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शामली: गोकश अफजल को पकड़ने गई पुलिस पर सैकड़ों ग्रामीणों का हमला

उत्तर प्रदेश के शामली जिले के झिंझाना थाना क्षेत्र में गोकश अफजल को पकड़ने गई पुलिस टीम पर सैकड़ों की संख्या में ग्रामीणों ने हमला कर दिया। एक सब इंस्पेक्टर समेत 3 पुलिसकर्मी घायल हो गए। आक्रामक भीड़ ने पुलिस की दो गाड़ियों को तोड़ डाला।

घटना मंगलवार (मई 26, 2020) देर रात की है। पुलिस अधीक्षक विनीत जायसवाल ने बताया कि आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत 100 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज करते हुए गोकश अफजल समेत 30 लोगों को अब तक गिरफ्तार किया जा चुका है।

दरअसल, झिंझाना थाना क्षेत्र के टपराना गाँव में पुलिस की टीम गोकश अफजल को पकड़ने गई थी। पुलिस ने यहाँ दबिश देकर अफजल को हिरासत में ले लिया। जिसे छुड़ाने के लिए आरोपी पक्ष के लोगों और सैकड़ों ग्रामीणों ने पुलिस पर हमला बोल दिया और गोकश को छुड़ाने में कामयाब रहे।

सूचना पाकर तुरंत आलाधिकारी कई थानों की फोर्स लेकर मौके पर पहुँचे और गोकश अफजल समेत 30 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस अधीक्षक विनीत जायसवाल ने कहा कि जल्द ही अन्य अभियुक्तों की गिरफ्तारी भी कर ली जाएगी। एसपी ने बताया कि घायल पुलिसकर्मियों का मेडिकल करवाया गया है। सभी खतरे से बाहर हैं। गाँव में बड़ी संख्या में फोर्स को तैनात किया गया है। आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए दबिश दी जा रही है।

जानकारी के मुताबिक जमीअत उलेमा-ए हिन्द के सदर मौलाना साजिद कासमी ने जिलाधिकारी जसजीत कौर को प्रार्थना-पत्र देकर आरोप लगाया कि जिले में पुलिस द्वारा एक खास समुदाय को पूरी तरह से टारगेट करते हुए परेशान किया जा रहा है। उन्होंने पुलिस द्वारा ग्रामीणों के साथ की गई मारपीट की घटना की मजिस्ट्रेट जाँच कराए जाने की माँग की है।

इससे पहले सोमवार (मई 25, 2020) को मुखबिरों से सूचना के आधार पर टपराना पहुँची पुलिस ने गोवंश कटान की तैयारी कर रहे युवक शाहनवाज को धर दबोचा था। उसके दो भाई इकराम व इमरान फरार हो गए। पुलिस ने मौके से चोरी किया गया एक बछड़ा व काटने के उपकरण बरामद किए। बताया जा रहा है कि पकड़ा गया युवक शाहनवाज इससे पूर्व भी गोवंशों काटने के आरोप मे जेल जा चुका है। वहीं परिवार के अन्य लोगो पर भी गोवंश तस्करी के आरोप हैं।

अलीगढ़: बसपा नेता मोहम्मद जाहिद के बेटे के निकाह में नाचीं बार बालाएँ, हॉटस्पॉट में सोशल डिस्टेंसिंग की उड़ी धज्जियॉं

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में बसपा नेता व हिस्ट्रीशीटर मोहम्मद जाहिद के बेटे के निकाह में सोशल डिस्टेंसिग और लॉकडाउन का जमकर मखौल उड़ाया। निकाह में बार बालाओं को डांस हुआ। घटना मंगलवार (मई 26, 2020) की है।

कार्यक्रम का वीडियो वायरल होने पर पुलिस ने जाहिद व अन्य के खिलाफ FIR दर्ज कर लिया है। अलीगढ़ के एसएसपी मुनिराज ने इस बाबत जानकारी देते हुए बताया कि कार्यक्रम का आयोजन करने वाले के खिलाफ सोशल डिस्टेंसिंग के उल्लंघन का मामला दर्ज किया है। आरोपित के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

जानकारी के मुताबिक घटना सासनी गेट के सराय सुल्तानी मोहल्ले की है, जहाँ पर अधिकतम कोरोना संक्रमितों के मिलने की वजह से 100% लॉकडाउन है। इसके बावजूद बसपा नेता ने ये कार्यक्रम आयोजित किया। इस दौरान न तो किसी ने मास्क पहना था और न ही सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया गया।

वायरल हुए वीडियो में देखा जा सकता है कि कार्यक्रम में सैकड़ों की संख्या में लोगों की भीड़ इकट्ठी है और सोशल डिस्टेंसिंग की जमकर धज्जियाँ उड़ाई जा रही है। लोग स्टेज के पास आकर बार बालाओं के ऊपर पैसे भी लुटा रहे हैं। लोगों ने इसका वीडियो बनाकर विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर शेयर कर दिया। इसके बाद पुलिस ने संज्ञान लेते हुए मामला दर्ज कर लिया। बता दें कि अलीगढ़ के तीन थाना क्षेत्र- सदर कोतवाली, सासनी गेट और देहली गेट थाना क्षेत्र में 100 फीसदी लॉकडाउन किया गया है। 

गौरतलब है कि कोरोना संक्रमण अपने चरम पर है, मगर लोग हरकतों से बाज नहीं आ रहे। पिछले दिनों भी सासनी गेट में ऐसा ही एक मामला सामने आया था। जहाँ एक व्यापारी ने अपनी शादी की 25वीं सालगिरह धूमधाम से मनाई और गाना-बजाना तक हुआ। बीच सड़क पर भीड़ जमाकर हुए इस जश्र का जब वीडियो वायरल हुआ तो पुलिस ने व्यापारी व उनके अज्ञात परिजनों पर मुकदमा दर्ज कर लिया है।

‘उत्तराखंड जल रहा है… जंगलों में फैल गई है आग’ – वायरल तस्वीरों की सच्चाई का Fact Check

उत्तराखंड के जंगलों में लगने वाली आग मुख्यधारा की मीडिया का हॉट टॉपिक बना हुआ है। लेकिन क्या उत्तराखंड के जंगल इस साल की गर्मियों में वास्तव में आग में झुलस रहे हैं? जवाब है- नहीं।

सोशल मीडिया पर आजकल कुछ तस्वीरों को बड़ी मात्रा में शेयर किया जा रहा है। ‘टूरिज्म-एडवेंचर’ के फेसबुक ग्रुप्स से शुरू हुई ये तस्वीरें आखिरकार इन्हीं इन्टरनेट ग्रुप्स पर आधारित ‘वोक-युवा फ्रेंडली’ वेबसाइट्स स्कूपव्हूप, द लॉजिकल इन्डियन आदि के पास पहुँची और उन्होंने भ्रामक, ‘क्लिकबेट’ हेडलाइन और फर्जी तस्वीरों के जरिए सनसनी को आग देने का काम किया।

द लॉजिकल इन्डियन ने एक कदम आगे जाते हुए अपने ही द्वारा 2016 में प्रकाशित की गई खबर में इस्तेमाल भ्रामक बातों को 2020 में एक बार फिर भुनाने की कोशिश की है। ऐसे कर उसने साबित किया है कि केवल वेबसाइट के नाम में लॉजिक है, खबरों से उसका कोई लेना-देना नहीं है।

नतीजा यह हुआ कि सोशल मीडिया पर सिर्फ और सिर्फ उत्तराखंड के जंगलों की आग चर्चा का विषय बन गई।

हालाँकि, ऐसा नहीं है कि उत्तराखंड के जंगलों में इस वर्ष आग ही ना लगी हो। लेकिन जितनी हेक्टेयर वन भूमि पर आग की ख़बरों को बिना किसी पुष्टि के पुरानी तस्वीरों के साथ फैलाया जा रहा है, वह बेबुनियाद तथ्य है।

पिछले साल, इसी समय उत्तराखंड ने लगभग 1600 हेक्टेयर जंगलों के नुकसान की सूचना दी थी। इस साल अब तक प्राप्त आँकड़ों के अनुसार उत्तराखंड के 71 हेक्टेयर वन भूमि को नुकसान हुआ है। निसंदेह जंगलों की आग एक बड़ी विभीषिका है, लेकिन इस तरह की घटनाओं के बारे में भ्रामक जानकारियाँ और फर्जी खबरें व्यवस्थाओं और संस्थाओं का काम बढ़ाने का ही कार्य करते हैं।

जंगलों में आग का एक प्रमुख कारण यहाँ पर पाए जाने वाले चीड़  के पेड़ होते हैं, जिनमें ज्वलनशील लीसा पाया जाता है। साथ ही चीड़ की पत्ती में मौजूद राल इसे सड़ने-गलने भी नहीं देती है। ये राल भी बेहद ज्वलनशील होती है। इससे जंगल में आग लगने का खतरा बना रहता है। कई बार देखा गया है कि जंगलों से गुजरने वाले लोग अक्सर अधजली बीड़ी-सिगरेट फेंक देते हैं, जिसके कारण आग लग जाती है। आकाशीय बिजली के कारण भी जंगल दहक उठते हैं।

उत्तराखंड में पश्चिमी सर्कल के वनों के मुख्य संरक्षक (CCF) पराग मधुकर धकाते ने बताया कि सोशल मीडिया पर बहुत सी गलत सूचनाएँ, पुरानी तस्वीरें और फर्जी खबरें प्रसारित हो रही हैं। उन्होंने कहा कि गत वर्षों की तुलना में इस वर्ष जंगलों में लगने वाली आग में कमी आई है। साथ ही कुछ दिनों में बारिश हो रही है, इसलिए नमी बरकारार है और जंगल की आग की कम घटनाएँ सामने आ रही हैं।

सोशल मीडिया पर जंगलों की आग की जो तस्वीरें ‘द लॉजिकल इंडियन’ से लेकर ‘स्कूपव्हूप’ आदि ‘वोक-युवा फ्रेंडली’ वेबसाइट्स पर शेयर की जा रही हैं, वह वर्ष 2016 की हैं, ना कि 2020 की। PIB उत्तराखंड ने भी इन ख़बरों को भ्रामक और फर्जी बताया है।

आईएफएस एसोसिएशन उत्तराखंड के ट्विटर अकाउंट ने उत्तराखंड में वर्ष 2020 में जंगलों में लगने वाली आग के वास्तविक तथ्यों की तुलना ग्राफ के माध्यम से सामने रखी है। इसमें 2019 और 2020 में लगने वाली जंगलों की आग की तुलना से स्पष्ट होता है कि 2020 की आग पिछले वर्ष की तुलना में बहुत ही कम है।

मीडिया गिरोह का है कारनामा

वास्तव में विपक्ष और प्रोपेगेंडा मीडिया निरंतर ही केंद्र सरकार से लेकर भाजपा-शासित राज्यों को निशाना बनाने का प्रयास कर रहा है। प्रोपेगेंडा मीडिया द्वारा चलाई जा रही कोरोना वायरस की महामारी के समय में जब टेस्टिंग किट, वेंटिलेटर, पीपीई किट, 26 करोड़ संक्रमण आदि की नौटंकी फ्लॉप हो गई तो, यह मीडिया गिरोह उत्तराखंड के जंगलों की आग को ऐसे दिखा रहा है जैसे इससे भयावह आग कभी लगी ही न हो।

जंगलों की आग भयावह होती है, लेकिन 2020 के आँकड़े पिछले सालों की तुलना में कहीं भी नहीं ठहरते। इसी कारण, जब पूरा गिरोह एक साथ हल्ला मचा रहा है तो इनका प्रयोजन उत्तराखंड के जंगल या जानवरों से प्रेम दिखाना नहीं, बल्कि पैनिक बाँटना है।

इन ख़बरों को ‘भावुक किन्तु फर्जी’ तस्वीरों के जरिए ‘पशु प्रेमियों’ और ‘प्रगतिशीलों’ के फेसबुक ग्रुप्स में शेयर किया जा रहा है, ताकि सरकार के खिलाफ एक प्रकार का दबाव बनाया जाए कि यदि यह कोरोना से निपटने में सक्षम है तो वह जंगलों की आग की ओर ध्यान नहीं दे रही।

ईद का जश्न मनाने के लिए दी विशेष छूट: उद्धव के तुष्टिकरण की शिवसेना के मुखपत्र सामना ने ही खोली पोल

जब से उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने हैं, शिवसेना पर तुष्टिकरण की राजनीति को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं। अब उसके मुखपत्र सामना में प्रकाशित एक लेख से चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। इस लेख के मुताबिक महाराष्ट्र के मुंब्रा में समुदाय विशेष के लोगों को लॉ़कडाउन के बावजूद ईद मनाने के लिए विशेष रियायत दी गई।

लेख में कहा गया कि ईद-उल-फितर के मद्देनजर अल्पसंख्यक समुदाय को छूट दी गई थी। लेकिन अब ईद का जश्न खत्म हो चुका है, इसलिए सरकार दोबारा से लॉकडाउन के नियमों में सख्ती कर रही है। अब चिकन-मटन की दुकानें बंद रहेंगी और केवल मेडिकल स्टोर और दूध की दुकानों को खोलने की अनुमति होगी।

लेख में लिखा गया कि रमजान के मद्देनजर किसी भी प्रकार के तनाव को रोकने के लिए मुंब्रा निवासियों की अपील पर दी गई रियायत अब ईद के बाद जल्द खत्म होने वाली है। ठाणे नगर निगम ने कड़े लॉकडाउन का ऐलान कर दिया है। ये सख्ती 27 मई से लागू होगी।।इस दौरान दूध की दुकानें और दवाई की दुकानें को छोड़कर सभी दुकानें जैसे मछली, चिकन, और मीट की दुकानें पूरी तरह बंद होंगी।

इस समय देश में कोरोना के एक तिहाई मामले महाराष्ट्र में ही सक्रिय हैं। ऐसे में शिवसेना के मुखपत्र सामना का समुदाय विशेष के लोगों पर अलग से इनायत बख्शने और कोरोना का खतरा होने के बावजूद उन्हें छूट देने की बात मानना, बड़ा कबूलनामा है।

ठाणे नगर निगम द्वारा जारी सर्कुलर में कोरोना मामलों में वृद्धि की चेतावनी देते हुए लिखा गया कि सख्त लॉकडाउन घोषणा के बाद, इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोगों ने दुकानों और सब्जी मंडियों में भीड़ देखी है। इसलिए अब यहाँ मेडिकल और दूध की दुकानों को छोड़कर किसी भी दुकानों को खुले रहने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

बता दें, पिछले दिनों मुंब्रा में कोरोना संक्रमितों की संख्या में अचानक इजाफा देखा गया था। अब तक देश की आर्थिक राजधानी से कोरोना के 298 केस सामने आ चुके हैं। स्वयं नेशनलिस्ट कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता जितेंद्र आव्हाड भी पिछले महीने कोरोना संक्रमित पाए गए थे।

पूरे महाराष्ट्र में अब तक कोरोना के 54हजार मामले दर्ज हो चुके हैं। इनमें से 60 प्रतिशत मामले केवल मुंबई से हैं। यहाँ पर मृत्यु का आँकड़ा भी 1000 के पार पहुँच गया है। उल्लेखनीय है कि राज्य में भले ही पिछले दो दिन में ये कोरोना केसों में गिरावट देखने को मिली है। लेकिन पिछले लगातार दो हफ्तों में यह आँकड़ा 1000 से भी अधिक रहा है।

वियतनाम: ASI को खुदाई में मिला 1100 साल पुराना शिवलिंग, बलुआ पत्थर से है निर्मित

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को एक संरक्षण परियोजना की खुदाई के दौरान 9वीं शताब्दी का शिवलिंग मिला है। इस शिवलिंग के मिलने की जानकारी भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर तस्वीरों के साथ दी है।

खुदाई में प्राप्त बलुआ पत्थर से निर्मित यह शिवलिंग पूरी तरह से सुरक्षित है। इसे किसी तरह की हानि नहीं पहुँची है। यह शिवलिंग ASI को वियतनाम के माई-सन (मी-सान) मंदिर परिसर की खुदाई के दौरान मिला है।

इस ऐतिहासिक शिवलिंग के मिलने पर ASI की प्रशंसा करते हुए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपने आधिकारिक ट्विटर एकाउंट से लिखा, “9वीं शताब्दी का अखंड बलुआ पत्थर शिवलिंग वियतनाम के ‘माई सन’ मंदिर परिसर में जारी संरक्षण परियोजना की नवीनतम खोज है। एएसआई की टीम को बधाई।”

इसके साथ ही विदेश मंत्री ने खुदाई में प्राप्त शिवलिंग की तस्वीरें ट्वीट कर 2011 में इस अभयारण्य की अपनी यात्रा का भी जिक्र किया है। एक अन्य ट्वीट में उन्होंने इस खोज को भारत की विकास साझेदारी का एक महान सांस्कृतिक उदाहरण भी बताया है।

पूरी तरह से सुरक्षित यह शिवलिंग हिंदू मंदिरों के एक परिसर का हिस्सा है। इसका निर्माण शक्तिशाली चंपा साम्राज्य द्वारा 4 शताब्दी ईस्वी सन् और 13 वीं शताब्दी ईस्वी के बीच माई सन में किया गया था।

उल्लेखनीय है कि ‘माई सन’ एक यूनेस्को (UNESCO) विश्व धरोहर केंद्र है, जो 10 शताब्दियों में निर्मित विभिन्न हिंदू मंदिरों का घर है। यह चाम लोगों के उन्नत तकनीकी सभ्यता का एक अद्भुत उदाहरण है।

‘रिपब्लिक टीवी को रिपोर्टिंग करने से रोकना चाहते हैं महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख’

रिपब्लिक मीडिया के संस्थापक अर्नब गोस्वामी को लेकर महाराष्ट्र सरकार का रुख धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगा है। ताजा मामला राज्य में कोरोना के हालातों से जुड़ी सीरीज करने को लेकर है। 25 मई को टेलीकास्ट की गई इस सीरीज के बाद राज्य के गृहमंत्री अनिल देशमुख बौखलाए हुए हैं और अर्नब से संबंधित पुराने मामलों को खुलवाने के लिए आदेश दे चुके हैं।

गृहमंत्री के इसी फैसले के मद्देनजर रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क ने अपनी ओर से बयान जारी किया है। इस बयान में उन्होंने महाराष्ट्र सरकार के घटिया तरीकों और लोगों को डराने वाले बर्ताव को देखकर हैरानी जताई है।

बयान में उन्होंने बताया है कि 25 मई को उन्होंने एक सीरीज की। इस सीरीज में उन्होंने कोरोना के समय में महाराष्ट्र के हालात को दर्शाया। साथ ही महाराष्ट्र सरकार द्वारा ट्रेनों की अनुपलब्धता के ऊपर दिए झूठे बयानों पर तथ्यों के साथ बात रखी। मगर, इस शो के 24 घंटे बाद ही महाराष्ट्र के गृहमंत्री ने हर प्रोटोकॉल तोड़ते हुए अपने ट्विटर हैंडल से अर्नब गोस्वामी को और रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क को ये कहकर धमकाना शुरू कर दिया कि वो कोर्ट द्वारा बंद किए गए एक साल पुराने केस को दोबारा से खोलेंगे।

बयान में आगे लिखा गया कि राज्य के गृहमंत्री को पता होना चाहिए कि कोर्ट का कानून ही केस को दोबारा से खोल सकता है। लेकिन, अगर फिर भी होम मिनिस्टर ऐसा कुछ करते हैं तो वो कानून का उल्लंघन होगा। बाकी जनता को डराने के लिए उनके इस तरह निर्णय केवल उनकी मंशा और उनके प्रतिशोध को दर्शाता है।

रिपब्लिक मीडिया के बयान में पालघर और यस बैंक-डीएचएफएल फ्रॉड केस जैसी घटनाओं में देशमुख की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा गया कि ये स्पष्ट है कि अनिल देशमुख अपनी मंत्री पद की शक्तियों का बेजा इस्तेमाल कर रिपब्लिक मीडिया को रिपोर्टिंग करने से रोकना चाहते हैं, क्यूँकि मीडिया संस्थान का मुख्यालय मुंबई में ही है।

मीडिया संस्थान के बयान अनुसार, जिन केसों को गृहमंत्री प्रतिशोध भावना से खोलने का विचार कर रहे हैं, उनमें से कइयों को कोर्ट के कानून और आदेश द्वारा खारिज कर दिया गया था, वो भी इसलिए क्योंकि उन्होंने उन आरोपों पर पहले ही तथ्य पेश कर दिए थे।

उल्लेखनीय है कि इस बयान के साथ रिपब्लिक मीडिया ने उन तथ्यों को भी जोड़ा है, जिसके कारण अर्नब के ख़िलाफ़ चल रहे केसों को कोर्ट में बंद करना पड़ा। इसमें अन्वय नाइक की पत्नी अक्षता नाइक द्वारा कोर्ट में कोई सबूत न पेश कर पाने की बात का उल्लेख किया गया है। ARG आउटलायर मीडिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा 90% अमाउंट की पेमेंट की बात है और उन ईमेल-पत्रों, व्हॉट्सअप संदेशों आदि का जिक्र है, जिनमें सीडीपीएल को पूरा बैलेंस चुकाने और फाइनल सेटेलमेंट के लिए कॉन्टेक्ट किया गया।

अर्नब के ख़िलाफ़ अनिल देशमुख करवा रहे सीबीआई जाँच

मंगलवार को साल 2018 के एक मामले में महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख ने रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्नब गोस्वामी और दो अन्य के ख़िलाफ़ दोबारा जाँच शुरू करने के आदेश दिए। इस केस को पिछले साल रायगढ़ पुलिस ने बंद कर दिया था। लेकिन, दोबारा केस को खोलने के पीछे अनिल देशमुख ने मृतक की बेटी अदन्या नाइक को वजह बताया।

उन्होंने मंगलवार को ट्वीट करके हुए लिखा, “अदन्या नाइक ने मुझसे शिकायत की थी कि अलीबाग पुलिस ने अर्नब गोस्वामी के रिपब्लिक टीवी से बकाया राशि का भुगतान नहीं करने की जाँच नहीं की थी, जिसके कारण मई 2018 में उसके उद्यमी पिता और दादी ने आत्महत्या कर ली थी। मैंने मामले की सीआईडी जाँच का आदेश दिया है।”

इसके अलावा, बता दें महाराष्ट्र सरकार ने अर्नब गोस्वामी और उनके संस्थान रिपब्लिक टीवी के ख़िलाफ़ एक और आपराधिक केस में नई जाँच शुरू की है। ये जाँच मीडिया संस्थान पर कोरोना संकट के बीच महाविकास अघाड़ी सरकार के ख़िलाफ़ आलोनात्मक रिपोर्टिंग करने के कारण शुरू हुई है।

इससे जुड़े पेपर भी रिपब्लिक मीडिया को भेजे जा चुके हैं। इन पेपर्स के मुताबिक, ये जाँच बांद्रा में प्रवासी मजदूरों की भीड़ इकट्ठा होने के बाद संस्थान द्वारा इस मुद्दे पर की गई रिपोर्टिंग पर आधारित है।

गौरतलब है कि पालघर मामले में सोनिया गाँधी पर टिप्पणी करने के बाद अर्नब गोस्वामी पर कॉन्ग्रेस लगातार हमलावर है। इसी क्रम में कुछ हफ्तों पहले उनपर अलग-अलग राज्यों में एफआईआर हुई। उनपर हमला हुआ। उनसे 12 घंटे तक पूछताछ हुई और बाद में प्रतिशोध के लिए उस मामले को उजागर किया गया, जिसे कोर्ट सबूतों के अभाव में पहले ही बंद कर चुका था।

‘मोदी मंदिर’ बनाने की खबर फर्जी: MLA गणेश जोशी ने कॉन्ग्रेस को बताया ‘मोदीफोबिया’ से ग्रसित

उत्तराखंड मसूरी विधानसभा क्षेत्र के विधायक और भाजपा नेता गणेश जोशी द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मंदिर बनाने और मोदी स्तुति की खबर को ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ से लेकर अन्य प्रमुख मुख्यधारा की मीडिया ने मनगढ़ंत रूप से प्रकाशित किया है। इसके विपरीत भाजपा नेता गणेश जोशी का कहना है कि उनसे बयान लेकर मीडिया ने अपनी मर्जी से काल्पनिक बातों को प्रकाशित किया।

ऑपइंडिया से बातचीत में मसूरी विधायक गणेश जोशी ने बताया कि ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ की पत्रकार ने जब उनसे ‘मोदी आरती’ के बारे में पूछा तो इस पर उन्होंने यही कहा था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लोकप्रिय नेता हैं और कई लोग उनका सम्मान करते हैं, लेकिन इस बयान की जगह TOI ने फर्जी खबर को प्रकाशित किया है।

‘कभी नहीं कहा कि PM मोदी का मंदिर बना रहा हूँ’

दरअसल, भाजपा नेता गणेश जोशी ने कहा था कि पीएम मोदी की छवि के कारण लोग उन्हें श्रद्धेय मानते हैं, उनकी पूजा भी करते हैं और लोगों ने इसी कारण उनके मंदिर भी बनाए हैं। लेकिन ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ की रिपोर्टर ने उनके बयान को एक किनारे रखकर यह खबर प्रकशित करना ज्यादा बेहतर समझा कि भाजपा के विधायक गणेश जोशी ने कहा है कि वो पीएम नरेन्द्र मोदी का मंदिर बनाने जा रहे हैं।

गणेश जोशी ने यह भी कहा कि बहुत से लोगों ने कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी और रजनीकांत के लिए भी मंदिर बनाया है क्योंकि वे लोग उनसे प्यार करते हैं और उनका सम्मान करते हैं।

‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ की रिपोर्टर द्वारा प्रकाशित इस खबर को फर्जी बताते हुए ऑपइंडिया से बातचीत में विधायक गणेश जोशी ने कहा कि इस झूठी रिपोर्ट को अन्य मीडिया संस्थानों ने भी बिना उनका बयान पूछे ही प्रकाशित कर उनकी छवि खराब करने का काम किया है।

‘मोदी-आरती’ की वास्तविकता

गौरतलब है कि हाल ही में उत्तराखंड में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समर्थक डॉ. रेनू पंत ने कोरोना वायरस संकट के दौरान प्रधानमंत्री मोदी के कुशल नेतृत्व और COVID-19 वायरस के कारण जारी लॉकडाउन को लेकर लिए गए जरूरी फैसलों से प्रभावित होकर उनके सम्मान में ‘मोदी-स्तुति’ लिखी थी।

इसी मोदी-आरती को लेकर विपक्ष और मीडिया भाजपा नेताओं को इससे जोड़ने का प्रयास कर रहा है। जबकि डॉ. रेनू पंत का भाजपा से कोई लेना-देना नहीं है और वो सिर्फ पीएम मोदी की समर्थक हैं।

विधायक गणेश जोशी ने ऑपइंडिया से स्पष्ट करते हुए कहा- “वास्तव में, जिस तरह से बीजेपी कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ रही है और जरूरतमंद लोगों को राहत प्रदान कर रही है, उसे लेकर विपक्ष चिंतित है।

भाजपा नेता गणेश जोशी ने कहा-

“अकेले मेरे निर्वाचन क्षेत्र में हमने अब तक तकरीबन 3 लाख भोजन पैकेट्स वितरित किए हैं और 17 हजार से अधिक लोगों को राशन सामग्री प्रदान की है। लेकिन कॉन्ग्रेस कोरोना वायरस की महामारी के समय धरातल से एकदम गायब है। और अब मात्र एफआईआर की राजनीति के सहारे ही खड़ी है। हमने देखा है कि किस तरह से कॉन्ग्रेस द्वारा मीडिया के खिलाफ एफआईआर की राजनीति की जा रही है, और अब वो इसका इस्तेमाल निर्वाचित प्रतिनिधियों के खिलाफ भी कर रहे हैं, यह निंदनीय और शर्मनाक है।”

कॉन्ग्रेस पर द्वैषपूर्ण राजनीति करने की बात रखते हुए भाजपा नेता गणेश जोशी ने कहा – “वे मीडिया में इस तरह की फर्जी खबरें जारी कर हमारे प्रयासों को पटरी से उतारने की कोशिश कर रहे हैं। मैंने अपने मंदिर में फोटो रखने के बारे में कभी कुछ नहीं कहा। हर दूसरे कार्यकर्ता की तरह ही मेरे कार्यालय में भी पीएम मोदी की एक तस्वीर है और उनके प्रति मेरे मन में सम्मान और श्रद्धा है। लेकिन मीडिया और विपक्ष फेक न्यूज़ के जरिए यह साबित करने का प्रयास कर रहा है कि मैं पीएम मोदी का मंदिर बनाने की योजना बना रहा हूँ। यह बिल्कुल निराधार और बेबुनियाद खबरें हैं।”

‘मोदीफ़ोबिया से ग्रसित है कॉन्ग्रेस’

विपक्ष और मीडिया को ‘मोदीफ़ोबिया’ से ग्रसित बताते हुए गणेश जोशी ने कहा कि डॉ. रेणु पंत एक स्कॉलर हैं, जिनकी रचना का धन सिंह रावत और उन्होंने अनावरण किया था। उन्होंने कहा कि डॉ. रेणु पंत एक आम नागरिक हैं, जिन्हें पीएम मोदी का प्रशंसक होने के कारण निशाना बनाया जा रहा है, वास्तव में यह सिर्फ और सिर्फ मोदीफोबिया है।

दरअसल, डॉ. रेणु पंत द्वारा ‘मोदी आरती’ उस समय पढ़ी गई, जब देहरादून के डोभालवाला स्थित राजकीय इण्टर कॉलेज में मसूरी विधायक गणेश जोशी एवं प्रदेश के राज्यमंत्री धन सिंह रावत ने लॉकडाउन के दौरान जरुरतमंद प्रवासियों एवं स्थानीय लोगों को भोजन, राशन, मास्क, सैनिटाइजर प्रदान करने वाले भाजपा कार्यकर्ताओं को सम्मानित करने के लिए उपस्थित थे।

गणेश जोशी ने कहा कि प्रशसकों द्वारा यदि प्रधानमंत्री मोदी के सम्मान में कुछ लिखा जाता है, तो उन्हें रोका भी नहीं जा सकता। साथ ही उन्होंने कॉन्ग्रेस को अपनी नकारात्मक सोच को छोड़ने की भी सलाह दी।

‘मोदी किचन’ के जरिए कोरोना वायरस से प्रभावितों की मदद कर रहे हैं गणेश जोशी

विधायक गणेश जोशी ने कोरोना वायरस की महामारी के दौरान ‘मोदी किचन’ के जरिए लॉकडाउन के कारण प्रभावितों को खाना खिलाने से लेकर उनकी अन्य जरूरतों में मदद करने का काम व्यापक स्तर पर किया है। कई प्रमुख समाचार पत्रों ने भी उनके इस कार्य की सराहना की है।

‘मोदी किचन’ में खाना बनाते हुए मसूरी विधायक गणेश जोशी

भूखे, असहाय और जरुरतमंदों के लिए ‘मोदी किचन’ खोलना गणेश जोशी का ही विचार था। शुरू में ऐसी 6 रसोइयाँ – डोभालवाला, जाखन, गढ़ी कैंट, मसूरी, राजपुर में तैयार की गईं। इसी की तर्ज पर भाजपा ने पूरे उत्तराखंड में ऐसे ही 200 ‘मोदी किचन’ खोलकर इस मॉडल को अपनाया और लोगों तक मदद पहुँचाई जा रही।

जरूरतमंदों के लिए राहत सामग्री वितरण करते हुए

इसके साथ ही गणेश जोशी द्वारा बाहरी राज्यों से घर लौट रहे प्रवासियों को फ़ूड पैकेट्स भी उपलब्ध करवाए जा रहे हैं।

1 वर्ष का वेतन, निर्वाचन क्षेत्र भत्ते एवं सचिवीय भत्ते से कटौती पर भी गणेश जोशी की सहमति

राहत सामग्री के साथ ही विधायक गणेश जोशी ने कोरोना महामारी से निपटने में अपना सहयोग करते हुए अपने 1 वर्ष का वेतन, निर्वाचन क्षेत्र भत्ते एवं सचिवीय भत्ते, यानी कुल आय का 30% कटौती पर सहमति भी दी है।

यह उत्तराखंड ही नहीं बल्कि पूरे देशभर में ही देखा जा रहा है कि कॉन्ग्रेस और मीडिया ने भाजपा सरकार को लेकर कोरोना वायरस के दौरान जारी लॉकडाउन के दौरान भ्रामक और फेक न्यूज़ के जरिए भाजपा सरकार और उनके समर्थकों के खिलाफ दुष्प्रचार करने का काम किया है, जबकि प्राथमिकता इस समय सिर्फ और सिर्फ लोगों को राहत पहुँचाने और व्यवस्थाओं का सहयोग करने पर ही होना चाहिए।

प्रजासुखे सुखं राज्ञः… तबलीगी और मजदूरों की समस्या के बीच आपदा में राजा का धर्म क्या

किसी आपदा के वक़्त राजा का धर्म क्या है? जब किसी देश पर कोई विपत्ति आती है तो राजा का और आज के संदर्भ में सत्तासीन नेताओं का जनता के प्रति क्या कर्तव्य है? इस राजधर्म की बड़ी सुंदर व्याख्या भारतीय वांग्मय में की गई है। कोरोना आपदा के बीच राजा का प्रजा के प्रति धर्म को समझना आवश्यक है।

रामचरितमानस में तुलसीदास जी लिखते हैं :
“जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप अवसि नरक अधिकारी।” – अर्थात जिस राजा के राज्य में प्रजा दुखी होती है, उसे नरक मिलता है।

इसी बात को एक और तरह से उन्होंने लिखा है।
“सोचिअ नृपति जो नीति न जाना, जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना। – यानी जो शासक अपनी जनता को अपने प्राण के समान प्यारा नहीं मानता वह सोच करने के लायक है।

राजा के धर्म का निरूपण कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में भी किया है। वे लिखते हैं :
प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्।
नात्मप्रियं प्रियं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं प्रियम्॥ (अर्थशास्त्र 1/19)
– अर्थात्, प्रजा के सुख में राजा का सुख है, प्रजा के हित में उसका हित है। राजा का अपना प्रिय कुछ नहीं है, प्रजा का प्रिय ही उसका प्रिय है।

एक अन्य ग्रन्थ में प्रजा को संतान के बराबर बताया गया है।
“पुत्र इव पितृगृहे विषये यस्य मानवाः। निर्भया विचरिष्यन्ति स राजा राजसत्तम॥”

इन सभी ग्रंथों की उक्तियों का एक ही निचोड़ है कि राजा को जनता का उसी तरह ध्यान रखना चाहिए, जिस तरह एक पिता अपने पुत्र की देखभाल करता है। आज के लोकतान्त्रिक सन्दर्भ में इस बात का सीधा अर्थ है- जो शीर्ष पर बैठा हुआ नेता अपनी संतान की तरह लोगों के प्राण, उनकी आजीविका तथा सम्मान की रक्षा नहीं कर सकता, वह राज करने लायक नहीं है।

इसी सिद्धांत को कोरोना संकट और उससे उत्पन्न स्थितियों पर भी लागू किया जाना चाहिए। यहाँ यह कहना ज़रूरी है कि कोरोना एक ऐसी बीमारी है, जिसका पूर्वानुमान लगाना किसी के लिए संभव नहीं था। जिसकी तैयारी कर पाना किसी के वश में नहीं था। इस छूत की बीमारी से बचने के कोई स्थापित मानक नहीं थे। लेकिन इस विपत्ति के समय एक ही अपेक्षा थी कि सत्तासीन नेता इस पर राजनीति न करें और लोगों को बीमारी से बचाने के लिए और उनकी तकलीफें दूर करने के लिए जो भी मुनासिब हो, वो करें।

कोरोना के साथ भारत के अब तक के अपेक्षाकृत सफल युद्ध में दो बड़ी दुर्घटनाएँ हुईं हैं। इन घटनाओं ने इस बीमारी के फैलाव और उससे पैदा हुई तकलीफों को और बढ़ा दिया। पहली गंभीर घटना थी, तबलीगी जमात के कारण कोरोना के संक्रमण का जबरदस्त फैलाव। पहले तो ऐसा लगा कि यह इतना बड़ा झटका है जिससे उबर पाना मुश्किल होगा।

पर देश ने बड़े धैर्य, संयम, जहाँ आवश्यक हुआ वहाँ ज़रूरी सख्ती के साथ इसका सामना किया। मोटे तौर पर तब्लीगी जमात की पोंगापंथी, मूर्खता, जाहिली और दकियानूसी सोच से उत्पन्न इस संकट को ठीक तरीके से हल किया गया।

यह संकट अभी ख़त्म नहीं हुआ था कि दूसरी बड़ी विपदा देश के सामने आ गई। वह थी देशभर से मजदूरों के पलायन की समस्या। इस संकट का सामना मेरे विचार से उतनी अच्छी तरह नहीं हुआ, जिस तरीके से किया जा सकता था। मजदूरों की एक विकट समस्या सबसे ज्यादा विकराल हुई देश की वित्तीय राजधानी मुंबई तथा देश की राजनीतिक राजधानी दिल्ली में। देश में ज्यादातर मजदूर दो राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार से आते हैं।

आज देश में कोरोना संक्रमण के जितने मामले हैं, उनमें से आधे से अधिक इन चार राज्यों- महाराष्ट्र (52667), दिल्ली (14053), उत्तर प्रदेश (6268) और बिहार (2686) में ही हैं। कुछ हद तक यह समस्या गुजरात में भी देखी गई।

सबसे पहले इस समस्या के संकेत दिखाई दिए दिल्ली में। देश में लॉकडाउन 25 मार्च को शुरू हुआ था। उसके तीन दिन बाद 28 मार्च को राजधानी दिल्ली में अचानक मजदूरों को संदेश मिला कि उनके जाने के लिए दिल्ली के आनंद विहार बस अड्डे पर व्यवस्था की गई है। ये बस अड्डा दिल्ली-उत्तर प्रदेश सीमा पर है। कई मोहल्लों में व्हाट्सएप के जरिए व अन्य संचार माध्यमों के जरिए मजदूरों तक यह अफवाह पहुँचाई गई।

यह गंभीर जाँच का विषय है कि किसने राजनीतिक स्वार्थों के कारण यह अफवाह फैलाई। मीडिया में छपी खबरों के अनुसार, दिल्ली में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी के कुछ स्थानीय नेताओं का इसमें हाथ था। पार्टी के विधायक राघव चड्ढा की एक विवादित ट्ववीट भी इस दौरान आई जिसमें कहा गया था कि उतर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मज़दूरों को पिटवा रहें हैं। जबकि यह बात झूठी निकली।

लाखों मजदूर जब आनंद विहार बस अड्डे पर पहुँचे तो अफरा-तफरी तो मचनी ही थी। इस घटना के चित्र, खबरें और वीडियो मीडिया में छाए रहे। दुनिया में ये संदेश गया कि मजदूर बेहद परेशान हैं। अब यह जिम्मेदारी हर उस राज्य की थी, जहाँ भी यह प्रवासी मजदूर रह रहे हैं।

इन राज्यों को सुनिश्चित करना था कि श्रमिकों की ठीक से व्यवस्था हो। उन में आई हुई स्वाभाविक अनिश्चितता और बेचैनी कम हो। उनके खाने-पीने का सही इंतजाम हो। साथ ही उन से रहने की जगहों का किराया ना माँगा जाए। इस सबका उद्देश्य कोरोना के फैलाव को आगे बढ़ने से रोकना था। लेकिन ऐसा लगता है कि इसमें कई जगह कोताही हुई।

उधर 15 अप्रैल को मुंबई में बांद्रा के पास एकाएक कई हजार मजदूर जमा हो गए। उन्हें भी यह बताया गया था कि उनके लिए जाने की व्यवस्था की जा रही है। विनय दुबे नाम के एक कथित सामाजिक कार्यकर्ता ने सोशल मीडिया पर बाकायदा लॉकडाउन के खिलाफ राजनीतिक अभियान चलाया, जिसे मुंबई की पुलिस और प्रशासन ने अनदेखा किया। जबकि दिल्ली की घटना के बाद मुंबई को मुस्तैद होना चाहिए था।

असल में इस व्यक्ति के साथ नरमी बरती गई क्योंकि इसके सत्ताधारी नेताओं के साथ नज़दीकी रिश्ते थे। उधर कुछ मीडिया खबरों के मुताबिक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने तो यहाँ तक कहा कि मजदूरों को अपने राज्यों में चले जाना चाहिए।

इस सारे घटनाक्रम से प्रवासी मजदूरों में खासी बेचैनी फैली। फिर तो हर जगह ऐसी घटनाओं का सिलसिला आरंभ हुआ। गुजरात में भी कई जगह ऐसा हुआ। राज्यों ने मज़दूरों की मनःस्थिति समझने में संवेदनहीनता का परिचय दिया। मजदूर गहरे संकट में थे। अधिकतर मजदूर एक साथ छोटे-छोटे कमरों, झोपड़ियों या अस्थायी निर्माणों में रहते है। वे घर से दूर थे। कामकाज बंद हो चुके थे। बेकार श्रमिक बदहाल थे।

छोटे-छोटे दड़बों में रहने वाले मजदूरों की मानसिक अवस्था क्या होगी, इसे समझा जा सकता है। उन्हें चिंता रही होगी- अपने घरबार की; उन्हें चिंता हो रही चिंता होगी अपने काम की; चिंता रही होगी अपनी जान की; उन्हें दूर बसे अपने परिवार की चिंता रही होगी।

यों भी जब पूरी दुनिया में कोरोना के संक्रमण और मौत का मंजर फैला हो तो व्यक्ति अपनों के साथ रहना चाहता है। इसलिए मजदूरों की दिक्कत समझी जा सकती है। उसके साथ सहानुभूति होनी चाहिए थी। जैसा कि हमने ऊपर कहा कि राजा का धर्म होता है अपनी प्रजा की चिंता संतान की तरह करें। पर महाराष्ट्र, दिल्ली और गुजरात में शुरू के दिनों में स्थानीय नेतृत्व ने ऐसा नहीं किया। 

ऐसा लगा कि महाराष्ट्र और दिल्ली में वहाँ का स्थानीय नेतृत्व चाहता था कि जितना जल्दी से जल्दी हो ये मजदूर अपने घरों को लौटे। यह एक गैर ज़िम्मेदार सोच थी, जो प्रवासी मज़दूरों को अपना नहीं बल्कि दूसरा समझती थी। इसमें अपनत्व नहीं बल्कि फौरी राजनीतिक स्वार्थ का भाव था। दिल्ली और मुंबई की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में इन प्रवासी लोगों का महत्वपूर्ण योगदान है।

प्रवासी श्रमिक भारत के नागरिक हैं। वे किसी भी राज्य के हों तथा आजीविका के लिए कहीं भी रहते हों, देश के संसाधनों पर उनका उतना ही अधिकार है, जितना किसी और नागरिक का। इन्हें वह सब मिलने का हक था, जो कि किसी अन्य नागरिक को मिलता है। पर ऐसा नहीं हुआ, इसके कारण मजदूरों में दूसरेपन का संदेश गया। इसके कारण पहले से ही एकाकी, क्षुब्ध, परेशान और काम न होने के कारण चिंतित मजदूरों में संदेश गया कि उन्हें घर लौटना चाहिए।

इससे  देश में अफरातफरी का माहौल पैदा हो गया। देश में प्रवासी मज़दूरों की संख्या करोड़ों मे हैं। इन सब की व्यवस्था करना इतना सरल भी नहीं था। पर न तो इन तक सही संदेश पहुँचाने की व्यवस्था की गई और ना ही समाज के इस अहम हिस्से से संवेदशील तरीके से संवाद किया गया।

इसके बाद भागमभाग का जो मंजर फैला उसे हमने देखा, उससे एक अंतरराष्ट्रीय नेरेटिव बना कि सरकारे तकलीफ में पड़े हुए अपने मजदूरों के प्रति संवेदनशील नहीं है। दुनिया भर के मीडिया में असंख्य सही और गलत स्टोरी इस पर चली है। हर स्तर पर अपने देश की व्यवस्था इसके लिए जिम्मेदार है। अभी भी इस पर राजनीतिक बयानबाजी हो रही है, जो अत्यंत अफसोसजनक है। इससे नेताओं को बचने की आवश्यकता है। 

इनमें से ज्यादातर प्रवासी मजदूर दो राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार के हैं। जहाँ उत्तर प्रदेश ने एक बड़ी हद तक संवेदनशीलता दिखाई, वहीं बिहार के नेताओं का आचरण उचित नहीं था। शुरू में बिहार के मुख्यमंत्री ने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में जब बिहार के लोग लौटेंगे तो उसके लिए राज्य तैयार नहीं है। संकट के समय ऐसा बयान उचित नहीं था। देश के हर नागरिक को अपने घर जाने का अधिकार है। बिहार की सरकार को इस तरह का संवेदनहीन बयान नहीं देना चाहिए था।

उधर महाराष्ट्र सरकार का पूरा रिस्पॉन्स भ्रम से भरा हुआ था। ऐसा लगा कि उन्हें पता ही नहीं था कि क्या करना है। पहले तो लॉकडाउन को बड़े लचर तरीके से लागू किया गया। मुंबई देश की वित्तीय धड़कन है। वहाँ कोरोना रोकने के लिए जो प्रशासनिक मुस्तैदी चाहिए थी, वह नदारद थी। इस प्रशासनिक लचरपन को राजनीतिक बयानबाजी की आड़ में छिपाया नहीं जा सकता। 

शायद राज्य सरकार चाहती थी कि प्रवासी जल्द से जल्द दूर चले जाएँ और राज्य की समस्या कम हो जाए। पर हुआ उसका उल्टा ही। शुरू के दिनों में महाराष्ट्र में लॉकडाउन को लेकर जो अनिश्चितता बनी, उसके कारण वहाँ परिस्थिति विषम से विषमतर होती गई l आज स्थिति है कि महाराष्ट्र में 52,000 से ज्यादा कोरोना पीड़ित हैं।

महाराष्ट्र और खासकर मुंबई में इसकी तैयारी नहीं है। राजनीतिक रस्साकशी और नेतृत्व की अनुभवहीनता के कारण महाराष्ट्र जैसी सक्षम प्रशासनिक व्यवस्था ऐसे लगता है कि लाचार हो गई है। इससे उलट उत्तर प्रदेश का उदाहरण देखें तो मुख्यमंत्री योगी ने शुरू के दिनों में लॉकडाउन में बेहद सख्ती दिखाई और बाद में मजदूरों के प्रति संवेदनशील व्यवहार रखा।

इसी के कारण शायद वे अपने यहाँ कोरोना के संक्रमण को काफी सीमित रख पाए है। उधर गुजरात और तमिलनाडु में भी शुरू में इस समस्या की अनदेखी की गई। वहाँ भी मजदूरों के संकट को कम करके आँका गया। दिल्ली का हाल भी बुरा है। तीनों राज्यों में कोरोना संक्रमण की स्थिति नाज़ुक है।

कहा जा सकता है कि इस विपदा की घड़ी में कुछ राज्यों का नेतृत्व कसौटी पर सही नहीं उतरा। उसने मजदूरों को तकलीफ में फँसे अपने देशवासियों के रूप में न देखकर एक समस्या के रूप में देखा। उस समस्या को अपने से दूर रखने की कोशिश की। नेतृत्व में ज़रूरी संवेदनशीलता के अभाव से ये समस्या और भी गंभीर हो गयी। नहीं तो हमें देश में ऐसे दृश्य नहीं देखने को मिलते जो आज मीडिया में दिखाई दे रहे हैं।

फिर भी यह कहना पड़ेगा कि भारतीय समाज ने हर स्थान पर प्रवासी परिवारों से अपनत्व का व्यवहार किया। हर स्थान पर जिससे जितना संभव हुआ, लोगों ने इनके दिक्कते दूर करने के लिए प्रयास किए।

सामाजिक-धार्मिक संस्थानों जैसे गुरुद्वारों, मंदिरों, स्थानीय संस्थाओं, सेवा भारती, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा सैकड़ों अन्य छोटे बड़े संगठनों और व्यक्तिगत तरीके से लोगों ने जितना भी बन पड़ा, अपने इन प्रवासी मजदूर भाइयों के लिए किया। खाना, पानी, वाहन, राशन, चिकित्सा  आदि की व्यवस्था की। अगर यह सामाजिक शक्ति भारत में नहीं होती तो यह संकट कितना बड़ा हो सकता था, इसकी कल्पना करना भी तकलीफदेह है।

1992 अजमेर रेपकांड और ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के अपमान का आरोप: ‘सत्य सनातन’ के अंकुर आर्य पर FIR की कहानी

देश में एक सिलसिला सा चल पड़ा है। इसके तहत विपक्ष द्वारा शासित राज्यों में उन लोगों पर FIR कर दी जा रही है, जिनके विचार से वहाँ की सरकार या सरकार में प्रभाव रखने वाले लोग असहमत हों। ऐसी ही एक FIR ‘सत्य सनातन’ नामक यूट्यूब चलाने वाले आचार्य अंकुर आर्य के खिलाफ राजस्थान के अजमेर में हुई है। राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार चल रही है।

ऑपइंडिया ने इस सम्बन्ध में अंकुर आर्य से बातचीत की। उन्होंने इस FIR को लेकर अपनी बात रखी। दरअसल, अजमेर स्थित ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती दरगाह के अफसान चिश्ती ने एक ट्वीट किया था, जिसमें उन्होंने अंकुर पर कई आरोप लगाए थे। वहाँ उन्हें कुछ लोगों ने सलाह दी कि वो इस मामले में अंकुर पर FIR कर सकते हैं। बस फिर क्या? कॉन्ग्रेसी सरकार की मशीनरी में उन्होंने तुरंत ही ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के अपमान का मामला दर्ज करा दिया।

अब यहाँ राजनीति समझें। पहले अफसान ने राजस्थान के मुख्यमंत्री कार्यालय से दरख्वास्त की थी कि अंकुर के खिलाफ मामला दर्ज किया जाए। उन्होंने अपनी शिकायत में कहा था कि अजमेर दरगाह को बदनाम करने और ख्वाजा मोईनुद्दीन का अपमान करने के लिए अंकुर ने एक वीडियो शूट किया है, इसलिए उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए। शिकायत में वो एक यूट्यूब वीडियो की बात कर रहे थे, जो अंकुर के चैनल पर था। इसके बाद दिल्ली के पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा सहित देश भर से अंकुर के समर्थन में लोगों ने ट्रेंड चलाया।

सोशल मीडिया में काफी देर तक ‘वी सपोर्ट अंकुर आर्य’ नंबर एक पर ट्रेंड होता रहा। अब बात करते हैं, उस वीडियो की, जिसे लेकर बवाल मचा हुआ है। इस वीडियो में यति नरसिंहानन्द सरस्वती भी थे। इसलिए उनके खिलाफ भी FIR दर्ज करवा दी गई है। उन पर भी ख्वाजा और अजमेर दरगाह के अपमान का आरोप लगा है। साथ ही अंकुर के अप्रैल 2019 के एक वीडियो के आधार पर दावा किया गया कि उन्होंने ख्वाजा का अपमान किया है।

शिकायत में यति नरसिंहानंद सरस्वती पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती को किन्नर बताया है। बता दें कि अजमेरशरीफ का दरगाह उनके नाम पर ही है, जहाँ हिन्दू भी चादर चढ़ाने जाते रहे हैं। अक्सर बॉलीवुड सेलेब्स को वहाँ देखा जाता है। जब हमने अंकुर से पूछा कि क्या ये सच है तो उन्होंने बताया कि वीडियो को गलत सन्दर्भ में पेश किया गया है। उनकी नज़र में वीडियो को एडिट कर के उससे छेड़छाड़ की गई है।

ये सब तब से शुरू हुआ, जब अंकुर ने देवी चित्रलेखा नामक कथावाचक द्वारा व्यास पीठ से नमाज का गुणगान करने का विरोध किया था। इसी तरह उन्होंने उन तमाम कथावाचकों के खिलाफ विरोध दर्ज कराया था, जिन्होंने कथा के नाम पर इस्लाम का गुणगान किया था। इस सम्बन्ध में उन्होंने यति सरस्वती के साथ एक वीडियो बनाया था, जिसमें सरस्वती ने भी अपनी राय रखी थी। देवी चित्रलेखा ने एक वीडियो शूट कर के इन आरोपों का जवाब दिया था और बदले में कई अन्य आरोप लगाए थे।

अंकुर स्वामी रामेदव के गुरुकुल से पढ़े हुए हैं। उन्होंने बताया कि अपने ही धर्म के कथावाचकों के ‘शुद्धिकरण’ के लिए उनके खिलाफ बोलना शुरू किया लेकिन व्यास पीठ से ‘अली मौला’ गाने वाले मोरारी बापू के वयोवृद्ध होने के कारण उन्होंने उन पर टिप्पणी नहीं की और यति नरसिंहानन्द सरस्वती से इस सम्बन्ध में राय ली और उनका वीडियो बनाया। इस वीडियो में यति सरस्वती ने बताया कि हमारा इतिहास ही भूलों से भरा पड़ा है।

उन्होंने ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती को दिल्ली में पहली बार इस्लामिक शासन के लिए जिम्मेदार ठहराया। बकौल यति नरसिंहानंद सरस्वती, वो ख्वाजा ही थे, जिन्होंने मोहम्मद गौरी को दिल्ली पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया था। बता दें कि शिकंजे में आने के बावजूद पृथ्वीराज चौहान ने गौरी को कई बार छोड़ दिया था लेकिन अंत में एक बार मोहम्मद गौरी विजयी रहा और उसने दिल्ली में इस्लामिक राज की स्थापना कर दी थी।

इसी का जिक्र करते हुए यति सरस्वती ने ‘ख्वाजा’ शब्द को लेकर टिप्पणी की। उन्होंने बताया कि फारसी में ख्वाजा शब्द का मतलब किन्नर होता है। साथ ही उन्होंने उन सब लोगों को अपना दुश्मन बताया, जो कथा के नाम पर इस्लामिक चीजों का महिमामंडन करते हैं।

अंकुर कहते हैं कि इन दोनों हिस्सों को अलग-अलग कर के प्रपंच फैलाया गया। यति सरस्वती ने अपने ही बिरादरी के कथावाचकों को अपना दुश्मन बताया था, लेकिन बकौल अंकुर, इसे ऐसे दिखाया गया- ‘ख्वाजा किन्नर है और यहाँ ये सभी मेरे दुश्मन हैं।’ ‘मरुधरा’ ने अपने वीडियो के जरिए ये प्रपंच फैलाया।

अंकुर का कहना है कि जो बात स्वामी यति ने कथावाचकों के लिए कहा था, उसे ऐसे दिखाया गया जैसे उन्होंने इसे समुदाय विशेष और ख्वाजा के लोगों के बारे में कहा था। यति सरस्वती खुद एक कथावाचक हैं और वो भागवत में दक्ष हैं। वो अक्सर भागवत कथा कहते हैं।

हमने अंकुर की बातों की तह तक जाने के लिए और सच्चाई जानने के लिए उस वीडियो को खोज निकाला, जिसमें उन्होंने और यति नरसिंहानंद सरस्वती ने इस सम्बन्ध में बातचीत की थी। हम वो वीडियो नीचे एम्बेड कर रहे हैं, जिसमें आप 13वें मिनट से लेकर 15वें मिनट तक वाला हिस्सा देख सकते हैं। कथावाचकों द्वारा अल्लाह का गुणगान और व्यास पीठ की मर्यादा पर बोलते हुए यति सरस्वती इसमें कहते हैं:

“व्यासपीठ पर अलग अल्लाह का ही नाम लेना है तो फिर राम की पूजा क्यों करें? अल्लाह की ही क्यों न करें सीधा? ये कथाएँ अल्लाह को सर्वोपरि बनाने के लिए हो रही है। मेरा सोचना है कि अल्लाह के नाम पर ही मेरे करोड़ों भाइयों-बहनों का खून बहाया गया। मैं उन सभी को अपना व्यक्तिगत दुश्मन मानता हूँ, जो उस अल्लाह को मानते हैं- चाहे वो मोरारी बापू हों या फिर कोई अन्य कथावाचक जो ऐसा करते हैं।”

अंकुर आर्य और स्वामी यति नरसिंहानंद सरस्वती की बातचीत

इस वीडियो को देखने से स्पष्ट पता चलता है कि यति नरसिंहानंद सरस्वती कथावाचकों से क्षुब्ध होकर उनके लिए बोल रहे थे, मजहब या दरगाह के लिए नहीं। हालाँकि, उन्होंने कई अन्य मुद्दों पर भी बात की थी लेकिन अगर ये वाला हिस्सा एडिट कर के बाहर निकाला जाए तो ऐसा ही लगेगा कि जैसे वो हर उस व्यक्ति के बारे में कह रहे हों, जो अल्लाह को मानता हो। जब सन्दर्भ देखें तो लगता है कि वो मोरारी बापू व अन्य कथावाचकों के लिए ऐसा बोल रहे थे।

अब आते हैं अंकुर के उस पुराने वीडियो पर, जिसे लेकर विवाद हुआ। ये मुद्दा अजमेर में हुए देश के सबसे जघन्य रेपकांड को लेकर था, जिसे चिश्ती के अपमान के रूप में दिखाया गया।

दरअसल, अजमेर में हुए रेपकांड का पूरा खेल वहाँ के कुछ कॉन्ग्रेस नेताओं और ख़ुद को चिश्ती का वंशज बताने वालों ने रचा था। स्थिति ये हो गई थी कि अजमेर की लड़की से शादी करने में लोग हिचकने लगे थे। 200 से भी ज्यादा लड़कियों को ब्लैकमेल कर के उनका बलात्कार किया गया। दोषियों को अब तक सजा नहीं मिल पाई है। कई बच गए। यहाँ तक कि पत्रकारों, फोटो स्टूडियो वालों और पुलिसकर्मियों तक ने ब्लैकमेल कर के लड़कियों का बलात्कार किया था, जिनमें अधिकतर स्कूल-कॉलेज जाने वाली छात्राएँ थीं।

कहते हैं, ये रेप स्कैंडल किसी बड़े परिवार के एक लड़के और 9वीं कक्षा की एक लड़की के बीच प्रेम संबंध से शुरू हुआ था। लड़के के दोस्तों ने उन दोनों की अश्लील तस्वीरें निकाल ली थीं और लड़की को अपने दोस्तों से जान-पहचान कराने को कहा था। फिर तो इसका सिलसिला ही चल पड़ा। बाद में तो पुलिस ने भी माना कि उन्होंने जानबूझ कर खादिमों के विरुद्ध लीगल एक्शन नहीं लिया। पुलिस को डर था कि इससे साम्प्रदायिक तनाव फैलेगा।

इसी मुद्दे को अंकुर ने अपने वीडियो के जरिए उठाया था। इसको लेकर अजमेर के चिश्तियों को बुरा लग गया और उन्हें प्रताड़ित करने के लिए उनके खिलाफ FIR दर्ज करा दी गई। अंकुर बताते हैं कि अजमेरशरीफ दरगाह पर आज भी ट्रांसजेंडरों का एक ‘उर्स’ लगता है, जो खुद को ख्वाजा से जोड़ कर देखते हैं। वो बताते हैं कि इस्लाम में LGBTQ समुदाय के लिए कोई जगह ही नहीं है, इस्लामिक पुस्तकों में उनका क़त्ल वाजिब माना गया है।

साथ ही अंकुर ये भी कहते हैं कि जिन मुल्कों से इस्लाम का प्रादुर्भाव हुआ, वहाँ तो मजार वगैरह का कोई कॉन्सेप्ट था ही नहीं, फिर ये यहाँ क्यों? राम मंदिर और मथुरा के साथ इन मजारों को जोड़ते हुए अंकुर का कहना है कि इन मजारों में से अधिकतर तो हिन्दू मंदिरों को ध्वस्त कर के बनाया गया है। उन्होंने दावा किया कि कई मजारों की आड़ में वेश्यावृत्ति से लेकर ड्रग्स तक के धंधे चल रहे हैं, क्योंकि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करता। उन्होंने कहा:

“इस्लामिक मुल्कों में कब्रों को भी सामान्य माना जाता है। कब्रों को हटा भी दिया जाता है। पहली बात, मेरी वीडियो के साथ छेड़छाड़ कर के उसे पेश किया गया है। दूसरी बात, मैंने अजमेर में 1992 में हुए रेपकांड की बात की, जिसे ख्वाजा का अपमान बता दिया गया। तीसरा, ख्वाजा का अनुवाद किन्नर होता है। ऐसा हमने तो नहीं कहा? पारसी में ऐसा होता है। ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के दरगाह ने उस सलीम चिश्ती की दुआ कबूल की है, जिसने 200 से भी ज्यादा लड़कियों का बलात्कार किया।”

ऑपइंडिया से बात करते हुए अंकुर आर्य ने पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी से पूछा कि अपनी सुविधा की हिसाब से वो किसी एक रेप का विरोध करते हैं लेकिन अपनी ही पार्टी के नेताओं और चिश्तियों द्वारा सीरीज में किए गए बलात्कार के खिलाफ क्या उन्होंने कभी कोई कैंडल मार्च निकाला या फिर क्या इसके खिलाफ कभी आवाज उठाई? उन्होंने कॉन्ग्रेस पर भी सवाल दागा कि अजमेर में हुए उस घिनौने अपराध के बारे में पार्टी क्यों कुछ नहीं बोलती?

अंकुर ने बताया कि ऐसे ही एक मजार की खुदाई की गई थी तो उसके नीचे से शिवलिंग निकला था। उन्होंने इसका वीडियो भी ट्वीट किया है। उन्होंने कहा कि वो हिन्दुओं से हमेशा अपील करते हैं कि जब भी वो किसी मजार के पास खड़े होते हैं तो ये ज़रूर सोचें कि वो किसी पवित्र हिन्दू प्रतीक चिह्नों पर पैर रख कर खड़े हैं। उन्होंने कहा कि ये उन्हीं लोगों के मजार होते हैं, जिन्होंने हिन्दुओं का क़त्ल किया है, हिन्दू महापुरुषों को मारा है।

उन्होंने एक मौलवी का भी वीडियो शेयर किया, जिसमें वो दावा कर रहा है कि ख्वाजा का मतलब किन्नर होता है और वहाँ ‘हिजड़ों’ का मेला भी लगता है। उस वीडियो में वो मौलवी अल्लाह की कसम खाते हुए कहता है कि सारे ‘हिजड़े’ ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती को अपना मानते हैं। ‘सत्य सनातन’ यूट्यूब चैनल के संस्थापक अंकुर आर्य ने ऑपइंडिया को बताया कि उन्होंने वही बात कही थी, जो कई मौलवी भी कहते रहे हैं, फिर इस पर हंगामा क्यों?

राजस्थान में कॉन्ग्रेस की सरकार है, ऐसे में इस FIR का क्या मतलब हो सकता है? इस सवाल पर अंकुर आर्य जवाब देते हैं कि ये सब डराने के लिए किया जा रहा है ताकि आगे चल कर कोई हिन्दू हितों के लिए आवाज़ ही न उठाए। उन्होंने कहा कि पुलिस ने अब तक उनसे संपर्क नहीं किया है, कानूनी प्रक्रिया के तहत वो अपना पक्ष रखेंगे। उन्होंने कहा कि वो अपने बयान पर अभी भी कायम हैं क्योंकि उनकी बातों को गलत सन्दर्भ में पेश किया गया है।

चुनाव से पहले फिर ‘विशेष राज्य’ के दर्जे का शिगूफा, आखिर इस राजनीतिक जुमले से कब बाहर निकलेगा बिहार

देश में लॉकडाउन की घोषणा हुए दो महीने होने को हैं। कोरोना के शुरुआती दौर में केंद्र के साथ-साथ राज्य सरकारों की प्राथमिकता थी कि संक्रमण की रफ्तार कैसी तोड़ी जाए।

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के अनुसार बिना लॉकडाउन वाली स्थिति में 15 अप्रैल तक भारत में संक्रमितों की संख्या संभवतः 8.5 लाख के क़रीब होती। लॉकडाउन की नीति ने सरकारों की प्राथमिक आशय को पूरा किया है। यही कारण है कि विश्व की दूसरी बड़ी जनसंख्या होने के बावजूद भारत में संक्रमण की रफ़्तार विश्व के कई देशों से कम है।

लेकिन आर्थिक गतिविधियों के बंद होने की वजह से देश में अन्य कठिनाइयाँ उभर कर सामने आ गई हैं। इनमें गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, पलायन इत्यादि प्रमुख हैं।

भारत में कुल रोजगार में 93% भागीदारी असंगठित क्षेत्र की है, जो इस लॉकडाउन से सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। रिक्शा-ठेला चालक, सब्जी बेचने वाले, ड्राइवर-गार्ड, माली, दूध-अखबार पहुँचाने वाले, मंडी से लेकर कल-कारखानों में दिहाड़ी पर काम करने वाले, घरेलू कार्यों में सहयोग करने वाले और इसी तरह के अन्य कार्यों में लिप्त वर्ग के लोग जो गाँव की गरीबी और बेरोजगारी से भागकर शहरों में अपना भविष्य तलाशने आए थे, आज उनमें से अधिकांश मजदूर बेरोजगार होकर वापस गाँव जाने को प्रयत्नशील हैं।

सैकड़ों मील की दूरी पैदल तय करने की मजबूरी और उनसे होने वाली मौतों ने सोती हुई राज्य सरकारों को भी नींद से जगा दिया है। वर्तमान परिस्थिति में प्रवासी मजदूरों को उनके घर तक पहुँचाना, उनमें संक्रमण की जाँच करना, उनके इलाज का प्रबंध करना वगैरह सरकारों के लिए चुनौती बनी हुई है।

प्रवासी मजदूरों की इस दुर्दशा ने एक बार फिर देश में विभिन्न राज्यों के आर्थिक विकास की असमानता पर गंभीर बहस छेड़ दी है। एक तरफ विकास की सीढ़ी पर आगे खड़े गुजरात, महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा जैसे राज्य हैं। दूसरी ओर बिहार, झारखंड, उड़ीसा, बंगाल जैसे राज्य हैं, जहाँ से पलायित लोग अन्य राज्यों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की संभावनाएँ तलाशते हैं।

अब कोरोना जनित आर्थिक मंदी से प्रभावित यह वर्ग घर वापसी कर रहा है। ऐसे में इनके गृह राज्य की सरकारें स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने के प्रयासों में जुट गई हैं। इस मंदी में सरकारों के राजस्व का भी नुकसान हुआ है। लिहाजा विभिन्न राज्य सरकारों ने केंद्र से अपने लिए आर्थिक सहायता की माँग की है।

प्रवासियों के वापस आने से अन्य राज्यों की तुलना में बिहार ज्यादा प्रभावित हो रहा है। बिहार मुख्यतः कृषि आधारित राज्य है। उत्तर बिहार में बाढ़ और दक्षिण बिहार में सुखाड़ से प्रभावित रहने की वजह से कृषि क्षेत्र वापस आए प्रवासियों को रोजगार देने में बहुत सक्षम नहीं है। ऐसे में बिहार सरकार के आर्थिक सलाहकारों ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की माँग एक बार पुनः छेड़ दी है।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अत्यंत करीबी माने जाने वाले एडीआरआई संस्थान के निदेशक ने हालिया प्रकाशित अखबारी लेखों के माध्यम से यह माँग बिहार की जनता तक पहुँचा दी है। हालाँकि इसकी शुरुआत तो स्वयं नीतीश कुमार ने 28 फरवरी 2020 को अमित शाह की अध्यक्षता वाली पूर्वी जोनल काउंसिल की बैठक में ही कर दी थी।

वस्तुतः यह माँग तो हर चुनाव के पहले बिहार की सभी राजनैतिक दलों का प्रमुख मुद्दा बन जाता है। लेकिन सभी पार्टियों के चुनावी मुद्दे में शामिल होने के वावजूद बिहार आज तक विशेष राज्य के वर्ग में शामिल होने में असफल रहा है। तो फिर से इसकी माँग उठाना क्या आगे आने वाले चुनावी समर का सूचक है? या वित्तीय संसाधन जुटाने का एक सार्थक प्रयास, जिससे बिहार आर्थिक मंदी के असर से निकलने और लोगों को रोजगार देने में सक्षम हो?

विशेष दर्जा देने का प्रावधान पाँचवें वित्त आयोग द्वारा सुझाई गई थी। इसके अनुसार राष्ट्रीय विकास परिषद निम्नलिखित 5 कारणों से किसी भी राज्य को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान कर सकती थी;

  • पर्वतीय और दुष्कर बहुलता क्षेत्र वाले राज्य
  • अत्यधिक कम जनसंख्या घनत्व अथवा अनुसूचित जनजाति बहुलता वाले राज्य
  • सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण अंतराष्ट्रीय सीमा वाले राज्य
  • आर्थिक और अवसंरचना की दृष्टि से पिछड़े राज्य
  • वित्तीय संकट परिस्थिति

वर्तमान में 11 राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त है। ये राज्य हैं: असम, नागालैंड, जम्मू-कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, सिक्किम, त्रिपुरा और उत्तराखंड। ये सारे राज्य या तो हिमालय की गोद में हैं या अनुसूचित जनजाति बहुल राज्य हैं।

विशेष राज्य का दर्जा होने के कारण इन्हें कुल केंद्रीय सहयोग राशि का 30% सीधा-सीधा मिल जाता है। विशेष दर्जे वाले राज्य को केंद्रीय सहयोग राशि का 90% भाग अनुदान और 10% भाग कर्ज के रूप में मिलता है। वहीं, अन्य राज्यों के लिए यह क्रमशः 70% और 30% होता है। केंद्रीय योजनाओं के कार्यान्वयन में भी विशेष दर्जे वाले राज्यों को बस 10% साझेदारी करनी होती है।

लेकिन, 14वें वित्त आयोग ने इस विशेष राज्य के दर्जे वाले वर्ग को ही रद्द करने की अनुशंसा की, जिसे सरकार ने मान लिया था। केंद्र सरकार ने वित्त आयोग की उस अनुशंसा को भी स्वीकार कर लिया था, जिसके तहत केंद्रीय राजस्व में राज्य सरकारों की हिस्सेदारी 32% से बढ़ा कर 42% करनी थी। इन अनुशंसाओं के पालन करने के बाद किसी भी राज्य को आर्थिक सहायता के लिए विशेष दर्जा देने का प्रावधान समाप्त हो चुका है।

ऐसे में राज्यों का ‘विशेष दर्जा’ देने की माँग राजनीति से प्रेरित दिखती है, वह भी तब जब केंद्रीय आर्थिक सहायता राशि बिना विशेष दर्जा प्रदान किए भी दी जा सकती है।

जब मध्य प्रदेश बिना विशेष राज्य के दर्जे के बावजूद स्वयं का संसाधन विकसित करते हुए विकास के मापदंडों पर आगे निकल सकता है। जब पंजाब जैसा छोटा और कृषि प्रधान राज्य भी बिना किसी विशेष सहायता के बिहार को हर क्षेत्र में पछाड़ सकता है। फिर प्रश्न उठता है कि बिहार ऐसा क्यूँ नहीं कर पाया? ऐसा न कर पाने की जिम्मेदारी किसकी है?

बिहार के मुख्यमंत्री का तीसरा कार्यकाल पूरा होने जा रहा है और बिहार विकास के अनेक मानकों पर नीचे खड़ा है। बिहार बँटवारे के बाद से अभी तक के समयकाल में तीन चौथाई समय नीतीश कुमार का शासन रहा है। ऐसे में विशेष राज्य के दर्जे की माँग के भरोसे 15 वर्ष के कार्यकाल तक बैठे रहना कहाँ तक उचित है? वह भी तब जब बिहार सरकार केंद्र द्वारा आवंटित विकास राशि का भी पूर्ण व्यय और सदुपयोग नहीं कर पाती।

इन परिस्थितियोंऐसे में विशेष दर्जा की माँग उठना न सिर्फ चुनावी जुमला दिखता है, बल्कि यह वर्तमान सरकार की राज्य के विकास के प्रति उदासीनता और अपनी अकर्मण्यता छिपाने की एक सोची-समझी रणनीति भी है।

राजनीतिक तौर पर भी इस मुद्दे को बिहार की जनता सिरे से खारिज कर चुकी है। 2014 के लोकसभा चुनाव में जब नीतीश कुमार भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़े थे तो उन्होंने विशेष राज्य के दर्जे को एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया था। उस चुनाव के नतीजों से स्पष्ट है कि जनता इसे बिहार के विकास के लिए मुद्दा मानती ही नहीं है। ऐसे में पुनः इस माँग को उठना अपने नाकारेपन और नाकाबिलियत से ज्यादा कुछ नहीं हो सकता।

अब जब कोरोना संक्रमण के दौरान प्रदेश के लोगों को रोज़गार के अवसर देने होंगे और विदेशी औद्योगिक इकाइयाँ भी भारत में निवेश के नए अवसर ढूँढ रही है, ऐसे में राज्य सरकारों को अपनी उदासीनता और अकर्मण्यता त्याग कर इस चुनौती को अवसर में बदलना होगा। बिहारवासी इस चुनौती को अवसर के रूप में देख रहे हैं।

पटना स्थित सीएसआरए नामक शोध संस्थान के द्वारा चलाए जा रहे विशेषज्ञों के वक्तव्य ऋंखला में भी बिहार के विकास के लिए कृषि और उद्योग के क्षेत्र में कई अवसरों को चिह्नित किया गया है। सीएसआरए विशेषज्ञों के अनुसार बिहार में कम लागत वाली लघु-मध्यम उद्योग की असीम संभावनाएँ हैं। इनमें मखाना आधारित उद्योग, गन्ना मिल, दुग्ध आधारित उद्योग, आम, लीची, और केला संबंधित फूड प्रोसेसिंग उद्योग, जूट, सिल्क और कपास आधारित कुटीर उद्योग, कृषि आधारित उद्योग वगैरह शामिल हैं।

लेकिन बिहार सरकार और एएडीआरआई निदेशक जैसे आर्थिक सलाहकारों के रवैए से तो यही लगता है कि वे प्रदेश को अभी भी ‘जंगलराज’ बनाम ‘सुशासन’ की घुट्टी पिलाते हुए जनता को विशेष दर्जे की माँग से बरगलाना चाहते हैं।

बदकिस्मती यह है कि प्रमुख विपक्षी दल जैसे राजद और कॉन्ग्रेस भी इसी इसी माँग के सहारे अपनी राजनीति साधना चाहते हैं। ऐसे में यह प्रश्न तो स्वाभाविक ही है कि कब तक बिहार की बदहाली का हवाला देते हुए उसके नेता और राजनीतिक दल केंद्र से विशेष राज्य के दर्जे की भीख माँगते रहेंगे। वो भी तब जब उन्हें पता है कि यह भीख मिलने वाली नहीं है और बिना इस दर्जे के भी बिहार का विकास किया जा सकता है।