिस्तान का साथ दिया और भारत के साथ धोखा किया, जैसे ज्योति मल्होत्रा, देवेंद्र सिंह गजाला, यामीन मोहम्मद वगैरह। तब एक ऐसा शख्स भी था जो सालों तक पाकिस्तान में रहा और वहाँ से भारत के लिए खुफिया जानकारियाँ भेजता रहा। इसकी वजह से कई भारतीयों की जान बची। उस शख्स का नाम था रविंदर कौशिक। खुफिया एजेंसियों में उन्हें ‘ब्लैक टाइगर’ के नाम से जाना जाता था। उन्होंने न सिर्फ पाकिस्तान में रहने का फैसला किया, बल्कि अपनी असली पहचान को पूरी तरह बदल लिया।

कौशिक ने वहाँ की भाषा सीखी और एक पाकिस्तानी लड़की से शादी भी की। वे पाकिस्तानी फौज में मेजर के पद तक पहुँचे। एक ऐसी जिंदगी जी, जहाँ हर पल उनका राज खुल सकता था। फिर भी उन्होंने भारत को ऐसी-ऐसी जानकारियाँ दीं, जिनसे दुश्मन के कई ऑपरेशन नाकाम हो गए।

रविंदर कौशिक ने कभी कोई मेडल या सम्मान नहीं माँगा। वे बस अपने देश की सेवा करना चाहते थे, और ये काम उन्होंने खामोशी से और पूरी लगन से किया।

देश से गद्दारी करने वालों का नाम लेना और उनकी बुराई करना आसान है, लेकिन देश के लिए सब कुछ कुर्बान करने वालों के नाम समय के साथ भूल जाते हैं। ऐसे वीरों को याद करना जरूरी है, जिन्होंने देश के लिए अपनी जिंदगी, यहाँ तक कि अपना नाम भी छोड़ दिया।

रविंदर कौशिक कोई फिल्मी किरदार नहीं थे, बल्कि असल जिंदगी के सुपरहीरो थे। उनकी असली कहानी को बार-बार सुनाया जाना चाहिए।

एक रंगमंच जिसने रविंदर कौशिक को असली जासूस बनाया

कौशिक का जन्म 11 अप्रैल 1952 को राजस्थान के श्रीगंगानगर में हुआ था। वे ऐसे परिवार में बड़े हुए, जहाँ देशभक्ति सिर्फ बातें नहीं, बल्कि जिंदगी का हिस्सा थी। उनके पिता वायुसेना के अधिकारी थे, जिन्होंने युद्ध लड़े थे। बचपन से ही कौशिक ने अपने पिता की तरह देश की सेवा करने का सपना देखा।

युद्ध के मैदान में तो उन्हें अपना जौहर दिखाने का मौका नहीं मिला, लेकिन कॉलेज के रंगमंच ने उन्हें रास्ता दिखाया। वे श्रीगंगानगर के एसडी बिहानी पीजी कॉलेज में कॉमर्स की पढ़ाई कर रहे थे, लेकिन उनकी असली रुचि थिएटर में थी। एक बार उन्होंने एक नाटक में भारतीय अधिकारी का किरदार निभाया, जो दुश्मनों के सामने हार मानने की बजाय मौत चुनता है। दर्शकों में रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) के कुछ अधिकारी भी थे, जो छिपकर बहादुर और होशियार लोगों की तलाश में थे।

उन्हें रविंदर कौशिक में देशभक्ति और जोश दिखा। नाटक के बाद वे चुपके से कौशिक के पास गए और सीधा प्रस्ताव रखा। उन्होंने कौशिक से कहा कि अपने देश की सेवा करो, लेकिन याद रखो तुम फिर कभी नहीं दिखोगे। तुम्हें कोई और बन कर जीना होगा। कौशिक ने बिना हिचक हाँ कह दिया। 1973 में वे दिल्ली गए और अपने परिवार को बताया कि उन्हें नौकरी मिल गई है। इसके बाद वे रॉ में शामिल हो गए। अगले दो साल तक उन्होंने सख्त ट्रेनिंग ली, उर्दू सीखी, पाकिस्तान की संस्कृति और भूगोल का अध्ययन किया।

रविंद्र कौशिक ने इस्लाम के रीति-रिवाज सीखे और यहाँ तक कि खतना भी करवाया। उनकी असली पहचान को धीरे-धीरे मिटा दिया गया। 1975 तक रविंदर कौशिक का नाम कागजों से भी गायब हो गया और वे नबी अहमद शाकिर बनकर पाकिस्तान के लिए रवाना हुए। वे पूरी तरह तैयार थे कि कोई शक न करे कि वे भारतीय हैं।

कौशिक ने जो किया, वैसा पहले कभी नहीं हुआ था। उनकी कहानी एक ऐसी किंवदंती बन गई, जिसे दोहराना मुश्किल है।

झूठ की जिंदगी – कराची यूनिवर्सिटी से पाकिस्तानी फौज तक

साल 1975 में कौशिक उर्फ नबी अहमद शाकिर पाकिस्तान पहुँचे। बाहर से वे इस्लामाबाद के एक मुस्लिम शख्स लगते थे, लेकिन अंदर से वे रविंदर कौशिक थे, जो अपने देश की सेवा के लिए वहाँ आए थे।

उनका पहला कदम था कराची यूनिवर्सिटी में दाखिला लेना। उन्होंने एलएलबी की पढ़ाई शुरू की, ताकि लोगों का भरोसा जीत सकें। वे डिबेट करते, इम्तिहान देते और एक आम पाकिस्तानी छात्र की तरह रहने लगे। किसी को उन पर शक नहीं हुआ। उन्होंने एक नया व्यक्तित्व बना लिया।

पढ़ाई पूरी करने के बाद कौशिक ने पाकिस्तानी फौज में जाने का फैसला किया। रॉ को शुरू में ये जोखिम भरा लगा, लेकिन कौशिक ने मिलिट्री अकाउंट्स डिपार्टमेंट की परीक्षा दी और पहले ही प्रयास में पास हो गए। जो लड़का भारत में नाटक में सैनिक का रोल करता था, वह अब पाकिस्तानी फौज में अफसर बन गया।

इस पद से कौशिक ने भारत के लिए जरूरी जानकारियाँ भेजनी शुरू कीं। ये जानकारियाँ बहुत खास थीं, जैसे फौज की हलचल, अफसरों के तबादले, हथियारों की डिलीवरी वगैरह। उन्होंने इनविजिवल इंक से रिपोर्ट लिखीं और कुवैत या दुबई के रास्ते भारत भेजीं।

उस समय इंटरनेट नहीं था। जानकारी भारत पहुँचने में कई दिन या हफ्ते लग जाते थे। फिर भी कौशिक की भेजी हर जानकारी देशभक्ति का सबूत थी।

रविंदर कौशिक ने अपनी पाकिस्तानी पहचान को और मजबूत करने के लिए एक स्थानीय लड़की अमानत से शादी की, जो उनकी यूनिट में एक दर्जी की बेटी थी। उनका एक बेटा हुआ, जिसका नाम था अरीब। उनकी पत्नी और बेटे को कभी नहीं पता कि उनके घर का आदमी पहले रविंदर था।

कौशिक ने काम पर, घर पर और समाज में अपनी असली पहचान छुपाए रखी। वे दोस्ताना, धार्मिक और अपनी यूनिट के प्रति वफादार दिखते थे। बाहर से वे एक भरोसेमंद पाकिस्तानी फौज के अफसर और प्यार करने वाले पति थे, लेकिन असल में वे भारत के जासूस थे।

भारत के लिए दहाड़ने वाला ब्लैक टाइगर

साल 1979 से 1983 तक भारत के पास ऐसा जासूस था, जो दुश्मन की फौज में मेजर के पद पर था। कौशिक ने ऐसी जानकारियाँ दीं, जिनसे भारत को रणनीतिक फायदा हुआ। उनकी रिपोर्ट्स ने दुश्मन की घुसपैठ रोकी, उनके गुप्त प्लान नाकाम किए और हजारों लोगों की जान बची। कहा जाता है कि उनकी जानकारियों ने ऐसे ऑपरेशनों को रोका, जिनसे 20,000 भारतीय सैनिकों की जान जा सकती थी।

वे ये सब प्रसिद्धि के लिए नहीं कर रहे थे। वे बस मानते थे कि ये काम किसी को तो करना ही है। उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को उनके योगदान के बारे में बताया गया। उन्होंने ही कौशिक को ‘ब्लैक टाइगर’ का नाम दिया, जो रॉ में हमेशा के लिए अमर हो गया। ये कोई कोडनेम नहीं, बल्कि सम्मान था।

कौशिक बहुत सावधान रहते थे। उनके संदेश भेजने का तरीका धीमा लेकिन सुरक्षित था। वे सुनिश्चित करते थे कि सारी जानकारी सही और समय पर भारत पहुँचे। वे इतने घुलमिल गए थे कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के बड़े अफसर भी उनसे बिना शक के बात करते थे।

वे सार्वजनिक रूप से भारत कभी नहीं लौटे। एक बार वे अपने भाई की शादी के लिए सऊदी अरब के बहाने आए। तब भी उन्होंने दुबई के बिजनेसमैन का भेस बनाए रखा और अपने पाकिस्तानी परिवार के लिए तोहफे खरीदे।

धोखा: वो मिशन जिसने ब्लैक टाइगर को कर दिया एक्सपोज

रविंदर कौशिक जानते थे कि वे आग से खेल रहे हैं। उनका पर्दाफाश उनकी गलती से नहीं, बल्कि रॉ की एक भूल से हुआ। 1983 में रॉ ने एक और जासूस, इनायत मसीह को पाकिस्तान भेजा, ताकि वह कौशिक को एक खास संदेश दे। ये कदम जोखिम भरा था, क्योंकि कौशिक आठ साल से वहाँ काम कर रहे थे और सीधे संपर्क की जरूरत नहीं थी। फिर भी ये फैसला लिया गया।

मसीह सीमा पार करने में कामयाब रहा, लेकिन जल्दी ही उसे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ने पकड़ लिया। उसे इतना सताया गया कि वह टूट गया और उसने सब कुछ बता दिया। उसने ये भी बताया कि मेजर नबी अहमद शाकिर असल में रविंदर कौशिक हैं। आईएसआई हैरान थी। उन्होंने मसीह को कौशिक से दोबारा मिलने और एक मुलाकात तय करने को कहा।

कौशिक को कुछ पता नहीं था। वे एक पार्क में मसीह से मिलने गए, लेकिन वहाँ पाकिस्तानी अधिकारी उनका इंतजार कर रहे थे। भारत के सबसे मूल्यवान अंडरकवर एजेंट को दुश्मनों की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए गिरफ्तार किया गया क्योंकि किसी ने मसीह को संदेश पहुंचाने के लिए भेजकर उसकी जान से खेलने का फैसला किया था। भारत के सबसे कीमती जासूस को एक गलत फैसले की वजह से पकड़ा गया।

कौशिक को सियालकोट ले जाया गया, जहाँ उससे पूछताछ शुरू हुई। उसे बिना रुके कई घंटों तक प्रताड़ित किया गया। हालाँकि, कौशिक ने कुछ भी नहीं बताया। लगातार प्रताड़ना के बाद भी उन्होंने अपनी मातृभूमि के साथ विश्वासघात नहीं किया। कौशिक ने कभी अपनी पहचान की पुष्टि नहीं की। उन्होंने किसी और का नाम नहीं बताया और एक भी ऑपरेशनल डिटेल लीक नहीं की।

अँधेरे के दो साल-सियालकोट में ज्यादतियों का नहीं हुआ कोई अंत

सियालकोट में कौशिक ने जो दो साल बिताए, वो जेल नहीं, बल्कि उनके हौसले को तोड़ने की कोशिश थी। पाकिस्तानियों ने हर तरह की शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक यातनाएँ दीं। उन्हें सोने नहीं दिया गया, ठंडी सतह पर लेटने को मजबूर किया गया और अकेले में बंद रखा गया। इसका उद्देश्य उनके जीवन को अमानवीय बनाना था, लेकिन कौशिक ने कुछ नहीं कहा।

वे अकेले थे, बिना किसी मदद के। बाद में अपने परिवार को भेजे पत्रों में उन्होंने बताया कि उन्हें क्या-क्या सहना पड़ा। उनके खिलाफ सालों तक मुकदमा चला और 1985 में उन्हें फांसी की सजा दी गई। बाद में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने इसे उम्रकैद में बदल दिया। ये राहत नहीं, बल्कि उनकी तकलीफ को और बढ़ाने का फैसला था।

उन्हें सियालकोट से कोट लखपत जेल और फिर मियांवाली जेल भेजा गया, जहाँ वे जिंदगी भर रहे। जेल में भी वे भारत को पत्र भेजते रहे। एक पत्र में उन्होंने पूछा, “क्या भारत जैसे बड़े देश में कुर्बानी देने वालों को यही मिलता है?” वे प्रसिद्धि नहीं चाहते थे, बस इतना चाहते थे कि उनकी कहानी भुलाई न जाए।

जेल में कई साल बिताने के बाद, उन्हें प्रतिरोध का आखिरी तरीका मिला, लेखन। उन्होंने अपने परिवार को सावधानीपूर्वक और चुपचाप पत्र भेजना शुरू किया। उनके पत्रों से उनके परिवार को सच्चाई पता चली। उनके पिता ये सदमा सहन नहीं कर सके और उनकी मृत्यु हो गई। उनकी माँ ने दिल्ली में हर दरवाजा खटखटाया, लेकिन सरकार ने सिर्फ 500 रुपये की छोटी पेंशन दी, जिसे बाद में 2,000 रुपये किया गया। उनके बलिदान को कभी आधिकारिक मान्यता नहीं मिली।

फिर भी, कौशिक ने कभी कड़वाहट नहीं दिखाई। उन्होंने दर्द और अकेलेपन की बात की, लेकिन कभी पछतावा नहीं जताया। उनका एक वाक्य आज भी गूँजता है, “अगर मैं अमेरिकी होता, तो तीन दिन में जेल से बाहर होता।” ये शिकायत नहीं, बल्कि अपने देश को आईना दिखाने की बात थी।

खामोश विदाई – एक देशभक्त का आखिरी अध्याय

नवंबर 2001 में, 18 साल जेल में बिताने के बाद, रविंदर कौशिक की मियाँवाली जेल में मृत्यु हो गई। वे टीबी और दिल की बीमारी से जूझ रहे थे, लेकिन उन्हें कोई खास इलाज नहीं मिला। उनके लिए कोई अपील या अभियान नहीं चला। भारत ने उन्हें वापस लाने की कोई कोशिश नहीं की। वे उसी तरह मरे, जैसे जिए -खामोशी से।

उनका शव मुल्तान में दफनाया गया, जो उनकी मातृभूमि से बहुत दूर था। उनकी कब्र पर उनका असली नाम भी नहीं लिखा। भारत की तरफ से उनके परिवार को कोई संदेश नहीं मिला, न कोई स्वीकृति, न शोक। जिसने सब कुछ दाँव पर लगाया, उसे इतिहास में चुपके से गायब होने दिया गया।

उनके परिवार ने अकेले में शोक मनाया। उनकी माँ ने इंटरव्यू और पत्रों से उनकी याद को जिंदा रखा। लेकिन दुनिया आगे बढ़ गई। आज उनका नाम किताबों या गणतंत्र दिवस के भाषणों में शायद ही आता हो। उनके नाम पर कोई सड़क, स्मारक या पट्टिका नहीं है।

इतिहास नाम याद रखता है, लेकिन कुछ नाम भूलने के लिए ही बनते हैं। रविंदर कौशिक ऐसा ही नाम है। फिर भी, वे इससे ज्यादा के हकदार हैं। उनके पास कोई मेडल नहीं था, वे परेड में नहीं चले, लेकिन श्रीगंगानगर की गलियों से मियाँवाली की जेल तक, उन्होंने ऐसी जिंदगी जी, जिसकी कल्पना कम लोग कर सकते हैं। उनकी कहानी सिर्फ सीमाओं के पार नहीं, बल्कि पहचान, विश्वास और चुप्पी के पार थी।

खुफिया एजेंसियों और कुछ फिल्मों में उन्हें याद किया जाता है। ‘एक था टाइगर’ और ‘रोमियो अकबर वाल्टर’ जैसी फिल्में उनकी कहानी से प्रेरित हैं, लेकिन कोई भी उन्हें खुलकर श्रेय नहीं देता। उनके परिवार को कोई राजकीय सम्मान नहीं मिला। उनकी कब्र बिना नाम के है, उस देश से दूर, जिसके लिए उन्होंने सब कुछ छोड़ दिया।

लेकिन शायद सम्मान सुर्खियों से नहीं मिलता। शायद ये कहानी को बार-बार सुनाने से शुरू होता है, ताकि हर भारतीय रविंदर कौशिक को जाने।

अब वक्त है कि हम अपने सैनिकों के साथ-साथ कौशिक का नाम भी पढ़ाएँ। वक्त है कि हम वर्दी वालों के साथ-साथ परदे के पीछे सेवा करने वालों को भी सम्मान दें। वक्त है कि हम कहें कि रविंदर कौशिक भारत के ब्लैक टाइगर थे, सच्चे देशभक्त, गुमनाम योद्धा और इस देश के सबसे बहादुर जासूस।

जो सड़क दरभंगा के BJP सांसद ने बनवाई, 2 महीने बाद उसके ही नाम पर निकाल लिए लाखों: सत्ता मिलने से पहले ही प्रशांत किशोर की ‘जन सुराज’ का शुरू हो गया करप्शन?

मार्च 2024 में एक सड़क का निर्माण पूरा हुआ। ₹11 लाख रुपए की लागत से। 2 महीने बाद फिर से उसी सड़क के निर्माण के नाम पर ₹6 लाख दोबारा निकाल लिए गए। मामला बिहार के दरभंगा जिले का है। भ्रष्टाचार के आरोपों के घेरे में जिला परिषद की अध्यक्ष सीता देवी हैं।

फर्जी भुगतान के इस मामले की रिपोर्ट दैनिक भास्कर ने प्रकाशित की है। अखबार ने जब सीता देवी से इसको लेकर सवाल किया तो उनका जवाब था- आप (पत्रकार) ऑफिस में आइए, बात की जाएगी। उनका यह भी दावा है कि 11 लाख रुपए से दरभंगा के बीजेपी सांसद गोपाल जी ठाकुर ने देकुली गाँव में जो सड़क बनवाई है वह दूसरी तरफ है और उन्होंने दूसरी तरफ सड़क बनवाई है।

यह दूसरी बात है कि ग्रामीण उनके दावे को खारिज कर रहे हैं। ऑपइंडिया को ग्रामीणों ने बताया है कि सड़क गोपाल ठाकुर के सांसद निधि से ही बनी है। सीता देवी जिस सड़क का दावा कर रही हैं उसका जमीन पर कोई अस्तित्व नहीं है।

गोपाल जी ठाकुर ने बनवाई सड़क

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, दरभंगा जिला के देकुली गाँव में यह गड़बड़ी हुई है। देकुली गाँव में दिलीप झा के घर से नारायण झा के घर PCC सड़क का निर्माण सांसद गोपाल जी ठाकुर ने अपनी सांसद निधि से करवाया था। यह सड़क 15वें वित्त आयोग के तहत बनाई गई थी। इसको लेकर सांसद ठाकुर ने जनवरी, 2023 में मंजूरी दी थी।

इसके बाद जनवरी, 2024 में इस सड़क निर्माण के लिए निर्माण विभाग मंजूरी मिल गई और मार्च, 2024 तक यह सड़क बना कर तैयार कर दी गई थी। इस सड़क के निर्माण के लिए मार्च, 2024 में ही भुगतान कर दिया गया था। यह भुगतान ₹11.67 लाख का किया गया था। यह काम करवाए जाने की जानकारी 15वीं वित्त आयोग के पोर्टल पर है।

इसका योजना कोड 67389875 है। यह सड़क अभी भी बनी हुई है और गाँव में लोग इससे आवाजाही करते हैं। गोपालजी ठाकुर के निर्माण करवाने का शिलापट भी रोड के किनारे लगा हुआ है।

सीता देवी पर दोहरीकरण के आरोप

इसी सड़क के निर्माण के नाम पर मई, 2024 में ₹6 लाख का भुगतान दरभंगा जिला परिषद की चेयरमैन सीता देवी ने किया है। यह भुगतान तीन किश्त में किया गया है। यह भुगतान उसी सड़क के नाम पर किया गया, जिसे गोपाल जी ठाकुर ने बनवाया।

इस योजना का नाम ‘रंजीत झा के घर से चन्द्रमोहन झा के घर तक सड़क का निर्माण’ था। रंजीत झा, उन्हीं नारायण झा के बेटे हैं, जिनके घर के पास निर्माण सांसद गोपाल जी ठाकुर ने करवाया था।

रिपोर्ट कहती है कि सीता देवी ने इस निर्माण का प्रस्ताव तब रखा था, जब वह जिला परिषद की सदस्य हुआ करती थीं और भुगतान तब हुआ, जब वह अध्यक्ष बन गईं। लेकिन प्रश्न उठता है कि जब यह सड़क पहले ही बन चुकी थी तो ऐसे में दोबारा किस सड़क का निर्माण किया गया और किस एवज में पैसा लिया गया।

उठे कई प्रश्न

यह भी प्रश्न उठता है कि यदि उसी सड़क के निर्माण के लिए मार्च, 2024 में ₹11 लाख खर्च किए गए तो मई, 2024 में उसकी लागत ₹6 लाख कैसे रह गई। इसके अलावा इस पूरे मामले में यह भी प्रश्न उठता है कि मात्र कुछ ही महीनों के भीतर सड़क का निर्माण क्यों करवाया गया?

यदि नहीं करवाया गया तो भुगतान क्यों किया गया और यदि करवाया गया तो इसका कारण पहले बनी सड़क की गुणवत्ता खराब होना था क्या? गुणवत्ता खराब होने वाला तर्क भी इस मामले में फिट नहीं बैठता है, क्योंकि कोई सड़क अगर 2 महीने में टूट जाती तो उस पर जाँच होती। इस मामले में ऑपइंडिया ने एक स्थानीय व्यक्ति से भी बात की है।

ऑपइंडिया ने उनसे सड़क निर्माण के विषय में पूछा। नाम ना छापने की शर्त पर उन्होंने बताया कि इस सड़क का निर्माण गोपालजी ठाकुर ने ही करवाया था और इसे काफी मजबूती से बनवा दिया था। उन्होंने बताया कि इस सड़क के निर्माण को उनके समेत पूरे गाँव ने देखा था।

उन्होंने बताया कि यह सड़क तबसे चल रही है और इसके दोबारा निर्माण की कोई आवश्यकता ही नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि एक बार निर्माण के बाद और कोई भी गतिविधि यहाँ उन्हें नहीं दिखी। ग्रामीण ने बताया कि यदि इसको लेकर दोबारा पैसा लिया गया है, तो यह गड़बड़ी है। इस गड़बड़ी को लेकर जाँच की माँग की गई है।

जिला परिषद से जुड़े लोगों ने यह भी आशंका जताई है कि चुनावी वर्ष में यह घोटाला कहीं सरकार की छवि बिगाड़ने को तो नहीं किया गया। सीता देवी को लोगों ने जनसुराज पार्टी से जुदा बताया है। सीता देवी ने इस मामले में दैनिक भास्कर से बात की है।

उन्होंने दैनिक भास्कर से कहा, “दोनों दो साईड का मामला है। एक तरफ से सांसद की ओर से और दूसरी तरफ से जिला परिषद की ओर से सड़क बनाई गई है। आप ऑफिस में आए, बात की जाएगी।” अब इस मामले में जाँच की माँग हो रही है।

पहले भी सामने आ चुकी ₹15 करोड़ की गड़बड़ी

इससे पहले भी जिला परिषद में ₹15 करोड़ की गड़बड़ी पकड़ी जा चुकी है। मई, 2025 में ही जिला परिषद के मुख्य अभियंता के नाम से फर्जी तरीके से हस्ताक्षर करके 142 योजनाओं को मंजूरी देने की बात सामने आई थी। इन योजनाओं की लागत ₹15 करोड़ थी। बाद में मुख्य अभियंता ने स्वयं इन योजनाओं को मंजूरी देने की बात से इनकार किया था। इस गड़बड़ी के सामने आने के बाद इन योजनाओं पर रोक लगा दी गई थी और जाँच चालू कर दी गई थी।