Home Blog Page 4804

दिल्‍ली के अस्पताल में ढेर बनाकर रखी जा रही लाशें, शवदाह गृह से लौटाए जा रहे शव: 6 में से काम कर रहीं सिर्फ 2 भट्टियाँ

दिल्‍ली के निगमबोध शवदाह गृह से 8 शवों को वापस अस्‍पताल लौटा दिया गया क्‍योंकि वहाँ पर और शवों के अंतिम संस्‍कार के पर्याप्त साधन मौजूद नहीं थे। दिल्ली स्थित निगमबोध घाट पर शवों के अंतिम संस्‍कार के लिए 6 सीएनजी भट्टियाँ हैं, जिनमें से सिर्फ 2 ही काम कर रही हैं।

हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली लोक नायक अस्पताल के कोरोना वायरस शवगृह के अंदर, 108 शव मौजूद हैं। पोस्टमॉर्टम हाउस के अधिकारियों का कहना है कि वहाँ शवों के सभी 80 भंडारण रैक पूरी तरह भरे हुए हैं और फर्श पर 28 शव एक-दूसरे के ऊपर ढेर लगाकर रखे हुए हैं।

निगमबोध घाट इलेक्ट्रिक शवदाह गृह की छह सीएनजी भट्टियों में से तीन सोमवार तक काम कर रही थीं मगर उनमें से एक उसी रात खराब हो गई। श्मशान के एक अधिकारी ने बताया कि वो अधिक बोझ नहीं ले सके और इसलिए शव वापस लौटा दिए। मंगलवार को अतिरिक्त घंटे काम करने के बाद भी वो सिर्फ 15 शवों को स्वीकार कर सके।

मंगलवार को, आठ शवों को निगमबोध घाट सीएनजी श्मशान से लौटा दिया गया था क्योंकि यह अब और अधिक शवों को रखने की स्थिति में नहीं थी। इसकी छह भट्टियों में से केवल दो ही काम कर रही थीं।

उल्‍लेखनीय है कि दिल्ली स्थित लोकनायक अस्‍पताल दिल्‍ली में कोरोना के इलाज का सबसे बड़ा अस्‍पताल है। इसके पोस्‍टमॉर्टम हाउस में सिर्फ उन लोगों के शव रखे गए हैं, जिनकी मौत कोरोना वायरस से हुई है या जिनके द्वारा कोरोना वायरस संक्रमण की आशंका है। शवों को पीपीई किट में लपेट कर रखा गया है और जो मेडिकल स्टाफ ड्यूटी पर लगे हैं वो भी पीपीई किट पहनकर ही काम कर रहे हैं।

बुधवार (मई 27, 2020) को दिल्ली में कोरोना वायरस के 792 नए मामलों की पुष्टि हुई है। राजधानी दिल्ली में आज कोरोना वायरस के मरीजों की कुल संख्या बढ़कर 15,257 तक पहुँच गई है। इस बीच 15 लोगों की मौत हुई और दिल्ली में मौत का आँकड़ा 303 हो गया।

पूरे देशभर की यदि बात करें तो केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, पिछले 24 घंटे में देशभर में कोरोना वायरस संक्रमण के 6,566 नए मामले सामने आए हैं और 194 लोगों की मौत हुई है। इसके बाद देशभर में कोरोना पॉजिटिव मामलों की कुल संख्या 1,58,333 हो गई है, जिनमें से 4,531 लोगों की अब तक मौत हो चुकी है।

वहीं, राजस्थान स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, राज्य में आज सुबह 10.30 बजे तक कोरोना पॉजिटिव के 131 नए मामले सामने आए हैं, छह लोगों की मौत हुई है और चार लोग ठीक हुए हैं।

नहीं रहे 26/11 के हीरो हरिश्चंद्र श्रीवर्धानकर: कसाब को पहचाना था, आतंकी इस्माइल को ऑफिस बैग से मारा था

हरिश्चंद्र श्रीवर्धानकर का कल (27 मई 2020) को ठाणे जिले के कल्याण स्थित उनके आवास पर निधन हो गया। वे 70 साल के थे। मुंबई के 26/11 हमले में जिंदा पकड़े गए आतंकी अजमल कसाब की अदालत में पहचान करने वाले वे मुख्य गवाह थे।

श्रीवर्धनकर मूल रूप से कोंकण के हरिहरेश्वर के रहने वाले थे। वह खाद्य और नागरिक आपूर्ति विभाग के सेवानिवृत्त कर्मचारी थे। उनके परिवार में पत्नी, दो पुत्र, दो पुत्री और एक बहू है।

26 नवंबर 2008 को मुंबई में जब पाकिस्तान से आए दस आतंकियों ने हमला किया था तो हरिश्चंद्र को दो गोलियॉं लगी थी। उन्हें कामा अस्पताल के निकट कसाब और उसके साथी अबू इस्माइल ने गोली मारी थी। उन्होंने अपने ऑफिस बैग से इस्माइल को मारा भी था।

सूत्रों ने बताया, ‘‘मंगलवार की रात उनका निधन हो गया।’’ हरिश्चंद्र पहले ऐसे गवाह थे जिन्होंने विशेष अदालत के समक्ष कसाब की पहचान की थी और उसके खिलाफ गवाही दी थी। कसाब एकमात्र आतंकवादी था जिसे जिंदा पकड़ा गया था और 21 नवंबर 2012 को पुणे की यरवदा जेल में उसे फांसी पर लटकाया गया था।”

कुछ दिनों पहले श्रीवर्धनकर को असहाय अवस्था में रास्ते में पाया गया था। वह बीमार थे। गरीबी से लाचार उनके परिवार वाले उनका इलाज नहीं करा पा रहे थे। सूत्रों के मुताबिक पूर्व सीएम देवेंद्र फडणवीस ने कुछ हफ़्ते पहले कल्याण के एक निजी अस्पताल में जाकर श्रीवर्धनकर के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी ली थी। साथ ही उन्होंने भाजपा की तरफ से श्रीवर्धनकर के परिवार को 10 लाख रुपए प्रदान करने की घोषणा भी की थी।

हल्के में ले रहा था चीन अब बातचीत पर उतरा, डोभाल-जयशंकर-रावत की तिकड़ी से खाया मात

चीनी सेना द्वारा वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर सड़क और अन्य निर्माण को लेकर भारत के आक्रामक रुख ने इस बार चीन को कई तरह की चुनौतियाँ दी हैं। और यह मात्र एक संयोग ही माना जा सकता है कि यह सब भारत के पहले प्रधानमंत्री और अक्साई चीन सीमा क्षेत्र विवाद की नींव रखने वाले जवाहरलाल नेहरू की पुण्यतिथि के दौरान घटित हो रहा है।

आखिरकार भारत में चीनी राजदूत सुन वेइदॉन्ग ने अपने बयान में कहा है कि बीजिंग और नई दिल्ली को कभी भी आपसी रिश्तों में अंतर नहीं आने देना चाहिए और बातचीत के माध्यम से उन्हें हल करना चाहिए। NSA अजीत डोभाल, विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर और सीडीएस बिपिन रावत के लिए यह एक बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा सकती है कि कम्युनिस्ट सत्ता वाला तानाशाही देश चीन बातचीत के माध्यम से विवादों को खत्म करना चाहता है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन की सेना के बढ़ते दुस्साहस के कारण भारत की ओर से यह दिन-रात का रेस्क्यू ऑपरेशन था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एनएसए द्वारा सभी घटनाक्रमों के बारे में अपडेट रखा गया था। इस दौरान विदेश मंत्री जयशंकर ने चीनी दूत के साथ व्यक्तिगत संबंधों का भी लाभ उठाया, जिन्होंने 2009 से 2013 तक बीजिंग में भारत के राजदूत के रूप में तैनात होने पर एक्सटर्नल अफेयर्स मंत्रालय के साथ मिलकर काम किया था।

ट्रम्प ने कल सुबह ही ट्वीट करते हुए लिखा, “हमने भारत और चीन दोनों को सूचित किया है कि अमेरिका उनके इस समय जोर पकड़ रहे सीमा विवाद में मध्यस्थता करने के लिए तैयार, इच्छुक और सक्षम है।”

वास्तव में जब भी डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत के मामलों में ऐसी किसी मध्यस्थता की पहल की बात सामने रखी है, उसके कुछ ही पलों बाद भारत में मोदी सरकार ने कोई ना कोई ऐसा बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया है, जो बिना किसी आक्रामक कूटनीति और स्पष्ट दिशा-निर्देश के सम्भव नहीं माना जा सकता था। इसमें जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निष्क्रिय करने से लेकर पाकिस्तान पर की गई एयर स्ट्राइक जैसे फैसले महत्वपूर्ण हैं।

ये कुछ कदम मोदी सरकार ने अन्य देशों की मध्यस्थता की माँग को ठुकराकर लिए हैं और यह संदेश दिया है कि भारत अब इतना सक्षम और शक्तिशाली है कि वह अपने भाग्य का फैसला स्वयं करना जनता है। वरना एक समय यहाँ ऐसे भी नेता रहे, जिन्हें भारत की जनता के भाग्य को ब्रिटिश शासक, उनके वायसराय और बाद में संयुक्त राष्ट्र की मेहरबानी पर छोड़ देने में ही भलाई नजर आती थी।

पूर्वी लद्दाख में सीमा तनाव के अलावा, भारत और चीन की सेनाएँ तकरीबन पिछले एक माह से ही उत्तरी सिक्किम में आमने-सामने थे। चीन द्वारा सफेद झंडे दिखाने के पीछे भारत सरकार और सेना का आक्रामक रवैया ही सबसे बड़ी वजह माना जा सकता है। कल ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत और चीन के बीच जारी विवाद में मध्यस्थता की पेशकश की थी।

भारत और चीन के बीच करीब 3,500 किलोमीटर लंबी सीमा है, जिसे वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) कहते हैं। एलएसी पर लद्दाख और उत्तरी सिक्किम में अनेक क्षेत्रों में चीन की सेना ने हाल ही में सैन्य ठिकानों का निर्माण किया है। चीन एक लंबे समय से ही उस क्षेत्र में सड़क का निर्माण कर रहा था, ताकि जरूरत पड़ने पर सेना तेजी से मोर्चे पर पहुँचाई जा सके।

शुरुआती दौर में चीन ने पश्चिमी राजमार्ग का प्रयोग अपने सैनिकों को भेजने के लिए किया। चीन की सेना निर्माण कार्य में प्रयोग होने वाले भारी वाहनों जैसे ट्रकों के जरिए अपने सैनिकों को वहाँ चुपचाप तैनात कर रहा था।

कोरोना वायरस, ताईवान, हॉन्गकॉन्ग और दक्षिण चीन सागर को लेकर हर और से बैकफुट पर खड़ा चीन भारत को अपना रुख ढीला करने पर मजबूर कर दुनिया को अपने वर्चस्व का संकेत देना चाहता था। उसने नेपाल से लेकर अपने प्राचीन मित्र पाकिस्तान तक का सहारा भी लिया। लेकिन चीन के हाथ सिर्फ और सिर्फ फजीहत ही लगी है।

नेहरू की देन है अक्साई चीन विवाद

एक समय था जब संसद में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि लद्दाख के अक्साई चिन क्षेत्र के कुछ हजार वर्ग किलोमीटर के बंजर भू-भाग पर चीन ने कब्जा कर लिया है, लेकिन इसके लिए कोई चिंता की बात नहीं है क्योंकि वहाँ घास तक पैदा नहीं होती। यही नहीं, नेहरू ने यहाँ तक बयान दिया था कि हमें तो पता भी नहीं कि वो आखिर है कहाँ?

इसमें कोई शक नहीं कई चीन आज भी भारतीय नेतृत्व में नेहरू के उसी बयान की झाला का अंदाजा लगाकर अपने सैन्य अभियानों को चला रहा था। लेकिन नतीजा यह हुआ है कि अपनी उग्र, शत्रुपूर्ण रवैए के लिए मशहूर चीन को पीछे हटकर बातचीत का सहारा लेना जरुरी समझा है।

जब अंग्रेज सावरकर को कोल्हू में बैल की जगह जोतते थे, जब गाँधी अफ्रीका से भारत लौटे भी नहीं थे: कहानी कालापानी की

विनायक दामोदर सावरकर, यानी वीर सावरकर। ये महज एक नाम नहीं है बल्कि संघर्ष की एक ऐसी गाथा है, जिसका वर्णन शब्दों से परे है। जिस व्यक्ति ने एक दशक से भी ज्यादा समय तक कालापानी की सज़ा भुगती, आज उसे अपमानित किया जाता है। जिसने रानी लक्ष्मीबाई, पेशवा नाना और वीर कुँवर सिंह जैसों की वीरता को दुनिया के सामने लाया, उसके योगदानों पर हँसा जाता है। क्यों? क्योंकि वो एक हिन्दू राष्ट्रवादी थे।

क्या होता है कालापानी? क्या आपके जेहन में किसी भी अन्य स्वतंत्रता सेनानी का नाम आता है, जिन्होंने कालापानी की सज़ा इतने लम्बे वक़्त तक भुगती हो? या फिर किसी ऐसे ही नेता का नाम, जिन्होंने कालापानी की सज़ा भुगती हो। दिमाग पर जोर डालना पड़ेगा। खोजना पड़ेगा। आज़ादी में नेहरू और गाँधी का भी योगदान था लेकिन उन्हें कभी कालापानी नहीं हुई। कालापानी मतलब यातना। कालापानी मतलब नरक। कालापानी मतलब क्रूर अत्याचार। कालापानी मतलब 24 घंटे त्रासदी वाला जीवन। क्या ये सबके वश की बात थी?

कालापानी में कक्ष कारागारों को सेल्युलर जेल कहा जाता था। वहाँ कड़ा पुलिस पहरा रहता था। सावरकर अपनी पुस्तक ‘काला पानी’ में इस नारकीय यातना का वर्णन करते हैं। 750 कोठरियाँ, जिनमें बंद होते ही कैदी के दिलोदिमाग पर घुप्प अँधेरा छा जाता था। अंडमान के सुन्दर द्वीप पर ये अंग्रेजों का नरक था। यद्यपि ‘काला पानी’ एक गद्य उपन्यास की तरह है, जिसे सावरकर ने अपनी जीवनी के रूप में नहीं लिखा है और इसके तमाम पात्र भी काल्पनिक हैं, लेकिन यातनाओं और जेल का जो विवरण है, वो समझने वाले समझ जाते हैं कि सत्य है।

इस पुस्तक के बारे में कहा जाता है कि इस पर फ़िल्म बनाने के लिए सावरकर के पास ऑफर आया था। उनके निजी सचिव बाल सावरकर लिखते हैं कि सुधीर फड़के इस पर फिल्म बनाना चाहते थे लेकिन उनकी माँग थी कि रफीउद्दीन नामक किरदार को बदल दिया जाए और उसकी जगह किसी हिन्दू पात्र को दे दी जाए। सावरकर को ये स्वीकार्य नहीं था। उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि वो इस तरह एक दूसरे मजहब के किरदार का नाम हिन्दू का करने की अनुमति कभी नहीं दे सकते।

सावरकर ने कह दिया कि अगर उन लोगों को समुदाय विशेष को शिष्ट और साधु प्रवृत्ति का दिखाने की इतनी ही हूल मची है तो कोई एक नया किरदार गढ़ लें लेकिन वो इस तरह से पहले से बने हुए किरदार के नाम में परिवर्तन की अनुमति नहीं देंगे। आज भी बॉलीवुड का यही ट्रेंड है। समुदाय विशेष के किरदार को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया जाता है। उन्हें एक इमानदार दोस्त, त्यागी व्यक्ति और भोले-भाले इंसानों के रूप में चित्रित किया जाता है जबकि पंडितों को चुंगला, बातें इधर-उधर करने वाला और शोषणकर्ता के रूप में दिखाया जाता है।

वीर सावरकर ने जिक्र किया है कि किस तरह वहाँ इंसानों को जानवरों से भी बदतर समझा जाता था। अंग्रेज उन्हें कोल्हू के बैल की जगह जोत देते थे। पाँव से चलने वाले कोल्हू में एक बड़ा सा डंडा लगा कर उसके दोनों तरफ दो आदमियों को लगाया जाता था और उनसे दिन भर काम करवाया जाता था। जो काम बैलों का था, वो इंसानों से कराए जाते थे। जो टालमटोल करते, उन्हें तेल का कोटा दे दिया जाता था और ये जब तक पूरा नहीं होता था, उन्हें रात का भोजन भी नहीं दिया जाता था। उन्हें हाँकने के लिए वार्डरों तक की नियुक्ति की गई थी।

सावरकर जहाँ भी जाते थे, वहाँ उनके ‘अपने लोग’ मिल ही जाते थे। इसी तरह अंडमान में ही कुछ ऐसे वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी रह रहे थे, जो 1857 के युद्ध में अपने रोल के कारण यहाँ बंद थे। ये ऐसे लोग थे, जो बुढ़ापे तक सज़ा काटने के बाद वहीं बस गए थे। ऐसे देशभक्तों ने सावरकर से संपर्क किया था और उन लोगों की बातचीत होते रहती थी। उनके अनुभवों से सावरकर ने कई चीजें सीखीं। तभी उन्होंने अंडमान में कागज़-कलम न मिलने पर दीवारों पर कीलों, काँटों और अपने नाखूनों तक से साहित्य रचे। कई पंक्तियों को कंठस्थ किया और आमजनों तक पहुँचाया।

भले ही ‘काला पानी’ में सावरकर ने काल्पनिक पात्र गढ़ें हों लेकिन वो सभी वास्तविक पात्रों से ही प्रेरित थे। उनके नाम बदले हुए थे। अंडमान में कई छँटे हुए बदमाश भी थे, जिनका जिक्र किया गया है। सावरकर अपनी एक अन्य पुस्तक ‘मेरा आजीवन कारावास‘ में लिखते हैं कि उन्हें भी कोल्हू के बैल का काम दिया गया था। उससे पहले उनसे छिलका कूटवाने का काम लिया जाता था। अचानक एक दिन अंग्रेजों ने कहा कि ये करते-करते उनके हाथ कठोर हो गए होंगे, इसीलिए अब उन्हें कोल्हू वाला काम दिया जा रहा है।

सिर चकराता था। लंगोटी पहन कर कोल्हू में काम लिया जाता था। वो भी दिन भर। शरीर इतना थका होता था कि उनकी रातें करवट बदलते-बदलते कटती थी। अन्य बंदीगण सावरकर से प्रेम करने लगे थे, इसीलिए वो आकर उनकी मदद कर देते थे। उनके कपड़े तक धो देते थे और बर्तन माँज देते थे। सावरकर के रोकने के बाद वो मिन्नतें करने लगते थे, जिसके बाद सावरकर ने उन्हें मना करना छोड़ दिया क्योंकि उन बंदियों को इसमें ही ख़ुशी होती थी। धीरे-धीरे यातनाएँ और भी असह्य होती चली गईं।

स्थिति ये आ गई कि सावरकर को आत्महत्या करने की इच्छा होती। इतनी भयंकर यातनाएँ दी जातीं और वहाँ से निकलने का कोई मार्ग था नहीं, भविष्य अंधकारमय लगता- जिससे वो सोचते रहते कि वो फिर देश के किसी काम आ पाएँगे भी या नहीं। एक बार कोल्हू पेरते-पेरते उन्हें चक्कर आ गया और फिर उन्हें आत्महत्या का ख्याल आया। सावरकर लिखते हैं कि उनके मन और बुद्धि में उस दौरान तीव्र संघर्ष चल रहा था और बुद्धि इसमें हारती हुई दिख रही थी।

सावरकर के बारे में क्या कहते थे वाजपेयी

सावरकर काफी देर तक उस खिड़की को देखते रहते, जहाँ से लटक कर पहले भी कैदियों ने आत्महत्या की थी। कई दिनों तक सोचने के बाद उन्होंने निश्चय किया कि अगर मरना ही है तो एक ऐसा कार्य कर के मरें, जिससे लगे कि वो सैनिक हैं। सोच-विचार के बाद उन्होंने न सिर्फ अपने बल्कि कई अन्य कैदियों के मन से भी आत्महत्या का ख्याल निकालने में सफलता पाई। वहाँ उन्होंने कोल्हू पर ही संगठन का काम शुरू किया, बंदियों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया, उन्हें देशप्रेम सिखाया। अंग्रेज उन्हें बाकी बंदियों से दूर रखना चाहते थे। उन्हें बाद में रस्सी बाँटने का काम दे दिया गया था।

वहाँ अंडमान में कई राजबंदी रहा करते थे। सावरकर उनसे जब पहली बार मिले, तभी उन्हें उनके दुखों का अंदाज़ा हो गया था। उन्होंने अंग्रेजों के भय को दरकिनार कर के उनसे सबका परिचय लिया। उसी समय उन्होंने उन सभी से कहा था कि देखना, एक दिन जब भारत आज़ाद होगा तो इसी जेल में हम सबके पुतले लगे होंगे। सावरकर ने कहा-

“आज भले ही पूरे विश्व में हमारा अपमान हो रहा हो लेकिन देखना, एक दिन यही जगह एक तीर्थस्थल बन जाएगा और लोग कहेंगे कि देखों यहाँ हिन्दुस्तानी कैदी रहा करते थे। ऐसा ही होगा। ऐसा होना चाहिए।”

आज वो कमरा किसी तीर्थस्थल से कम नहीं है, जहाँ सावरकर रहा करते थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी वहाँ जाकर काफी देर तक ध्यान धरा था। सेल्युलर जेल में सावरकर की प्रतिमा लगी हुई है। वहाँ लोग जाते ही अभिभूत हो जाते हैं और सावरकर के त्याग को याद करते हैं। पोर्ट ब्लयेर विमानक्षेत्र का नाम ही वीर सावरकर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है। सावरकर का सपना तभी पूर्णतया सच होगा, जब हिन्दुओं के भीतर जाग्रति आएगी और भारत पुनः विश्वगुरु बनेगा। दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी हमेशा कहा करते थे कि हमें सावरकर को ठीक से समझने की ज़रूरत है।

महात्मा गाँधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका में 21 वर्ष बीता कर भारत लौटे थे, जिसके बाद उन्होंने कॉन्ग्रेस की सभाओं में दिलचस्पी लेनी शुरू की थी। इसके उलट सावरकर को 1911 में ही सेल्युलर जेल में भेज दिया गया था, जब उनकी उम्र महज 28 वर्ष की थी। गाँधी जब भारत लौटे थे, तब उनकी उम्र 45 वर्ष थी। सावरकर को 50 साल के कारावास की सजा सुनाई गई थी। उससे पहले वो लन्दन में रहे थे। उन्हें वहाँ भी गिरफ्तार किया गया था। आज़ादी के बाद भी उन्हें नेहरू सरकार ने सम्मान नहीं दिया।

सावरकर ने ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ नामक पुस्तक लन्दन में ही गहन अध्ययन कर के लिखा था। वो एक लाइब्रेरी का एक्सेस पाने में कामयाब रहे थे और उन्होंने एक के बाद एक दस्तावेजों का अध्ययन कर के ये साबित किया कि वो प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था, कोई साधारण सिपाही विरोध नहीं। महारानी लक्ष्मीबाई से लेकर पेशवा नाना तक को इतिहास में अमर बनाने का श्रेय सावरकर को भी जाता है, जिन्होंने उन महापुरुषों के बलिदानों के बारे में जनता को अवगत कराया। उनकी किताब को भगत सिंह सहित कई क्रन्तिकारी पढ़ते ही नहीं थे बल्कि उसका अनुवाद भी करते थे।

सावरकर 1960 के दशक में अक्सर अस्वस्थ रहते थे। उससे कई वर्ष पहले 1948 में, जैसा कि हमें पता है, नाथूराम गोडसे ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या कर दी थी, जिसके बाद सावरकर गिरफ़्तार हुए थे। तब गुस्साई भीड़ ने उनके घर के ऊपर पत्थरबाज़ी की थी। हालाँकि, सावरकर सभी आरोपों से बरी हुए और क़ानून ने उन्हें दोषी नहीं माना। नेहरू सरकार द्वारा आज़ाद भारत में सावरकर को फिर से प्रतिबंधित किया गया, 60 के दशक में भी गिरफ्तार किया गया।

आज ये कह देना बिलकुल आसान है कि सावरकर ने माफ़ी माँगी थी। दरअसल, ये सब इसीलिए किया जाता है ताकि लोग उनका योगदान भूल जाएँ हिंदुत्व की बातें न करें, सावरकर को सम्मान देने में हीन भावना का शिकार हो जाएँ और राष्ट्रवाद के लिए देश में कोई जगह न बचे। ऐसे लोगों को अंडमान की उस कालकोठरी में बंद होकर एक सप्ताह बिताना चाहिए, यातनाएँ सहनी तो दूर की बात है। असल बात तो ये है कि सावकार ने देश के लिए जो सहा, वो सबके बूते की बात नहीं।

अमित शाह की वो एक लाइन… और राजनीति कर रहीं ममता बनर्जी को कहना पड़ा – Thank You

पश्चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी ने एक बार फिर केंद्र सरकार के खिलाफ जहर उगला है। कोरोना वायरस महामारी के बीच पश्चिम बंगाल सरकार की अक्षमता पर गृह मंत्रालय कई बार उन्हें सतर्क कर चुका है, जिससे बौखला कर ममता बनर्जी ने गृह मंत्री अमित शाह को कहा कि उन्हें आकर बंगाल को सम्भालना चाहिए।

बुधवार (मई 27, 2020) को बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कहा – “मैंने अमित शाह से कहा, अगर आपको लगता है कि पश्चिम बंगाल अपने दम पर सब कुछ मैनेज नहीं कर सकता है, तो आप आइए और संभालिए। इस पर अमित शाह ने कहा कि चुनी हुई सरकार को हम कैसे तोड़ सकते हैं। यह कहने के लिए मैं उन्हें धन्यवाद देती हूँ।”

ममता बनर्जी ने बुधवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा- “मैंने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से अपील की है वे स्थिति पर गौर करें। मैं चाहती हूँ कि प्रधानमंत्री इस मामले में हस्‍तक्षेप करें। यह राजनीति करने का समय नहीं है। बिहार समेत बीजेपी शासित अन्‍य राज्‍यों में कोरोना वायरस के केस बढ़ रहे हैं। भारत एक देश है। कोरोना वायरस को फैलने से रोकना चाहिए।”

इसके साथ ही भरतीय रेलवे को निशाना बनाते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि रेलवे प्रवासी श्रमिकों के लिए विशेष रेलगाड़ियाँ अपनी मर्जी और शर्तों पर चला रहा है। इससे कोरोना वायरस के मामले बढ़ेंगे ही। उन्होंने कहा, “मैं नहीं जानती कि रेल मंत्रालय ऐसा क्‍यों कर रहा है। हम दो लाख प्रवासी मजदूरों की जाँच किस तरह करेंगे? क्‍या केंद्र मदद करेगा?”

ममता बनर्जी ने कहा कि बीजेपी उन्हें राजनीतिक रूप से परेशान कर सकती है लेकिन वो राज्य को क्यों नुकसान पहुँचा रहे हैं? साथ ही रेलवे पर आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि आप महाराष्‍ट्र को खाली कर रहे हैं और बंगाल में कोरोना फैला रहे हैं।

केंद्र सरकार से लगातार टकराव कर रही हैं ममता

उल्लेखनीय है कि हाल ही में अम्फान तूफान से हुई भारी तबाही का जायजा लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पश्चिम बंगाल गए थे। उन्होंने हवाई सर्वेक्षण कर प्रभावित इलाकों का जायजा लिया। ममता बनर्जी समेत राज्य अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक की। फिर, हालातों को देखते हुए बंगाल को दोबारा खड़ा करने के लिए ₹1000 करोड़ के राहत पैकेज का ऐलान किया।

पीएम मोदी के इस त्वरित फैसले की तारीफ देश भर में हुई। लेकिन, ममता बनर्जी ने बैठक समाप्त होने के कुछ देर बाद ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिए राहत पैकेज पर सवाल खड़ा कर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि PM ने 1 हजार करोड़ रुपए का राहत पैकेज घोषित जरूर किया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि उनके द्वारा दिया गया 1 हजार करोड़ रुपए एडवांस है या पैकेज है।

नए नक्शे पर नेपाल ने संविधान संशोधन टाला, भारतीय इलाके को बताया था अपना हिस्सा

भारत के इलाकों को अपना बताने वाले नक़्शे पर नेपाल ने कदम पीछे हटा लिए हैं। देश के नक्शे में फेरबदल के लिए नेपाल के संविधान में संशोधन किया जाना था। इसके लिए बुधवार (मई 27, 2020) को संसद में प्रस्ताव रखा जाना था। लेकिन अब इस मसले को कार्यसूची से बाहर कर दिया गया है। पार्टियों ने इस मामले पर राष्ट्रीय सहमति बनाने का फैसला किया है।

बताया जा रहा है कि नेपाल सरकार ने आखिरी वक्त पर संसद की कार्यसूची से संविधान संशोधन की कार्यवाही को हटा दिया। नेपाल में नए नक्शे को अपडेट करने को संविधान में संशोधन करने लिए निर्धारित बैठक टाल दी गई है।

इसके साथ ही नेपाल की प्रतिनिधि सभा में संशोधन के लिए संसद में निर्धारित चर्चा भी टल गई है। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने नए नक्‍शे के मसले पर राष्ट्रीय सहमति बनाने के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाई थी लेकिन सभी राजनीतिक दलों में इस मसले पर एक राय नहीं बन पाई। इस बैठक में सभी दल के नेताओं ने भारत के साथ बातचीत कर किसी भी मसले को सुलझाने का सुझाव दिया था।

बता दें कि नेपाल में किसी भी संविधान संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का नेशनल असेंबली में दो-तिहाई बहुमत है, लेकिन इसे निचले सदन में संविधान संशोधन प्रस्ताव पास कराने के लिए उसे अन्य दलों से समर्थन की आवश्यकता होगी। निचले सदन में उसकी दो तिहाई बहुमत से 10 सीटें कम हैं।

हलाँकि, नेपाली कॉन्ग्रेस ने नए नक्शे को जारी करने के सरकार के कदम का समर्थन किया है। साथ ही उसका यह भी कहना है कि संविधान संशोधन प्रस्ताव के लिए पार्टी में चर्चा की आवश्यकता है। सत्तारूढ़ दल ने सभी से अपनी राजनीतिक माँगों को इसके साथ नहीं जोड़ने का आग्रह किया है।

नेपाली कॉन्ग्रेस के नेता कृष्ण प्रसाद सिटौला ने कहा है कि मानचित्र को अपडेट करने का निर्णय आगामी केंद्रीय कार्य समिति की बैठक में लिया जाएगा। इसलिए पार्टी ने संशोधन को कुछ समय के लिए टालने का अनुरोध किया है।

गौरतलब है कि नेपाल की ओर से अपने नए राजनीतिक नक्शे में भारतीय क्षेत्र दिखाए जाने पर भारत के विदेश मंत्रालय ने नेपाल को भारत की संप्रभुता का सम्मान करने की नसीहत दी थी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा था, “हम नेपाल सरकार से अपील करते हैं कि वो ऐसे बनावटी कार्टोग्राफिक प्रकाशित करने से बचें। साथ ही भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करें।”

साथ ही भारत ने यह भी कहा था कि नेपाल सरकार अपने फैसले पर फिर से विचार करे। अनुराग श्रीवास्तव ने कहा था कि नेपाल सरकार, इस मामले में भारत की स्थिति से भलीभाँति वाकिफ है। बता दें कि नेपाल ने 18 मई को नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था। इसमें कालापानी, लिपुलेख और लिमिपियाधुरा को अपने क्षेत्र के रूप में दिखाया था। नेपाल ने अपने नक़्शे में कुल 335 वर्ग किलोमीटर के इलाके को शामिल किया था। इसके बाद 22 मई को संसद में संविधान संशोधन का प्रस्ताव पेश किया था।

लद्दाख में घास नहीं जमती, कश्मीर मुस्लिम बहुल: नेहरू कृपा से आज फिर खड़े हैं अक्साई चीन पर सैनिक

आज ही अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक ट्वीट में कहा है कि वे भारत और चीन के बीच सीमा विवाद में मध्यस्थता को तैयार हैं। दिलचस्प बात यह है कि आज ही भारत के नाम हर प्रकार के सीमा विवाद करने के बाद खुद को भारत रत्न देने वाले देश के पहले प्रधानमंत्री और लार्ड माउंटबेटन के अच्छे दोस्त जवाहर लाल नेहरू की भी पुण्यतिथि है।

तिब्बत पर चीन के बलात कब्जे के बाद तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने नेहरू को चीन की ओर से सतर्क रहने की ओर इशारा भी किया था। 1950 के अक्टूबर में जवाहरलाल नेहरू को लिखे एक पत्र में सरदार पटेल ने चीन तथा उसकी तिब्बत के प्रति नीति से सावधान किया था और कहा था कि चीन का रवैया कपटपूर्ण और विश्वासघाती है।

अक्साई चीन क्षेत्र

सरदार पटेल पहले ही कर चुके थे नेहरू को सतर्क

सरदार पटेल ने अपने पत्र में चीन को अपना दुश्मन, उसके व्यवहार को अभद्रपूर्ण और चीन के पत्रों की भाषा को किसी दोस्त की नहीं, भावी शत्रु की भाषा कहा था। लेकिन नेहरू हमेशा से चीन से बेहतर ताल्लुक़ चाहते थे।

सरदार पटेल के पत्र जवाब में नेहरू ने लिखा, “तिब्बत के साथ चीन ने जो किया, वह गलत था, लेकिन हमें डरने की ज़रूरत नहीं। आख़िर हिमालय पर्वत स्वयं हमारी रक्षा कर रहा है। चीन कहाँ हिमालय की वादियों में भटकने के लिए आएगा?”

दिसम्बर 1950 में सरदार पटेल के निधन के बाद नेहरू को उनकी नीतियों पर टोकने वाला शायद ही कोई बाकी था। इसके बाद भी नेहरू के चीन के साथ शिष्टाचार जारी रहे। आखिरकार वर्ष 1954 में भारत ने स्वीकार कर लिया की तिब्बत पर चीन का ही अधिकार है। इस पर नेहरू ने पंचशील समझौते के हस्ताक्षरों ने आखिरी मोहर भी लगा दी।

ठीक इससे पहले, जिसके बारे में बहुत लोग अनभिज्ञ ही हों, वह घटना भी घटी जब वर्ष 1953 में ही UNSC (संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद) के स्थायी सदस्यता की पेशकश भारत को हुई। लेकिन नेहरू ने इसे अस्वीकार करते हुए भारत की जगह चीन को UNSC की स्थायी सदस्यता की वकालत की थी।

इस बारे में सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ नेहरू में सर्वपल्ली गोपाल, खंड 11 के पेज संख्या 248 में लिखा है, “नेहरू ने सोवियत संघ की भारत को UNSC के छठे स्थायी सदस्य के रूप में प्रस्तावित करने की पेशकश को ठुकराते हुए कहा था कि भारत की जगह इसमें चीन को स्थान मिलना चाहिए।”

इसके बाद नेहरू जी के इस ‘योगदान’ का दंश भारत हर आए दिन भुगतता नजर आ रहा है। नेहरू देश के सामरिक हितों के प्रति कितने सतर्क और निश्चिन्त थे, उसका यह सबसे बड़ा उदाहरण कहा जा सकता है।

आख़िरकार पंचशील के बाद चीन ने अक्साई चीन क्षेत्र की ओर अपने कदम बढ़ाने शुरू कर दिए। यह भी उल्लेखनीय है कि भारत-चीन के बीच औपनिवेशिक ब्रिटिश साम्राज्य सिर्फ इस कारण से मैकमोहन रेखा खींच गया था, ताकि असम के चाय के बागान चीन से सुरक्षित रह सकें, लेकिन अक्साई चीन में उन्हें ऐसी महत्वाकांक्षा नजर न आई।

अंग्रेजों और नेहरू की मेहरबानी का नतीजा यह हुआ कि 1956 में आखिरकार चीन ने अक्साई चीन क्षेत्र में सड़क निर्माण शुरू कर अपना दुस्साहसी अभियान शुरू कर दिया।

अक्साई चिन को 1842 में ब्रिटेन ने जम्मू-कश्मीर का हिस्सा घोषित किया था। अब यहाँ पर बनी चीनी सड़क का एक ही मतलब था कि चीन अब भारत के इलाके से होकर तिब्बत तक जा सकता था।

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और चाइनीज प्रीमियर चाऊ एन लाई के बीच अप्रैल 24, 1960 के दिन लद्दाख की सीमा पर बातचीत में नेहरू के संवाद का अंश –

एक नक्शा 1958 में चीनी सरकार द्वारा जारी किया गया, जिसमें अक्साई चीन क्षेत्र की ये सड़कें चीनी नक्शे का हिस्सा बताई गईं।

वर्ष 1960 में भारत-चीन, दोनों देशों के बीच दिल्ली में एक बार फिर समिट का आयोजन हुआ, तब तक भारत द्वारा दलाई लामा को शरण दी जाने के कारण दोनों देशों के रिश्तों में गरमा-गर्मी का माहौल था।

चीनी प्रीमियर चाऊ एन लाई जब भारत पहुँचे तो सड़क पर जनता हाथों में पोस्टर लिए निकली। इन पर लिखा था – “चीन से सावधान” “कठोर रहना नेहरू” “चीनी घुसपैठियों के सामने समर्पण नहीं।”

लेकिन मानो जवाहरलाल नेहरू के अलावा बाकी सभी चीन से सतर्क रहने को जरूरी समझते थे। सोशल मीडिया पर इस मुलाकात के वीडियो आज भी सुरक्षित हैं –

इस समिट का उद्देश्य दोनों देशों के बीच सीमा विवाद पर चर्चा था। लेकिन इसका कोई हल ना निकला। यहाँ से सीमा विवाद बिगड़ता चला गया। इस घटना के ठीक 2 साल बाद 1962 में भारत और चीन की सेनाएँ आमने-सामने थीं।

हर दूसरे दिन चीनी सैनिक भारतीय सेना से उलझते नजर आने लगे। ठीक तभी जवाहरलाल नेहरू ने अपना ऐतिहासिक बयान देते हुए कहा – “Ladakh is a useless, uninhabitable land. Not a blade of grass grows there. We did not even know where it was.”

जिसका हिंदी में अर्थ है – “लद्दाख के अक्साई चिन क्षेत्र के कुछ हजार वर्ग किलोमीटर के बंजर भू-भाग पर चीन ने कब्जा कर लिया है, लेकिन इसके लिए कोई चिंता की बात नहीं है क्योंकि वहाँ घास तक पैदा नहीं होती। हमें तो पता भी नहीं कि वो आखिर है कहाँ?”

नेहरू के इस लापरवाही का जवाब देते हुए वहाँ मौजूद एक सांसद ने कहा था कि उनके सिर पर भी बाल नहीं उगते, तो क्या वह भी चीन को दे दिया जाए?

नेहरू अपने अंतरराष्ट्रीय सीमाओं और देशप्रेम के प्रति कितने सजग थे, इसका उदाहरण इसी बात से मिल जाता है कि लद्दाख को बंजर भूमि बताने वाले नेहरू ने ही कश्मीर को पाकिस्तान को दिए जाने की भी वकालत करते हुए कहा था कि कश्मीर के एक हिस्से को पाकिस्तान को दिया जाना चाहिए, क्योंकि यहाँ पर मुस्लिम बहुलता में हैं।

नेहरू की फॉरवर्ड पॉलिसी

वर्ष 1959 के बाद भारत और चीन के सैनिक लगातार एक-दुसरे से ‘नो मैन्स लैंड’ में उलझते रहे और जो जहाँ पहुँचता, अपने झंडे गाड़ कर चौकियाँ बनाता रहा। चीनी प्रीमियर के बिना निष्कर्ष चीन लौटने के बाद नेहरू ने नवंबर, 1961 में फॉरवर्ड पॉलिसी सामने रखी।

जवाहरलाल नेहरू ने ‘फॉरवर्ड पॉलिसी’ अपनाई, जिसमें कहा गया कि भारत को एक-एक इंच चीन की ओर बढ़ना चाहिए। जबकि वास्तव में जमीनी हकीकत यह थी कि यह ‘बैकवर्ड पॉलिसी’ बन गई। चीनी सेना लगातार भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ करती चली गई और हम लगातार पीछे हटते चले गए।

कुछ माह में ही मानो नेहरू नींद से जागे और संसद में प्रस्ताव रखते हुए चीन के धोखे की बात का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उन्हें दुनिया समझ में आ गई। जवाहरलाल नेहरू ने कहा, “हम आधुनिक दुनिया की सच्चाई से दूर हो गए थे।”

आखिरकार चीन के साथ हुए उस 1962 के युद्ध में भारत के हाथ वह दुर्भाग्यपूर्ण हार आई, जिसके बारे में कुछ इतिहासकार बताते हैं कि उस हार ने नेहरू को उनके आखिरी दिनों तक परेशान रखा। चीनी सैनिकों को जिस अवसर की तलाश थी वह उन्हें मिला। नेहरू का ‘पंचशील’ और ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारे भारत की हार के रूप में सामने आए।

भारत के लिए नेहरू अपनी लापरवाही के कारण आज तक इस युद्ध का फैसला अधूरा छोड़कर गए। आज चीन के सैनिक एक बार फिर सीमाओं पर डटे हैं, तनाव का माहौल है, हालाँकि इस बार चीन के सामने नेहरू नहीं बल्कि नरेन्द्र मोदी हैं, जिन्होंने 2014 में अपने पहले कार्यकाल की शपथ लेते हुए खुद को देश का प्रधानसेवक कहा था। फिर भी, चीन के कम्युनिस्ट रवैए के प्रति किसी भी प्रकार की आशा खुद को धोखे में रखना ही होगा।

दलित नाबालिग से चाँद ने किया रेप, दोस्त शान से बनवाया वीडियो: फिर व्हाट्सऐप ग्रुप में डाल दिया video

उत्तर प्रदेश के नोएडा के भंगेल गाँव में एक दलित लड़की से बलात्कार का मामला सामने आया है। पुलिस ने मामले में दोनों आरोपित चाँद उर्फ मुरस्लीन और शान उर्फ सोनू को गिरफ्तार कर लिया है।

जानकारी के मुताबिक आरोपित ने लड़की के साथ दुष्कर्म का वीडियो भी बना लिया था और वीडियो को वायरल करने की धमकी देकर पिछले एक साल से मासूम के साथ बलात्कार कर रहा था। पीड़िता के भाई ने नोएडा पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करवाई, जिसके बाद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दोनों आरोपितों को गिरफ्त में ले लिया।

घटना करीब साल भर पहले की बताई जा रही है। पीड़िता भंगेल गाँव में अपनी बड़ी बहन के साथ किराए के मकान में रहती है। आरोपित चाँद भी भंगेल में ही रहता है। पुलिस उपायुक्त (द्वितीय जोन) हरीश चंदर के मुताबिक करीब एक साल पहले पीड़िता को कुछ नशीला पदार्श पिलाने के बाद चाँद ने उसके साथ बलात्कार किया। इतना ही नहीं, उसने अपने दोस्त शान उर्फ सोनू ने इस घटना का वीडियो भी बनवाया।

इसके बाद आरोपित वीडियो वायरल कर देने की धमकी देकर एक साल तक रेप करते रहे। पुलिस अधिकारी ने बताया कि लॉकडाउन के कारण पीड़िता अपने गाँव चली गई। इसी बीच आरोपितों ने पीड़िता का वीडियो व्हाट्सऐप ग्रुप में शेयर कर दिया।

उन्होंने बताया कि आरोपित ने कथित रूप से पीड़िता को घटना की सूचना पुलिस को देने पर उसे और उसके परिवार को जान से मारने की धमकी भी दी। शिकायत के बाद हरकत में आई पुलिस ने दोनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। दोनों आरिपितों के खिलाफ कई धाराओं में केस दर्ज किया गया है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों राजस्थान के जयपुर में एक भाई द्वारा तीन दोस्‍तों के साथ मिलकर अपनी सगी 10 साल की मंदबुद्धि बहन से गैंगरेप कर उसे मौत के घाट उतारने का शर्मनाक मामला सामने आया था। जीशान अली ने छोटी बहन का अपहरण करने के बाद सुनसान जगह पर अपने तीन दोस्तों- साजिद अली, अमजद अली और वाजिद अली के साथ बारी-बारी से गैंगरेप किया। इसके बाद गला दबाकर बहन की हत्या कर दी। पुलिस ने चारों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है।

राजस्थान के ही अलवर में मोहम्मद हामिद ने घर पर सोई 10 माह की बच्ची का बलात्कार किया था। 19 वर्षीय आरोपित मोहम्मद हामिद ने जब बच्ची का बलात्कार किया, उस समय वो घर पर सो रही थी। पुलिस ने हामिद को गिरफ्तार कर लिया है।

सिंधिया की राह पर रायबरेली की MLA अदिति सिंह, ट्विटर पर त्याग दिया कॉन्ग्रेस का नाम

उत्तर प्रदेश के रायबरेली से कॉन्ग्रेस की विधायक अदिति सिंह उसी राह पर चलती दिख रही हैं जिस पर कुछ दिनों पहले मध्यप्रदेश में कॉन्ग्रेस के महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया आगे बढ़े थे। दरअसल, अदिति ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से कॉन्ग्रेस का नाम हटा दिया है। ट्विटर हैंडल से INC (Indian National Congress) हटाते ही ट्विटर ने अदिति के आईडी से ब्लूटिक हटा दिया है।

अदिति ने अब अपना हैंडल @AditiSinghRBL कर लिया है। RBL यानी रायबरेली है। अदिति सिंह के इस निर्णय को लेकर तरह-तरह की चर्चाएँ हैं। उनके इस कदम से राजनीतिक सरगर्मियाँ अचानक तेज हो गई हैं।

अदिति सिंह का ट्विटर प्रोफाइल

अदिति सिंह ने अपने सोशल मीडिया की प्रोफाइल से कॉन्ग्रेस के नाम सहित राहुल और सोनिया गाँधी की फोटो भी हटा दी है। विधायक के इस तेवर के बाद अब माना जा रहा है कि वह अब पार्टी से जल्दी ही किनारा कर सकती हैं। इससे पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपना ट्विटर प्रोफाइल और बॉयो बदला था। इसके कुछ महीनों बाद मध्य प्रदेश में बड़ा सियासी उलटफेर हुआ और कमलनाथ सरकार गिर गई थी।

अब उसी तरह कॉन्ग्रेस के गढ़ रायबरेली सदर की विधायक भी अलग राह चुनती दिख रही हैं। अदिति सिंह की इस कवायद को कहीं न कहीं उनकी पार्टी से बगावत से जोड़कर देखा जा रहा है। बता दें पिछले कुछ समय से अदिति सिंह और कॉन्ग्रेस पार्टी के बीच सब ठीक नहीं चल रहा है।

पहले अदिति सिंह ने गाँधी जयंती पर पार्टी के व्हिप का उल्लंघन करते हुए यूपी विधानसभा के विशेष सत्र में हिस्सा लिया, जिसके बाद उन्हें नोटिस भी भेजा गया। हालाँकि कॉन्ग्रेस विधायक ने नोटिस को ठेंगा दिखा दिया था।

वहीं हाल ही में कॉन्ग्रेस और योगी सरकार में बसों की सियासत गर्म हुई तो अदिति सिंह का ट्वीट चर्चा का विषय बना। इसमें उन्होंने कॉन्ग्रेस, महाराष्ट्र और राजस्थान सरकार पर सवाल खड़े किए। इस पूरे मामले में विधायक अदिति सिंह ने योगी सरकार के रुख का समर्थन किया था।

अदिति सिंह ने ट्वीट कर लिखा था, “आपदा के वक्त ऐसी निम्न सियासत की क्या जरूरत, एक हजार बसों की सूची भेजी, उसमें भी आधी से ज्यादा बसों का फर्जीवाड़ा। 297 कबाड़ बसें, 98 ऑटो रिक्शा व एबुंलेंस जैसी गाड़ियाँ, 68 वाहन बिना कागजात के, ये कैसा क्रूर मजाक है। अगर बसें थीं तो राजस्थान, पंजाब, महाराष्ट्र में क्यूँ नहीं लगाई।”

इसके अलावा उन्‍होंने एक और ट्वीट में लिखा था, “कोटा में जब यूपी के हजारों बच्चे फँसे थे तब कहाँ थीं ये तथाकथित बसें, तब कॉन्ग्रेस सरकार इन बच्चों को घर तक तो छोड़िए, बॉर्डर तक ना छोड़ पाई। तब योगी आदित्यनाथ ने रातों रात बसें लगाकर इन बच्चों को घर पहुँचाया। खुद राजस्थान के सीएम ने भी इसकी तारीफ की थी।”

पिछले दिनों ये खबरें भी आईं थीं कि अदिति सिंह को कॉन्ग्रेस ने महिला विंग के महासचिव पद से हटा दिया है। नवंबर में अदिति की विधायक की सदस्यता खत्म करने को लेकर भी कॉन्ग्रेस ने यूपी विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित को नोटिस दिया गया था। अदिति ने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने का भी समर्थन किया था।

‘पिंजरा तोड़’: वामपंथनों का गिरोह जिसकी भूमिका दिल्ली दंगों में है; ऐसे बर्बाद किया DU कैम्पस, जानिए सब कुछ

‘पिंजरा तोड़’ मुहिम वामपंथी नौटंकी का वही फर्जीवाड़ा थी (और है) जो कोई भी वामपंथी मुहिम होती है। कुछ लोग, जिनके पेट भरे हुए हैं, जिन्हें सामाजिक समसामयिकता और भेदभाव झेलना नहीं पड़ता, वो एक बेकार-सी बात को एवरेस्ट की दुर्गम चढ़ाई की तरह बता कर, अंग्रेजी के तमाम विशेषणों का प्रयोग कर के (जो उनकी जानकारी में है, और जो वामपंथियों की पॉकेटबुक में वर्णित हों) जनसामान्य के लिए ऐसे रखते हैं, जैसे यह न हुआ तो सृष्टि का अंत तय है।

हॉस्टल की लड़कियों द्वारा इसकी शुरुआत हुई दिल्ली विश्वविद्यालय के कैम्पस में, जहाँ आम तौर पर जेएनयू ब्रीड की सड़ी हुई ‘सर्वहारा को चूसने’ वाली पॉलिटिक्स काम नहीं करती। जी, जेएनयू में सर्वहारा का अलग तरह से शोषण होता है। यह शोषण वैचारिक है, जिससे वहाँ के वामपंथियों को एक सर्वकालिक विषय मिला रहता है, जिसकी मदद से वो सर्वहारा/गरीब/वंचित/शोषित (सारे पर्यावाची शब्द) को कोई न्याय नहीं दिलाते।

न्याय दिलाना लक्ष्य भी नहीं होता। लक्ष्य होता है इनकी बातें कर के मीडिया में थोड़ी-सी कवरेज पा लेना। उसी तर्ज पर, दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में एक चौथाई से ले कर आधी सीट तक के लिए तरसता वामपंथ, एक परजीवी की तरह नकली मुद्दे उठाते हुए चर्चा का हिस्सा बनना चाह रहा था। इसी तर्ज पर आपको रामजस में टुकड़े-टुकड़े गैंग के ‘राष्ट्रद्रोही’ उमर खालिद के भाषण वाली बात याद होगी, जब नॉर्थ कैम्पस में वामपंथियों ने रॉड, डंडे और पत्थर से हमला करते हुए दंगा किया था।

साथ ही, आपको यह बात भी याद होगी कि उसी आयोजन में ‘केरल माँगे आजादी’, ‘पंजाब माँगे आजादी’ के भी नारे लगे थे। वो एक तरह से टेस्टिंग चल रही थी कि यहाँ का पानी कैसा है। डीयू में वामपंथियों को कोई चारा नहीं देता, गाली सुनते हैं और सीट को उँगलियों पर गिनते हैं। जेएनयू का कचरा वामपंथ डीयू में, जो कि वाकई देश की एक प्रतिनिधि जनसंख्या है, अपने पर पसारना चाह रहा था लेकिन वो राजनैतिक तौर पर संभव नहीं था।

यहाँ के वामपंथी शिक्षक भी, मेरे निजी अनुभव से, ऐसे-ऐसे दोगली वैचारिक प्रवृत्ति के हैं कि हँसी आती है। इन्हें आप कैम्पस में बीड़ी और लाल चाय पीते पाएँगे, लेकिन पार्टी में मार्लबोरो और कॉफी। ये दोनों ही चीजें, हमारे समय में (2004-07) हर स्टाफ रूम में उपलब्ध होती थीं, लेकिन दोगला वामपंथ सार्वजनिक तौर पर सर्वहारा की बात करने वाले इन नौटंकीबाज शिक्षकों को सिगरेट पीने की इजाज़त नहीं देता।

ख़ैर, मोदी के पहले और दूसरे कार्यकाल से ही डीयू कैम्पस में अलग वैचारिक ‘क्रांति’ की शुरुआत हो चुकी थी और स्कूल मॉनिटरों के चुनाव में वामपंथियों के भतीजों की जीत को ‘देश के युवाओं की आवाज’ बता कर नाचने वाले लम्पटों को एक नया उद्योग मिल गया। अब शैक्षणिक संस्थानों में मोदी सरकार ने शिक्षकों की आवाजाही, उपस्थिति रजिस्टर आदि का भी काम गम्भीरता से करना शुरु कर दिया तो निकम्मे वामपंथी मास्टरों को यह बात पची नहीं।

फिर खुल कर विरोध का दौर आ गया और व्हाट्सएप के ग्रुपों में शिक्षक इन बच्चों को विष की दो-दो बूँदे हर रोज पिलाने लगे। आप देखिएगा कि डीयू के शिक्षकों ने फेसबुक पर लेखन कब से शुरु किया है। 2017-18 के बाद से कैम्पस पॉलिटिक्स के लिए ही कैम्पस चर्चा में रहा क्योंकि जेएनयू और जामिया के बच्चे अब ‘सेमिनार’ के बहाने भीड़ की शक्ल में आर्ट्स फैकल्टी से ले कर नॉर्थ कैम्पस के तमाम जगहों पर आने-जाने लगे।

अब यह बाइनरी स्थापित हो चुकी थी और वैसे विद्यार्थियों को निशाना बनाया जाने लगा जो गैर-वामपंथी थे। उनका उपहास करना, उन्हें जबरन यूनिवर्सिटी या कॉलेज की समितियों से इस्तीफा दिलवाना, मानसिक प्रताड़ना देना आदि आम हो चुका था। हाल ही में हिन्दू कॉलेज की दीपिका शर्मा चर्चा में आई थीं जब उन्होंने कश्मीरी हिन्दुओं के नरसंहार की बरसी पर एक पत्र पढ़ना चाहा और उन्हें कैम्पस के गुंडों ने शोर मचा कर शांत करना चाहा।

आप इनके पोस्टों को, पोस्टरों को देखेंगे तो पाएँगे कि इनके पास वही चार घिसे-पिटे नारे हैं जिसमें ‘आजादी’, ‘तेरे अरमानों को’, ‘बोल कि लब आजाद हैं तेरे’, ‘सब बुत उठवाए जाएँगे’ आदि होते हैं। इनमें इस साल का नयापन यह रहा कि इन्होंने ‘*** के ख़िलाफ़, औरतों का इंक़लाब’ खूब चलाया। ये सब भी बताता है कि वामपंथियों ने इन लड़कियों को अपना मोहरा बनाया ताकि वो हर कैम्पस में अपनी एक भीड़ तैयार रखें जो एक व्हाट्सएप मैसेज पा कर झोला उठा कर सड़क पर आ जाए।

‘पिंजरा तोड़’ की नौटंकी है क्या?

इसी सब की तर्ज पर कुछ लड़कियों ने ‘पिंजरा तोड़‘ की स्थापना की। उद्देश्य था ‘अंग्रेजी के भारी भरकम शब्दों के प्रयोग से क्रांति कर देना’। जी, उद्देश्य बिलकुल यही प्रतीत होता है क्योंकि जिन बातों को इन लड़कियों ने सबसे बड़े मुद्दे बना कर सोशल मीडिया पर, जॉन एलिया के गर्दन झटकने की गति से सत्रह गुणा तीव्रता से बालों को आवेशित रूप में लहराया है, वो सारे काम आज तक की वीरांगनाओं ने एक आवेदन लिख कर पा लिया था।

मुद्दों पर गौर कीजिए: कन्या छात्रावासों में आने-जाने की समय सीमा बदलवाने की बात, वाई-फाई लगवाने की बात, नल ठीक करने की बात, मेस के भोजन की बात… मतलब आम समस्याएँ जो एक छात्रा अपने हॉस्टल में, और एक छात्र अपने हॉस्टल में, झेलता है: समय की पाबंदी वाली बात के अलावा।

प्रश्न यह है कि हॉस्टल के गेट क्यों बंद कर लिए जाते हैं? ‘पिंजरा तोड़’ छात्राओं का कहना है कि उन्हें ‘पितृसत्ता, फासीवादी ताकतों, जहरीली मर्दानगी के जोश, हिन्दू राष्ट्र’ से आजादी चाहिए। यहाँ भी समस्या नहीं है। समस्या इस बात में है कि यही ‘पिंजरा तोड़’ कन्या समूह अपने कई फेसबुक पोस्टों में यह स्वीकारता है कि दिल्ली की सड़कें लड़कियों के लिए सुरक्षित नहीं हैं।

हॉस्टल के गेट किसी की आजादी को खत्म करने के लिए बंद नहीं किए जाते, बल्कि समाज की घटिया स्थिति को देखते हुए, जहाँ मर्दों का एक गिरोह हर लड़की को घूरने, छूने, मोलेस्ट करने, और बलात्कार करने की फिराक में रहता है, उनकी सुरक्षा हेतु बचाव में उठाया गया एक कदम है। लड़कियाँ हॉस्टल क्यों चुनती हैं? क्योंकि उन्हें लगता है कि बाहर किसी रेंट वाले मकान में रहने से बेहतर कैम्पस के सुरक्षित माहौल में रहना है।

अधिकतर लड़कियों के माता-पिता भी इसी कारण उन्हें हॉस्टलों में रखना चाहते हैं। आजादी की बात करना सही है, मिलनी भी चाहिए, लेकिन क्या हम अपने ही बेहूदे समाज की स्थिति को नकार दें, जहाँ घर से कॉलेज/कार्यालय पहुँचती युवती को पचास बार उसकी कमर और छाती पर किसी हरामखोर लड़के या अधेड़ का अनचाहा स्पर्श मिलता है?

आठ बजे तक हॉस्टल की गेट पर ताला लगना सुरक्षा है, स्वतंत्रता का हनन नहीं। आपको स्वतंत्रता चाहिए तो आप अपने माता-पिता से इजाजत लीजिए और हॉस्टल के बाहर रहिए। आप अपनी जिद के कारण बाकी हर उस लड़की को खतरे में नहीं डाल सकती जो यहाँ पढ़ने आई हैं न कि वामपंथ की कुत्सित राजनीति का हिस्सा बनने। सुरक्षा के विषय पर आगे और भी चर्चा होगी।

कुल मिला कर यह मुहिम सोशल मीडिया पर बेकार के मुद्दों को राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बना कर, सीधे ‘क्लास स्ट्रगल’ और ‘पेट्रियार्की’ से जोड़ दिया गया। इनकी नेत्रियों को देखेंगे तो आप पाएँगे कि कैसे ‘पिंजरा तोड़’ एक बाह्यावरण है, जबकि भीतर में इनकी योजना दंगे भड़काने और सड़कों पर अराजकता फैलाने को ले कर है। आगे, इनकी पूरी यात्रा पर विस्तृत चर्चा होगी कि कैसे इन्होंने कैम्पस में पढ़ाई छोड़ कर सारी बातें की हैं।

‘पिंजरा तोड़’ में पिंजरा है ही नहीं। ये वामपंथियों की एक साजिश है कि वो किसी तरह विद्यार्जन की जगहों को जेएनयू, जाधवपुर, अलीगढ़ और जामिया जैसे वैसे संस्थान बना दें जो अपनी शिक्षा के कारण नहीं, वामपंथियों की हिंसा, सेक्स, जिहाद, आतंकवाद,नक्सलवाद समेत हर वैसे मुद्दे पर चर्चा में आए जिसका छात्र जीवन से कोई वास्ता नहीं। ये हमारे हर कैम्पस को बर्बाद करना चाहते हैं, उसकी लाइब्रेरी में पत्थरबाजी, आगजनी करने वाले दंगाइयों को बिठाना चाहते हैं… युवाशक्ति को तबाह करना इनके वृहद अजेंडे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

‘पिंजरा तोड़’: क्या था और क्या बन गया

इसी संदर्भ में एक और ध्यातव्य बात यह है कि अगर ‘पिंजरा तोड़’, जिसे बच्चियों की एक ईमानदार मुहिम ही मान लें, अपने शुरुआती बातों पर टिका रहता कि उन्हें आज़ादी चाहिए हॉस्टल से रात-बेरात निकलने या वापस आने की, तो भी हम मानते कि 18-22 साल की नवयुवतियाँ हैं, स्कूलों के यूनिफॉर्म वाले दौर से बाहर आई हैं, इन्हें अपने पंखों को विस्तार देने की, स्वयं को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता की मुहिम बनाने में सहयोग की आवश्यकता है।

लेकिन नहीं, हमारी छोटी बहनों, दोस्तों या छोटे-छोटे शहरों से आई बच्चियों को पठन-पाठन से भटका कर उन्हें वामपंथी प्रोपेगेंडा का हिस्सा बना दिया गया। यहाँ हमें ‘स्वच्छन्दता’ की आवश्यकता को भी संदर्भ में ला कर देखने की जरूरत है।

इसमें कोई दोमत नहीं कि हमारी बहनों पर अभी भी हमारा समाज भाइयों से कम ध्यान देता है। चाहे उसका भोजन हो, पढ़ाई हो, कपड़े हों या फिर सामान्य स्वतंत्रता की बातें हो, हमारी बहनें हमारे ही घरों में नकारी जाती रही हैं। कुछ जगहों पर सुधार आया है लेकिन कई समुदायों में अभी भी उनकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। इसी कारण, जब वो एक स्कूल के तंत्र से, समाज के दबाव से बाहर आ कर दिल्ली जैसी जगह में स्वतंत्रता को अलग तरीके से महसूस करती हैं, और उन्हें कोई घाघ वामपंथन भटकाने के लिए तैयार खड़ी हो, तो संभव है कि वो ऐसे चंगुल में फँस सकती हैं।

ये वामपंथन नेत्रियाँ वो हैं जिनका पेट भरा हुआ है, जो एक अभिजात्य परिवार से ताल्लुक रखती हैं, जिनके पिता उन्हें महँगी गाड़ियों से कॉलेज भेजते हैं, जिन पर समाज का वैसा दबाव नहीं है जो प्रथम वर्ष की किसी 17 साल की उस लड़की पर होता है तो बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश, उड़ीसा जैसी जगहों से आती हैं। उन्हें लगता है कि ‘दीदी सही कहती हैं कि लड़के जब बारह बजे तक घूमते हैं, तो हमारे हॉस्टल पर ताला क्यों’।

जबकि, उन्हें पता ही नहीं कि उनकी इस दीदी ने किस-किस तरह के कांड कर रखे हैं। जेएनयू में वामपंथनों को उनके तथाकथित दोस्त कई बार विरोधी छात्र नेताओं को चुनाव से पहले छवि खराब करने के लिए मोहरे के तौर पर इस्तेमाल करते हैं और वो उनके कहने पर ABVP के नेताओं पर ‘सेक्सुअल मोलेस्टेशन’ का आरोप लगा देती हैं। इन्हीं वामपंथनों को उनके वामपंथी नेताओं की असलियत तब पता चलती है जब वो सर्वहारा की लड़ाई लड़ने जंगलों में पहुँचती हैं, और वहाँ वो एक सेक्स स्लेव से ज्यादा कुछ नहीं बन पातीं। ‘क्रांति में तुम्हारा यही सहयोग है’, ‘तुम्हारी देह कम्यून की प्रॉपर्टी है’ कह कर उन्हें बरगलाया जाता है।

इन दीदियों ने ‘पिंजरा तोड़’ शुरु किया था हॉस्टल की समस्याओं को ले कर और अब यह पूरी तरह से डीयू में वामपंथी प्रोपेगेंडा का महिला ब्रिगेड बन कर खड़ा हो चुका है जो हर उस विषय पर भीड़ की शक्ल ले कर पहुँच जाता है, जो वामपंथियों के वृहद अजेंडे का हिस्सा है। आप इनके फेसबुक पोस्ट्स को खँगालेंगे तो ‘पिंजरा तोड़’ की नेत्रियाँ दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों की पूरी आधारशिला रखती प्रतीत होती हैं।

मजदूर दिवस पर इन धूर्त युवतियों के पेज पर पुलिसकर्मियों से ले कर बैंक कर्मचारियों, कम्पनियों के सीईओ, ब्यूरोक्रेट्स आदि को समाज में योगदान न देने वाला बताया गया है। इनकी मूर्खता ऐसे ही समयों पर उजागर होती है जब उनके लिए एक श्रमिक पूज्य है, लेकिन वैसे एक लाख श्रमिकों के घरों को तलाने वाला पूँजीपति दुत्कार योग्य हो जाता है। इन मूढ़ाँगनाओं को कोई यह भी पूछे कि कितने समाज ऐसे हैं जो वामपंथियों के शासन में फले-फूले हैं!

इनके हर पोस्ट से आपको या तो हिन्दू-घृणा नजर आएगी या फिर ये समाज को ‘ब्राह्मण बनाम अन्य’ की तर्ज पर तोड़ने की बातें करती दिखेंगी। इनका एजेंडा साफ है कि हॉस्टल के ताले तो बस एक छलावा हैं, इनकी श्यामल आत्मा उसी रक्तपिपासु वामपंथी एजेंडे पर चल रही है जो देश के हर राज्य को अलग करने का सपना देखता है। इसलिए, ‘पिंजरा तोड़’ नक्सलियों की सम्मोहित राष्ट्रदोही सेना से ज्यादा कुछ भी नहीं है।

इस उपशीर्षक के अंत में एक त्वरित दृष्टि इनके पिछले पाँच महीनों के पोस्ट पर आप दौड़ाएँगे तो आप पाएँगे कि पूरे दिसम्बर, 2019 और जनवरी, 2020 इन्होंने सीलमपुर-जाफराबाद में लोगों को भड़काया है, लोगों को बसों में ढो कर शाहीन बाग लाना, उनके इलाकों में सड़कों को ब्लॉक करने के लिए उकसाना, इनके मुहल्लों में वामपंथी शैली में पैम्फलेटबाजी करना और नारे लगाने पर केन्द्रित रहा है।

इनका मार्च इस बचाव में निकला कि इनका दिल्ली के हिन्दू-विरोधी दंगों में कोई हाथ नहीं है। फिर इन्होंने होली को ‘बहुजन लड़की’ को ‘ब्राह्मण देवता’ द्वारा जलाने की बात कह कर, इसे मोलेस्टेशन का त्यौहार बता कर हिन्दुओं के प्रति घृणा बाँटी। अप्रैल काफी चहल-पहल वाला महीना रहा इनके लिए क्योंकि इनके एजेंडे में छात्रों को हॉस्टलों से कोविड के दौर में घर भेजने की बातें थीं, दूसरे मजहब की गर्भवती महिला के बच्चे के मरने वाला फेक न्यूज था, प्रवासी मजदूरों को ले कर विचित्र सुझाव और घड़ियाली आँसू थे (ये लम्बा चला रहा है इनके पेज पर)।

इन्होंने फेक न्यूज फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जब 20 अप्रैल को इन्होंने यह लिख दिया कि लगभग 200 लोग भूख के कारण लॉकडाउन में मर गए। ऐसा कहीं, कुछ भी नहीं हुआ है। दीदियों का विशुद्ध झूठ है ये। रेंट खत्म करने की बातें, ब्राह्मणवादि पितृसत्ता, ABVP द्वारा स्त्रियों के योगदान को प्रतारित करने की मुहिम को टोकनिज्म कह कर नकारने की बातें आदि में इनका अप्रैल निकाला।

मई में इनका मुख्य फोकस दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा ली जा रही ‘ऑनलाइन परीक्षाओं’ को नकारने का रहा है जो कि अभी भी चल रहा है। हालाँकि ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि इनकी पूरी नौटंकी में आपको बंगाल, पालघर, महाराष्ट्र, दिल्ली आदि नहीं दिखेगा जो कि प्रवासी मजदूरों की समस्या के केन्द्रबिन्दु रहे हैं। यहाँ पर कन्याएँ गेम कर जाती हैं।

नारीवाद है क्या?

‘पिंजरा तोड़’ की मूल अवधारणा कहीं न कहीं नारीवाद से जुड़ी हुई है क्योंकि बार-बार इनके पोस्ट और कुकर्मों के आयोजनों में ‘हर पुरुष कुत्ता है’ या ‘पुरुषों का जहरीला पौरूष’ जैसे वाक्यांश प्रयुक्त होते रहे हैं। नारीवाद बहुत ही सामान्य सा विचार है, जहाँ हम अपने समाज में अपनी बच्चियों, नवयुवतियों, स्त्रियों आदि को वैसे ही अवसर देने की बातें करते हैं जैसे लड़कों, नवयुवकों और पुरुषों को उपलब्ध हैं।

लेकिन इन ढीठ और प्रपंची वामपंथनों का नारीवाद लड़कों को कोसने, घटिया शब्दों से गरियाने या फिर ‘हम भी खड़े हो कर लघुशंका निपटाएँगे’ जैसी हास्यास्पद बातों पर सिमटा हुआ है। इनकी पूरी मुहिम लड़की को लड़का, या स्त्री के पुरुष बना देने पर केन्द्रित है। ‘वो ये कर सकते हैं, तो हम क्यों न करें’ की जिद इन्हें सामाजिक वास्तविकताओं से दूर ले जाती हैं, और अटपटे काम करवाती हैं।

नारीवाद मेरे लिए लड़कियों को समान शिक्षा, भोजन आदि से बढ़ाते हुए उन्हें आर्थिक रूप से स्वतंत्र करना है। नारीवाद मेरे लिए ‘लड़की द्वारा हर उस काम को करना जो लड़के करते हैं’, नहीं है। क्योंकि दोनों दो तरह के होते हैं, दोनों के अपनी उपयोगिताएँ हैं। लेकिन इसका मतलब यह बिलकुल नहीं है कि उपयोगिता के नाम पर हम उन्हें चूल्हे में झोंक दें कि तुम इसी के लिए बनी हो।

नहीं, यह सामाजिक भेदभाव और पितृसत्ता का कुत्सित रूप है। अगर वो घर का काम करना चाहती है तो उसे उसकी भी आजादी मिलनी चाहिए, और अगर वो अपने लिए कोई नौकरी ढूँढती है तो उसकी भी। अलग-अलग उपयोगिता से मेरा तात्पर्य शारीरिक संदर्भ में है कि एक स्त्री ही बच्चे को जन्म दे सकती है, उसे दूध पिलाना भी उसी के द्वारा संभव है, अतः नारीवाद के नाम पर यह हल्ला करना कि वो बच्चे पैदा नहीं करेगी, बेकार की बात है।

जिसे नहीं करना, न करे। लेकिन आपने विवाह किया है, और उसमें दूसरे व्यक्ति की भी उम्मीदें आपके साथ हैं, फिर अचानक एक दिन आप यह कह दें कि आप बच्चे जनने की मशीन नहीं है। आप तलाक लीजिए और उस व्यक्ति को मुक्त कीजिए कि वो अपनी संतान की इच्छा कहीं और से पूरी करे। संतानोत्पत्ति एक प्राकृतिक कार्य है, हर जीव करता है। आप यह चुनाव वैयक्तिक स्तर पर कर सकती हैं लेकिन ‘हम बच्चे पैदा नहीं करेंगे’ की सामूहिक माँग मूर्खता है।

संक्षेप में, कहने का तात्पर्य यह है कि आर्थिक रूप से स्वतंत्र स्त्री न सिर्फ स्वयं को एक खराब माहौल से निकाल सकती है। बल्कि अपने बच्चों का भी जीवन सँवार सकती है। इसलिए, नारीवाद का उद्देश्य लड़कियों के समान अवसर दिलाने से ले कर उन्हें स्वाबलम्बी बनाने पर होना चाहिए, न कि राह भटक कर हिन्दूघृणा और पुरुषों को कुत्ता बताने में। कुत्ता ही बताना है तो बेशक अपने परिवार से शुरु कीजिए, दूसरों के परिवार में मत झाँकिए।

वामपंथियों की पुरानी तकनीक: अंग्रेजी के बड़े शब्दों की अतिवृष्टि

Disenfranchisement of muslims, repressive state machinery, criminalisation of students, marginalised community, Hindutva state, capitalisation, human cost, rhetorical eulogising of women, patriarchal gender roles, devalue women’s labour, communal bigotry, unleash repression, most vulnerable, times of crisis, holi is marked with violence and abuse, bahujan woman, brahmin god, pop culture, celebration of sexual harassment, divisive, anti-people, human chain, revolution, social justice, protest gathering, aggressively performing puja, toxic show of masculinity, nights of struggle, educate-agitate-organise, historically denied, brute show of military power, demonstration of international consolidation of fascist forces, historically marginalised, notions of emancipation, hegemonic nationalism, status quo, infested with patriarchy, fascism, dehumanising, proletariat, historically oppressed…

ये सारे शब्द या वाक्यांश वो हैं जो आपको हर वामपंथी फेफड़े में लिए घूमता मिल जाएगा। वो खाँसेगा तो एंटी-पीपुल निकलेगा, थूक दिया तो ‘ब्रूट शो ऑफ मिलिट्री पावर एंड डिमोन्सट्रेशन ऑफ इंटरनेशनल कन्सॉलिडेशन ऑफ फासिस्ट फोर्सेस’ की फुहाड़ें जमीन पर होंगी। ये तरीका पुराना तो है लेकिन कारगर है।

स्कूल से निकले बच्चों पर जब आप ऐसे भारी शब्द फेंकेंगे तो औपनिवेशिक मानसिकता से सराबोर नववामपंथी या वोक-युवा ‘यो-यो, योर राइट’ कहते हुए गर्दन हिलाएगा कि ऐसी अंग्रेजी बोल रहा है तो सही ही होगा। जबकि ऐसी सारी बातें उस फूड ब्लॉगर की बकैती से ज्यादा कुछ नहीं जो ‘ओपन फ्लेम रोस्टेड एगप्लांट फॉर स्मोकी फ्लेवर, इन एन असॉर्टेड मिक्स ऑफ़ फाइनली चॉप्ड अनियन, गार्लिक, ग्रीन चिली विद अ टच ऑफ एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल’ लिख कर बैंगन के भर्ते की फोटो लगा देता है।

वामपंथी अपने विशुद्ध बकैती को एलिजाबेथन अंग्रेजी में ऐसे लिखते हैं कि भाई, हॉस्टल का गेट नहीं खुला न तो माया सभ्यता वाला प्रलय अभी ही आ जाना है, पूरी सृष्टि की सर्वनाश तय है। मूर्ख लोग डिक्शनरी में भी नहीं देखते कि ‘असॉर्टेड मिक्स’ के नाम पर वो बैंगन की बीजों वाला चोखा दे कर जा चुका है।

पिंजरा तोड़ की एजेंडाबाज नेत्रियाँ

19 फरवरी की एक वीडियो में नताशा नाम की एक लड़की, जो कि दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों को भड़काने के आरोप में दिल्ली पुलिस की सेवा में है, मूलतः मजहबी महिलाओं की एक भीड़ को यह बताती नजर आती है कि सरकार गाँवों के छोटे अस्पतालों को बेच देगी, फिर जितनी भी सरकारी कम्पनियाँ हैं उसको बेच देगी, बीमा कम्पनियों को बेच देगी, सरकारी संपत्ति को बेच जा रही है, रेलवे को बेचने की बात है, बैंक में जो पूँजी है उसको स्टॉक मार्केट में लगा देगी, पेंशन के पैसे को सट्टे पर लगाने वाली है यह सरकार…

इतनी बकैती के बाद उस वीडियो को आगे सुनने की इच्छा नहीं हुई क्योंकि मैं अपनी यूनिवर्सिटी की पढ़ी-लिखी लड़कियों से थोड़ी और उम्मीद रखता था। उन महिलाओं की भीड़ को नताशा यह बता रही है कि असल में जो भी गरीब लोग हैं, वो यहाँ के नागरिक नहीं हैं। आप सोचिए कि एक भीड़ जिसकी शिक्षा का स्तर कम हो, जिसे उनके घरों के पुरुषों ने ढाल बना कर ‘विरोध’ के नाम पर शिफ्टों में बिठा रखा हो, जिसमें से वही चार औरतें हर मीडिया वाले को पहले से पढ़ाया जवाब देती हैं, उन्हें आप ये बता रही हो कि गरीब लोगों के पास नागरिकता नहीं और सरकार सारी सरकारी चीजें बेच रही हैं!

ये तो बस एक उदाहरण है इनकी करतूतों का। फेसबुक के जरिए इन्होंने बार-बार फेक न्यूज फैलाया है जिससे यह साबित किया जा सके कि यहाँ तो डॉक्टर भी संवेदनहीन हैं और उन्होंने गर्भवती महिला को उसके मजहब के कारण लौटा दिया जिससे बच्चा मर गया। जबकि बात यह थी कि वह महिला एनीमिया (रक्ताल्पता) की शिकार थी और सातवीं बार गर्भवती थी, जिससे उसे बेहतर अस्पताल की जरूरत थी।

वैसे ही 200 लोगों के भूखे मरने की बातें इन्होंने लिखी और यह बताना चाहा कि सरकार मे मजदूरों को उनके हाल पर छोड़ दिया है। बजट के विश्लेषण में इन्होंने पहले ही भविष्य में झाँक लिया और उसे बेकार कह दिया। हालाँकि, हर बार इन्हें एक ही पार्टी की सरकार से समस्या होती है। इन्हें गैर-भाजपा सरकारों में आज तक कोई समस्या नहीं दिखी।

इन सारी बातों को देखने का बाद आपको लग जाएगा कि ‘पिंजरा तोड़’ का या उसके समर्थकों का मुख्य उद्देश्य एक ऐसी भीड़ इकट्ठा करना है जो कैम्पस को बर्बाद करने में योगदान देती रहे। इनके प्रमुख उपलब्धियों में बच्चों को क्लास न जाने के लिए प्रेरित करने से ले कर हर उस मुद्दे पर कहीं इकट्ठा होने की बातें हैं जो जेएनयू में चल रहा हो, जामिया में चल रहा हो, AMU में चल रहा हो।

देवांगना और नताशा को बार-बार जामिया कॉर्डिनेशन कमिटी की मीटिंग में पाया गया है। इस पर विस्तृत चर्चा तो आगे होगी, लेकिन यहाँ यह बात देखने योग्य है कि आखिर दिल्ली विश्वविद्यालय की लड़कियाँ जामिया की मुहिम का हिस्सा क्यों बन रही हैं? फिर याद आता है कि व्हाट्सएप आदि के जरिए अब भीड़ इकट्ठा करने में आसानी होती है, लेकिन उसी में से कोई प्लान लीक भी कर सकता है, तो कुछ लोगों को भीतरी कोठरी का हिस्सा बनाया जाता है।

लदीदा और आयशा जैसी जिहादनें हीरोइन बना कर दिखाई जाती हैं। कैमरा तैयार रहता है कि फुल एचडी फोटो ले ली जाए और तुरंत एक गिरोह हरकत में आ जाता है। ऐसे लोग, ऐसे ही फर्जी विरोधों का हिस्सा बन कर यूएन तक हो आते हैं। तो जाहिर है कि ‘पिंजरा तोड़’ की नेत्रियाँ भी तो अपनी जगह ढूँढेंगी, उन्हें भी तो हिस्सा बनना है इस ‘बनते हुए इतिहास’ का!

यही कारण है कि ऐसे छोटे-छोटे समूहों को बड़े-बड़े नाम दे कर लेजिटिमेसी प्रदान की गई जैसे नाटो की प्रासंगिकता खत्म होने के बाद अब जामिया कॉर्डिनेशन कमिटी और जाफराबाद एक्शन ग्रुप टाइप के व्हाट्सएप ग्रुप ही सुडानी क्रांति का निपटारा कर पाएँगे।

बाहरहाल, ऐसी नेत्रियाँ शरजील इमाम जैसे धूर्त कट्टरपंथी के हाथों की कठपुतलियाँ बनीं भीड़ों को इकट्ठा करने वाली वोलेंटियर से ज्यादा कुछ न बन पाईं। इनका काम जगह-जगह की महिलाओं को बरगलाना और उकसाना भर रह गया। इनके पूरे फेसबुक पेज पर आपको इनके वीडियो आदि से दिख जाएगा कि नेतागीरी के नाम पर ये लोग वाकई हिन्दू-विरोधी दंगों की पृष्ठभूमि में कैसे फिट बैठती हैं।

दिल्ली के हिन्दू-विरोधी दंगों में ‘पिंजरा तोड़’ का योगदान

हाल ही में दिल्ली पुलिस ने इन दोनों लड़कियों, देवांगना और नताशा, को जाफराबाद मेट्रो स्टेशन पर भीड़ के साथ होने तथा उन्हें उकसाने के लिए गिरफ्तार किया है। खास कर 22 फरवरी की रात को, पुलिस के अनुसार, पिंजरा तोड़ के सदस्यों ने भीड़ जुटाई थी और कहा था कि वो जाफराबाद मेट्रो स्टेशन पर धरना दें।

हालाँकि ये सारा काम इन्होंने वहाँ की महिलाओं को समर्थन देने के नाम पर किया था लेकिन पुलिस का मानना है कि इनका हाथ और भी गहरे जाता है। उन्होंने कहा है कि ‘पिंजरा तोड़’ समूह एक बाहरी कारण हो सकता है जिसने दिल्ली के हिन्दू-विरोधी दंगों को भड़काने में एक भूमिका निभाई हो।

अगर हम सिर्फ फेसबुक पोस्टों की बात करें, जो ‘पिंजरा तोड़’ के पेज पर अभी भी उपलब्ध है, तो पता चलता है कि 26 जनवरी को सीलमपुर-जाफराबाद इलाके में इन्होंने संविधान की प्रस्तावना का पाठ किया है (जो कि कोई अपराध नहीं है, यह बस उनके वहाँ होने की बात बताने के लिए है)। साथ ही, उसी दिन उन्होंने भारतीय गणतंत्र दिवस पर हर साल की तरह प्रदर्शित होने वाली झाँकी को नकारात्मक तरीके से देखते हुए लिखा कि ये तो सैन्य क्षमताओं का क्रूर प्रदर्शन है और फासीवादी ताकतों का अंतरराष्ट्रीय गठजोड़।

उसी तरह 1, 6, 16, 22, 23, और 24 फरवरी को इनके वहाँ होने के सोशल मीडिया पोस्ट्स हैं जिसमें वो उसी इलाके में हैं जहाँ अंततः दंगे भड़के। साथ ही यह भी कहना आवश्यक है कि जिस तरह से दंगे हुए और जिस तरह से उस इलाके के हर 10-15 घरों की छत पर से पेट्रोल बम, एसिड की बोतलें, गुलेल, पत्थरों और ईंटों के टुकड़ों के ढेर आदि मिले, और जानकारों के हिसाब से इसकी तैयारी में एक महीने से ज्यादा की बातें कही जा रही हैं, उसे भी इस पूरे संदर्भ में रख कर देखना चाहिए।

चाहे जाफराबाद-सीलमपुर में ही घरना पर बैठना हो, या फिर उन्हें बसों में भर कर शाहीन बाग ले जाना हो, पिंजरा तोड़ ने स्वयं ही अपने पेज के माध्यम से ये जानकारियाँ साझा की हैं।

22 और 23 फरवरी का दिन इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है जब ट्रम्प के दिल्ली आने की तैयारी चल रही थी, उसी वक्त फारूक फैजल के राजधानी स्कूल की छत, ताहिर हुसैन का घर और नॉर्थ ईस्ट दिल्ली में कई घरों की छतों पर एक अलग तैयारी चल रही थी। शाहीन बाग में एक सड़क को घेर कर आवाजाही बॉद कर दी गई थी, लेकिन जाफराबाद में वैसा कुछ नहीं हुआ था।

ओवैस सुल्तान खान (Owais Sultan Khan) की एक पोस्ट के मुताबिक, पिंजरा तोड़ की लड़कियों ने वहाँ का महिलाओं को भड़काया कि वो सड़क जाम कर दें। खान ने यह भी लिखा कि वो इसके पक्ष में नहीं हैं क्योंकि इन लड़कियों ने पहले भी दरियागंज में महिलाओं को विरोध में आगे कर दिया, पुलिस से लड़ गईं और फरार हो गईं, जिस कारण वहाँ की महिलाओं को पुलिस उठा कर ले गई।

इन लड़कियों के समूह को अभिजात्य वर्ग का बताते हुए ओवैस खान ने स्पष्ट शब्दों में लिखा कि इनकी फंतासियों के चक्कर में सीलमपुर और ट्रांस-यमुना का इलाका काफी तनावपूर्ण स्थिति में है। ध्यान रहे कि दंगों की पूरी तैयारी इस समय हो चुकी थी और इन इलाकों में अगले दिन व्यवस्थित तरीके से आगजनी, हत्या और रक्तपात होना तय था।

22 फरवरी को भीम आर्मी ने भारत बंद बुलाया था और ‘पिंजरा तोड़’ ने भारत बंद का मतलब जाफराबाद बंद निकाला और दिल्ली के और हिस्सों को जोड़ने वाली एक मुख्य सड़क को शाहीन बाग की शैली में बंद करवा दिया। इसी समय, CAA समर्थकों ने चेतावनी दी थी कि अगर कोई शाहीन बाग की तरह उनके चलने-फिरने के अधिकारों पर हमला किया, तो वो उसका विरोध करेंगे।

आखिर विधायक अब्दुल रहमान की वीडियो अपील के बाद भी कि लोग सड़क जाम न करें, ‘पिंजरा तोड़’ ने लोगों को सड़क को क्यों ब्लॉक किया? आखिर उनका कौन सा हित सध रहा था रोड को ब्लॉक करने में? वहीं के एक लड़के इमरान का भी एक वीडियो है जो बार-बार कह रहा है फेसबुक लाइव में कि यहाँ के लड़के जज्बाती हो रहे हैं, अगर सड़क पर कुछ हो गया तो बहुत बड़ा रूप ले सकता है। क्या ये सारी बातें ‘पिंजरा तोड़’ वालों को नहीं दिख रही थीं या फिर वो मन बना कर आए थे कि शरजील इमाम के अरमानों को मंज़िल तक पहुँचाना है?

अब आप शरजील इमाम और जामिया कॉर्डिनेशन कमिटी की योजना को पुनरावलोकन कीजिए। शरजील ने यही तो कहा था कि भारत के 500 शहरों को मजहब के लोग बंद नहीं कर सकते क्या? एक शाहीन बाग ने दिखा दिया कि ‘हाँ, बंद कर सकते हैं और पुलिस कुछ नहीं कर सकती’। दूसरी बात यह थी कि ट्रम्प के आने का समय था तो शाहीन बाग की बासी खबर से किसी को कुछ खास मजा आता नहीं।

फिर तय तरीके से जाफराबाद बंद किया गया और चौकस तैयारी के साथ लोग बैठ गए। यहाँ, ये लोग बार-बार कपिल मिश्रा पर आरोप लगाते रहे कि उसने धमकी दी है, जबकि मिश्रा ने सिर्फ यह कहा कि अगर सड़क खाली नहीं हुई तो वो भी सड़क पर उतरेंगे। इसमें धमकी कहाँ है, वो किसी को समझ में नहीं आया। 23 फरवरी को ‘सेलिब्रेटिंग इन्क्लाब, की नौंटकी हुई और सड़क पर भीड़ जमा होने लगी।

पृष्ठभूमि तैयार थी, ट्रम्प के दिल्ली पहुँचने का इंतजार था। पुलिस अपनी तैयारी में थी क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति के आने पर पूरा शहर एक बखतरबंद किले में तब्दील हो जाता है। दंगाइयों को इसी मौके का इंतजार था। ‘पिजंरा तोड़’ ने 24 फरवरी को पोस्ट किया कि RSS और भाजपा के गुंडे, लाठी, सरिया और पत्थर ले कर ‘भड़काऊ’ नारेबाजी कर रहे हैं।

जबकि, जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के निकटवर्ती इलाकों में छतों पर पत्थर, एसिड की बोतलें, पेट्रोल बम और हथियार इकट्ठा हो रहे थे। समय बीता और पत्थरबाजी शुरु हुई। पुलिस ट्रम्प की सुरक्षा में बँटी हुई थी, पूरा केन्द्रीय नेतृत्व ट्रम्प की आवभगत में लगा हुआ था और सीलमपुर, मौजपुर, जाफराबाद आदि इलाके में किसी हिन्दू को उसकी बाइक पर ‘जय श्री राम’ के स्टिकर के कारण भीड़ ने लिंच कर दिया।

कहीं आइबी के अंकित शर्मा को ताहिर हुसैन की घर में खींच लिया गया और उसे चाकुओं से दो घंटे तक गोदा! 400 से ज्यादा घायल, 50 से ज्यादा मौतें, करोड़ों की सम्पत्ति का नुकसान। फिर दंगों के बाद जो हिन्दुओं की कहानियाँ सामने आईं कि उनके मंदिर पर हमला हुआ, उनकी बच्चियों के कपड़े उतार लेते थे मजहबी लड़के, समुदाय विशेष के स्कूल पर दिखावे के दो-चार खरोंच, बगल के हिन्दू के स्कूल को पूरी तरह से राख में बदल दिया… पेट्रोल पम्प पर हमला हुआ, हिन्दू की बच्ची की शादी में सिलिंडर वाले इलाके में आग लगाई गई… अनेक कहानियाँ…

ये एक प्रोजेक्ट था जो शरजील इमाम, जामिया कॉर्डिनेशन कमिटी और कई लोगों की मिलीभगत थी। इसमें जामिया के दंगे, फिर जेएनयू में वामपंथियों द्वारा की गई हिंसा जिसमें ABVP के बच्चों को बुरी तरह पीटा गया और मरणासन्न होने तक मारा गया, सब एक शृंखला की कड़ियाँ हैं। कदाचित् ऐसा हो कि कालांतर में आपको इन सारी भीड़ों में कुछ लोग हर जगह मिल जाएँ। वैसी ही एक भीड़ का संचालन ‘पिंजरा तोड़’ की नायिकाएँ भी कर रही थीं।

अब आप सोचिए कि हॉस्टल के ताले खुलवाने की बात को ले कर हुआ विरोध पचास हत्याओं के आरोप में कैसे संलिप्त पाया जाता है! क्या आपको इसमें वामपंथी हरामखोरी की बदबू नहीं आती? क्या आपको यह नहीं लगता कि राष्ट्रीय राजधानी में अलग-अलग कैम्पसों में आगजनी, हिंसा, मारपीट हो, और नॉर्थ कैम्पस में आने वाले बच्चे जिन इलाकों से आते हों, वहाँ दंगों का हो जाना सामान्य घटना तो नहीं है?

चर्चा में बने रहने की मजबूरी

दंगे भी हो गए, शाहीन बाग भी हट गया और कोरोना आ गया, लेकिन ‘पिंजरा तोड़’ को अपनी प्रासंगिकता बनाए रखनी थी। इसलिए, अपनी संलिप्तता के बावजूद लकड़बग्घों के इस गिरोह ने दाँत निपोड़ कर झूठ बोलने से कभी संकोच नहीं किया। इन्होंने शांति की बातें भी कीं। इन्होंने ‘सामुदायिक सद्भाव के लिए शांतिसभा’ जैसी नौटंकियाँ भी बुलाईं।

ऐसी बेहूदगी तो वामपंथियों का मुख्य शृंगार है। ये तो वामपंथी विचारधारा के चेहरे पर लगे उस बड़े नथ के समान है कि आदमी चेहरा देखना छोड़ कर नथ के मोती ही गिनता रह जाता है। इन्होंने अपना कलुषित चेहरा छुपाने के लिए खूब शांतिप्रिय पोस्ट किए लेकिन अब आम आदमी जानता है कि ‘शांतिप्रिय’ और ‘शांतिदूत’ जैसे शब्दों का प्रयोग किनके लिए और किन संदर्भों में होता है।

कोरोना के समय में अपने आप को चर्चा में बनाए रखना इनके लिए आवश्यक था क्योंकि सोशल मीडिया पर ताबड़तोड़ गर्दन झुलाकर जो भुतबाइह इन्होंने किया था, उसके बाद तो कानून के हाथ तो इनके बाल सँवारने आते ही। इसी कारण इन्होंने लगातार दंगा साहित्य रचना जारी रखी और सबसे पहले मजदूरों के सबसे बड़े हिमायती बनते दिखे। गरीबों की बातें कीं, रेंट फ्री करने की बातें हुईं, हॉस्टलों में जो छात्र-छात्राएँ रह रहे थे उनके स्वास्थ्य और सुरक्षा की बातें हुईं…

सारा दृश्य बड़ा मनोरम दिख रहा था। ऐसे में पहले जामिया की तथाकथित छात्रा सफूरा जरगर पकड़ी गई, फिर मीरान हैदर गए भीतर, शरजील को तो पता नहीं कितने राज्यों की पुलिस खोज रही है… और उसके बाद ‘पिंजरा तोड़’ की भी बारी आई और पुलिस इन्हें भी ले गई ताकि पता चले कि ट्रम्प के आने पर, इस वृहद तैयारी के साथ ऐसे दंगे कैसे हो गए और उसी इलाके में जहाँ ‘पिंजरा तोड़’ काफी समय से मौजूद था।

‘शांति’ शब्द और उसके रूपों का दुरुपयोग

‘पिंजरा तोड़’ लकड़बग्घा गिरोह भी वामपंथियों, जिहादियों और तमाम राष्ट्रद्रोहियों की तरह ही ‘शांति’ शब्द के शीलहरण का बराबर का भागीदार रहा है। इनके सारे ‘विरोध प्रदर्शन’ ‘शांतिपूर्ण’ होते हैं। इनके नारे ‘शांतिप्रिय’ तरीके से लगाए जाते हैं और ये हमेशा समर्थकों को ‘शांतिपूर्वक’ कार्य करने की सलाह देते हैं।

इन्होंने इस शब्द का वो हाल कर दिया है कि लोग अब आतंकवादियों के लिए ‘शांतिदूत’ का प्रयोग करते हैं। कोई जिहादी कहीं मारा जाता है तो कहा जाता है कि एक ‘शांतिप्रिय’ आदमी को सेना ने मार गिराया। जैसे पूर्व भारतीय कप्तान अनिल कुंबले जी ने अपने नाम के आगे तो स्पिनर लिखवा रखा था, लेकिन सीधी गेंदे फेंक कर इतने एलबीडब्ल्यू करवाए, कुछ वैसे ही, लेकिन नकारात्मक संदर्भ में, इन वामपंथियों ने ‘शांति’ शब्द को बाकी जनता को बेवकूफ बनाने के लिए इस्तेमाल किया है।

‘पिंजरा तोड़’ ने अपने फेसबुक पर 30 जनवरी को नाबालिग लड़के द्वारा गोली चलाने की घटना पर तो पूरा साहित्य रच दिया है और बताया कि कैसे भाजपा नेता के उकसाने पर उसने गोली चलाई, लेकिन शाहरूख का नाम, ताहिस हुसैन की करतूत, फैसल फारूख की छत आदि उनकी पूरी चर्चा से गायब रही। एक भी बार इन्होंने दंगाई समुदाय से, जिन्होंने अलग-अलग जगहों पर विरोध के नाम पर तीस जानें ले लीं, उसे शांति का संदेश नहीं दिया।

इससे यही झलकता है कि ‘शांति’ शब्द इनके लिए एक माध्यम है ताकि ये अपने गिरोह की शह पर कुछ न कुछ उल्टा करते रहें लेकिन मीडिया लिट्रेचर और कार्यक्रमों में यही लिखा जाए कि ‘पिंजरा तोड़’ द्वारा किए जा रहे शांतिपूर्ण विरोध में’। इसमें आप देखेंगे तो पाएँगे कि इस नौटंकी समूह को मीडिया के किस हिस्से ने ऐसे दिखाया है जैसे वो वेस्टर्न मीडिया की मलाला या ग्रेटा थनबर्ग हो।

रवीश कुमार, ‘द वायर’, ‘स्क्रॉल’, ‘क्विंट’, NDTV आदि ने इन्हें दलाई लामा की तरह दिखाया कि यही लोग हैं तो भारत में साम्प्रदायिक सौहार्द बचा हुआ है वरना… इनकी कवरेज आप देखिए इन जगहों पर चाहे वो इनके जामिया के समय के कथित विरोधों का दौर हो या फिर चार गिन पहले पुलिस के नोटिस के बाद, इन सारे वामपंथी, जिहादियों के हिमायती दंगाइयों को किसी नायक की तरह दिखाया जा रहा है और इनके नाम के आगे ‘स्टूडेंट एक्टिविस्ट’ लिखा जा रहा है!

काहे के स्टूडेंट एक्टिविस्ट? पुलिस पर पत्थर फेंकना, बसों में आग लगाना, भोली-भाली महिलाओं को अपने अजेंडे के लिए सड़क पर बिठा कर दंगों की पृष्ठभूमि तैयार करना… यही तो किया है इन लोगों ने। ‘शांति’ शब्द की ही तरह अर्बन नक्सलियों और जिहादियों को मीडिया ‘एक्टिविस्ट’ के रंग-बिरंगे जरीदार घाघरे में छुपाने की पुरजोर कोशिश करती है, लेकिन हो नहीं पाता।

ऐसे कैसे चलेगा बहन?

इनके वामपंथी एजेंडे का सच सामने आ चुका है। नॉर्थ कैम्पस में इनके लोगों ने ठीक-ठाक सफलता पाई है क्योंकि विद्यार्थी ही नहीं, शिक्षक भी इनके विषैले स्पर्शकों (टेन्टेकल्स) के दायरे में आ गए हैं। अब शिक्षक भी कैम्पस के विरोधों का हिस्सा बन रहे हैं। छात्र-छात्राओं पर सरकार विरोधी प्रदर्शनों में इकट्ठा होने का दवाब लगातार बनाया जा रहा है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के कई छात्र-छात्राओं में मुझसे बात करते हुए बताया कि कैसे वामपंथियों के साथ न होना या न्यूट्रल होना, विद्यार्थियों के पास के विकल्प में है ही नहीं। ऐसे लोगों को नीची नजरों से देखा जाता है, उन्हें उपहास का पात्र बनाया जाता है जैसे कि गैरवामपंथी होना कोई पाप हो।

‘पिंजरा तोड़’ का भांडा फूट गया है। इनके एक पोस्ट पर स्त्री-सुरक्षा की बात दिखी जहाँ पर इन्होंने इस खतरे को स्वीकारा है लेकिन कहा है कि बलात्कारियों को कड़ी सजा देना समाधान नहीं है क्योंकि सजा पाने वालों में इतने लोग इस जाति के हैं, इतने लोग ओबीसी हैं, इतने मायनोरिटी हैं, तो न्याय मिलने की और सुधार की संभावना कम हो जाती है।

अब आप तय कीजिए कि ये लड़कियाँ चाहती क्या हैं? ये जानती हैं कि दिल्ली लड़कियों के लिए असुरक्षित जगह है। ये जानती हैं कि बलात्कार और यौन हिंसा आम बातें हैं, और रात्रि में ये अपराध ज्यादा होते हैं। ये यह भी जानती हैं कि सरकार और प्रशासन को स्त्रियों की सुरक्षा के लिए कदम उठाना चाहिए।

लेकिन, इनको हॉस्टल के ताले खुले चाहिए। साथ ही, अगर तर्क के लिए ही सही, इनके साथ एक गार्ड को भेजा जाए कि अगर ये देर रात में आए, तो यही वो पहली लड़कियाँ होंगी जो चिल्लाएँगी कि उनकी निजता का हनन हो रहा है, ये कैसी सुरक्षा है कि वो जो करना चाह रही हैं वह कार्य किसी गार्ड की उपस्थिति में हो!

मतलब, स्वतंत्रता भी चाहिए, सुरक्षा भी चाहिए, ये भी पता है कि समाज में अपराध हो रहे हैं, सजा की बात हो तो जाति और अल्पसंख्यकों की गणना करने लगती हो… तुम्हें नहीं लगता कि तुम कन्फ्यूज्ड वामपंथन हो? मतलब, वामपंथन हो… कन्फ्यूज्ड तो वो बाय डेफिनिशन होते ही हैं! हें हें हें!