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1500 साल से था कैथेड्रल, 2020 में बना ​दी मस्जिद; अब बुर्के में न्यूड फोटो शूट पर मॉडल को हो सकती है जेल

तुर्की की हागिया सोफिया (Hagia Sophia) हाल में काफी चर्चा में रही है। इस्तांबुल में स्थित 1500 साल पुराने ऑर्थोडॉक्स क्रिश्चियन कैथेड्रल को इसी साल मस्जिद में बदल दिया गया था। कुछ जानकारों का मानना है कि इसकी वजह से ही केरल के हालिया स्थानीय चुनावों में वामपंथी पार्टियों को जीत भी मिली है। अब खबर आ रही है कि हागिया सोफिया के सामने न्यूड फोटो शूट कराने वाली प्लेबॉय मॉडल मारिसा पापेन को सात साल जेल की सजा हो सकती है।

बता दें कि मारिसा पापेन ने हागिया सोफिया के दरवाजे पर खड़े होकर न्यूड फोटो शूट कराया था। इसके अलावा उसने तुर्की के झंडे पर नग्न लेटकर फोटशूट करवाया था। इसकी बहुत से लोगों ने निंदा की थी। यह वाकया साल 2018 का है।

‘द सन’ के अनुसार, उन पर तुर्की के अभियोजकों द्वारा ‘राज्य की संप्रभुता के संकेतों का अपमान करने’ का आरोप लगाया गया है, जिन्होंने ‘भड़कीले कृत्यों’ और ‘अश्लील’ तस्वीरों की ब्रांडिंग की है। मारिसा पापेन कथित तौर पर हैरान हैं कि तुर्की के अधिकारी तस्वीरों के लिए उनके पीछे पड़े हैं।

मारिसा ने हाल ही में  ‘नेक्ड एटलस’ नाम की अपनी वेबसाइट लॉन्च की। जिसके बाद ये मामला गरमा गया है। वेबसाइट में वे सभी देश शामिल हैं जहाँ मारिसा पापेन ने नग्न तस्वीरें खींची हैं। उसने दुनिया भर में प्रतिष्ठित संरचनाओं के सामने नग्न होकर फोटोशूट करवाया। 

मारिसा ने इस्तानबुल की मशहूर हागिया सोफाया मस्जिद के दरवाजे पर खड़े होकर भी एक न्यूड फोटो लिया था। यह उल्लेख करना उचित है कि जब हागिया सोफिया ने यह किया था वह एक मस्जिद नहीं थी।

इस फोटो पर सोशल मीडिया में काफी हंगामा हुआ। इसके बाद तुर्की प्रशासन ने मारिसा को एक नोटिस भेजकर सफाई माँगी थी। मारिसा ने सिर्फ मस्जिद ही नहीं कैपाडोशिया वैली और अन्य कई जगहों पर भी ऐसी तस्वीरें लीं थीं।

बेल्जियम की मॉडल को 2018 में वेटिकन के सामने न्यूड पोज देने के लिए भी गिरफ्तार किया गया था। मिस्र में कुक्सर के कर्णक मंदिर में उसे इसी कारण से गिरफ्तार किया गया था। इसके अलावा उसने यरुशलम की सेलिंग वॉल के पास नग्न पोज दिया, जिसकी वजह से वहाँ के लोगों में नाराजगी देखने को मिली।

लेकिन इसने उसके दुनिया भर में न्यूड पोज़ देने के उसके उत्साह को कम नहीं किया। द सन ऑनलाइन के साथ एक साक्षात्कार में उसने कहा, “यह स्वतंत्रता के लिए एक चीख है। मैं ऐसे समय में वापस जाना चाहती हूँ जब महिलाएँ रानियाँ थीं। इसलिए मैं उन सभी देशों में जाना चाहती हूँ जहाँ महिलाओं का दमन होता है। जैसा कि मैंने कहा कि यह स्वतंत्रता के लिए एक चीख है और मैं चाहती हूँ कि वे मेरा मैसेज देखें।”

13 साल की लड़की का रेप कर इस्लाम कबूल करवाया: कोर्ट गए पिता को न्याय की जगह मिला 30000 ‘रुपए’ का जुर्माना

पाकिस्तानी मानवाधिकार कार्यकर्ता राहत ऑस्टिन ने रविवार (दिसंबर 20, 2020) को ट्विटर पर एक वीडियो शेयर की। इस वीडियो में 13 वर्षीय एक नाबालिग ईसाई लड़की के पिता ने अपने परिवार के साथ हुए अत्याचार के बारे में बताया। पीड़ित पिता के मुताबिक साजिद अली, सुमैरा और तारव ने लाहौर के कंजरा से उनकी बेटी महविश को अगवा कर लिया। रेप के बाद जबरन उसका धर्मांतरण किया गया।

इसी घटना के बारे में बोलते हुए पाकिस्तानी कार्यकर्ता ने आज (दिसंबर 22, 2020) लाहौर उच्च न्यायालय के आदेशों की कॉपी शेयर की, जिसने निचली अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें पीड़ित के पिता को 30,000 पीकेआर (पाकिस्तानी रुपए) का जुर्माना देने के लिए कहा गया था। 

कार्यकर्ता ने बताया कि पीड़िता के पिता ने निचली अदालत द्वारा लगाए गए 30,000 पीकेआर जुर्माना को माफ करने के लिए हाई कोर्ट का रुख किया था। बता दें कि पीड़ित पिता ने नाबालिग बेटी के अपहरण के बाद मदद के लिए निचली अदालत का दरवाजा खटखटाया था, मगर निचली अदालत ने पीड़िता के पिता की किसी भी तरह की मदद देने के बजाय उन पर जुर्माना लगा दिया था।

सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाले पीड़िता के पिता के लिए इतनी राशि की व्यवस्था करना लगभग असंभव था। इसलिए उन्होंने लाहौर उच्च न्यायालय से गुहार लगाई थी कि वह उन पर लगाए गए जुर्माने को वापस ले ले। हालाँकि, पाकिस्तान HC ने उन्हें निचली अदालत द्वारा दिए गए आदेश को खारिज करने में मदद करने के बजाय तुरंत जुर्माना भरने को कहा।

पाकिस्तान में इंसाफ मिलना असंभव है: पीड़िता के पिता

हमने रविवार को बताया था कि 13 वर्षीय ईसाई पीड़ित के व्यथित पिता ने कहा था कि अगर उन्हें न्याय नहीं मिला को वो पूरे परिवार के साथ मरने पर मजबूर हो जाएँगे। पीड़ित पिता ने वीडियो में कहा था –

“यदि प्रधानमंत्री, मंत्री, मुख्य न्यायाधीश और सांसद मेरी पीड़ा नहीं सुनते और मेरी बच्ची की सही सलामत वापसी नहीं सुनिश्चित करवाते तो मैं पूरे परिवार के साथ मरने को मजबूर हो जाऊँगा। पाकिस्तान में इंसाफ मिलना असंभव है। न्याय तभी मिलेगा जब मेरी बेटी मेरे पास वापस आएगी। मेरी बातों को हल्के में न लें। अगर मेरी बेटी वापस नहीं आती है, तो मैं वही करूँगा जो मैंने कहा है।”

वहीं यह पूछे जाने पर कि क्या उन्होंने किसी राजनीतिक नेताओं से मदद माँगी है, पीड़ित पिता ने दुख व्यक्त करते हुए कहा था, “शुरू में हमने दो बार मंत्री जाहज आलम घस्ती से मिलने की कोशिश की, लेकिन मिल नहीं सके। हालाँकि, बाद में 3 बार उनसे अलग-अलग मौकों पर मिले। लेकिन उन्होंने कहा कि इसमें मैं क्या कर सकता हूँ।”

उल्लेखनीय है कि पिछले साल 10 अक्टूबर को 14 वर्षीय हुमा यूनुस को कराची में उसके माता-पिता के घर से पंजाब के डेरा गाजी खान निवासी अब्दुल जब्बार नामक एक मुस्लिम व्यक्ति द्वारा अपहरण कर लिया गया था। वहीं फरजाना (14) और सेहरिश (16) के साथ 3 मुस्लिम युवकों ने सामूहिक बलात्कार किया, लेकिन परिजनों को अदालत के बाहर ही मामला सुलझाने के लिए मजबूर होना पड़ा था।

‘दुनिया में हिन्दू नाम का कोई धर्म नहीं’: महिला उपदेशक बोलती रही और सुनते रहे स्टालिन, ​तमिलनाडु में हैं कॉन्ग्रेस के साथी

‘दुनिया में हिन्दू नाम का कोई धर्म ही नहीं है, इसका अस्तित्व मात्र एकाध सदी पुराना है।’ एक तथाकथित उपदेशक ने खुलेआम मंच से ये बातें कहीं और वो भी एक बड़े नेता के सामने। जब हिन्दू धर्म पर महिला उपदेशक कलैरसी नटराजन यह टिप्पणी कर रही थी तब वहाँ पर तमिलनाडु की प्रमुख विपक्षी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के अध्यक्ष मुथुवेल करुणानिधि (MK) स्टालिन मौजूद थे और चुपचाप ये सब सुन रहे थे।

अब इस टिप्पणी को लेकर विवाद शुरू हो गया है। राज्य की भाजपा यूनिट ने भी इस बयान पर आपत्ति जताई है। नटराजन ने यहाँ तक कहा कि सब शैव हैं और सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण तो ये है कि हम सब तमिल हैं। राजनीतिक विश्लेषक शहजाद जयहिंद ने कहा कि जब इस तरह का विवादित और आपत्तिजनक बयान दिया गया, तब MK स्टालिन चुप बैठे हुए थे, ऐसे में उन पर सवाल उठना लाजिमी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में बात करते हुए इसी कार्यक्रम में एक उपदेशक ने कहा कि वो अमीर लोगों के मित्र हैं और उनकी मदद करने के लिए ही सत्ता में आए हैं। उपदेशक ने कहा कि वे अमीरों की मदद करते हैं लेकिन खुद के बारे में कहते रहते हैं कि वो गरीब परिवार से थे और उन्होंने बचपन में चाय बेची है। बिशप एर्ज़ा सरगुणम ने ये बातें कहते हुए दावा किया कि मोदी जो कहते हैं, वो उसके बिल्कुल विपरीत हैं।

एमके स्टालिन लगातार भाजपा पर घृणा फैलाने का आरोप लगाते हैं। उन्होंने दावा किया था कि जो लोग डीएमके के खिलाफ हिन्दुत्व का हथियार प्रयोग कर रहे हैं, उन्हें शायद पता भी नहीं है कि उनकी पार्टी ने हिन्दू धर्म के लिए क्या किया है। उन्होंने दावा किया था कि भाजपा के नेता धर्म को हथियार के रूप में प्रयोग करते हुए जनता को बाँट रहे हैं। उन्होंने कहा था कि आज कई ऐसे लोग पैदा हो गए हैं, जो धर्म और अध्यात्म की रक्षा के लिए अवतार होने का दावा ठोकते हैं।

एमके स्टालिन का कहना था कि हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए उनकी पार्टी ने बहुत कुछ किया है। उन्होंने गिनाया था कि 1967-75 के बीच जब डीएमके की सरकार थी तो 5000 मंदिरों का जीर्णोद्धार किया गया। उन्होंने कहा कि पहले तो ‘Charitable Endowments department (HR&CE)’ का कोई अलग विभाग ही नहीं था, इसे डीएमके ने बनाया। उन्होंने दावा किया कि 1996-2001 में 2459 मंदिरों की मरम्मत हुई, तब भी डीएमके की सरकार थी।

उन्होंने तमिल को सबसे पुरानी सभ्यता बताते हुए कहा कि ये कभी विभाजित नहीं होंगे। उन्होंने कहा था कि भाजपा के पूर्व अध्यक्ष अमित शाह तमिलनाडु में क्या चल रहा है, इस बारे में कुछ जानते ही नहीं हैं। बता दें कि तमिलनाडु में जब से भाजपा सक्रिय हुई है, तब से वहाँ दशकों से काबिज द्रविड़ पार्टियों में बेचैनी है। NDA कि सहयोगी सत्ताधारी पार्टी AIADMK ने भी भाजपा को मंदिर यात्रा निकालने की अनुमति नहीं दी थी।

इसी तरह पिछले वर्ष MK स्टालिन ने केंद्र की मोदी सरकार पर हिंदी भाषा थोपने का आरोप लगाया था। हालाँकि, बाद में डीएमके प्रमुख स्टालिन ने हिंदी थोपने को लेकर चलाए जा रहे आंदोलन को खत्म कर दिया था। स्टालिन ने आंदोलन ख़त्म करने की घोषणा करते हुए कहा था कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मामले पर सफाई दे दी है। जिससे बात यहीं ख़त्म होती है। साथ ही स्टालिन ने कहा था कि हिंदी थोपने के खिलाफ डीएमके की लड़ाई जारी रहेगी।

केजरीवाल जी, वाड्रा जी, शिपिंग कॉर्पोरेशन में 65% हिस्सेदारी बेच रही है सरकार, आपको लेना है?

अम्बानी और अडानी के खिलाफ कई वर्षों से लिबरल्स समुदाय द्वारा चलाए जा रहे जागरूकता अभियान के नतीजे अब सामने आने लगे हैं। सूट-बूट वाली मोदी सरकार शिपिंग कॉरपोरेशन में 63.75% हिस्सेदारी बेचने जा रही है और इसकी लिए बोलियाँ लगाने जा रही है।

पूँजीवादी अम्बानी और अडानी के बढ़ते हुए कारोबार से एक आदर्श पड़ोसी की तरह मन ही मन जलने वाले क्रन्तिकारी कॉमरेड एवं लिबरल्स ने इस बार सब तैयारियाँ पहले से कर डाली थीं। लिबरल्स ने बोलियाँ लगने से पहले ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और प्रियंका गाँधी वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा के कानों में ये बात डाल दी, कि ये प्रोजेक्ट अम्बानी या अडानी के हाथ नहीं जाना चाहिए।

हालाँकि, जेएनयू में ही प्रकाशित एक शोधपत्र में खुलासा हुआ है कि वामपंथियों ने जितनी ऊर्जा अम्बानी और अडानी के प्रचार अभियान में लगा दी, उसका एक प्रतिशत भी अगर उन्होंने अपने मानसिक विकास पर खर्च की होती तो उन्हें आज उधार की बीड़ी माँगकर जीवनयापन के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता।

एक ख़ुफ़िया सूत्र ने हमें नाम न बताने की शर्त पर बताया कि वामपंथियों ने अम्बानी और अडानी के बिजनेस को घाटे में ले जाने के लिए अपने कुदाल, फावड़ा, सब्बल और दराँती लेनी शुरू कर दी हैं। सर से लेकर पाँव तक कर्ज में डूबे एक साथी ने तो अम्बानी को मजा चखने के लिए अपनी ही जेसीबी तक खरीद डाली। उनका कहना है कि तेल खोदने से लेकर अनाज भंडार बनाने तक का काम अब अम्बानी को नहीं मिलेगा बल्कि वो खुद ही ये सभी काम करने जा रहे हैं।

लेकिन खुद ही तेल की खुदाई करने के लिए क्रन्तिकारी कॉमरेड्स द्वारा उठाए गए इस कदम को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में पहला कदम बताया तो वामपंथियों ने फैसला किया कि अब वो खुद ही तेल की खुदाई ना कर के मशीनों को ही इसका ठेका देंगे। उन्होंने कहा कि वो कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहते जो ‘साहेब’ की किसी योजना का महिमामंडन करती हो।

वामपंथियों ने इसके लिए जेएनयू से भर्तियाँ करनी जब शुरू की तो उन्हें यह जानकार बहुत दुःख हुआ कि आधे कॉमरेड्स अम्बानी-अडानी की कम्पनी में अपनी प्लेसमेंट के लिए सीवी बना रहे थे। बाकी जो कुछ कॉमरेड्स अपने कमरों में बैठे थे उनके दरवाजे पर स्पष्ट शब्दों में लिखा था- ‘अजगर करे न चाकरी… पंछी करे न काम।’

एक क्रन्तिकारी वामपंथी मित्र ने साथी कॉमरेड की इन हरकतों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कठोर शब्दों में कहा कि ‘भैया ऐसे तो नहीं चलने वाला।’ हालाँकि, उन्हीं में से एक वामपंथी कॉमरेड्स ने कहा कि वास्तविकता यही है कि पूँजीवादियों के खिलाफ धरना प्रदर्शन करना और ढपली बजाना पूँजीवादियों के लिए काम कर के पेट पालने से कहीं अधिक आसान और गरिमामय है।

हाथरस केस: मृतका के आरोपित संदीप से थे रिश्ते, अक्टूबर से मार्च के बीच एक-दूसरे को किए थे 105 कॉल

हाथरस केस में पिछले दिनों सीबीआई ने चार्जशीट दाखिल किया था। इसके हवाले से मीडिया रिपोर्टों में कई चौंकाने वाले दावे किए गए हैं। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार मृतका और आरोपित संदीप के बीच संबंध थे। ग्रामीणों से बातचीत और दोनों के कॉल डिटेल्स खँगालने के बाद जाँच एजेंसी को इसका पता चला।

रिपोर्ट के अनुसार सीबीआई को दोनों की कॉल डिटेल चेक करने पर मालूम चला कि 17 अक्टूबर 2019 से 3 मार्च 2020 के बीच में दोनों ने एक-दूसरे को 105 बार कॉल किया था। मृतका भी संदीप को क़ॉल करती थी। दोनों की फोन पर बातें हुआ करती थीं। लेकिन एक समय के बाद लड़की से बातचीत बंद होने पर संदीप नाराज हो गया।

बता दें कि हाथरस केस में सीबीआई ने 3 दिन पहले विशेष न्यायालय में चारों आरोपितों संदीप, रवि, रामू और लवकुश के खिलाफ धारा 376, 376 ए,376 डी, 302 व 3(2)(5) एससी-एसटी एक्ट के तहत चार्जशीट दाखिल की थी। चार्जशीट में घटना वाले दिन के बारे में कहा गया है कि उस दिन लड़की ने अपनी माँ से घास काटने में असमर्थता जताई थी। इसके बाद माँ ने उसे घास के बंडल बाँधने को कहा और वह दूसरे खेत में चली गई।

जब माँ वापस लौटी तो उन्हें वहाँ अपनी लड़की नहीं दिखी और फिर उन्होंने उसे तलाशना शुरू किया। कुछ दूर पर उन्हें उसकी चप्पल नजर आई और थोड़ी देर में देखा कि उनकी बेटी खेत में बेसुध पड़ी थी। इसके बाद उन्होंने अपने बेटे को बुलवाया और दोनों उसे लेकर थाने गए। वहाँ भाई ने शिकायत की और फिर उसे लेकर जिला अस्पताल गए। यहाँ से उसे जेएन मेडिकल कॉलेज में रेफर कर दिया गया।

मेडिकल कॉलेज में 22 सितंबर को पीड़िता की हालत देखने के बाद डिपार्टमेंट ऑफ फोरेंसिक मेडिसिन एंड टेक्नोलॉजी के हेड डॉ. एमएस हुड्डा ने सीएमओ को तुरंत मृत्यु पूर्व बयान दर्ज कराने को कहा और उसी शाम 5.40 बजे तहसीलदार मनीष कुमार तहसील कोल के सामने उसने अपना आखिरी बयान दिया। चार्जशीट में इसी बयान को आधार बनाकर संदीप, रामू, रवि व लवकुश पर आरोप लगाए गए हैं।  

सीबीआई को जाँच में पता चला कि संदीप और मृतका के रिश्ते के बारे में दोनों के घरवालों को पता लग गया था। इसी वजह से उनमें बात भी नहीं हो रही थी। संदीप को समय के साथ लड़की पर गुस्सा आने लगा था। उसने कई बार अपने परिजनों के नंबर से उसे संपर्क करने का प्रयास किया, मगर तब भी बात नहीं हो पाई। संबंधों के बारे में पता चलने पर दोनों पक्षों में झगड़ा हुआ था, जिसके बारे में मृतका के घरवालों ने कुछ नहीं बताया।

नेपाल में लड़कियों संग पकड़ाए बि​हार के 3 जज बर्खास्त: होटल रजिस्टर के फटे पन्ने और फर्जी बिल से भी नहीं बचे

बिहार सामान्य प्रशासन विभाग ने निचली अदालतों के तीन न्यायाधीशों को बर्खास्त करने को मँजूरी दे दी है। सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से इसकी अधिसूचना जारी कर दी गई है। इन तीनों न्यायाधीशों का नाम 2013 के नेपाल सेक्स स्कैंडल में सामने आया था। 

दैनिक जागरण ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि विभाग की ओर से जारी अधिसूचना के मुताबिक इनकी बर्खास्तगी 12 फरवरी, 2014 से ही प्रभावी होगी। बर्खास्त किए गए तीनों न्यायाधीश समस्त लाभों से वंचित रहेंगे। इन तीनों जजों को अब रिटायरमेंट के बाद का कोई लाभ नहीं मिलेगा।

बिहार सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार समस्तीपुर परिवार न्यायालय के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश हरिनिवास गुप्ता, तदर्थ अपर जिला एवं सत्र न्यायधीश (अररिया) जितेंद्र नाथ सिंह और अररिया के अवर न्यायाधीश सह मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी कोमल राम को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है। 

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 2015 की कार्यवाही पर रोक लगा दी थी और बिहार सरकार को न्यायाधीशों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने की अनुमति दी थी।

बता दें कि जिन तीन न्यायिक अधिकारियों को बर्खास्त किया गया, उन्हें पुलिस छापेमारी में नेपाल के एक होटल में लड़कियों के साथ आपत्तिजनक हालत में पकड़ा गया था। घटना 26 जनवरी 2013 की है। न्यायिक अधिकारी होने के कारण नेपाल की पुलिस ने तीनों को छोड़ दिया था। ये सभी विराटनगर स्थित मैट्रो गेस्ट हाउस के अलग-अलग कमरों में ठहरे थे।

विराटनगर से प्रकाशित नेपाली भाषा के अखबार ‘उदघोष’ के 29 जनवरी 2013 के अंक में यह खबर प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी। इस मामले की जाँच पूर्णिया के जिला जज ने की और अपनी सिफारिश पटना हाई कोर्ट को भेजी थी। बिहार राज्य बार काउंसिल की ओर से घटना के एक सप्ताह के बाद मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिख कर इस घटना की जानकारी दी गई थी। हालाँकि, जाँच के दौरान पता चला कि मैट्रो गेस्ट हाउस के रजिस्टर के पन्ने को भी फाड़ दिया गया था, जिसमें इन तीनों की एंट्री थी।

मामला सामने आने के बाद पटना हाईकोर्ट ने पूर्णिया के तत्कालीन जिला जज संजय कुमार से मामले की जाँच कराई। जाँच रिपाेर्ट में मामला सत्य पाए जाने के बाद हाई कोर्ट की स्टैंडिंग कमेटी ने तीनों को बर्खास्त करने की सिफारिश की थी। इस मामले में गृह मंत्रालय के उप सचिव एसएम कंडवाल ने पटना उच्च न्यायालय के तत्कालीन रजिस्ट्रार जनरल को पत्र लिखकर मामले की जाँच करने के लिए कहा। 

पटना उच्च न्यायालय ने पूर्णिया जिले और सत्र न्यायाधीश को मामले की जाँच करने का निर्देश दिया। रिपोर्ट में लिखा गया कि तीनों न्यायाधीशों ने कहा कि जिस समय घटना हुई, उस समय वे नेपाल में नहीं बल्कि भारत में थे। पूर्णिया जिला और सत्र न्यायाधीश, संजय कुमार ने अपनी रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया कि नेपाली दैनिक ‘उद्घोष’ ने गलत स्टोरी प्रकाशित करने के लिए माफी माँगी थी।

हालाँकि, संजय कुमार द्वारा की गई जाँच से असंतुष्ट पटना उच्च न्यायालय ने गृह मंत्रालय को हस्तक्षेप करने के लिए कहा। गृह मंत्रालय की एक एजेंसी ने आरोपित जजों के मोबाइल फोन के हिस्ट्री को ट्रैक किया और पाया कि उनके फोन 26-27 जनवरी, 2013 को एक साथ ऑफ कर दिए गए थे और जब यह फिर से एक्टिव हुआ तो नेपाल के फोर्ब्सगंज शहर के पास कहीं ट्रेस किया गया था। यह दर्शाता है कि तीनों जज नेपाल में थे, न कि भारत में, जैसा कि उनके द्वारा दावा किया गया था।

गृह मंत्रालय द्वारा दायर रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है आरोपित जजों ने होटल के बिल भी पेश किए थे, ताकि यह साबित किया जा सके कि घटना के दिन वे बिहार के पूर्णिया में थे, नेपाल में नहीं। रिपोर्ट में कहा गया है कि होटल के बिल तैयार किए गए थे और एक आरोपित न्यायाधीश ने खुद हस्ताक्षर किए थे। निष्कर्षों के आधार पर, तीनों जजों की बर्खास्तगी को मँजूरी देते हुए एक प्रस्ताव पारित किया गया।

इस बीच फरवरी 2014 में, तीनों आरोपित न्यायाधीशों ने बर्खास्तगी के खिलाफ उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। इसके बाद न्यायिक अधिकारियों यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट गए कि अनुशासनात्मक जाँच के बिना उन्हें बर्खास्त नहीं किया जा सकता है।

इस बीच, पटना HC की पूर्ण अदालत ने HC के आदेश के अनुपालन में उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश के आदेश पारित किए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में राज्य सरकार को सिफारिश पर कार्रवाई करने से रोकते हुए उनके खिलाफ कार्यवाही पर रोक लगा दी थी।

हालाँकि, 2019 में जस्टिस इंदु मल्होत्रा और संजीव खन्ना की पीठ ने आरोपित न्यायिक अधिकारियों की याचिका को खारिज कर दिया और उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा। इसने राज्य सरकार को उनकी बर्खास्तगी पर हाई कोर्ट की सिफारिश पर निर्णय लेने की अनुमति दी। इसमें कहा गया है कि न्यायाधीश राज्य सरकार द्वारा पारित किए गए बर्खास्तगी आदेशों को चुनौती दे सकते हैं।

2016 की रक्षाबंधन पर PM मोदी से कहा- आप मेरे भाई हैं…, 2020 में कनाडा में लाश मिली: करीमा को किसने मारा?

पाकिस्तान की बलूच कार्यकर्ता करीमा बलूच की कनाडा की राजधानी टोरंटो में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। लेकशोर में हार्बरफ्रंट में उनकी लाश मिली। वो रविवार (दिसंबर 20, 2020) को दोपहर 3 बजे से ही लापता थीं। इसके बाद टोरंटो पुलिस ने उन्हें खोजने के लिए जनता की मदद माँगी थी। करीमा बलूच की लाश एक द्वीप पर मिली। उनके शौहर हम्माल हैदर और भाई ने मृत शरीर की पहचान की।

पुलिस शव को अपने कब्जे में लेकर जाँच कर रही है। लोगों का कहना है कि कनाडा की पुलिस और सुरक्षा एजेंसी CSIS को इस मामले में पाकिस्तान का हाथ होने की जाँच ज़रूर करनी चाहिए। कनाडा में पाकिस्तान के ISI एजेंट्स की सक्रियता बढ़ने की ख़बरें आ रही हैं और वहाँ के मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो से अपील कर रहे हैं कि वो कार्रवाई करें। ‘बलूच नेशनल मूवमेंट’ ने करीमा की मौत पर 40 दिनों का शोक घोषित किया है।

करीमा ‘बलूच स्टूडेंट्स ऑर्गेनाईजेशन (आज़ाद)’ के नेता के रूप में लोकप्रिय हुई थीं और क्षेत्र को पाकिस्तान से स्वतंत्रता दिलाने के लिए आंदोलन चलाया था। वो पाकिस्तान की फ़ौज और सरकार के खिलाफ खासी मुखर थीं और महिला व मानव अधिकार के लिए आवाज़ उठाती रहती थीं। वो BSO की पहली महिला अध्यक्ष भी थीं। 2014 में संगठन के तत्कालीन अध्यक्ष ज़ाहिद बलूच के अचानक गायब होने के बाद उन्होंने ये पद सँभाला था।

पाकिस्तान की सरकार ने BSO को एक आतंकी संगठन घोषित कर रखा है और मार्च 15, 2013 को ही इसे प्रतिबंधित संगठनों की श्रेणी में डाल दिया गया था। बलूचिस्तान में पाकिस्तानी फ़ौज द्वारा किए जा रहे अत्याचारों की तरफ अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान दिलाने के लिए प्रयासरत रहीं करीमा 2016 में पाकिस्तान से किसी तरह निकलने में कामयाब हो गई थीं और उन्होंने कनाडा में शरण ली थी। उन्हें कई धमकियाँ मिली थीं।

उन्होंने बताया था कि पाकिस्तान की फ़ौज ने उन पर हमला कर दिया था, जिसमें वो किसी तरह बच निकलीं और 1 वर्ष तक अंडरग्राउंड रहने के बाद अपने कुछ दोस्तों की मदद से पाकिस्तान से बाहर निकलने में कामयाब रहीं। वर्ष 2016 में ही BBC ने उन्हें विश्व की शीर्ष 100 सबसे ‘प्रेरक और प्रभावशाली’ महिलाओं की सूची में रखा था। उनका कथन कि ‘कोई भी राष्ट्रीय आज़ादी का अभियान महिलाओं के बिना अपूर्ण है’, को BBC ने मेंशन किया था।

वर्ष 2016 में करीमा बलूच ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए एक रक्षाबंधन संदेश भेजा था। उन्होंने अपने वीडियो मैसेज में कहा था कि बलूचिस्तान की महिलाएँ पीएम मोदी को अपने भाई के रूप में देखती हैं। बलूचिस्तान में चल रहे युद्ध अपराध, मानवाधिकार उल्लंघन, नरसंहार के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आवाज़ बनने की उन्होंने पीएम मोदी से दरख्वास्त की थी। उन्होंने कहा था, “आप उन बहनों की आवाज़ बनें, जिनके भाई गायब कर दिए गए हैं।”

मई 2019 में उन्होंने आरोप लगाया था कि पाकिस्तान बलूचिस्तान के संसाधनों का दोहन कर रहा है और यहाँ की जनता गरीब होती जा रही है। उन्होंने स्विट्जरलैंड में आयोजित संयुक्त राष्ट्र के एक सेशन में भी ये मुद्दा उठाया था। बलूच नेशनल मूवमेंट (BNM) ने उनकी मौत को आंदोलन के लिए बड़ी क्षति बताया है। संगठन ने कहा कि वो एक दूरद्रष्टा नेता थीं, राष्ट्रीय प्रतीक थीं- जिनकी भरपाई सदियों में भी नहीं हो सकती।

बलूचिस्तान में लोगों की नाराज़गी और आंदोलन के लिए भी पाकिस्तान हमेशा भारत को ही जिम्मेदार ठहराता है। पाकिस्तानी अख़बार ‘द एक्सप्रेस ट्रिब्यून’ में मुल्क के रिटायर्ड एयर मार्शल और पूर्व एम्बेस्डर शहजाद चौधरी ने एक लेख में दावा किया था कि अजीत डोभाल ‘गंदे हथकंडे’ अपना रहे हैं और 2014 में नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के साथ NSA बनाए गए अजीत डोभाल ख़ुफ़िया विभाग के दक्ष व अनुभवी व्यक्ति हैं और 90 के दशक में 6 वर्षों तक पाकिस्तान में रहे हैं।

आशा ने इस्माइल का प्रपोजल ठुकराया, उसने दिन-दहाड़े तलवार से कई बार काटा: खौफनाक Video Viral

कर्नाटक के हुबली से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। वहाँ इस्माइल नाम के युवक ने अपने प्रपोजल ठुकराने के लिए एक हिंदू लड़की आशा पर दिन दहाड़े तलवार से हमला कर दिया। घटना किसी ने मोबाइल में शूट की और अब यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है। लड़की फिलहाल खतरे से बाहर बताई जा रही है लेकिन इस हमले में उसे गंभीर घाव आए हैं।

पूरा मामला हुबली शहर के देशपांडे नगर का है। बताया जा रहा है लड़की अपने घर से दफ्तर जाने के लिए निकली थी, लेकिन उसी समय इस्माइल अपने हाथ में तलवार लेकर आ गया और पीछे से उस पर हमला कर दिया। इस दौरान एक शख्स बीच में आया और इस्माइल को आगे वार करने से रोक लिया।

आशा, इस हमले में गंभीर रूप से घायल हो गई। बाद में उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया। उधर पुलिस ने इस्माइल  को अरेस्ट किया। शुरुआती जाँच में पता चला है कि इस्माइल की फ्रेंडशिप आशा से 2 साल पहले हुई थी और 6 महीने पहले उसने आशा को प्रपोज भी किया था। 

आशा ने इस्माइल की मंशा समझने के बाद उससे रिश्ता तोड़ लिया और पिछले 5 माह से वह उसका फोन कॉल आदि भी नहीं उठा रही थी। आशा के इसी रवैये से तंग आकर इस्माइल ने उससे बदला लेने का फैसला किया और मौका मिलते ही उस पर जानलेवा हमला कर दिया।

पुलिस का कहना, “हमने आरोपित इस्माइल को गिरफ्तार कर लिया है और अपराध में इस्तेमाल किए गए हथियार को जब्त कर लिया है। जाँच चल रही है। लड़की को एक निजी अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया गया है। वहाँ उसका इलाज चल रहा है। डॉक्टर ने हमें बताया कि वह खतरे से बाहर है। एक बार उसे होश आ जाए तो हम उसका बयान ले लेंगे।”

रिपब्लिक टीवी के अनुसार उनके सूत्रों से उन्हें पता चला है कि इस्माइल ने कुछ दिन पहले सुसाइड करने की भी कोशिश की थी। हालाँकि, उसके रिश्तेदारों ने उसे बचा लिया।

जम्मू कश्मीर DDC चुनाव: 86 सीटों पर आगे निकला गुपकार गैंग, भाजपा को 47 पर बढ़त – कॉन्ग्रेस तीसरे नंबर पर फिसली

जम्मू कश्मीर में हुए स्थानीय निकाय (DDC) के चुनावों में गुपकार गैंग और भाजपा के बीच काँटे की टक्कर चल रही है, लेकिन शुरुआती बढ़त के बाद भाजपा पिछड़ रही है। खबर लिखे जाने तक जहाँ गुपकार गैंग 86 सीटों पर आगे चल रहा था, वहीं भाजपा 47 सीटों पर आगे है। हालाँकि, 21 सीटों पर आगे चल रही कॉन्ग्रेस इस चुनाव में भाजपा का खेल बिगाड़ सकती है, जिसके गुपकार गैंग से मिल जाने की संभावना है।

जम्मू कश्मीर में DDC की कुल 280 सीटों के लिए मतदान हुए थे, जिसके चुनाव परिणाम आज आने वाले हैं। काउंटिंग की प्रक्रिया को रिटर्निंग अधिकारियों के सुपरविजन में पूरा किया जा रहा है और पूरी प्रक्रिया की CCTV रिकॉर्डिंग भी की जा रही है। कोरोना के दौरान जारी दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए काउंटिंग हो रही है। कई इलाकों में धारा-144 लागू है और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कुछ नेताओं को हिरासत में भी लिया गया।

जम्मू और कश्मीर डिवीजन में कुल सीटों का आधार, अर्थात दोनों ही डिवीजन में 140-140 सीटें हैं। जम्मू-कश्मीर में जिला विकास परिषद (DDC) चुनाव की मतगणना से एक दिन पहले सोमवार को अधिकारियों ने एहतियात के तौर पर कम से कम 20 राजनीतिक नेताओं को हिरासत में लिया था।

चुनाव प्रचार के दौरान केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा था कि गुपकार गैंग के पास जब सत्ता थी तो उन्होंने कभी रिफ्यूज़ियों को वोट का अधिकार नहीं दिया लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने ये समझा कि जिन परिवारों ने हिंदुस्तान को चुना, पाकिस्तान का तिरस्कार किया, उनको ये अधिकार मिलना चाहिए कि वो जाकर वोट करें। उन्होंने पूछा था कि जिन्होंने हिन्दुस्तान को तब गले लगाया, जब भारत का विभाजन हुआ और हिन्दुस्तान की धरती को चुना और रिफ्यूजी बनकर यहाँ आए।

कॉन्ग्रेसी राज में किसानों का नरसंहार: 24 मौतें, 150+ घायल… आँसू गैस के बाद दनादन चली थीं गोलियाँ

दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन के नाम पर मोदी सरकार को बदनाम करने का काम जितनी तेजी से कॉन्ग्रेस कर रही है, उसे देख यही लगता है कि उनके लिए यह आंदोलन अपनी पहचान जिंदा रखने के लिए एक अवसर जैसा है। 

आए दिन हर कॉन्ग्रेसी नेता इस प्रदर्शन की बाबत उलटी-सीधी बयानबाजी कर रहे हैं। राहुल गाँधी स्वयं मोदी सरकार को क्रूर बता रहे हैं। हालाँकि इस बीच हैरानी इस बात की है कि आज किसानों की हितैषी बन बैठी कॉन्ग्रेस उस किसानों के नरसंहार, उस मुलताई कांड को भूल गई, जिसे आनी वाली 12 जनवरी को 18 साल पूरे हो जाएँगे।

12 जनवरी 1998 वही दिन है, जिसे याद करके आज भी मध्य प्रदेश की जनता सिहर जाए। इसी दिन राज्य में 24 किसानों को मौत के घाट उतारा गया था। उनकी गलती सिर्फ इतनी थी कि वह गेरुआ रोग के कारण खराब हुई अपनी फसलों की शिकायत लेकर सरकार के पास पहुँचे थे और उनसे समाधान चाहते थे। उनके इस प्रदर्शन का नेतृत्व समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक डॉ. सुनीलम कर रहे थे। 

किसानों की खस्ता हालात देखते हुए उन्होंने ही 25 दिसंबर 1997 को मुलताई में धरना देना शुरू किया था। धीरे-धीरे उनके साथ कई किसान नेता जुड़ते गए। किसान संघर्ष समिति का गठन हुआ और एक माँग पत्र बनाया गया। इन सब कोशिशों का सिर्फ़ यही मकसद था कि किसानों की बात सुन ली जाए और जो उनकी फसलें बर्बाद हुई हैं, उसके बदले सरकार मदद प्रदान करे।

बैठकें हुईं। आपसी बातचीत हुई। किसान नेताओं ने माँग रखी। लेकिन प्रशासन बिलकुल चुप था। देखते ही देखते 9 जनवरी 1998 का दिन आया। सैंकड़ों की तादाद में किसान बैतूल पुलिस ग्राउंड में जुट गए।

किसान चाहते थे कि उन्हें 1 एकड़ के बदले 5000 रुपए हर्जाना दिया जाए। लेकिन प्रशासन प्रस्ताव लेकर आया 1 एकड़ के बदले 400 रुपए देने का। किसानों ने मना कर दिया और अपनी कुछ अतिरिक्त माँगे बताईं, जैसे आधी कीमत पर राशन देना, खाद-बीज-कीटनाशक का कर्ज माफ कर देना आदि।

2 दिन तक प्रशासन अपनी शर्तों पर किसानों को मनाने का प्रयास करता रहा, लेकिन 12 जनवरी को किसानों ने विरोध-प्रदर्शन के तौर पर तहसील पर ताला लगाने का फैसला कर लिया। इस बीच कहते हैं कि कॉन्ग्रेस ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी कि किसानों पर पुलिस के हमले शुरू हो चुके थे। कई जगह आगजनी हुई थी, उनका इल्जाम भी प्रदर्शनकारियों पर मढ़ा गया था। उन्हें पकड़ कर जेल में बंद किया जाने लगा था। उन पर अराजकता फैलाने के इल्जाम लगने लगे थे। जिसे देख समझ कर किसानों में गुस्सा बढ़ता जा रहा था।

12 जनवरी को इसी गुस्से को जाहिर करने के लिए तहसील कार्यालय को घेरा गया और कथित तौर पर पथराव शुरू हुआ। बस, पुलिस जैसे मौके के तलाश में थी। उन्होंने पहले किसानों पर आँसू गैस छोड़े, लाठीचार्ज की और फिर बिना किसी पूर्व चेतावनी के फायरिंग शुरू हो गई।

अपनी खराब फसल के बदले मुआवजा माँगने वाले किसान घायल जमीन पर थे। 17 ने तो मौके पर दम तोड़ दिया था, लेकिन बाद में आँकड़े 24 बताए जाने लगे। धीरे-धीरे पता चला कि इस हमले में 150 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। कुछ बच्चे जो उसी रास्ते से गुजर रहे थे, वह भी पुलिसिया बर्बरता का शिकार हुए।

सबसे हैरानी की बात यह है कि 12 जनवरी 1998 को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह थे। वही दिग्विजय सिंह, जो आज ट्विटर पर आए दिन किसानों के नाम पर मोदी सरकार पर निशाना साध रहे हैं। किसानों के हमदर्द बने हैं। यही दिग्विजय, उस दौरान मुलताई कांड के समय चुनाव प्रचार कर रहे थे। मगर, प्रशासन के ख़िलाफ़ इनसे कुछ नहीं कहा जा रहा था।

दिग्विजय सिंह का मध्यप्रदेश में कार्यकाल

ध्यान रहे कि इस पूरे संहार से पहले और बाद में दिग्विजय सिंह के हाथ ही मध्य प्रदेश की डोर थी। 1998 में हुई 11वीं विधानसभा चुनाव में वह फिर 1 दिसंबर को 1998 को मुख्यमंत्री चुने गए थे और 7 दिसंबर 2003 तक कार्यभार संभाले रखा था। मगर, प्रशासन के ख़िलाफ़ उनसे कुछ नहीं कहा गया।

बाद में बलराम जाखड़ को कॉन्ग्रेस हाईकमान के बनाए जाँच दल में मुलताई भेजा गया। लौट कर उन्होंने बताया कि गलती प्रशासन की थी। तब जाकर दिग्विजय सरकार ने जिलाधिकारी रजनीश वैश्य और एसपी जीपी सिंह पर एक्शन लिया। कहने को पूरे मामले में प्रशासनिक जाँच के आदेश भी दिए गए लेकिन किसानों की स्थिति दिग्विजय राज में दयनीय बनी रही।

अंत में सारे किए धरे का ठीकरा सपा के सुनीलम पर फोड़ा गया। उन पर बाकायदा केस चले और आरोप मढ़ा गया कि उन्होंने किसानों को उकसाया। साल 2012 में सुनीलम को 7 साल की सजा हुई। जिस पर सुनीलम ने दिग्गी सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा:

`दिग्विजय सिंह ने मेरी हत्या के इरादे से ही 12 जनवरी 1998 को गोली चलवाई थी और मेरे खिलाफ 66 मुकदमे दर्ज कराने का मकसद सालों साल अदालत के चक्कर कटवाना तथा सजा दिलवाना ही था। आज मैं कह सकता हूँ कि वे तात्कालिक तौर पर ही सही, अपना षड्यंत्र पूरा करने में सफल हुए हैं।`

मध्य प्रदेश में किसानों की स्थिति आज भी बहुत बेहतर नहीं कही जा सकती लेकिन कॉन्ग्रेस शासन के अंत के बाद 2005 में शिवराज सरकार में वहाँ की स्थिति में सुधार देखने को मिलता है।

बराक ओबामा ने अपनी किताब में राहुल गाँधी को अनगढ़ छात्र बता कर बिलकुल सही विशेषण का प्रयोग किया। वो जनता को इंप्रेस करने के चक्कर में मोदी सरकार पर कीचड़ उछाल रहे हैं, लेकिन उनकी खुद की पार्टी मुलताई में हुए किसानों के संहार की जिम्मेदार मानी जाती है, वह आज तक उस पर बात नहीं करते।

CAG रिपोर्ट्स कहती हैं कि कॉन्ग्रेस सरकार 52000 करोड़ रुपए तक की गड़बड़ी कर चुकी है, जिसे किसानों की कर्जमाफी और उनके कल्याण के लिए सैंक्शन किया गया था। बावजूद इन सभी तथ्यों के कॉन्ग्रेस का कोई नेता इन पर मलाल नहीं खाता और मोदी सरकार से खुल कर शर्म करने को कहता है। कॉन्ग्रेस से यह सवाल तो बनता है कि मोदी सरकार किस बात की शर्म करे कि उनके सामने एक ऐसा विपक्ष है, जिसका मकसद जनसरोकार नहीं राजनीति बचाने के लिए अवसर खोजना है।