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टीका लाल टपलू की हत्या और कश्मीरी पंडितों को भगाने के लिए नारा – ‘जलजला आया है कुफ्र के मैदान में, लो मुजाहिद आ गए मैदान में’

14 सितंबर 1989 यानी आज से ठीक 31 साल पहले कश्मीर में टीका लाल टपलू नामक कश्मीरी पंडित की हत्या को अंजाम दिया गया था। पंडित टीका लाल टपलू कश्मीरी पंडितों के बीच सबसे जाना-माना चेहरा थे। उनकी हत्या के बाद ही कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार का सिलसिला शुरू हुआ था। 

पंडित टपलू को मारने के लिए बड़ी ही बारीकी से आतंकियों ने साजिश रची थी। मगर, फिर भी टपलू को इसका आभास हो चुका था, शायद इसीलिए उन्होंने सबसे पहले अपने परिवार को दिल्ली पहुँचाया और फिर दोबारा 8 सितंबर को कश्मीर लौट आए। उनकी निर्मम हत्या कश्मीरी पंडितों को घाटी से भगाने की दिशा में पहला कदम माना जाता है।

8 सितंबर को दिल्ली से कश्मीर लौटने के बाद उनके घर पर 12 सितंबर को एक हमला हुआ था। यह हमला उन्हें डराने के लिए था। लेकिन कश्मीरी पंडितों का नेतृत्व करने की ठान चुके पंडित टीका लाल इससे घबराए नहीं और चिंक्राल मोहल्ले में स्थित अपने आवास पर टिके रहे। नतीजतन मात्र 2 दिन के अंदर उनकी हत्या की वारदात को अंजाम दे दिया गया।

14 सितंबर की सुबह पंडित टीका लाल के लिए सामान्य सुबह थी। उन्होंने अपने आवास के बाहर एक बच्ची को रोते हुए देखा,और वह बिन कुछ सोचे-समझे घर से बाहर निकल आए। बच्ची की माँ से उसके रोने की वजह पूछने पर पता चला कि उसके स्कूल में कोई फंक्शन है और उसके पास पैसे नहीं है, इसलिए वह रो रही है।

यह बात सुन कर पंडित टपलू ने उसे गोद में उठाया और पाँच रुपए देकर चुप करा दिया। मगर, तभी सामने से आतंकवादी आ गए और उन्होंने उनकी छाती गोलियों से छलनी कर दीं। इस वारदात के साथ ही कश्मीरी पंडितों को यह अहसास करवा दिया गया था कि वहाँ पर अब निजाम ए मुस्तफा का राज ही चलेगा।

कश्मीरी लेखक राहुल पंडिता के अनुसार, जिस दिन पंडित टीका लाल को मारा गया, उस दिन उनके पिता उन्हें घर ले आए थे और उन्हें दो दिन तक स्कूल जाने नहीं दिया गया था। यानी साफ है कि आतंकी कश्मीरी पंडितों को जो संदेश देना चाहते थे, वो उन तक पहुँच गया था।

लेखक अपने एक लेख में कश्मीरी पंडितों की आपबीती लिखते हुए जिक्र करते हैं कि पंडित टीका लाल की हत्या के मात्र एक महीने बाद यानी 14 अक्टूबर को उनके पिता ने एक कार्यक्रम में शिरकत की थी, जहाँ से लौटने के बाद उन्होंने बताया कि कार्यक्रम में भीड़ नारे लगा रही थी:

यहाँ क्या चलेगा, निजाम ए मुस्तफा
ला शरकिया ला गरबिया, इस्लामिया इस्लामिया;

जलजला आया है कुफ्र के मैदान में 
लो मुजाहिद आ गए हैं मैदान में

मौजूदा जानकारी के अनुसार, पंडित टीका लाल पेशे से वकील थे, लेकिन शुरुआती समय से ही उनका जुड़ाव आरएसएस से था। इसके अलावा घटना के समय वह जम्मू कश्मीर में भाजपा उपाध्यक्ष भी थे। लोग उन्हें लालाजी यानी बड़ा भाई कहकर संबोधित करते थे। अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से वकालत पढ़ने के बावजूद पंडित टपलू ने कभी अपनी पढ़ाई का इस्तेमाल पैसा कमाने के लिए नहीं किया था।

उन्होंने जो भी कमाया, सब विधवा औरतों और उनके बच्चों की पढ़ाई में ही खर्च किया। उन्होंने घाटी में रहते हुए कई मुस्लिम लड़कियों की भी शादी करवाई थी। उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि लोग जात-पात धर्म-मजहब से ऊपर उठ कर उनका सम्मान करते थे।

उनकी यही छवि अलगाववादियों के लिए गले में फँसी हड्डी जैसी थी, जिन्हें अपना अस्तित्व बचाने के लिए कश्मीरी पंडितों को हटाना था। लेकिन पंडित टीका लाल के जीवित रहते उन्हें यह काम असंभव लग रहा था।

कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, पंडित टीका लाल टपलू की मृत्यु के बाद काशीनाथ पंडिता ने कश्मीर टाइम्स में लेख लिख कर अलगाववादियों से पूछा था कि आखिर वह चाहते क्या हैं। जिसके जवाब में उन्होंने बताया था कि कश्मीरी पंडित भारत का समर्थन देना या तो बंद कर दें और अलगाववादी आंदोलन का साथ दें या कश्मीर छोड़ दें।

बता दें, जिस समय पंडित टीका लाल की हत्या को अंजाम दिया गया, उस दौरान जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट अपनी राजनैतिक पैठ बनाने की कोशिशों में जुटा हुआ था। उनकी अंतिम यात्रा के समय में जब केदार नाथ साहनी और लाल कृष्ण आडवाणी जैसे लोग हजारों कश्मीरी पंडितों के साथ श्रीनगर पहुँचे और घटना के विरोध में कश्मीरी हिंदू संगठनों ने बंद का आयोजन किया तो जेकेएलएफ ने आयोजन पर पत्थरबाजी भी करने की कोशिश की। हालाँकि वह अपने इरादों में सफल नहीं हो पाए। मगर, इन सबसे अलगाववादी इरादों की भनक कश्मीरी पंडितों को जरूर लग गई थी।

आज भाजपा नेता पंडित टीका लाल टपलू को उनके राष्ट्रवादी भावना और अदम्य साहस के लिए याद किया जाता है। कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार की बात जब-जब होती है, उसकी पृष्ठभूमि समझने के लिए पंडित टीका लाल की हत्या सबसे पहली घटना बन कर सामने आती है।

आज 14 सितंबर के मौके पर और उनकी निर्मम हत्या के 31 साल बीत जाने पर, अनुपम खेर लिखते हैं, “आज से 31 साल पहले 59 वर्षीय सोशल वर्कर श्री टीका लाल टपलू जी की आतंकवादियों द्वारा 14 सितंबर को श्रीनगर में हत्या कर दी गई थी। और यहाँ से शुरू हुआ था कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार का एक लंबा सिलसिला। ये घाव भले ही भर गए हो। लेकिन भूले नहीं हैं। और भूलने चाहिए भी नहीं।”

इसी तरह हरीश चंद्र लिखते हैं, “आज से 31 साल पहले 14 सितम्बर को सामाजिक कार्यकर्ता श्री टीका लाल टपलू की इस्लामी आतंकवादियों द्वारा श्रीनगर में हत्या करके कश्मीर को हिन्दूविहीन बनाने का जिहादी षड्यंत्र प्रारम्भ हुआ। कश्मीर के हिन्दुओं पर जिहादियों द्वारा किया गया अत्याचार भारत भूल नहीं सकता।”

हिन्दी केवल उत्तर भारत की नहीं: हिन्दी दिवस को हिन्दी बोलने वालों तक नहीं करें सीमित, न ही किया जाना चाहिए

14 सितंबर 1949 – जब संविधान सभा ने हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया। 14 सितंबर 1953 – जब से हिन्दी दिवस मनाने की शुरुआत हुई। हिन्दी के लिए असल मायनों में दो सबसे अहम मौके। ऐसी भाषा जो दुनिया की 5 सबसे ज्यादा बोली जाने वाली (देशी भाषा या बोलने-समझने लायक – दोनों स्तरों पर) भाषा में से एक है।

हिन्दी भाषा ने कालांतर में एक लंबी यात्रा तय की है और इस यात्रा में तमाम उतार-चढ़ाव थे। अनुमानित तौर पर हिन्दी भाषा में लगभग 7 लाख शब्द हैं और एक औसत व्यक्ति 50 हज़ार शब्दों तक सिमट कर रह जाता है। 

प्रेमचंद इकलौते ऐसे व्यक्ति थे, जिनकी शब्द संख्या 1.50 लाख तक पहुँची थी। इस आँकड़े का मतलब? मतलब हम भाषा को कितना कम समझते हैं या क़ायदे से आधा भी नहीं! भारतीय दर्शन में तो शब्दों का दर्जा बहुत बड़ा है, शब्दों को ब्रह्म तुल्य माना जाता है। यानी जितना सत्य है, शब्दों से हट कर कुछ नहीं! और शब्द कहाँ से आए? भाषा से! 

भाषा का अपना इतिहास है, विज्ञान है, अपनी एंथ्रोपोलॉजी (मानवशास्त्र) है। भाषा में सम्बोधन, भाव भंगिमाएँ, ध्वनि और संकेत हैं। बल्कि इसे कुछ यूँ कहा जाना चाहिए कि भाषा है तभी छंद है, अलंकार है, गद्य और पद्य है, अभिव्यक्ति और विचार है। हम भाषा अपने जन्म से ही समझना शुरू कर देते हैं, फिर पढ़ते हैं और वह जन्मांतर तक हमारे साथ रहती है। 

अंग्रेज़ी भाषा में एक कहावत है जो हिन्दी भाषा की चौखट पर सटीक बैठती है Language is an emotion of collectiveness (भाषा में एकीकरण की भावना है)। भाषा है, तभी विचार हैं और विचार हैं तभी अभिव्यक्ति है। सीधी सी बात है – ‘भाषा नहीं तो अभिव्यक्ति नहीं।’ कोई विचार प्रसारित होता है, तो वह भाषा की ही देन है। इस बात के आधार पर भाषा की प्रासंगिकता और उपयोगिता पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है। 

हम पूरी दुनिया में शायद इकलौते ऐसे देश हैं, जिसने हिन्दी भाषा को माता का दर्जा दिया है और यह कारण पर्याप्त है भाषा के लिए कट्टर बनने के लिए। माता के साथ स्नेह और सम्मान की भावनाएँ जुड़ी होती हैं और इन बातों से आज तक किसी भी तरह का समझौता नहीं हुआ है। एक यथार्थ यह भी है कि हम भले अपनी भाषा के लिए कितने कट्टर क्यों न बन जाएँ पर हिन्दी भाषा से ज़्यादा सहिष्णु भाषा भी कोई दूसरी नहीं है। 

अपनी यात्रा में हिन्दी भाषा ने सबसे ज़्यादा उतार-चढ़ाव देखे हैं लेकिन इसी भाषा ने सभ्यता को जन्म दिया। हिन्दी भाषा की वजह से ही सामाजिक और सामुदायिक सुधार हुए। भाषा के स्वरूप में बदलाव लाने का मतलब भाषा की आत्मा कुचलने जैसा है और जब आत्मा ही नहीं होगी तो एक लाश को कितना और कैसै सजाया जा सकता है।

किसी जानकार ने लिखा है कि ‘भाषा या तो कठिन है या फिर नहीं है’ और सच्चाई यही है कि भाषा की सुंदरता उसके असल स्वरूप में है। यही कारण है कि आज की तिथि में हिन्दी दुनिया की चौथी सबसे ज़्यादा उपयोग की जाने वाली भाषा है।  

शब्द शास्त्र में इसके लिए एक उक्ति है ‘उकतार्थानाम अप्रयोगः’ मायने, जिस अर्थ के लिए कोई शब्द या शब्दांश उपयोग होता है उसके लिए दोबारा कोई शब्द उपयोग नहीं किया जाएगा अन्यथा पुनरावृत्ति दोष होता है। हम कभी गौर नहीं करते लेकिन हिन्दी भाषा में विकल्प की कमी नहीं है। कालांतर में हमने ख़ुद से विकल्प सीमित किए हैं। हम कभी खोजने का प्रयास नहीं करते हैं कि सॉफ्टवेयर की हिन्दी क्रमानुदेश होती है और हार्डवेयर की धातु सामग्री। 

हिन्दी भाषा में आज भी ऐसे अनेक शब्द हैं, जो आम जनमानस से अपरिचित हैं। कभी एक आम वार्ता में कोई कहे अनुशीलन, उद्विग्न, आरूढ़, अलभ्य, आभ्यातारिक, परिस्फुट, नैराश्य। वार्ता में ऐसे किसी भी शब्द का उल्लेख करने से वहाँ स्थिति असामान्य हो जाती है लेकिन क्या वाकई ऐसा होना चाहिए? इस श्रेणी के शब्दों का उपयोग करने वालों को ‘टैबू’ की तरह देखा जाता है। ऐसी कोई अनिवार्यता भी नहीं है कि इनका इस्तेमाल होना ही चाहिए पर कम से कम इन्हें जानना और समझना तो आवश्यक है। 

इसलिए हरिशंकर परसाई ने लिखा है कि हिन्दी दिवस के दिन हिन्दी बोलने वाले हिन्दी बोलने वालों को कहते हैं कि हिन्दी में बोलना चाहिए। ऐसी हालात हमारे सामने कभी नहीं आनी चाहिए। हिन्दी का दायरा और महत्व केवल एक दिन तक सीमित नहीं किया जा सकता है और न ही किया जाना चाहिए। और हिन्दी के सम्बंध में दिया जाने वाला सबसे गलत तर्क है कि हिन्दी केवल उत्तर भारत की भाषा है। 

सच्चाई यह है कि तमिलनाडु के मन्दिरों में हिन्दी भाषी भजन बजते हैं। कोयम्बटूर में अच्छी भली हिन्दी बोलने-समझने वाली आबादी है। केरल के कई संस्थानों में हिन्दी अनिवार्य है। इतना ही नहीं, पूर्वोत्तर के ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहाँ पर्याप्त हिन्दी बोली जाती है। गुवाहाटी, शिलॉन्ग, चेरापूंजी, दार्जिलिंग, गैंगटोक और न जाने कितने क्षेत्र… जिनके बारे में हम जानते ही नहीं। 

हिन्दी भाषा में अच्छा लिखने वालों की सूची और भी लंबी है, हिन्दी भाषा ने बहुतों को बहुत कुछ दिया शायद इतना, जितना लौटाया नहीं जा सकता। इस भाषा ने सभ्यताओं को गढ़ा है और अब यह भावनाएँ गढ़ती हैं। छोटी कक्षाओं से लेकर भाषण के मंचों तक और नुक्कड़ पर होने वाली बहसों से लेकर पुस्तकों में उकेरे गए हर अहम शब्द तक। भाषा ने पीढ़ियों का बुनियादी ढाँचा सुधारा है और आने वाले समय में भी सुधारेगी, ज़रूरत है तो इसका सम्मान करने की और इसे समझने की।

‘कंगना रनौत को थप्पड़ नहीं मारा… शिवसैनिक महिलाओं की इज्जत करते हैं’ – अभिनेता नास्सर अब्दुल्ला

बॉलीवुड अभिनेता नास्सर अब्दुल्ला ने शिवसेना का समर्थन करते हुए कहा है कि महाराष्ट्र में तोड़फोड़ की घटनाएँ बालसाहब ठाकरे के समय से ही होती आ रही हैं। उन्होंने दावा किया कि जितने भी शिवसैनिक हैं, वो सभी महिलाओं की इज्जत करते हैं। उन्होंने कहा कि कंगना रनौत शिवसेना के साथ आततायी हो गईं और इसलिए उनका दफ्तर तोड़ा गया। बकौल नास्सर अब्दुल्ला, ये बात तो माननी पड़ेगी कि शिवसैनिकों ने कंगना रनौत के साथ हाथापाई नहीं की।

उन्होंने ये बातें ‘आजतक’ पर अंजना ओम कश्यप के साथ एक चर्चा में कही। अंजना ओम कश्यप ने उनसे पूछा कि क्या वो ये कहना चाहते हैं कि चूँकि कंगना रनौत महिला हैं, इसीलिए शिवसैनिकों ने उनकी पिटाई नहीं की और पूर्व-नौसेना अधिकारी मदन शर्मा पुरुष हैं, इसीलिए उन्हें पीट कर घायल कर दिया गया? नास्सर अब्दुल्ला ने कहा कि कंगना रनौत महिला हैं, इसीलिए उनके दफ्तर पर बुलडोजर चला दिया, उन्हें थप्पड़ नहीं मारा।

देखें वीडियो 32:00 के बाद (साभार: आजतक)

जहाँ तक नास्सर अब्दुल्ला की बात है, वो बॉलीवुड की कई फिल्मों में काम कर चुके हैं। उन्हें ‘आई एम ऑलवेज हियर (2004)’, ‘ओम शांति ओम (2007) और ‘गाँधी (1982)’ में काम करने के लिए जाना जाता है। उन्होंने 1992 में फिल्म ‘दिल आशना है’ से बॉलीवुड में डेब्यू किया था। इसके बाद उन्होंने 1995 में टीवी सीरियल ‘स्वाभिमान’ में काम किया। हालाँकि, पिछले 8 वर्षों से उन्हें फ़िल्में नहीं मिल रही हैं।

वो टीवी डिबेट्स में अजीब तरीके से हाथ हिला कर अंग्रेजी बोलने के लिए भी जाने जाते हैं। ज्ञात हो कि हाल ही में कंगना रनौत के दफ्तर में बीएमसी ने तोड़फोड़ मचाई थी। बीएमसी ने कंगना रनौत के पाली स्थित ऑफिस के एक हिस्से को अवैध निर्माण का हवाला देते हुए ध्वस्त कर दिया था। जब ये सब किया जा रहा था, तब उस वक्त बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत मनाली से मुंबई के लिए निकल चुकी थीं और रास्ते में थी। 

वहीं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का कार्टून शुक्रवार को सोशल मीडिया में फॉरवर्ड करने पर मुंबई में शिवसेना कार्यकर्ताओं ने सेवानिवृत्त नेवी ऑफिसर मदन शर्मा पर हमला बोल दिया था। इस हमले में पूर्व नेवी अधिकारी की आँख बुरी तरह जख्मी हो गई थी। बाद में पुलिस उल्टा उन्हें ही गिरफ्तार करने आई थी। लेकिन, वह अपने घर से बाहर ही नहीं निकले। इस मामले में आरोपितों को गिरफ्तार कर थाने से ही जमानत भी दे दी गई। 

सलमान खान ने कुत्ते को उठाया, झील में फेंका… और हँसते हुए वीडियो बनवाता रहा: FIR दर्ज, आरोपित फरार

भोपाल के श्यामा हिल्स पुलिस स्टेशन में सलमान खान नामक एक व्यक्ति के खिलाफ पशु क्रूरता का मामला दर्ज किया गया है। सलमान खान पर आरोप है कि उसने एक कुत्ते को अपर लेक में फेंक दिया और फिर उसका वीडियो बनवाता रहा। कुत्ते को झील में फेंकने वाला वीडियो वायरल होते ही भोपाल में आरोपित की गिरफ़्तारी की माँग होने लगी। सोशल मीडिया पर अन्य जगह के लोगों ने भी इस मामले में अपना विरोध दर्ज कराया।

ये वीडियो श्यामला हिल्स के पास अपर लेक में स्थित बोट क्लब के पास बनाए गए रेलिंग के पास शूट किया गया है। उक्त आरोपित कुत्ते को सबसे पहले अपने दोनों हाथों से उठाता है और फिर उसे झील में जोर से उछाल कर फेंक देता है। इसके बाद वो वीडियो में मुस्कुराता हुआ दिख रहा है। अभी तक पुलिस को ये नहीं पता चल सका है कि कुत्ते की मौत हो गई या फिर वो ज़िंदा है। वीडियो किसे शूट किया, इसका भी पता नहीं चला है।

आरोपित सलमान खान भोपाल के टीला जमालपुरा का रहने वाला है। वो फ़िलहाल फरार है। कहा जा रहा है कि सलमान खान के खिलाफ पहले से ही पशु क्रूरता का इतिहास रहा है और वो इससे पहले भी जानवरों के साथ इस तरह की हरकतें करता रहा है। रविवार की शाम आईपीसी की धारा-429 (किसी जीव-जन्तु का वध करने या उसे विकलांग करने आदि द्वारा कुचेष्टा) के तहत मांमला दर्ज किया गया है और उसकी तलाश जारी है।

साथ ही सलमान खान के खिलाफ ‘पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण अधिनियम’ के तहत भी कार्रवाई की जा रही है। श्यामा हिल्स की ही रहने वाले सुनीता जोशी ने उसके खिलाफ थाने में ममला दर्ज कराया। भोपाल के डीआईजी इरशाद वली ने बताया कि सलमान खान एक फोटो स्टूडियो में काम करता है और पुलिस ने उसकी पहचान कर ली है। पुलिस ने बताया कि घटना की तारीख और समय के बारे में पता नहीं चल सका है।

हालाँकि, भोपाल पुलिस ने सलमान द्वारा कुत्ते को झील में फेंकने वाले वीडियो को लेकर आरोपित के दोस्तों से पूछताछ की, जिन्होंने बताया कि ये घटना काफी पुरानी है। सोशल मीडिया पर भी लोग इस घटना को लेकर गुस्से का इजहार करते माँग कर रहे हैं कि आरोपित के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। अस्मा खान नामक एक छात्रा ने भोपाल के डीएम को इस मामले में ज्ञापन दिया। उन्होंने वीडियो शूट करने वाले के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की माँग की।

‘लद्दाख में क्रैश हुआ भारत का Mi-17’ – चीन की गोदी में खेल रहे पाकिस्तानी पत्रकार, फैला रहे फर्जी खबर

दुनिया के सामने भारत को कमजोर दिखाने के लिए पाकिस्तान अब सोशल मीडिया पर नए झूठ फैला रहा है। हाल ही में एक पाकिस्तानी पत्रकार ने एक तस्वीर को शेयर करके ये बताने की कोशिश की है कि भारत का ‘M-17’ लद्दाख में क्रैश हो गया है और इस संबंध में वह भारतीयों को जानकारियाँ देते रहेंगे।

ट्विटर पर पाकिस्तानी पत्रकार मुबाशेर लुकमान ने एक क्रैश विमान की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा, “भारतीयों चेक करो, क्या यह तुम्हारा M 17 लद्दाख में क्रैश हो गया है। हम तुम्हें इससे जुड़ी जानकारियाँ देते रहेंगे।”

इसके बाद कई पाकिस्तानियों ने इस तस्वीर को धड़ल्ले से शेयर किया। इमरान खान की पीटीआई से जुड़ी डॉ फातिमा ने इस तस्वीर को शेयर करते हुए लिखा, “बस एक दरख्वास्त है!!! हमारे लिए भी कुछ राफेल्स रखे रखना।”

अब दिलचस्प बात यह है कि जिस तस्वीर को पाकिस्तानी पत्रकार, वहाँ की अवाम और पीटीआई से जुड़े लोग तक सोशल मीडिया पर खुशी-खुशी शेयर कर रहे हैं, वो तस्वीर वास्तविकता में साल 2018 की है।

जी हाँ, पाकिस्तानियों द्वारा शेयर की जा रही तस्वीर 3 अप्रैल 2018 को उत्तराखंड के केदारनाथ में हुई एक दुर्घटना की है। 3 अप्रैल 2018 की सुबह प्राकृतिक आपदा से हुए नुकसान की मरम्मत के लिए Mi-17 निर्माण कार्यों से जुड़ा सामान लेकर केदारनाथ मंदिर के पीछे बने वीआईपी हैलीपैड पर लैंडिंग करने जा रहा था। मगर, बीच में ही यह घटना हो गई और सुबह के 8 बजकर 10 मिनट पर वहाँ से वायुसेना का एमआई 17 क्रैश होने की खबर आई। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इस दुर्घटना के समय विमान में पायलट समेत 6 वायुसैनिक सवार थे। लेकिन राहत की बात यह थी कि इसमें कोई हताहत नहीं हुआ था।

अब यह तो साफ है कि शेयर की जा रही तस्वीर क्रैश हुए M-17 की ही है लेकिन पाकिस्तानी इसे जिस मकसद से लद्दाख में क्रैश हुआ बता रहे हैं, वह चीन की चाटुकारिता ही है। घटना न तो हाल फिलहाल की है और न ही लद्दाख की। इसलिए तस्वीर के साथ शेयर किए जा रहे कैप्शन से यही मालूम चलता है कि एक बार फिर झूठे दावों का इस्तेमाल करके पाकिस्तान अपना और चायनीज प्रोपेगेंडा फैलाना चाहता है।

हालाँकि, सोशल मीडिया पर भारतीय यूजर्स ऐसे प्रोपेगेंडा का मुँहतोड़ जवाब दे रहे हैं। शिव अरूर पाकिस्तानी पत्रकार के ट्वीट के रिप्लाई में लिखते हैं, “मुबाशेर, यह 2018 की तस्वीर है उत्तराखंड से। 55 लाख फॉलोवर्स के होते हुए भी तुम अपना पायजामा चायनीज को दे आए!”

इसी तरह अमन कश्यप घटना से संबंधित खबर का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए लिखते हैं, “डियर पोर्की, कुछ सुधार। ladakh होता है न कि laddakh। mi 17 है न कि m17। तस्वीर उत्तराखंड की है न कि लद्दाख की। घटना साल 2018 की है न कि 2020 की।”

दिल्ली हिन्दू-विरोधी दंगा: पूर्व JNU छात्र नेता उमर खालिद UAPA के तहत गिरफ्तार, जल्द फाइल होगी चार्जशीट

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद को गिरफ्तार कर लिया है। उमर खालिद को दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों के मामले में यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया गया है। शनिवार (सितम्बर 12, 2020) को ही दिल्ली पुलिस ने उमर खालिद को समन दिया था और उन्हें लोधी कॉलनी स्थित स्पेशल सेल के ऑफिस में हाजिरी देकर जाँच में सहयोग करने को कहा गया था। इससे पहले जुलाई 31 को भी उनसे पूछताछ हो चुकी है।

उसी दिन उमर खालिद का मोबाइल फोन भी सीज कर लिया गया था। रविवार को वो दोपहर 1 बजे पूछताछ के लिए पहुँचे, जिसके बाद शाम को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। अब उन्हें सोमवार को दिल्ली की एक अदालत के समक्ष पेश किया जाएगा। आने वाले कुछ ही दिनों में दिल्ली पुलिस उनके खिलाफ चार्जशीट भी दायर करेगी। क्राइम ब्रांच के नारकोटिक्स यूनिट में तैनात सब-इंस्पेक्टर अरविन्द कुमार को मुखबिर से मिली सूचना के बाद मार्च 6 को उमर खालिद के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।

मुखबिर ने पुलिस के सामने खुलासा किया था कि दिल्ली में हुआ हिन्दू-विरोधी दंगा पूर्व नियोजित साजिश के तहत हुआ था और इसमें उसके साथ दानिश सहित 2 अन्य साथी शामिल थे। ये सभी अलग-अलग संगठनों का हिस्सा थे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दिल्ली दौरे के समय अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सामने भारत में कथित अल्पसंख्यकों के प्रताड़ित होने का नैरेटिव बनाने के लिए उमर खालिद ने दो अलग-अलग जगहों पर भड़काऊ भाषण भी दिया था।

हालाँकि, उमर खालिद के वकील त्रिदीप पाइस ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ से बातचीत करते हुए बताया कि उनके क्लाइंट के खिलाफ लगाए गए आरोप पूरी तरह गलत, मनगढ़ंत और दबाव के कारण दर्ज किए गए हैं। सितम्बर 4 को किए गए एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उमर खालिद ने कहा था कि देश में दो किस्म का क़ानून चल रहा है- एक सत्ताधारी पार्टी के समर्थकों के लिए और दूसरा आम लोगों के लिए, जिनके खिलाफ झूठे सबूत बनाए जाते हैं।

ताहिर हुसैन ने पूछताछ के दौरान बताया था कि उसने 8 जनवरी को ही सीएए विरोधी प्रदर्शन स्थल शाहीनबाग में खालिद सैफी (India Against Hate Group) और उमर खालिद (JNU) के साथ मिलकर इस दंगे की योजना बना ली थी। उसने कबूला था कि वो और भी कई सीएए विरोधी प्रदर्शन के आयोजकों से संपर्क में था। इस कबूलनामे में उमर खालिद का नाम आने के साथ ही दिल्ली पुलिस ने उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी थी।

गलवान में 60 से ज्यादा चीनी सैनिक मारे गए थे, निर्भीक हुई है भारतीय सेना: अमेरिकी समाचार पत्र का दावा

अमेरिकी समाचार पत्र ‘न्यूज़वीक’ ने खुलासा किया है कि 15 जून को सीमा पर हुई भारत और चीनी सैनिकों की हिंसक झड़प में चीन के 60 से ज्यादा सैनिक मारे गए थे। साथ ही, यह बात भी सामने आई है कि भारतीय क्षेत्र में इन आक्रामक गतिविधियों के पीछे खुद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के आदेश थे, लेकिन उनकी सेना को मात कहानी पड़ी।

’60 से अधिक चीनी सैनिक मारे गए थे’

इस लेख के अनुसार, “विवादित इलाकों में घुसपैठ करना बीजिंग की पुरानी आदत है। वहीं, 1962 की हार से भारतीय नेता और जवान मानसिक रूप से लकवाग्रस्त हो चुके हैं और इसलिए वे सीमा पर सुरक्षात्मक रहते हैं। हालाँकि, गलवान घाटी में ऐसा नहीं हुआ। इस झड़प में चीन के 43 जवानों की मौत हुई। वहीं, पास्कल ने बताया कि यह आँकड़ा 60 से अधिक हो सकता है। भारतीय जवान बहादुरी से लड़े। दूसरी तरफ, चीन ने खुद को हुए नुकसान को नहीं बताया है।”

जिनपिंग के राष्ट्रपति बनने के बाद सीमावाद बढ़ा

‘न्यूजवीक’ के अनुसार, “चीन अपनी विफलता से और अधिक परेशान हो गया है, जिसका विपरीत प्रभाव हो सकता है। हार से परेशान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत के खिलाफ बड़ा कदम उठाने के लिए तैयार हैं। इससे निकट भविष्य में सीमा पर और अधिक तनाव पैदा हो सकता है।”

न्यूज़वीक की इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि नवंबर, 2012 में जब से शी जिनपिंग चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने हैं तभी से भारत से लगी सीमा पर चीनी सैनिकों की आक्रामकता बढ़ गई है। जिनपिंग CPC केंद्रीय सैन्य आयोग के अध्यक्ष और पार्टी के महासचिव भी हैं। अमेरिकी समाचार पत्र के अनुसार, भारत और चीन के बीच सीमा का सीमांकन नहीं किया गया है, इसलिए चीनी सैनिक घुसपैठ करने के लिए इसका फायदा उठाते हैं।

अमेरिकी अखबार की इस रिपोर्ट में दोनों पक्षों (भारत-चीन) पर एक-दूसरे पर दशकों पुराने नियम के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है। रिपोर्ट में लिखा है कि भारत के सैनिक निर्भिकता के नए मानकों का प्रदर्शन कर रहे हैं।

रूस ने चीनी गतिविधियों को लेकर भारत को किया था आगाह

‘न्यूज़वीक’ ने लिखा है कि रूस ने मई माह में ही चीन की हरकतों के बारे में भारत को आगाह किया था और चीन तिब्बत के इलाके में पहले से ही युद्धाभ्यास कर रहा था। इसमें कहा गया है कि ‘फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसी’ के क्लियो पास्कल के हवाले से, रूस ने भारत को मई में चीन की हरकतों के बारे में चेतावनी दी थी। इस अखबार ने आबादी के हिसाब से दुनिया के दो सबसे बड़े देशों में 45 साल में हुई यह पहली झड़प बताई है।

वर्तमान हालात यह हैं कि भारत के जवाबी हमलों से चीन के हौंसले पस्त हैं और अब पैंगोंग झील के उत्तरी किनारे पर फिंगर-4 से फिंगर-8 तक के इलाकों में चीनी सैनिक मौजूद हैं। लेकिन 29-30 अगस्त के बाद कई ऊँची चोटियों पर भारतीय सेना के नियंत्रण के बाद चीन की चिंता बढ़ चुकी हैं।

न्यूज़वीक के मुताबिक, ‘फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसी’ के क्लियो पास्कल का मानना है कि खेल बदल गया है और भारत इन आक्रमणकारियों को अब बढ़त लेने का अवसर नहीं दे रहा है और ऐसा प्रतीत होता है कि भारत के सैनिक ‘नएपन’ का निर्भीक प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय अधिक आक्रामक या अधिक आक्रामक रूप से रक्षात्मक हो गए हैं, लेकिन वे वास्तव में निर्भीक और बेहतर हैं।

उल्लेखनीय है कि 15 जून की इस झड़प में चीन ने अपने सैनिकों की वास्तविक जानकारी देने से मना कर दिया था, जबकि यह बात सामने आई थी कि 45 से अधिक चीन सैनिक हताहत हुए थे।

मुरादाबाद: कॉन्ग्रेस महानगर अध्यक्ष हाजी रिजवान सहित 5 पर महिला के घर में घुस छेड़खानी और मारपीट को लेकर FIR

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में कॉन्ग्रेस नेता की दबंगई सामने आई है। पुलिस ने कॉन्ग्रेस महानगर अध्यक्ष रिजवान कुरैशी समेत 5 लोगों पर घर में घुसकर महिला के साथ छेड़खानी, मारपीट और जान से मारने की धमकी देने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया है।

पीड़ित महिला ने आरोप लगाया कि आरोपित हाजी रिजवान कुरैशी का कॉन्ग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों से अच्छे संबंध है। इसी बात का फायदा उठाकर वह बिना डरे गुंडागर्दी करता है। बता दें, कुरैशी समाजवादी पार्टी के देहात विधायक हाजी इकराम का भतीजा है।

पीड़िता का आरोप है कि उनके घर के नीचे बनी दुकान को फरहान क़ुरैशी नाम के व्यक्ति ने किराए पर ले रखा है। जहाँ वह कबाब बेचता है। 26 अगस्त को उसने घर में दुकान से आ रहे ज्यादा धुएँ पर आपत्ति जताई तो फरहान क़ुरैशी ने अपने भाई फैसल, रफीक व कॉन्ग्रेस नेता हाजी रिजवान कुरैशी व दो-तीन अन्य लोगो को बुला लिया। ये लोग उसके घर में घुस गए और उनके साथ गाली-गलौच करते हुए अश्लील हरकतें की। कपड़े भी फाड़ दिए और मारपीट की। साथ ही जान से मारने की धमकी देने लगे।

महिला ने बताया कि वह कॉन्ग्रेस नेता हाजी रिजवान को अच्छे से जानती है। उन्होंने भी कोई कसर नहीं छोड़ा और खुली धमकी भी दी कि पुलिस हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती जो करना है कर लो। पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया है कि सभी आरोपितों के पास हथियार भी थे। इन लोगों के हंगामे की वजह से लोग जमा होने लगे। इसके बाद जान से मारने की धमकी देते हुए आरोपित भाग गए।

वहीं इस मामले में कॉन्ग्रेस के जिला अध्यक्ष ने महानगर अध्यक्ष कुरैशी का बचाव करते हुए उन्हें बेकसूर बताया है। जिला अध्यक्ष विनोद गुम्बर ने पूरी घटना को फर्जी बताया है। पीड़ित महिला ने बताया इस मामले में मुरादाबाद की थाना गलशहीद पुलिस ने 3 सितम्बर को ही कॉन्ग्रेस महानगर अध्यक्ष हाजी रिजवान क़ुरैशी, रफीक, फरहान, फैसल सहित एक अज्ञात के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर लिया है। लेकिन पुलिस की और से अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। सभी आरोपित फिलहाल फरार है।

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने ट्विटर पर जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल किया, यूजर्स ने घेरा

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने रविवार को एक ट्वीट में जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल किया। इसकी वजह से उन्हें सोशल मीडिया में कड़ी प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ा और आखिर में उन्होंने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया।

Jaiveer Shergill’s tweet

शेरगिल ने एक तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा, “हमारे पंजाब में टॉप तीन ड्राइविंग नियम!!” इसमें उन्होंने क@** शब्द का इस्तेमाल किया जो अत्यधिक अपमानजनक है। यह शब्द अक्सर अनुसूचित जाति के लोगों के लिए गाली के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

इसके तुरंत बाद सोशल मीडिया यूज़र्स ने बवाल खड़ा कर दिया। इस तरह के मजाक को साझा करने की वजह पूछी। एक यूजर ने कहा कि कॉन्ग्रेस नेताओं से कुछ भी अच्छा करने की उम्मीद नहीं की जा सकती।

वहीं एक अन्य यूजर ने उन्हें सर्वोच्च न्यायालय के वकील और राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ता के रूप में बिना विचार किए और बिना सोचे जातिवादी मजाक को साझा करने के लिए जमकर लताड़ा। शेरगिल ने आलोचनाओं के बाद ट्वीट तो डिलीट कर दिया, लेकिन उन्होंने जातिसूचक गाली का इस्तेमाल करने के लिए अभी तक कोई माफी नहीं माँगी है।

किसानों को ₹25 हजार करोड़, ₹1.63 लाख करोड़ MSME के लिए: PM मोदी के आत्मनिर्भर पैकेज का रिपोर्ट कार्ड

केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने रविवार (सितम्बर 13, 2020) को कोरोना काल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मई में घोषित किए गए 20 लाख करोड़ रुपए के आत्मनिर्भर भारत पैकेज के तहत कई योजनाओं की प्रगति पर रिपोर्ट पेश की। वित्‍त मंत्रालय ने आत्‍मनिर्भर भारत अभियान के तहत की गई घोषणाओं पर तुरंत अमल करते हुए इस अभियान के तहत किए जाने वाले कामों की निगरानी और नियमित समीक्षा भी शुरू कर दी है।

मंत्रालय ने कहा कि आत्मनिर्भर भारत पैकेज के तहत नाबार्ड के माध्यम से किसानों के लिए अतिरिक्त इमरजेंसी वर्किंग कैपिटल फंडिंग के आवंटित 30,000 करोड़ रुपए में से 25,000 करोड़ रुपए का वितरण किया गया है। शेष विशेष लिक्विडिटी सुविधा (एसएलएफ) के तहत 5,000 करोड़ रुपए की राशि को छोटे एनबीएफसी और एनबीएफसी-एमएफआई के लिए आरबीआई द्वारा नाबार्ड को आवंटित किया गया है। नाबार्ड इसे जल्द ही शुरू करने के लिए परिचालन दिशा-निर्देशों को अंतिम रूप दे रहा है।

वहीं, नाबार्ड ने ऋणदाताओं से क्रेडिट प्राप्त करने के लिए अनारक्षित गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों (NBFC) और माइक्रो फाइनेंस इंस्टीट्यूशंस (MFI) की सहायता के लिए दो एजेंसियों और बैंकों के सहयोग से संरचित वित्त और आंशिक गारंटी योजना भी शुरू की है। बैंक ने दो एजेंसियों और बैंकों के साथ भी सहयोग किया था, जिसमें ऐसे छोटे एमएफआई के लिए ऋण पात्रता को पाँच-छह गुना बढ़ाया जाएगा।

मंत्रालय ने कहा कि इस योजना के लिए 500 करोड़ रुपए के बाद उन छोटे एनबीएफसी-एफआईआई द्वारा 2500 से 3000 करोड़ रुपए की क्रेडिट परिकल्पना की गई है, जो ‘गेम-चेंजर’ साबित होंगे।

वित्त मंत्रालय ने कहा कि 28 अगस्त को बैंकों ने 25,055.5 करोड़ रुपए के पोर्टफोलियो की खरीद को मँजूरी दे दी है और वर्तमान में एनबीएफसी, एचएफसी और एमएफआई के लिए 45,000 करोड़ रुपए की आंशिक क्रेडिट गारंटी योजना 2.0 के तहत अतिरिक्त 4,367 करोड़ रुपए की मँजूरी की प्रक्रिया में है।

नाबार्ड के जरिए किसानों को दिए 30,000 करोड़ रुपए

अब तक नाबार्ड (NABARD) के जरिए कृषि कार्यों के लिए किसानों को 30,000 करोड़ रुपए बाँटे जा चुके हैं। इसके तहत 28 अगस्‍त तक किसानों को 25,000 करोड़ रुपए दिए गए। मंत्रालय ने कहा कि ‘SBICAP’ (एसबीआई कैपिटल मार्केट्स) को एनबीएफसी, एचएफसी, एमएफआई को उधार देने के लिए 30,000 करोड़ रुपए की विशेष तरलता योजना लागू करने के लिए एक एसपीवी स्थापित करने का काम सौंपा गया था।

‘स्‍पेशल लिक्विडिटी स्‍कीम’ के तहत 37 प्रस्‍ताव मँजूर

सितंबर 11, 2020 तक 10590 करोड़ रुपए की राशि वाले 37 प्रस्तावों को मँजूरी दी गई है। 783.5 करोड़ रुपए के वित्तपोषण के लिए 06 आवेदन प्रक्रियाधीन हैं।

10 सितंबर तक 23 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और शीर्ष निजी बैंक 42,01,576 कर्जदारों को 1.63 लाख करोड़ रुपए का कर्ज दे चुके हैं। वित्त मंत्रालय द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि 10 सितंबर को 1.18 लाख करोड़ रुपए 25,01,999 कर्जदारों को दिए जा चुके हैं।

गौरतलब है कि केंद्र ने मई 2020 में 20 लाख करोड़ रुपए के प्रोत्‍साहन पैकेज की घोषणा करते हुए अर्थव्‍यवस्‍था, इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर, सिस्‍टम, वायब्रेंट डेमोग्राफी और उपभोक्‍ता माँग को ‘आत्‍मनिर्भर भारत’ के ‘5 स्‍तंभ’ बताया था। इसके बाद सरकार ने किसानों से लेकर गैर-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों (NBFCs) और करदाताओं (Taxpayers) से लेकर छोटे कारोबार चलाने वाली महिलाओं तक की आर्थिक मदद की।