अयोध्या रामजन्मभूमि के भव्य मंदिर में भगवान श्रीराम के विराजमान होने के बाद से ही यह पूछा जा रहा था कि सीतामढ़ी के पुनौरा धाम स्थित जानकी जन्मस्थली का उद्धार कब होगा। इसकी घड़ी भी आ गई है।
नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली बिहार की एनडीए सरकार ने 1950 के बिहार हिन्दू धार्मिक न्यास अधिनियम में संशोधन करते हुए पुनौरा धाम मंदिर और उससे जुड़ी संपत्तियों को अपने नियंत्रण में ले लिया है। इस जगह को अयोध्या की तरह विकसित करने के लिए जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (30 मई 2025) को बिहार के काराकाट में रैली को संबोधित करते हुए भी इसका जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पुनौरा धाम का विकास धार्मिक परियोजना नहीं है। यह भारत की सांस्कृतिक पहचान और सनातन परंपरा के वैश्विक गौरव का प्रतीक बनेगा। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य की सरकारें मिलकर इस परियोजना को सफल बनाएँगी।
अध्यादेश से जुड़ी खास बातें
अधिनियम की धारा 32 में संशोधन: बिहार हिंदू धार्मिक न्यास अधिनियम, 1950 की धारा 32 में उपधारा 32(5) जोड़ी गई है, जिससे राज्य सरकार को पुनौराधाम मंदिर के विकास के लिए योजना बनाने का अधिकार प्राप्त हुआ है।
विकास योजना का दायरा: इस योजना में भूमि और सभी परिसंपत्तियों का प्रशासन शामिल होगा, जिसका उद्देश्य मंदिर को राष्ट्रीय महत्व का धार्मिक और पर्यटन आकर्षण बनाना है।
समिति का गठन: राज्य सरकार इस योजना के प्रशासन के लिए प्रतिष्ठित व्यक्तियों की एक समिति गठित करेगी।
वर्तमान न्यास समिति का विघटन: अधिनियम के लागू होने की तिथि से पुनौराधाम मंदिर की वर्तमान न्यास समिति भंग मानी जाएगी, और सभी पदाधिकारी कार्य करना बंद कर देंगे।
न्यास के कर्मचारियों की स्थिति: न्यास के सभी कर्मचारी अनुशासनात्मक कार्रवाई सहित समिति के पूर्ण नियंत्रण के अधीन रहते हुए न्यास की सेवा करते रहेंगे।
समिति का नियंत्रण: राज्य सरकार द्वारा गठित समिति न्यास और उसकी सभी मूर्त और अमूर्त परिसंपत्तियों के प्रबंधन का पूर्ण नियंत्रण अपने हाथ में लेगी।
समिति की रिपोर्टिंग: समिति राज्य सरकार को समय-समय पर रिपोर्ट करेगी।
निर्देशों की बाध्यता: राज्य सरकार योजना के उचित कार्यान्वयन के हित में समिति को निर्देश जारी कर सकती है, और ऐसे निर्देश बाध्यकारी होंगे।
योजना में संशोधन का अधिकार: राज्य सरकार न्यास के समुचित विकास के हित में वर्तमान योजना को संशोधित, परिवर्तित या प्रतिस्थापित कर सकेगी।
समिति का पुनर्गठन: राज्य सरकार किसी भी समय समिति का पुनर्गठन कर सकती है, जिसमें नए सदस्यों को शामिल करना या वर्तमान सदस्यों को बाहर करना शामिल है।
धारा 28 रहेगी लागू: अधिनियम की धारा 28 के अंतर्गत परिषद की सामान्य शक्तियाँ और कर्तव्य न्यास पर लागू रहेंगे।
*पुनौराधाम के विकास हेतु समिति के गठन के लिए अध्यादेश हुआ जारी* —————————————————————————— मुझे अत्यंत हर्ष है कि बिहार सरकार द्वारा "बिहार हिन्दू धार्मिक न्यास (संशोधन) अध्यादेश, 2025" जारी किया गया है, जिससे पुनौराधाम (सीतामढ़ी) के तीव्र और समर्पित विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ… pic.twitter.com/zVrO0IgQvP
गौरतलब है कि अयोध्या में भव्य मंदिर निर्माण के बाद केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बिहार से जानकी जन्मस्थली पर भी भव्य मंदिर के निर्माण का वादा किया था। इसके बाद इस दिश में बिहार ने कैबिनेट ने कई महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं। अप्रैल 2025 में बिहार सरकार के पर्यटन विभाग ने पुनौरा धाम के विकास के लिए करीब 143 करोड़ की योजना स्वीकृत की थी। यह रामायण सर्किट का हिस्सा होगा।
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस को अपना ही ट्वीट हटाना पड़ा, जिसमें उसने ऑपइंडिया की हिंदुओं पर हमले की खबर को ‘गलत’ ठहराने की कोशिश की थी।
बता दें कि 27 मई 2025 को यूनुस ने ट्वीट किया था कि ऑपइंडिया ने एक लेख छापा, जिसका शीर्षक था, ‘बांग्लादेश में हिंदुओं पर फिर टूटा मुस्लिम भीड़ का कहर, घरों में लगाई आग-मचाई लूटमार: इस बार लोकल नेता की मौत को बनाया हिंसा का बहाना‘ इस लेख में जेसोर जिले के अभयनगर में हिंदुओं पर हमले और पत्रकार मुन्नी शाहा की गिरफ्तारी का जिक्र था।
अमेरिका समर्थित सत्ता परिवर्तन के बाद सत्ता में आए यूनुस ने हिंदू समुदाय के खिलाफ हिंसा को ‘गुस्से और बदले’ की प्रतिक्रिया बताया, न कि ‘टारगेटेड कम्युनल रायट्स’ यानी सांप्रदायिक नफरत की बात को उसने खारिज करने की कोशिश की। हालाँकि बाद में उसे अपना ट्वीट डिलीट करना पड़ा, क्योंकि ऑपइंडिया ने उसे फिर से आईना दिखा दिया।
मोहम्मद यूनुस के अब हटाये जा चुके ट्वीट का स्क्रीनशॉट
ऑपइंडिया ने यह स्पष्ट किया कि मुहम्मद यूनुस ने अनजाने में हमारी रिपोर्ट की पुष्टि कर दी, इसके बावजूद यूनुस ने जेसोर में हिंदुओं के खिलाफ अत्याचार की खबरों को दबाने की बेतहाशा कोशिश की।
Mohammad Yunus, the caretaker chief of #Bangladesh, specifically targeted #OpIndia and our reportage about atrocities against Hindus. He also justified the violence against Hindus.
ऑपइंडिया की संपादक नुपुर जे शर्मा ने यूनुस की आलोचना की और कहा कि उनके शासन में इस्लामी कट्टरपंथियों का हौसला बढ़ा है, जिससे हिंदुओं पर हमले हो रहे हैं। शर्मा ने यूनुस पर आरोप लगाया कि उसके शासन में इस्लामी कट्टरपंथियों का हौसला बढ़ा है और हिंसक इस्लामी भीड़ों को धार्मिक अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं पर अत्याचार करने की खुली छूट मिल गई है।
उन्होंने यह भी कहा कि यूनुस का प्रयास न केवल सच्चाई को दबाने वाला था, बल्कि उनके भीतर के इस्लामी कट्टरपंथी इरादे को भी उजागर कर गया। ऑपइंडिया की संपादक की प्रतिक्रिया के बाद यूनुस को ये बात समझ आ गई कि वो पूरी तरह से एक्सपोज हो गया है, तब जाकर उसने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया।
ऑपइंडिया की खबर तथ्यों पर आधारित थी और बांग्लादेशी अखबार प्रोथोम आलो की रिपोर्ट पर थी, जिसमें जेसोर में हिंदुओं के घर जलाए जाने की बात थी। ऑपइंडिया ने न केवल इस घटना को उजागर किया, बल्कि बांग्लादेश में लंबे समय से हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों की सच्चाई को भी सामने लाने का काम किया है।
मुहम्मद यूनुस द्वारा ऑपइंडिया पर लगाया गया आरोप उसकी हताशा और सच्चाई से बचने की कोशिश को दर्शाता है। वह नहीं चाहता कि उसकी सरकार की विफलता और अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार दुनिया के सामने आएँ। यूनुस की सरकार इन हमलों को नजरअंदाज कर रही है और मीडिया के जरिए सच्चाई को छिपाने या गलत बताने की कोशिश कर रही है।
शब्दों का हेरफेर करके लोगों को भ्रम में डालना मीडिया का पुराना काम है। सामान्य पाठक तो शायद समझ भी न पाए जो शब्द उसे परोसा जा रहा है उसके पीछे क्या खेल होगा और उसका असर उसकी मानसिकता पर कैसे पड़ेगा। ‘मुस्लिम आलिमों/मौलवियों/मौलानाओं’ को रिपोर्ट में ‘तांत्रिक/साधु/पुजारी’ लिखते आना इसी बात का एक उदाहरण है जिसपर मीडिया सालों से प्रोपगेंडा चलाता आया है।
इस बार भी यही हुआ है। दैनिक भास्कर ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसका शीर्षक है- “मंदसौर में 40-50 महिलाएँ बनीं तांत्रिक का शिकार: महिला के पति को पागल बताकर किया यौन शोषण, गाँव में दहशत।”
इस खबर में जिस आरोपित को ‘तांत्रिक’ बताया जा रहा है उसका नाम मुबारिक मंसूरी है। रिपोर्ट के भीतर स्थानीयों के हवाले से बताया गय है कि मध्य प्रदेश के मंदसौर में मुबारिक मंसूरी ने 40-50 महिलाओं को अपना शिकार बनाया था। ये झाड़-फूँक, वशीकरण आदि का झांसा देकर उन्हें अपने अड्डे पर बुलाता और फिर उन्हें नशीला पदार्थ सुंघाकर उनसे गंदी हरकत करता, उनका रेप करता और उनकी वीडियो बनाता था। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया है।
पुलिस पड़ताल में उसके पास से फर्जी पहचान पत्र मिला और साथ में अश्लील साहित्य भी मिला है। बरामद किताबों की जो सामने जो तस्वीर आई है उसमें साफ-साफ शीर्षक ‘शाम-ए-करबला’ ,’इस्लाम और सेक्स’ लिखा है। बावजूद इन सब सबूतों के मीडिया इसे ऐसे दिखा रहा है जैसे ये कारनामा किसी ‘हिंदू तांत्रिक’ ने किया हो।
दैनिक भास्कर की खबर का स्क्रीनशॉट
दैनिक भास्कर की हेडलाइन पढ़िए। अगर एक अंजान व्यक्ति इसे एकदम से पढ़े तो क्या उसके मन में तांत्रिक की एक छवि नहीं बनेगी। क्या वो ये नहीं सोचेगा कि ये कांड किसी ऐसे व्यक्ति ने किया होगा जिसके माथ पर विभूति, हाथ में कपाल, मुख पर मत्रोंच्चार और सामने अग्रि होगी… लेकिन, अब असली आरोपित की तस्वीर देखिए।
मुबारिक मंसूरी की फोटो
क्या इसका भेष तांत्रिक का है। नहीं, मगर पाठक अपने मन में ये सोच चुका होगा कि 40-50 महिलाओं का रेप वैसे ही तांत्रिक ने किया होगा जिसकी उसने कल्पना की।
मेनस्ट्रीम मीडिया बस यही चाहता है पाठक को भ्रमित करके अपना ऐसा एजेंडा चलाना जिसमें हिंदू संस्कार और उससे जुड़ी परंपराएँ सिर्फ धूमिल होती रहें। फिर चाहें उसके लिए उन्हें एक मजहब और नाम सब छिपाना पड़े। सोचने वाली बात ये है कि ये कोई ऐसा मुद्दा नहीं है जिसपर हिंदुओं को अभी से आपत्ति हो।
स्वयं ऑपइंडिया इस मुद्दे पर 2019 से लगातार खबरें लिख रहा है, इस दौरान तमाम बार ये हाईलाइट किया जा चुका है कि अगर झाड़-फूँक करने वाला मुस्लिम है तो उसे तांत्रिक तो बिलकुल नहीं कहा जाएगा, क्योंकि वो अपना टोना में न मंत्र पढ़ता है और तंत्र विद्या इस्तेमाल करता है।
इतनी आपत्तियों के बाद भी दैनिक भास्कर जैसा अखबर, जिन्होंने इस मुद्दे पर जाकर ग्राउंड रिपोर्टिंग की, वो अपनी एक खबर में जान-बूझकर हेडलाइन में ‘हिंदू तांत्रिक’ शब्द लिखते हैं। देखिए, इसी मामले में 3 दिन पहले भी दैनिक भास्कर ने रिपोर्ट पब्लिश की थी, जिसका शीर्षक था- गरोठ में हिंदू तांत्रिक बना मुबारक मंसूरी, गिरफ्तार:हिंदू महिलाएं थी टारगेट पर, 10 साल से कर रहा था तंत्र-मंत्र का धंधा
दैनिक भास्कर की खबर का स्क्रीनशॉट
बाद में इसी मुद्दे पर की गई दूसरी खबर में भास्कर खुद बताता है कि स्थानीयों ने उन्हें जानकारी दी है कि करीब 30 साल पहले एक मुस्लिम परिवार उनके यहाँ आया था, जिनका का बेटा मुबारिक खान है।
दैनिक भास्कर की खबर में मुबारिक मंसूरी पर स्थानीय का बयान
अब अगर ये भी माना जाए कि पड़ताल के दौरान संस्थान को मुबारिक के मजहब के बारे में पता चला और पहले उन्हें गलत सूचना थी, तो क्या पूर्व में प्रकाशित खबर में बदलाव नहीं किया जाना चाहिए था।
ये कोई पहली बार नहीं है जब किसी मीडिया संस्थान ने ऐसी हरकत की हो। सिर्फ दैनिक भास्कर की बात करें तो इससे पहले जब मेरठ में नाबालिग के अपहरण और ठगी का मामला आया था। उस समय भी हेडलाइन में ‘तांत्रिक’ शब्द लिखा हुआ था जबकि आरोपित राशिद खान था।
इसी तरह सीतापुर में भी जब एक इश्तियाक नाम के आलिम ने एक किशोरी को झाड़-फूँक के नाम पर सिर से लेकर पाँव तक अगरबत्ती से दाग दिया था और बेल्ट से पीटा तक था उस समय भी मीडिया ने उसे तांत्रिक बनाया था।
इसके बाद अगला मामला सुल्तानपुर का था। तब भी हिंदू महिला को एक मौलवी ने ठगा था, मगर भास्कर ने हेडलाइन में शब्द इस्तेमाल किया था ‘तांत्रिक।’
2019 की खबरों में और 2025 की खबरों में कोई अंतर नहीं है। आज भी खबरों में ‘तांत्रिक’ शब्द धड़ल्ले से लिखा जा रहा है। अनुवाद के नाम ‘प्रीस्ट’ को उस जगह भी पुजारी लिख दिया जाता है जहाँ अपराध किसी ईसाई पादरी ने किया हो…। कोई सवाल उठता है तो उसे गंगा-जमुनी तहजीब से जोड़कर सही साबित करने के प्रयास होते हैं, फिर इसी क्रम में पाठकों का ब्रेनवॉश होता है और उनके जहन में बसाया जाता है कि अपराध करने वाला किसी अन्य मजहब नहीं हिंदू है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (30 मई 2025) को कानपुर के चकेरी एयरपोर्ट पर पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए कारोबारी शुभम द्विवेदी के परिवार से मुलाकात की। इस भावुक मुलाकात में पीएम मोदी ने शुभम की पत्नी ऐशान्या, पिता संजय और माँ सीमा से बात की।
शुभम की पत्नी ऐशान्या ने कहा, “प्रधानमंत्री से मिलकर ऐसा लगा जैसे घर का बड़ा सिर पर हाथ रख देता है।” उन्होंने बताया कि पीएम ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को और तेज करने का भरोसा दिलाया।
ऐशान्या ने बताया कि पीएम ने उनसे हमले की पूरी जानकारी ली और करीब 10 मिनट तक परिवार के साथ रहे। उन्होंने कहा, “पीएम बहुत दुखी थे। उन्होंने कहा कि आतंकी कश्मीर में बढ़ते टूरिज्म और खुशहाली को बिगाड़ना चाहते थे।” उन्होंने बताया कि पीएम मोदी ने परिवार से आगे भी मिलने का भरोसा दिया है।
#WATCH | Kanpur, UP: After meeting PM Modi, Wife of Shubham Dwivedi, who lost his life in #PahalgamTerroristAttack, Aishanya Dwivedi says, "PM Modi said that the entire nation and the government are standing with us. He offered his condolences…PM Modi was very sad…PM Modi… pic.twitter.com/hZWC2h5unW
शुभम के पिता संजय द्विवेदी ने कहा, “हमने पीएम का आभार जताया कि उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के जरिए आतंकियों को जवाब दिया। पूरा देश आतंकवाद के खिलाफ उनकी इस लड़ाई में साथ है।” संजय ने बताया कि पीएम ने उनके कंधे पर हाथ रखकर सांत्वना दी और कहा कि शहीदों की कुर्बानी व्यर्थ नहीं जाएगी। उन्होंने कहा, “पीएम भी भावुक हो गए। उनकी बातें ऐसी थीं जैसे परिवार का मुखिया बोल रहा हो।”
#WATCH | Kanpur, UP: After meeting PM Modi, Sanjay Dwivedi, father of Shubham Dwivedi, who lost his life in #PahalgamTerroristAttack, says, "Our family expressed gratitude as in response to the Pahalgam terrorist attack, an operation was launched against terrorism, the terrorist… pic.twitter.com/mE7xadiCg5
परिवार से मुलाकात के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनसभा में कहा, “पाकिस्तान का कोई भी खेल अब नहीं चलेगा। कानपुरिया अंदाज में कहें तो दुश्मन कहीं भी हो, उसे होंक दिया जाएगा।” पीएम ने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर अभी रुका है, खत्म नहीं हुआ। आतंकवाद के खिलाफ यह लंबी लड़ाई है और इसे हम जीतेंगे।” पीएम ने यह भी कहा कि पाकिस्तान को अपनी हरकतों की सजा मिलेगी और भारत का ‘मेक इन इंडिया’ हथियारों की ताकत दुनिया ने देखी है।
भारत ने आतंक के खिलाफ अपनी लड़ाई में तीन सूत्र स्पष्ट रूप से तय किए हैं –
1 – भारत हर आतंकी हमले का करारा जवाब देगा, उसका समय, तरीका और शर्तें हमारी सेनाएं खुद तय करेंगी।
2 – भारत अब एटम बम की गीदड़भभकी से नहीं डरेगा और न ही उसके आधार पर कोई फैसला लेगा।
कानपुर में पीएम मोदी ने 47,573 करोड़ रुपये की 15 मेगा विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास भी किया। इनमें कानपुर मेट्रो के चुन्नीगंज से कानपुर सेंट्रल तक के नए अंडरग्राउंड सेक्शन, घाटमपुर में 660 मेगावाट की तीन बिजली इकाइयाँ और पनकी में तापीय विद्युत परियोजना शामिल हैं।
गौरतलब है कि पीएम मोदी की रैली कानपुर में बीते माह ही होनी थी, लेकिन पहलगाम हमले की वजह से ये रैली रद्द कर दी गई। कानपुर के शुभम द्विवेदी (31) उन 26 लोगों में शामिल थे, जिनकी 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में जान चली गई थी। शुभम की शादी इसी साल 12 फरवरी को हुई थी। वह अपनी पत्नी और रिश्तेदारों के साथ पहलगाम घूमने गए थे, जब आतंकियों ने उनकी हत्या की।
पहलगाम हमले के जवाब में भारत ने 6 मई 2025 को ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ शुरू किया, जिसमें पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर और पाकिस्तान में 9 आतंकी ठिकानों को तो नष्ट किया ही, साथ ही पाकिस्तान के एयरबेस को भी निशाना बनाया।
बंगाल में अपने अम्मी-अब्बू की चाकू से बेहरमी से हत्या करने वाले हूमायूँ कबीर को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। अपनी जिहादी सोच की वजह से उसने न सिर्फ अम्मी-अब्बू का मर्डर किया बल्कि मदरसा के 4 आलिमों को मारने की कोशिश की।
वह बांग्लादेश भागना चाहता था लेकिन पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। पुलिस को शक है कि वो कई विदेशी कट्टरपंथी संगठनों के संपर्क में था।
जाधवपुर यूनिवर्सिटी से इंजीनियर की डिग्री लेने वाला हुमायूँ कबीर ने बुधवार (28 मई 2025) को अपने अब्बू मुसफतिजुर रहमान और अम्मी मुमताज परवीन की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी, क्योंकि वे उसे जिहादी मानसिकता से अलग होने और सामान्य जीवन जीने के लिए समझाया करते थे। घटना वाले दिन भी अम्मी-अब्बू ने उसे समझाने की कोशिश की थी।
जिहादी सोच की वजह से बीवी ने छोड़ा साथ
कबीर का पिछले साल तलाक हुआ था। पड़ोसियों के मुताबिक कबीर की जिहादी सोच की वजह से ही बीवी ने उसे तलाक दे दिया। बीवी पढ़ी-लिखी थी और उसे जिहादी सोच से बाहर निकलने के लिए कहती थी। बीवी के अम्मी-अब्बू दुबई में रहते हैं। जब कबीर ने जिहादी मानसिकता नहीं छोड़ा तो बीवी उसे छोड़कर दुबई चली गई। इसके बाद वह और भी जिद्दी और गुस्सैल हो गया।
कबीर नोएडा में काम करता था, लेकिन 5 महीने पहले उसकी नौकरी चली गई और वह वापस कोलकाता चला गया। वह अक्सर लैपटॉप और मोबाइल पर जेहादी कंटेंट देखता था। 2012 में यूनिवर्सिटी से पास आउट हुमायूँ पर जिहादी साहित्य का काफी असर पड़ा।
अम्मी-अब्बू ने की थी समझाने की कोशिश
मेमारी में घर पर अम्मी-अब्बू की हत्या से पहले भी उसकी बहस उनसे हुई थी। बहस के बाद अम्मी-अब्बू ने हावड़ा में स्कूल टीचर बेटी तमन्ना रहमान से बात की और भाई को समझाने को कहा था। यहाँ तक कि अम्मी-अब्बू ने पड़ोसियों को भी बेटे को समझाने के लिए कहा था, लेकिन किसी की नहीं चली।
सवाल नहीं देने पर की आलिमों पर हमला
पुलिस के मुताबिक उसने मदरसे के आलिमों पर ‘जवाब नहीं देने पर’ हमला किया था। आलिमों ने इस्लाम और जिहाद से संबंधित उसके सवालों का जवाब देने से मना कर दिया था। हुमायूँ बांग्लादेश भागना चाहता था इसलिए सीमा से सटे क्षेत्र बनगाँव के मदरसे में पहुँचा था। पुलिस जब उसे गिरफ्तार करने पहुँची तो मुस्लिम भीड़ ने पुलिस पर हमला कर दिया। भीड़ हुमायूँ को छुड़वाना चाहती थी।
थाईलैंड और कंबोडिया के बीच सीमा के क्षेत्रों को लेकर हाल ही में एक विवाद खड़ा हो गया है। इस एक क्षेत्र पर दोनों देश अपना दावा करते हैं। सांस्कृतिक रूप से दोनों ही देशों के लिए ये जगह काफी अहम है। यहां 900 साल पुराना एक प्राचीन हिंदू मंदिर स्थित है, जिसमें एक शिवलिंग स्थापित हैं। यह मंदिर प्रीह विहियर प्रांत में स्थित है।
दोनों देशों के बीच लंबे समय से बढ़ते तनाव के बीच 28 मई 2025 की सुबह कंबोडियाई और थाईलैंड के सैनिकों के बीच गोलीबारी हुई। मोराकोट कम्यून के चोम क्सान जिले में स्थित टेक्चो मोराकोट गाँव में हुई इस झड़प में एक कंबोडियाई सैनिक की मौत हो गई।
कंबोडिया के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि ये उकसाने वाला हमला नहीं था। मंत्रालय के अनुसार, थाईलैंड के सैनिकों ने उस जगह पर हमला किया, जहाँ पर कंबोडियाई सेना का अधिग्रहण लंबे समय से था। वहीं, रॉयल थाई आर्मी ने अपने बयान में कहा कि गोलीबारी की शुरुआत कंबोडियाई सैनिकों ने की थी और उन्होंने जवाबी कार्रवाई की।
थाईलैंड के रक्षा मंत्री फुमथाम वेचयाचाई ने कहा, “मुझे बताया गया है कि जवाबी गोलीबारी हमारी आत्मरक्षा और थाईलैंड की संप्रभुता की रक्षा के लिए जरूरी थी। मैंने सतर्कता बरतने के निर्देश दिए हैं। हालाँकि युद्धविराम (सीजफायर) लागू है, फिर भी दोनों पक्ष अब भी आमने-सामने हैं।”
थाईलैंड ने इस पर दावा किया कि उनकी सेना पर तब हमला किया गया जब वे कंबोडियाई सैनिकों को विवादित क्षेत्र में पोस्ट न बनाने को लेकर समझा रहे थे। थाई सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल विंथाई सुवारी ने कहा, “कंबोडियाई सेना ने स्थिति को गलत समझा और हथियार चलाने लगे। इसके बाद थाई सेना ने जवाबी कार्रवाई की।”
कंबोडिया के रक्षा मंत्रालय ने कहा, “कंबोडिया इस तरह का संघर्ष नहीं चाहता है। हम थाई रक्षा मंत्रालय के साथ बातचीत जारी रखेंगे ताकि एक आपसी समाधान निकाला जा सके ताकि स्थिति जल्द से जल्द सामान्य हो और इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके।”
कंबोडिया के प्रधानमंत्री हुन मानेट ने 29 मई 2025 को राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा कि वह कंबोडियाई और थाई सेना के बीच युद्ध नहीं चाहते। उन्होंने एक लिखित बयान में कहा कि लोगों को “किसी भी अप्रमाणित सूचना से घबराना नहीं है।”
उन्होंने आगे कहा, “इसी कारण, मुझे उम्मीद है कि कंबोडियाई और थाई सेना के कमांडरों के बीच आगामी बैठक सकारात्मक परिणाम लाएगी ताकि स्थिरता बनी रहे और दोनों देशों के बीच सैन्य बातचीत पहले की तरह ही बेहतर हो।”
उन्होंने यह भी कहा, “हालाँकि मैं जापान में हूं, फिर भी सैनिकों की तैनाती जैसे प्रमुख सैन्य अभियानों की पूरी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री के तौर पर मेरे पास है।”
यह संघर्ष लगभग 10 मिनट तक चला, जब तक स्थानीय कमांडरों ने एक-दूसरे से बातचीत कर सीजफायर का आदेश नहीं दिया। इसके बाद, दक्षिण-पूर्व एशियाई पड़ोसी देशों ने क्षेत्र से सैनिकों को वापस बुलाने का फैसला लिया।
अगले दो सप्ताह में एक संयुक्त सीमा समिति (ज्वाइंट बाउंड्री कमेटी) का गठन किया जाएगा ताकि “सीमा विवाद की समस्या का हल निकाला जा सके।” रॉयल कंबोडियन आर्मी के अनुसार, कमांडरों ने ‘विवाद को हल करने के लिए मौजूदा तंत्र का इस्तेमाल करने’ पर सहमति व्यक्त की, हालाँकि कंबोडिया ने अपने सैनिकों को संघर्ष क्षेत्र से वापस नहीं लेने की बात भी जोड़ी है।
थाईलैंड और कंबोडिया के बीच सीमा विवाद
थाईलैंड और कंबोडिया के बीच 800 किलोमीटर यानी लगभग 500 मील से अधिक की लंबी सीमा है। इसे मुख्य रूप से फ्रांसीसी उपनिवेशवाद के दौरान बनाया गया था। यह सीमा लंबे समय से विवादों में रही है और दोनों देशों की सेनाओं के बीच कई सशस्त्र संघर्ष हुए हैं।
2008 में इस ऐतिहासिक मंदिर को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता मिलने के बाद भी सीमा पर संघर्ष हुआ था। 2011 में एक बार फिर सीमा पर संघर्ष हुआ था, जिसमें मंदिर के पास कई लोगों की मौत हुई और कई लोग घायल हो गए। वर्षों से जारी हिंसा के कारण अब तक कम से कम 28 लोगों की मौत हो चुकी है।
हाल में हुआ तनाव फरवरी में शुरू हुआ जब कंबोडियाई सैनिकों और उनके परिवारों ने अपने देश का राष्ट्रगान प्रसात ता मोआन थॉम मंदिर के अंदर गाना शुरू कर दिया। वहाँ तैनात थाई सैनिकों ने उन्हें रोकने की कोशिश की, जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस हुई।
पूरी घटना का वीडियो एक थाई नागरिक ने रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया पर डाल दिया। कुछ ही समय में यह वीडियो वायरल हो गई।
वैसे तो कंबोडिया की प्राथमिकता शांतिपूर्ण तरीके से हल निकालना है फिर भी प्रधानमंत्री हुन मानेट ने मार्च में चेतावनी दी थी कि अगर थाई सैनिक कंबोडियाई संप्रभुता का उल्लंघन करते हैं तो देश अपने सैन्य बल का उपयोग करने के लिए तैयार रहेगा।
मई में हुई एक बैठक के बाद थाईलैंड और कंबोडिया के सैन्य प्रतिनिधियों ने ये फैसला लिया कि वे अपने सैनिकों को मौजूदा स्थानों पर ही रखेंगे और भविष्य के संघर्षों को कम करने के लिए मंदिर स्थल के आसपास दोनों देशों से पाँच-पाँच सैनिक ही तैनात रहेंगे।
11वीं सदी का प्राचीन मंदिर
कंबोडिया में स्थित प्रीह विहयर आधुनिक दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से कहीं आगे हैं। इस मंदिर के अधिकांश संरक्षित भाग ख्मेर साम्राज्य के स्वर्ण युग, 11वीं और 12वीं शताब्दी के समय के हैं। आधुनिक कंबोडियाई खुद को ख्मेर कहते हैं, वे सीधे ख्मेर लोगों के वंशज हैं। ख्मेर साम्राज्य ने 9वीं से 15वीं शताब्दी तक दक्षिण-पूर्व एशिया पर शासन किया था, जिसमें वर्तमान थाईलैंड भी शामिल था। इस थाईलैंड को पहले सियाम कहा जाता था। इसी साम्राज्य ने प्रसिद्ध अंकोर वाट परिसर का भी निर्माण किया था।
ख्मेर मंदिर अपनी अद्भुत वास्तुकला के लिए मशहूर हैं। ख्मेर राजाओं का प्रमुख धर्म हिंदू धर्म था। इसका प्रभाव इन मंदिरों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इसके अलावा, इन मंदिरों में बौद्ध धर्म के तत्व भी शामिल हैं, जो बाद में यहाँ पर लोकप्रिय हुए।
प्रीह विहियर ख्मेर विरासत का हिस्सा होने के बावजूद हमेशा से कंबोडिया के शासन में नहीं रहा। सियामी साम्राज्यों और आधुनिक थाई राज्यों ने समय समय पर उस जगह पर अपना आधिपत्य जमाया जहाँ पर वर्तमान में ये स्थित है।
‘प्रसात ता मोआन थॉम’ या ‘ता मोआन’ भी थाईलैंड के सुरिन प्रांत और कंबोडिया के ओडर मीन्चे प्रांत को बाँटने वाली सीमा पर स्थित है। इस पर भी विवाद चल रहा है। डांगरेक पर्वत श्रृंखला में स्थित होने के कारण दोनों देशों के बीच अक्सर तनाव देखने को मिलता रहता है।
यह मंदिर एक हिंदू तीर्थस्थल के रूप में बनाया गया था और भगवान शिव को समर्पित है। इसके आसपास बने अन्य दो मंदिरों, प्रसात ता मुएन और प्रसात ता मुएन टोट से ये काफी पुराना है। इसकी धार्मिक महत्ता इस बात से ही सिद्ध हो जाती है कि इसके गर्भ गृह में एक प्राकृतिक शिवलिंग मिला था।
यह हिंदू मंदिर अपने आसपास स्थित तीन मंदिरों में सबसे बड़ा है। यह डांगरेक पर्वत श्रृंखला के एक मार्ग पर स्थित है, जो कंबोडियाई मैदानों को थाईलैंड के खोराट पठार से अलग करता है। आयताकार में बने इस मंदिर में मुख्य रूप से लेटराइट (एक कठोर लाल मिट्टी) का उपयोग किया गया है। इसके कुछ हिस्से बलुआ पत्थर के भी हैं।
एक दिलचस्प बात ये है कि अधिकांश ख्मेर मंदिरों का मुख्य द्वार पूर्व दिशा की ओर होता है, लेकिन इस मंदिर का प्रवेश द्वार दक्षिण दिशा में है। यह मंदिर ऐसे क्षेत्र में स्थित है जहाँ थाईलैंड और कंबोडिया की सीमा अब तक स्पष्ट नहीं है। इसके कारण दोनों देश इस पर अपना दावा करते है। इसीलिए यहाँ अक्सर सेनाओं के बीच छिटपुट हिंसा देखी जाती रही है।
ऐतिहासिक विवाद
थाईलैंड ने जापान के साथ सैन्य गठबंधन के तहत 1941 में प्रीह विहियर और आसपास के क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था। 1953 में फ्रांसीसी औपनिवेशिक सेना की हार के बाद यह क्षेत्र फिर से फ्रांस को लौटा दिया गया। 1954 में, जब कंबोडिया स्वतंत्र राष्ट्र के तौर पर स्थापित हुआ, तो फ्रांसीसी सैनिकों ने वापसी की और थाई सेना ने इस क्षेत्र ने दोबारा इस पर अपना आधिपत्य दर्ज कराया। 5 साल बाद, कंबोडिया ने इस पर आपत्ति जताई और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में इस पर मामला दर्ज कराया।
प्राह विहियर मंदिर थाईलैंड-कंबोडिया के सीमा विवाद के बीचोबीच में स्थित है।
थाईलैंड ने लगभग 50 वर्षों तक फ्रांसीसी सीमा निर्धारण को स्वीकार किया था। इस निष्कर्ष के आधार पर 1962 में ICJ ने 9-3 के फैसले के तहत कंबोडिया के पक्ष में निर्णय दिया।
प्रीह विहियर मंदिर के 1963 में देश को सौंपे जाने के बाद भी कई वर्षों तक बंद रहा, क्योंकि वहाँ बारूदी सुरंगें बिछाई गई थीं और ख्मेर रूज गुरिल्लाओं समेत अलग अलग समूहों के बीच इसके आधिपत्य को लेकर लगातार संघर्ष जारी था।
1990 के दशक के अंत में ख्मेर रूज संगठन के विघटन हुआ । इसके बाद यह स्थल पर्यटकों के लिए खोला गया। पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की सुगमता और सुविधाओं के लिए थाईलैंड और कंबोडिया की सरकारों ने मिलकर इस जगह को बेहतर करने की योजना बनाई।
हालाँकि, जब 2008 में कंबोडिया ने प्रीह विहियर को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में पंजीकृत करने का प्रयास किया, तो एक बार फिर स्वामितव को लेकर पुराना विवाद सामने आ गया। थाई सरकार ने यह तर्क देकर आपत्ति जताई कि प्रस्ताव में मंदिर के आसपास के थाई-अधिकृत क्षेत्र का उल्लेख किया गया था।
इसके बाद संशोधित कंबोडियाई आवेदन को प्रधानमंत्री समक सुंदरावेज की सरकार ने स्वीकार कर एक संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर किए। हालाँकि, अंदरूनी आलोचना के कारण समक सरकार को अपना समर्थन वापस लेना पड़ा। यूनेस्को ने जैसे-जैसे आवेदन की समीक्षा की, स्थिति और भी बिगड़ती चली गई।
थाईलैंड के विदेश मंत्री नोपाडोन पट्टामा के खिलाफ विपक्षी सदस्यों ने मुकदमा दायर किया। दावा किया गया कि उन्होंने कंबोडिया के साथ जो समझौता किया था, वह अवैध था। थाई संवैधानिक न्यायालय ने इस आरोप को सही ठहराया, पर अगले ही दिन यूनेस्को ने कंबोडिया के आवेदन को मंजूरी दे दी।
इसके बाद तनाव चरम पर पहुंच गया। नोपाडोन के इस्तीफे के बाद कंबोडियाई जनता ने जश्न मनाया, जबकि थाईलैंड में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। इसके चलते कंबोडिया ने प्रीह विहियर की सीमा को बंद कर दिया। सैकड़ों थाई और कंबोडियाई सैनिक मंदिर के पास एक बार फिर विवादित क्षेत्र में तैनात कर दिए गए।
इसी तरह 2011 में, इस विवाद के कारण थाई और कंबोडियाई सेनाओं के बीच कई दिनों तक संघर्ष हुआ। इसमें 12 से अधिक लोग मारे गए, कई घायल हुए और लगभग 1,00,000 ग्रामीणों को अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। एक बार फिर दोनों देशों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाए।
कंबोडिया ने दावा किया कि थाई सैनिकों ने कंबोडिया अधिकृत क्षेत्र में जबरन प्रवेश किया और हथियारों तथा रॉकेट्स से हमला किया। इसके बाद उन्होंने जवाबी कार्रवाई की। थाईलैंड ने कहा कि उनके सैनिक नियमित गश्त पर थे और कंबोडिया के सैनिकों ने पहले हमला किया।
अप्रैल 2011 में कंबोडिया ने ICJ से अनुरोध किया कि कोर्ट 1962 के फैसले की व्याख्या करे ताकि ये स्पष्ट हो सके कि थाईलैंड मंदिर पर कंबोडिया की संप्रभुता को स्वीकार करता है, लेकिन मंदिर के आसपास के क्षेत्र पर नहीं। 2013 में, कोर्ट ने सर्वसम्मति से यह फैसला सुनाया कि थाईलैंड को प्रीह विहियर क्षेत्र से अपनी सेना हटानी होगी, क्योंकि कंबोडिया को पूरे क्षेत्र पर अधिकार प्राप्त है।
इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी पुष्टि की कि यह मंदिर धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से स्थानीय जनता के लिए महत्वपूर्ण है। थाईलैंड और कंबोडिया, दोनों ही विश्व धरोहर संधि के पक्षधर हैं। उन्हें एक विश्व धरोहर स्थल के रूप में इस स्मारक को संरक्षित करने पर मिलकर काम करना होगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि हर देश को ऐसे स्थलों को जानबूझकर नुकसान पहुँचाने वाले कदम उठाने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस विरासत को नुकसान पहुँच सकता है।
इस खबर को मूल रूप से रुकमा राठौर ने अंग्रेजी में लिखा है और अनुवाद किया हैरामांशी मिश्राने
भाजपा ने दैनिक भास्कर में छपी उस खबर को फर्जी करार दिया है, जिसमें दावा किया गया था कि पार्टी ‘मोदी 3.0’ के तहत ऑपरेशन सिंदूर चलाएगी और घर-घर जाकर महिलाओं को सिंदूर बाँटेगी। इस खबर में कहा गया था कि 9 जून से अभियान शुरू होगा, जिसमें 11 साल बाद ऑपरेशन सिंदूर के 9 बड़े बिंदुओं पर काम होगा। लेकिन भाजपा नेता अमित मालवीय ने इसे पूरी तरह से झूठा बताया।
अमित मालवीय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि कई लोग इस फर्जी खबर के आधार पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं, लेकिन असली हैरानी तब हुई जब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ट्रोल की तरह इस आधारहीन खबर को लेकर राजनीति शुरू कर दी। मालवीय ने ममता बनर्जी पर तंज कसते हुए कहा कि उन्हें अपने राज्य की बिगड़ती स्थिति पर ध्यान देना चाहिए, जहाँ सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा है, महिलाएँ सुरक्षित नहीं हैं और बेरोजगारी चरम पर है।
बीजेपी आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय ने यह भी कहा कि ममता बनर्जी को राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर बेतुके बयान देने से बचना चाहिए। मालवीय ने कॉन्ग्रेस प्रवक्ताओं पर भी निशाना साधा और उन्हें हल्का बताते हुए कहा कि उनसे बेहतर की उम्मीद करना बेकार है।
बहुत सारे लोग भास्कर में प्रकाशित इस #FakeNews के आधार पर सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। लेकिन हद तो तब हो गई जब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री, एक अधिकृत सरकारी मंच से, एक ट्रोल की तरह इस आधारहीन खबर को लेकर राजनीति करने लगीं।
इस खबर के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस छिड़ गई। कुछ लोगों ने भाजपा पर सवाल उठाए, तो कुछ ने ममता बनर्जी के बयानों की आलोचना की। यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर को लेकर चर्चा हो रही है, जिसमें भारत ने पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर तो हमला किया ही, पाकिस्तानी पलटवार को नेस्तनाबूद करते हुए उसके एयर डिफेंस सिस्टम के साथ ही एयरफोर्स के कई ठिकानों को भी उड़ा दिया था।
आज जब हमारे वायुसेना प्रमुख एयर चीफ माशर्ल अमर प्रीत सिंह जैसे शीषर्स्थ सैन्य अधिकारी सार्वजनिक मंच से इस बात को लेकर चिंता जताते हैं कि देश की प्रतिभाएँ बड़ी संख्या में विदेश पलायन कर रही हैं, तो यह केवल एक सैन्य अधिकारी की नाराज़गी नहीं होती, यह भारत की सामूहिक विफलता का उद्घोष होता है, और यह चिंता, यह चेतावनी तब और अधिक प्रासंगिक हो जाती है जब देश की सीमाएँ लगातार खतरे में हों, और हमारे देश की आंतिरक व्यवस्थाएँ भ्रष्टाचार, आरक्षण और वोट बैंक पॉलिटिक्स के दबाव में।
प्रतिभा का पलायन: भारत का अनदेखा रक्तस्राव
हमारे देश में आरक्षण की वजह से हर वर्ष लाखों होनहार और प्रतिभाशाली छात्र-छात्राएँ उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका, कनाडा, यूके, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी जैसे देशों का रुख करते हैं। वे वहीं शिक्षा अर्जित करते है और फिर वहीं बस जाते हैं, वहीं शोध करते हैं, वहीं के रक्षा और टेक्नोलॉजी सिस्टम को मज़बूत करते हैं। ये हमारे भारतीय वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर्स, तकनीकी विशेषज्ञ होते हैं, जिन्हें भारत की प्रगति की धुरी होना था, लेकिन वे आज Silicon Valley, MIT, NASA और अमेरिकी डिफेंस इंडस्ट्री के मज़बूत स्तंभ बने हुए हैं।
इस समय दुनिया भर में लगभग 15,000 भारतीय मूल के लोग ऐसे हैं जो विदेशों में अपनी कंपनियाँ चला रहे हैं और विशेषज्ञों की माने तो लगभग 60% सेंटी-मिलियनर्स और अरबपति भारतीय, अपनी कंपनियाँ ख़ुद शुरू करते हैं।
यह आँकड़े संकेत हैं कि भारत की योग्यता, प्रतिभा और पूंजी सम्मान, उद्यमशीलता और समान अवसर की तलाश में विदेश की ओर पलायन कर रही है, जो कि देश के लिए एक गंभीर चुनौती है। क्या हमने कभी यह सोचने की कोशिश की कि आखिर क्यों कोई युवा, जिसने यहीं जन्म लिया, यहीं से शिक्षा ली, जिसे यहीं की मिट्टी ने आकार दिया, वह अपना पूरा सामर्थ्य किसी अन्य राष्ट्र को क्यों समर्पित करता है?
इस प्रश्न का उत्तर है: प्रणालीगत असमानता और आरक्षण का अनियंत्रित विस्तार
जब योग्यता (Merit) की जगह जाति, वर्ग और वोटबैंक प्राथमिकता बन जाए, तो प्रतिभाशाली छात्रों का हताश होना स्वाभाविक है। एक सामान्य वर्ग का छात्र, जो कठिन मेहनत कर किसी IIT या मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेना चाहता है, उसे एक ही परीक्षा में ‘कई गुना’ अधिक अंक लाने होते हैं सिर्फ़ इसलिए क्योंकि वो ‘सवर्ण’ है। या इसे यूँ कह लीजिए, कि ‘कई गुना’ अंक लाने के बाद भी उसे वो जगह नहीं मिलती जिसका वो सही मायने में हकदार होता है।
क्या ये उस छात्र के शिक्षा के अधिकार का हनन नहीं है? आज तक भारत की किसी सरकार ने यह क्यूँ नहीं सोचा, कि सिर्फ़ सामान्य वर्ग से आने की वजह से हर वर्ष लाखों-करोड़ों सामान्य वर्ग के छात्रों से उनका शिक्षा का अधिकार छीना जा रहा है? बचपन से ही उन्हें यह एहसास करा दिया जाता है कि यह देश उनकी प्रतिभा से ज़्यादा उनके “जन्म” को महत्व देता है।
जब रक्षा क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहता…..
अब ज़रा सोचिए, हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जब भारत हर तरफ़ से सुरक्षा चुनौतियों से घिरा है:
पश्चिमी सीमा पर आतंकववाद के रूप में पाकिस्तान की छद्म युद्धनीत
पूर्वी सीमा पर चीन का आक्रामक विस्तारवाद
बांग्लादेशियों और रोहिंग्याओं की अवैध घुसपैठ
आंतरिक सुरक्षा पर उग्रवाद और कट्टरपंथी विचारधारा का बढ़ता प्रभाव
ऐसी चिंताजनक और चुनौतिपूर्ण स्थिति में क्या हम अपने रक्षा संस्थानों, DRDO, HAL, ISRO या सेनाबलों केवल औसत दर्जे की क्षमताओं के आधार पर चयन कर सकते हैं? कठिन परिस्थितियों एवं युद्ध के समय में हम अपनी सीमाओं की रक्षा ‘आरक्षण कोटा’ से करेंगे या ‘कौशल’ से?
एयर चीफ़ का यह बयान, कि HAL जैसी संस्थाएँ डिलीवरी समय पर नहीं दे पा रही हैं और तेजस जैसी परियोजनाएँ सालों से अधर में लटकी हैं, एक साफ़ इशारा है कि हम प्रणालियों में योग्यता की बजाय औपचारिकता को बढ़ावा दे रहे हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण संस्थानों में ऐसी औपचारिकताओं को तभी बढ़ावा मिलता है जब कई योग्य प्रतिभाएँ पीछे छूट जाती हैं।
हम विश्व की सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश हैं, और बढ़ती जनसंख्या का सीधा अर्थ होता है – घटती गुणवत्ता। मैं मानता हूँ कि सीमित संसाधनों और अवसरों को सभी में बाँटना एक चुनौती की स्थिति पैदा है, लेकिन यदि देश के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग व मेडिकल संस्थानों में चल रही आरक्षण प्रणाली और कई दूसरे अन्य क्षेत्रों में लागू वर्तमान आरक्षण व्यवस्था को ले कर कार्य नहीं किया गया, तो ये कुल मिलाकर भविष्य में देश की गुणवत्ता ही गिराएगी।
Inclusive बनने और दिखने के चक्कर में भारत मात्र Inclusive बन के ही रह गया है। भारत को अब Competitive भी बनना होगा। भारत का सर्वांगीण विकास तब तक अधूरा रहेगा जब तक उसमें सर्वश्रेष्ठ लोगों की सम्पूर्ण भागीदारी नहीं होगी। राष्ट्र निर्माण में ‘मेरिट’ की केंद्रीय भूमिका ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने भारत को 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प लिया है। ये संकल्प सिर्फ़ प्रधानमंत्री मोदी का ही नहीं बल्कि सभी 145 करोड़ भारतीयों का संकल्प है। परंतु इसके लिए हमें रक्षा, विज्ञान, शिक्षा, प्रशासन जैसे हर क्षेत्र में श्रेष्ठता चाहिए। इस श्रेष्ठता का मूल है- मेरिट। यदि हम अपनी प्रतिभाओं को सहेज नहीं सके, तो हम आत्मनिर्भर भारत, डिजिटल इंडिया या मेक इन इंडिया जैसे अभियानों को केवल नारे बनाकर छोड़ देंगे। मेरिट का मतलब यह नहीं कि समाज के वंचित वर्गों की अनदेखी की जाए। लेकिन, यह भी अति आवश्यक है कि समान अवसर सबको मिलें, न कि समान परिणाम।
एक निष्पक्ष प्रतियोगिता हो, जिसमें जो बेहतर हो, वही आगे बढ़े, जाति, धर्म, आर्थिक या पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर नहीं, बल्कि कौशल, योग्यता और चरित्र के आधार पर हमारे रक्षा प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए०पी० सिंह की चिंता, एक राष्ट्रवादी और ज़िम्मेदार नागरिक की अंतरात्मा की आवाज़ है। अब वक्त आ गया है कि हम राष्ट्र की आवश्यकताओं को वोटबैंक की राजनीति से ऊपर रखें। हमें अब अपने युवाओं को यहीं अवसर देना होगा, उनकी प्रतिभा को यहीं सम्मान देना होगा। अगर हम ऐसा नहीं कर पाए, तो हम सिर्फ़ प्रतिभा नहीं खोएँगे – हम अपना भविष्य खो देंगे।
बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा कदम उठाते हुए सवर्ण जातियों के लिए गठित आयोग के पदाधिकारियों की नियुक्ति की है। इस आयोग का अध्यक्ष बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व एमएलसी महाचंद्र प्रसाद सिंह को बनाया गया है। वहीं जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद को उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
आयोग में तीन अन्य सदस्यों – दरभंगा के दयानंद राय, पटना के जयकृष्ण झा और भागलपुर के राजकुमार सिंह को भी शामिल किया गया है। सामान्य प्रशासन विभाग ने शुक्रवार (30 मई 2025) को इसकी अधिसूचना जारी की। पहली बार इस आयोग का गठन साल 2011 में नीतीश कुमार की अगुवाई में एनडीए सरकार ने ही किया था।
इसके साथ ही नीतीश सरकार ने अनुसूचित जनजाति (एसटी) आयोग के लिए भी नियुक्तियाँ की हैं। पश्चिम चंपारण के शैलेंद्र कुमार को इस आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है, जबकि सुरेंद्र उराँव को उपाध्यक्ष और प्रेमशीला गुप्ता, तल्लु बासकी, राजकुमार को सदस्य नियुक्त किया गया है। इन सभी नियुक्तियों की वैधता तीन साल तक रहेगी।
एक दिन पहले ही सरकार ने जेडीयू नेता गुलाम रसूल बलियावी को बिहार अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया था। बलियावी हाल ही में केंद्र सरकार के वक्फ संशोधन बिल का विरोध करने के लिए चर्चा में थे। ये सभी नियुक्तियाँ इस बात का संकेत हैं कि नीतीश सरकार आगामी विधानसभा चुनावों के लिए जातिगत समीकरण साधने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। बिहार में कुछ महीनों बाद विधानसभा चुनाव होने हैं और सरकार विभिन्न समुदायों को साधने के लिए आयोगों के गठन और नियुक्तियों पर जोर दे रही है।
सवर्ण आयोग के गठन को राजनीतिक हलकों में अहम माना जा रहा है, क्योंकि बिहार में सवर्ण मतदाता एक बड़ा वोट बैंक हैं। नीतीश कुमार और उनकी सहयोगी पार्टी बीजेपी इस कदम से सवर्ण समुदाय को यह संदेश देना चाहती हैं कि उनकी चिंताओं और विकास को प्राथमिकता दी जा रही है। दूसरी ओर अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक आयोगों की नियुक्तियाँ भी अन्य समुदायों को लुभाने की रणनीति का हिस्सा मानी जा रही हैं।
बिहार की सियासत में जातिगत समीकरण हमेशा से अहम रहे हैं। नीतीश सरकार का यह कदम न केवल चुनावी रणनीति का हिस्सा है, बल्कि सामाजिक समावेश को बढ़ावा देने की दिशा में भी एक प्रयास माना जा रहा है। अब देखना यह है कि ये नियुक्तियाँ चुनावी मैदान में कितना असर दिखाती हैं।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ की जरूरत को दुनिया को बताने के लिए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल इन दिनों दुनिया के कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों से मिल रहा है। कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल पनामा, गुयाना के दौरे के बाद कोलंबिया पहुँचा। आतंकवादियों की मौत पर कोलंबिया ने संवेदना जताई थी इस पर क्लास लगाते हुए उन्होंने कोलंबिया सरकार को जमकर खरी-खोटी सुनाई। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में आतंकियों की मौत पर दुख जताने की जरूरत नहीं थी। दरअसल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान में मारे गए आतंकियों के प्रति कोलंबिया ने पाकिस्तान में जान-माल के नुकसान पर संवेदना प्रकट की थी।
शशि थरूर ने कहा कि आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई कर खुद की रक्षा करने वाले और आतंकियों का बचाव करने वालों के बीच कोई समानता नहीं है। इसलिए भारत और पाकिस्तान के बीच समानता नहीं हो सकती। उन्होंने भारत के ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तानी हताहतों के लिए बोगोटा के शोक संदेश की आलोचना की। थरूर ने कहा, ” हम कोलंबिया सरकार की प्रतिक्रिया से निराश हैं। आतंकवाद पीड़ित भारतीयों के प्रति सहानुभूति दिखाने के बदले आपने पाकिस्तान में आतंकियों की मौत पर संवेदना जताई।”
उन्होंने कहा, “हमें लगता है कि शायद स्थिति को पूरी तरह नहीं समझा गया और कोलंबिया ने बयान जारी कर दिया और आतंकवादी ठिकानों पर हमलों के बाद पाकिस्तान में हुई मौत पर संवेदना जताई।” उन्होंने कहा कि अब हमने अपनी बात साफ कर दी है। भारत ऐसा देश है जो वास्तव में दुनिया के रचनात्मक विकास की ताकत रखता है। उन्हें उम्मीद है कि अब दूसरी सरकारें भी उन देशों की आलोचना करेंगी जो आतंकवाद को पनाह देता है।
इससे पहले पनामा में शशि थरूर ने आतंकवाद के पनाहगाह पाकिस्तान को चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि भारत किसी भी हमले का जवाब देने के लिए तैयार है और गाँधी का ये देश अब ‘दूसरा गाल’ भी आगे नहीं करेगा। उन्होंने कहा, “हमें हमेशा उन मूल्यों के पक्ष में खड़े होना चाहिए, जिन पर हम भरोसा करते हैं। साथ ही, बगैर डर के जीवन जीना हमारा अधिकार है। इसके लिए हमें उन दुष्टों के खिलाफ लड़ना ही होगा, जिसको दुनिया आतंकवादी कहती है। “
शशि थरूर ने पीएम मोदी की बात कहते हुए कहा, ” पीएम मोदी ने साफ कर दिया है कि ऑपरेशन सिंदूर जरूरी था, क्योंकि आतंकवादी आए और मासूम लोगों को मार डाला, 26 महिलाओं का सिंदूर मिटा दिया”
शशि थरूर ने कहा कि हमें हमेशा अपने अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए। ये बात राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने देश को सिखाया था। पनामा में उन्होने राष्ट्रपति होसे रौल मलीनों को भारत के पक्ष की जानकारी दी।