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‘सत्ता के लालच से कॉन्ग्रेस का वर्तमान धूमिल’ – बोस, जिन्होंने गाँधी-नेहरू को छोड़ फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की

03 मई, 1939 को 81 साल पहले आज ही के दिन नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने फ़ॉरवर्ड ब्लॉक की घोषणा की थी। इसकी स्थापना के पीछे के घटनाक्रम में त्रिपुरी अधिवेशन की सबसे अहम भूमिका मानी जा सकती है।

त्रिपुरी अधिवेशन ने मानो नेहरू से लेकर महात्मा गाँधी और तमाम अन्य नेताओं को देश में और समकालीन नेताओं की दृष्टि में उनकी स्थिति का सटीक आकलन करा दिया था। महात्मा गाँधी और जवाहर लाल नेहरू के साथ-साथ ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार भी सुभाष चन्द्र बोस के करिश्माई व्यक्तित्व और उनकी लोकप्रियता से अच्छी तरह से परिचित थी। यही वजह थी कि ब्रिटिश सरकार ने खुद को हमेशा नेहरू का ज्यादा करीबी माना और वह सुभाष चन्द्र बोस से दूरियाँ बनाकर रखीं।

उस पर सुभाष चन्द्र बोस के ओजस्वी भाषण! महात्मा गाँधी की नाराजगी के बावजूद जबलपुर के तिलवाराघाट में हुए कॉन्ग्रेस के 52वें अधिवेशन में नेताजी को पूरी बुलंदी के साथ अध्यक्ष चुना गया था। महात्मा गाँधी की ओर से उम्मीदवार रहे, पट्टाभि सीतारमैया को 203 मतों से करारी हार मिली। यह हर हाल में अविश्वसनीय थी। इस पर जबलपुर में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा त्रिपुरी अधिवेशन में दिए भाषण ने उनकी रणनीति और उनकी कार्यप्रणाली स्पष्ट कर दी थी।

अध्यक्ष चुने जाने पर अधिवेशन में सुभाष चन्द्र बोस ने अपने भाषण में भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के समकालीन नेताओं में बढ़ रही सत्ता की चाह और उनकी भटकती हुई नीति के बारे में स्पष्ट रूप से चर्चा की, जिसने हार से पहले से ही बौखलाए महात्मा गाँधी से लेकर जवाहर लाल नेहरू, सबको चिंतित कर दिया।

अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस अधिवेशन में नेता जी का भाषण

सुभाष चन्द्र बोस ने जबलपुर में दिए इस भाषण में स्वराज्य के प्रश्न को उठाया और कहा कि यही समय है जब ब्रिटिश सरकार को अल्टीमेटम दे दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों के प्रति हमारे निष्क्रिय बर्ताव और हमारे ऊपर संघीय सरकार लादने का समय बीत चुका है। भाषण का एक हिस्सा कुछ इस तरह से है-

“सर्वप्रथम सत्ता के लोभ के कारण हमारे प्रबंध में जो भ्रष्टाचार घुस आया है, उसे कठोरता से दूर करना होगा। बंधुओं! कॉन्ग्रेस का वर्तमान वातावरण धूमिल हो चुका है और मतभेद उभर आए हैं। फलस्वरूप हमारे अनेक मित्र खिन्न-चित्त और हतोत्साहित हैं। किन्तु मैं अपरिवर्तनीय आशावादी हूँ। आप जिस मेघ को देख चुके हैं, वह गुजरता मेघ है। मुझे अपने देशवासियों के देशप्रेम पर विश्वास है। हमें भरोसा है शीघ्र ही हम इन कठिनाइयों पर विजय पाएँगे। हमारे कार्यकताओं में एकता कायम हो जाएगी।”

जनवरी 29, 1939 को जबलपुर में हुए त्रिपुरी अधिवेशन के दौरान अन्य कॉन्ग्रेस नेताओं के साथ नेताजी सुभाषचंद्र बोस

कट्टर गाँधीवादियों से बढ़ता हुआ मतभेद

लेकिन सुभाष चन्द्र बोस जानते थे कि कॉन्ग्रेस के नेताओं के बीच सत्ता की चाह में शुरू हुआ संघर्ष अब विराम नहीं लेने वाला है। बावजूद इसके वे सदैव ही महात्मा गाँधी के सम्मान में खड़े नजर आए। जबकि गाँधी ने बोस की लोकप्रियता को उनकी दुस्साहस की राजनीति बताया। वो यह भी अच्छे से जानते थे कि जवाहरलाल नेहरू पर गाँधी जी का वरदहस्त है। सुभाष चन्द्र बोस चाहते थे कि ब्रिटिश सरकार के खिलाफ तुरंत बड़ा संघर्ष छेड़ दिया जाए।

उन्होंने त्रिपुरी में ही यह आह्वाहन कर साबित कर दिया था कि वो राष्ट्रव्यापी संघर्ष को आवश्यक मानते थे और इस में किसी भी प्रकार की देरी के पक्ष में नहीं थे। लेकिन वो यह भी जानते थे कि कॉन्ग्रेस के माननीय सदस्य यह नहीं चाहते, इसी कारण स्पष्ट वक्ता सुभाष चन्द्र बोस उनकी राष्ट्रभक्ति पर भी संदेश जताते थे।

गाँधी जी की नाराजगी

1938 के अंतिम माह से सुभाष बोस और कॉन्ग्रेस के अन्य नेताओं के बीच दरार पैदा होनी शुरू हो गई थी। इसके पीछे एक वजह नेताजी द्वारा गैर-कॉन्ग्रेस शासित राज्यों में अन्य दलों को साथ लेकर साझा सरकार बनाने की राय भी थी। वह ऐसा इसलिए करना चाहते थे ताकि बंगाल की सांप्रदायिक शक्तियों को नियंत्रित कर कमजोर किया जा सके, लेकिन महात्मा गाँधी को उनका यह प्रस्ताव अज्ञात कारणों से पसंद नहीं आया और उनके इस मत का विरोध करते हुए कहा कि वो इस प्रयास के पक्ष में नहीं हैं। नेता जी के प्रति उनका नजरिया यहीं से बदलता गया और मतभेदों का सिलसिला शुरू होने लगा। उस समय सुभाष चन्द्र बोस कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष होने के साथ-साथ प्रांतीय कॉन्ग्रेस समिति के भी अध्यक्ष थे।

नेता जी की दूसरी बार और अविश्वसनीय जीत ने सबको हैरान कर दिया और महात्मा गाँधी के साथ ही उनके अन्य सहयोगियों ने भी नेता जी को सबक सिखाने की ठानी। इसके बाद वह समय आया जब महात्मा गाँधी ने एक प्रकार का विक्टिम कार्ड खेलते हुए फरवरी 04, 1939 को एक वक्तव्य में पट्टाभि की हार को अपनी हार बता दिया और कहा कि मुझे यह स्पष्ट हो गया है कि कॉन्ग्रेस प्रतिनिधि अब उनके सिद्धांतों और नीतियों के खिलाफ हैं।

लेकिन महात्मा गाँधी के इस बयान ने सुभाष चन्द्र बोस को निराश किया। सुभाष चन्द्र बोस ने जवाब में कहा- “मेरे लिए यह निराशाजनक होगा कि मैं अन्य लोगों का विश्वास जीतने में तो सफल रहा लेकिन भारत के सबसे महान व्यक्ति का विश्वास जीतने में असफल रहूँ।”

बोस, गाँधी

त्रिपुरी संकट

क्या यह एक संयोग नहीं है कि भारत के जिस इतिहास में, जिस त्रिपुरी संकट को हम पढ़ते हैं, उसमें गाँधी के तब के विचारों को कहीं भी स्थान नहीं दिया गया है। जबकि, यह स्पष्ट है कि जिसे नेहरूवादी इतिहासकारों ने त्रिपुरी संकट का नाम दिया था, वह संकट तो असल में महात्मा गाँधी और कट्टर गाँधीवादियों पर था।

गाँधी जी सुभाष की जीत से आहत ही नहीं बल्कि बेहद निराश थे। उन्होंने यह हार अपने निजी गौरव पर ले ली थी। गाँधी जी के साथ ही उनके करीबी और सहयोगी भी नेता जी के वर्चस्व से निराश थे।

सुभाष बोस कॉन्ग्रेस प्रतिनिधियों की ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा और निष्क्रियता पर कई बार सवाल उठाए थे। वह अक्सर कहते थे कि पुरातनपंथी कॉन्ग्रेसी ब्रिटिश सरकार से समझौता चाहते हैं ना कि आजादी। जबकि इसके विपरीत सुभाष चन्द्र बोस अंग्रेजों के खिलाफ बने हुए माहौल को इस्तेमाल कर उनका उग्रता से दमन कर देना चाहते थे।

नेहरू की भूमिका और नेहरू के भय

यह वो समय था, जब देश में राजनीतिक गतिविधियाँ तेजी से बदल रहीं थीं। वहीं, सुभाष चन्द्र बोस ने त्रिपुरी के समय नेहरू से भी जरूरत से ज्यादा उम्मीदें लगा लीं थीं। वह अंत तक भी सोचते रहे कि नेहरू गाँधी का नहीं बल्कि उनका साथ देंगे। यही वजह थी, जिस कारण नेताजी पंडित नेहरू की नीतियों को विरोधाभासी और व्यक्तिवादी नीतियाँ बताते थे।

नेहरू के प्रति अपनी निराशा को व्यक्त करते हुए सुभाष चन्द्र बोस ने लिखा कि उन्हें नेहरू ने निजी तौर पर नुकसान पहुँचाया है। उन्होंने कहा – “इस संकट में किसी ने हमें इतनी चोट नहीं पहुँचाई है जितनी पंडित नेहरू ने, कितनी दयनीय स्थिति है कि नेहरू त्रिपुरी में मेरे खिलाफ खुले प्रचार में उन पुराने बारह महारथियों के साथ थे।”

ये बारह महारथी वो थे, जिन्होंने गाँधी जी के पट्टाभि सीतारमैय्या की हार को अपनी हार बताते हुए घोषणा के बाद इस्तीफ़ा दे दिया था। गाँधी जी ने कहा था कि जो लोग सुभाष के तरीकों से सहमत नहीं हैं, तो वे कॉन्ग्रेस से हट सकते हैं। इसके बाद कॉन्ग्रेस कार्यकारिणी के 14 में से 12 सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया था।

इस प्रकरण के बीच सुभाष चन्द्र बोस ने लंदन में रहने वाले अपने भतीजे अमिया बोस को अप्रैल 17, 1939 को एक पत्र में लिखा- “नेहरू ने मुझे अपने व्यवहार से बहुत पीड़ा पहुँचाई है। अगर वे त्रिपुरी में तटस्थ भी रहते, तब पार्टी में मेरी स्थिति बेहतर होती। कॉन्ग्रेस में नेहरू की स्थिति बेहद कमजोर हुई है। यहाँ तक कि त्रिपुरी सत्र में जब वो बोल रहे थे, तब उनके खिलाफ हूटिंग तक की गई।” इस प्रकार कॉन्ग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन के बाद से नेहरू ने सुभाष चन्द्र बोस से दूरियाँ बनानी शुरू कर दीं थीं।

लेकिन त्रिपुरी से पहले तक भी सुभाष चन्द्र बोस, नेहरू के प्रति बेहद आदर का भाव रखते थे। जून 30, 1936 से लेकर फरवरी, 1939 तक पत्र भेजने के रिकॉर्ड भी उपलब्ध हैं। सभी पत्रों में नेताजी ने नेहरू जी के प्रति बेहद आदर का भाव दिखाया है।

त्रिपुरी के बाद सुभाष चन्द्र बोस स्पष्ट तौर पर जवाहर लाल नेहरू की भूमिका से आहत थे। नेहरू उस चुनाव में तटस्थ बने रहे और यह जताते रहे कि वो मध्यस्थता कर के अन्य नेताओं के बीच सुभाष चन्द्र बोस को सम्मान दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। हालाँकि वो उस समय सुभाष चन्द्र बोस के साथ खड़े नहीं रहे, जब उहें इसकी ज्यादा आवश्यकता थी।

यह भी सत्य है कि ब्रिटिशर्स ने सुभाष चन्द्र बोस और नेहरू के सम्बन्धों में फूट डालने के हर सम्भव उपाय किए थे। यह बात ब्रिटेन के गृह सचिव ने फरवरी 21, 1929 को लंदन में ब्रिटिश अधिकारियों को भेजी अपनी एक रिपोर्ट में कलकत्ता में कॉन्ग्रेस के सत्र के बाद कही थी।

हार के बदले गाँधी जी का विक्टिम कार्ड

अप्रैल 29, 1939 को कलकत्ता में आयोजित अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस कमिटी की बैठक से पहले बोस और गाँधी जी के बीच कई पत्राचार हुए, लेकिन इनके परिणाम कभी भी संतोषजनक नहीं रहे। इसी तारीख को जवाहर लाल नेहरू और बोस की मुलाक़ात भी हुई, गाँधी जी ने भी उनसे भेंट की। नेहरू चाहते थे कि सभी कार्यकर्ताओं को एक मत यदि कोई कर सकता है तो वो महात्मा गाँधी थे।

इन तीनों दिग्गजों की मुलाक़ात का फिर भी कोई परिणाम नहीं निकला। अब सुभाष चन्द्र बोस त्यागपत्र देने का मन बना चुके थे। उन्होंने कॉन्ग्रेस को अपना त्यागपत्र सौंपा और अपनी असमर्थता जाहिर करते हुए कहा कि वो इस पद पर नहीं रहना चाहते। हालाँकि नेहरू ने उन्हें त्यागपत्र के बारे में फिर से विचार करने की भी राय दी।

नेहरू की बात का समर्थन जयप्रकाश नारायण ने भी किया लेकिन सुभाष चन्द्र बोस अब निश्चय कर चुके थे और वह अपने त्यागपत्र से वापस नहीं हटने वाले थे। हालाँकि इसके बाद महात्मा गाँधी ने सुभाष चन्द्र बोस के साथ अपने विवादों पर सिद्धांत और विचारों का हवाला दिया था और कहा कि स्वराज्य पाने के उनके और सुभाष चन्द्र बोस के तरीके भिन्न हैं। गाँधी के मनमुटाव को दूर करने के लिए रविन्द्रनाथ ठाकुर ने भी पत्र लिखकर भ्रांतियों को दूर करने के प्रयास किए लेकिन गाँधी जी पर इसका भी कोई ख़ास प्रभाव नहीं पड़ा।

लेकिन सुभाष चन्द्र बोस की जीत और उनके त्यागपत्र देने तक महात्मा गाँधी और उनके सहयोगियों ने हर वो प्रयास किए, जिससे पार्टी में महात्मा गाँधी का वर्चस्व बना रहता। इस प्रकार सुभाषचन्द्र बोस के इस्तीफ़े ने देश में एक बार फिर से गाँधीवादियों को अपना वर्चस्व साबित करने का मौका दिया। यही वो वजह बनी, जिसने फॉरवर्ड ब्लॉक की नींव भी रखी।

फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना

अप्रैल 29, 1939 को कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देने के बाद आखिरकार मई 03, 1939 को सुभाष चन्द्र बोस ने कॉन्ग्रेस के अन्दर ही फॉरवर्ड ब्लॉक के नाम से अपनी पार्टी की स्थापना की। कॉन्ग्रेस अभी तक वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहा था और फ़ॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना के कुछ दिन बाद ही सुभाष चन्द्र बोस को कॉन्ग्रेस से ही निकाल दिया गया। कॉन्ग्रेस के भीतर जितने भी वामपंथी संगठन थे, फॉरवर्ड ब्लॉक उन सबका प्रतिनिधि बना।

जून 22, 1939 को फॉरवर्ड ब्लॉक का पहला अधिवेशन नागपुर में आयोजित किया गया और इसमें फ़ॉरवर्ड ब्लॉक को एक सोशलिस्ट पार्टी घोषित किया गया। इसी तारीख को फ़ॉरवर्ड ब्लॉक का आधिकारिक स्थापना दिवस भी तय किया गया। अधिवेशन में फॉरवर्ड ब्लॉक ने अपना नारा दिया – “All Power to the Indian People” फॉरवर्ड ब्लॉक के झंडे में एक बाघ के साथ वामपंथी चिन्ह भी था, जिसका सीधा संदेश सभी वामपंथी दलों को एक झंडे के नीचे एकत्रित करना था।

पहले अधिवेशन के कुछ मूल बिन्दुओं में से एक यह भी था कि सत्ता के मोह में कॉन्ग्रेस द्वारा किए गए भ्रष्टाचार को समाप्त करना और निहित स्वार्थों से कॉन्ग्रेस को मुक्त कर उसे अधिक गतिशील और जीवंत बनाना। सुभाष चन्द्र बोस की अभूतपूर्व नेतृत्व क्षमता के चलते देखते ही देखते फॉरवर्ड ब्लॉक देशभर में लोकप्रिय हो गया और इससे बड़ी तादाद में लोग जुड़ने लगे। लोगों ने बोस के क्रांति के बीहड़ मार्ग को अपनाया।

फॉरवर्ड ब्लॉक ने सबसे ज्यादा महत्व भारत के देशी राज्यों में स्वतंत्रता आन्दोलन को तीव्र करने पर दिया। इस सबके बीच कट्टर गाँधीवादी सुभाष चन्द्र बोस की बढ़ती लोकप्रियता और सफलता से बौखलाते गए। फॉरवर्ड ब्लॉक कॉन्ग्रेस का कोई प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल नहीं था, बल्कि कॉन्ग्रेस में ही जीर्ण विचारधारा से त्रस्त कुछ प्रगतिशीलों और वामपंथी शक्तियों का मोर्चा था, जिसने ब्रिटिश शासन के खिलाफ त्वरित कार्रवाई की माँग की थी।

यह भी स्पष्ट करना जरुरी है कि फॉरवर्ड ब्लॉक का वामपंथ आज के वामपंथ से एकदम भिन्न था। यह मासूम और निर्दोषों के रक्तपात की क्रांति के बजाए ब्रिटिश राज के दमन का संदेश लिए हुए क्रांतिकारियों का संगठन था, जिनकी भर्ती बाद में आजाद हिन्द फ़ौज में की गई।

अगस्त 1939 को फॉरवर्ड ब्लॉक के मुखपत्र के रूप में ‘फॉरवर्ड’ नामक साप्ताहिक पत्रिका जारी की गई, जिसमें फ़ॉरवर्ड ब्लॉक की नीतियों को देशभर में पहुँचाया जाने लगा। ब्रिटिश सरकार इन सब कामों से इतनी आतंकित हुई कि उसने सुभाष चन्द्र बोस की रैलियों को अनुमति देनी बंद कर दी। हालाँकि इसी समय गाँधी और नेहरू खुलकर अपनी जनसभाएँ आयोजित कर सकते थे। अब तक बोस ब्रिटिश सरकार से प्रत्यक्ष मुकाबले में खड़े हो चुके थे।

बाद में फॉरवर्ड ब्लॉक अपने आप एक स्वतन्त्र पार्टी बन गई। द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने से पहले से ही फॉरवर्ड ब्लॉक ने स्वतन्त्रता संग्राम को और अधिक तीव्र करने के लिए जन जागृति शुरू करने का काम किया।

नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के अंतरराष्ट्रीय अभियान

सितम्बर 03, 1939 को मद्रास में सुभाष चन्द्र बोस को ब्रिटेन और जर्मनी में युद्ध छिड़ने की सूचना मिली। हिटलर की सेना ने पोलैंड पर आक्रमण कर दिया। यही वो अवसर था, जिसकी तलाश बोस को एक लम्बे समय से थी। उन्होंने तुरंत घोषणा की कि भारत के पास सुनहरा मौका है और उसे अपनी मुक्ति के लिए अभियान तेज कर देना चाहिए।

सितम्बर 08, 1939 को युद्ध के प्रति पार्टी का रुख तय करने के लिए सुभाष चन्द्र बोस को विशेष तौर से कॉन्ग्रेस कार्य समिति में निमंत्रित किया गया। बोस अपनी निष्ठा के पक्के थे, उन्होंने अपनी राय के साथ यह संकल्प भी दोहराया कि अगर कॉन्ग्रेस यह काम नहीं कर सकती है तो फॉरवर्ड ब्लॉक अपने दम पर ब्रिटिश राज के खिलाफ़ युद्ध शुरू कर देगा। वह जानते थे कि स्वराज्य को लेकर कॉन्ग्रेस के संकल्प आज भी क्षीण हैं।

फॉरवर्ड ब्लॉक ने देशभर में अपने अभियानों से ब्रिटिश सरकार को मजबूर कर दिया था। प्रतिक्रिया में फॉरवर्ड ब्लॉक के सदस्यों को गिरफ्तार किया जाने लगा। बोस को भी कई बार गिरफ्तार किया गया लेकिन वह जेल में अनशन कर बाहर निकल आए।

ब्रिटिश सरकार सुभाष चन्द्र बोस की क्षमता से अनजान नहीं थी। बोस के खिलाफ खुलकर गिरफ्तारी और नजरबंदी के आदेश दिए जाने लगे। इसी बीच नवम्बर 29, 1939 को प्रेजिडेंसी जेल में किया गया उनका ऐतिहासिक अनशन भी हुआ। उन्हें रिहा किया गया, फिर नजरबंद किया गया। यहीं से सुभाष चन्द्र बोस के ब्रिटिशर्स की आँखों में धुल झोंककर विदेश चले जाने और आगे की कहानी शुरू हुई। उन्होंने मुसोलिनी से लेकर हिटलर तक से मुलाकात की। वो किसी भी तरह से भारत को ब्रिटिश राज से मुक्ति दिलाने के पक्षधर थे। आजाद हिन्द रडियो के जरिए वो निरंतर क्रांतिकारियों से जुड़े रहे और अपने दिशा-निर्देश उन तक पहुँचाते रहे।

जर्मन तानाशाह हिटलर और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस

एक आयरिश इतिहासकार यूनन ओ हैल्पिन का कहना है कि जब नेताजी ने जापान और जर्मनी से मदद लेने की कोशिश की तो ब्रिटेन की सरकार ने उन्हें ख़त्म करने का आदेश दिया। हैल्पिन का कहना था कि ब्रिटेन की ख़ुफ़िया सेवा के अधिकारियों को आदेश दिया गया था कि मध्य पूर्व से होकर जर्मनी जाने की कोशिश कर रहे सुभाष चन्द्र बोस को बीच रास्ते में ही ख़त्म कर दिया जाए। हालाँकि, वो कभी इसमें कामयाब नहीं हो सके। नेताजी की मौत के बजाए 1945 में उनके गायब होने की चर्चा को ही इतिहासकारों ने ज्यादा महत्व दिया है।

कितने कामयाब रहे सुभाष?

सुभास चन्द्र बोस की अद्भुत नेतृत्व क्षमता, उनका देशप्रेम और उनका संघर्ष आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का काम करता है। उनका व्यक्तित्व करिश्माई था। 1930 में सुभाष चन्द्र बोस कारावास में ही थे कि चुनाव में उन्हें कोलकाता का महापौर चुन लिया गया। उन्होंने भारतीय सैनिकों की वफ़ादारी को देश हित में और औपनिवेशिक राज के ख़िलाफ़ एकजुट कर प्रेरित किया था।

बचपन से ही स्वामी विवेकानंद और अरविन्द घोष उनकी प्रेरणा रहे। जब उनके साथ के अन्य नेता बस नाम पाने की जद्दोजहद में लगे थे, तब सुभाष चन्द्र बोस ने सिर्फ और सिर्फ त्याग किया – पहले इंडियन सिविल सर्विस (ICS) की नौकरी का, फिर वर्चस्व का, फिर अपनी आजादी का और आखिर में अपनी पहचान तक भी देश के लिए कुर्बान कर दी। 

नवम्बर 1945 में दिल्ली के लाल किले में आजाद हिन्द फौज पर चलाए गए मुकदमे ने सुभाष चन्द्र बोस के वर्चस्व में और वृद्धि की और वे लोकप्रियता के शिखर पर जा पहुँचे। अंग्रेजों के द्वारा किए गए विधिवत दुष्प्रचार और तत्कालीन प्रमुख राजनीतिक दलों के साथ-साथ कट्टर गाँधीवादियों द्वारा सुभाष चन्द्र बोस के विरोध के बावजूद सारे देश को झकझोर देने वाले उस मुकदमे के बाद माताएँ अपने बेटों को ‘सुभाष’ का नाम देने में गर्व महसूस करने लगीं। उनकी कीर्ति का परिचय यह था कि घर-घर में महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का चित्र दिखाई देने लगा।

कॉन्ग्रेस को हमेशा ही सुभाष चन्द्र बोस की क्षमता का पता था

वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस की लोकप्रियता से सर्वाधिक चिंतित पंडित जवाहर लाल नेहरू ही थे। शायद यही वजह है कि नेहरू ने कभी भी सुभाष चन्द्र बोस की मौत की खबरों पर यकीन नहीं किया।

अनुज धर की किताब ‘इंडियाज बिगेस्ट कवर-अप’ में इस बात का खुलासा भी है कि नेहरू आजादी के कई वर्ष बाद भी नेताजी की जासूसी करते रहे। 1964 में जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु के बाद भी 1968 तक नेताजी के परिजनों पर खुफिया एजेसियों की नजर रखी गई।

किताब में खुलासा किया गया है कि नेताजी के सबसे करीबी भतीजे अमिया नाथ बोस 1957 में जापान गए थे और जब इस बात की जानकारी जवाहर लाल नेहरू को मिली तब उन्होंने नवंबर 26, 1957 को देश के विदेश सचिव सुबीमल दत्ता से कहा कि वे टोक्यो में भारतीय राजदूत की ड्यूटी लगाएँ और यह पता करें कि अमिया नाथ बोस जापान में क्या कर रहे हैं? यही नहीं, उन्होंने इस बात की भी जानकारी देने को कहा था कि अमिया बोस भारतीय दूतावास, या जहाँ तथा कथित रूप से नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की अस्थियाँ रखी गई हैं, वहाँ गए थे या नहीं?

गाँधी को दिया राष्ट्रपिता का दर्जा

जुलाई 06, 1944 को आज़ाद हिन्द रेडियो पर अपने भाषण के माध्यम से गाँधी जी को सम्बोधित करते हुए नेताजी ने जापान से सहायता लेने का अपना कारण और आर्जी-हुकूमते-आज़ाद-हिन्द तथा आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना के उद्देश्य के बारे में बताया। इस भाषण के दौरान नेताजी ने महात्मा गाँधी को राष्ट्रपिता कहा और महात्मा गाँधी ने उन्हे ‘नेताजी’ कहा था। निर्णायक युद्ध में विजय के लिए उन्होंने गाँधी जी का आशीर्वाद और शुभकामनाएँ माँगीं। गाँधी जी का कहना था कि आखिर सुभाष चन्द्र बोस ने अपनी जिद को सच कर दिखाया।

स्वतंत्र भारत की घोषणा

सुभाष चन्द्र बोस ने भारत के आजाद होने के लिए अंग्रेजों की घोषणा का इन्तजार नहीं किया बल्कि अक्टूबर 21, 1943 को आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वयं स्वतंत्र भारत की समानांतर सरकार की स्थापना कर भारत को स्वतंत्र घोषित किया। इस सरकार को कई अन्य देशों ने अपनी स्वीकार्यता दी।

1944 को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा आक्रमण किया और कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त भी करा लिया। कोहिमा का युद्ध 4 अप्रैल 1944 से 22 जून 1944 तक लड़ा गया एक भयंकर युद्ध था।

वर्ष 1946 के नौसेना विद्रोह में नेताजी की झलक थी। इस विद्रोह के बाद ही ब्रिटेन को विश्वास हो गया कि अब भारतीय सेना के बल पर भारत में शासन नहीं किया जा सकता और भारत को स्वतन्त्र करने के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। कुछ इतिहासकार यह भी बताते हैं कि अंग्रेजों को भारत से अब कुछ नहीं चाहिए था, सिवाए सुभाष के!

ऑल इंडिया रेडियो आर्काइव्स से सुभाष चन्द्र बोस के एक भाषण के अंश –

नोट – इस लेख में वर्णित तथ्य आजाद हिन्द फ़ौज के आधिकारिक डॉक्यूमेंट, सुभाष चन्द्र बोस के पत्र एवं भाषण और उनकी जीवनियों से लिए गए हैं।

23 जगहों पर वायुसेना ने बरसाए फूल, बंगाल में ममता सरकार ने कोरोना वॉरियर्स को सलामी की नहीं दी इजाजत

कोरोना वॉरियर्स को सलामी देने के लिए भारतीय वायुसेना ने कोलकाता के अस्पतालों के ऊपर हेलिकॉप्टर से फूल बरसाने की योजना बनाई थी, लेकिन वहाँ पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार की इजाजत नहीं मिलने के कारण ये संभव नहीं हो सका। बाकी देश भर में योजनाबद्ध तरीके से यह सलामी दी गई। पूरे देश में 23 स्थानों पर वायुसेना ने फ्रंटलाइन वॉरियर्स को धन्यवाद देते हुए पुष्पवर्षा की।

भारतीय वायुसेना ने अपने अंदाज़ में कोरोना वॉरियर्स को सलामी दी है, उन्हें धन्यवाद दिया है। भारतीय सेना के तीनों अंगों ने मेडिकल कर्मचारियों, पुलिस, सफाईकर्मियों और नागरिकों को कोरोना वायरस आपदा के बीच देशहित में योगदान देने के लिए धन्यवाद दिया। वायुसेना ने फूल बरसाए और फ्लाईपास्ट के जरिए धन्यवाद ज्ञापन किया। श्रीनगर के डल झील के ऊपर से उड़ान भर के भी धन्यवाद दिया गया।

दिल्ली एनसीआर के ऊपर से भी रविवार (मई 3, 2020) को एरियल सैल्यूट देने की योजना बनाई गई है, जो सुबह 10:30 में ही होना था लेकिन मौसम के कारण इसमें थोड़ी देरी की गई। चडीगढ़ के सुखना झील के ऊपर से दो हरक्यूलस स्पेशल ऑपरेशन्स ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट ने सलामी दी। पंचकूला में सरकारी अपस्ताल के सामने भारतीय सेना के बैंड ने सलामी दी। गोवा के पणजी स्थित मेडिकल कॉलेज में नौसेना के हेलिकॉप्टर ने सलामी दी।

भारतोय सेना के एयरक्राफ्ट्स ने दिल्ली राजपथ के ऊपर से भी सलामी दी। वहाँ नेशनल वॉर मेमोरियल के ऊपर भी फूलों की वर्षा की गई। मुंबई में भी इसी तरह का भव्य नजारा देखने को मिला। वहाँ मैरीन ड्राइव के ऊपर से उड़ान भरी गई।

दिल्ली एनसीआर के अलावा मुंबई, जयपुर, गुवाहाटी, अहमदाबाद, पटना, लखनऊ और श्रीनगर में भी भारतीय वायुसेना ने कोरोना वॉरियर्स को धन्यवाद देने के लिए फ्लाईपास्ट किया। सीडीएस विपिन रावत ने दिल्ली में नेशनल वॉर मेमोरियल पर पूरी क्रिया के अनुसार वीरगति को प्राप्त जवानों को भी श्रद्धांजलि दी।

‘अल्लाह आजादी के लड़ाकों को ताकत दे’: पाकिस्तानियों ने हंदवाड़ा मुठभेड़ का मनाया जश्न, ऑफिसर समेत 4 वीरगति को प्राप्त

जम्मू कश्मीर के हंदवारा में आतंकियों से मुठभेड़ के बीच भारतोय सेना और पुलिस के 4 ऑफिसर और जवान फँस गए थे, जिनसे सम्पर्क नहीं हो पा रहा था। अब उन सभी के वीरगति को प्राप्त होने की ख़बर आई है। इनमें दो वरिष्ठ रैंक के अधिकारी हैं, जिनमें एक कर्नल रैंक के और एक मेजर हैं। पाकिस्तानियों ने हंदवारा मुठभेड़ की इस घटना को लेकर सोशल मीडिया पर जश्न मनाना शुरू कर दिया है।

पाकिस्तानी ट्विटर हैंडलों ने इस घटना की तुलना अभिनन्दन प्रकरण से की। बता दें कि शनिवार (मई 2, 2020) की रात वहाँ 12 घंटों तक मुठभेड़ चली।

रात भर संशय के माहौल के बाद अब उन जवानों के वीरगति को प्राप्त होने की ख़बर आई है। उन जवानों में एक जम्मू कश्मीर पुलिस से हैं और एक दूसरे सिक्यॉरिटी फोर्स के। शनिवार दोपहर 3:30 बजे सशस्त्र बलों और आतंकियों के बीच फायरिंग चालू हुई थी। हंदवारा उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा में स्थित है। इससे 1 दिन पहले उरी में पाकिस्तान ने सीजफायर का उल्लंघन किया था, जिसमें 2 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे।

इसी बीच दक्षिण कश्मीर के पुलवामा में स्थित डंगरपोरा में भी दो आतंकियों के मारे जाने की ख़बर है। वहाँ स्थानीय लोगों ने भी आतंकियों के समर्थन में पत्थरबाजी की। वहाँ सीआरपीएफ पर ग्रेनेड से हमला किया गया था। अगर हंदवारा की घटना पर लौटें तो सभी जवान चंजमुल्ला क्षेत्र में फँसे हुए थे। उनकी मुठभेड़ पाकिस्तान से घुसपैठ कर के आए आतंकियों से हुई।

इसी बीच पाकिस्तानी ट्विटर हैंडल्स ने आतंकियों की इस कार्रवाई का समर्थन करते हुए भारत का मजाक बनाया। तैयब ज़हीर ने विंग कमांडर (तब) अभिनन्दन की फोटो शेयर करते हुए इसे कोरोना से जोड़ा और लिखा- ‘स्टे होम, स्टे सेफ‘। बता दें कि पाकिस्तानी एफ-16 को मार गिराने वाले अभिनन्दन वहाँ की फ़ौज के कब्जे में आ गए थे, जिसके बाद भारत ने उनकी सकुशल घर-वापसी सुनिश्चित की थी। तब पूरा देश उनकी राह देख रहा था।

राणा मुबाशिर अली ने बॉलीवुड फिल्मों से तुलना कर भारतीय जवानों और ख़ुफ़िया एजेंसियों को नीचा दिखाने की कोशिश की। उसने दिखाया कि रॉ एजेंट फिल्मों में ‘एक था टाइगर’ के सलमान ख़ान जैसे होते हैं जबकि असल में कुलभूषण जाधव की तरह। साथ ही उसने बच्चियों तक को नहीं छोड़ा। उसने दिखाया कि फिल्मों में कश्मीरी लड़की ‘बजरंगी भाईजान’ के मुन्नी की तरह होती है जबकि असली कश्मीरी लड़की के नाम पर उसने एक बच्ची की फोटो शेयर की, जिसका एक आँख जख्मी हो चुका था और वो पट्टी बाँधे है।

इमरान ख़ान की प्रोफाइल पिक्चर वाले ट्विटर यूजर मलिक ने उस दृश्य को शेयर किया, जहाँ पाकिस्तानी फ़ौज अभिनन्दन को लेकर जाते हुए प्रतीत हो रही है। साथ ही उसने लिखा कि इतिहास उसे फ़रवरी 2019 की याद दिला रहा है। अदनान राजपुर नामक व्यक्ति ने दावा किया कि ये सब पीएम मोदी द्वारा रचा गया ‘ड्रामा’ है, ताकि वो ‘जम्मू कश्मीर में किए जा रहे अत्याचार और कोरोना से निपटने में मिली नाकामी’ से लोगों का ध्यान हटा सकें। एक ने लिखा कि अल्लाह उन ‘आज़ादी के लड़ाकों’ को और ताक़त दे।

दरअसल, हंदवारा में एक इमारत में आतंकियों के छिपे होने की सूचना मिली थी, जिसके बाद जॉइंट ऑपरेशन लॉन्च किया गया था। जवानों ने नागरिकों और उनकी संपत्ति को नुकसान पहुँचाए बिना आतंकियों को मार गिराने का प्रयास किया। आतंकियों को मार गिराने के लिए चार जवान इमारत के भीतर गए, जिनसे संपर्क टूट गया था। वहाँ रजवार में घने जंगल भी हैं, जहाँ और आतंकियों के छिपे होने की आशंका है।

श्रमिक ट्रेन में मजूदरों से किराया, लालू ने चलाई थी मुफ्त रेल: रवीश कुमार ने शेयर की ‘द हिन्दू’ की फेक न्यूज़

रवीश कुमार ने इस बार मोदी सरकार पर निशाना साधने के लिए चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू यादव का गुणगान किया है, जो फ़िलहाल राँची जेल में बंद है। सरकार की पहल के बाद भारतीय रेलवे ने मजदूरों को उनके गृह राज्य भेजने का निर्णय लिया है, जिसके लिए उन्हें कोई शुल्क नहीं देना होगा। रवीश ने झूठा दावा किया कि मजदूरों से किराया लिया जा रहा है जबकि कोसी बाढ़ के समय लालू ने मुफ्त में ट्रेनें चलवाई थी।

रवीश ने लिखा कि लालू प्रसाद ने टीवी के एक शो से मिला एक करोड़ रुपया बाढ़ पीड़ितों के लिए दान कर दिया था, जिसे उस समय की ख़बरों में प्राथमिकता दी गई जबकि तब अगर मोदी सरकार होती तो ख़बर लिखने वाला इसी बात से शुरू करता कि सरकार मुफ्त में लोगों को घर पहुँचाएगी। बकौल रवीश, गृह मंत्रालय ने जिस नोटिफिकेशन में ऐलान किया था कि श्रमिक स्पेशल चलेगी, उसमें लिखा था कि रेलवे पैसा लेगी। रेलवे गाइडलाइन तय करेगी कि टिकटों की बिक्री कैसे होगी।

यहाँ रवीश कुमार ने यह नहीं बताया कि रेलवे रुपए तो लेगी लेकिन किससे? मजदूरों से नहीं। सम्बंधित राज्य सरकारें अपने-अपने नागरिकों को घर लाने का पूरा किराया वहन करेगी। रवीश कुमार ने फेसबुक पर लिखे इस लेख में ज़रूर इस बात का जिक्र किया है कि रेलवे के प्रवक्ता के अनुसार किराया मजदूरों को नहीं, राज्य सरकारों को देना होगा। लेकिन, इसके बावजूद उन्होंने ‘द हिन्दू’ की वो ख़बर शेयर की है, जिसमें सही सूचना नहीं है।

इस ख़बर में ‘द हिन्दू’ ने लोगों के बीच भ्रम का माहौल बनाते हुए फेक न्यूज़ शेयर किया कि मजदूरों को अपने गृह राज्य जाने के लिए 50 रुपए अतिरिक्त किराया देना होगा। सोशल मीडिया पर रोहिणी सिंह जैसे पत्रकारों और सीताराम येचुरी जैसे नेताओं ने धड़ल्ले से इस ख़बर को शेयर कर के मोदी सरकार को बदनाम करने का प्रयास किया। असल में इन स्पेशल ट्रेनों के लिए आम लोगों द्वारा टिकट ख़रीदने का कोई प्रावधान ही नहीं है।

अगर राज्य सरकारें यात्रियों से रुपए वसूलती है तो इसमें मोदी सरकार का क्या दोष? ये एक अलग मुद्दा हो सकता है, अगर ऐसी स्थिति आती है तो। लेकिन, मोदी सरकार और रेलवे को बदनाम करने के लिए सब कुछ जानते हुए भी रवीश ने लिख दिया कि मज़दूर यात्रियों से किराया और 50 रुपए अतिरिक्त लिए जाएँगे। उन्होंने ‘आईटी सेल’ की रट लगाते हुए लिखा:

“आईटी सेल ही एकमात्र राजनीतिक जमात है, जो जनमत बनाता है। आप सभी आईटी सेल के लोगों से गुज़ारिश करें कि आईटी सेल मज़दूरों के हित के लिए लड़े। या फिर लालू प्रसाद के खिलाफ ट्रेंड कराए कि उन्होंने बिहार के बाढ़ पीड़ितों के लिए मुफ्त में ट्रेन चला कर रेलवे का नुकसान कर दिया। पीयूष गोयल के पक्ष में ट्रेंड कराए कि वे आर्थिक रूप से टूट चुके मज़दूरों से किराया लेकर रेलवे का फायदा कराया है। गोयल की मानवता लालू प्रसाद की मानवता से महान है।”

रवीश कुमार का प्रोपेगेंडा पोस्ट

रवीश कुमार ने आईटी सेल की रट लगाते हुए ख़ुद एक सजायाफ्ता घोटालेबाज का महिमामंडन किया और रेलवे के स्पष्टीकरण का जिक्र करते हुए भी उसको नज़रंदाज़ किया। गृह मंत्रालय पहले ही कह चुका है कि ट्रेनों में सोशल डिस्टेन्सिंग से लेकर सभी नियम का पालन कराया जाएगा और 50% क्षमता ही भरी जाएगी। लेकिन क्या रवीश छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से सवाल पूछेंगे, जिन्होंने कहा है कि मजदूरों का किराया राज्य सरकारों से लेना हास्यास्पद है?

शायद नहीं, क्योंकि बघेल कॉन्ग्रेस नेता हैं। सच्चाई ये है कि रेलवे ने मजदूरों और अन्य यात्रियों के लिए कम्प्लीमेंटरी मील और पीने का पानी की भी व्यवस्था की है, ख़ासकर लम्बी दूरी वाले ट्रेनों में। अलग-अलग प्रदेशों ने अपने नोडल अधिकारी तैनात किए हैं। राज्य ही अपने नागरिकों को रेलवे के पास लेकर जाएँगे, जिसके बाद उनकी यात्रा सुनिश्चित की जाएगी। रवीश कुमार ने एक बार फिर से ग़लत ख़बर फैलाई, जो उनकी आदत बन चुकी है।

राज्यपाल के कोरोना पर बयान से ममता बनर्जी नाराज, कहा- सत्ता हड़पने की कोशिश न करिए, आप सरकार का कुछ नहीं कर सकते

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्यपाल के बीच कोरोना संकट को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। अब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्यपाल जगदीप धनखड़ को पत्र लिखकर उनकी भाषाशैली पर सवाल खड़े किए है। पत्र में मुख्यमंत्री ने अधिकारियों के खिलाफ राज्यपाल द्वारा प्रयोग की गई भाषा को निंदनीय बताया है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्यपाल जगदीप धनखड़ को लिखे 14 पृष्ठों के अपने जवाब में कहा कि एक राज्यपाल से एक निर्वाचित मुख्यमंत्री को इस तरह के शब्द और इस तरह की विषय-वस्तु, अभिप्राय और लहजे वाले पत्र भारत के संवैधानिक एवं राजनीतिक इतिहास में पूर्ण रूप से अभूतपूर्व हैं।

उन्होंने कहा कि मेरे और मेरे मंत्रियों तथा मेरे अधिकारियों के खिलाफ आपके शब्द अपमानजनक, असयंमित, भयादोहन करने वाले और निंदनीय बताए जा सकते हैं। ममता ने पत्र के माध्यम से आगे राज्यपाल पर उपदेश देने और संवैधानिक नियमों का खुद पालन किए बगैर उसका प्रवचन देने तथा उल्लंघन करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि राज्यपाल उनकी नीतियों से सहमत नहीं हो सकते हैं, लेकिन दुर्भाग्य से इसे उनके संज्ञान में लाने के अलावा उनके पास और कोई शक्ति नहीं है। कोरोना संकट के इस घड़ी में सत्ता हड़पने की कोशिश न करिए, आप सरकार का कुछ नहीं कर सकते है।

अमर उजाला की खबर के मुताबिक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि इस संकट की घड़ी में सत्ता हड़पने की अपनी कोशिशों तेज करने से बाज आने की मैं आपसे विनती करती हूँ। आपको सोशल मीडिया पर अपने लगातार ट्वीट में आधिकारिक पत्र इस्तेमाल करने से दूर रहना चाहिए।

आपको बता दें कि राज्यपाल ने 24 अप्रैल को 14 पेज का एक पत्र सीएम ममता बनर्जी को भेजा था। इसमें राज्यपाल ने सीएम के पत्र के हर बिंदुओं का उल्लेख कर 37 मुद्दे लिखकर करारा जवाब भेजे थे। इसके बाद भी राज्यपाल ने एक और सीएम के नाम लिखकर ममता सरकार पर कुछ सवाल खड़े किए थे। इसके बाद से ही राज्यपाल और ममता सरकार के बीच कोरोना संकट पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है।

राज्यपाल धनखड़ ने शुक्रवार(1 मई, 2020) को भी ममता सरकार पर राज्य में कोरोना संक्रमितों मरीजों और मौतों के आँकड़े छिपाने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि ममता बनर्जी को आँकड़े छिपाने की बजाय राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था को दुरूस्त करने का काम करना चाहिए। केंद्र सरकार की रिपोर्ट का हवाला देते हुए धनखड़ ने पश्चिम बंगाल में खराब स्थिति की बात कही थी।

राज्यपाल धनखड़ ने ममता बनर्जी सरकार की ओर से मीडिया पर निशाना साधने पर भी सवाल खड़े किए थे। राज्यपाल ने ट्वीट कर लिखा, “चिंतित ममता बनर्जी ने मीडिया को ‘सही से बर्ताव’ करने की चेतावनी दी है। मीडिया को भय में क्यों रखना? छिपाने के लिए कुछ भी नहीं होना चाहिए।”

ओवैसी के पार्षद मुर्तजा ने पत्रकार अमीश देवगन को दी धमकी, पुलिस के साथ कर चुका है बदसलूकी

पत्रकार अमीश देवगन को असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के पार्षद मुर्तजा ने धमकी दी है। अमीश ने उनसे सवाल पूछे थे, इसीलिए गुस्से में AIMIM के नेता ने ‘न्यूज़ 18’ के पत्रकार अमीश देवगन को धमकाया। अमीश ने जब उनसे पूछा कि उन्होंने पुलिस के साथ बदसलूकी क्यों की और ऐसा क्यों कहा कि पहले मंदिर को बंद कराओ, मस्जिद को नहीं- तो पार्षद ने कहा कि आप गुंडागर्दी की बाद करेंगे तो मैं भी यही बात करूँगा।

मुर्तजा ने अमीश को ‘सोशल मीडिया का गुंडा’ बताते हुए सलाह दी कि वो एंकर बन कर बात करें। जब अमीश ने पूछा कि उन्होंने पुलिसकर्मी के गिरेबान और हाथ पकड़ने की कोशिश क्यों की तो उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी में गुंडागर्दी वाला कोई कॉन्सेप्ट ही नहीं है। जब अमीश ने अकबरुद्दीन ओवैसी के ’15 मिनट के लिए पुलिस हटा दो’ वाले बयान की याद दिलाई तो उन्होंने कहा कि वो उनसे सिर्फ़ उनके बारे में सवाल करें।

बाद में वो कहने लगे कि पुलिसकर्मी ने नेमप्लेट छिपाया। मोहम्मद मुर्तजा अली कहने लगे कि यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी तो लॉकडाउन के बाद पूजा की। मोहम्मद मुर्तजा ने अपनी गलती मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वो माफ़ी भी नहीं माँगेंगे क्योंकि पुलिस वाले ने ग़लती की है। अब इस सवाल पूछने के कारण अमीश को अलग-अलग नंबरों से कॉल आ रहे हैं। शो के दौरान ही मुर्तजा बार-देवगन का नाम पूछते रहे।

अमीश देवगन को ओवैसी के पार्षद ने धमकाया

उन्होंने धमकाया कि आपको पता नहीं है क्या आप किससे बात कर रहे हैं, आप अपने जुबान को लगाम दीजिए। उन्होंने धमकाने के अंदाज में नाम पूछा और धमकी दी। अमीश को इसके बाद कई नंबरों से कॉल आए हैं और उन्हें धमकी दी जा रही है। हालाँकि, उन्होंने कहा है कि वो किसी ने नहीं डरेंगे और सच के लिए आवाज़ उठाते रहेंगे। भाजपा नेता अमित मालवीय ने भी अमीश को धमकी दिए जाने की निंदा की है।

बता दें कि मुर्तजा अली का एक वायरल वीडियो में बृहस्पतिवार (अप्रैल 30, 2020) को हैदराबाद के चवन्नी नदी अली बेग में एक मस्जिद के पास अपनी ड्यूटी कर रहे दो कॉन्स्टेबल को धमकाने और ड्यूटी में बाधा डालते हुए देखा गया था। ओवैसी की ही पार्टी का वारिस पठान पहले से ही दिल्ली दंगों के मामले में कई भड़काऊ बयान देने के कारण आरोपित है।

पश्चिम बंगाल: जनता को बताया 572 मामले, केंद्र को बताया 931, CM ममता के कोरोना गणित से राज्यपाल धनखड़ नाराज़

एक बार फिर पश्चिम बंगाल की सरकार कोरोना मरीजों की संख्या को लेकर सवालों से घिर गई है। इस बार ममता बनर्जी सरकार ने राज्य में कोरोना मरीजों की संख्या हेल्थ बुलेटिन में 572, जबकि उसी समय में केन्द्र सरकार को 931 बताई है। इसे लेकर प्रदेश के राज्यपाल जगदीप घनखड़ ने ममता सरकार पर सवाल खड़े किए हैं। साथ ही ममता सरकार पर एक बार फिर सही आँकड़ों को छिपाने के आरोप लगाए हैं।

राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने शनिवार (2 मई, 2020) को इस पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि बंगाल सरकार कोरोना संक्रमण के आँकड़ों पर पर्दा डाल रही है और राज्य वासियों तथा केंद्र सरकार को अलग-अलग जानकारी दे रही हैं। अपने दो ट्वीट में राज्यपाल ने लिखा, कोविड-19 संक्रमण के आँकड़ों पर पर्दा डालने के अभियान को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को बंद करना चाहिए। इसे पारदर्शी रूप से साझा करें।

राज्यपाल ने ट्वीट करके राज्य सरकार के हेल्थ बुलेटिन और केंद्र सरकार को लिखी चिट्ठियों को साझा किया है। राज्यपाल के आरोपों के मुताबिक, ममता सरकार ने 30 अप्रैल तक कोरोना मरीजों की संख्या हेल्थ बुलेटिन 572, जबकि उसी दिन केन्द्र सरकार को स्वास्थ्य सचिव द्वारा भेजी गई चिट्ठी में राज्य के अंदर कोरोना मरीजों की संख्या 931 बताई गई है।

राज्यपाल जगदीप घनखड़ द्वारा ट्वीट की गई चिट्ठी में आप देख सकते हैं कि हेल्थ बुलेटिन में सरकार इस बात का दावा कर रही है कि बंगाल में 30 अप्रैल तक कोरोना पॉजिटिव मामले 572 हैं।

राज्यपाल द्वारा ट्वीट किया गया पत्र

वहीं ट्वीट में केन्द्र सरकार को लिखी गई चिट्ठी में आप देख सकते हैं कि पश्चिम बंगाल के स्वास्थ्य ने केंद्र सरकार को राज्य में 30 अप्रैल तक कोरोनो मरीजों की संख्या 931 बताई है। साथ ही विस्तार से राज्य के ग्रीन, ओरेंज और रेज जोन में आने वाले जिलों के नाम भी दिए गए हैं। इसे लेकर ही राज्यपाल ने ममता बनर्जी को पारदर्शिता बरतने की नसीहत दी है। राज्यपाल ने सवाल करते हुए लिखा कि आखिर आँकड़ों में यह विषमता क्यों है? यह सामंजस्य नहीं होने का परिणाम है।

राज्यपाल द्वारा ट्वीट किया गया केन्द्र सरकार को लिखा पत्र

आपको बता दें कि इससे पहले भी राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाए थे। राज्यपाल ने अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा था कि निःशुल्क राशन गरीबों के लिए हैं, तिजोरियों में बंद करने के लिए नहीं है। धोखाधड़ी करने वालों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।

धनखड़ ने कहा था कि बंगाल में लॉकडाउन का पालन कराने के लिए केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती पर विचार होना चाहिए। दरअसल, बंगाल के कई इलाकों में मुफ्त राशन वितरण में भारी अनियमितताएँ बरते जाने की खबरें सामने आई थीं। इतना ही नहीं पहले भी ममता सरकार पर कोरोना मरीजों की संख्या को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

ग्रेटर नोएडा: मस्जिद के सामने इफ्तार पार्टी आयोजित कर रहा पप्पू और मौसम धराया, 19 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज

देश में जारी लॉकडाउन के बीच सभी प्रकार के धार्मिक और राजनीतिक आयोजनों पर प्रतिबंध है, साथ ही सरकार ने रमजान के बीच लोगों से घरों में ही नमाज अदा करने की अपील की है। इसके बाद भी शुक्रवार को उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में लॉकडाउन के नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए इफ्तार पार्टी का आयोजन किया गया। इस मामले में पुलिस ने दो लोगों को गिरफ्तार करते हुए 19 लोगों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है।

जानकारी के मुताबिक, शुक्रवार (मई 1, 2020) की शाम को ग्रेटर नोएडा के मोहल्ला चौथइया पट्टी में स्थित जामा मस्जिद के सामने पप्पू नाम के एक युवक ने रमजान माह में इफ्तार पार्टी का आयोजन किया। इसके बाद लॉकडाउन के नियमों की अनदेखी करते हुए इफ्तार पार्टी में काफी संख्या में लोग इकट्ठा हो गए। इतना ही नहीं, पार्टी में सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियाँ उड़ाई गईं।

इस बात की जानकारी जैसे ही जेवर पुलिस को हुई, वह तत्काल टीम के साथ मौके पर पहुँच गई। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए मौके से इफ्तार पार्टी के आयोजक पप्पू और मौसम नाम के व्यक्ति को करीब शाम 7 बजे गिरफ्तार कर लिया। साथ ही पुलिस ने पूछताछ के बाद इप्तार पार्टी में शामिल होने वाले 19 लोगों के खिलाफ में लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन करने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया है।

पुलिस उपायुक्त (जोन तृतीय) राजेश कुमार सिंह ने बताया कि थाना जेवर पुलिस को सूचना मिली कि मोहल्ला चौथाइया पट्टी में जामा मस्जिद के सामने पप्पू इफ्तार पार्टी का आयोजन कर रहा है। सूचना पर पहुँची जेवर पुलिस ने पप्पू तथा मौसम को गिरफ्तार कर लिया, जबकि इस मामले में 19 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ है। साथ ही अन्य फरार आरोपितों की तलाश की जा रही है।

इससे पहले भी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, असम के लखीमपुर और कर्नाटक के कोलार की मस्जिदों में लॉकडाउन का उल्लंघन करते हुए नमाज अदा करने के लिए बड़ी संख्या में लोग जमा हो गए थे। इन सभी के खिलाफ पुलिस ने कार्रवाई करते हुए मुकदमा दर्ज किया है।

आपको बता दें कि कोरोना वायरस के लगातार बढ़ते मरीजों की संख्या से चिंतित सरकार ने तीसरी बार लॉकडाउन की अवधि को बढ़ा दिया है, जो कि 17 मई तक लागू रहेगा। इससे पहले योगी सरकार ने प्रदेश के धर्मगुरुओं से बात करते हुए कहा था कि हम आम तौर पर पूजा के लिए मंदिर और नमाज के लिए मस्जिद जाते हैं, लेकिन पूजा-नमाज घर से भी की जा सकती है, क्योंकि आज सबसे अधिक जान बचाना जरूरी है।

इसके बाद धर्मगुरुओं ने लॉकडाउन के चलते लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने और घरों में रहने की अपील की थी। साथ ही रमजान के महीने में घरों में ही नमाज अदा करने और लोगों से घरों में रहकर ही परिवार के साथ इफ्तार करने की अपील भी की थी, लेकिन इन सब के बाद भी कुछ कट्टरपंथी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं।

ताहिर हुसैन को कोर्ट से झटका, जमानत याचिका खारिज: दिल्ली दंगो और अंकित शर्मा हत्या का है आरोपित

दिल्ली हिंदू विरोधी हिंसा के मामले में आरोपित और आम आदमी पार्टी से निष्कासित पूर्व निगम पार्षद ताहिर हुसैन की जमानत याचिका को दिल्ली के कड़कड़डूमा कोर्ट ने शनिवार को खारिज कर दिया है। इसके बाद अब ताहिर हुसैन को फिलहाल जेल में ही रहना होगा। दरअसल ताहिर हुसैन को दिल्ली पुलिस ने आईबी अंकित शर्मा की हत्या और दिल्ली हिंसा में संलिप्तता के चलते गिरफ्तार किया गया था।

दरअसल, अपनी जमानत याचिका में ताहिर हुसैन ने कहा था कि वो निर्दोष है। दिल्ली हिंसा में उसका हाथ नहीं है और पुलिस के पास उसके खिलाफ कोई ठोस सबूत भी नहीं हैं। पुलिस उसे गलत तरीके से फँसा रही है। इससे पहले दिल्ली पुलिस ने ताहिर हुसैन के खिलाफ कठोर अवैध गतिविधियाँ अधिनियम (यूएपीए) के तहत मामला दर्ज किया है।

आपको बता दें कि ताहिर हुसैन पर आइबी कॉन्स्टेबल अंकित शर्मा की हत्या में शामिल होने के साथ-साथ, दिल्ली में हिंसा भड़काने, साजिश रचने समेत कई अन्य मामले दर्ज किए गए हैं। इससे पहले ताहिर हुसैन को दिल्ली पुलिस ने दिल्ली हिंसा मामले में 5 मार्च को गिरफ्तार किया था। दरअसल ताहिर हुसैन अपने वकील के साथ राऊज एवेन्यू कोर्ट में मुँह पर मास्क लगाए सरेंडर करने के लिए पहुँचा था, लेकिन पहले से वहाँ मौजूद दिल्ली पुलिस के विशेष जाँच दल ने गिरफ्तार कर लिया था।

चश्मदीदों के अनुसार, उसकी इमारत में करीब तीन हजार दंगाई जमा थे। वहॉं से हिंदुओं को निशाना बना पत्थरबाजी हुई। पेट्रोल बम फेंके गए। गोलियॉं चलाई गई। उसकी इमारत से पत्थरों और पेट्रोल बम का जखीरा बरामद किया गया था। शुरुआत में आम आदमी पार्टी ने उसका बचाव करने की कोशिश की, लेकिन, जब एक के बाद एक सबूत सामने आते गए तो निलंबित कर आम आदमी पार्टी ने उससे पल्ला झाड़ने की कोशिश की।

ताहिर हुसैन मामले में कोर्ट के आदेश की कॉपी

उल्लेखनीय है कि सीएए, एनआरसी विरोध के नाम पर 23-24 फरवरी को दिल्ली में शुरू हुई हिंदू विरोधी हिंसा में 53 लोगों ने अपनी जान गँवा दी थी। इस हिंसा में 200 से अधिक लोग घायल हुए थे। इस दौरान दंगाइयों ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद, मौजपुर, बाबरपुर, घोंडा, चांदबाग, शिव विहार, भजनपुरा, यमुना विहार इलाकों में सरकारी और निजी संपत्ति को भी काफी नुकसान पहुँचाया था।

हिंसक भीड़ ने मकानों, दुकानों, वाहनों, एक पेट्रोल पम्प को फूँक दिया था और स्थानीय लोगों तथा पुलिस कर्मियों पर पथराव किया था। इस हिंसा मे राजस्थान के सीकर के रहने वाले दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल रतन लाल की गोली लगने से मौत हो गई थी और डीसीपी और एसीपी सहित कई पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए थे। वहीं आईबी में कार्यरत अंकित शर्मा की हत्या करने के बाद उनकी लाश को नाले में फेंक दिया गया था।

एंटोनिया माइनो से खुल कर चर्चा | Nitin Rivaldo in candid conversation with Antonia Maino

इस ‘व्यंग्य साक्षात्कार’ में एंटोनिया माइनो ने कॉन्ग्रेस, राहुल गाँधी, पालघर समेत अपनी सेकुलर विचारधारा पर बातचीत की।

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