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जस्टिस यशवंत वर्मा पर अब तक क्यों नहीं हुई FIR, क्या है वी रामास्वामी केस, क्यों सारी शक्ति CJI के हाथ: जानिए सब कुछ

दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के घर लगी आग में होली के दिन बड़ी मात्रा में अघोषित नकदी मिली थी। इस नकदी की कीमत 15 करोड़ रुपए बताई जा रही है। इसको लेकर लोगों में सवाल उठा कि इतनी भारी मात्रा में नकदी मिलने के बावजूद इस मामले में FIR क्यों नहीं की गई। जस्टिस वर्मा पर FIR करने की माँग वाली एक याचिका को भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। आइए जानते हैं, इसके पीछे क्या वजह है।

इस सवाल का उत्तर भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय में निहित है, जो अब एक कानूनी ढाँचे का रूप से ले लिया है। यह वी. रामास्वामी बनाम भारत संघ (1991) मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से उपजा है, जिसके कारण जजों पर आपराधिक मुकदमा दर्ज होने का निर्णय लेने का अधिकार भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के हाथों में आ गया है।

इस फैसले के बाद CJI तय करेंगे कि जिस जज पर आरोप लग रहा है कि वह आपराधिक कदाचार या अक्षमता है या नहीं है। अगर है भी तो CJI के सहमति के बाद भी हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के किसी भी न्यायाधीश के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाए सकता है। यानी सबसे पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश जज पर लगाए गए आरोपों का आकलन करेंगे।

इसके बाद ही CJI राष्ट्रपति को सलाह देंगे कि उस जज के खिलाफ FIR दर्ज करने की अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं। हालाँकि, शीर्ष न्यायालय ने माना था कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत जज भी ‘लोक सेवक’ हैं। इसलिए लोक सेवक होने के नाते जजों पर भी आय से अधिक संपत्ति रखने जैसे अपराधों के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है। लेकिन, सब कुछ CJI के हाथ में होगा।

जस्टिस रामास्वामी बनाम भारत संघ

जस्टिस रामास्वामी मामले में शीर्ष न्यायालय ने तर्क दिया था कि यह तंत्र न्यायिक स्वतंत्रता को जवाबदेही के साथ संतुलित करता है। बाद में इसी फैसले को और अधिक परिष्कृत किया गया। सी. रविचंद्रन अय्यर बनाम न्यायमूर्ति एएम भट्टाचार्जी (1995) मामले में जजों के खिलाफ मिली शिकायतों की जाँच के लिए ‘इन-हाउस प्रक्रिया’ को औपचारिक रूप से दिया।

सी. रविचंद्रन अय्यर बनाम न्यायमूर्ति एएम भट्टाचार्जी (1995) में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 124 के तहत ‘बुरे व्यवहार’ और ‘महाभियोग योग्य दुर्व्यवहार’ के बीच अंतर को स्पष्ट किया। साथ ही शीर्ष कोर्ट ने न्यायिक कदाचार की जाँच के लिए एक ‘आंतरिक प्रक्रिया’ के तहत पाँच सदस्यीय समिति का गठन किया। समिति ने अक्टूबर 1997 में अपनी रिपोर्ट दी और सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 1999 में इसे अपनाया।

साल 2014 में इसमें सुप्रीम कोर्ट में इसमें संशोधन किया। साल 2014 में मध्य प्रदेश के एक न्यायाधीश द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकायत के कारण सुप्रीम कोर्ट ने अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एसके गंगेले बनाम रजिस्ट्रार जनरल हाई कोर्ट मध्य प्रदेश मामले में आंतरिक प्रक्रिया में संशोधन किया। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जेएस खेहर और अरुण मिश्रा ने सात चरण वाली प्रक्रिया की रूपरेखा तैयार की।

इसके तहत, किसी जज के खिलाफ शिकायत भारत के मुख्य न्यायाधीश, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या राष्ट्रपति को दी जा सकती है। अगर शिकायत हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या राष्ट्रपति को दी जाती है तो वे उस शिकायत को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को भेजते हैं। CJI को लगता है कि शिकायत गंभीर नहीं है तो वे उसे खारिज कर सकते हैं।

अगर शिकायत गंभीर लगती तो वे आगे की प्रक्रिया अपनाई जाती है। अगर मामला हाई कोर्ट के किसी जज का होता है तो भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) उस हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में रिपोर्ट की माँग करते हैं। तमाम जाँच और आरोपित जज के बयान लेने के बाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश यदि गहन जाँच की सिफारिश करते हैं तो CJI रिपोर्ट और बयान की समीक्षा करते हैं।

समीक्षा के बाद CJI एक जाँच समिति का गठन करते हैं। यह समिति तीन सदस्यीय होगी, जिसमें दो अलग-अलग हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक हाई कोर्ट के न्यायाधीश शामिल होंगे। यह समिति न्यायाधीश से स्पष्टीकरण माँगती है। तमाम जाँच के बाद यह समिति CJI को अपनी रिपोर्ट देती है। इसमें बताया जाता है कि आरोपों में दम है या नहीं। साथ ही कदाचार के कारण निष्कासन कार्यवाही की आवश्यकता है या नहीं।

यदि कदाचार गंभीर नहीं हैतो CJI न्यायाधीश को सलाह दे सकते हैं और रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर रख सकते हैं। यदि कदाचार गंभीर है तो CJI संबंधित न्यायाधीश को इस्तीफा देने या सेवानिवृत्त होने की सलाह देते हैं। यदि आरोपित न्यायाधीश इससे इनकार करता है तो CJI संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश देते हैं कि आरोपित जज को न्यायिक कार्य सौंपना बंद दें।

यदि आरोपित न्यायाधीश फिर भी इस्तीफा नहीं देता हैं तो CJI राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सूचित करते हैं तथा उन्हें हटाने की कार्यवाही की सिफारिश करते हैं। इसके बाद संसद में उस न्यायाधीश को हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की जाती है। हालाँकि, यह तमाम आंतरिक प्रक्रिया का जिक्र संविधान में नहीं है। इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा जजों के लिए खुद ही विकसित कर दिया गया है।

जस्टिस यशवंत वर्मा का केस भी इसी प्रक्रिया के तहत

जस्टिस यशवंत वर्मा का केस इसी ढाँचे के तहत प्रक्रिया में है। मामला सामने आने के बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना ने जस्टिस वर्मा को उनके गृह हाई कोर्ट इलाहाबादा भेजने का फैसला सुना दिया। जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाई कोर्ट से ही दिल्ली हाई कोर्ट में लाया गया था। वहीं, इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन इसका विरोध कर रहा है।

CJI ने इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय से फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट माँगी। चीफ जस्टिस उपाध्याय ने 25 पन्नों की रिपोर्ट CJI दी, जिसमें कहा गया कि मामले की गहन जाँच की जरूरत है। इसके बाद CJI ने जस्टिस डीके उपाध्याय को आदेश दिया कि वे जस्टिस यशवंत वर्मा को कोई भी न्यायिक कार्य ना सौंपे। फिर उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट स्थानांतरण का आदेश निकाल दिया गया।

रिपोर्ट मिलने के बाद CJI खन्ना ने जस्टिस यशवंत वर्मा मामले की ‘आंतरिक जाँच’ कराने का निर्णय लिया। इस जाँच के लिए तीन सदस्यों की एक समिति बनाई गई है। इस समिति में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाईकोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया जज वर्मा पर FIR की माँग वाली याचिका

सुप्रीम कोर्ट ने 28 मार्च 2025 को दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ सरकारी परिसर में अवैध नकदी मिलने के मामले में FIR दर्ज करने की माँग वाली याचिका खारिज कर दी। जस्टिस अभय ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की पीठ ने कहा कि याचिका समय से पहले दायर की गई थी। पीठ ने कहा कि CJI के निर्देश पर मामले की इन-हाउस जाँच जारी है।

दो जजों की खंडपीठ ने आगे कहा, “इन-हाउस जाँच पूरी होने के बाद कई विकल्प खुले हैं। सीजेआई एफ़आईआर दर्ज करने का निर्देश दे सकते हैं या रिपोर्ट की जाँच करने के बाद मामले को संसद को भेज सकते हैं। आज इस याचिका पर विचार करने का समय नहीं है। इन-हाउस रिपोर्ट के बाद सभी विकल्प खुले हैं। याचिका समय से पहले है।”

याचिकाकर्ता नेदुम्पारा ने अपनी याचिका में कहा था कि केरल हाई कोर्ट के तत्कालीन जज के खिलाफ POCSO मामले का आरोप था, लेकिन पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज नहीं की। उन्होंने कहा कि जाँच करना कोर्ट का काम नहीं है। इसे पुलिस पर छोड़ देना चाहिए। उन्होंने कहा कि इन-हाउस कमिटी वैधानिक प्राधिकरण नहीं है। यह विशेष एजेंसियों द्वारा की जाने वाली जाँच का विकल्प नहीं हो सकती है।

नेदुम्पारा ने कहा कि जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में आम आदमी कई सवाल पूछ रहा है। लोग सवाल कर रहे हैं कि 14 मार्च को जब नकदी बरामद हुई, उस दिन से आज तक एफआईआर क्यों नहीं दर्ज की गई? जब्ती का कोई पंचनामा क्यों नहीं बनाया गया? एक सप्ताह तक इस घोटाले को क्यों छिपाया गया? आपराधिक कानून क्यों नहीं बनाया गया? हालाँकि, पीठ ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया।

पाकिस्तान में इस्लाम न अपनाने पर हिंदू की हत्या, मुश्ताक नाम का हत्यारा गिरफ्तार : ईद से पहले मारी गोली, देता था जान से मारने की धमकी

पाकिस्तान के पेशावर में 56 साल के हिंदू सफाई कर्मचारी नदीम नाथ को सिर्फ इसलिए गोली मार दी गई, क्योंकि उसने इस्लाम कबूल करने से मना कर दिया। इस मामले में मुश्ताक नाम के इस्लामी कट्टरपंथी को पकड़ा गया है, जिसके नदीम की हत्या की बात स्वीकारी है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, शनिवार (29 मार्च 2025) को पेशावर की पोस्टल कॉलोनी में नदीम अपना काम खत्म कर घर लौट रहे थे, तभी मुश्ताक नाम के शख्स ने उन पर हमला कर दिया। गोली लगते ही नदीम जमीन पर गिर पड़े, अस्पताल पहुँचे, लेकिन जान नहीं बची। चार बच्चों के पिता नदीम का क्या कसूर था? सिर्फ इतना कि वो अपने धर्म पर अडिग रहे।

नदीम के भाई सागर नाथ ने FIR में बताया कि मुश्ताक पिछले 2-3 महीने से नदीम पर इस्लाम अपनाने का दबाव डाल रहा था। नदीम ने हर बार मना किया, लेकिन इस्लामी कट्टरता के आगे उनकी एक न चली। सागर ने कहा, “मुश्ताक ने मेरे भाई के सिर में गोली मारी, वो हमें चेतावनी देता था कि धर्म नहीं बदला तो जान लेगा।” नदीम के दोस्तों ने भी परिवार को बताया कि वो किसी की परेशानी से तंग था, पर सबसे बड़े होने के नाते उसने घरवालों से कुछ नहीं कहा। एक मेहनती इंसान को अपनी जान सिर्फ इसलिए गंवानी पड़ी, क्योंकि वो हिंदू था।

पुलिस ने दावा किया कि भाना मारी थाने के SHO अजमल हयात की टीम ने 24 घंटे में मुश्ताक को चरसड्डा से पकड़ लिया। SHO ने कहा, “उसने जुर्म कबूल कर लिया, जाँच चल रही है।” लेकिन सवाल ये है कि क्या एक गिरफ्तारी से हिंदुओं का दर्द कम हो जाएगा?

खैबर पख्तून्ख्वा पुलिस के एक्स हैंडल का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार: X_KP_Police1)

पाकिस्तान की सरकार आतंकवाद और गरीबी से जूझ रही है, लेकिन अल्पसंख्यकों की सुरक्षा में पूरी तरह नाकाम है। वहाँ की इस्लामी कट्टरता हिंदुओं को निगल रही है। जबरन धर्मांतरण के मामले आम हैं, हर साल सैकड़ों हिंदू लड़कियों को अगवा कर उनकी जिंदगी बर्बाद कर दी जाती है। हिंदुओं पर अत्याचार, मंदिरों को तोड़ना, और जबरन इस्लाम थोपना उनकी हकीकत है। ये इस्लामी कट्टरपंथ का नंगा नाच है, जो अल्पसंख्यकों को कुचल रहा है। नदीम की हत्या इसका ताजा सबूत है।

80 हजार गुंडों को जेल में भरा, 8000+ का एनकाउंटर, 222 हुए ढेर: 8 साल में उत्तर प्रदेश में अपराध में 85% तक की कमी, योगी सरकार का एक्शन देख खुद थाने पहुँच रहे अपराधी

उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार के 8 वर्ष पूरे हो चुके हैं। मुख्यमंत्री योगी 2017 से लगातार अपनी पहली प्राथमिकता प्रदेश की कानून व्यवस्था को बताते आए हैं। इस दिशा में उन्हें सफलता भी मिली है। सरकार के 8 वर्ष पूरे होने के साथ ही उत्तर प्रदेश में जघन्य अपराधों में 85% तक की कमी आई है। उनकी सरकार के दौरान पुलिस ने ताबड़तोड़ एनकाउंटर किए हैं।

भाजपा 2017 में हुए चुनावों में सपा के ‘गुंडाराज’ को खत्म करने का वादा करके सत्ता में आई थी। इसके बाद मुख्यमंत्री बनते ही योगी आदित्यनाथ ने अपना एजेंडा स्पष्ट कर दिया था। तब से लगातार उत्तर प्रदेश में चाहे माफियाओं की सम्पत्तियाँ जब्त करना हो, या फिर अपराधियों को जेल भेजना, इस पर लगातार काम चल रहा है।

रिपोर्ट कार्ड में बताया- 85% तक लाए जघन्य अपराधों में कमी

उतर प्रदेश में चोरी, डकैती और अपहरण जैसे अपराधों पर योगी सरकार की सख्ती का सीधा असर पड़ा है। आँकड़े इसकी तस्दीक करते हैं। यूपी सरकार की एक रिपोर्ट कहती है कि अगर 2016 से तुलना की जाए तो उत्तर प्रदेश में ऐसे अपराधों में 85% तक की कमी हुई है।

रिपोर्ट बताती है कि राज्य में 2016 के मुकाबले डकैती मामलों में 85% तक की कमी आई है। लूट के मामले भी 77% तक घट गए हैं। हत्या के मामले भी 41% घटे हैं। सरकार ने बताया है कि दहेज़ हत्याओं में भी राज्य में इसी तरह की कमी देखी गई है। कभी राह चलते लूट के लिए बदनाम पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले अब सुरक्षित हो चुके हैं।

उत्तर प्रदेश पुलिस ने बताया है कि इसके पीछे पुलिस की लगातार अपराधियों पर कार्रवाई और CCTV तथा बढ़ी हुई पुलिस गश्त जिम्मेदार हैं। पुलिस का इन्फ्रा मजबूत होना भी इसका एक कारण है। बीते कुछ वर्षों में पुलिस को हाईटेक गाड़ियाँ मिली हैं, उससे उसकी उपस्थिति बढ़ाने में भी मदद मिली है।

8 हजार+ का एनकाउंटर

उत्तर प्रदेश में बीते 8 वर्षों में अपराध पर शिकंजे के लिए योगी सरकार ने इन्फ्रा मजबूत करने से साथ ही पुलिस को भी छूट दी है। रिपोर्ट बताती है कि बीते 8 वर्षों में अलग-अलग एनकाउंटर में 222 अपराधी मार गिराए गए हैं। इन एनकाउंटर में अपराधी 8118 घायल हुए हैं। एनकाउंटर के डर के चलते कई बार अपराधियों के खुद ही थाने में पहुँचने की तस्वीरें सामने आती रही हैं।

इसके अलावा लगभग 80 हजार अपराधी जेल भी भेजे गए हैं, 900 से अधिक के विरुद्ध NSA की कार्रवाई हुई है। NSA की कार्रवाई का सामने करने वाले अधिकांश वह अपराधी हैं, जिन्होंने किसी मौके पर मजहबी तनाव फैलाने का प्रयास किया या फिर कोई जघन्य अपराध किया।

माफिया तंत्र पर भी वार

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में स्पष्ट रूप से कहा था कि वह माफिया को मिट्टी में मिला देंगे। 1990 के दशक के बाद उत्तर प्रदेश में अपराध संस्थागत हो गया था। हर क्षेत्र में एक ना एक माफिया ने अपना प्रभुत्व जमा लिया था। यह माफिया अपराध से आगे बढ़ कर आर्थिक साम्राज्य भी खड़ा कर चुके थे।

इन माफियाओं के पास अपराध से अर्जित पैसे से बनाई हुई हजारों करोड़ की सम्पत्ति थी। योगी सरकार का हंटर इन माफियाओं के साथ ही इन संपत्तियों पर भी चला है। उत्तर प्रदेश पुलिस ने इन 8 वर्षों के दौरान माफियाओं की ₹4000 करोड़ से अधिक की सम्पत्ति जब्त कर ली है।

गैंगस्टर एक्ट के अंतर्गत राज्य में ₹14000 करोड़ की सम्पत्ति जब्त हुई है। 68 माफिया और उनके गैंग के 1400+ सदस्यों के विरुद्ध 700+ मुकदमे दर्ज हुए हैं। पुलिस ने इनके 350+ से अधिक शस्त्र लाइसेंस भी कैंसल किए हैं। इसके चलते कभी मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद के नाम से काँपने वाले इलाकों में भी अब निवेश आ रहा है।

पुलिस इन्फ्रा पर भी जोर

योगी सरकार ने कानून व्यवस्था मजबूत करने के लिए अपराधियों पर कार्रवाई के साथ ही इन्फ्रा मजबूत करने पर भी जोर दिया है। किसी भी पुलिस बल का सबसे बड़ी जरूरत पुलिसकर्मी होते हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस लगातार पुलिसकर्मियों की कमी से जूझती आई है।

एक रिपोर्ट के अनुसार, 2017 में उत्तर प्रदेश पुलिस में 2 लाख से अधिक पुलिसकर्मियों की कमी थी। पिछली सरकार की दो बड़ी भर्तियों और हाल ही में सम्पन्न हुई 60 हजार कांस्टेबल भर्ती बाद यह कमी वर्तमान में 50 हजार के आसपास आ गई है।

इसे भी खत्म करने के लिए यूपी सरकार ने तय किया है कि वह 28 हजार भर्तियाँ अप्रैल में लाने जा रही है। इसके बाद जरूरत का लगभग 90% पुलिसबल मौजूद होगा। इससे पुलिस मजबूत होने के साथ ही उत्तर प्रदेश में युवाओं को रोजगार भी मिला है। योगी सरकार ने इस माध्य से 2.16 लाख युवाओं को पक्का रोजगार दिया है।

प्रदेश में पुलिसकर्मियों की भर्ती के साथ ही 126 नए थाने बनाए गए हैं। इससे पुलिस की हर इलाके में सुलभता से मौजूदगी हो सकेगी। इसके अलावा 86 नई चौकियाँ बनाई गई हैं। UP112 के लिए भी प्रदेश में नई स्कॉर्पियो गाड़ियाँ खरीदी गई हैं।

जब हाई कोर्ट में जज थीं निर्मल यादव तब भ्रष्टाचार में आया नाम, ट्रांसफर हुआ-रिटायर भी हो गईं, पर फैसला अब आया: साथी महिला जज के घर आया था ₹15 लाख भरा बैग, जानिए क्या है मामला

चंडीगढ़ की एक अदालत ने शनिवार (30 मार्च 2025) को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश निर्मल यादव को भ्रष्टाचार के मामले में बरी कर दिया है। दरअसल, साल 2008 में केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) द्वारा निर्मल यादव एवं अन्य लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला दर्ज कर दिया है। इस मामले में शामिल तीन अन्य लोगों को भी बरी कर दिया गया है।

चंडीगढ़ की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अलका मलिक की विशेष अदालत ने जिन अन्य आरोपितों को बरी किया है, उनके नाम हैं- रविन्द्र सिंह भसीन, राजीव गुप्ता और निर्मल सिंह। राजीव गुप्ता ने दावा किया था कि यह पैसा एक ज़मीन सौदे मिला है। वहीं, निर्मल सिंह ने पैसे के उद्देश्य के बारे में झूठा बयान दिया था। वहीं, होटल व्यवसायी रविंद्र सिंह ने दावा किया था कि यह पैसा उनके हैं।

जिस समय निर्मल यादव पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा था, उस समय वह हाई कोर्ट की जज और पूर्व न्यायिक अधिकारी थीं। यह पूरा मामला रुपए से भरे बैग को लेकर था, जिसमें 15 लाख रुपए भेजे गए थे।दरअसल, अगस्त 2008 में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट की जज निर्मलजीत कौर के आवास पर 15 लाख रुपए से भरा एक बैग पहुँचाया गया था।

इसके बाद जस्टिस कौर के चपरासी ने इस मामले की सूचना चंडीगढ़ पुलिस को दी थी। इसके बाद चंडीगढ़ पुलिस ने इस मामले में प्राथमिकी दर्ज की थी। बाद में पंजाब के तत्कालीन राज्यपाल के आदेश पर मामला सीबीआई को सौंप दिया गया था। सीबीआई ने इस मामले की जाँच शुरू की, लेकिन कुछ समय के बाद केस को बंद करने के लिए कोर्ट में कोर्ट क्लोजर रिपोर्ट डाल दी।

हालाँकि, रिपोर्ट को खारिज कर दिया गया। इसके बाद साल 2011 में सीबीआई ने आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। ​​साल 2014 में सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने पाँच आरोपितों के खिलाफ आरोप तय किए। जस्टिस कौर ने साल 2016 में कोर्ट में अपना बयान रिकॉर्ड कराया। मुख्य आरोपियों में से एक पूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता संजीव बंसल ने कोर्ट में इस केस को बंद करने का आवेदन दिया।

बंसल ने कहा कि वह सिर्फ कूरियर ब्वॉय थे और होटल व्यवसायी रवींद्र सिंह का पैसा निर्मल सिंह पहुँचाने गए थे। बाद में दिसंबर 2016 में मोहाली में बंसल की मौत हो गई। इसके बाद जनवरी 2017 में उनके खिलाफ कार्यवाही बंद कर दी गई। इसमें कुल 84 गवाहों के बयान दर्ज किए गए। अभियोजन पक्ष के अनुसार, हरियाणा के पूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता संजीव बंसल के क्लर्क ने यह पैसा भेजा था।

यह पैसे जस्टिस निर्मल यादव के लिए भेजे थे। हालाँकि, दोनों जजों की नाम में समानता होने के कारण पैसा गलती से जस्टिस निर्मल यादव के पास नहीं पहुँचकर जस्टिस निर्मलजीत कौर के पास पहुँच गया। बाद में साल 2010 में जस्टिस यादव को उत्तराखंड हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया। बाद वह इसी हाई कोर्ट से रिटायर हो गईं।

जस्टिस निर्मलजीत कौर को जब ये पैसे मिले थे, उस समय हाई कोर्ट में आए हुए उन्हें सिर्फ 33 दिन हुए थे। उन्होंने अपने बयान में बताया था कि उनका चपरासी उनके पास आकर बोला था कि दिल्ली से उनके लिए कागज आया है। इसके बाद उन्होंने उसे खोलने के लिए कहा। वह टेप में लिपटा हुआ था। इसके बाद जस्टिस कौर ने अपने चपरासी से कहा था, इसे लाने वाले को जल्दी पकड़ो।

पैसे डिलीवर होने के कुछ देर बाद संजीव बंसल ने जस्टिस कौर को फोन किया और बताया कि ये पैसे गलती से उनके घर पहुँच गए हैं। संजीव बंसल ने जस्टिस कौर से कहा था कि असल में ये पैसे निर्मल सिंह नाम के व्यक्ति के लिए थे। हालाँकि, तब तक जस्टिस कौर पुलिस को सूचित कर चुकी थीं। उन्होंने इसकी सूचना हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर को भी दे दी थी।

पत्थरबाजों से बच्चों को बचाने के लिए सड़क पर लेट गईं हिंदू महिलाएँ, दुर्गा मंदिर से निकली शोभा यात्रा को मोहम्मद अलाउद्दीन की छत पर जमा ‘मुस्लिम भीड़’ ने बनाया निशाना: देखिए Video

बिहार के दरभंगा में नवरात्र के पहले ही दिन हिंदुओं पर हमला हुआ है। यहाँ अलाउद्दीन नाम के व्यक्ति के घर पर इकट्ठा हुए मुस्लिमों ने जमकर पथराव किया, जिसमें कई लोग घायल हो गए। इस घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। ये वही जगह है, जहाँ होली पर भी हिंदुओं पर हमला हुआ था। हालाँकि तब पुलिस और ग्रामीणों की आपसी बातचीत से मामला सुलझा लिया गया था, लेकिन नवरात्र के पहले दिन पथराव के बाद से पूरे इलाके में तनाव है और तीन थानों की पुलिस फोर्स को तैनात किया गया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुशेश्वरस्थान थाना क्षेत्र के केवटगामा पंचायत में दुर्गा मंदिर से कलश शोभायात्रा के बाद लौट रहे श्रद्धालुओं पर अचानक पत्थरों की बारिश शुरू हो गई। ये हमला इतना चौंकाने वाला था कि महिलाएँ और बच्चे चीखते-चिल्लाते इधर-उधर भागने लगे। लोगों का कहना है कि ये हमला मुस्लिमों ने किया, जो पहले से छत पर इकट्ठा होकर शोभायात्रा का इंतजार कर रहे थे।

ये घटना रविवार (30 मार्च 2025) की शाम करीब साढ़े चार बजे की है। गाँव वालों ने बताया कि पछियारी रही गाँव में रहने वाले मोहम्मद अलाउद्दीन के घर की छत पर मुस्लिम जमा थे। जैसे ही शोभायात्रा वहाँ से गुजरी, इन लोगों ने पत्थर फेंकना शुरू कर दिया। पत्थर अचानक ऊपर से गिरने लगे, जिससे नीचे चल रहे श्रद्धालु घबरा गए। कुछ महिलाओं ने बताया कि वो अपने बच्चों को बचाने के लिए सड़क पर ही लेट गईं, ताकि पत्थरों से चोट न लगे। हमले की वजह से कई लोग मामूली रूप से घायल भी हुए।

पथराव की सूचना मिलते ही कुशेश्वरस्थान, तिलकेश्वर और बिरौल थानों से भारी पुलिस बल गाँव पहुँचा। पुलिस ने हालात को काबू में किया, लेकिन गाँव का माहौल अभी भी तनावपूर्ण है। लोग अपने घरों में डरे हुए हैं और बाहर निकलने से कतरा रहे हैं। पंचायत के पूर्व मुखिया आलोक कुमार उर्फ विकास कुमार ने बताया कि इस तरह की घटनाएँ गाँव की एकता को तोड़ रही हैं।

कुशेश्वरस्थान थानाध्यक्ष राकेश कुमार सिंह ने कहा कि स्थिति अब नियंत्रण में है और गाँव में पुलिस तैनात कर दी गई है। एसएसपी जगुनाथ रेड्डी ने भी भरोसा दिलाया कि हालात सामान्य हैं और किसी को परेशान होने की जरूरत नहीं है। लेकिन गाँव वालों का कहना है कि ये शांति बस ऊपरी है, अंदर ही अंदर डर और गुस्सा अभी भी बना हुआ है।

होली के दिन भी हिंदुओं पर हुआ था हमला

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2 सप्ताह पहले होली के दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ था। उस दिन गाँव में होली खेल रहे युवकों पर मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने हमला कर दिया था। पहले तो मामूली बहस हुई, लेकिन फिर बात बढ़ गई और लाठी-डंडों के साथ पत्थरबाजी शुरू हो गई। कई युवक घायल हो गए थे और गाँव में तनाव फैल गया था। उस वक्त पुलिस ने दोनों पक्षों से बात की और पीआर बॉन्ड भरवाकर मामला शांत कराया था। गाँव वालों ने उम्मीद की थी कि अब सब ठीक हो जाएगा, लेकिन रविवार को फिर से पथराव की घटना ने पुराने जख्मों को हरा कर दिया।

सृष्टि के पहले दिन से काल की गणना, चंद्र और सूर्य ग्रहण की अग्रिम जानकारी: दुनिया के सबसे प्राचीन और सटीक कैलेंडर ‘विक्रम संवत’ का वर्ष 2082 शुरू, जानिए किसने और कब की थी शुरुआत

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के साथ ही आज रविवार (30 मार्च 2025) को हिंदू नव वर्ष 2082 की शुरुआत हो गई। इसे नव संवत्सर या विक्रम संवत भी कहा जाता है। कहा जाता है सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक महान खगोलविद वाराह मिहिर ने इस कैलेंडर की शुरुआत की थी और उसका नाम विक्रम संवत या विक्रमी संवत रखा था। माना जाता है कि ब्रह्मा ने इसी दिन सृष्टि की रचना की थी। यानी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सृष्टि उत्पन्न हुई थी।

देश-दुनिया भले ही पोप ग्रेगरी द्वारा विकसित ग्रेगोरियन कैलेंडर प्रचलित हो, लेकिन विक्रम संवत आज भी भारतीय और नेपाल मूल के लोगों के जीवन का अंग है। नेपाल ने विक्रम संवत वाला हिंदू कैलेंडर ही लागू है। वहीं, भारत सहित दुनिया भर के हिंदू शादी-विवाह से लेकर अन्य शुभ मुहूर्त एवं पर्व-त्यौहार इसी कैलेंडर पर आधारित कालगणना से तय करते हैं। विक्रम संवत दुनिया का सबसे वैज्ञानिक एवं सटीक कालगणना है।

जानकारों का कहना है कि विक्रम संवत सूर्य की और चंद्र की गति, दोनों की गति पर आधारित है। दुनिया का ये अकेला कैलेंडर है, जो गणना करके सूर्य ग्रहण या चंद्र का पहले ही घोषणा कर देता है कि इस दिन को इतने बजे सूर्य या चंद्र ग्रहण लगेगा। इस कैलेंडर के जरिए किसी भी खगोलीय स्थिति की गणना वर्षों पहले लगाई जा सकती है। इस तरह की खगोलीय जानकारी पश्चिमी कैलेंडरों से नहीं मिलती है।

सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्नों में शामिल आचार्य वाराह मिहिर ने पृथ्वी द्वारा सूर्य के चक्कर लगाने की एकदम सटीक गणना की है। उसी गणना के आधार पर उन्होंने दिन और रात के समय का निर्धारण किया है। इसमें पल, प्रतिपल, घटी, मुहूर्त और पहर होते हैं। इन्हीं के आधार पर तिथियों का निर्धारण एवं उनकी गणना की जाती है। इतना ही नहीं, यह कैलेंडर साल में आने वाले विभिन्न ऋतुओं के अलावा नक्षत्रों के बारे में भी बताता है।

अति प्राचीन ग्रंथ ‘सूर्य सिद्धांत’ में कहा गया है कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाने में 365 दिन 15 घटी 31 पल तथा 24 प्रतिपल लगाती है। विक्रम संवत में 12 मास होते हैं और मास सिर्फ 30 दिन का होता है। यह मास 15 दिन के दो पक्ष में बँटा होता है, जो शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष का होता है। विक्रम संवत में हर तीन साल पर एक मास बढ़ जाता है, जिसे अधिमास या मलमास कहा जाता है।

दरअसल, मासों की गणना या निर्माण पृथ्वी की अपनी कक्षा से नहीं की गई, इसका निर्धारण चंद्रमा के पृथ्वी के चारों ओर की कक्षा से किया गया। इसलिए इसे चंद्र मास भी कहते हैं। चंद्रमा का एक मास 30 चंद्र तिथियों का होता है, परंतु वह सौर मास (सूर्य मास) से लगभग आधा दिन छोटा होता है। दोनों मासों में सामंजस्य बैठाने के लिए भारतीय ज्योतिषाचार्यों ने मलमास या अधिमास का विधान किया। 

यह अधिमास या मलमास इसलिए होता है, ताकि सूर्य वर्ष से एकरूपता लाई जा सके। इसी के कारण हिंदू महीनों, वर्ष, ऋतुओं एवं खगोलीय गणना में सटीकता रहती है। विक्रम संवत से ऋतु परिवर्तन की सटीक जानकारी, नक्षत्रों की स्थिति, ग्रहों की स्थिति, सूर्य या चंद्र ग्रहण का काल, तिथि और मुहूर्त की गणना सटीक होती है। वहीं, यूरोप में पहले एक साल 360 दिन का हुआ करता था।

विक्रम संवत का जिक्र ब्रह्म पुराण में भी है। इसमें कहा गया है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ब्रह्मा का पहला दिन है और सृष्टि के कालचक्र का भी पहला दिन है। विक्रम संवत की शुरुआत इसी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होती है। ग्रेगोरियन कैलेंडर की शुरुआत ईसा मसीह के जन्म से होती है। इसे ईसाई कैलेंडर भी कहा जाता है। ग्रेगोरियन कैलेंडर विक्रम संवत से 57 साल पीछे चल रहा है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार अभी साल 2025 चल रहा है, विक्रम संवत के अनुसार यह 2082 चल रहा है।

विक्रम संवत को हिंदू से लेकर जैन धर्मग्रंथों में इस संवत को शुरू करने में सम्राट विक्रमादित्य का नाम लिया जाता है। जैन ग्रंथ कल्काचार्य में कहा गया है कि विक्रम काल की स्थापना सम्राट विक्रमादित्य ने आकाश नाम के राजा को हराने के बाद की थी। इस दिन को उन्होंने विजय हासिल की थी। हालाँकि, ये राजा कौन हैं, ये स्पष्ट नहीं है। हिंदू ग्रंंथों कहा गया है कि उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने शकों पर इसी दिन जीत हासिल की थी।

ये वही सम्राट विक्रमादित्य हैं, जिनके दरबार में आयुर्वेद के जनक धन्वंतरि, जैन संन्यासी एवं नीति शास्त्र के ज्ञाता क्षपणक, बौद्ध ज्ञाता अमर सिंह, विद्वान कवि शंकु, कवि घटखर्पर, राजकवि कालिदास, तंत्र शास्त्र के ज्ञानी वेताल भट्ट, व्याकरण के आचार्य वररुचि, खगोलशास्त्री वाराह मिहिर शामिल थे। इनमें अमर सिंह और वाराह मिहिर का जन्म क्षत्रिय कुल में हुआ था, जबकि कालिदास और वेताल भट्ट ब्राह्मण कुल के थे। बाकी वैश्य एवं आज दलित कहे जाने वाले समुदाय से भी थे।

कहा जाता है कि विक्रम संवत से पहले युधिष्ठिर संवत, कलियुग संवत, सप्तर्षि संवत आदि प्रचलन में आए थे। माना जाता है कि सभी संवत की शुरुआत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होती ही थी, लेकिन अन्य बातें स्पष्ट नहीं थीं। इसके बाद विक्रम संवत अस्तित्व में आया और इसमें तिथि से लेकर तिथि, मास, संवत्सर (यानी वर्ष), नक्षत्र आदि की स्पष्टता थी।

‘एम्पुरान’ से हटेंगे वे सीन जिनमें हिंदुओं किया गया बदनाम, मोहनलाल ने माँगी माफी: गोधरा दंगों पर बनी फिल्म में ‘हिंदू बेरहम-मुस्लिम पीड़ित’ का प्रोपेगेंडा किया प्रमोट

मलयालम सिनेमा के सुपरस्टार मोहनलाल की फिल्म ‘L2: एम्पुरान’ रिलीज के बाद से ही विवादों में घिरी है। फिल्म में 2002 के गोधरा दंगों को जिस तरह दिखाया गया और हिंदुओं के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैलाया, उससे हिंदू समुदाय भड़क गया। कई लोगों का कहना है कि फिल्म में हिंदुओं को गलत और बेरहम दिखाया गया, जिससे उन्हें दुख पहुँचा है।

इस बवाल के बाद मोहनलाल ने रविवार (30 मार्च 2025) को फेसबुक पर एक भावुक पोस्ट लिखी और अपने फैन्स से माफी माँगी। उन्होंने कहा कि फिल्म में कुछ सीन और बातें ऐसी थीं, जिनसे उनके चाहने वालों को ठेस पहुँची, और वो इसके लिए शर्मिंदा हैं। मोहनलाल ने वादा किया कि फिल्म से वो सारी चीजें हटा दी जाएँगी, जो लोगों को परेशान कर रही हैं।

‘एम्पुरान’ फिल्म ‘लूसिफर’ का सेकंड पार्ट है, जिसे एक्टर-डायरेक्टर पृथ्वीराज सुकुमारन ने बनाया है। फिल्म में पृथ्वीराज का किरदार जायद मसूद है, जिसकी कहानी शुरू होती है गोधरा दंगों से। फिल्म में दिखाया गया कि कैसे हिंदू कट्टरपंथियों ने एक मुस्लिम परिवार को बेरहमी से मार डाला। इसके अलावा, उस वक्त गुजरात में सत्ताधारी बीजेपी और तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग का भी आरोप लगाया गया। ये सीन देखकर हिंदू संगठनों में गुस्सा भड़क गया। लोगों ने सोशल मीडिया पर मोहनलाल और पृथ्वीराज को खूब खरी-खोटी सुनाई। कुछ ने इसे ‘लव जिहाद’ की कहानी को बढ़ावा देने वाला बताया, तो कुछ ने कहा कि ये हिंदुओं को बदनाम करने की साजिश है।

मोहनलाल ने अपनी पोस्ट में लिखा, “मुझे पता चला कि ‘एम्पुरान’ में कुछ राजनीतिक और सामाजिक बातों ने मेरे चाहने वालों को बहुत दुख पहुँचाया। एक कलाकार के तौर पर मेरा फर्ज है कि मेरी कोई फिल्म किसी राजनीतिक आंदोलन, विचारधारा या धर्म के खिलाफ नफरत न फैलाए। इसलिए मैं और एम्पुरान की टीम अपने प्रियजनों को हुई तकलीफ के लिए दिल से माफी माँगते हैं। हमने फैसला किया है कि फिल्म से वो सारी चीजें हटा देंगे।” उन्होंने ये भी कहा कि पिछले 40 सालों से उनके फैन्स ही उनकी ताकत हैं और उनके बिना मोहनलाल कुछ भी नहीं।

विवाद इतना बढ़ गया कि फिल्म के प्रोडक्शन हाउस ने ऐलान किया कि ‘एम्पुरान’ से 17 सीन हटाए जाएँगे। इनमें दंगों के सीन और महिलाओं के खिलाफ हिंसा दिखाने वाले हिस्से शामिल हैं। दूसरी तरफ, बीजेपी की युवा शाखा भारतीय जनता युवा मोर्चा के स्टेट जनरल सेक्रेटरी के. गणेश ने पृथ्वीराज पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि पृथ्वीराज के ‘विदेशी कनेक्शन’ की जाँच होनी चाहिए।

गणेश ने दावा किया कि उनकी पिछली फिल्में जैसे ‘कुरुथी’ और ‘जन गण मन’ भी ‘देश विरोधी’ थीं। उन्होंने पृथ्वीराज के जॉर्डन में फिल्म ‘आडुजीवितम’ की शूटिंग के दौरान उनके संपर्कों पर भी सवाल उठाए।

गोधरा दंगे 27 फरवरी 2002 को शुरू हुए थे, जब अयोध्या से लौट रहे 59 कारसेवकों को साबरमती एक्सप्रेस के एक कोच में जिंदा जला दिया गया था। ये हमला मुस्लिमों की भीड़ ने किया था। इसके बाद गुजरात में भयानक दंगे भड़क उठे। लेकिन ‘एम्पुरान’ में सिर्फ हिंदुओं को दोषी दिखाने की कोशिश ने लोगों का गुस्सा बढ़ा दिया। सच ये है कि गोधरा की घटना को लेकर सालों से राजनीति होती रही है, पर उस ट्रेन में जलाए गए कारसेवकों की बात कम ही होती है। इस फिल्म ने उस पुराने दर्द को फिर से कुरेद दिया।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

हिंदुओं के जलाए खेत, दुकानें भी लूटीं… बंगाल के मालदा के बाद मुर्शिदाबाद में हिंदुओं को बनाया गया निशाना: BJP नेता का दावा, पुलिस बोली- अफवाह फैलाई तो होगी कार्रवाई

पश्चिम बंगाल में मालदा के बाद अब मुर्शिदाबाद से हिंदुओं को टारगेट करने का मामला उजागर हुआ है। खबर मुर्शिदाबाद के झाऊबोना से है जहाँ कहा जा रहा है कि इस्लामी भीड़ द्वारा हिंदुओं के खेतों में आग लगा दी गई और दुकानों को लूट लिया गया। इस संबंध में जानकारी भाजपा नेता सुकांत मजूमदार ने अपने एक्स पर साझा की है।

उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “ममता बनर्जी के तुष्टिकरण शासन में हिंदुओं पर एक और भयानक हमला! जिहादी भीड़ ने मोथाबारी में उत्पात मचाने के बाद झाउबोना, नौदा (मुर्शिदाबाद) में आतंक फैलाया।”

उन्होंने ट्वीट में आगे बताया कि जिहादी भीड़ ने अंधेरे की आड़ में, जानबूझकर हिंदुओं के पान के खेतों में आग लगा दी और झाउबोना और त्रिमोहिनी बाज़ार में दुकानों को लूट लिया और निर्दोष हिंदुओं पर हिंसक हमले किए।

भाजपा नेता ने इस्लामी भीड़ के विरुद्ध तत्काल कार्रवाई की माँग की है और कहा कि बंगाल में हिंदू दोयम दर्ज के नागरिक बनकर रह गए हैं। प्रदेश सीएम पर आरोप लगाते हुए वह बोले कि ममता की शर्मनाक तुष्टिकरण की राजनीति ने बंगाल के हिंदुओं के जीवन को खतरे में डाल दिया हैं लेकिन हिंदू डरते नहीं हैं। पूरा हिंदू समुदाय इस उत्पीड़न के खिलाफ एकजुट हो रहा है।

पुलिस ने अफवाह फैलाने वालों को दी चेतावनी

इस मामले में बता दें कि एक तरफ जहाँ भाजपा नेता ने हिंदुओं पर हमले की जानकारी दी है, वहीं बंगाल पुलिस ने शांति बनाए रखने की अपील है। उन्होंने कहा, “पश्चिम बंगाल पुलिस ने दोहराया है कि शांति और सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने की कोशिश करने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। सांप्रदायिक विवाद को बढ़ावा देने की कोशिश करने वाले, अफवाह फैलाने वालों से भी कानून के अनुसार सख्ती से निपटा जाएगा। हम सभी से अपील करते हैं कि सोशल मीडिया पर चल रही अफवाहों पर ध्यान न दें और शांत रहें।”

बंगाल के मालदा में हिंसा

गौरतलब है कि इससे पहले खबर आई थी पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के मोथाबारी गाँव में भी मुस्लिम भीड़ ने हिंदुओं का धार्मिक जुलूस देखते हुए हमला किया। उस समय भी पुलिस ने यही कहा था कि अफवाहें न फैलाई जाएँ। लेकिन बता दें कि, मालदा को लेकर हर मीडिया में ऐसी खबर आई थीं कि 26 मार्च को मोथाबाड़ी मस्जिद में नमाज हो रही थी। इस दौरान वहाँ से हिंदुओं का एक धार्मिक जुलूस गुजर रहा था। जुलूस में लोग जयकारे लगाते जा रहे थे। इससे मुस्लिम नाराज हो गए और उन्होंने वहाँ से गुजरने एवं जयकारे लगाने का विरोध किया। बाद में भीड़ उग्र हो गई और कई हिंदुओं के घरों, दुकानों और गाड़ियों को लूटकर उनमें तोड़फोड़ एवं आगजनी की।

बंगाल पुलिस ने बाद में इस सबंध में कार्रवाई करते हुए 34 उपद्रवियों को गिरफ्तार किया। और, एहतियात के तौर पर प्रशासन ने इलाके में इंटरनेट सेवा बंद कर दी थी। इसके साथ रैपिड एक्शन फोर्स की तीन कंपनियों को तैनात किया गया था। मगर, ईद की नमाज और त्योहार को देखते हुए प्रशासन ने इलाके में धारा 144 नहीं लागू की।

‘नमाज पढ़ो, गोमांस खाओ, रोजा रखो’: जिस हिंदू का ड्राइवर था अहमद रजा, उसकी ही बेटी से किया ‘लव जिहाद’; पैसे-गहने हड़पे, 3 बार कराया गर्भपात

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में लव जिहाद का चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहाँ एक हिंदू युवती की जिंदगी उस वक्त नर्क बन गई, जब उसके अपने घर में ड्राइवर रहे अहमद रजा ने उसे प्रेम के झूठे जाल में फँसाया और फिर शादी के नाम पर उसका शारीरिक-मानसिक शोषण शुरू कर दिया। युवती का कहना है कि अहमद ने न सिर्फ उसकी भावनाओं से खिलवाड़ किया, बल्कि उसे रोजा रखने, नमाज पढ़ने और गोमांस खाने तक का दबाव डाला।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, बस्ती जिले के वाल्टरगंज थाना क्षेत्र की पीड़िता अपने घर में अहमद रजा को ड्राइवर के तौर पर देखती थी। जमदाशाही के रहने वाले अब्दुल नईद का बेटा अहमद रोज उसके साथ छेड़खानी करता था। लोकलज्जा के डर से उसने कभी परिवार को कुछ नहीं बताया। लेकिन फरवरी 2024 में अहमद ने चाकू की नोक पर उसके साथ बलात्कार किया। जब उसने पुलिस में जाने की धमकी दी, तो अहमद ने शादी का वादा कर उसे चुप करा दिया। परिजनों ने इस शादी से इनकार कर दिया, लेकिन अहमद ने झाँसा देकर उसे घर से भगा लिया। वो अपने साथ दो सोने के हार, तीन सोने की चेन, एक लाख रुपये, कार, स्कूटी, कूलर और वाशिंग मशीन तक ले गया।

शुरुआत में अहमद उसे अपनी रिश्तेदारी में ले गया, फिर रूधौली थाना क्षेत्र के पुरैना चौराहे पर किराए का मकान लेकर रहने लगा। शादी की बात पर टालमटोल करता रहा, लेकिन बाद में उसने शादी कर ली। मगर ये शादी खुशियों की बजाय दर्द की कहानी बन गई।

युवती का आरोप है कि एक दिन अहमद के माता-पिता और बहनें मोमिना व फातिमा आए और बोले, “नमाज पढ़ो, गोमांस खाओ, रमजान में रोजा रखो।” जब उसने मना किया, तो उसे गालियाँ दी गईं और मारपीट की गई। उसका कहना है कि अहमद ने उसके सारे जेवर बेच दिए, स्कूटी 35 हजार में गिरवी रख दी और सारा पैसा अपने घरवालों को दे दिया। सबसे दर्दनाक ये कि उसका तीन बार गर्भपात करवाया गया और अब वो फिर गर्भवती है।

पीड़ित लड़की ने हिम्मत दिखाते हुए वाल्टरगंज थाने में शिकायत दर्ज की। डीएसपी सत्येंद्र भूषण तिवारी ने बताया कि केस दर्ज कर लिया गया है और अहमद की गिरफ्तारी के लिए पुलिस टीम लगी हुई है। जाँच और मेडिकल रिपोर्ट के बाद कोर्ट में बयान दर्ज होंगे।

विश्व हिंदू महासंघ के जिलाध्यक्ष अखिलेश सिंह ने चेतावनी दी कि अगर पीड़िता को जल्द न्याय नहीं मिला, तो आंदोलन होगा। ये मामला सिर्फ एक लड़की की कहानी नहीं, बल्कि समाज के सामने एक सवाल है- आखिर कब तक मासूम जिंदगियाँ ऐसे शोषण का शिकार बनती रहेंगी?

पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह की सुरक्षा घटाई, नुकसान की वसूली भी: क्यों फिर से राजशाही-हिंदू राष्ट्र बनने के लिए सुलग रहा नेपाल, क्या आवाज दबा पाएगी वामपंथी सरकार?

नेपाल में राजशाही और हिंदू राष्ट्र की बहाली की माँग को लेकर राजधानी काठमांडू में हुए प्रदर्शन और उसमें हुई हिंसा को लेकर पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह पर कार्रवाई हुई है। नेपाल के प्रधानमंत्री खड्ग प्रसाद शर्मा ओली के नेतृत्व वाली सरकार ने पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह की सुरक्षा में भारी कटौती कर दी है और उनका पासपोर्ट रद्द करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। वहीं, पूर्व राजा पर 7.93 लाख नेपाली रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है।

बता दें कि शुक्रवार (28 मार्च 2025) को राजशाही एवं हिंदू राष्ट्र समर्थकों को पुलिस ने रोकने के लिए लाठी-चार्ज किया था। इसके बाद प्रदर्शनकारी उग्र हो गए। कहा जा रहा है कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई, जिसमें एक पत्रकार और एक प्रदर्शनकारी की मौत हो गई। वहीं, 100 से अधिक लोग भी घायल हो गए हैं। इस हिंसा के बाद राजधानी में सेना को तैनात कर दिया गया है।

काठमांडू के नागरिक निकाय ने प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक संपत्ति और पर्यावरण को हुए नुकसान के लिए पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह पर जुर्माना लगाया है। काठमांडू मेट्रोपॉलिटन सिटी (केएमसी) ने महाराजगंज में ज्ञानेंद्र शाह के आवास पर पत्र भेजकर 7,93,000 नेपाली रुपए मुआवजा देने को कहा है। यह जुर्माना सड़कों और फुटपाथों पर कचरे फैलाने और भौतिक संरचनाओं को नुकसान पहुँचाने के लिए लगाया गया है।

KMC ने अपने पत्र में राजा ज्ञानेंद्र शाह पर कचरा प्रबंधन अधिनियम 2020 और काठमांडू मेट्रोपॉलिटन सिटी फाइनेंस एक्ट 2021 का उल्लंघन का हवाला दिया है। पत्र में कहा गया है, “पूर्व सम्राट के आह्वान पर आयोजित विरोध प्रदर्शन ने महानगर की विभिन्न संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया और राजधानी शहर के पर्यावरण को प्रभावित किया है।” उधर, ओली सरकार ने उनका पासपोर्ट रद्द करने का आदेश दिया है।

पूर्व राजा ज्ञानेंंद्र शाह की सुरक्षा भी ओली सरकार ने घटा दी है। उनकी सुरक्षा में पहले 25 सुरक्षाकर्मी तैनात रहते थे। अब उसे घटा कर 16 सुरक्षाकर्मी कर दिया गया है। बता दें कि पुलिस ने राजशाही समर्थक राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष रवींद्र मिश्रा, महासचिव धवल शमशेर राणा, स्वागत नेपाल, शेफर्ड लिम्बू और संतोष तमांग जैसे राजतंत्र समर्थक नेताओं सहित 51 लोगों को हिरासत में लिया है।

भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता से नेपाली परेशान

दरअसल, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के मुखिया एवं प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार ने हिंदू राष्ट्र और राजशाही की बहाली की माँग करने वालों के खिलाफ शुरू से कठोर रवैया अपनाया हुआ है। वहीं, विपक्षी दल नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी सेंटर) के प्रमुख पुष्प कलम दहल प्रचंड ने हिंसा के लिए पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह पर कार्रवाई के लिए ओली से कहा था।

प्रचंड कुख्यात माओवादी से लेकर नेपाल में प्रधानमंत्री तक रह चुके हैं। उन्होंने राजशाही के खिलाफ हिंसक अभियान चलाया था, जिसमें नेपाल के हजारों लोग मारे गए थे। आखिरकार साल 2008 में नेपाल में राजशाही का अंत हुआ तो प्रचंड प्रमुख बने। हालाँकि, नेपाल राजनीतिक अस्थिरता का केंद्र बन गया है। पिछले 17 साल वहाँ 13 सरकारें बनीं। हालात बदतर हो गए हैं।

लोगों का आरोप हैं कि नेपाल को राजनीतिक अस्थिरता के साथ-साथ वित्तीय अस्थिरता में भी झोंक दिया गया है। बेरोजगारी और गरीबी लगातार बढ़ रही है और नेपाल की सारी पार्टियाँ भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। उनका ध्यान जनता के कल्याण में लगने के बजाय जनता को लूटने-खसोटने में है। इसको देखते हुए व्यापारी दुर्गा प्रसाद ने राजशाही और हिंदू राष्ट्र की बहाली की माँग उठाई।

नेपाल में राजशाही का समर्थन करने वाले कई राजनीतिक दल भी हैं। इन सबने मिलकर संयुक्त जन आंदोलन समिति बनाई। इनका कहना है कि 1991 के संविधान को नेपाल में बहाल की जाए। समिति का कहना है कि इस संविधान में राजशाही के साथ-साथ बहुदलीय संसदीय लोकतंत्र प्रणाली की मान्यता है। इसके साथ ही इसमें नेपाल को ‘हिंदू राष्ट्र’ बताया गया है, जो कि लोकतंत्र में धर्मनिरपेक्ष कर दिया गया है।

राजशाही बनाम लोकशाही की जंग

वर्तमान व्यवस्था से निराश और नेपाल के लोगों में राजशाही की जोर पकड़ती माँग को देखते हुए पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह भी एक्टिव हो गए। इस साल फरवरी में ज्ञानेंद्र शाह ने कहा था, “समय आ गया है कि हम देश की रक्षा करने और राष्ट्रीय एकता लाने की जिम्मेदारी लें।” इसके बाद से बाद से राजशाही समर्थकों में उत्साह आ गया और वे काठमांडू सहित देश भर में इसके समर्थन में रैलियाँ निकालने लगे।

उधर, नेपाल के लोकतंत्र समर्थक सभी माओवादी पार्टी के नेताओं ने ‘समाजवादी मोर्चा’ बनाकर राजशाही आंदोलन का विरोध किया। पुष्पकमल दहल प्रचंड की नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी-माओवादी केंद्र और पूर्व प्रधानमंत्री माधव नेपाल की सीपीएन-यूनिफाइड सोशलिस्ट पार्टी ने राजशाही आंदोलन का विरोध किया। प्रचंड के नेतृत्व में विपक्षी दलों के मोर्चा ने भी काठमांडू में एक अलग रैली की।

प्रचंड की रैली में शामिल लोगों ने कसम खाई की वे राजशाही को बहाल नहीं होने देंगे। वहीं, नेपाल में राजतंत्र का विरोध करने वाली एक सिविल सोसायटी ने 24 मार्च 2025 को ‘राजशाही को बहाल करने के उद्देश्य से राजनीतिक रूप से सक्रिय होने’ के लिए पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह की आलोचना की थी। सोसायटी में चरण परसाई, सुशील पायकुरेल, कनकमणि दीक्षित, मोहना अंसारी, दिनेश त्रिपाठी, हीरा बीसोकरमा, राजन कुइकेल और रीता परियार शामिल हैं।

इसमें कई लोग वकील एवं अन्य पेशे से संबंधित हैं। इन्हें माओवादी पार्टियों का समर्थक माना जाता है। सिविल सोसायटी के नेताओं ने एक संयुक्त बयान में कहा था,”ज्ञानेंद्र शाह का राजनीतिक सक्रियता में उतरना उनके पूर्वजों के राष्ट्र निर्माण के प्रयासों को विफल करता है और अपने पड़ोसियों एवं दुनिया के सामने देश को कमजोर करने का खतरा पैदा करता है।”

माओवादी पार्टियों की सक्रियता और फिर सिविल सोसायटी के बयान के बाद राजशाही समर्थकों की ‘संयुक्त जन आंदोलन समिति’ ने गुरुवार (27 मार्च) को घोषणा की थी कि यदि सरकार एक हफ्ते के भीतर उनसे समझौता नहीं करती तो वे उग्र प्रदर्शन करेंगे। इसके बाद समिति ने 28 मार्च को एक विरोध प्रदर्शन शुरू किया। समिति के लोगों का कहना है कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण था और पुलिस ने लाठी चार्ज करके उग्र बना दिया। वहीं, प्रशासन सारा दोष प्रदर्शनकारियों को दे रहा है।