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नोएडा में धराया फर्जी पत्रकार अफसार अली उर्फ़ एके चौधरी, स्टिंग के जरिए ₹5 करोड़ की उगाही में लगा था

नोएडा से चलने वाले एक डिजिटल न्यूज़ चैनल के प्रमुख अफसार अली उर्फ़ एके चौधरी को गिरफ्तार किया गया है। दिल्ली पुलिस ने अफसार अली को रंगदारी और ब्लैकमेलिंग के आरोप में गिरफ्तार किया है। आईपीसी की धारा-384 (जबरन वसूली) के तहत एक मामला भी दर्ज किया गया है। नोएडा में रहने वाले अफसार अली को गिरफ्तार करने के बाद दिल्ली पुलिस इस मामले में आगे की जाँच कर रही है।

अफसार अली उर्फ़ एके चौधरी ‘जनसत्य’ नामक न्यूज़ चैनल का संचालन कर रहा था। इसके साथ ही वो फिल्म सिटी में ‘ग्लोबल न्यूज़ मीडिया प्राइवेट लिमिटेड’ नामक कम्पनी के नाम से न्यूज़ चैनल के दफ्तर और स्टूडियो का भी संचालन कर रहा था। इस मामले में ग्रेटर कैलाश पुलिस स्टेशन में u/s 384/34 IPC केस दर्ज किया गया है, जिसके बाद उसे गिरफ्तार कर उससे पूछताछ की जा रही है।

अफसार अली उर्फ़ एके चौधरी पर आरोप है कि उसने दक्षिणी दिल्ली के एक वकील को धमकाया था कि अगर उसने 5 करोड़ रुपए नहीं दिए तो उसका ‘स्टिंग’ सार्वजनिक कर दिया जाएगा, जो उसके चैनल ने किया था। पुलिस ने शुक्रवार (अक्टूबर 2, 2020) को बताया कि आरोपित ने ‘स्टिंग’ को सोशल मीडिया पर अपलोड करने की धमकी दी थी। उक्त फर्जी पत्रकार इससे पहले भी 3 मामलों में घिर चुका है।

उस पर इससे पहले गाड़ी चोरी और धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया गया है। उसके खिलाफ 2010-15 के बीच दिल्ली और उत्तर प्रदेश में एफआईआर दर्ज किए गए थे। डीसीपी साउथ अतुल ठाकुर ने बताया कि अफसार अली लोगों के वीडियो धोखे से रिकॉर्ड कर उन्हें अपने चैनल पर वायरल करने की धमकी दे रुपए ऐंठता था। पीड़ित अधिवक्ता ने पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद पुलिस हरकत में आई और अफसार अली को गिरफ्तार किया गया।

अफसार अली अमीरों को निशाना बनाता था और बड़े फार्म हाउस खरीदने वाला बनकर स्टिंग ऑपरेशन को अंजाम दिया करता था। इसी क्रम में वह लोगों का स्टिंग वीडियो बना लेता था। वह अपने साथ कुछ फोटोग्राफर्स को भी रखता था। उसके मीडिया संस्थान में 40 लोग कार्यरत थे, जिस ताला लटक गया है। दिल्ली के साकेत कोर्ट में पेशी के बाद पत्रकार अफसार अली को 5 दिनों की पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया है।

हाथरस केस: मीडिया को पीड़ित परिवार से बात करने की इजाजत, फोन जब्त करने के इंडिया टुडे के दावों को एसडीएम ने नकारा

सदर एसडीएम प्रेम प्रकाश के मुताबिक़ हाथरस मामले में एसआईटी जाँच पूरी हो चुकी है। इसके साथ ही प्रशासन ने मीडिया को भी अनुमति दे दी है कि वह पीड़ित परिवार वालों से मिलकर बात कर सकते हैं। एसडीएम ने कहा, “इस मामले में एसआईटी की जाँच पूरी हो चुकी है इसलिए मीडिया के लिए लगाई गई पाबंदी भी हटा दी गई है। फ़िलहाल उस इलाके में सीआरपीसी की धारा 144 लागू है, इसलिए एक समय पर 5 से अधिक मीडियाकर्मी मौजूद नहीं रह सकते हैं।”

उन्होंने कहा, “अभी वहाँ सिर्फ मीडियाकर्मियों को जाने की अनुमति है। जब प्रतिनिधिमंडल के लिए हरी झंडी दिखाई जाएगी तब हम सभी को प्रवेश करने की अनुमति देंगे। इस तरह के जितने भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि पीड़िता के परिवार वालों के फोन लिए जा चुके हैं या उन्हें घर में बंद करके रखा गया है, यह सभी आरोप बेबुनियाद है।” उत्तर प्रदेश पुलिस और प्रशासन पर इस तरह के आरोप लगाए गए थे कि उन्होंने पीड़िता के परिवार वालों के फोन जब्त कर लिए हैं। 

इस मुद्दे को लेकर सबसे पहले इंडिया टुडे समूह ने ख़बर प्रकाशित की थी। राहुल कँवल ने उत्तर प्रदेश सरकार से कुछ ‘कठिन प्रश्न’ पूछे थे, जब उनके संस्थान की एक कर्मचारी का ऑडियो ऑपइंडिया ने चलाया था। इसके अलावा भी तमाम मीडिया संस्थानों ने यह ख़बर चलाई थी कि पीड़िता के परिजनों का मोबाइल फोन पुलिस ने जब्त कर लिया है।

परिवार द्वारा लगाए गए फोन जब्त करने के आरोप भी ठीक उस समय ही सामने आए जब मीडिया वालों की पीड़िता के भाई से फोन पर बातचीत की ऑडियो लीक हुई।

पीड़िता की चोटों की वजह से मृत्यु होने के बाद से ही हाथरस मुद्दे पर बहस और राजनीतिक खींचतान का दौर जारी है। ऐसा आरोप लगाया जा रहा था कि 2 हफ्ते पहले पीड़िता के साथ बलात्कार हुआ था। घटना को लेकर पूरे देश के लोगों में काफी गुस्सा था। इसके बाद कई मीडिया संस्थाओं ने आरोप लगाया कि परिवार की रज़ामंदी के बिना पीड़िता का अंतिम संस्कार कर दिया गया था। बाद में पता चला कि अंतिम संस्कार के दौरान पीड़िता के पिता भी मौजूद थे। 

एडीजी प्रशांत कुमार ने एएनआई से बात करते हुए बताया था कि फोरेंसिक रिपोर्ट मिल गई है और उसके मुताबिक़ लड़की के साथ बलात्कार की घटना नहीं हुई थी। पीड़िता के साथ किसी भी तरह का यौन शोषण नहीं हुआ था। मौत का कारण गला दबाना और रीढ़ की हड्डी में लगी चोटें थीं। कल (2 अक्टूबर 2020) मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस घटना पर बड़ी कार्रवाई करते हुए हाथरस के एसपी, डीएसपी और इंस्पेक्टर समेत अन्य अधिकारियों को निलंबित किया था। उन्होंने यह फैसला जाँच की प्राथमिक रिपोर्ट सामने आने के बाद किया था। 

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार के जिस तरह प्रशासन ने हाथरस मामले पर कार्रवाई की थी उससे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ नाराज़ थे। इस पूरे घटनाक्रम जारी की गई प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया था कि हाथरस के एसपी और आईपीएस अधिकारी विक्रांत वीर को निलंबित किया जा रहा है। उन्होंने इस पूरे मामले पर लापरवाही दिखाई है। ऐसे ही डीएसपी राम शबद, इंस्पेक्टर दिनेश वर्मा, सब इंस्पेक्टर जगवीर सिंह और हेड कांस्टेबल महेश पाल को निलंबित किया जा चुका है। इस कार्रवाई के बाद शामली के एसपी विनीत जायसवाल को हाथरस का एसपी नियुक्त किया गया है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी किए गए इस बयान में यह भी कहा गया है कि आरोपित, जाँच में शामिल पुलिस वालों और पीड़ित परिवार का नार्को और पॉलीग्राफ टेस्ट भी कराया जाएगा।     

लोन मोरेटोरियम पर केंद्र सरकार ने दी बड़ी राहत, अब नहीं देना होगा ब्याज पर ब्याज

केंद्र सरकार ने बैंक से लोन लेने वालों को अच्छी खबर दी है। सुप्रीम कोर्ट में दायर किए गए एक हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा है कि अब लोगों को लोन ली गई राशि पर लग रहे ब्याज पर ब्याज नहीं देना होगा। एमएसएमई लोन, एजुकेशन, हाउसिंग, कंज्यूमर, ऑटो, क्रेडिट कार्ड बकाया और उपभोग लोन पर लगे सभी प्रकार के चक्रवृद्धि ब्याज को माफ़ किया जाएगा। इससे आमलोगों और मध्यम वर्ग को बड़ी राहत मिली है।

केंद्र सरकार ने कहा है कि लोन मोरेटोरियम पर 6 महीने की अवधि में 2 करोड़ रुपए तक की धनराशि पर लगने वाले ब्याज के ऊपर जो ब्याज लगता था, वो अब नहीं लगेगा। यानी, इन पर अब चक्रवृद्धि ब्याज ग्राहकों से नहीं लिया जाएगा। वित्त मंत्रालय ने कोरोना आपदा को देखते हुए छोटे कर्जदारों की मदद के लिए ये फैसला लिया है।

केंद्रीय वित्त मंत्रालय का कहना है कि कोरोना संक्रमण के कारण आई आपदा के बीच छोटे उद्योगों और मध्यम वर्ग के लोगों को जो मार पड़ी है, उसे देखते हुए ये उचित है कि सरकार ही कर्ज के ब्याज पर लगने वाला ब्याज वहन करे। ब्याज की छूट का भार अब सरकार द्वारा वहन किया जाएगा। सरकार ने इसे ही मौजूदा ऋण समस्या का समाधान मानते हुए आश्वस्त किया है कि जल्द ही इसके लिए संसद से अनुमति ली जाएगी।

इस विषय में अनुदान के लिए संसद से अनुमति ली जाएगी। कोरोना आपदा को देखते हुए मार्च में जो लॉकडाउन लगाया गया था, उससे बाजार पर बड़ी मार पड़ी थी और सामान्य लोग ईएमआई भरने की स्थिति में नहीं थे। कमाई और कारोबार ठप्प होने के कारण कर्ज चुकाने में भी कई लोग सक्षम नहीं थे। ऐसे में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने ऐसे लोगों से लोन न चुकाने के लिए बैंकों से 6 महीने की मोहलत दिलाई।

लेकिन, मोरेटोरियम के बदले लगने वाला अतिरिक्त चार्ज इन फैसलों की राह में सबसे बड़ी बाधा बन कर सामने आ रहा था, क्योंकि जो लोग ब्याज न देने की स्थिति में थे, वो ब्याज पर ब्याज कहाँ से देते? अब सरकार के इस फैसले के बाद मोरेटोरियम का लाभ ले रहे लोगों को ब्याज पर अतिरिक्त धनराशि खर्च नहीं करनी होगी। ग्राहकों को अब सिर्फ लोन पर सामान्य ब्याज ही देना होगा, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं।

इसी साल अगस्त महीने में सुप्रीम कोर्ट ने भी मोरेटोरियम मामले में सुनवाई करते हुए कहा था कि केंद्र सरकार को हलफनामा दायर कर इस बारे में स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कारोबार के साथ-साथ लोगों की परेशानियाँ देखने को भी कहा था। राजीव महर्षि वाली विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के बाद सरकार ने भी लोगों को राहत देने का मन बनाया।

एक दुखी परिवार बलरामपुर में भी है, हाथरस पॉलिटिक्स से फुर्सत मिले तो उनकी भी सुध ले लीजिए राहुल जी

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने शनिवार (अक्टूबर 3, 2020) को ट्वीट किया कि दुनिया की कोई भी ताक़त उन्हें हाथरस के ‘इस दुखी परिवार से मिलकर उनका दर्द बाँटने’ से नहीं रोक सकती। राहुल गाँधी एक बार हाथरस जाने की कोशिश कर चुके हैं और अब वो दूसरी बार वहाँ जाने वाले हैं। लेकिन, राजस्थान तो दूर की बात, यूपी में ही स्थित बलरामपुर में भी एक पीड़ित परिवार है, जिसकी उन्होंने सुध तक न ली।

हाथरस वाली घटना के एक सप्ताह के भीतर यूपी के बलरामपुर जिले में दो युवकों– शाहिद पुत्र हबीबुल्ला निवासी गैंसड़ी और साहिल पुत्र हमीदुल्ला निवासी गैंसड़ी द्वारा सामूहिक बलात्कार की घटना सामने आई। दोस्ती के बहाने घर ले जाकर दोनों आरोपितों ने लड़की सामूहिक दुष्कर्म किया और गंभीर हालत में एक रिक्शे पर बैठाकर घर भेज दिया। 22 वर्षीय पीड़िता युवती की अस्पताल ले जाते समय मौत हो गई। 

वहाँ भी पीड़िता दलित है। वो भी उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा है, जहाँ योगी आदित्यनाथ की ही सरकार है। लेकिन, राहुल गाँधी ने शायद सिर्फ एक वजह से बलरामपुर के पीड़ित परिवार की सुध नहीं ली है, क्योंकि वहाँ आरोपितों के नाम शाहिद और साहिल हैं। यहाँ उन्हें ‘वर्ग विशेष’ कह कर किसी हिन्दू जाति को निशाना बनाने का मौका नहीं मिलेगा। वहीं हाथरस में पूरा मीडिया जुटा हुआ है, कैमरा है और ड्रामा का स्कोप भी- इसलिए राहुल वहाँ जाने की जिद कर रहे हैं।

हाथरस जाने के लिए यमुना एक्सप्रेसवे पर राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी 132 किलोमीटर पैदल चलने के लिए निकल गए, जबकि उन्हें भी पता है कि इतनी दूरी पैदल तय करने में कितना समय लगता है। रास्ते में उन्होंने गिरने का भी ‘नाटक’ किया, कई कार्यकर्ताओं ने पुलिस से संघर्ष किया, वो कैमरा अपनी तरफ लाते हुए कहते पाए गए और पुलिस के साथ बहस की। हाथरस पर राजनीतिक रोटी सेंकने की भरपूर कोशिश की।

हाथरस मामले में ही लीक हुआ एक ऑडियो इस मामले में चल रही राजनीति के बारे में काफी कुछ खुलासा करती है। ऑडियो टेप में किसी अज्ञात व्यक्ति को हाथरस मृतका के भाई संदीप से कहते हुए सुना जा सकता है कि वो वहीं पर रहें, प्रियंका गाँधी आने वाली हैं। साथ ही वो पीड़ित परिवार से ये भी कहता है कि वो पुलिस-प्रशासन के साथ किसी प्रकार का समझौता न करें, उनके कहने पर कहीं न जाएँ। प्रियंका गाँधी कुछ ही देर में पहुँचेंगी।

पीड़ित परिवार को भड़काया जाता है कि वो ये बोलें कि उनके सम्बन्धियों और परिचितों को उनसे मिलने नहीं आने दिया जा रहा है, साथ ही ये पूछें कि गाँव में इतनी कड़ी सुरक्षा-व्यवस्था उनके लिए है या फिर ठाकुरों के लिए? साथ ही पीड़ित परिवार को कहा जा रहा है कि वो 50 लाख लेकर भी समझौता न करें और प्रियंका गाँधी के सामने कहें कि उनलोगों पर दबाव बनाया जा रहा है और वो इसका वीडियो बनाना चाहते हैं।

वहीं बलरामपुर वाले मामले में पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में भी मृतका के शरीर पर 10 घाव के निशान मिले हैं। आरोपितों की गिरफ़्तारी भी हुई है और पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करने के बाद बताया कि कैसे, क्या हुआ। लेकिन, राहुल गाँधी ने उस पीड़ित परिवार की सुध तक न ली। मुख्य धारा की मीडिया का भी रवैया ऐसा है ही।

राजस्थान में कॉन्ग्रेस की सरकार है और बलात्कार के नित नए मामले सामने आ रहे हैं। बाँसवाड़ा में जहाँ एक लड़की की नग्न लाश हॉस्पिटल में मिली है, वहीं सिरोही में महज 6 साल की मासूम के साथ दरिंदगी की हदें पार की गईं। जयपुर में एक महिला से होटल में ही गैंगरेप किया गया। अजमेर में एक महिला को बंधक बना कर उसके साथ बलात्कार किया गया। जाहिर है, राहुल गाँधी बलरामपुर की तरह इन पीड़ित परिवारों की भी सुध नहीं लेंगे।

उधर सपा के मुखिया अखिलेश यादव भी लंदन से दिल्ली पहुँचने वाले हैं, जिसके बाद वे हाथरस जाएँगे। उन्होंने योगी सरकार से माँग की है कि वो डीएम और असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाए। बता दें कि इस मामले एसपी, डीएसपी और इंस्पेक्टर सहित कई अधिकारियों को पहले ही सस्पेंड किया जा चुका है।

हाथरस केस: फोन टैपिंग और नार्को टेस्ट के संदर्भ में कुछ बातें

जिन-जिन को लगता है कि सरकार फोन टेप नहीं करवा सकती, वे कानून की जानकारी ले लें। सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए गृह सचिव की अनुमति के साथ ऐसा किया जा सकता है। कई अन्य मामलों में भी, जैसे कि राष्ट्रीय सुरक्षा आदि के लिए ऐसा करने की अनुमति है। हाथरस मामले में लीक हुए ऑडियो और उसके बाद उपजे विवाद के बीच इसके बारे में पूरा विस्तार से पढ़ना हो तो नीचे के ट्वीट को पढ़ लीजिए:

अब बात करते हैं कि हाथरस मामले में पत्रकार या पीड़ित परिवार के ‘ऑडियो’ को लीक क्यों किया गया। पहले तो आप यह तय कीजिए कि आपको मतलब किस बात से है? पत्रकार/पीड़ित के फोन रिकॉर्ड होने से, या इस बात से कि वहाँ दंगा न फैले, पीड़ित परिवार को न्याय मिले? इस ऑडियो के लीक होने से कौन सी सामाजिक अशांति फैली या पीड़िता को न्याय मिलने पर आँच आ गई? अपराध ऑडियो लीक होना नहीं है, अपराध किसी भी व्यक्ति को मीडिया द्वारा अपने हिसाब के जवाब देने या वीडियो बनवाने के लिए कोचिंग देना है कि ऐसा करने से न्याय मिल जाएगा तुमको।

भिन्न-भिन्न स्रोतों से आ रही खबरों से हम बखूबी जानते हैं कि सामाजिक शांति भंग करने के उद्देश्य से गिद्धों का एक झुंड उस एक ‘ट्रिगर’ प्वाइंट की प्रतीक्षा में बैठा है, जो लोगों में असंतोष भर दे। पहले ही कई फेक न्यूज चलाए जा चुके हैं कि आरोपित संदीप का पिता योगी का सहयोगी और जानकार है। ऐसे में एक प्रशासनिक असावधानी बहुत बड़ी भूल बन सकती है। हाथरस मामले में लीक हुए ऑडियो में पत्रकार को पीड़ित परिवार से मनपंसद बयान दिलवाने की कोशिश करते हुए सुना जा सकता है।

वो वीडियो न्याय दिलाने के लिए नहीं, टीआरपी के लिए होता है। न्याय वीडियो से कैसे मिलेगा? कोर्ट में इंडिया टुडे के वीडियो दिखाए जाएँगे? फिर तो वीडियो कई घूम रहे हैं, उसके आधार पर न्याय कर दो! पत्रकार का काम रिपोर्ट करना होता है। जो है, वो दिखाओ, जो नहीं है, उसके संभावित कारण तार्किक तरीके से बताओ। जो जटिल बात है उसको सरल बनाकर समझाओ।

पत्रकार का काम है जो वीडियो मिले उसकी विवेचना करना, न कि मनपसंद वीडियो बनवा लेना। फोन कर के आप जानकारी लेते हैं, न कि कस्टम-मेड इन्फ़ॉर्मेशन तैयार करके भेजते हैं ताकि आपके चैनल का फायदा हो। पत्रकार जब ऐसा करते हैं, तो कम से कम उसी ऑडियो में ये तो न क्लेम करें कि ‘मैं तुम्हारी बहन हूँ, मैं न्याय दिलवाऊँगी’। पत्रकार को यह कहना चाहिए कि ‘तुम जो वीडियो दोगे, उससे हमारा चैनल चमक जाएगा, तुम्हारी बहन को न्याय मिलेगा कि नहीं, ये नहीं पता।’

पत्रकार की बातचीत यह होनी चाहिए कि ‘तुम्हारे पास जो भी जानकारी है, वो हमें दो ताकि हम उसे पब्लिक में रखें और वहाँ से प्रशासन पर एक दबाव बनेगा’। आप पीड़ित को दिलासा दीजिए, दिलासा देते-देते एक्सप्लॉइट मत कीजिए। एक और बात चल रही है कि नार्को/पॉलीग्राफ़ टेस्ट ‘स्वेच्छा’ से दिए जाते हैं, सरकार किसी को मजबूर नहीं कर सकती। ये तो सही बात है, कानून भी यही कहता है।

लेकिन, जिस व्यक्ति को न्याय की दरकार है, वो तो किसी भी हद तक जाएगा, कुछ भी करेगा ताकि वो परिवार और समाज की नजरों में सम्मानित बना रहे। परिवार के लोग पॉलीग्राफ़ न लें और चार आरोपित ले लें, तो आप ही बताइए कि नजारा कैसा होगा? चार में से तीन आरोपित जिनके नाम बाद में जोड़े गए, अगर वो टेस्ट में पास हो गए, तब पीड़ित परिवार क्या करेगा? फिर आप बताइए कि सत्य को सामने लाने की कोशिश कौन सा पक्ष करता दिखेगा?

जब एक अपराध, पारिवारिक और ग्रामीण स्तर से उठ कर राष्ट्रीय बन जाता है, तब उसके हर पहलू पर हर व्यक्ति की नजर होती है। जब अपने पिता की बेटी, ‘हाथरस की बेटी’ और ‘भारत की बेटी’ बन जाती है, तब हर व्यक्ति चाहता है सत्य अपने मूल स्वरूप में आए, ‘चाहे जो भी करना पड़े’। अभी हर उस व्यक्ति की नजर इस बात पर होगी कि पीड़ित परिवार अगर गैंगरेप की बात को सही मानता है, तो वो टेस्ट देने से पीछे क्यों हटेगा?

अभी उनके हर एक मूवमेंट पर लोगों के सवाल होंगे कि अगर किसी की बहन मार दी गई है, कथित तौर पर गैंगरेप हुआ है, तो फिर परिवार उसी सत्य को दोहराने से क्यों हिचक रहा है? ये लॉजिक देना कि ‘वो पहले ही बहुत ह्यूमिलिएट (अपमानित) हो चुके हैं, नार्को टेस्ट और भी परेशान करेगा उनको’, ये कुतर्क है, जिसका उस संदर्भ में कोई मायने नहीं रह जाता, जबकि आप पल-पल की खबर वीडियो और न्यूज बाइट के रूप में हर चैनल पर देने की कोशिश कर रहे हैं।

ये भी अगर न्याय पाने के लिए जद्दोजहद है, तो पॉलीग्राफ़ भी उसी तरफ एक कदम है। संवेदनहीनता यह नहीं है कि ‘न्यायिक प्रक्रिया में जो भी संभव है, वो किया जाए ताकि सत्य सामने आए’। संवेदनहीनता यह है कि आप काम अपने चैनल और ‘अपनी’ खबर के लिए कर रही हैं, और रंग-रोगन ‘मैं तुम्हारी बहन हूँ, न्याय दिलाऊँगी’ वाला कर रही हैं! पत्रकारिता न्याय दिलवाने में सहायक हो सकती है, कई मामले में हुई भी है, लेकिन सत्य को ‘मैनुफ़ैक्चर’ करवाने वाली पत्रकारिता न्याय नहीं दिलाती, संभव है कि उसके कारण अन्याय ही हो जाए। इसलिए आप जो पढ़ते, सुनते, देखते, लिखते और बोलते हैं, उस पर थोड़ा ध्यान दीजिए।

PM मोदी ने किया दुनिया के सबसे लम्बे राजमार्ग टनल का उद्घाटन, 10000 फीट की ऊँचाई पर है स्थित

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (अक्टूबर 3, 2020) को प्रातः 10 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से रोहतांग में 9.02 किलोमीटर लम्बे ‘अटल टनल’ का उद्घाटन किया। इससे मनाली और लेह के बीच की दूरी 46 किलोमीटर घट गई है, अर्थात 4-5 घंटे कम हो गई है। ये दुनिया की सबसे लम्बी राजमार्ग टनल है, जो पूरे साल मनाली कोलाहौल-स्पीति घाटी को जोड़ कर रखेगी। इससे पहले ठंड में बर्फबारी के कारण ये घाटियाँ अलग-थलग हो जाती थीं।

ये टनल हिमालय की पीर पंजाल श्रृंखला में औसत समुद्र तल (MSL) से 3000 मीटर (10,000 फीट) की ऊँचाई पर अत्याधुनिक तकनीक और संरचनाओं के साथ बनाई गई है। अटल टनल का दक्षिण पोर्टल (SP) मनाली से 25 किलोमीटर दूर 3060 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है, जबकि इसका उत्तर पोर्टल (NP) लाहौल घाटी में तेलिंगसिस्सुगाँव के पास 3071 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।

यह घोड़े की नाल के आकार में 8 मीटर सड़क मार्ग के साथ सिंगल ट्यूब और डबल लेन वाली टनल है। इसकी ओवरहेड निकासी 5.525 मीटर है। यह 10.5 मीटर चौड़ी है और इसमें 3.6 * 2.25 मीटर फायर प्रूफ आपातकालीन निकास टनल भी है, जिसे मुख्य टनल में ही बनाया गया है। ‘अटल टनल’ को अधिकतम 80 किलोमीटर प्रति घंटे की गति के साथ प्रतिदिन 3000 कारों और 1500 ट्रकों के यातायात को सहने की क्षमता के लिए डिजाइन किया गया है।

यह टनल ‘सेमी ट्रांसवर्स वेंटिलेशन सिस्टम’, एससीएडीए नियंत्रित अग्निशमन और निगरानी प्रणाली सहित अति-आधुनिक इलेक्‍ट्रो-मैकेनिकल प्रणाली से युक्‍त है। इसके दोनों पोर्टल पर टनल प्रवेश बैरियर दिया गया है और आपातकालीन संचार के लिए प्रत्येक 150 मीटर दूरी पर टेलीफोन कनेक्शन की व्यवस्था है। प्रत्येक 60 मीटर दूरी पर फायर हाइड्रेंट तंत्र और हर 250 मीटर की दूरी पर सीसीटीवी कैमरों से युक्‍त स्‍वत: किसी घटना का पता लगाने वाला सिस्टम लगाया गया है।

‘अटल टनल’ की खासियत है कि प्रत्येक किलोमीटर पर वायु गुणवत्ता निगरानी लगाई गई है और हर 25 मीटर पर निकासी प्रकाश/निकासी इंडिकेटर लगा हुआ है। पूरी टनल में प्रसारण प्रणाली और प्रत्‍येक 50 मीटर दूरी पर फायर रेटिड डैम्पर्स व हर 60 मीटर दूरी पर लगे कैमरे इसे ख़ास बनाते हैं। इस टनल के बनने के बाद न सिर्फ पर्यटकों बल्कि स्थानीय लोगों को भी आवागमन में सुविधा होगी।

अटल बिहारी वाजपेयी जब देश के प्रधानमंत्री थे तब 3 जून 2000 को रोहतांग दर्रे के नीचे रणनीतिक टनल के निर्माण का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया था। टनल के दक्षिण पोर्टल की पहुँच रोड की आधारशिला 26 मई 2002 को रखी गई थी। केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल की 24 दिसम्‍बर 2019 को हुई बैठक में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को सम्मान देते हुए इस टनल का नामकरण उनके नाम पर करने का निर्णय लिया गया। अब पीएम मोदी ने इस ‘अटल टनल’ का उद्घाटन किया है।

कट्टरपंथ से लड़ने के लिए फ्रांस ने बनाया प्लान, राष्ट्रपति ने कहा- इस्लाम को विदेशी प्रभाव से मुक्ति पाना होगा

दुनिया में फैलते इस्लामी कट्टरपंथ को रोकने के अनेक देश लगातार प्रयास कर रहे हैं। इसी कड़ी में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अहम बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि फ्रांस अपनी धर्म निरपेक्षता को ध्यान में रखते हुए कट्टरपंथी इस्लामियों का सामना करेगा। इसके पहले भी इमैनुएल इस्लाम को कट्टरता और नफरत फैलाने वाला मज़हब बता चुके हैं। 

विदेशी इमामों के प्रवेश पर प्रतिबंध का फ्रांस पहले ही ऐलान कर चुका है। मैक्रों ने इस साल की शुरुआत में कहा था, “हमने 2020 के बाद अपने देश में किसी भी अन्य देश से इमामों के आने पर रोक लगा दी है।” उन्होंने कहा था कि इस फैसले से फ्रांस में आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगेगी।

अब मैक्रों ने कहा है कि उनकी सरकार दिसंबर में एक विधेयक (बिल) लेकर आएगी जो साल 1905 के एक क़ानून को और मज़बूत करेगा। यह क़ानून चर्च और स्टेट को अलग करता है जिससे देश में धर्म के प्रति उदासीनता बनी रहे। उन्होंने अपने भाषण में यहाँ तक कहा कि आगामी कुछ समय में इस बात को सुनिश्चित किया जाएगा कि मज़हब, फ्रांस की शिक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक क्षेत्र (पब्लिक सेक्टर) से दूर रहे। मैक्रों के मुताबिक़ यह सभी निर्णय कट्टरपंथ और अलगाववाद को रोकने के लिए लिए जा रहे हैं। इतना ही नहीं फ्रांस के इमामों को फ्रांसीसी भाषा भी सीखनी होगी। उन्होंने कहा कि इस्लाम को विदेशी प्रभाव से मुक्ति पानी होगी।

मैक्रों ने कहा, “इस्लाम एक ऐसा मज़हब है जिस पर पूरी दुनिया में संकट है, ऐसा सिर्फ हम अपने देश में नहीं देख रहे हैं।” इसके बाद उन्होंने युवाओं की शिक्षा पर भी ज़ोर दिया जिससे उन्हें धर्मनिरपेक्ष आदर्शों वाला बनाया जा सके। इसकी शिक्षा बच्चों को शुरूआती स्तर से या उनके स्कूल के समय से ही देनी होगी। उन्होंने इस बात के भी संकेत दिए कि फ्रांस इस्लाम को विदेशियों के प्रभाव से भी आज़ाद करेगा, इसके लिए मस्जिदों को मिलने वाली फंडिंग में सुधार किया जाएगा। इसके अलावा ऐसे स्कूल और संगठन जो समुदायों के लिए काम करते हैं उन पर भी बराबर नज़र रखी जाएगी। 

राष्ट्रपति मैक्रों ने यह बातें उस घटना के ठीक कुछ दिन बाद कही हैं जिसमें एक आदमी ने धारदार हथियार से दो लोगों पर हमला कर दिया था। घटना ठीक उस जगह पर हुई थी जहाँ कट्टरपंथी इस्लामियों ने साल 2015 में शार्ली हेब्दो के कर्मचारियों का नरसंहार किया था। फ्रांस की सरकार ने इस हरकत को भी इस्लामी आतंकवाद का नतीजा बताया था। साल 2015 में इस्लामी कट्टरपंथियों ने शार्ली हेब्दो के कार्यालय पर आतंकवादी हमला किया था जिसमें कई मशहूर कार्टूनिस्ट समेत कुल 12 लोगों की मौत हो गई थी।    

हाथरस केस: इंडिया टुडे ने कबूला लीक ऑडियो तनुश्री का ही, मृतका के भाई से कहलवाना चाहती थी ‘दबाव’ की बात

हाथरस केस में हमने कल (2 अक्टूबर 2020) को कुछ लीक ऑडियो पर रिपोर्ट की थी। इसमें से एक ऑडियो में इंडिया टुडे की पत्रकार तनुश्री पांडेय मृतका के भाई संदीप से बातचीत कर रही थीं। इसमें संदीप से तनुश्री ऐसा स्टेटमेंट देने के लिए बोल रही थीं, जिसमें मृतका के पिता आरोप लगाए कि उनके ऊपर प्रशासन की ओर से बहुत दबाव था।

इंडिया टुडे ने इस पर स्पष्टीकरण जारी करते हुए इसे ‘अवैध फोन टैपिंग’ का मामला करार दिया है। ‘इंडिया टुडे’ ने अपने बयान में कहा है कि उत्तर प्रदेश के पुलिस-प्रशासन ने मीडियाकर्मियों को हाथरस में घुसने से रोक रखा है और पीड़िता के परिवार को मीडिया से बात नहीं करने दिया जा रहा है।

सोशल मीडिया पर ‘इंडिया टुडे’ की पत्रकार तनुश्री पांडेय और हाथरस मामले की मृतका के भाई संदीप के बीच हुई बातचीत के लीक हुए फ़ोन ऑडियो के विषय में चैनल ने पूछा है कि सबसे पहला सवाल तो ये है कि हाथरस मामले को कवर कर रहीं उसके पत्रकार का फोन टैप क्यों किया जा रहा है? चैनल ने आशंका जताई है कि अगर मृतका के शोक-संतप्त परिजनों का फोन सर्विलांस पर है या टैप किया जा रहा है तो इसके लिए सरकार को जवाब देना पड़ेगा।

अपनी किरकिरी होने के बाद चैनल ने बयान जारी करते हुए कहा है कि जिस टेलीफोन कॉल को ‘अवैध तरीके से’ लीक कर दिया गया, उसमें उसकी पत्रकार तनुश्री पांडेय मृतका के भाई से ‘दृढ़ता से’ कह रही हैं कि वो पीड़ित पिता का वीडियो शूट करें और उन्हें भेजें। चैनल ने दावा किया है कि इस ऑडियो को बदनीयत से लीक किया गया है। अपनी सफाई में चैनल ने आगे कहा:

“मृतका के पीड़ित परिजनों को सरकार द्वारा मिल रही धमकियों और दबाव के बीच अपनी आवाज़ उठाने के लिए तैयार करना उसी प्रक्रिया का एक भाग है, जो एक पत्रकार को करना ही करना चाहिए। ‘इंडिया टुडे’ चैनल इस मामले में अपने पत्रकार के साथ खड़ा है। हम यूपी सरकार से भी माँग करते हैं कि सारे प्रतिबन्ध हटाए जाएँ और और बिना ‘डर या एहसान’ के पत्रकारों को हाथरस मामले की ग्राउंड रिपोर्टिंग करने दिया जाए।”

सोशल मीडिया पर कई अन्य लिबरल गैंग के पत्रकार भी तनुश्री पांडेय के समर्थन में उतर आए हैं। ‘ऑल्टन्यूज़’ के प्रतीक सिन्हा ने दावा किया है कि वो बस अपना काम कर रही थीं और उन्होंने वही चीजें कहीं, जो पहले से ही ‘सार्वजनिक’ हैं। वहीं ‘इंडिया टुडे’ की कई अन्य पत्रकारों ने इसे प्राइवेसी पर हमला बताते हुए फोन टैपिंग का आरोप लगाया। हालाँकि, किसी ने भी पत्रकार द्वारा पीड़ित परिवार को उनके हिचकिचाहट के बावजूद मनपसंद बयान दिलवाने के पत्रकार के प्रयासों की निंदा नहीं की।

बातचीत को सुनकर यह साफ पता चलता है कि तनुश्री पीड़िता के भाई से एक निश्चित बयान दिलवाने का प्रयास कर रही हैं और संदीप की दबी आवाज सुनकर लग रहा है जैसे वह ऐसा नहीं करना चाहते। संदीप इस ऑडियो में पहले दबाव की बात कहते हैं। मगर बाद में कहते हैं कि उनके पिता इस बात को लेकर स्पष्ट नहीं है कि उन पर दबाव बनाया गया या नहीं। इसके बाद तनुश्री, संदीप से कहती हैं कि उसे कहीं से पता चला है कि परिवार पर ही बहन की मौत का इल्जाम लगाने का प्रयास किया जा रहा है।

उन्हें ऑडियो में कहते सुना जा सकता है, “संदीप, प्लीज मेरे लिए एक चीज कर दो। मैं तुमसे वादा करती हूँ कि जब तक तुम्हारे परिवार को इंसाफ नहीं मिल जाता मैं यहाँ से हिलूँगी भी नहीं… संदीप एक वीडियो अपने पिता की बनाओ जिसमें वो कहें- हाँ, मुझ पर ऐसा बयान जारी करने का बहुत प्रेशर था कि मैं संतुष्ट हूँ। मैं जाँच चाहता हूँ क्योंकि हमारी बेटी मरी है और हमें न उसे देखने का मौका मिला और न उसके अंतिम संस्कार का।”

वे आगे कहती हैं, ”सिर्फ 5 मिनट लगेंगे। जल्दी से वीडियो बनाओ और सिर्फ़ मुझे भेज दो।” इस बातचीत में तनुश्री बार-बार संदीप को एसआईटी के ख़िलाफ़ भड़काती है। मगर, लड़की का भाई कहता है कि जाँच टीम सिर्फ़ उसे जरूरी सवाल कर रही थी और फिर वह चली गई।

UNSC में भारत की दावेदारी: जिस स्थायी सीट के ऑफर को नेहरू ने ठुकराया, उसके लिए PM मोदी चला रहे मुहिम

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) उस संस्था का नाम है, जिसका गठन 1945 में ‘अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा’ बनाए रखने के लिए हुआ था। संयुक्त राष्ट्र की छः प्रमुख अंगों में से एक सुरक्षा परिषद (UNSC) में फ़िलहाल 15 देश हैं। इनमें पाँच सदस्य स्थायी होते हैं। 130 करोड़ की जनसंख्या वाला भारत इसमें शामिल नहीं है।

UNSC का कहना है कि उसका उद्देश्य ‘शांति पर खतरों अथवा आक्रामक कृत्यों’ की पहचान करने में नेतृत्व करना है। साथ ही ये दो पक्षों के बीच शांति से मामले को निपटाने पर जोर देता है और इसके तरीके निकालता है। इसे संयुक्त राष्ट्र की तरफ से बलपूर्वक शांति-स्थापना के लिए प्रतिबन्ध लगाने के भी अधिकार प्राप्त हैं। 15 देशों में से 5 स्थायी सदस्य हैं- अमेरिका, यूके, चीन, रूस और फ़्रांस। अब जब इसमें सुधार की माँग हो रही है, भारत की दावेदारी सबसे तेज़ी से उभरी है।

भारत और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC)

24 अक्टूबर 1945 में अस्तित्व में आए इस संस्था की स्थायी सदस्यता के लिए भारत ने औपचारिक तौर पर दावा 3 अक्टूबर 1994 को पेश किया था। लेकिन जब बात भारत की विदेश नीति बात की आती है तो प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा की गई बड़ी गलतियों को उसमें न जोड़ा जाए, तो वो अधूरी है। कॉन्ग्रेस के ही नेता और वर्षों तक यूएन में सेवा देने के बाद भारत के विदेश राज्यमंत्री रहे शशि थरूर अपनी पुस्तक ‘Nehru: The Invention of India’ में यूएन के भारतीय अधिकारियों के द्वारा देखी गई फाइलों के हवाले से लिखा है कि जब जब नेहरू को अमेरिका ने भारत के UNSC में स्थायी सदस्य बनने का ऑफर दिया, तो उन्होंने कहा कि ये सीट चीन को दे दी जाए।

तो एक तरह से जवाहरलाल नेहरू ने एक बड़ा मौका गँवा दिया और उसके बाद से भारत कभी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का स्थायी सदस्य नहीं बन सका। अब जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व भर में भारत का डंका बजाया है तो भारत की UNSC में स्थायी दावेदारी कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनकी प्रमुख माँगों में से एक रही है। उनका कहना है कि भारत के बिना ऐसी किसी संस्था का कामकाज कैसे चल सकता है?

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंबली को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट कहा कि बदलते घटनाक्रम और आज की परिस्थितियों को देखते हुए यूएन में सुधर की सख्त ज़रूरत है। उन्होंने पूछा कि आपदा के इस वक़्त में यूएन कहाँ है? साथ ही उन्होंने UNSC में भारत के लिए स्थानीय सदस्यता की माँग दोहराई। उन्होंने कहा कि दुनिया के हित के लिए ‘संतुलन और सशक्तिकरण’- दोनों आवश्यक है।

भारत की बढ़ती शक्ति का ही नतीजा है कि जून 2020 में हमारा देश 8वीं बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का अस्थायी सदस्य चुना गया। इससे पहले 1950-1951, 1967-1968, 1972-1973, 1977-1978, 1984-1985, 1991-1992 और 2011-12 में भारत UNSC का अस्थायी सदस्य रहा है। ताज़ा चुनाव में भारत को 184 मत (95.8%) मिले। इससे ज्यादा सिर्फ 2011-12 में भारत को 187 वोट मिले थे।

संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में भी भारत की UNSC में स्थायी सदस्यता की माँग की धमक सुनाई पड़ रही है। अमेरिका के पूर्व डिप्लोमेट रिचर्ड वर्मा ने कहा कि डेमोक्रेट उम्मीदवार जो बिडेन अपनी जीत के बाद संयुक्त राष्ट्र में सुधारों को आगे बढ़ाएँगे और भारत जैसे देश को UNSC में स्थायी सदस्यता दिलाने में मदद करेंगे, इसमें कोई दो राय नहीं है। उन्होंने कहा कि उनके काल में भारत-अमेरिका सबसे करीबी दो देश होंगे।

2015 में यूएन की जनरल असेम्ब्ली में भी भारत ने साफ़ कर दिया था कि संयुक्त राष्ट्र में कोई भी सुधार तब तक अपूर्ण रहेगा, जब तक भारत को UNSC का स्थायी हिस्सा न बनाया जाए, क्योंकि ऐसा न किया जाना 21वीं सदी की वैश्विक चुनौतियों के अनुरूप नहीं होगा। भारत की माँग है कि न सिर्फ स्थायी, बल्कि UNSC की अस्थायी सदस्यों की संख्या भी बढ़ाई जाए। भारत ने 1994 में पहली बार UNSC की स्थायी सदस्यता के लिए अपनी दावेदारी पेश की थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आने के बाद से बदल रहा है परिदृश्य

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब बोलते हैं तो पूरी दुनिया उन्हें सुनती है। इसका कारण है कि वो न सिर्फ वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए तकनीक के इस्तेमाल पर जोर देते हुए रोचक उपाय सुझाते हैं, बल्कि पक्षपात के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को उनकी गलतियाँ याद दिलाने से भी नहीं चूकते। जब यूएन का गठन हुआ था, तभी महात्मा गाँधी का मानना था कि भारत को UNSC में वीटो पावर रखने वाला सदस्य होना चाहिए।

चाहे दुबई हो या फिर अमेरिका का न्यूयॉर्क, नरेंद्र मोदी जहाँ भी गए- उन्होंने वहाँ रह रहे भारतीयों में एकता की अलख जगाई। उन्हें एहसास दिलाया कि वो एक हैं और एक होकर आवाज़ उठाएँगे तो किसी भी देश को सुनना पड़ेगा। भारत ने UNSC में अपनी अनौपचारिक दावेदारी तो इसके गठन के बाद से ही शुरू कर दी थी, लेकिन पीएम मोदी के आने के बाद जिस तरह से कई छोटे-बड़े देशों ने इसका समर्थन किया है, उससे भारत का मनोबल बढ़ा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से G-4 (भारत, जापान, ब्राजील और जर्मनी) को नई ऊँचाइयाँ देते हुए यूएन में एकता दिखाई है और सितम्बर 2015 में जिस ऐतिहासिक ‘टेक्स्ट बेस्ड नेगोशिएशन्स’ की यूएन में शुरुआत हुई, उसके पीछे भारत का बड़ा रोल था। यूएन में भारत ने अपनी धमक ऐसी बढ़ा ली है कि UNSC में स्थायी सदस्यता मिलना बस अब समय की बात है। चीन के साथ तनाव को देखते हुए चीन-विरोधी देशों को भी लग रहा होगा कि भारत को इसमें होना चाहिए।

हालाँकि, अभी इस मामले में बहुत कुछ किया जाना है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि G-4 देशों को यूएन सुरक्षा परिषद के चुनावों में वोट का ही बहिष्कार कर देना चाहिए और जब परमाणु बम रखने के आधार पर या अन्य मामलों में किसी देश को प्रतिबंधित करने की बात आए तो इसका विरोध करना चाहिए। पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत ने इसकी शुरुआत भी कर दी है। यहाँ एक उदाहरण देखना ज़रूरी है।

यूएनएससी ने सूडान के खिलाफ ‘इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट’ के साथ सहयोग न करने का आरोप लगा कर प्रस्ताव पारित किया। लेकिन, भारत ने 2015 में निर्भयतापूर्वक वहाँ के राष्ट्रपति उमर हसन अल-बशीरस का इंडो-अफ्रीकन समिट के दौरान स्वगात किया। सूडानी राष्ट्रपति ने भी UNSC में भारत की दावेआरी का स्वागत किया और साथ ही समझाया कि कैसे यूएन में अफ्रीका का प्रतिनिधत्व काफी कम है।

UNSC (संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद) में भारत की स्थायी सदस्यता: अब आगे क्या?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार पेरिस में भारतीय समुदाय को सम्बोधित करते हुए कहा था कि भारत एक ऐसा देश है जो हमेशा शांति के लिए खड़ा रहता है और विश्व में शांति की स्थापना में मदद करता है- फिर भी UNSC में एक स्थायी सीट के लिए हमें संघर्ष करना पड़ रहा है। अब जब प्रथम विश्वयुद्ध के 100 वर्ष हो चुके हैं, पीएम ने कहा था कि महात्मा गाँधी और बुद्ध की भूमि को उसका ‘हक़’ मिलना चाहिए।

पीएम मोदी कहते हैं कि अब वो समय चला गया जब भारत मदद के लिए कहता था, अब ऐसा समय है जब देश सिर्फ अपना अधिकार माँग रहा है, कोई एहसान करने नहीं बोल रहा। क्लाइमेट चेंज के विषय में भारत पूरी दुनिया के नेतृत्व की ओर आगे बढ़ रहा है। सोलर अलायन्स ओर एक बड़ा कदम था। पेरिस में क्लाइमेट चेंज पर हुए समिट में भारत की धमक पूरी दुनिया ने काफी अच्छी तरह देखी।

भरतपुर: 8 साल की बच्ची को अगवा कर सुबेदीन ने साथियों संग किया रेप

राजस्थान के भरतपुर जिले के कैथवाड़ा थाना क्षेत्र में एक 8 वर्षीय नाबालिग बच्ची के अपहरण और सामूहिक बलात्कार का मामला सामने आया है। पुलिस ने मामले में आरोपित सुबेदीन उर्फ इन्नस पुत्र काला खां को गिरफ्तार कर लिया है। फिलहाल, अन्य आरोपित फरार हैं।

जाँच अधिकारी डीएसपी मदनलाल जैफ के अनुसार पीड़िता के पिता ने 30 सितंबर को कैथवाड़ा थाने पर इस मामले में शिकायत दर्ज करवाई थी। पिता ने अपनी तहरीर में गाँव बांसोली निवासी सुबेदिन और उसके 3-4 साथियों पर अपनी बच्ची के अपहरण और गैंगरेप का आरोप लगाया था।

इसके बाद पुलिस ने मामले को संज्ञान में लेते हुए अपनी जाँच पड़ताल शुरू की व मुख्य आरोपित सुबेदीन को गिरफ्तार कर लिया। वहीं बाकी फरार आरोपितों के धर पकड़ के लिए पुलिस टीमें दबिश दे रही हैं।

पिता द्वारा दर्ज शिकायत के अनुसार, आरोपितों ने उनकी लड़की के साथ दुष्कर्म किया फिर घायल अवस्था में घर के पास छोड़कर भाग गए।

गौरतलब है कि इससे पहले राजस्थान के बारां (Baran) जिले में दो नाबालिग लड़कियों से गैंगरेप का मामला सामने आया था। इसमें पीड़िताओं के पिता ने पुलिस से अपनी बच्चियों के साथ हुए अपराध को लेकर न्याय की माँग की थी। अगवा की गई लड़कियों से जब पुलिस अधिकारियों ने पूछताछ की तो पुलिस के सामने ही उन्हें जान से मारने की धमकी दे दी गई। इस वजह से वह अपने ऊपर हुए जुर्म के बारे में नहीं बता सकी थीं।

नाबालिग लड़कियों के पिता ने पुलिस को बताया था कि दो नाबालिग आरोपित 18 सितंबर की रात को बहला फुसला कर उनकी बेटियों को भगा ले गए थे। पिता के आरोप के अनुसार, अगवा करने के बाद उन्हें अजमेर, कोटा और जयपुर ले जाकर तीन दिनों तक लगातार उनका बलात्कार किया गया। दोनों लड़कियों को 21 सितंबर को कोटा से बरामद किया गया था।

एक तरह जहाँ दोनों नाबालिगों ने कैमरे पर नशीला पदार्थ पिलाकर सामूहिक बलात्कार करने की बात स्वीकार की। वहीं इस मामले में पुलिस और सीएम अशोक गहलोत का दावा है कि नाबालिग लड़कियों ने अपने बयान में बलात्कार के आरोपों से इनकार किया है।