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महाराष्ट्र के प्रस्तावित देवस्थान इनाम निरसन अधिनियम का विरोध, CM फडणवीस से हस्तक्षेप की माँग: जानिए वक्फ छूट से क्यों खफा हुए हिंदू

महाराष्ट्र सरकार के राजस्व विभाग द्वारा प्रस्तावित ‘देवस्थान इनाम निरसन अधिनियम, 2026’ के मसौदे को लेकर राज्य में विवाद गहरा गया है। महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात कर इस विधेयक के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराया और एक ज्ञापन सौंपा। हिंदू संगठनों का आरोप है कि इस कानून के जरिए मंदिरों की ऐतिहासिक जमीनों पर अवैध कब्जों को वैध करने और उन्हें निजी हाथों में सौंपने की साजिश रची जा रही है। इस विवाद का सबसे बड़ा कारण वक्फ संपत्तियों को इस अधिनियम से बाहर रखना है।

प्रस्तावित मसौदे के तहत वर्ष 2011 से पहले के अवैध कब्जों को वैध बनाने और कब्जाधारियों को मालिकाना हक देने का प्रावधान है, जिसे महासंघ ने भू-माफिया को फायदा पहुँचाने वाला बताया है। महाराष्ट्र मंदिर महासंघ ने चेतावनी दी है कि अगर इसे इसी रूप में लागू किया गया तो पूरे राज्य में आंदोलन किया जाएगा।

यह ड्राफ्ट महाराष्ट्र सरकार के राजस्व विभाग द्वारा तैयार किया गया है, जिसमें देवस्थान इनाम यानी मंदिरों और धार्मिक संस्थानों को ऐतिहासिक रूप से दी गई जमीनों को खत्म करने और उनके स्वामित्व, कब्जा अधिकार, हस्तांतरण, अतिक्रमण और किरायेदारी से जुड़े मामलों के लिए नया कानूनी ढाँचा बनाने की बात कही गई है।

देवस्थान इनाम जमीन क्या हैं?

देवस्थान इनाम जमीनें वे भूमि हैं जो पहले के समय में राजाओं द्वारा मंदिरों, धार्मिक संस्थानों और चैरिटेबल संस्थाओं को दी गई थीं। इन पर अक्सर लगान में छूट भी मिलती थी। मसौदे में इन्हें ऐसी भूमि बताया गया है जो गाँव या गाँव का कोई हिस्सा, भूमि राजस्व या टैक्स छूट के रूप में धार्मिक संस्थानों को दी गई हो।

इस विधेयक में साफ तौर पर 1954 के हैदराबाद इनाम निरसन अधिनियम, 1952 के आतियत कानून और 1995 के वक्फ अधिनियम के तहत आने वाली जमीनों को बाहर रखा गया है। इसी वक्फ छूट को लेकर विवाद सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है।

विधेयक का विरोध क्यों हो रहा है?

महाराष्ट्र मंदिर महासंघ का आरोप है कि यह कानून मंदिरों की जमीनों को किरायेदारों, कब्जाधारियों और निजी लोगों को ट्रांसफर कराने का रास्ता खोल देगा। संगठन का कहना है कि मंदिर की संपत्ति देवता की होती है और उसे न तो ट्रस्टी बेच सकते हैं और न ही सरकार ट्रांसफर कर सकती है।

महासंघ के राष्ट्रीय संगठन मंत्री सुनील घनवट ने तीन मुख्य आपत्तियाँ बताई हैं। पहली यह कि सरकार के पास देवस्थान जमीनों का स्वामित्व ही नहीं है, इसलिए वह इनके हस्तांतरण का कानून नहीं बना सकती। उनका कहना है कि पहले के कानून सिर्फ जमीन को सुरक्षित रखने के लिए थे, न कि उसे निजी हाथों में देने के लिए।

दूसरी आपत्ति यह है कि ये जमीनें ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हैं और कई जमीनें छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे मराठा शासकों या पुराने राजवंशों द्वारा दी गई थीं। ऐसे में इन्हें निजी हाथों में जाने देना मंदिर व्यवस्था को कमजोर करेगा।

तीसरी आपत्ति वक्फ जमीनों को छूट देने को लेकर है। संगठन का कहना है कि कानून में वक्फ संपत्तियों को बचाया गया है लेकिन हिंदू मंदिरों की जमीनों पर ही नियम लागू किए जा रहे हैं, जो असमान व्यवहार है।

संगठन का आरोप है कि यह कानून मंदिरों के स्वामित्व को कमजोर करेगा, अतिक्रमण को वैध बनाएगा, बिल्डरों और जमीन माफिया को फायदा देगा और मंदिरों की आर्थिक स्वतंत्रता को नुकसान पहुँचाएगा।

ड्राफ्ट कानून के मुख्य प्रावधान

देवस्थान इनाम समाप्त करना
धारा 3 के तहत सभी देवस्थान इनाम समाप्त कर दिए जाएँगे, केवल नकद अनुदान को छोड़कर। इससे मंदिरों की जमीनों पर पुराने कानूनी अधिकार खत्म हो जाएँगे।

कब्जाधारियों को अधिकार देना

धारा 4 के तहत खेती करने वाले किरायेदारों, मिरासदारों और अन्य धारकों को कब्जे के अधिकार दिए जाएँगे और उन्हें ऑक्यूपेंट क्लास-1 का दर्जा मिलेगा। इससे मंदिरों की जमीनों पर मजबूत मालिकाना अधिकार जैसा प्रभाव पड़ेगा।

2011 से पहले के कब्जे को वैध करना

मसौदे में कहा गया है कि 1 जनवरी 2011 से पहले जो लोग जमीन पर कब्जे में हैं, अगर कुछ शर्तें पूरी करते हैं तो उन्हें जमीन का अधिकार दिया जा सकता है। इसमें बाजार मूल्य का भुगतान और आर्थिक सीमा की शर्त भी शामिल हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में 2011 से पहले रहने वालों को बिना शुल्क के भी अधिकार दिए जा सकते हैं। आलोचकों का कहना है कि यह अतिक्रमण को वैध बनाने जैसा है।

अवैध कब्जे पर सख्त कार्रवाई

इसी कानून में अवैध कब्जे पर 2 से 5 साल की सजा, भारी जुर्माना और तत्काल बेदखली का प्रावधान भी है। सरकार पुराने कब्जों को वैध और नए कब्जों पर सख्ती दोनों कर रही है, लेकिन संगठन का कहना है कि इससे गलत संदेश जाएगा।

वक्फ छूट विवाद क्यों बढ़ा?

महासंघ ने वक्फ संपत्तियों को कानून से बाहर रखने पर कड़ा विरोध जताया है। उनका कहना है कि अगर वक्फ जमीनों को सुरक्षा दी जा सकती है तो मंदिरों की जमीनों को क्यों नहीं। इस मुद्दे ने अब जमीन सुधार से आगे बढ़कर धार्मिक संस्थानों के साथ असमान व्यवहार और मंदिर स्वायत्तता की बहस का रूप ले लिया है।

संवैधानिक चिंताएँ

महासंघ का कहना है कि यह कानून अनुच्छेद 25, 26 और 300A का उल्लंघन करता है। उनका तर्क है कि मंदिरों की जमीनें पूजा-पाठ, प्रशासन, दान कार्य, पुजारियों के वेतन और धार्मिक गतिविधियों के लिए जरूरी हैं।

महाराष्ट्र मंदिर महासंघ की माँगें

संगठन ने एक मेमोरेंडम दिया जिसमें ड्राफ्ट एक्ट को तुरंत वापस लेने, लैंड रिकॉर्ड में देवस्थान की ज़मीन को साफ़ तौर पर नॉन-ट्रांसफरेबल स्टेटस देने, मंदिर की जमीन के लिए एक सख़्त एंटी-लैंड ग्रैबिंग कानून बनाने, पिछले कब्जों और जाली रिकॉर्ड की SIT जाँच कराने और मंदिर की जमीन के झगड़ों को छह महीने के अंदर सुलझाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाने की मांग की गई।

महासंघ ने चेतावनी दी कि अगर सरकार इस कानून पर आगे बढ़ती है, तो वह मंदिर ट्रस्ट, भक्तों और हिंदू संगठनों को शामिल करके पूरे राज्य में आंदोलन शुरू कर सकता है।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात

महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के नेशनल ऑर्गेनाइजर सुनील घनवत की लीडरशिप में एक डेलीगेशन ने MLA प्रताप अडसद और प्रताप पचपुते के साथ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मिलकर प्रपोज़्ड कानून के खिलाफ एक मेमोरेंडम दिया।

घनवत ने बाद में कहा कि मुख्यमंत्री ने मामले की गंभीरता को माना और अधिकारियों को संबंधित विभाग और मंत्रियों के साथ बैठक करने का निर्देश दिया।

आगे क्या होगा?

यह मसौदा अभी जनता के सुझाव और आपत्तियों के लिए रखा गया है। 5 जून 2026 तक लोग अपनी राय दे सकते हैं। सरकार अब इसमें संशोधन, बदलाव या इसे विधानसभा में पेश करने का फैसला ले सकती है।

लेकिन मंदिर संगठनों के विरोध और वक्फ तुलना के कारण यह मामला आने वाले समय में महाराष्ट्र की बड़ी राजनीतिक और धार्मिक बहस बन सकता है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

₹182 करोड़ की ‘जिहादी ड्रग’ कैप्टागॉन भारत में पहली बार जब्त, होता है बेहद खतरनाक: जानें इसका मिडिल ईस्ट कनेक्शन और कैसे पड़ा ये नाम

भारत में पहली बार कैप्टागॉन  नाम की खतरनाक सिंथेटिक ड्रग की इतनी बड़ी खेप पकड़ी गई है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने ऑपरेशन रेजपिल के तहत करीब 182 करोड़ रुपए कीमत की कैप्टागॉन ड्रग्स जब्त की है।

इस मामले में एक सीरियाई नागरिक को भी गिरफ्तार किया गया है। जाँच एजेंसियों के मुताबिक यह खेप मिडिल ईस्ट भेजी जानी थी और भारत का इस्तेमाल ट्रांजिट रूट यानी रास्ते के तौर पर किया जा रहा था।

गृह मंत्री अमित शाह ने इसे भारत की जीरो टॉलरेंस नीति की बड़ी सफलता बताया है। कैप्टागॉन को दुनिया भर में ‘जिहादी ड्रग’ और ‘गरीबों का कोकीन’ जैसे नामों से भी जाना जाता है। आइए जानते है कि आखिर यह ड्रग क्या है, इसका इस्तेमाल कौन करता है, इसे इतना खतरनाक क्यों माना जाता है और भारत से इसका क्या कनेक्शन निकला।

क्या है कैप्टागॉन?

कैप्टागॉन एक सिंथेटिक स्टिमुलेंट ड्रग है। इसका असली नाम फेनेथिलीन है। इसे 1960 के दशक में दवा के तौर पर बनाया गया था। शुरुआत में इसका इस्तेमाल ध्यान संबंधी समस्याओं, डिप्रेशन और नार्कोलेप्सी जैसी बीमारी के इलाज में किया जाता था।

लेकिन धीरे-धीरे यह सामने आया कि इस दवा की लत बहुत तेजी से लगती है और इसका गलत इस्तेमाल बढ़ रहा है। इसके बाद दुनिया के कई देशों में इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। हालाँकि आज अवैध बाजार में जो कैप्टागॉन बिकता है, वह असली मेडिकल दवा नहीं है।

इसे लैब में तैयार किया जाता है और इसमें एम्फेटामाइन, मेथाम्फेटामाइन, कैफीन और दूसरे खतरनाक केमिकल मिलाए जाते हैं। यही वजह है कि इसका असर बेहद तेज और खतरनाक माना जाता है।

शरीर और दिमाग पर कैसे असर करती है यह ड्रग?

कैप्टागॉन लेने के बाद इंसान को अचानक बहुत ज्यादा ऊर्जा महसूस होती है। उसे लंबे समय तक नींद नहीं आती, थकान कम लगती है और डर का एहसास भी कम हो जाता है। कई लोग इसे लेने के बाद खुद को ज्यादा ताकतवर और आत्मविश्वासी महसूस करते हैं।

जाँच एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के मुताबिक इस ड्रग का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति घंटों तक जाग सकता है। भूख कम लगती है और शरीर दर्द को भी कम महसूस करता है। लेकिन इसके साथ ही यह इंसान को आक्रामक, हिंसक और लापरवाह भी बना सकता है।

लंबे समय तक इस्तेमाल करने के कारण कई प्रकार की समस्या हो सकती है जैसे मानसिक बीमारी, हार्ट प्रॉब्लम, तनाव, डिप्रेशन और गंभीर एडिक्शन जैसी समस्याएँ पैदा हो सकती हैं। ड्रग एक्सपर्ट्स के मुताबिक यह सिर्फ नशा नहीं बल्कि मानसिक नियंत्रण को कमजोर करने वाला खतरनाक सिंथेटिक पदार्थ है।

क्यों कहा जाता है जिहादी ड्रग?

कैप्टागॉन का वैज्ञानिक नाम ‘जिहादी ड्रग’ नहीं है। यह शब्द मीडिया और सुरक्षा एजेंसियों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है। इसे यह नाम इसलिए मिला क्योंकि कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि मिडिल ईस्ट के युद्धग्रस्त इलाकों और कट्टरपंथी संगठनों के लड़ाके इसका इस्तेमाल करते रहे हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक इस ड्रग को लेने के बाद लड़ाकों को डर कम लगता था, थकान महसूस नहीं होती थी और वे लंबे समय तक जागकर लड़ाई कर सकते थे। यही वजह है कि इसे युद्ध और हिंसक गतिविधियों से जोड़कर देखा जाने लगा।

सीरिया से जुड़ी कई डॉक्यूमेंट्री और रिपोर्ट्स में पूर्व लड़ाकों ने बताया कि युद्ध के दौरान उन्हें यह गोली दी जाती थी ताकि वे लगातार लड़ सकें। कुछ रिपोर्ट्स में ISIS और दूसरे उग्रवादी संगठनों के साथ भी इसका नाम जोड़ा गया है।

हालाँकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि हर उपयोगकर्ता आतंकी नहीं होता। मिडिल ईस्ट के कई देशों में आम लोग भी इसे पार्टी ड्रग या स्टिमुलेंट के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।

मिडिल ईस्ट में क्यों फैला इसका नेटवर्क?

कैप्टागॉन का सबसे बड़ा अवैध बाजार मिडिल ईस्ट माना जाता है। खासकर सऊदी अरब, कतर, UAE और कुवैत जैसे देशों में इसकी बड़ी माँग बताई जाती है। कई जगह शराब पर सख्त पाबंदियाँ होने के कारण युवा वर्ग और पार्टी कल्चर से जुड़े लोग इस ड्रग की तरफ आकर्षित होते हैं।

संयुक्त राष्ट्र और कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की रिपोर्ट के मुताबिक अरब देशों में हर साल करोड़ों कैप्टागॉन गोलियाँ पकड़ी जाती हैं। इसे ‘गरीबों का कोकीन’ भी कहा जाता है क्योंकि यह कोकीन से सस्ती पड़ती है, लेकिन असर काफी तेज होता है।

सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इसकी तस्करी से अरबों रुपए कमाए जाते हैं। यह पैसा संगठित अपराध, हथियारों की तस्करी और कुछ मामलों में चरमपंथी नेटवर्क तक भी पहुँच सकता है।

भारत में कैसे पकड़ी गई इतनी बड़ी खेप?

पूरे मामले का खुलासा एक विदेशी एजेंसी से मिले इनपुट के बाद हुआ। जानकारी मिली थी कि भारत का इस्तेमाल कैप्टागॉन की तस्करी के लिए ट्रांजिट रूट के रूप में किया जा रहा है। इसके बाद NCB ने दिल्ली के नेब सराय इलाके में एक मकान की पहचान की।

11 मई 2026 को यहाँ छापा मारा गया। तलाशी के दौरान एक चपाती कटिंग मशीन में छिपाकर रखी गई करीब 31.5 किलो कैप्टागॉन टैबलेट बरामद हुई। जाँच में पता चला कि यह खेप सऊदी अरब के जेद्दा भेजी जानी थी।

पूछताछ के बाद 14 मई को गुजरात के मुंद्रा पोर्ट स्थित कंटेनर फैसिलिटेशन स्टेशन में एक और बड़ा खुलासा हुआ। वहाँ एक कंटेनर से करीब 196 किलो कैप्टागॉन पाउडर बरामद किया गया। कंटेनर को ‘भेड़ की ऊन’ बताकर सीरिया से भारत लाया गया था।

जाँच एजेंसियों के मुताबिक ड्रग्स को छिपाने के लिए हाईटेक तरीके इस्तेमाल किए जा रहे थे। कहीं चाय की पत्तियों के डिब्बे तो कहीं मशीनों और कार्गो कंटेनर का इस्तेमाल किया गया।

कौन है गिरफ्तार आरोपित और क्या है विदेशी कनेक्शन?

इस मामले में गिरफ्तार आरोपित सीरिया का नागरिक बताया जा रहा है। जाँच में सामने आया कि वह करीब डेढ़ साल पहले भारत पर्यटक वीजा पर आया था लेकिन वीजा खत्म होने के बाद भी अवैध रूप से भारत में रह रहा था।

एजेंसियाँ अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि उसके संबंध किन अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडिकेट से थे। जाँच में हवाला नेटवर्क, समुद्री तस्करी, फर्जी ट्रेड डॉक्यूमेंट और विदेशी हैंडलर्स के एंगल भी देखे जा रहे हैं। NCB को शक है कि भारत का इस्तेमाल सिर्फ ट्रांजिट पॉइंट की तरह किया जा रहा था और असली बाजार मिडिल ईस्ट के देश थे।

क्यों बढ़ रही है चिंता?

सुरक्षा एजेंसियों के लिए कैप्टागॉन सिर्फ एक ड्रग नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा बड़ा खतरा बन चुका है। इसकी वजह है कि यह बहुत तेजी से लत लगाता है, हिंसक व्यवहार बढ़ा सकता है, मानसिक संतुलन बिगाड़ सकता है और इसका कनेक्शन अंतरराष्ट्रीय अपराध नेटवर्क से भी जोड़ा जाता है।

जाँच एजेंसियों के मुताबिक ड्रग्स तस्करी में अब हवाला नेटवर्क, फर्जी दस्तावेज, समुद्री रास्ते और कंटेनर कारोबार का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। भारत में हाल के वर्षों में ड्रग्स तस्करी के कई बड़े मामले सामने आए हैं। एजेंसियों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट अब भारत के बंदरगाहों और व्यापारिक रूट्स का इस्तेमाल बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

सरकार का क्या कहना है?

गृह मंत्री अमित शाह ने साफ कहा है कि भारत में ड्रग्स के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति लागू है। उन्होंने कहा कि देश में आने वाले या भारत की जमीन का इस्तेमाल करके बाहर भेजे जाने वाले हर ड्रग्स पर कार्रवाई होगी।

सरकार ने 2047 तक ‘ड्रग-फ्री इंडिया’ का लक्ष्य रखा है। इसी के तहत NCB, कोस्ट गार्ड, कस्टम और दूसरी एजेंसियाँ समुद्री रास्तों, एयर कार्गो और कंटेनर नेटवर्क पर निगरानी बढ़ा रही हैं।

ऑपरेशन रेजपिल को इसी अभियान की बड़ी सफलता माना जा रहा है। पहली बार भारत में इतनी बड़ी मात्रा में कैप्टागॉन पकड़े जाने से यह साफ हो गया है कि अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडिकेट अब भारत को भी अपने नेटवर्क में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं।

ऐसे में एजेंसियों के सामने चुनौती सिर्फ नशे को रोकने की नहीं बल्कि संगठित अपराध और विदेशी नेटवर्क पर भी शिकंजा कसने की है।

मोदी सरकार ने ऊर्जा आत्मनिर्भरता पर शुरू किया ऐसा काम, देखती रह जाएगी दुनिया: होर्मुज से नहीं पड़ेगा फर्क, जानें किस मिशन पर निकले भारतीय वैज्ञानिक

भारत अब ऊर्जा के क्षेत्र में ऐसी तैयारी कर रहा है, जिसे आने वाले वर्षों में देश की सबसे बड़ी रणनीतिक परियोजनाओं में गिना जा सकता है। मोदी सरकार ने बंगाल की खाड़ी और पूर्वी समुद्री तट के विशाल हिस्सों में तेल और प्राकृतिक गैस की खोज के लिए बड़े स्तर पर समुद्री सर्वे अभियान शुरू करने की तैयारी की है।

इसका मकसद सिर्फ नए तेल और गैस भंडार तलाशना नहीं, बल्कि भारत को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाना भी है। जब भी युद्ध के चलते तेल संकट जैसी स्थितियाँ बनती हैं, तो भारत पर भी उसका असर पड़ता है क्योंकि देश अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। अब भारत इसी निर्भरता को कम करने के मिशन पर निकल चुका है।

आखिर क्या है यह पूरा मिशन और क्यों है इतना अहम?

न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार, इस परियोजना को तकनीकी तौर पर ‘2D ब्रॉडबैंड मरीन सीस्मिक और ग्रैविटी-मैग्नेटिक डेटा सर्वे’ कहा जा रहा है। आसान भाषा में समझें तो वैज्ञानिक समुद्र की सतह के नीचे कई किलोमीटर गहराई तक छिपी चट्टानों और परतों का स्कैन करेंगे, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहाँ तेल और गैस के बड़े भंडार मौजूद हो सकते हैं।

इसके लिए डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ हाइड्रोकार्बन्स ने बड़े स्तर पर योजना तैयार की है। इस मिशन के तहत बंगाल-पूर्णिया बेसिन, महानदी बेसिन, कृष्णा-गोदावरी बेसिन, कावेरी बेसिन और अंडमान समुद्री क्षेत्र में सर्वे किया जाएगा। केवल बंगाल-पूर्णिया और महानदी क्षेत्र में ही लगभग 45 हजार लाइन किलोमीटर सर्वे होना है।

अंडमान और कृष्णा-गोदावरी क्षेत्रों में करीब 43-43 हजार लाइन किलोमीटर और कावेरी क्षेत्र में लगभग 30 हजार लाइन किलोमीटर तक समुद्री अध्ययन किया जाएगा। यह पूरा अभियान करीब दो साल तक चल सकता है।

समुद्र के नीचे आखिर कैसे खोजा जाएगा तेल और गैस?

इस मिशन में अत्याधुनिक सर्वे जहाजों का इस्तेमाल किया जाएगा। ये जहाज अपने पीछे लंबे केबलनुमा उपकरण खींचेंगे, जिन्हें ‘स्ट्रीमर’ कहा जाता है। ये उपकरण समुद्र की तह में शक्तिशाली ध्वनि तरंगें भेजेंगे। जब ये तरंगें नीचे मौजूद चट्टानों से टकराकर वापस लौटेंगी, तो वैज्ञानिक उनके आधार पर समुद्र के नीचे की संरचना का नक्शा तैयार करेंगे।

इसी डेटा से यह समझा जाएगा कि कहाँ ऐसी भूगर्भीय संरचनाएँ मौजूद हैं, जिनमें तेल या प्राकृतिक गैस फंसी हो सकती है। वैज्ञानिक टेक्टॉनिक गतिविधियों, चट्टानी संरचनाओं और करोड़ों साल पुरानी तलछटी परतों का अध्ययन करेंगे। यानी जैसे डॉक्टर शरीर के अंदर देखने के लिए स्कैन करते हैं वैसे ही यहाँ समुद्र की गहराइयों का स्कैन होगा।

किन इलाकों में सबसे ज्यादा उम्मीद और कितना बड़ा हो सकता है खजाना?

विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत के पूर्वी समुद्री क्षेत्र में अब भी बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडार छिपे हो सकते हैं। बंगाल ऑफशोर क्षेत्र में 10 किलोमीटर से ज्यादा मोटी तलछटी परतें पाई गई हैं, जिन्हें तेल और गैस के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यहाँ मायोसीन और ईओसीन काल की चट्टानों में हाइड्रोकार्बन मिलने की संभावना जताई जा रही है।

कई स्थानों पर गैस के शुरुआती संकेत भी मिले हैं। महानदी बेसिन को भी भविष्य का बड़ा ऊर्जा क्षेत्र माना जा रहा है। यहाँ गहरे समुद्री गैस भंडार और जैविक गैस सिस्टम मिलने की संभावना है। वहीं कृष्णा-गोदावरी बेसिन पहले से भारत के बड़े गैस उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है, लेकिन अब उम्मीद है कि इसके गहरे समुद्री हिस्सों में और भी बड़े भंडार हो सकते हैं।

सबसे ज्यादा रणनीतिक महत्व अंडमान बेसिन को दिया जा रहा है। इसकी भूगर्भीय संरचना म्यांमार और इंडोनेशिया के गैस क्षेत्रों से काफी मिलती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अंडमान समुद्री क्षेत्र में भारी मात्रा में प्राकृतिक गैस मौजूद हो सकती है। यहाँ ‘गैस हाइड्रेट्स’ मिलने की भी संभावना है।

यह समुद्र के नीचे जमी हुई मीथेन गैस होती है, जिसे भविष्य का ऊर्जा स्रोत माना जा रहा है। कावेरी बेसिन में पहले से तेल उत्पादन होता रहा है, लेकिन अब वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इसके गहरे समुद्री क्षेत्रों और जुरासिक काल की परतों में बड़े भंडार अब भी मौजूद हो सकते हैं।

बॉम्बे हाई से क्या सीखा भारत और अभी कैसे निकलता है समुद्र से तेल?

भारत पहले से समुद्र से तेल निकालता रहा है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण Bombay High है। यह क्षेत्र मुंबई तट से दूर अरब सागर में स्थित है और 1970 के दशक में यहाँ बड़े तेल भंडार मिलने के बाद भारत की ऊर्जा तस्वीर बदल गई थी। आज भी भारत के समुद्री तेल उत्पादन का बड़ा हिस्सा बॉम्बे हाई से आता है।

समुद्र से तेल निकालने के लिए बड़े ऑफशोर प्लेटफॉर्म लगाए जाते हैं। समुद्र के नीचे ड्रिलिंग कर पाइपलाइन के जरिए तेल और गैस को सतह तक लाया जाता है। फिर इन्हें जहाजों या पाइपलाइन नेटवर्क के जरिए रिफाइनरियों तक पहुँचाया जाता है। लेकिन पूर्वी तट के गहरे समुद्री हिस्से अभी पश्चिमी तट की तुलना में कम खोजे गए हैं। इसी वजह से सरकार अब आधुनिक तकनीक के जरिए इन इलाकों की विस्तृत मैपिंग कर रही है।

इस मिशन पर क्यों रहेगी दुनिया की नजर?

यह परियोजना सिर्फ तेल और गैस खोजने तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा से भी जुड़ी है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने यह दिखा दिया कि ऊर्जा के लिए विदेशों पर ज्यादा निर्भर रहना कितना जोखिम भरा हो सकता है। भारत फिलहाल अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है।

अगर घरेलू उत्पादन बढ़ता है, तो भारत वैश्विक संकटों के असर से काफी हद तक बच सकता है। यही वजह है कि मोदी सरकार इस मिशन को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में सबसे बड़ा कदम मान रही है। बंगाल की खाड़ी और अंडमान के नीचे छिपे संभावित ऊर्जा भंडार अगर उम्मीद के मुताबिक मिले, तो आने वाले वर्षों में भारत न केवल अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा खुद पूरा कर सकेगा, बल्कि एशिया की ऊर्जा राजनीति में भी उसकी स्थिति और मजबूत हो सकती है।

होर्मुज संकट के बीच भारत ने मजबूत किया अपना तेल भंडार, PM मोदी की UAE यात्रा पर पेट्रोल-डीजल से LNG-PNG तक मिला सुरक्षा कवच: जानें सब कुछ

भारत और UAE के बीच हुआ नया ऊर्जा समझौता सिर्फ एक कारोबारी डील नहीं, बल्कि आने वाले समय में भारत की एनर्जी सिक्योरिटी को मजबूत करने वाला बड़ा रणनीतिक कदम माना जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की UAE यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच यह समझौता हुआ, जिसके तहत UAE की सरकारी तेल कंपनी ADNOC भारत के स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व में 30 मिलियन बैरल तक कच्चा तेल स्टोर करेगी।

इस समझौते का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि अगर दुनिया में युद्ध, तनाव या सप्लाई संकट पैदा हो जाए, तब भी भारत के पास तेल का पर्याप्त बैकअप मौजूद रहे।

क्या है पूरा समझौता?

भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अगर किसी वजह से तेल की सप्लाई रुक जाए तो देश की अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ सकता है। इसी खतरे को कम करने के लिए भारत ने जमीन के नीचे बड़े-बड़े तेल भंडार यानी स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) बनाए हैं।

अब UAE की कंपनी ADNOC भारत के इन रिजर्व में अपना तेल रखेगी। यह स्टोरेज मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम और कर्नाटक के पादुर व मैंगलोर जैसे केंद्रों में होगा। भविष्य में ओडिशा के चाँदी खोल प्रोजेक्ट में भी UAE की भागीदारी हो सकती है।

इस समझौते के तहत सिर्फ कच्चे तेल पर ही नहीं, बल्कि LPG और LNG स्टोरेज को लेकर भी सहयोग बढ़ाने की बात हुई है। दोनों देशों ने लंबे समय तक LPG सप्लाई जारी रखने को लेकर भी करार किया है।

स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व क्या होता है?

आसान भाषा में समझें तो स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व यानी आपातकालीन तेल भंडार। जिस तरह घरों में लोग मुश्किल समय के लिए राशन जमा करके रखते हैं, उसी तरह देश भी संकट के वक्त इस्तेमाल के लिए तेल जमा करके रखते हैं।

अगर युद्ध हो जाए, समुद्री रास्ते बंद हो जाएँ या अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की भारी कमी आ जाए, तब यही रिजर्व देश की जरूरतें पूरी करते हैं। भारत के पास फिलहाल करीब 5.3 मिलियन टन का स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व है, जो विशाखापत्तनम, मैंगलोर और पादुर में मौजूद है।

अब UAE के 30 मिलियन बैरल तेल स्टोर होने से यह क्षमता करीब 70 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। सरकार पहले ही ओडिशा के चाँदी खोल और पादुर में नए रिजर्व बनाने की मंजूरी दे चुकी है। यानी आने वाले सालों में भारत का तेल बैकअप और मजबूत होने वाला है।

भारत को इससे क्या फायदा होगा?

इस समझौते का सबसे बड़ा फायदा भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मिलेगा। अगर पश्चिम एशिया में युद्ध या तनाव बढ़ता है और तेल सप्लाई प्रभावित होती है, तब भी भारत के पास पहले से जमा तेल मौजूद रहेगा। इससे देश में पेट्रोल-डीजल की भारी कमी या कीमतों में अचानक उछाल जैसी स्थिति को काफी हद तक रोका जा सकेगा।

दूसरा बड़ा फायदा यह है कि भारत को तेल की लगातार उपलब्धता सुनिश्चित होगी। UAE पहले से भारत के सबसे बड़े तेल सप्लायर देशों में शामिल है। अब भारत की जमीन पर ही उसका तेल स्टोर होने से सप्लाई और ज्यादा भरोसेमंद हो जाएगी।

तीसरा फायदा रणनीतिक स्तर पर है। अगर किसी संकट के दौरान पड़ोसी देशों को मदद की जरूरत पड़े, तो भारत उनके लिए भी सप्लाई सपोर्ट देने की स्थिति में आ सकता है। इससे क्षेत्र में भारत की ताकत और प्रभाव दोनों बढ़ेंगे।

होर्मुज संकट के बीच भारत के लिए राहत

यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ रहा है। ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच चल रहे तनाव की वजह से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर खतरा बना हुआ है। दुनिया का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से तेल सप्लाई करता है। अगर यहाँ संकट बढ़ता है तो पूरी दुनिया में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं।

इसी खतरे को देखते हुए UAE ने फुजैराह तक अपनी नई पाइपलाइन परियोजना को तेजी से पूरा करने का फैसला किया है ताकि तेल निर्यात के लिए होर्मुज पर निर्भरता कम की जा सके।

भारत के लिए राहत की बात यह है कि अब उसका बड़ा तेल स्टॉक पहले से ही देश के भीतर मौजूद रहेगा। यानी समुद्री रास्ते प्रभावित होने पर भी भारत के पास बैकअप तैयार रहेगा।

सिर्फ तेल नहीं, निवेश और रक्षा साझेदारी भी मजबूत

पीएम मोदी और UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की मुलाकात में सिर्फ ऊर्जा सहयोग ही नहीं, बल्कि रक्षा, निवेश, टेक्नोलॉजी और व्यापार को लेकर भी कई अहम समझौते हुए।

UAE ने भारत में 5 अरब डॉलर के निवेश का ऐलान किया है। इसमें बैंकिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर और फाइनेंस सेक्टर में बड़े निवेश शामिल हैं। इसके अलावा दोनों देशों ने रक्षा सहयोग, साइबर सिक्योरिटी और समुद्री सुरक्षा बढ़ाने पर भी सहमति जताई।

जिस जमीन पर कब्जा कर बनाई दुकानें, अब वहाँ मुस्लिम करते हैं हिंदू लड़कियों से अश्लीलता: पहले भी 9 लोग कर चुके हैं नाबालिग से गैंगरेप, गुजरात के खेड़ा का मामला

गुजरात के खेड़ा जिले के चांदणा गाँव में अवैध कब्जा और हिंदू महिलाओं के साथ अभद्रता किए जाने का मामला सामने आया है। गाँव के बीचों-बीच खाली पड़ी जमीन पर मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों द्वारा कब्जा कर लिया गया है और वहाँ अवैध रूप से दुकानें बना दी गई हैं। हिंदू समाज के लोगों का आरोप है कि इन दुकानों पर मुस्लिम युवकों के समूह इकट्ठा होते हैं और वहाँ से गुजरने वाली हिंदू महिलाओं और युवतियों को देखकर अश्लील इशारे और अभद्र टिप्पणियाँ करते हैं। स्थानीय हिंदुओं ने इस मामले में कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर अवैध कब्जा हटाने की माँग की है।

ग्रामीणों ने माँग की है कि इन अवैध कब्जों को तुरंत हटाया जाए और गाँव में सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। आवेदन पत्र की एक कॉपी ऑपइंडिया के पास भी मौजूद है। आवेदन में कहा गया है कि गाँव के मध्य स्थित खाली जमीन पर मुस्लिम समाज द्वारा पिछले कई वर्षों से अवैध कब्जा कर निर्माण कर दिया गया है। वहीं, व्यापार-व्यवसाय के नाम पर कई दुकानें भी खड़ी कर दी गई हैं।

ग्रामीणों का आरोप है कि इन दुकानों के पास से गुजरने वाले सार्वजनिक रास्ते से सुबह-शाम हिंदू समाज की महिलाएँ और लड़कियाँ आती-जाती हैं। इसी दौरान वहाँ कुछ मुस्लिम युवक इकट्ठा होते हैं और अश्लील भाषा का प्रयोग करते हुए अभद्र टिप्पणियाँ और इशारे करते हैं। दुकानों के पास हिंदू समाज के कई मंदिर और चबूतरा चौक भी स्थित हैं। यहाँ नवरात्रि गरबा, भाठीजी महाराज के गरबा, रामधून और रामदेवजी के भजन जैसे धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

आरोप है कि इन धार्मिक आयोजनों के दौरान भी मुस्लिम युवक देर रात तक दुकानें खुली रखते हैं और वहाँ आने-जाने वाले लोगों पर कटाक्ष करते हुए अभद्र टिप्पणियाँ करते हैं। हिंदू समाज के लोगों ने पहले हुई घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि नवरात्रि के दौरान गरबा खेलने आने वाली महिलाओं, बहनों और लड़कियों के छिपकर वीडियो और फोटो भी बनाए जाते हैं जिसके चलते पहले भी तनाव और विवाद की स्थिति पैदा हो चुकी है।

ग्रामीणों का कहना है कि अब यह जगह एक तरह का ‘हब’ बन चुकी है, जहाँ गाँव में आने-जाने वाली हिंदू महिलाओं और लड़कियों को गलत नजर से देखा जाता है, उन पर अभद्र टिप्पणियाँ की जाती हैं। जब वे आसपास की दुकानों पर सामान लेने जाती हैं तो उनका पीछा करने जैसी घटनाएँ भी आए दिन सामने आ रही हैं।

प्रशासन ने नोटिस लगाकर माँगे दस्तावेज: स्थानीय हिंदू

ऑपइंडिया से बातचीत में स्थानीय हिंदू संगठन के पदाधिकारी धवलसिंह झाला ने बताया कि पिछले 3 वर्षों से आरोपित हिंदू लड़कियों और महिलाओं को परेशान कर रहे थे। उनका कहना था कि गाँव के बीचों-बीच जमीन पर कब्जा कर वहाँ अवैध निर्माण कर दिए गए थे। उन्होंने बताया कि तीन साल पहले नवरात्रि के दौरान भी इस मुद्दे को लेकर तनाव की स्थिति बनी थी। वहीं इस बार नवरात्रि में मुस्लिम युवक बाइक लेकर कार्यक्रम स्थल के बीच से गुजरते थे, तेज आवाज में बाइक चलाते थे और अश्लील हरकतें करते थे।

उन्होंने आगे कहा कि हाल ही में गाँव में एक हिंदू नाबालिग लड़की के साथ कई मुस्लिम युवकों द्वारा सामूहिक दुष्कर्म किए जाने की घटना भी सामने आई थी। इस घटना के बाद गाँव के हिंदू समाज ने पूरे मामले की गहराई से जाँच की और दस्तावेजों की पड़ताल की। जाँच के दौरान आधिकारिक रूप से यह सामने आया कि मुस्लिम समुदाय के लोगों ने गाँव की खाली पड़ी जमीन पर कब्जा कर अवैध निर्माण कर लिए हैं।

उन्होंने आगे जानकारी देते हुए बताया कि फिलहाल प्रशासन ने सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया है। इसके अलावा जिला प्रशासन ने अवैध दुकानों पर नोटिस चस्पा कर संबंधित लोगों को तुरंत दस्तावेज और सबूत पेश करने का आदेश दिया है। कहा गया है कि यदि वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए तो जिला प्रशासन की ओर से कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

नाबालिग हिंदू के साथ हाल ही में हुआ गैंगरेप

गौरतलब है कि हाल ही में इसी गाँव में एक 17 वर्षीय हिंदू नाबालिग के साथ तीन साल तक गैंगरेप और ब्लैकमेलिंग का एक मामला सामने आया। पीड़िता की माँ की शिकायत के आधार पर खेड़ा टाउन पुलिस स्टेशन में 9 मुस्लिम पुरुषों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। पुलिस के अनुसार, मुख्य आरोपित परवेज पठान ने पहले नाबालिग को अपने जाल में फँसाया, उसकी अश्लील तस्वीरें और वीडियो बनाए और फिर उसे धमकाकर बार-बार उसके साथ रेप किया। शिकायत के अनुसार, परवेज ने नाबालिग को अपने अन्य मुस्लिम दोस्तों के हवाले भी कर दिया था और 2023 से 2025 के बीच अलग-अलग लोगों ने उसके साथ रेप किया।

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि आरोपितों ने नाबालिग को बार-बार धमकी दी कि अगर उसने उनकी बात नहीं मानी, तो वे उसकी तस्वीरें और वीडियो वायरल कर देंगे और उसे बदनाम कर देंगे। आखिरकार पीड़िता परेशान हो गई और उसने आत्महत्या करने की बात कही जिसके बाद यह पूरा मामला परिवार के सामने आया। इसके बाद, 17 अप्रैल 2026 को एक शिकायत दर्ज की गई थी।

(यह खबर मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

ट्रंप ने कचरे में फेंके चीनी गिफ्ट, फोन भी तोड़कर किए नष्ट: लैपटॉप तक बीजिंग नहीं ले गए अधिकारी, पढ़ें- जासूसी के डर और ‘डिजिटल लॉकडाउन’ की पूरी कहानी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील दौरे पर चीन की राजधानी बीजिंग पहुँचे थे। यह दौरा 2 दिन का था। इस ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन में ट्रंप के साथ अमेरिका के सबसे बड़े बिजनेस लीडर्स और शीर्ष अधिकारी मौजूद थे। लेकिन कैमरे के सामने दिखने वाली दोस्ती के पर्दे के पीछे एक डिजिटल जंग चल रही थी।

चीन दौरे पर जासूसी और हैकिंग का बहुत बड़ा डर देखने को मिला। इसी डर की वजह से अमेरिकी टीम के लिए एक सख्त ‘डिजिटल लॉकडाउन’ लागू कर दिया था। चीन से वापस लौटते समय अमेरिकी अधिकारियों और पत्रकारों को मिले सभी तोहफे, बैज और पिन विमान पर चढ़ने से पहले ही एयरपोर्ट पर एक कचरे के डिब्बे में फेंकने पड़े।

इसके अलावा, अमेरिकी टीम का कोई भी सदस्य अपना पर्सनल मोबाइल या लैपटॉप चीन लेकर ही नहीं गया था। वहाँ बातचीत के लिए सिर्फ कुछ समय वाले अस्थाई ‘बर्नर फोन’ इस्तेमाल किए गए थे, जिन्हें बाद में पूरी तरह नष्ट करने का आदेश दिया गया। साफ-साफ कहें तो अमेरिका को डर था कि चीन इन गिफ्ट्स और फोन के जरिए उनकी खुफिया बातें सुन सकता है या उनका डेटा चोरी कर सकता है।

एयरपोर्ट पर सीढ़ियों के पास रखा गया डस्टबिन, ‘नो चाइना आइटम’ रूल

विमान पर चढ़ने से पहले सभी अमेरिकी अधिकारियों और पत्रकारों को साफ कह दिया गया था कि वे चीन से मिला कोई भी सामान प्लेन के अंदर नहीं ले जा सकते। सुरक्षा नियमों के कारण पूरी टीम को चीन की तरफ से मिले तोहफे, पास और कोट पर लगाने वाले सरकारी पिन वहीं रखे एक डिब्बे में फेंकने पड़े।

चीन में कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, एप्पल के मालिक टिम कुक और एनवीडिया के प्रमुख जेन्सेन हुआंग जैसे बड़े दिग्गज ये पिन लगाए हुए दिखे थे, लेकिन जासूसी के डर से बाद में इन सभी चीजों को कूड़ेदान में डाल दिया गया।

पर्सनल फोन-लैपटॉप घर छोड़े, सिर्फ ‘बर्नर फोन’ का हुआ इस्तेमाल

साइबर एक्सपर्ट्स का कहना है कि चीन में मोबाइल और लैपटॉप से डेटा चोरी करना या उनमें वायरस डालना बहुत आसान है। वहाँ फोन बंद होने पर भी हैक किया जा सकता है। इसी बड़ी खतरे से बचने के लिए अमेरिकी टीम अपने असली फोन और लैपटॉप घर पर ही छोड़ गई थी।

चीन में काम चलाने के लिए उन्होंने सिर्फ कुछ दिनों के लिए अस्थाई ‘बर्नर फोन’ का इस्तेमाल किया था। बाद में इन फोन्स को भी पूरी तरह नष्ट करने का आदेश दिया गया ताकि चीन भविष्य में भी उनकी बातें न सुन सके और जासूसी का कोई खतरा न रहे।

चीन में हर चीज पर नजर, होटल के Wi-Fi और चार्जर से भी दूरी

अमेरिका के सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन एक ‘मास सर्विलांस स्टेट’ है यानी वहाँ हर एक गतिविधि पर सरकार की नजर रहती है। सुरक्षा अधिकारियों ने डेलिगेशन को साफ चेतावनी दी थी कि चीन में कोई भी इलेक्ट्रॉनिक बातचीत सुरक्षित नहीं है। अधिकारियों को होटल के वाई-फाई नेटवर्क से कनेक्ट करने या किसी भी सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन का इस्तेमाल करने से मना किया गया था।

ऐसा ‘जूस जैकिंग’ के खतरे को देखते हुए किया गया, जिसमें चार्जिंग पोर्ट के जरिए फोन का डेटा चोरी कर लिया जाता है। अमेरिकी दल केवल अमेरिका से साथ लाए गए सरकारी प्रमाणित चार्जर और पावर बैंक का ही इस्तेमाल कर रहा था। इस डिजिटल लॉकडाउन के कारण अधिकारियों के रोजमर्रा के काम भी प्रभावित हुए क्योंकि वे क्लाउड स्टोरेज या अपने निजी अकाउंट्स का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे। कई बेहद संवेदनशील संदेशों को डिजिटल रूप से भेजने के बजाय अधिकारियों ने आपस में आमने-सामने (इन-पर्सन) बात करके साझा किया।

बंद दरवाजों के पीछे तीखी बहस और सुरक्षा पर टकराव

बाहर से देखने पर भले ही ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकात बहुत अच्छी लग रही थी, लेकिन दोनों देशों के सुरक्षा अधिकारियों के बीच अंदर ही अंदर भारी तनाव चल रहा था। जब वे बीजिंग के मशहूर ‘टेंपल ऑफ हीवन’ देखने गए, तो चीनी अधिकारियों ने अमेरिका के एक सुरक्षा एजेंट को अंदर जाने से रोक दिया क्योंकि उसके पास नियम के मुताबिक हथियार था।

इस बात पर दोनों पक्षों में करीब डेढ़ घंटे तक तीखी बहस हुई, जिससे वहाँ मौजूद मीडिया का काम भी देर से शुरू हुआ। यही नहीं, जब ट्रंप वापस लौटने लगे तब भी चीनी सुरक्षाकर्मियों ने अमेरिकी पत्रकारों की गाड़ियों को राष्ट्रपति के काफिले में शामिल होने से रोक दिया था, जिसके बाद अमेरिकी अफसरों को बीच-बचाव करके रास्ता साफ कराना पड़ा।

‘हम भी उन पर जमकर जासूसी करते हैं’- ट्रंप का बयान

चीन से वापसी के दौरान जब एयर फोर्स वन विमान हवा में था, तब पत्रकारों ने डोनाल्ड ट्रंप से पूछा कि क्या उन्होंने शी जिनपिंग के सामने साइबर हमलों का मुद्दा उठाया था? इस पर ट्रंप ने स्वीकार किया कि दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ जासूसी अभियानों में लगे हुए हैं। ट्रंप ने संवाददाताओं से कहा, “शी जिनपिंग ने उन साइबर हमलों के बारे में बात की जो हमने चीन में किए थे। जो वे करते हैं, वही हम भी करते हैं। हम भी उन पर जमकर जासूसी करते हैं।”

ट्रंप ने आगे दावा किया कि उन्होंने शी जिनपिंग से आमने-सामने कहा, “हम आपके खिलाफ ऐसी बहुत सी चीजें करते हैं जिनके बारे में आपको भनक तक नहीं है।” हालाँकि, अमेरिकी खुफिया एजेंसियाँ चीन के ‘वोल्ट टाइफून’ और ‘साल्ट टाइफून’ जैसे हैकिंग समूहों पर अमेरिकी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाने का आरोप लगाती रही हैं, जबकि चीन ने हमेशा इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि वह कानूनन डेटा प्राइवेसी का सम्मान करता है।

पेट्रोल पर मोदी सरकार को कोस रही कॉन्ग्रेस, लेकिन UPA सरकार की नीतियाँ मौजूदा वैश्विक हालात में लाती बर्बादी: जानें तेल बांड से घाटा छिपाना कैसे पड़ता देश पर भारी

पश्चिम एशिया संकट और हॉर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी की वजह से ईंधन की कीमतों पर भारी दबाव पड़ रहा है। ऐसे में मोदी सरकार ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों में सिर्फ ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है। हालाँकि दुनिया के अन्य देशों की तुलना में ये बढ़ोतरी नाममात्र की है, लेकिन इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस पार्टी और उसके नेता लगातार मोदी सरकार को निशाना बना रही है।

कॉन्ग्रेस पार्टी का आरोप है कि पीएम मोदी ने जनता पर कोड़ा बरसा दिया है। कॉन्ग्रेस ने यह भी आरोप लगाया कि यह फैसला जानबूझकर विधानसभा चुनाव खत्म होने तक टाल दिया गया था।

राहुल गाँधी ने कहा, “जनता मोदी सरकार की गलती की कीमत चुकाएगी। तीन रुपए का झटका तो आ गया, बाकी रिकवरी किस्तों में होगी।” इससे पहले 28 अप्रैल को उन्होंने कहा था, “चुनावी राहत खत्म, महंगाई की आग आने वाली है! 29 अप्रैल के बाद सावधान- पेट्रोल, डीजल, सब महँगा हो जाएगा।” उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि जब तेल सस्ता था तब मुनाफा कमाया और अब बोझ जनता पर डाल दिया।

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी इसे ‘मोदी सरकार द्वारा निर्मित संकट’ बताते हुए नेतृत्व की कमी और अक्षमता को जिम्मेदार ठहराया। कॉन्ग्रेस के अन्य नेता भी इसी सुर में सुर मिला रहे हैं।

विपक्षी पार्टी के ऐसे हमले इतिहास को सुविधानुसार भुला देते हैं। इस संदर्भ में यूपीए काल की वित्तीय चालाकी को दोबारा याद करना जरूरी है, जिसने देश पर लाखों करोड़ की टाली गई जिम्मेदारी (Deferred Liability) को थोपकर घाटे को छिपाया गया।

UPA के दौर में तेल बांड से छिपाया जाता था वित्तीय घाटा

विपक्ष के ये हमले इतिहास को बड़ी सफाई से नजरअंदाज कर रहे हैं। इस संदर्भ में यूपीए (UPA) काल की उस “वित्तीय जालसाजी” को याद करना जरूरी है, जिसने देश पर लाखों करोड़ रुपये का बोझ लाद दिया था।

ऑयल बॉन्ड को बनाया था राजकोषीय घाटा छिपाने का हथियार

यूपीए सरकार ने पेट्रोल, डीजल, केरोसिन और एलपीजी पर सब्सिडी देने के लिए तेल कंपनियों को विशेष ‘ऑयल बॉन्ड’ जारी किए थे। बजट से सब्सिडी देने के बजाय, डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को ये बॉन्ड थमा दिए, जो बाद में देश के लिए एक महँगा कर्ज बन गए।

उपभोक्ताओं को राहत देने के बजाय, यूपीए के इन ऑयल बॉन्ड ने अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुँचाया और कर्ज चुकाने का सारा बोझ आने वाली सरकार पर डाल दिया। इसके विपरीत, मोदी सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर फिर से अंधाधुंध सब्सिडी देने से इनकार कर दिया, जो वित्तीय अनुशासन का एक मॉडल है, खासकर तब जब पूरी दुनिया वैश्विक संकट से जूझ रही है।

भविष्य की पीढ़ी पर लादा ₹3 लाख करोड़ का बोझ

साल 2005 से 2010 के बीच, यूपीए सरकार ने तेल कंपनियों को लगभग ₹1.48 लाख करोड़ के ऑयल बॉन्ड जारी किए। ये साधारण कर्ज नहीं थे। बजट से नकद सब्सिडी देने के बजाय, सरकार ने लंबी अवधि की प्रतिभूतियां (Sovereign Securities) जारी कीं।

इन बॉन्डों की अवधि 15 से 20 वर्ष थी और ब्याज दर 7 से 8.4 प्रतिशत तक थी। कागजों पर तो राजकोषीय घाटा कम दिखा, क्योंकि सब्सिडी बजट का हिस्सा नहीं थी, लेकिन हकीकत में यह भविष्य के करदाताओं के साथ धोखा था।

यूपीए सरकार के इस रवैये ने अर्थव्यवस्था को कई मोर्चों पर चोट पहुँचाई, जिसमें-

  • वित्तीय भ्रम: यूपीए ने घाटे को छिपाकर लक्ष्यों को पूरा करने का दिखावा किया, जबकि कच्चा तेल 147 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गया था। केवल ब्याज भुगतान ने ही दो दशकों में ₹1.70 लाख करोड़ जोड़ दिए, जिससे कुल भुगतान (मूलधन + ब्याज) ₹3 लाख करोड़ से ऊपर निकल गया।
  • विकास कार्यों में कटौती: सरकार को हर साल सिर्फ ब्याज चुकाने के लिए ₹10,000 करोड़ अलग रखने पड़े। यह पैसा बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य या शिक्षा पर खर्च हो सकता था।
  • तेल कंपनियों की बदहाली: तेल कंपनियों के पास नकदी के बजाय ऐसे बॉन्ड रह गए जिन्हें वे भुना नहीं सकती थीं। इससे रिफाइनिंग क्षमता और विस्तार में उनकी निवेश क्षमता घट गई।

सब्सिडी के बावजूद आसमान छूती थीं कीमतें

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन बॉन्डों से आम जनता को कोई खास राहत नहीं मिली। यूपीए के 10 सालों में कीमतें लगातार बढ़ती रहीं। 2004 में दिल्ली में पेट्रोल ₹34 प्रति लीटर था, जो 2014 तक ₹72 पार कर गया (118% की वृद्धि)। डीजल ₹22 से बढ़कर ₹55 हो गया (155% से अधिक की वृद्धि)। 2012 में तो एक ही झटके में पेट्रोल के दाम 8 रुपए बढ़ा दिए गए थे।

मोदी सरकार ने चुकाया यूपीए का ‘क्रेडिट कार्ड’ बिल

यूपीए द्वारा जारी किए गए ज्यादातर ऑयल बॉन्ड 2014 के बाद परिपक्व (Mature) हुए। असली भुगतान का भारी बोझ (सालाना हजारों करोड़ रुपये) मोदी सरकार के कंधों पर आया। इस साल मार्च तक, मोदी सरकार ने इन बॉन्डों की आखिरी किश्तें चुकाकर लगभग ₹3.20 लाख करोड़ का कुल दायित्व खत्म कर दिया है।

जहाँ यूपीए ने ₹1.48 लाख करोड़ के बॉन्ड जारी किए और मूलधन के रूप में केवल ₹13,764 करोड़ चुकाए, वहीं डॉ. मनमोहन सिंह सरकार ने 2014 तक ब्याज के तौर पर ₹68,750 करोड़ का भारी भुगतान किया।

कुल मिलाकर, ₹1.48 लाख करोड़ के बॉन्ड के लिए सरकारी खजाने से ₹1.71 लाख करोड़ का केवल ब्याज चुकाया गया है। 2014 से 2026 के बीच मोदी सरकार ने कुल ₹2.36 लाख करोड़ (मूलधन + ब्याज) का भुगतान किया है।

यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं थी। जब वैश्विक तेल कीमतें कम थीं, तब भी सरकार ने एक्साइज ड्यूटी कम नहीं की और उस राजस्व का उपयोग यूपीए के इन पुराने घावों (ऑयल बॉन्ड) को भरने के लिए किया।

मौजूदा समय की चुनौतियाँ और जमीनी वैश्विक हकीकत

दिल्ली में पेट्रोल ₹97.77 और डीजल ₹90.67 प्रति लीटर है। ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर पार कर 126 डॉलर तक पहुँच चुका है। पश्चिम एशिया के तनाव ने दुनिया के समुद्री तेल व्यापार के एक चौथाई हिस्से को बाधित कर दिया है। यूरोप से लेकर चीन और जापान तक, हर देश इसकी मार झेल रहा है। भारत, जो अपनी जरूरत का 85% कच्चा तेल आयात करता है, इस वैश्विक हकीकत से अछूता नहीं रह सकता।

मोदी सरकार का फैसला कि वह फिर से सब्सिडी के जाल में नहीं फंसेगी, आर्थिक रूप से सही कदम है। 2014 और 2016 में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को बाजार से जोड़ने के कारण अब स्वचालित समायोजन (Automatic Adjustment) होता है, जिससे तेल कंपनियों को घाटा नहीं होता।

कॉन्ग्रेस की रणनीति न दोहराने से देश को फायदा है। यूपीए का अनुभव बताता है कि वित्तीय देनदारियों को टालना कोई राहत नहीं है, बल्कि यह ब्याज के साथ आने वाला ‘विलंबित दर्द’ है। कॉन्ग्रेस अपनी याददाश्त खोकर राजनीतिक लाभ खोज सकती है, लेकिन रिकॉर्ड साफ है कि यूपीए ने जो बिल उधार छोड़ा था, उसे मोदी सरकार ने चुकाया। देश को आज के संकट का सामना आज ही करना होगा, इसे भविष्य के लिए टाला नहीं जा सकता।

(ये रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

NEET 2026 पेपर लीक में बड़ा खुलासा, परिवारों ने लाखों रुपए देकर खरीदे क्वेश्चन पेपर: 700 छात्रों तक पहुँचा नेटवर्क, पढ़ें- CBI जाँच तक हुए कौन से खुलासे

देश की सबसे मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET-UG 2026 का पेपर लीक मामला अब सिर्फ एक परीक्षा घोटाला नहीं, बल्कि एक बड़े संगठित नेटवर्क का चेहरा बनकर सामने आया है।

राजस्थान, हरियाणा, महाराष्ट्र, केरल और उत्तराखंड तक फैले इस रैकेट ने लाखों छात्रों के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जाँच एजेंसियों के मुताबिक पेपर परीक्षा से पहले व्हाट्सएप, टेलीग्राम और प्रिंट कॉपी के जरिए छात्रों तक पहुँचाया गया। आरोप है कि लाखों रुपए लेकर प्रश्नपत्र बेचे गए और कई छात्रों ने पैसे देकर परीक्षा में फायदा उठाने की कोशिश की।

सबसे ज्यादा चर्चा राजस्थान के बिवाल परिवार को लेकर हो रही है, जहाँ एक ही परिवार के कई सदस्यों के मेडिकल कॉलेज में चयन के बाद अब जाँच एजेंसियाँ पुराने रिजल्ट तक खंगाल रही हैं।

इस पूरे मामले में कई गिरफ्तारियाँ हो चुकी हैं, जिसमें RJD के नेशनल सेक्रेटरी संतोष कुमार जायसवाल को गिरफ्तार किया गया है, जिसे जाँच एजेंसियाँ पूरे नेटवर्क का मास्टरमाइंड मान रही हैं। CBI अब यह पता लगाने में जुटी है कि आखिर पेपर सबसे पहले लीक कहाँ से हुआ और इसमें कौन-कौन शामिल था।

30 लाख में हुआ सौदा, परिवार से शुरू हुआ पूरा खेल

जाँच में सामने आया है कि जयपुर के जमवारामगढ़ निवासी दो भाइयों मांगीलाल बिवाल और दिनेश बिवाल ने गुरुग्राम के एक डॉक्टर से करीब 30 लाख में NEET-UG 2026 का पेपर खरीदा था।

आरोप है कि यह पेपर सबसे पहले परिवार के बच्चों को दिया गया और फिर आगे बेचकर करोड़ों का खेल शुरू हुआ। CBI और राजस्थान SOG की जाँच के मुताबिक दिनेश बिवाल ने अपने बेटे ऋषि बिवाल और रिश्तेदारों के लिए पेपर मंगवाया था।

इसके बाद यह पेपर सीकर के कोचिंग नेटवर्क और छात्रों तक पहुँचाया गया। जाँच एजेंसियों का दावा है कि पेपर व्हाट्सएप, PDF, टेलीग्राम चैट और प्रिंट कॉपी के जरिए बड़े स्तर पर फैलाया गया।

सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ जब जाँच में पता चला कि यह पेपर करीब 700 छात्रों तक पहुँच चुका था। देहरादून से गिरफ्तार आरोपित राकेश मंडवारिया पर आरोप है कि उसने इस पेपर को बड़े पैमाने पर छात्रों में बाँटा।

ऋषि बिवाल की मार्कशीट ने खड़े किए बड़े सवाल

इस मामले में सबसे ज्यादा चर्चा ऋषि बिवाल की मार्कशीट को लेकर हो रही है। जाँच एजेंसियों के हाथ लगी राजस्थान बोर्ड की मार्कशीट के अनुसार ऋषि मुश्किल से 12वीं पास कर पाया था।

मार्कशीट के मुताबिक उसे फिजिक्स थ्योरी में सिर्फ 9 नंबर, केमिस्ट्री में 15 नंबर और बायोलॉजी में 20 नंबर मिले थे। कुल 500 में 254 नंबर लेकर वह ‘ग्रेस मार्क्स द्वारा सेकंड डिवीजन’ से पास हुआ था। जाँच में यह भी सामने आया कि पेपर मिलने के बावजूद ऋषि NEET में सिर्फ 107 नंबर ही ला सका।

क्या 2025 में भी हुआ था यही खेल?

CBI अब सिर्फ 2026 ही नहीं, बल्कि 2025 के NEET रिजल्ट की भी जाँच कर रही है। आरोप है कि बिवाल परिवार ने पिछले साल भी पेपर खरीदकर अपने पाँच बच्चों का मेडिकल कॉलेज में चयन करवाया था।

जाँच के दायरे में विकास बिवाल, प्रगति बिवाल, सानिया बिवाल, पलक बिवाल और गुंजन बिवाल के नाम शामिल हैं। बताया जा रहा है कि इन सभी ने सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन लिया है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इन छात्रों की तस्वीरें सीकर के ‘दीप कैरियर इंस्टीट्यूट’ के बड़े पोस्टरों में लगाई गई थीं, जिन पर लिखा था सिलेक्शन नहीं तो पैसे वापस। हालाँकि रिजल्ट आने के कुछ समय बाद ही यह कोचिंग संस्थान अचानक बंद हो गया।

सीकर की चर्चित CLC कोचिंग का नाम भी जाँच में सामने आया। लेकिन संस्थान के मैनेजिंग डायरेक्टर श्रवण चौधरी ने दावा किया कि बिवाल परिवार का कोई सदस्य रेगुलर क्लासरूम कोर्स में नहीं पढ़ता था।

उनका कहना है कि सभी छात्रों ने सिर्फ टेस्ट सीरीज जॉइन की थी। उन्होंने साफ कहा कि अगर किसी छात्र के अभिभावक बाहर से पेपर खरीदकर लाते हैं, तो उसमें कोचिंग संस्थान की भूमिका नहीं हो सकती। फिर भी जाँच एजेंसियाँ सीकर के कई कोचिंग संस्थानों और उनके नेटवर्क की जाँच कर रही हैं।

कैसे फैला पेपर? नासिक से गुरुग्राम और फिर पूरे देश तक

जाँच एजेंसियों के मुताबिक पेपर का असली सोर्स महाराष्ट्र के नासिक की एक प्रिंटिंग प्रेस हो सकता है। वहाँ से यह गुरुग्राम के एक डॉक्टर तक पहुँचा और फिर राजस्थान के नेटवर्क में शामिल लोगों के जरिए फैलाया गया। इसके बाद पेपर सीकर, जयपुर, देहरादून, केरल, बिहार, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड तक पहुँचा।

जाँच में सामने आया कि परीक्षा से पहले गेस पेपर के नाम पर 140 से ज्यादा सवाल छात्रों तक पहुँचाए गए थे, जिनमें से बड़ी संख्या असली पेपर से मैच कर गई। बताया जा रहा है कि परीक्षा से दो दिन पहले यह पेपर 5-5 लाख रुपए में बेचा गया, जबकि परीक्षा से एक रात पहले इसे 50-50 हजार रुपए तक में बाँटा गया ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों से पैसा कमाया जा सके।

व्हाट्सएप और टेलीग्राम बना पेपर लीक का सबसे बड़ा जरिया

CBI के मुताबिक पेपर सबसे पहले PDF फॉर्म में व्हाट्सएप और टेलीग्राम के जरिए भेजा गया। बाद में इसके प्रिंट निकालकर ऑफलाइन भी बेचे गए। जाँच एजेंसियों को आरोपितों के मोबाइल फोन से कई चैट, PDF और डिजिटल सबूत मिले हैं।

डिलीट किए गए डेटा की भी फोरेंसिक जाँच की जा रही है। CBI अब पैसों के लेन-देन, बैंक अकाउंट, मोबाइल डेटा और सोशल मीडिया चैट खंगाल रही है।

आत्महत्या के मामलों ने बढ़ाई चिंता

NEET परीक्षा रद्द होने के बाद छात्रों पर मानसिक दबाव भी साफ दिखाई दे रहा है। गोवा और उत्तर प्रदेश से दो छात्रों की आत्महत्या की खबरों ने पूरे देश को झकझोर दिया।

गोवा के कर्टोरिम में 17 साल के छात्र ने आत्महत्या कर ली। बताया गया कि वह परीक्षा रद्द होने के बाद बेहद तनाव में था। उसने एक नोट भी छोड़ा जिसमें लिखा था कि वह अब प्रतियोगी परीक्षाएँ नहीं देना चाहता।

वहीं उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में 20 साल के छात्र ने भी आत्महत्या कर ली। परिवार का कहना है कि परीक्षा रद्द होने के बाद वह लगातार मानसिक तनाव में था। यह उसका तीसरा प्रयास था और उसे इस बार चयन की उम्मीद थी।

अब सरकार क्या करने जा रही है?

केंद्र सरकार ने इस पूरे मामले को गंभीर बताते हुए सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने घोषणा की है कि NEET-UG 2026 की री एग्जाम 21 जून 2026 को कराई जाएगी।

उन्होंने कहा कि छात्रों को एडमिट कार्ड 14 जून 2026 तक जारी कर दिए जाएँगे। इस बार छात्रों को अपनी सुविधा के अनुसार परीक्षा शहर चुनने का मौका भी दिया जाएगा। सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि अगले साल से NEET परीक्षा पूरी तरह कंप्यूटर आधारित यानी CBT मोड में कराई जाएगी ताकि पेपर लीक जैसी घटनाओं को रोका जा सके।

CBI फिलहाल इस पूरे नेटवर्क की तह तक पहुँचने की कोशिश कर रही है। जाँच एजेंसियाँ यह पता लगा रही हैं कि इस रैकेट का असली मास्टरमाइंड कौन है और इसमें कितने लोग शामिल थे।

जिस मुस्लिम शौहर के चक्कर में छोड़ना पड़ा करियर-धर्म, वो पूजा बेदी को अब भी लगता है सेकुलर: लव जिहाद को बता रही ओवररेटेड, समझें इनकी ब्रेनवॉशिंग

बॉलीवुड और उसकी कई अभिनेत्रियाँ अक्सर जमीन की हकीकत से कटी हुई नजर आती हैं और कई बार उनके बयान ऐसे होते हैं जो आम लोगों को वास्तविकता से बिल्कुल अलग लगते हैं।

ऐसा ही एक उदाहरण अभिनेत्री पूजा बेदी के उस इंटरव्यू में देखने को मिला, जो उन्होंने सुहासिनी मणिरत्नम के साथ जोस अलुक्कास के यूट्यूब चैनल पर दिया। इस इंटरव्यू में पूजा बेदी ने बताया कि उन्होंने एक्टिंग इसलिए छोड़ दी थी क्योंकि उनके रूढ़िवादी मुस्लिम ससुराल वालों को उनका फिल्मी करियर पसंद नहीं था।

लेकिन इसी दौरान उन्होंने यह भी कहा कि जब उन्होंने अपने मुस्लिम शौहर से निकाह की थी तब देश में सच्चा सेक्युलरिज्म और डेमोक्रेसी थी, जो अब दिखाई नहीं देती।

पूजा बेदी ने कहा कि आज जिस तरह लव जिहाद, हिंदू-मुस्लिम जैसी बातें होती हैं, वह उन्हें बेहद दुखद लगती हैं। उनके मुताबिक जब वह बड़ी हो रही थीं तब समाज ज्यादा सेक्युलर और लोकतांत्रिक था।

हालाँकि उनके अपने ही बयान में एक बड़ा विरोधाभास नजर आता है। एक तरफ वह कहती हैं कि उनके मुस्लिम ससुराल वाले इतने रूढ़िवादी थे कि उन्होंने उनके करियर को स्वीकार नहीं किया, दूसरी तरफ वह उसी दौर को सच्चा सेक्युलर बताती हैं।

इंटरव्यू में पूजा बेदी ने यह भी कहा कि अगर वह अपने ससुराल वालों की इच्छा के खिलाफ जाकर फिल्मों में काम जारी रखतीं तो यह उनके साथ गलत होता। उन्होंने खुद को 100 प्रतिशत अच्छी बहू और बेगम बताते हुए कहा कि उनके ससुराल वालों को उनके काम करने से असहजता होती, इसलिए उन्होंने अपना करियर छोड़ना सही समझा।

यहाँ सवाल यह उठता है कि अगर किसी महिला को अपने पति और ससुराल वालों की धार्मिक सोच के कारण अपना करियर छोड़ना पड़े, तो क्या उसे ही सेक्युलरिज्म और डेमोक्रेसी का उदाहरण माना जाए?

इंडियन एक्सप्रेस ने अपने लेख से हटाया लव जिहाद वाला हिस्सा

दिलचस्प बात यह रही कि इंडियन एक्सप्रेस ने पूजा बेदी के इसी इंटरव्यू पर जो लेख प्रकाशित किया, उसमें उनके लव जिहाद वाले बयान का कोई जिक्र नहीं किया गया।

लेख में यह बताया गया कि पूजा बेदी ने निकाह के बाद अपने ससुराल वालों को खुश रखने के लिए अपना करियर छोड़ दिया, यहाँ तक कि उन्होंने फिल्मों के लिए मिली साइनिंग अमाउंट भी वापस कर दी थी। लेकिन उसी इंटरव्यू में उन्होंने जो आज लव जिहाद की बातें होती हैं वाला बयान दिया था, उसे लेख से गायब रखा गया।

इंडियन एक्सप्रेस ने पूजा बेदी के बयान से लव जिहाद का ज़िक्र हटाया

यह पहली बार नहीं है जब तथाकथित सेक्युलर और लिबरल नैरेटिव को बनाए रखने के लिए लव जिहाद जैसे मुद्दों को नजरअंदाज किया गया हो। आलोचकों का मानना है कि प्रभावशाली लोग, मीडिया संस्थान और राजनीतिक वर्ग लंबे समय से ऐसे मामलों को या तो कम करके दिखाते रहे हैं या पूरी तरह नकारते रहे हैं।

यही वजह है कि यह मुद्दा लगातार विवाद और बहस का विषय बना हुआ है। पूजा बेदी जैसी सफल और प्रसिद्ध अभिनेत्री के लिए लव जिहाद जैसी घटनाओं को केवल राजनीतिक प्रचार बताना कई लोगों को वास्तविक घटनाओं की अनदेखी लगता है।

भारत में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ महिलाओं के साथ झूठी पहचान, शादी, धर्म परिवर्तन या शोषण के आरोप लगे। आलोचकों का कहना है कि जब प्रभावशाली लोग इन मामलों को पूरी तरह खारिज कर देते हैं, तो इससे पीड़ितों की आवाज कमजोर पड़ती है।

सिर्फ भारत ही नहीं दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि राजनीतिक और मीडिया वर्ग ने संवेदनशील मामलों को दबाने की कोशिश की। उदाहरण के तौर पर ब्रिटेन में पाकिस्तानी मूल के कुछ गैंग्स पर नाबालिग लड़कियों के शोषण के आरोप वर्षों तक चर्चा से दूर रहे।

इसी तरह केरल में भी चर्च संगठनों ने ईसाई लड़कियों को निशाना बनाकर धर्म परिवर्तन कराने के आरोप उठाए थे, जिन पर लंबे समय तक राजनीतिक बहस चलती रही। भारत में लव जिहाद शब्द तब ज्यादा चर्चा में आया जब केरल से जुड़े कुछ मामलों में लड़कियों के धर्म परिवर्तन और कट्टरपंथी संगठनों से जुड़ने के आरोप सामने आए।

इसके बाद देशभर में ऐसे कई मामले सामने आए जिनमें महिलाओं ने मुस्लिम युवकों पर झूठी पहचान, शादी और धर्म परिवर्तन के आरोप लगाए। हाल के वर्षों में सामने आए कई चर्चित मामलों को भी इसी बहस से जोड़कर देखा गया। TCS नासिक स्कैंडल ऐसे ही अपराधों की लंबी लिस्ट में नया नाम है, जिसका पूजा बेदी मजाक उड़ाने की कोशिश कर रही हैं।

धार की भोजशाला है वाग्देवी का मंदिर, MP HC ने लगाई मुहर: नहीं होगी नमाज, जानिए इतिहास से लेकर ASI सर्वे और अदालती फैसले के बारे में सब कुछ

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला एक बार फिर देश की सबसे बड़ी कानूनी और सांस्कृतिक बहस के केंद्र में आ गई है। अब शुक्रवार (15 मई 2026) को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने इस मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए धार भोजशाला को वाग्देवी का मंदिर माना है। इस फैसले के पीछे ASI की रिपोर्ट काफी अहम साबित हुई, जिसमें मंदिर से जुड़े अहम सबूत सामने आए थे।

रिपोर्ट के मुताबिक, एमपी हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने अपने फैसले में माना है कि MP की भोजशाला वाग्देवी का प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर है। हाई कोर्ट ने 5 याचिकाओं और 3 इंटरवेंशन पर सुनवाई के बाद ये फैसला सुनाया।

बता दें कि हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ने साल 2022 में याचिका दायर कर धार्मिक स्वरूप तय करने और हिंदू समाज को पूरा अधिकार देने की माँग की थी। इसके बाद कोर्ट ने ASI को वैज्ञानिक सर्वे का निर्देश दिया था। ASI ने 98 दिनों तक वैज्ञानिक सर्वे कर अपनी रिपोर्ट हाई कोर्ट को सौंप दी थी। अब हाई कोर्ट ने सभी पक्षों की जिरह को सुनने के बाद फैसला सुनाया है।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में हिंदुओं को पूजा का अधिकार दिया है। हालाँकि हाई कोर्ट ने धार की भोजशाला यानी वाग्देवी के मंदिर के रखरखाव का दायित्व ASI को ही दिया है, जो अब तक ये काम करती आ रही है।

हाई कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष से कहा है कि वो मस्जिद बनाने के लिए दूसरी जगह की माँग कर सकते हैं, लेकिन धार की भोजशाला कमाल मौला मस्जिद (जैसा दावा करते हैं) नहीं बल्कि मूल रूप से वाग्देवी का मंदिर है। अब इस जगह पर नमाज नहीं होगी। अभी तक शुक्रवार को ASI के पुराने आदेश के हिसाब से नमाज पढ़ी जाती थी, लेकिन अब सभी पुराने आदेश रद्द हो गए हैं।

बता दें कि पूरे देश की निगाहें इस फैसले पर टिकी हुई थी, क्योंकि यह विवाद केवल मंदिर और मस्जिद तक सीमित नहीं रहा था, बल्कि यह भारतीय इतिहास, पुरातत्व, आस्था, सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा बन चुका था। हालाँकि अब हाई कोर्ट के फैसले के बाद हिंदुओं को बड़ी राहत मिली है।

गौरतलब है कि भोजशाला माँ सरस्वती का प्राचीन मंदिर और शिक्षा का महान केंद्र था, मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है। इस पूरे विवाद को नई दिशा तब मिली थी, जब भारतीय पुरात्तव विभाग (ASI) ने वैज्ञानिक सर्वेक्षण के बाद अपनी विस्तृत रिपोर्ट हाई कोर्ट में पेश की और दावा किया कि मौजूदा ढाँचे से पहले यहाँ परमारकालीन विशाल मंदिरनुमा संरचना मौजूद थी।

लगभग दो वर्षों तक चले कानूनी संघर्ष, वैज्ञानिक जाँच, ऐतिहासिक बहस और हजारों दस्तावेजों की पड़ताल के बाद अब अदालत के फैसले ने विवाद का पटाक्षेप कर दिया है।

आखिर क्या है भोजशाला और क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

धार की भोजशाला को हिंदू समाज माता सरस्वती के मंदिर और प्राचीन विश्वविद्यालय के रूप में देखता है। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, इसकी स्थापना 11वीं शताब्दी में परमार वंश के महान शासक राजा भोज ने की थी। राजा भोज केवल एक शक्तिशाली शासक ही नहीं, बल्कि शिक्षा, साहित्य, दर्शन, आयुर्वेद, खगोल विज्ञान और संस्कृत के बड़े संरक्षक माने जाते हैं।

उस समय धार उनकी राजधानी थी और भोजशाला ज्ञान तथा शिक्षा का प्रमुख केंद्र हुआ करती थी। यहाँ दूर-दूर से विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने आते थे और संगीत, संस्कृत, योग, दर्शन, व्याकरण, ज्योतिष तथा आयुर्वेद जैसे विषय पढ़ाए जाते थे। हिंदू पक्ष का दावा है कि यह स्थान केवल पूजा का स्थल नहीं था, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का जीवंत प्रतीक था।

भोजशाला परिसर में आज भी ऐसे कई शिलालेख, नक्काशीदार स्तंभ और स्थापत्य अवशेष मौजूद हैं, जिनमें संस्कृत, प्राकृत और प्राचीन नागरी लिपि के चिन्ह दिखाई देते हैं। कई अभिलेखों में ‘ॐ नमः शिवाय’, ‘ॐ सरस्वत्यै नमः’ और परमार राजाओं की प्रशंसा का उल्लेख मिलने का दावा किया गया है।

हिंदू पक्ष यह भी कहता है कि यहाँ स्थापित माँ सरस्वती की मूल प्रतिमा को अंग्रेजों के शासनकाल में लंदन ले जाया गया था और वह आज भी वहाँ संग्रहालय में रखी हुई है। इसी कारण भोजशाला को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर के रूप में भी देखा जाता है।

कैसे शुरू हुआ भोजशाला विवाद और क्यों बढ़ती गई टकराव की स्थिति?

मुस्लिम पक्ष इस परिसर को कमाल मौला मस्जिद बताता है और दावा करता है कि यहाँ लंबे समय से नमाज अदा की जाती रही है। जबकि सच्चाई ये है कि यह मूल रूप से माता सरस्वती का मंदिर था, जिसे मुस्लिम आक्रमणकारियों ने तोड़कर मस्जिदनुमा ढाँचे में बदल दिया। साल 2003 में इस विवाद को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने एक व्यवस्था लागू की।

इसके तहत हिंदुओं को हर मंगलवार पूजा की अनुमति दी गई, जबकि मुस्लिम पक्ष को हर शुक्रवार नमाज पढ़ने की इजाजत मिली। बाकी दिनों में परिसर को स्मारक और पर्यटन स्थल के रूप में रखा गया। हालाँकि यह व्यवस्था अस्थायी समाधान साबित हुई, क्योंकि दोनों पक्ष लगातार अपने पूर्ण अधिकार की माँग करते रहे।

हिंदू संगठनों का कहना था कि यदि ASI संरक्षित परिसर के भीतर मंदिर के प्रमाण मौजूद हैं, तो हिंदुओं को वहाँ नियमित पूजा का अधिकार मिलना चाहिए। वहीं मुस्लिम पक्ष ने इसे मस्जिद और दरगाह के रूप में संरक्षित रखने की माँग जारी रखी।

2022 से शुरू हुई नई कानूनी लड़ाई और हाई कोर्ट की सुनवाई

भोजशाला विवाद का नया और सबसे महत्वपूर्ण कानूनी अध्याय वर्ष 2022 में शुरू हुआ। हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से रंजना अग्निहोत्री, आशीष गोयल और अन्य याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर माँग की कि भोजशाला का वास्तविक धार्मिक स्वरूप तय किया जाए और पूरे परिसर का वैज्ञानिक सर्वे कराया जाए।

याचिका में यह भी कहा गया कि हिंदू समाज को वहाँ पूर्ण पूजा-अर्चना का अधिकार दिया जाए। हिंदू पक्ष की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन, विनय जोशी और अन्य वकीलों ने अदालत में पक्ष रखा। उन्होंने दावा किया कि परिसर में मौजूद स्थापत्य, शिलालेख और मूर्तिकला मंदिर स्वरूप की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं।

सुनवाई के बाद 11 मार्च 2024 को हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने ASI को आदेश दिया कि वह ज्ञानवापी की तर्ज पर भोजशाला परिसर का वैज्ञानिक सर्वे करे। इसके बाद 22 मार्च 2024 से ASI ने विस्तृत सर्वेक्षण शुरू किया, जो करीब 98 दिनों तक चला। इस दौरान खुदाई, कार्बन डेटिंग, स्थापत्य विश्लेषण, शिलालेखों की जाँच और संरचनात्मक अध्ययन किया गया।

15 जुलाई 2024 को ASI ने 2000 से अधिक पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट अदालत में पेश की। बाद में फरवरी 2026 में अतिरिक्त वैज्ञानिक रिपोर्ट भी दाखिल की गई।

6 अप्रैल 2026 से इंदौर हाई कोर्ट की डबल बेंच ने इस मामले में नियमित सुनवाई शुरू की, जो 12 मई 2026 तक चली। इस दौरान हिंदू, मुस्लिम और जैन पक्षों ने हजारों दस्तावेज, ऐतिहासिक रिकॉर्ड, पुरातात्विक साक्ष्य और धार्मिक दावे अदालत के सामने रखे। सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था और अब अपना फैसला हिंदुओं के पक्ष में सुना दिया है।

ASI रिपोर्ट में क्या-क्या बड़े खुलासे हुए?

ASI की रिपोर्ट इस पूरे विवाद का सबसे अहम हिस्सा बनकर सामने आई। ASI ने दावा किया कि मौजूदा ढाँचे से पहले यहाँ परमारकालीन विशाल संरचना मौजूद थी और वर्तमान निर्माण मंदिर के अवशेषों का उपयोग करके किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, परिसर में मिले स्तंभ, नक्काशीदार पत्थर, शिलालेख और स्थापत्य तत्व मंदिर शैली की ओर संकेत करते हैं।

ASI को परिसर से भगवान गणेश, नरसिंह, भैरव, ब्रह्मा और पशु आकृतियों से जुड़ी कुल 94 मूर्तियाँ और मूर्तिकला के हिस्से मिले। रिपोर्ट में कहा गया कि 106 स्तंभों और 82 पिलास्टर्स पर देवी-देवताओं, मनुष्यों और पशु आकृतियों को जानबूझकर छेनी से विकृत किया गया।

ASI ने यह भी कहा कि मौजूदा मस्जिदनुमा ढाँचे में स्थापत्य संतुलन और समरूपता का अभाव दिखाई देता है, जबकि मूल संरचना में उच्च स्तर की वास्तुकला और कलात्मकता मौजूद थी। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि वर्तमान निर्माण कई सदियों बाद जल्दबाजी में तैयार किया गया और उसमें मंदिर के मूल पत्थरों और स्तंभों का उपयोग हुआ।

ASI को परिसर में संस्कृत और प्राकृत भाषा के शिलालेख मिले, जिनमें राजा नरवर्मन, उदयादित्य और परमार वंश का उल्लेख पाया गया। कुछ अभिलेखों में संस्कृत व्याकरण, वर्णमाला और ‘कर्पूरमंजरी’ नाटक के अंश भी मिले। ASI ने भोजशाला के विकास को तीन चरणों में विभाजित किया। पहले में 10वीं शताब्दी से पहले की प्रारंभिक ईंट संरचना का उल्लेख किया।

दूसरे चरण में 11वीं से 13वीं शताब्दी के बीच राजा भोज और परमार काल के भव्य मंदिर तथा शिक्षा केंद्र का वर्णन किया गया। तीसरे चरण में 14वीं शताब्दी के बाद मस्जिद और दरगाह निर्माण की बात कही गई। ASI ने यह भी कहा कि मूल मंदिर संरचना के कई हिस्सों को तोड़कर इस्लामी स्थापत्य तत्व जोड़े गए।

हिंदू पक्ष ने अदालत में किन दावों और सबूतों के आधार पर लड़ाई लड़ी?

हिंदू पक्ष ने कोर्ट में दावा किया कि भोजशाला मूल रूप से माँ सरस्वती का मंदिर और भारत की प्राचीन शिक्षा परंपरा का केंद्र था। अधिवक्ता विष्णू शंकर जैन और अन्य वकीलों ने कहा कि परिसर में मौजूद मूर्तियाँ, देवी-देवताओं की आकृतियाँ, संस्कृत शिलालेख और मंदिर शैली के स्तंभ किसी मस्जिद का हिस्सा नहीं हो सकते।

उन्होंने अदालत में ब्रिटिशकालीन गजेटियर, इतिहासकारों के दस्तावेज और पुरातात्विक रिकॉर्ड भी पेश किए, जिनमें भोजशाला को सरस्वती मंदिर और शिक्षा केंद्र बताया गया था। हिंदू पक्ष ने यह भी कहा कि यहाँ सदियों से वसंत पंचमी पर पूजा-अर्चना होती रही है और यह परंपरा आज भी जारी है।

याचिकाकर्ताओं का दावा था कि मुस्लिम आक्रमणकारियों ने मंदिर को ध्वस्त कर उसके अवशेषों से मस्जिदनुमा ढाँचा तैयार किया। हिंदू संगठनों ने अदालत से माँग की कि हिंदुओं को पूरे परिसर में पूजा का अधिकार दिया जाए और भोजशाला को आधिकारिक रूप से मंदिर घोषित किया जाए।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि ASI की रिपोर्ट मंदिर पक्ष को मजबूत करती है, क्योंकि उसमें मिले शिलालेख, मूर्तिकला, स्तंभ और स्थापत्य प्रमाण स्पष्ट रूप से हिंदू धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप की ओर संकेत करते हैं। अदालत में यह भी कहा गया कि जिस संरचना को मस्जिद बताया जा रहा है, उसमें इस्तेमाल किए गए अधिकांश खंभे और पत्थर मूल मंदिर के थे।

भोजशाला पर इस्लामी आक्रमण, विनाश और सत्ता संघर्ष की पूरी कहानी

भोजशाला पर कई बार इस्लामी आक्रमण हुए। दावा किया जाता है कि 1269 में कमाल मौलाना नाम का एक मुस्लिम फकीर मालवा पहुँचा और बाद में यहाँ इस्लामी प्रभाव बढ़ने लगा। इसके बाद 1305 में अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा पर हमला किया और भोजशाला को भारी नुकसान पहुँचाया।

हिंदू पक्ष का दावा है कि उस समय यहाँ अध्ययन कर रहे 1200 से अधिक छात्रों और शिक्षकों को बंदी बनाया गया और इस्लाम स्वीकार करने से इनकार करने पर उनकी हत्या कर दी गई। इसके बाद 1401 में दिलावर खान ने परिसर के एक हिस्से को दरगाह में बदलने का प्रयास किया।

फिर 1514 में महमूद शाह ने भोजशाला परिसर पर कब्जा मजबूत करने की कोशिश की और कमाल मौला मकबरे का विस्तार किया। हिंदू पक्ष का कहना है कि इन्हीं घटनाओं के आधार पर बाद में इसे मस्जिद और दरगाह बताया जाने लगा। बाद में मेदनी राय ने मुस्लिम शासकों के खिलाफ युद्ध कर क्षेत्र पर दोबारा नियंत्रण स्थापित किया।

1703 में मालवा पर मराठों का अधिकार हो गया और मुस्लिम शासन समाप्त हुआ। इसके बाद अंग्रेजों का शासन आया। हिंदू संगठनों का दावा है कि 1902 में लॉर्ड कर्जन भोजशाला से माता सरस्वती की प्रतिमा इंग्लैंड ले गया। आजादी के बाद 1952 में भोजशाला को ASI के अधीन कर दिया गया।

बाद में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, आर्य समाज और हिंदू महासभा जैसे संगठनों ने भोजशाला आंदोलन को आगे बढ़ाया। 1961 में प्रसिद्ध पुरातत्वविद् विष्णु श्रीधर वाकणकर ने लंदन जाकर दावा किया कि वहाँ रखी वाग्देवी की प्रतिमा वास्तव में भोजशाला की है।

बहरहाल, अब इंदौर हाई कोर्ट के फैसले के बाद इस पूरे विवाद का पटाक्षेप हो गया है। धार की भोजशाला मूल रूप से वाग्देवी का मंदिर है और इसमें हिंदुओं को पूजा का अधिकार है। हाई कोर्ट का ये फैसला हिंदुओं के लिए बड़ी जीत की तरह है।