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Rutgers University में हिंदूफोबिया के खिलाफ प्रस्ताव पास: वामपंथी प्रोफेसर अब हिंदू छात्रों के माता-पिता के पीछे

24 अप्रैल 2021 को रटगर्स यूनिवर्सिटी स्टूडेंट असेंबली (RUSA) ने हिंदूफोबिया की परिभाषा को अपनाते हुए एक ऐतिहासिक प्रस्ताव (No. 1451-XX) पारित किया। यह प्रस्ताव अंडरस्टैंडिंग हिंदूफोबिया कॉन्फ्रेंस के निष्कर्ष के 14 दिन बाद आया।

इस कॉन्फ्रेंस को यूनिवर्सिटी में लगातार हिंदूफोबिक घटनाएँ देखते हुए आयोजित किया गया था। मामले के संबंध में हिंदू छात्रों के समूह ने मार्च में याचिका डाली थी। इसमें यूनिवर्सिटी से विवादित इतिहासकार व प्रोफेसर ऑड्रे ट्रूस्के के ख़िलाफ़ एक्शन लेने की बात की गई थी।

इन सबके बावजूद प्रोफेसर ऑड्रे ट्रूस्के सुधरने की बजाय उन छात्रों के अभिभावकों को स्टॉक करने लगीं, जिन्होंने कॉन्फ्रेंस में भाग लिया था। इसके प्रमाण, ऑक्सफॉर्ड यूनिवर्सिटी में नस्लवाद का शिकार होने वाली स्टूडेंट यूनियन की पूर्व अध्यक्ष रश्मि सामंत ने भी पेश किए।

रश्मि सामंत द्वारा शेयर किया गया स्क्रीनशॉट

सामंत ने रटगर्स यूनिवर्सिटी के किसी एक छात्र के साथ अपनी चैट पब्लिक की। इससे साफ है कि प्रोफेसर LinkedIn के जरिए छात्रों के माता-पिता को स्टॉक कर रही हैं।

अनुमान है कि ऐसा सिर्फ यूनिवर्सिटी के हिंदू छात्रों को निशाना बनाने के लिए हो रहा है बिलकुल वैसे जैसे रश्मि सामंत को बनाया गया था। सामंत लिखती हैं, “घटिया। ऑड्रे ट्रूस्के क्या ऑक्सफॉर्ड के अभिजीत सरकार की तरह हेट कैंपेन चलाना चाहती हैं? ”

ऑड्रे ट्रूस्के के ख़िलाफ़ हिंदू छात्रों ने लिखा यूनिवर्सिटी को पत्र

बता दें कि हिंदूफोबिक ऑड्रे ट्रूस्के के ख़िलाफ़ यह मुद्दा हिंदू छात्रों द्वारा उठाया गया था। छात्रों ने यूनिवर्सिटी को पत्र लिख कर बताया कि ऑड्रे इतिहास के नाम पर हिंदूफोबिक फिक्शन बेच रही हैं। याचिका में कहा गया कि ऑड्रे ने औरंगजेब द्वारा किए गए हिंदू नरसंहार को तुच्छ दिखाने की कोशिश की।

लेटर में बताया गया कि कैसे यूनिवर्सिटी में हिंदू धर्म, हिंदू देवी-देवता और पवित्र ग्रंथों का लगातार मजाक बनाकर अभियान चल रहा है। इससे कैंपस में या फिर सोशल मीडिया में उनके धर्म के कारण उनकी सुरक्षा को खतरा हो सकता है, कोई भी उन पर हमला कर सकता है। हिंदू छात्रों ने इस मुद्दे को प्राथमिकता से तब उठाया, जब कई अन्य फैकल्टी सदस्यों ने ऑड्रे ट्रूस्के का समर्थन किया।

बता दें कि 7 मार्च को हिंदू समूह के छात्रों ने बताया था कि कैसे ऑड्रे ट्रूस्के यूनिवर्सिटी में हिंदुओं के ख़िलाफ़ माहौल बना रही हैं। अमेरिका में हुई हिंसा के समय ट्रुस्के ने ही भारतीय झंडे को देख हिंदू दक्षिणपंथियों को घेरा था। इसके बाद उन्होंने भगवद् गीता को लेकर फर्जी बातें कहीं और साथ में गैंगरेप जैसी घटनाओं को महाभारत की घटना के समतुल्य रख बताया कि हिंदू संस्कृति में रेप कल्चर है।

हिंदूफोबिया की परिभाषा

इन घटनाओं के बाद रटगर के कई फैकल्टी सदस्यों ने ऑड्रे ट्रूस्के का समर्थन किया, जिसे देख हिंदू छात्र इतना परेशान हुए कि उन्होंने विश्वविद्यालय में आवेदन करने का फैसला किया। स्टूडेंट्स ने हिंदूफोबिया पर एक कॉन्फ्रेंस की। इसमें कुछ संशोधनों के साथ हिंदोफोबिया की एक नई परिभाषा दी गई, जो इस प्रकार है- “सनातन धर्म (हिंदू धर्म) और हिंदुओं के प्रति विरोधी, विनाशकारी, और अपमानजनक व्यवहार और सामूहिक व्यवहार जो भय या घृणा प्रकट कर सकता है।”

रश्मि सामंत कौन हैं?

रश्मि सामंत, कर्नाटक से हैं। हाल में वह ऑक्सफॉर्ड स्टूडेंट यूनियन में पहली भारतीय महिला के तौर पर अध्यक्ष चुनी गईं। लेकिन उनके कुछ विरोधियों ने उनके ख़िलाफ सोशल मीडिया पर उनके पुराने पोस्ट वायरल कर दिए। उन पर इस्लामोफोबिक समेत तमाम इल्जाम लगने लगे। नतीजन उन्हें एक हफ्ते में पद से इस्तीफा देना पड़ा। बाद में सामंत भारत आ गईं। मानसिक तौर से प्रताड़ित हुईं सामंत यहाँ कई दिन अस्पताल में रहीं। ठीक होने के बाद उन्होंने दोबारा यूनिवर्सिटी जाकर अपनी पढ़ाई खत्म करने का फैसला किया।

जिसके ट्ववीट पर किया ‘फैक्टचेक’, उसने गलत वीडियो के लिए माँगी माफी: ‘लोकसत्ता’ ने चुपके से एडिट की रिपोर्ट

मराठी मीडिया संस्थान ‘लोकसत्ता’ ने नागपुर के 85 वर्षीय RSS स्वयंसेवक नारायण भाऊराव दाभाडकर के बलिदान को झूठा बताने की कोशिश की थी। अब उसने एक अपुष्ट ट्वीट पर आधारित अपनी तथाकथित ‘फैक्टचेक’ रिपोर्ट को चुपके से एडिट कर दिया है। ‘लोकसत्ता’ ने दाभाडकर और उनके परिवार को बदनाम करने के लिए rohanrtweets नामक ट्विटर हैंडल के एक अपुष्ट वीडियो के आधार पर झूठ फैलाया था।

अब उस वीडियो को डिलीट कर दिया गया है। इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि नारायण भाऊराव को नागपुर के इंदिरा गाँधी अस्पताल में भर्ती नहीं कराया गया था। सच्चाई ये है कि उन्हें इंदिरा गाँधी रुग्णालय में भर्ती कराया गया था। ‘लोकसत्ता’ ने एक दूसरे इंदिरा गाँधी सरकारी अस्पताल से बातचीत कर रिपोर्ट बना दी थी। सोशल मीडिया पर लोगों ने इस रिपोर्ट में हुई गलतियों की तरफ ध्यान दिलाया।

‘लोकसत्ता’ ने चुपचाप इस रिपोर्ट को एडिट कर दिया और इसमें ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)’ के विदर्भ प्रान्त के कैम्पेन चीफ अनिल साम्ब्रे का बयान जोड़ दिया। साम्ब्रे ने स्पष्ट कहा कि ये घटना सच्ची है। उन्होंने बताया कि नारायण भाऊराव ने अस्पताल से विनती की कि उनका बेड किसी और को दे दिया जाए और अस्पताल ने ऐसा किया। उन्होंने ये भी कहा कि मीडिया का एक हिस्सा इसे गलत रूप में पेश कर रहा है।

‘लोकसत्ता’ द्वारा की गई एडिटिंग

‘लोकसत्ता’ ने इस दौरान उस ट्वीट का भी जिक्र किया, जिसके आधार पर ये रिपोर्ट बनाई गई थी। ये ट्वीट अब डिलीट कर दिया गया है और यूजर ने ग़लतफ़हमी फैलाने के आरोपों पर माफ़ी भी माँगी है। यूजर रोहन ने कहा कि उनका ट्वीट अपुष्ट था, जिसके आधार पर ‘लोकसत्ता’ ने खबर बनाई। उन्होंने कहा कि वो इस प्रकरण से दुःखी हैं। उन्होंने नारायण भाऊराव दाभाडकर की बेटी के बयान का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने सारे तथ्य साफ़ कर दिए हैं।

यूजर ने ट्वीट डिलीट कर माँगी माफ़ी

रोहन ने लिखा, “ऐसे कठिन समय में इस तरह का बलिदान देने के लिए अनंत साहस चाहिए होता है। मैंने इस अपुष्ट वीडियो को देखा था और इसे सही समझा। लेकिन, आश्वारी मैम का वीडियो देखने के बाद मैं खेद व्यक्त करता हूँ कि मैंने बिना सच्चाई जाने इस वीडियो को शेयर किया। मैं दाभाडकर परिवार के दुःख को समझ सकता हूँ।” उन्होंने ये भी बताया कि कई लोग गलत दावा कर रहे हैं कि दाभाडकर ज़िंदा हैं।

बता दें कि ‘लोकसत्ता’ का कथित फैक्टचेक नागपुर के एक तथाकथित समाजसेवक शिवम थावरे की इंदिरा गाँधी हॉस्पिटल के सुपरिटेंडेंट अजय प्रसाद से हुई बातचीत पर आधारित था। दाभाडकर की बेटी आश्वारी के अनुसार, जब उनके पिता अस्पताल में भर्ती थे तो उन्होंने बाहर बेड के लिए हंगामा सुना। तभी उन्होंने फैसला किया कि वे तो अपनी ज़िंदगी जी चुके है, इसलिए उनके द्वारा लिए गए बेड के कारण कहीं किसी युवा की जान न चली जाए। ये बताते-बताते आश्वारी दाभाडकर रो पड़ी थीं।

‘मास्क पहनना मूर्खता, मैंने भिखारियों साथ खाया… नहीं हुआ कोरोना’: सिंघम-2 के एक्टर मंसूर अली खान पर ₹2 लाख का जुर्माना

मद्रास हाईकोर्ट ने तमिल फिल्मों में सहायक किरदार निभाने वाले अभिनेता को कोरोना वैक्सीन को लेकर अफवाह फैलाने के आरोप में 2 लाख रुपए बतौर जुर्माना राज्य सरकार के पास जमा कराने को कहा है। इससे पहले अप्रैल में मंसूर अली खान को गैर-जमानती धाराओं में आरोपित बनाया गया था। उन्होंने तमिलनाडु में कोरोना टीकाकरण अभियान को लेकर गलत सूचनाएँ फैलाई थी। इस पर उनकी खूब आलोचना भी हुई थी।

मंसूर अली खान ने अभिनेता विवेक के निधन को कोरोना वैक्सीन से जोड़ा था। उन्होंने आरोप लगाया था कि स्थानीय प्रशासन और सरकारें मिल कर लोगों की ‘हत्या’ कर रही है। तमिल फिल्मों में अक्सर कॉमेडी किरदार निभाने वाले विवेक को रजनीकांत की फिल्म ‘शिवाजी’ में उनके किरदार के लिए ज्यादा जाना जाता था। SIMS अस्पताल में उनका निधन होने के बाद खान ने दावा किया था कि वो वैक्सीन लेने से पहले एकदम ठीक थे।

मंसूर अली खान ने मास्क पहनने के सरकारी और मेडिकल दिशा-निर्देशों को ‘मूर्खतापूर्ण कार्य’ तो बताया ही था, साथ ही दावा किया था कि चुनाव प्रचार के दौरान वो जमीन पर सोए और भिखारियों के साथ जम कर अपना खाना शेयर किया, लेकिन उन्हें कोरोना वायरस संक्रमण नहीं हुआ। खान ने बाद में उम्मीदवार के रूप में अपना नाम वापस ले लिया था। तमिलनाडु में हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम 2 मई को आएँगे।

स्थानीय भाजपा यूनिट ने उनके खिलाफ मामला दर्ज कराया था। ‘द ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन (GCC)’ ने भी उनके खिलाफ ‘पब्लिक हेल्थ एक्ट’ के तहत मामला दर्ज किया था। मंसूर अली खान के पर गिरफ़्तारी की तलवार लटक रही थी, लेकिन मद्रास हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी। वडापानी पुलिस थाने ने उनके खिलाफ IPC की धारा-153 (बेहूदगी से लोगों को भड़काना), 270 (अपने क्रियाकलापों से संक्रमण फैलाना और दूसरों की जान खतरे में डालना), और 505(1)(b) (जनता में भय पैदा करना) के तहत मामला दर्ज किया था।

साथ ही उन पर एपिडेमिक्स एक्ट और डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के तहत भी मामले दर्ज किए गए थे। मंसूर अली खान ने मद्रास उच्च-न्यायालय में दायर की गई याचिका में अपने बचाव में कहा कि उन्होंने एक अस्पताल के गेट पर इमोशनल होकर ये बयान दिए थे और उनका इरादा किसी को ठेस पहुँचाने का नहीं था। 30 वर्षों से तमिल फिल्मों में सक्रिय मंसूर अली खान ने कई बार राजनीति में भी किस्मत आजमाई है लेकिन नाकाम रहे।

समलैंगिक संबंधों पर मनोवैज्ञानिक से ‘क्लास’ लेंगे हाई कोर्ट जज, कहा- शब्द दिमाग से नहीं दिल से निकलने चाहिए

समलैंगिक संबंधों के बारे में समझ बढ़ाने के लिए मद्रास हाई कोर्ट के एक जज ने मनोवैज्ञानिक से सलाह लेने का फैसला किया है। जस्टिस एन आनंद वेंकटेश ने कहा है कि समलैंगिक सेक्स के मामले में उनकी समझ अच्छी नहीं है। इसे समझने के लिए उन्होंने एक मनोवैज्ञानिक के साथ ‘शैक्षिक सत्र’ की योजना बनाई है। जज ने कहा कि इस साइको-एजुकेशन सेशन से उन्हें सेम सेक्स रिलेशनशिप का कॉन्सेप्ट समझने में मदद मिलेगी।

असल में जस्टिस वेंकटेश एक समलैंगिक जोड़े द्वारा दायर की गई एक याचिका पर सुनवाई कर रहे हैं। इस बीच उन्होंने समलैंगिक जोड़े से कहा कि उनके परिवार एक-दूसरे के साथ समय व्यतीत करें और काउंसिलिंग सेशन में हिस्सा लें, ताकि एक-दूसरे को अच्छे से समझ सकें। समलैंगिक जोड़ों के सम्मान और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कोर्ट को आगे भी कई फैसले सुनाने हैं, जिसमें इस सेशन से मदद मिलेगी।

समलैंगिक जोड़ों के सम्बन्ध में मद्रास हाई कोर्ट को दिशा-निर्देश जारी करने का निवेदन किया गया था, जिसके जवाब में जस्टिस वेंकटेश ने कहा कि इस मामले में वो और समय चाहते हैं। उन्होंने कहा कि शब्द उनके दिल से आने चाहिए, दिमाग से नहीं। यह तब तक संभव नहीं होगा जब तक वो इस मामले की पूरी समझ न रख लें। उन्होंने मनोविज्ञान शिक्षिका विद्या दिनाकरन से सुविधानुसार अपॉइंटमेंट देने को कहा है।

उन्होंने कहा कि एक बार वे इस मामले की समझ लेकर और शिक्षित होकर फैसला देंगे तो शब्द उनके दिल से निकलेंगे। इस मामले में उन्होंने एक NGO को समलैंगिक जोड़े की देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी और उनके काउंसल से दोनों के माता-पिता से बात कर उनके बीच समझ विकसित करने को कहा। दोनों के परिवार ने इससे जुड़े कई मुद्दे उठाते हुए समाज की सोच की बात की थी। कोर्ट ने कहा कि रातोंरात कुछ नहीं होगा, इसलिए थोड़ा समय देकर उनके मन में समलैंगिक जोड़े को लेकर सकारात्मक बात बिठाई जाए।

जिस समलैंगिक कपल की यहाँ बात हो रही है, उसमें दोनों महिलाएँ हैं। दोनों महिलाओं के परिजनों ने मिसिंग कंप्लेन दर्ज करवाई थी, जिसे बंद करने के लिए हाई कोर्ट में अपील की गई है। कोर्ट ने कहा कि मनोवैज्ञानिक का मानना है कि दोनों महिलाओं ने इस रिश्ते को समझ कर ही फैसला लिया है। दोनों को उनके परिवारों को सौंपने के मुद्दे पर विद्या ने कहा कि उन्हें अलग-अलग रहने को मजबूर किया जा सकता है और इससे उनकी प्रताड़ना होगी।

त्रिपुरा: कोरोना प्रोटोकॉल के नाम पर शादी समारोह में बदसलूकी करने वाले DM ने माँगी माफी, सस्पेंड किए गए

COVID-19 प्रोटोकॉल का पालन करने के नाम पर एक शादी समारोह में बदसलूकी और असभ्य भाषा का प्रयोग करने वाले पश्चिमी त्रिपुरा के DM शैलेश कुमार यादव को सस्पेंड कर दिया गया है। घटना का वीडियो वायरल होने के बाद त्रिपुरा के मुख्यमंत्री ने इस मामले पर संज्ञान लिया था। राज्य के भाजपा विधायकों ने भी मुख्य सचिव मनोज कुमार को पत्र लिखकर DM शैलेश कुमार यादव के निलंबन की कार्रवाई करने की माँग की थी।

सोमवार (26 अप्रैल 2021) की रात DM शैलेश कुमार यादव ने कथित तौर पर कोरोना प्रोटोकॉल का पालन न करने पर दो मैरिज गार्डनों पर कार्रवाई की थी। इनमें से एक मैरिज हॉल का वीडियो वायरल हो गया। इस वीडियो में DM शैलेश यादव मैरिज हॉल में उपस्थित लोगों के साथ बदसलूकी करते देखे गए। DM के साथ पुलिसकर्मी भी थे।

वीडियो में DM को दूल्हे और बुजुर्ग पुरोहित के साथ भी बदसलूकी करते हुए देखा गया। DM पर आरोप था कि उन्होंने हॉल में उपस्थित लोगों के साथ मारपीट की और बुजुर्गों को भी नहीं छोड़ा। इसके अलावा DM शैलेश यादव ने गाली-गलौज करते हुए अपने ही द्वारा हस्ताक्षरित अनुमति आदेश की कॉपी को फाड़ दिया और नियमों के उल्लंघन की कार्रवाई करने की धमकी देने लगे।

विधायकों द्वारा मुख्य सचिव को लिखे पत्र में कहा गया था कि डीएम ने महिलाओं के साथ भी बदसलूकी की। उन्हें थाने ले जाया गया। हालाँकि बाद में उन्हें छोड़ दिया गया लेकिन विधायकों ने आरोप लगाया कि DM शैलेश यादव के साथ महिला पुलिसकर्मी नहीं थीं।

इस मामले पर DM शैलेश कुमार यादव की आलोचना होने के बाद उन्होंने माफी माँगी। उन्होंने कहा, “मेरी इस कार्रवाई से किसी को ठेस पहुँची हो तो मैं उसके लिए माफी माँगता हूँ। हालाँकि मैंने यह कार्रवाई लोगों और समाज की भलाई के लिए ही की। सरकार के दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन कराने के लिए यह कार्रवाई की।”

हालाँकि विधायकों ने अपने पत्र में बताया है कि इन्हीं DM ने शादी के लिए अनुमति दी थी। इसी अनुमति के तहत 4-4 कार ले जाने और शादी समारोह में 50 लोगों के शामिल होने की बात कही गई थी। इस घटना पर मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देव ने मुख्य सचिव मनोज कुमार से रिपोर्ट तलब की थी जिसके बाद अब पश्चिमी त्रिपुरा के DM शैलेश कुमार यादव को निलंबित कर दिया गया है।

दिल्ली में अब जजों के लिए 5 स्टार कोविड सेंटर नहीं, AAP सरकार ने वापस लिया आदेश: हाई कोर्ट ने फटकारा था

दिल्ली हाई कोर्ट के जज और अन्य न्यायिक कर्मचारियों के लिए अशोक होटल में कोविड सेंटर बनाने का आदेश केजरीवाल सरकार ने वापस ले लिया है। अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार ने इसके लिए दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित 5 स्टार अशोक होटल में 100 कमरे आवंटित करने का आदेश दिया था।

इस आदेश को वापस लिए जाने की जानकारी आप सरकार ने गुरुवार (29 अप्रैल 2021) को दिल्ली हाई कोर्ट को दी। इसके बाद जस्टिस विपिन सांघी और रेखा पल्ली की डिवीजन बेंच ने इस मुद्दे पर कार्यवाही का निस्तारण कर दिया। इस संबंध में समाचार प्रकाशित होने के बाद हाई कोर्ट ने मामले का स्वत: संज्ञान लिया था।

चाणक्यपुरी के एसडीएम ने 26 को अशोक होटल में कोविड सेंटर को लेकर नोटिफिकेशन जारी किया था। इसमें कहा गया था कि इस कोविड फैसिलिटी को प्राइमस हॉस्पिटल द्वारा संचालित किया जाएगा। जजों के अलावा न्यायिक कर्मचारी और उनके परिजन भी इस सुविधा का लाभ उठाने के हकदार थे।

यह मामला संज्ञान में आने के बाद हाई कोर्ट ने केजरीवाल सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए पूछा था कि क्या यह सब अदालत को खुश करने के लिए किया गया है? कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि उनकी ओर से न्यायाधीशों और अन्य न्यायिक अधिकारियों और उनके परिवारों के लिए अशोक होटल परिसर को प्राथमिकता के आधार पर कोविड-19 सुविधा में बदलने का कोई अनुरोध नहीं किया गया था।

अफसरों के लिए भी VIP कोविड इंतजाम

मंगलवार को (27 अप्रैल) केजरीवाल सरकार ने दिल्ली के चार बड़े होटलों को सरकारी अधिकारियों और उनके परिवार के लोगों के लिए कोविड केयर सेंटर बनाने का आदेश जारी किया था।

चार फोर स्टार होटलों विवेक विहार के होटल जिंजर, शाहदरा के होटल पार्क प्लाजा, कड़कड़डूमा के पास स्थित होटल लीला एंबियंस, हरि नगर में होटल गोल्डन ट्यूलिप एसेंशियल को सरकारी अधिकारियों और उनके परिवार वालों के लिए रिजर्व करने का फैसला किया गया था। दिल्ली सरकार द्वारा जारी आदेश के मुताबिक, इन होटलों को राजीव गाँधी सुपरस्पेशलिटी अस्पताल और दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल से जोड़ा जाएगा ताकि दिल्ली सरकार, स्वायत्त संस्थाओं और निगम के अधिकारियों और उनके परिवार वालों का इलाज किया जा सके।

अनुभव शर्मा को परिवार ने छोड़ा, मोहम्मद युनूस ने किया दाह संस्कार: मीडिया गिरोह के प्रोपेगेंडा की खुली पोल

प्रोपगेंडा फैलाने के लिए कोरोना महामारी को वामपंथियों ने एक अवसर की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। झूठ का कारोबार चलाने के लिए वह लोगों की संवेदनाओं से खेल रहे। सबसे ताजा उदाहरण कल तब देखने को मिला, जब अनुभव शर्मा का नाम लेकर एक तस्वीर वायरल हुई और दावा कर दिया गया कि उनका दाह संस्कार मोहम्मद यूनुस ने किया है। 

इस पोस्ट को तमाम लोग सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे

इस तस्वीर को रवीश कुमार, अभिसार शर्मा, मोहम्मद जुबेर समेत कई मीडिया गिरोह के लोगों ने जमकर शेयर किया। अभिसार शर्मा के ट्वीट पर इसे 27000 शेयर मिले हैं। इस तस्वीर को शेयर करके ट्विटर पर बताया गया कि यह मुजफ्फरनगर की है। अनुभव कोविड से ग्रसित थे। ऐसे में उनके परिवार के लोग भी जब दाह संस्कार को आगे नहीं आए, तब मोहम्मद यूनुस ने उनका अंतिम संस्कार किया। इस तस्वीर को आधार बनाकर संदेश दिया गया कि धर्म की राजनीति करने वालों को कोरोना महंगा पड़ रहा है।

अब इस तस्वीर की सच्चाई क्या है? यह स्वराज्य की पत्रकार स्वाति गोयल ने बताया है। गोयल ने खबर को फर्जी बताते हुए कहा कि उन्होंने इस संबंध में अनुभव के परिवार से बात की। अनुभव के भाई शरद ने उनसे कहा कि उन्हें हँसी का पात्र बना दिया गया है। इस वायरल पोस्ट से वह लोग बहुत आहत हैं। अनुभव के भाई ने कहा कि उनके भाई की कोरोना से मृत्यु नहीं हुई। किसी ने झूठ प्रकाशित करने से पहले परिवार से सच जानने का प्रयास नहीं किया।

पत्रकार आगे बताती हैं कि कोई परिवार जिसने अपना जवान बेटा खोया हो, उसके साथ आप सबसे बुरा क्या कर सकते हैं? फर्जी न्यूज फैला दीजिए कि उसके परिवार ने उसका दाह संस्कार नहीं किया। जो पोस्ट वायरल है, उसके अनुसार मो यूनुस ने अनुभव का अंतिम संस्कार किया। वो बिलकुल झूठ है।

स्वराज्य की रिपोर्ट के अनुसार, शरद ने कहा, “मैंने अपने भाई का अपने हाथ से अंतिम संस्कार किया। मेरे समुदाय और मेरे घर के लोग वहाँ मौजूद थे।” उनके मुताबिक, “यूनुस फैमिली बिजनेस में ड्राइवर के तौर पर काम करते हैं और अनुभव के दोस्त भी थे, लेकिन अनुभव का दाह संस्कार सिर्फ़ मैंने ही किया है। अमर उजाला की रिपोर्ट फेक है, इसमें दिए गए बयान का सोर्स भगवान जाने कौन है। किसी ने न हमसे बात की, न यूनुस से।”

Hindu Man’s Family Refutes Report And Viral Social Media Posts That Muslim Man Performed Last Rites Of Their Son
27 अप्रैल को प्रकाशित हुई अमर उजाला में खबर

शरद ने ये भी कहा, “तस्वीर में आग पकड़ाने के लिए युनूस ‘राल (एक तरह का पाउडर)’ डालता दिख रहा है… उससे पहले, हमारे पंडितजी ने भी 5 किलो राल डाला लेकिन किसी ने उनकी तस्वीर नहीं शेयर की।” शरद के अनुसार, “वहाँ खड़ा हर व्यक्ति एकजुटता दिखा रहा था। उससे कोई समस्या नहीं है। लेकिन सच यही है कि मैंने अपने भाई का अंतिम संस्कार किया।”

अनुभव शर्मा को क्या हुआ था?

शरद खुद भी एक रिपोर्टर हैं। वह ऑन ड्यूटी नाम की मैग्जीन चलाते हैं। इस संबंध में वह अपने फेसबुक और मैग्जीन पर इस पर लिखने वाले थे, लेकिन वह व्यस्त रहे। इस बीच किसी ने उनसे इस संबंध में सच्चाई जानने के लिए संपर्क नहीं किया। उन्होंने बताया कि उनके भाई को 4-5 दिन से बाजुओं में दर्द था। डॉक्टरों ने कहा कि सर्वाइकल था। वह पूछते हैं, “अगर मेरे भाई को कोरोना होता तो क्या प्रशासन इस प्रकार दाह संस्कार करने की अनुमति देता?” तस्वीर वायरल होने पर उन्होंने कहा, “वह कोई तस्वीर खींचने वाला मौका नहीं था। हमें नहीं पता किसने यूनुस की तस्वीर खींची। लेकिन मुझे मालूम है जिसने फोटो ली, उसने मेरी और मेरे परिवार की भी ली होगी।”

पिछले साल फैली फेक न्यूज

कोरोना महामारी के समय पहली बार ऐसा झूठ फैलाने की कोशिश नहीं हुई। पिछले साल भी उन कहानियों को ढूँढकर शेयर करने का काम हुआ, जहाँ हिंदुओं के दाह संस्कार दूसरे मजहब के लोगों ने किए हों। इसी क्रम में तेलंगाना के एक परिवार के बारे में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ (TOI) में फेक न्यूज़ छपी कि वहाँ एक हिन्दू की मौत होने के बाद दूसरे मजहब के लोगों ने मिल कर उसे कन्धा दिया और उसके अंतिम संस्कार की भी व्यवस्था की।

हेडिंग में लिखा गया कि समुदाय विशेष के 5 लोगों ने मिल कर एक हिन्दू की लाश को कंधा दिया और उसका अंतिम संस्कार किया। मृतक पेशे से ऑटो ड्राइवर था, जिसकी मौत टीबी के कारण हुई थी। अख़बार में यहाँ तक दावा किया गया कि दूसरे मजहब वालों ने पीड़ित परिवार और अंतिम संस्कार में भाग लेने आए सम्बन्धियों के लिए भोजन की भी व्यवस्था की।

लेकिन, सच्चाई पता की गई तो मालूम हुआ कि पीड़ित परिवार TOI की खबर सुनने के बाद सदमें मे था। मृतक के भाई का कहना था कि समुदाय विशेष की वाहवाही के लिए ये सब प्रपंच रचा गया। वहीं मृतक के बेटे ने बताया था कि 5 लोगों ने उनके पिता के दोस्त होने की बात कह के अर्थी को कंधा दिया और इसका फोटो पत्रकारों को दे दिया।

इसके अलावा एक खबर अगस्त 2020 में वायरल हुई थी। वायरल तस्वीर में मुस्लिम भीड़ किसी अर्थी को कांधा देती दिख रही थी। तस्वीर को शेयर कर कहा गया कि ये लोग तबलीगी जमात के हैं जिन्होंने अपने मजहबी कार्य को छोड़ कर हिंदू डॉक्टर का दाह संस्कार करवाया, जो कोरोना संक्रमित थे। हालाँकि पड़ताल में पता चला कि डॉ की मृत्यु कोरोना से नहीं हुई थी। सारा प्रोपगेंडा जमातियों की छवि निर्माण के लिए थे।

लखनऊ के मेदांता अस्पताल में प्रियंका गाँधी ने कराई ऑक्सीजन की व्यवस्था? जानिए, क्या है सच

हाल ही में कई मीडिया समूहों ने यह न्यूज चलाई कि प्रियंका गाँधी वाड्रा ने लखनऊ के मेदांता अस्पताल के लिए ऑक्सीजन की व्यवस्था कराई। भास्कर ने रिपोर्ट दी कि प्रियंका गाँधी वाड्रा ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को ऑक्सीजन की व्यवस्था करने के लिए कहा और उन्होंने ऑक्सीजन का एक टैंकर लखनऊ के लिए भेज दिया। इसी न्यूज को कई अन्य मीडिया आउटलेट्स ने शेयर किया।

भास्कर की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट
वन इंडिया की रिपोर्ट

कॉन्ग्रेस नेता ललन कुमार ने भी ऑक्सीजन टैंकर की फोटो शेयर करते हुए छतीसगढ़ से ऑक्सीजन की व्यवस्था कराने के लिए प्रियंका गाँधी वाड्रा को श्रेय दिया।

हालाँकि अब रिपोर्ट आ रही है कि लखनऊ के मेदांता अस्पताल के लिए ऑक्सीजन की व्यवस्था दिल्ली के एक एनजीओ ने कराई। इंडियन एक्स्प्रेस की रिपोर्ट में यह कहा गया है कि अस्पताल प्रशासन ऑक्सीजन की आपूर्ति के किसी भी राजनैतिक पहलू से पूरी तरह से अनभिज्ञ है।

इंडियन एक्स्प्रेस की रिपोर्ट का एक अंश

रिपोर्ट्स में बताया गया है कि अस्पताल के डायरेक्टर राकेश कपूर के अनुसार दिल्ली के एक एनजीओ ने ऑक्सीजन सिलेंडर की व्यवस्था कराई। उन्होंने यह भी कहा कि वह इस मामले में किसी भी प्रकार के राजनैतिक हस्तक्षेप से वाकिफ नहीं हैं।

पंजाब: फ्यूचर ग्रुप के स्टोरेज सेंटर की 4 महीनों से नाकेबंदी, ‘किसानों’ को हटाने के लिए हाई कोर्ट में कंपनी

फ्यूचर सप्लाई चेन्स सॉल्यूशंस ने पंजाब ऐंड हरियाणा हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इसमें उन किसान प्रदशर्नकारियों को हटाने का निर्देश देने की अपील की गई जिन्होंने गैरकानूनी तरीके से करीब 4 महीने से उसके स्टोरेज फैसिलिटी की नाकेबंदी कर रखी है। यह स्टोरेज फैसिलिटी पटियाला जिले के शंभू कलां गाँव के पास है। याचिका 28 अप्रैल 2021 को दाखिल की गई।

कंपनी ने कोर्ट से अनुरोध किया है कि वह किसानों की नाकाबंदी को तत्काल वहाँ से हटवाए और समूह को अपनी व्यावसायिक गतिविधियों को चलाने के लिए सुरक्षित रास्ता प्रदान करे। कंपनी ने अपनी दलील में कहा है कि 4 करोड़ रुपए का खराब होने वाला माल स्टोरेज में है। अगर किसानों को वहाँ से नहीं हटाया जाता है तो उत्पाद जल्द ही खराब हो जाएँगे।

खराब हुए 66 लाख रुपए के सामान

याचिका में, फ्यूचर ग्रुप ने दावा किया है कि 66 लाख रुपए के पैक किए गए खाद्य वस्तुएँ, दालें और अन्य खाद्यान्न पहले ही खराब हो चुके हैं। 1.5 करोड़ रुपए के उत्पादों का एक और बैच आने वाले दिनों में खराब हो जाएगा। ग्रुप ने कहा कि इन उत्पादों को कर्मचारियों द्वारा भंडारण सुविधा से दैनिक आधार पर बाहर निकालने की आवश्यकता होती है।

किसान प्रदर्शनकारियों ने कथित तौर पर इस स्टोरेज सेंटर को इसलिए घेर रखा है, क्योंकि उन्हें लगता है कि फ्यूचर समूह की सप्लाई चेन को रिलायंस खरीद रहा है। हालाँकि, यह सौदा अभी लंबित है, क्योंकि इसे अमेजॉन ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे रखी है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अमेजॉन, रिलायंस और फ्यूचर ग्रुप के बीच केस की सभी कार्यवाही पर रोक लगा दी थी। शीर्ष अदालत ने मामले में सुनवाई के लिए 4 मई की तारीख तय की है और सभी पक्षों को तब तक अपने जवाब तैयार करने को कहा है।

नाकेबंदी हटाने को कुछ नहीं कर रहा जिला प्रशासन: फ्यूचर ग्रुप

फ्यूचर ग्रुप के वरिष्ठ प्रबंधक आकाश भरारा के माध्यम से हाई कोर्ट में आवेदन दायर किया गया है। कंपनी की ओर से पेश अधिवक्ता सचिन राय वैद ने दलील दी कि इस रुकावट से कंपनी को काफी वित्तीय नुकसान हुआ है। याचिकाकर्ता ने कहा कि इस स्टोरेज सेंट में 400 से अधिक लोग कार्यरत हैं, जिनकी आजीविका पूरी तरह से भंडारण सुविधा के संचालन पर निर्भर है। पिछले चार महीने से रुकावट के कारण वे बेरोजगार बैठे हैं।

वैद ने कहा, “किसानों की गैरकानूनी कार्रवाई और उक्त नाकेबंदी को हटाने में जिला प्रशासन की निष्क्रियता से याचिकाकर्ता कंपनी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है, जिससे व्यापार और व्यवसाय चलता है।” न्यायमूर्ति महाबीर सिंह संधू ने याचिकाकर्ता को खाद्य पदार्थों को स्टोर करने के लिए राज्य अधिकारियों द्वारा दी गई लाइसेंस की प्रति पेश करने का निर्देश दिया। इस मामले की सुनवाई 29 अप्रैल को होगी।

हनुमान जी की पूजा में भीड़ लगी तो कॉन्ग्रेसी CM ने DM-SP को डाँटा, गाजी फकीर के जनाजे में जुटी भारी भीड़ पर चुप्पी

कोरोना दिशा-निर्देशों का पालन कराने को लेकर राजस्थान की सरकार का दोहरा रवैया सामने आया है। जहाँ एक तरफ धौलपुर के धार्मिक आयोजन में भीड़ जुटी तो सीधा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने स्थानीय SP को फटकार लगाई, जबकि जैसलमेर में ‘सरहद का सुल्तान’ गाजी फकीर के जनाजे में उमड़ी भीड़ की तरफ से आँख मूँद ली गई। गाजी फकीर के बेटे मोहम्मद सालेह राजस्थान सरकार में वक्फ और अल्पसंख्यक विभाग के मंत्री हैं।

ये सब तब हो रहा है, जब राजस्थान कोरोना की दूसरी लहर सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों की सूची में शीर्ष 5 में पहुँच गया है। यहाँ सक्रिय कोरोना मामलों की संख्या 1,63,372 हो गई है। पिछले 24 घंटों में यहाँ 16,613 नए मामले सामने आए हैं और 120 लोगों ने कोविड-19 के कारण अपनी जान गँवा दी। राजधानी जयपुर में सबसे ज्यादा 33,324 सक्रिय मामले हैं। राजस्थान में कोरोना ने अब तक 3926 लोगों की जान ली है।

मामला कुछ यूँ है कि राजस्थान में कोरोना की दूसरी लहर के बीच धार्मिक आयोजनों पर रोक लगी हुई है। ऐसे में धौलपुर में भाजपा विधायक सुखराम खोली ने हनुमान जी की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अखंड रामायण का पाठ कराया। इसमें 500 से अधिक लोग जुट गए। सीएम गहलोत ने एक बैठक में यहाँ के DM-SP को सबके सामने फटकार लगा डाली। उन्होंने मुख्य सचिव को भी आदेश दिया कि वो इस मामले का स्पष्टीकरण स्थानीय प्रशासन से तलब करें।

राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार के दोहरे रवैये पर ‘दैनिक भास्कर’ की खबर (साभार)

ये हुई एक खबर। अब आते हैं उस दूसरी खबर पर, जहाँ हजारों लोगों की भीड़ तो जुटी लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। ऐसा इसलिए, क्योंकि जिसका जनाजा था वो जैसलमेर, खासकर पोखरण का एक प्रभावशाली हस्ती था। इलाके में उसका दबदबा था ही, साथ ही भारत-पाकिस्तान के सिंधी मुस्लिम उसे खलीफा भी मानते थे। उसके परिवार के कई लोग बड़े-बड़े पदों पर हैं। एक बेटा अशोक गहलोत की कैबिनेट में मंत्री है।

सालेह मोहम्मद के अब्बा का निधन हुआ। इसमें खुद सालेह भी शामिल हुए, जबकि मात्र 4 दिन पहले ही वो कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे। वो हजारों लोगों के साथ जनाजे में शामिल हुए लेकिन राज्य सरकार या प्रशासन के कान में जूँ तक न रेंगी। मीडिया के सूत्र कह रहे हैं कि उनकी रिपोर्ट नेगेटिव भी आ गई थी। राजस्थान में अंतिम यात्रा में मात्र 20 लोगों के शामिल होने की अनुमति है। वहाँ की घटना के लिए मुख्यमंत्री ने कोई रिपोर्ट तलब नहीं की।

गाजी फकीर की जैसलमेर की राजनीति पर ऐसी पकड़ थी कि उनकी सलाह के बिना वहाँ कॉन्ग्रेस कोई भी निर्णय नहीं लेती थी। शायद अशोक गहलोत को डर है कि उनके परिवार के खिलाफ कार्रवाई करने का इशारा भर करने से पश्चिमी राजस्थान के मुस्लिम उनके खिलाफ हो सकते हैं, जो हर चुनाव में अपने खलीफा के फतवे का पालन करते थे। सार ये कि राजस्थान में पूजा-पाठ गलत है, जनाजे की भीड़ के लिए कोई बंदिश नहीं है।