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छत्तीसगढ़ सरकार सब कुछ करने को तैयार, फिर भी ईसाइयों के कब्रिस्तान में पादरी रहे पिता को दफन नहीं कर रहा बेटा: अपनी जिद में सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, 15 दिन से मुर्दाघर में पड़ा है शव

जनजातीय हिन्दू समुदाय के लिए बनाए गए श्मशान में पिता का अंतिम संस्कार करने पर अड़े एक ईसाई की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि है कि वह सभी पक्ष को स्वीकार हो, ऐसा फैसला चाहता है।

छत्तीसगढ़ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि यदि ईसाई व्यक्ति का अंतिम संस्कार हिन्दुओं के श्मशान में किया गया, तो इससे विवाद पैदा होगा। सुप्रीम कोर्ट से पहले छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने ईसाई व्यक्ति को राहत देने से मना कर दिया था। ईसाई व्यक्ति का शव पिछले 15 दिन से मोर्चरी में रखा हुआ है।

क्या है मामला?

छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के रहने वाले रमेश बघेल के पिता सुभाष बघेल की मौत 7 जनवरी, 2025 को हो गई थी। रमेश बघेल एक ईसाई है और उसके दादा हिन्दुओं की महरा जाति से ईसाई बन गए थे। मृतक सुभाष बघेल एक ईसाई पादरी भी रहा था।

सुभाष बघेल की मौत के बाद बेटे रमेश बघेल ने गाँव के श्मशान में उसका ईसाई रीति रिवाज से अंतिम संस्कार करना चाहा था। यहाँ रहने वाले हिन्दुओं और बाकी समुदाय ने इसका कड़ा विरोध किया। हिन्दुओं ने रमेश बघेल से कहा कि वह अपने पिता का अंतिम संस्कार 20 किलोमीटर दूर एक ईसाई श्मशान में करें।

मामले में घटनास्थल पर पहुँची पुलिस ने भी रमेश बघेल से कहा कि वह बिना विवाद के ईसाइयों के श्मशान में अपने पिता का अंतिम संस्कार कर दें। हालाँकि, रमेश बघेल इस बात पर अड़ गया कि उसे इस जनजातीय श्मशान में ही अपने पिता का अंतिम संस्कार करना है।

वह इस मामले में याचिका लेकर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट पहुँच गया। उसने माँग की कि हाई कोर्ट पुलिस और प्रशासन को आदेश दे कि वह इसी जनजातीय श्मशान में अंतिम संस्कार करवाएँ।

क्या बोला छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट?

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में जस्टिस बिभु दत्ता गुरु ने 9 जनवरी, 2025 को इस याचिका की सुनवाई की। हाई कोर्ट में इस मामले में राज्य सरकार ने बताया कि गाँव के श्मशान में ईसाइयों के लिए कोई अलग जगह निर्धारित नहीं है और अगर रमेश बघेल अपने पिता का अंतिम संस्कार ईसाई तरीके से करना चाहता है तो वह 20 किलोमीटर दूर स्थित ईसाई श्मशान में जा सकता है।

राज्य सरकार ने बताया कि इस स्थिति में ग्राम पंचायत को भी कोई शिकायत नहीं है और इसे कोई समस्या भी खड़ी नहीं होगी। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की यह दलील मानते हुए रमेश बघेल की याचिका पर कोई आदेश पारित करने से मना कर दिया।

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “इस रिट याचिका में याचिकाकर्ता द्वारा माँगी गई राहत प्रदान करना उचित नहीं होगा, इससे आम जनता में अशांति और असामंजस्य पैदा हो सकता है।” हाई कोर्ट ने कहा कि पास में ही ईसाई श्मशाम उपलब्ध है, ऐसे में वह राहत नहीं देगा। इस फैसले के खिलाफ रमेश बघेल सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 17 जनवरी, 2025 को छत्तीसगढ़ सरकार को नोटिस जारी कर जवाब माँगा था। मामले में 20 जनवरी, 2024 को भी बहस हुई थी। इस दौरान राज्य सरकार की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्पष्ट किया था कि ईसाई तौर तरीकों से अंतिम संस्कार किए जाने की इजाजत जनजातीय हिन्दू श्मशान में नहीं दी जा सकती।

उन्होंने रमेश बघेल की तरफ से पेश वकील कोलिन गोंसाल्वेस पर आरोप लगाया था कि वह उन जनजातीय लोगों में विवाद पैदा कर रहे हैं, जो ईसाइयत में धर्मान्तरित हो चुके है और जो अभी भी हिन्दू हैं। उन्होंने कहा था कि विवाद से बचने के लिए ईसाई व्यक्ति को 15-20 किलोमीटर दूर स्थित ईसाई श्मशान में ले जाया जाए।

मामले में वकील गोंसाल्वेस ने आरोप लगाया था कि ईसाई व्यक्ति को इसलिए नहीं अनुमति दी जा रही है क्योंकि वह धर्मांतरित है। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने इस बात पर दुख जताया था कि अंतिम संस्कार के लिए व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट तक आना पड़ा था।

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (22 जनवरी, 2025) को इस मामले की दोबारा सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह जल्द ही अपना फैसला दे देगा क्योंकि मृत व्यक्ति का शरीर लम्बे समय से मोर्चरी में रखा हुआ है।

मंगलवार को सुनवाई के दौरान SG मेहता ने कहा , “मान लीजिए कल कोई हिन्दू यह तर्क रखता है कि ‘मैं अपने परिवार के शव का अंतिम संस्कार मुस्लिम कब्रिस्तान में करना चाहता हूँ, क्योंकि उसके पूर्वज मुस्लिम थे या और कुछ थे तथा उसने धर्म परिवर्तन कर हिन्दू धर्म अपना लिया तो स्थिति क्या होगी?”

SG मेहता ने कहा कि इससे कानून व्यवस्था का मुद्दा खड़ा हो जाएगा। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ईसाई व्यक्ति को एम्बुलेंस देने को तैयार है और वह दूसरी जगह स्थित ईसाई कब्रिस्तान में अंतिम संस्कार कर सकता है। उन्होंने साफ़ किया कि गाँव का कब्रिस्तान जनजातीय हिन्दुओं के लिए है, ना कि ईसाइयों के लिए।

वकील गोंसालेवेस ने सुनवाई के दौरान आरोप लगाया कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है। इस पर जस्टिस शर्मा ने कहा कि ऐसा कोई मामला नहीं है। SG तुषार मेहता ने यह भी साफ़ किया कि निजी भूमि पर भी अंतिम संस्कार की अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि इससे जमीन की प्रकृति कृषि या आवासीय से बदल कर पवित्र हो जाती है।

इस मामले में सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने इस बात पर जोर दिया कि ईसाइयों के लिए अलग श्मशान हर जगह होने चाहिए। मामले में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ से एक हलफनामा दायर करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह इस मामले में सबको स्वीकार होने वाला निर्णय चाहता है।

गौमूत्र पीने से 15 मिनट में ठीक हुआ बुखार… IIT मद्रास के डायरेक्टर के बाद Zoho के श्रीधर वेम्बु ने भी ‘औषधीय गुण’ माना, कहा- पारंपरिक ज्ञान के मूल्य को अब पहचान रहा आधुनिक विज्ञान भी

आईआईटी मद्रास के डायरेक्टर वी. कामकोटी के गौमूत्र पर दिए गए बयान ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। उन्होंने गौमूत्र से जुड़ा एक किस्सा शेयर किया, जिसके बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया हुई। लोगों ने इसे वैज्ञानिक तौर आधारहीन करार दिया और कहा कि ऐसे दावे प्रमाणित शोध पर आधारित होने चाहिए। इसी बीच Zoho कंपनी के CEO श्रीधर वेम्बु ने आईआईटी मद्रास के डायरेक्टर वी कामकोटी का समर्थन करते हुए कहा कि आधुनिक विज्ञान हमारे पारंपरिक ज्ञान को मान्यता दे रहा है।

वेम्बु ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, “IIT मद्रास के डायरेक्टर प्रोफेसर कामकोटी एक सम्मानित शोधकर्ता और शिक्षक हैं। उन्होंने गौमूत्र के फायदों पर आधारित वैज्ञानिक शोध के उदाहरण दिए हैं। आधुनिक विज्ञान अब हमारे पारंपरिक ज्ञान का महत्व समझने लगा है। लेकिन ऑनलाइन आलोचक केवल अपने पूर्वाग्रह दिखा रहे हैं, जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। प्रोफेसर कामकोटी, मजबूत बने रहिए। इन आलोचनाओं के आगे झुकने की जरूरत नहीं है।”

इसके अलावा वेम्बु ने अपने एक अन्य ट्वीट में लिखा, “जो लोग गौमूत्र का मजाक उड़ा रहे हैं, वे नहीं जानते कि स्वस्थ व्यक्तियों (खासतौर पर पुराने समाजों, जो आधुनिक खानपान से अछूते रहे हैं) से ली गई फीकल ट्रांसप्लांट और फीकल पिल्स पर वैज्ञानिक रुचि बढ़ रही है। यह प्रक्रिया लाभकारी आंत बैक्टीरिया को बहाल करने में मदद करती है।”

उन्होंने आगे लिखा, “आँत बैक्टीरिया हमारी रोग प्रतिरोधक प्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में बड़ी भूमिका निभाते हैं। इसलिए ‘गौमूत्र और गोबर के फायदेमंद गुण’ कोई अंधविश्वास नहीं है। आधुनिक विज्ञान भी अब इस पर सहमति जताने लगा है। ऑनलाइन आलोचना करने वाले संकीर्ण सोच वाले लोग ही इसे नकारते हैं।”

बता दें कि आईआईटी मद्रास के डायरेक्टर वी. कामकोटी ने एक कार्यक्रम के दौरान दावा किया था कि एक सन्यासी ने बुखार के इलाज के लिए डॉक्टर के पास जाने की बजाय गौमूत्र का सेवन किया और 15 मिनट के भीतर उनका बुखार उतर गया। यह कार्यक्रम पोंगल के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में उन्होंने गौमूत्र को ‘महत्वपूर्ण दवा’ बताया और इसके एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुणों का जिक्र करते हुए कहा कि यह इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS) जैसी बीमारियों में मदद कर सकता है। उन्होंने इसके बाकी औषधीय गुण भी बताए।

ताहिर हुसैन पर क्यों बँटे सुप्रीम कोर्ट के जज, क्यों चुनाव प्रचार के लिए जमानत देना चाहते थे जस्टिस अमानुल्लाह, जस्टिस मित्तल ने क्यों जताई आपत्ति: अब आगे क्या, जानिए सब कुछ एक साथ

सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच दिल्ली दंगों के सरगना ताहिर हुसैन को दिल्ली चुनावों में प्रचार के लिए अंतरिम जमानत देने पर एकमत फैसला देने में नाकाम रही। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ताहिर को अंतरिम जमानत देने के पक्ष में थे, लेकिन जस्टिस पंकज मित्तल इसके पक्ष में नहीं थे। अब इस मामले को बड़े बेंच के पास सुनवाई के लिए भेजा जाएगा।

दरअसल, आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने मुस्तफाबाद से टिकट दिया है। इसको लेकर ताहिर हुसैन ने नामांकन दाखिल करने और दिल्ली विधानसभा चुनाव में प्रचार तक अंतरिम जमानत की माँग की थी। इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय जजों की यह बेंच सुनवाई कर रही थी।

सुनवाई के दौरान जस्टिस मित्तल ने हुसैन की याचिका खारिज कर दी। वहीं, जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि हुसैन को अंतरिम जमानत दी जानी चाहिए। जस्टिस अमानुल्लाह द्वारा असहमति जताए जाने के बाद जस्टिस मित्तल ने कहा, “चूँकि हमारी राय अलग-अलग है, इसलिए रजिस्ट्री को इस मामले को तीसरे न्यायाधीश के गठन के लिए CJI के समक्ष रखना चाहिए।”

न्यायमूर्ति मित्तल ने कहा, “अगर चुनाव लड़ने के लिए अंतरिम जमानत दी जाती है तो इससे भानुमती का पिटारा खुल जाएगा। चूँकि देश में साल भर चुनाव होते रहते हैं, इसलिए हर कैदी यह दलील लेकर आएगा कि वह चुनाव में भाग लेना चाहता है और इसलिए उसे अंतरिम जमानत चाहिए। इससे मुकदमेबाजी के द्वार खुल जाएँगे और इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।”

जस्टिस मित्तल ने यह भी कहा कि हुसैन के खिलाफ गंभीर आरोप हैं और इस बात की बहुत अधिक आशंका है कि अगर उन्हें जेल से बाहर आकर प्रचार करने की अनुमति दी जाती है तो वे गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने दोहराया कि चुनाव प्रचार करने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है। इस बात का फैसला अदालत के विवेक पर निर्भर करता है कि अंतरिम जमानत दी जानी चाहिए या नहीं।

वहीं, जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि ताहिर हुसैन को कुछ शर्तों के साथ अंतरिम जमानत पर रिहा किया जा सकता है। उन्होंने कहा, “यह स्थापित कानून है कि अपराध की गंभीरता ही जमानत के मामलों के लिए एकमात्र मानदंड नहीं है। मेरा मानना ​​है कि उचित शर्तों के अधीन याचिकाकर्ता को जमानत दी जानी चाहिए। जमानत केवल 4 फरवरी 2025 की दोपहर तक ही दी जा सकती है।”

जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि अंतरिम जमानत की शर्तों के रूप में हुसैन पर चुनाव प्रचार के दौरान दिल्ली दंगों के मामलों पर नहीं बोलने का सख्त दायित्व दिया जा सकता है। न्यायाधीश ने कहा, “वह दी गई अवधि समाप्त होने के बाद तुरंत जेल अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण भी करेंगे।”

जस्टिस मित्तल ने हुसैन के खिलाफ आरोपों की गंभीरता को देखते हुए, खासकर इंटेलिजेंस के अधिकारी की मौत से संबंधित मामले में, उन्हें राहत देने पर कड़ी आपत्ति जताई। जस्टिस मित्तल ने कहा कि अगर चुनाव प्रचार अंतरिम जमानत के लिए आधार बनते हैं तो यह भारत जैसे देश में नए मुकदमों का द्वार खोल सकता है।

जस्टिस मित्तल ने यह भी कहा कि अगर हुसैन को वर्तमान मामले में जमानत मिल भी जाती है तो भी वह जेल में ही रहेगा, क्योंकि उसे मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अभी तक जमानत नहीं मिली है। जस्टिस मित्तल ने कहा, “यह (वर्तमान अंतरिम जमानत मामला) एक अकादमिक अभ्यास है! अगर आपको सभी मामलों में जमानत नहीं मिलती है तो इस जमानत का मतलब यह नहीं है कि आप बाहर चले जाएँगे।”

इस जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट को ट्रायल कोर्ट के फैसले का इंतजार क्यों करना चाहिए? हम यह अनुमान नहीं लगा सकते कि उसे जमानत नहीं मिलेगी… अगर हम (सुप्रीम कोर्ट) ट्रायल कोर्ट का इंतजार करेंगे तो यह ऐसा होगा जैसे हम ट्रायल कोर्ट के अधीन हैं।” जस्टिस अमानुल्लाह ने ताहिर हुसैन के खिलाफ मुकदमे की धीमी प्रगति पर भी सवाल उठाया।

जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा, “चार साल में केवल चार या पाँच चश्मदीद गवाहों की जाँच और उनसे पूछताछ की गई। अगर यह मामला इतना महत्वपूर्ण था तो… । वह एक दिन भी बाहर नहीं रहा। आपको किसी को दोषी ठहराने की असीमित स्वतंत्रता नहीं हो सकती। यह संविधान का अनुच्छेद 21 नहीं है, इसे नकार दिया गया है।”

जवानों से लेकर विधायक तक को मरवाया, फिर भी 35 साल तक बचता रहा: बीवी के साथ सेल्फी ने नक्सल कमांडर चलापति को करवा दिया ढेर, जंगल में हुई थी शादी

ओडिशा की सीमा पर स्थित छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में हुई मुठभेड़ में नक्सलियों का बड़ा कमांडर चलापति मारा गया। चलापति ₹1 करोड़ का इनामी नक्सली था और बीते लगभग 35 वर्षों से सुरक्षाबलों से बच कर भाग रहा था। चलापति नक्सलियों की सेंट्रल कमिटी का सदस्य था। आंध्र प्रदेश में 2 बड़े नेताओं की दिनदहाड़े हत्या करवाने से लेकर सुरक्षाबलों पर दर्जनों हमलों करने में उसका हाथ था। चलापति के मरने के पीछे उसका नक्सली पत्नी अरुणा के साथ सेल्फी लेना बड़ा कारण रहा।

गरियाबंद में सोमवार (20 जनवरी, 2025) को चालू हुए इस ऑपरेशन में सुरक्षाबलों ने कुल्हाड़ीघात इलाके में नक्सलियों को घेरा था। इस इलाके में ओडिशा की सीमा से भी सुरक्षाबल घुसे थे। सुरक्षाबलों के ऑपरेशन में 60 नक्सलियों का जत्था फंस गया। इसके बाद दोनों तरफ से हुई फायरिंग में 29 नक्सली मारे गए। यह ऑपरेशन मंगलवार को भी चला। इस ऑपरेशन में मारे गए नक्सलियों में सबसे बड़ा नाम चलापति का था। सुरक्षाबलों को सर्च अभियान के दौरान उसकी लाश मिली।

कौन था नक्सली चलापति?

आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में जन्मे चलापति का असल नाम रामचन्द्र रेड्डी था। उसने विज्ञान से स्नातक और मैसुरु में डिप्लोमा की पढ़ाई भी की हुई थी। दावा है कि यहाँ तक कि वह आंध्र प्रदेश सरकार में भी काम कर चुका था। कुछ जगह दावा किया गया है कि चलापति स्कूल ही नहीं गया था लेकिन हिंदी, अंग्रेजी, उड़िया और तेलुगु पढ़ सकता था।

1990-91 के आसपास वह वामपंथी विचारधारा से प्रेरित होकर नक्सली बन गया और आतंक मचाने वाले संगठन पीपल्स वॉर ग्रुप (PWG) में शामिल हो गया। चलापति इसके बाद धीमे-धीमे बड़ा नाम बनता गया। 2004 में जब कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) बनी तो उसे इसमें प्रमुख जगह दी गई। चलापति इस पार्टी की सेंट्रल कमिटी में शामिल था।

ओडिशा में 13 जवान, आंध्र में MLA मरवाए

चलापति गुरिल्ला आतंक में विशेषज्ञ था। फरवरी, 2008 में उसने ओडिशा के नयागढ़ में एक हमला किया था जिसमें 13 जवान मारे गए थे। यहाँ से वह तमाम हथियार भी लूट ले गया था और सुरक्षाबल घटनास्थल पर ना पहुँच सके, इसके लिए सारे रास्ते पेड़ काट कर ब्लॉक कर दिया था।

चलापति ने ओडिशा और आंध्र प्रदेश की सीमा पर नक्सलियों को मजबूत किया था। उसने सर्वाधिक हमले ओडिशा में ही किए थे। ऐसे ही एक हमले में 2011 में उसने कंधमाल जिले में पुलिस शस्त्रागार को निशाना बनाया था। हालाँकि, पुलिस ने उसे खदेड़ दिया था।

2016 में सुरक्षाबलों के एक बड़े ऑपरेशन, जिसमें 31 नक्सली मारे गए थे, उसका बदला लेने के लिए चलापति ने 2018 में TDP के एक विधायक और एक पूर्व विधायक की विशाखापत्तनम में हत्या करवा दी थी। उनकी गाड़ी को घेर कर नक्सलियों ने फायरिंग की थी। उस पर 2003 में ओडिशा और आंध्र में पुलिस स्टेशन उड़ाने का भी आरोप है।

जंगल में की शादी, सेल्फी से मरा

चलापति ने 2010 के आसपास एक और महिला नक्सली अरुणा से शादी कर ली थी। दोनों जंगल में साथ रहते थे। उनकी सुरक्षा के लिए 15-20 नक्सली लगे रहते थे। उसके बारे में सुरक्षाबलों के पास कोई नई फोटो और जानकारी नहीं थी। हालाँकि, 2016 में सुरक्षाबलों को एक ऑपरेशन के बाद एक स्मार्टफोन मिला था।

इस स्मार्टफोन में अरुणा और चलापति की एक फोटो थी। दोनों ने जंगल के किसी ठिकाने में एक सेल्फी ली थी। इसी से उसके वर्तमान के हावभाव और गतिविधियों की जानकारी सुरक्षाबलों को हुई। सुरक्षाबलो ने इसके बाद उसके ऊपर इनाम भी घोषित किया था।

2024 में लगातार बढ़ती सुरक्षाबलों की कार्रवाई से बचने के लिए उसने हाल ही में छत्तीसगढ़ की गरियाबंद की पहाड़ियों पर अपना ठिकाना बनाया था। लेकिन इस ऑपरेशन में वह मारा गया। इस ऑपरेशन के बाद सुरक्षाबलों को बड़ी मात्रा में हथियार भी बरामद हुए हैं।

बड़ा इमामबाड़ा, छोटा इमामबाड़ा, बेगम का मकबरा… सब UP सरकार की, JPC को बताया- जिन जमीन/संपत्ति पर वक्फ बोर्ड का दावा, उनमें 78% सरकारी… उनके पास कागज नहीं

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश की सरकार ने संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को बताया है कि राज्य की जिन संपत्तियों पर वक्फ बोर्ड दावा कर रहा है, उसका 78 प्रतिशत हिस्सा सरकार का है। इन पर वक्फ बोर्ड का कोई कानूनी मालिकाना हक नहीं है। यूपी सरकार की ओर से राज्य के अल्पसंख्यक कल्याण आयोग की अतिरिक्त मुख्य सचिव मोनिका गर्ग ने अपनी बात रखी।

दरअसल, वक्फ (संशोधन) विधेयक पर संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने मंगलवार (21 जनवरी 2025) को लखनऊ में क्षेत्रीय दौरे की अपनी अंतिम बैठक आयोजित की। यह बैठक JPC प्रमुख एवं भाजपा सांसद जगदंबिका पाल की अध्यक्षता में हुई। बैठक में शिया और सुन्नी वक्फ बोर्ड तथा अल्पसंख्यक आयोग के सदस्यों सहित इससे प्रभावित सभी पक्षों ने भाग लिया।

रिपोर्ट के अनुसार, यूपी सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण आयोग की अतिरिक्त मुख्य सचिव मोनिका गर्ग ने JPC को बताया कि वक्फ बोर्ड का दावा है कि उसके पास राज्य में 14,000 हेक्टेयर जमीन है। इनमें से आधिकारिक रिकॉर्ड में 11,700 हेक्टेयर जमीन सरकारी है। गर्ग ने कहा कि सच्चर कमिटी की रिपोर्ट में भी कहा गया था कि वक्फ बोर्ड जिन 60 संपत्तियों पर दावा कर रहा है, वे सरकारी हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार की राजस्व विभाग ने संयुक्त संसदीय समिति को बताया कि वक्फ बोर्ड जिन जमीनों पर अपना दावा कर रहा है, उनमें से एक बड़ा हिस्सा राजस्व रिकॉर्ड में वर्ग 5 और वर्ग 6 के तहत दर्ज है। वर्ग 5 और 6 में सरकारी संपत्तियाँ और ग्राम सभा की संपत्तियाँ शामिल हैं। दरअसल, उत्तर प्रदेश में वक्फ बोर्ड 1.3 लाख से अधिक संपत्तियों पर दावा कर रहा है।

इन संपत्तियों में ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित) स्मारक, बलरामपुर का सरकारी अस्पताल, लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) की जमीनें सहित कई सरकारी संपत्तियाँ हैं। LDA और आवास विकास विभाग की जिन संपत्तियों पर वक्फ बोर्ड दावा कर रहा है, उन्हें संबंधित नगरपालिकाओं से आधिकारिक तौर पर संबंधित विभागों को आवंटित की गई थीं।

यूपी सरकार ने JPC को बताया कि राज्य में वक्फ संपत्तियों को चिह्नित करने के लिए दिशा-निर्देश और नियम हैं। जब वक्फ बोर्ड किसी भूमि पर दावा करता है तो उस भूमि का 1952 के अभिलेखों से मिलान किया जाता है। मिलान में भूमि वक्फ बोर्ड के स्वामित्व की पाई जाती है तो वह सरकार से उस भूमि पर अतिक्रमण हटाने का अनुरोध कर सकता है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने संयुक्त संसदीय समिति (JPC) से यह भी कहा कि लखनऊ के प्रसिद्ध स्मारक बड़ा इमामबाड़ा, छोटा इमामबाड़ा और अयोध्या में बेगम का मकबरा सरकारी संपत्ति हैं, लेकिन वक्फ बोर्ड गलत तरीके से इन संरक्षित स्मारकों के स्वामित्व का दावा कर रहा है। वक्फ बोर्ड ने जिन संपत्तियों पर अपना अधिकार जताया है, उनमें और भी कई नामी-गिरामी संपत्तियाँ हैं।

सांसद जगदंबिका पाल ने बताया कि JPC अगले संसद सत्र में 31 जनवरी को अपनी रिपोर्ट पेश करेगी। उन्होंने कहा, “JPC पिछले 6 महीने से पूरे देश में लगातार बैठक कर रही है। मुझे पूरा भरोसा है कि हम सब एकमत होकर अपनी रिपोर्ट पेश करेंगे। पिछली बार हमें इसे शीतकालीन सत्र में पेश करना था। हम इस रिपोर्ट को बजट सत्र में पेश करने जा रहे हैं।”

बता दें कि संसद का बजट सत्र 31 जनवरी 2025 से शुरू होकर 4 अप्रैल 2025 तक चलेगा। इस सत्र में केंद्रीय बजट 1 फरवरी 2025 को पेश किया जाएगा। वहीं, वक्फ संपत्तियों को विनियमित करने के लिए 1995 में बनाए गए वक्फ अधिनियम की कुप्रबंधन, भ्रष्टाचार और अतिक्रमण जैसे मुद्दों पर अंकुश लगाने के लिए मोदी सरकार तैयारी कर रही है।

अब्देल अजीज कद्दी ने इजरायल में किया आतंकी हमला, 4 को मारा चाकू: सुरक्षाकर्मियों ने मार गिराया, मोरक्को का नागरिक था इस्लामी आतंकी

इजरायल के बड़े शहर तेल अवीव में मंगलवार (21 जनवरी, 2025) की शाम एक इस्लामी आतंकी ने हमला कर दिया। उसने चाकू से कई लोगों पर वार किया। इस हमले में 4 लोग घायल हुए हैं। सुरक्षाबलों ने आतंकी को मौके पर ही मार गिराया। हमलावर कुछ ही दिन पहले इजरायल के भीतर घुसा था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह हमला तेल अवीव के भीड़भाड़ वाले इलाके में हुआ। चाकू से किए गए इस हमले में तीन युवक जबकि एक अधेड़ घायल हुए हैं। इनमें से 2 को ज्यादा चोटें नहीं आई हैं लेकिन 2 की हालत गंभीर है। घायलों को अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। हमले में इस्तेमाल चाकू भी बरामद हो गया है।

हमलावर को सुरक्षा एजेंसियों ने घटना के कुछ ही मिनट के भीतर मार गिराया था। हमलवार की पहचान अब्देल अजीज कद्दी के तौर पर की गई है। 31 वर्षीय कद्दी मोरक्को का निवासी था। उसके पास से मोरक्को का पहचान पत्र भी मिला है। कद्दी के पास अमेरिकी ग्रीन कार्ड भी था।

कद्दी 18 जनवरी, 2025 को ही इजरायल में आया था। उसने इजरायल के भीतर घुसने के लिए टूरिस्ट वीजा का इस्तेमाल किया था। इजरायल के गृह मंत्री ने बताया है कि एयरपोर्ट पर तैनात अधिकारियों ने उसे देश के भीतर एंट्री देने से मना किया था और सुरक्षा एजेंसियों को सौंप दिया था।

सुरक्षा एजेंसियों ने पूछताछ के बाद उसे छोड़ दिया। कुछ ही दिनों के भीतर उसने यह हमला कर दिया। गृह मंत्री ने सुरक्षा एजेंसी शिन बेत को इस संबंध में जाँच करने के आदेश दिए हैं। हमलावर ने किस उद्देश्य से यह हमला किया, यह साफ़ नहीं हो पाया है।

हमलावर के किसी आतंकी संगठन से जुड़े होने की बात भी अभी सामने नहीं आई है। इस हमले को अभी लोन वुल्फ अटैक माना जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों ने बताया है कि उसकी पृष्ठभूमि में ऐसी कोई जानकारी नहीं थी, जो उसे इजरायल में प्रवेश देने से रोकती।

पुलिस घटनास्थल के आसपास दूसरे हमलावरों की आशंका को लेकर जाँच कर रही है। इससे पहले भी हाल ही में तेल अवीव में एक चाकूबाकी की घटना हुई थी। इसे भी आतंकी हमला ही बताया गया था। इस हमले में एक व्यक्ति घायल हुआ था।

कोविड में जिस केरल मॉडल का ‘लिबरल’ करते थे बखान, उसका CAG ने किया भंडाफोड़: 300% महँगी खरीदी गई PPE किट, खास कंपनी को पहुँचाया गया फायदा

कोरोना महामारी के दौरान पूरे देश में केरल सरकार के ‘केरल मॉडल’ की खूब तारीफ की गई। केरल की तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा की कार्यशैली को ‘लिबरल गैंग’ ने आदर्श माना। लेकिन अब नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने पिनराई विजयन सरकार के कोविड प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि महामारी के दौरान पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (PPE) किट की खरीदारी में बड़े पैमाने पर अनियमितताएँ हुईं और एक खास कंपनी को फायदा पहुँचाया गया।

CAG की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2020 में सरकार ने केरल मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (KMSCL) को PPE किट और अन्य स्वास्थ्य उपकरण खरीदने की विशेष अनुमति दी थी। सरकार ने उस समय PPE किट की अधिकतम दर ₹545 प्रति किट निर्धारित की थी, ताकि आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण रखा जा सके। इसके बावजूद केरल में PPE किट को ₹1,550 प्रति किट की ऊँची दर पर खरीदा गया। यह दर सरकारी सीमा से लगभग 300% अधिक थी।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस खरीद प्रक्रिया में सन फार्मा (San Farma) नाम की कंपनी को विशेष लाभ दिया गया। इस कंपनी को 100% भुगतान एडवांस में दिया गया, जबकि अन्य कंपनियों ने कम दर पर किट देने की पेशकश की थी। CAG ने इस प्रक्रिया को गलत ठहराते हुए कहा कि इससे राज्य को ₹10.23 करोड़ का अतिरिक्त वित्तीय बोझ उठाना पड़ा।

रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च और अप्रैल 2020 के बीच ऊँची कीमत पर की गई खरीदारी ने राज्य के संसाधनों पर अनावश्यक दबाव डाला। जहाँ लाखों किट सस्ती दरों पर खरीदी जा सकती थीं, लेकिन महँगे दामों पर 15,000 किट की खरीदी गई। इसके अलावा राज्य में दवाइयों, मेडिकल सामानों का भारी अभाव रहा। केरल में डॉक्टरों की कमी, दवाइयों की कमी भी रही। सीएजी रिपोर्ट में साफ है कि सस्ते दाम पर पीपीई किट देने वाली कंपनियों को कम ऑर्डर दिया गया, जबकि महँगा पीपीई देने वाली कंपनी को एडवाँस में ज्यादा पैसों का भुगतान किया गया और ऑर्डर भी बड़ा दिया गया।

इस खुलासे के बाद विपक्ष ने सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) सरकार पर हमला बोला है। कॉन्ग्रेस के नेता वी.डी. सतीशन ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि “कोविड महामारी को लोगों की जान बचाने के बजाय सरकार ने अपनी जेबें भरने का अवसर बना लिया।” उन्होंने यह भी कहा कि यह भ्रष्टाचार मुख्यमंत्री पिनराई विजयन और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा की जानकारी में हुआ।

केके शैलजा ने इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्होंने CAG रिपोर्ट अभी तक नहीं पढ़ी है, लेकिन उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए PPE किट की खरीदारी जरूरी थी। उन्होंने कहा कि “महामारी के दौरान PPE किट की भारी कमी थी। कुछ किट महँगे दाम पर खरीदने पड़े, लेकिन लाखों किट सस्ते दामों पर खरीदी गईं।”

उन्होंने यह भी दावा किया कि जब यह मामला विधानसभा में उठाया गया था, तब इसका स्पष्ट उत्तर दिया गया था। उन्होंने कहा, “सिर्फ 15,000 किट ऊँची कीमत पर खरीदी गई थीं, और यह उस समय की परिस्थितियों की वजह से हुआ। विपक्ष इस मुद्दे को बार-बार उठाकर लोगों को गुमराह कर रहा है।”

CAG रिपोर्ट ने राज्य के कोविड प्रबंधन के दौरान हुए वित्तीय दुरुपयोग को उजागर करते हुए इसे ‘गैर-जरूरी खर्च’ बताया है। रिपोर्ट ने संकेत दिया कि खरीदारी के दौरान पारदर्शिता की कमी थी और कुछ कंपनियों को गलत तरीके से लाभ दिया गया।

इस बीच, राज्य सरकार ने CAG रिपोर्ट पर विस्तार से जवाब देने की बात कही है। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने कहा है कि “रिपोर्ट का गहन अध्ययन किया जाएगा, और जरूरत पड़ी तो सरकार उचित जवाब देगी।” वहीं, विपक्ष ने इस मुद्दे को आगे बढ़ाने की योजना बनाई है और इसे विधानसभा में फिर से उठाने का इरादा जाहिर किया है। फिरलहाल, CAG रिपोर्ट के इस खुलासे ने न केवल केरल सरकार के कोविड प्रबंधन पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि उन प्रशंसाओं और पुरस्कारों पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है जो महामारी के दौरान राज्य सरकार को मिले थे।

आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिए हाई कोर्ट में नियुक्त हो सकते हैं ‘ठेके’ पर जज, सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमों का पहाड़ घटाने को की पहल: 62 लाख मामले हैं लंबित

देश के अलग-अलग हाई कोर्ट में बढ़ते मुकदमों के पहाड़ को कम करने के लिए अस्थायी तौर पर जजों की नियुक्ति की जा सकती है। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट विचार कर रहा है। यह जज ‘एड हॉक’ आधार पर लाए जाएँगे। सुप्रीम कोर्ट ने कई हाई कोर्ट में जजों के खाली पदों को लेकर चिंता जताई है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मंगलवार (22 जनवरी, 2025) को सुनवाई करते हुए अस्थायी जजों की नियुक्ति पर टिप्पणी की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह अस्थायी जज, हाई कोर्ट के एक स्थायी जज के साथ बेंच में शामिल हो कर आपराधिक मामले की अपीलों को निपटा सकते हैं। हालाँकि, यह बाकी किसी तरह का मामला नहीं सुनेंगे।

बढ़ते केस चिंता का विषय

CJI संजीव खन्ना, जस्टिस BR गवई और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट में आपराधिक मामले बहुत बढ़ गए हैं। बेंच ने कहा कि ऐसे में हाई कोर्ट में अस्थायी तौर जजों की नियुक्ति का रास्ता जल्द साफ़ किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में हाई कोर्ट में अस्थायी जजों की नियुक्ति को लेकर फैसला दिया था।

इसके बाद ऐसी नियुक्तियों के लिए नियम बनाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि इन नियमों में कुछ संशोधन की जरूरत है। अभी तक के नियमों के अनुसार, अगर किसी हाई कोर्ट में 20% पद खाली हैं, तभी इन अस्थायी जजों की नियुक्ति की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट इन नियमों में बदलाव चाहता है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति को गंभीरता को बताने के लिए कई हाई कोर्ट में लटके आपराधिक मामलों का डाटा भी दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट में 63 हजार जबकि कर्नाटक हाई कोर्ट में 20 हजार ऐसे मामले लटके हैं। पटना हाई कोर्ट और पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट में भी कमोबेश यही स्थिति है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अटॉर्नी जनरल R वेंकटरमणी से इस मामले में सहयोग करने को कहा है। उसने कहा, “हम चाहते हैं कि सभी वकील और अटॉर्नी जनरल इस बात पर विचार करें कि क्या हाई कोर्ट की खंडपीठों में लटके आपराधिक मामलों के निपटान के लिए एड हॉक जजों की नियुक्ति की जा सकती है।”

गौरतलब है कि एड हॉक नियुक्क्तियों को भारत में ‘ठेके वाली भर्तियाँ’ भी कहा जाता है।

2021 में दिया था अस्थायी जजों पर फैसला

हाई कोर्ट के भीतर मामलों के तेज निपटान के लिए एड हॉक जजों की नियुक्ति को लेकर 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 224A का हवाला देते हुए फैसला दिया था। इस अनुच्छेद में एड हॉक जजों की नियुक्ति के बारे में लिखा हुआ है।

अनुच्छेद 224A के अनुसार “किसी भी राज्य के हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस किसी भी समय, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, किसी भी व्यक्ति से, जो उस कोर्ट या किसी दूसरे हाई कोर्ट के जज का पद धारण कर चुका है, उस राज्य के हाई कोर्ट के जज के रूप में बैठने और काम करने का अनुरोध कर सकता है।”

कयास लगाए जा रहे हैं कि अगर एड हॉक जजों की बहाली को लेकर फैसला होता है, तो हाई कोर्ट से रिटायर हो चुके जज ही वापस लाए जाएँगे। इन्हें 1 वर्ष तक के लिए नियुक्त किया जा सकता है। इस पर अभी बाकी नियम बनना बाक़ी है।

62 लाख मुकदमे लटके

देश के अलग-अलग हाई कोर्ट में लंबित मुकदमों का पहाड़ खड़ा हो चुका है। लंबित मामलों की जानकारी देने वाले पोर्टल नेशनल जुडिशियल डाटा ग्रिड (NJDG) के अनुसार वर्तमान में देश के 25 हाई कोर्ट में 62 लाख से अधिक मुकदमे लंबित पड़े हैं। इनमें से 18 लाख से अधिक आपराधिक मामले हैं।

अकेले इलाहाबाद हाई कोर्ट के सामने ही 5.47 लाख आपराधिक मामले में लंबित हैं। इनमें से 4.5 लाख मामले 1 साल से ज्यादा लम्बे समय से लटके हैं। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 1.9 लाख आपराधिक मुकदमे लटके हुए हैं। वहीं पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में भी 1.6 लाख से ज्यादा आपराधिक मुकदमे लटके हुए हैं।

ब्राह्मण होना गर्व की बात, उनका ड्राफ्ट नहीं होता तो संविधान बनने में लगते 25 और साल: जानिए कर्नाटक हाई कोर्ट के जजों ने क्यों बताया ‘वर्ण का प्रतीक’, कहा- इनके लिए आयोजन होते रहने चाहिए

कर्नाटक हाई कोर्ट के दो जजों ने एक ब्राह्मण संगठन द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया। उन्होंने यहाँ ब्राह्मणों के समाज में योगदान की प्रशंसा की और साथ ही ब्राह्मण होना गर्व की बात कहा। उन्होंने ब्राह्मणों की एकता पर काम करने वाले और भी कार्यक्रम आयोजित किए जाने की वकालत की है।

राजधानी बेंगलुरु में ‘विश्वामित्र’ के नाम से 18-19 जनवरी, 2025 को आयोजित किए गए इस कार्यक्रम कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस वेदव्यासाचार्य श्रीशानंद और जस्टिस कृष्णा दीक्षित ने हिस्सा लिया। यह कार्यक्रम अखिल कर्नाटक ब्राह्मण महासभा ने आयोजित किया था।

इस कार्यक्रम में बोलते हुए जस्टिस दीक्षित ने कहा कि ब्राह्मण शब्द जाति का नहीं बल्कि वर्ण का द्योतक होना चाहिए। उन्होंने कहा कि वेद को चार हिस्सों में बदलने वाले वेदव्यास एक मछुआरे के पुत्र थे और रामायण लिखने वाले वाल्मीकि SC या संभवतः ST थे लेकिन ब्राह्मणों ने हमेशा उनका सम्मान किया है।

जस्टिस दीक्षित ने संविधान निर्माण में भी ब्राह्मणों के महत्वपूर्ण योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा, “सात सदस्यों वाली ड्राफ्ट कमिटी में तीन ब्राह्मण थे, अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर, गोपालस्वामी अयंगर और BN राव… डॉ BR अंबेडकर ने भंडारकर संस्थान में कहा था कि अगर BN राव ने संविधान का ड्राफ्ट नहीं बनाया होता, तो इसे तैयार होने में 25 साल और लगते।”

जस्टिस दीक्षित ने कहा कि जब हम ब्राह्मण कहते हैं तो यह गर्व की बात होती है। उन्होंने कहा, “क्यों? क्योंकि उन्होंने (ब्राह्मणों ने) संसार को द्वैत, अद्वैत, विशिष्ट अद्वैत और सुधाअद्वैत जैसे कई सिद्धांत दिए। यह वह समुदाय है जिसने दुनिया को ‘बसाव’ महान दार्शनिक व्यक्तित्व दिए।”

वहीं जस्टिस श्रीशानंद ने इस बात पर जोर दिया कि ब्राह्मणों में एकता लाने वाले कार्यक्रम किए जाते रहने चाहिए। उन्होंने कहा, “कई लोग पूछते हैं कि जब लोग खाने या शिक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं तो ऐसे बड़े आयोजनों की क्या ज़रूरत है। लेकिन यह आयोजन समुदाय को एक साथ लाने और उसके मुद्दों पर चर्चा करने के लिए ज़रूरी हैं। ऐसे आयोजन आखिर क्यों नहीं होने चाहिए?”

जस्टिस श्रीशानंद ने बताया कि जज बनने से पहले वह कई संस्थाओं से जुड़े हुए थे लेकिन अब उनसे दूर हैं।

ताहिर हुसैन को क्यों नहीं मिलनी चाहिए जमानत: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अमानुल्लाह का सवाल, चुनाव प्रचार के लिए जेल से बाहर आना चाहता है दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों का ‘मास्टरमाइंड’

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (21 जनवरी 2025) को दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों के आरोपित और विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम उम्मीदवार ताहिर हुसैन की अंतरिम जमानत याचिका पर सुनवाई की। यह याचिका दिल्ली विधानसभा चुनाव के प्रचार के लिए दायर की गई थी। सुनवाई के दौरान जजों के बीच मामले को लेकर गहरी चर्चा हुई। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की खंडपीठ ने दिल्ली पुलिस से यह स्पष्ट करने को कहा कि ताहिर हुसैन को अंतरिम या नियमित जमानत क्यों न दी जाए।

बता दें कि ताहिर हुसैन पर 2020 के दिल्ली दंगों में शामिल होने और आईबी कर्मचारी अंकित शर्मा की हत्या का गंभीर आरोप है। वह इस मामले में चार साल और दस महीने से जेल में है। इससे पहले, दिल्ली हाई कोर्ट ने उसकी अंतरिम जमानत याचिका खारिज करते हुए सिर्फ नामांकन के लिए कस्टडी पेरोल दी थी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुनवाई की शुरुआत में जस्टिस पंकज मित्तल ने कहा कि ताहिर हुसैन के खिलाफ 11 मामले दर्ज हैं, जिनमें से 9 मामलों में उसे जमानत मिल चुकी है। लेकिन दो मामलों में वह अभी भी जेल में हैं, जिनमें से एक मनी लॉन्ड्रिंग और आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या का मामला है। जस्टिस मित्तल ने टिप्पणी की थी, “जेल में रहते हुए चुनाव लड़ना आसान हो गया है। लेकिन ऐसे लोगों को चुनाव लड़ने से रोकना चाहिए।” उन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ अग्रवाल से यह भी पूछा कि ताहिर हुसैन सिर्फ अंतरिम जमानत की माँग क्यों कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “चुनाव ही जीवन में सबकुछ नहीं है। अगर जमानत लेनी है तो नियमित जमानत के लिए आवेदन करें।”

दूसरी ओर जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने मामले पर अलग नजरिया रखा। उन्होंने दिल्ली पुलिस से सवाल किया कि जब ताहिर हुसैन को अन्य 9 मामलों में जमानत दी जा चुकी है, तो इस मामले में उन्हें जमानत क्यों नहीं मिल सकती। उन्होंने कहा, “अगर अन्य मामलों में वही आरोप हैं और उनमें जमानत मिल चुकी है, तो इस मामले में क्या अलग है? अगर वह मुख्य आरोपित नहीं हैं बल्कि सिर्फ उकसाने का आरोप है, तो पाँच साल से अधिक समय तक जेल में रखने का औचित्य क्या है?”

वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ अग्रवाल ने अपनी दलील में कहा कि ताहिर हुसैन ने चार साल और दस महीने जेल में बिताए हैं। उन्होंने कहा कि हुसैन पर सिर्फ यह आरोप है कि उन्होंने भीड़ को उकसाया। मुख्य आरोपितों को नियमित जमानत दी जा चुकी है। अग्रवाल ने यह भी कहा कि ताहिर हुसैन ने दंगों के समय मदद के लिए कई पीसीआर कॉल किए थे।

सुनवाई के दौरान, जस्टिस मित्तल ने हाई कोर्ट के आदेश में कुछ तथ्यों को लेकर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि हुसैन को हाई कोर्ट से आदेश में गलती सुधारने के लिए अर्जी देनी चाहिए थी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत फिलहाल अंतरिम जमानत देने के पक्ष में नहीं है।

जस्टिस अमानुल्लाह ने ताहिर हुसैन की जमानत याचिका को गंभीरता से लेने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा, “हम मामले की मेरिट पर विचार कर रहे हैं। अगर हमें लगे कि नियमित जमानत का आधार है, तो अंतरिम जमानत क्यों न दी जाए? पाँच साल से अधिक समय से वह जेल में हैं, और जिन मामलों में आरोप समान हैं, उनमें जमानत मिल चुकी है।”

दिल्ली पुलिस की ओर से पेश अधिवक्ता राजत नायर ने अदालत से समय माँगा ताकि वह मामले पर अपनी दलीलें प्रस्तुत कर सकें। इस पर अदालत ने मामले की सुनवाई बुधवार तक स्थगित कर दी।

गौरतलब है कि ताहिर हुसैन पर 2020 के दिल्ली दंगों का मुख्य साजिशकर्ता होने का आरोप है। वो उस समय आम आदमी पार्टी में था और पार्षद था। उसके खिलाफ आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या सहित कई गंभीर आरोप हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने पहले उसे चुनाव के लिए नामांकन भरने के लिए कस्टडी पैरोल दी थी, लेकिन जमानत देने से इनकार कर दिया था। अब हुसैन चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत माँग रहा है।