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जियो-फेसबुक डील: 788 मिलियन ग्राहक और अंतरराष्ट्रीय बाजार – जरूरत है प्रतिस्पर्धा और निजता के संरक्षण का

जियो-फेसबुक सौदे (Jio FaceBook Deal) पर सभी की निगाह अकड़ी हुई है। इस सौदे की नज़र भारत के रिटेल सेक्टर पर है। इस सेक्टर के काफी हिस्से आज भी असंगठित हैं। लेकिन यह इसकी अप्रयुक्त क्षमता ही तो है, जो इसे पारस्परिक रूप से आकर्षक बनाती है। इस सौदे के चलते फेसबुक ने जियो प्लेटफॉर्म्स के शेयर्स में 9.99% इक्विटी 43,574 करोड़ रुपए में खरीदी है। जहाँ एक तरफ अर्थशास्त्रियों को भारत की आर्थिक वृद्धि नज़र आ रही है, वही दूसरों को उपयोगकर्ता की निजता की सुरक्षा का डर सता रहा है। सब मींज माँज के असल मुद्दा ये बैठता है कि यह सौदा भारतीय अर्थव्यवस्था और नागरिकों के रोजमर्रा के जीवन को कैसे प्रभावित करेगा?

आर्थिक प्रभाव

COVID-19 महामारी से जूझते हुए भी, टेक्नॉलजी सेक्टर में अपना सबसे बड़ा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्राप्त करना, भारत की आर्थिक प्रगति का प्रारंभिक संकेत है। इस सौदे से एक तरफ समस्त उपभोक्ताओं को अत्यंत सहज एवं उच्च टेक्नॉलजी की सुविधा होगी तो दूसरी तरफ छोटे और मध्यम वर्गीय व्यापारियों के लिए बेहतर व्यवसाय के अवसर खुलेंगे, जिनको इ-कॉमर्स के माध्यम से बड़े बाजार की पहुँच प्राप्त होगी।

जियो मार्ट को इस सौदे से एक बहुत महत्वपूर्ण फायदा होगा। वह एक ऐसी वटवृक्ष बन जाएगी, जिसकी छाया में ग्राहक खरीदारी, भुगतान, त्वरित सन्देश एवं सोशल मीडिया का लाभ एक साथ उठा सकेंगे। यह सारी चीज़ें एक जगह होने से कुछ नवांकुर कंपनियों ने अपने गहन विचार व्यक्त किए हैं। नवांकुर कम्पनियों ने बड़ी-बड़ी कम्पनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में असमर्थता दिखाई है और जब देश में दो बड़ी कंपनियाँ एक साथ आ जाए तो यह उनके लिए मुश्किलें पैदा कर सकती है। बाजार में इस बात की भी हलचल है कि यह जोड़ी एकाधिकार (मोनोपोली) उत्पन्न करने में सक्षम है, जिसकी वजह से बाकी कम्पनियों को काफी नुक्सान हो सकता है।

अत: अब यह प्रश्न उठता है कि क्या यह सौदा जो विश्व की सबसे बड़ी सोशल मीडिया कंपनी और देश की सबसे बड़ी दूरसंचार कंपनी के बीच है, वह भारतीय बाजार की प्रतिस्पर्धा पर कितना और किस प्रकार से असर डालता है? इन सभी बातों को मद्देनज़र रखते हुए भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग एवं भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण का काम बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग इस सौदे पर कड़ी नज़र रखेगा ताकि किसी भी तरह से यह सौदा बाजार को हानि न पहुँचाए।

पारस्परिक लाभ

रिलायंस रिटेल को अपने किराने की डिलीवरी प्लेटफॉर्म जियो-मार्ट पर अधिक ग्राहक पाने में व्हाट्सएप अत्यंत मददगार साबित होगा। यह सौदा दोनों खिलाड़ियों के लिए एक जीत है। फेसबुक को ई-कॉमर्स की दुनिया के सबसे तेज़ी से बढ़ते बाजारों में से एक में अपना झंडा गाड़ने का मौका मिला है, वहीं रिलायंस को अपने साझेदार फेसबुक की सोशल मीडिया जगत में लोकप्रियता का लाभ उठाते हुए उसके उपयोगकर्ताओं को अपने रिटेल प्लेटफॉर्म की तरफ आकर्षित करने का। कई और भी रिश्ते हैं, जो इस साझेदारी के माध्यम से सँजोए जा सकते हैं।

अंतरराष्ट्रीय टेक्नॉलजी दिग्गज और भारतीय टेलिकॉम दिग्गज के हाथ मिलाने से ऑनलाइन दुनिया के अन्य क्षेत्रों जैसे- वर्चुअल रियलिटी, फिनटेक, मोबाइल गेमिंग और वीडियो स्ट्रीमिंग के दरवाज़े भी इनके लिए खुल गए हैं। इस दोस्ती ने भारत और अमेरिका के लिए द्विपक्षीय स्तर पर एक साथ आने और एक मज़बूत डेटा एवं टेक्नॉलजी पर साझेदारी हेतु चर्चा करने के लिए नींव तैयार कर दी है। भारत के लिए अमेरिकी डेटा का लाभ उठाने के लिए, CLOUD एक्ट के तहत एक व्यवस्था में प्रवेश करना अनिवार्य है। यह सौदा उस मंज़िल को पाने में अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

निजता पर प्रकोप

जहाँ फेसबुक के पास 400 मिलियन ग्राहक हैं, जियो के पास भी 388 मिलियन ग्राहक हैं। दोनों कंपनियों द्वारा उत्पन्न डेटा की विशाल मात्रा अपने आप में चिंताजनक है। इस डेटा के आदान-प्रदान और एकत्रीकरण का डर सामाजिक चर्चा में उत्पन्न हुआ है। यहाँ पर इतना कहना काफी होगा कि डेटा-शेयरिंग इस सौदे का भाग नहीं है। मल्टी-नेशनल कंपनी होने के कारण फेसबुक के पास उपभोक्ता-डेटा के संरक्षण का अनुभव है। फिर बड़ी कंपनियों के पास निजता बनाए रखने के लिए आधुनिक टेक्नॉलजी इस्तेमाल करने की क्षमता भी तो होती है।

इसके अलावा, भारत में एक मजबूत सिविल सोसाइटी की उपस्थिति एक पहरेदार के स्वरूप में किसी भी उल्लंघन का संकेत देती रहती है। इसके अतिरिक्त भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस पुट्टास्वामी के निर्णय में निजता के मौलिक अधिकार के संरक्षण हेतु कई नियम पारित किए, जिनका उल्लंघन एक दण्डनीय अपराध बताया गया है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट भी एक स्वतंत्र डेटा प्रोटेक्शन अथॉरिटी की आवश्यकता पूरी नहीं कर सकता है। जैसे कि भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग, प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 के उल्लंघन की जाँच करती है उसी प्रकार से डेटा प्रोटेक्शन अथॉरिटी उपयोगकर्ता की निजता के उल्लंघन पर सरकार एवं निजी कंपनियों पर मुकदमा चलाने का अधिकार रखती है। इस टेक्नॉलजी के दौर में, भारत की आर्थिक वृद्धि और नागरिकों की निजता के संरक्षण के लिए सरकार को जल्द से जल्द एक प्रगतिशील डेटा संरक्षण कानून पारित करने की ज़रूरत है।

जियो-फेसबुक की इस जोड़ी का योग भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत लाभदायक साबित होगा। यह सौदा भारतीय उपभोक्ताओं और व्यापारियों के सशक्तिकरण में अत्यंत प्रगतिशील होने के साथ साथ भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई दरवाज़े खोलने की क्षमता रखता है। आर्थिक एवं सामाजिक वृद्धि के मार्ग पर चलते रहने के लिए इस जोड़ी पर प्रतिस्पर्धा और निजता को संरक्षित रखने का दारोमदार भी रहेगा।

इस लेख के दूसरे लेखक हैं: प्रणव भास्कर तिवारी (नीति अनुसंधान सहयोगी – द डायलॉग)

बंगाल: ममता बनर्जी ने पत्रकारों को दी कार्रवाई करने की धमकी, गवर्नर धनखड़ ने दिया करारा जवाब

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा मीडिया और भाजपा पर निशाना साधे जाने के बाद राज्य के गवर्नर जगदीप धनखड़ ने उन्हें करारा जवाब दिया है। राज्यपाल धनखड़ ने कोरोना के बढ़ते मामलों पर चिंता जताते हुए सभी पार्टियों से एकजुट होने की अपील की है। साथ ही ममता बनर्जी के बयान,’विपक्ष गिद्धों की तरह मौत का इंतजार कर रहा है’ के मद्देनजर कहा है कि इस समय राजनीति करने से दूर रहना चाहिए।

गौरतलब है कि बुधवार (अप्रैल 30, 2020) को ममता बनर्जी ने पत्रकारों को ढंग से बर्ताव करने की सलाह देते हुए चेताया था। उन्होंने कहा था कि अगर वे सही से बर्ताव नहीं करते, तो उन पर वे आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत केस कर सकती हैं। इसके अलावा उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि वे कोरोना वायरस के प्रकोप के दौरान भाजपा के लिए प्रचार कर रहे हैं।

ममता बनर्जी ने कहा था, “मेरा मीडिया से एक अनुरोध है। जब कोई घटना होती है, तो आप सरकार की प्रतिक्रिया लेने की जहमत नहीं उठाते। बल्कि भाजपा की सुनकर एक तरफा, नकारात्मक और विनाशकारी वायरस वाहक बन जाते हैं।”

इसके बाद उन्होंने मीडिया को कहा, “वर्तमान में हम आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत, कार्रवाई शुरू कर सकते हैं। लेकिन हम नहीं कर रहे, क्योंकि बंगाल की संस्कृति है; हम मानवता में विश्वास करते हैं। सहिष्णुता हमारा धर्म है। ”

अब ममता बनर्जी के इन्हीं बयानों को लेकर गवर्नर ने अपने ट्वीट में लिखा, “सभी पार्टियों से कोविड-19 की लड़ाई में एकजुट होने की अपील करता हूंँ। ममता के कथन ‘विपक्ष उस तरह का बर्ताव कर रहा है जैसे गिद्धों को मौत का इंतजार रहता है’ से दुख है। हम पर छत गिरने जैसी स्थिति है। हमें राजनीति से दूर रहना चाहिए। जब लोगों को अनकहे दुखों का सामना करना पड़ता है, तो ऐसे समय में ये मुसीबत क्यों बढ़ जाती है?”

अपने दूसरे ट्वीट में राज्यपाल ने लिखा कि मुख्यमंत्री विभिन्न माध्यमों से मीडिया को नियंत्रित करने और डराने धमकाने की कोशिश कर रही हैं। मीडिया को डर में क्यों रखा जाएगा? आखिर एक सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं होना चाहिए। मीडिया लोकतंत्र का रीढ़ है। स्वतंत्र मीडिया आवश्यक तत्व है और इस तरह मीडिया कर्मियों को दबाव में रखना ठीक नहीं।

उन्होंने अगले ट्वीट में लिखा, “जेम्स मैडिसन ने कहा था कि एक लोकप्रिय सरकार बिना किसी लोकप्रिय जानकारी या जानकारी प्राप्त करने के संसाधन के बिना एक त्रासदी होती है। मिस्र, लीबिया, ट्यूनीशिया में लंबे समय तक शासन करने वाले तानाशाह को 2011 में बाहर करने में मीडिया की भूमिका बड़ी रही है। क्या यही खबर है कि आप कुछ छिपाना चाहती हैं?”

राज्यपाल धनखड़ ने ममता बनर्जी सरकार की ओर से मीडिया पर निशाना साधने पर भी सवाल खड़े किए। राज्यपाल ने ट्वीट कर लिखा, “चिंतित ममता बनर्जी ने मीडिया को ‘सही से बर्ताव’ करने की चेतावनी दी है। मीडिया को भय में क्यों रखना? छिपाने के लिए कुछ भी नहीं होना चाहिए।”

गौरतलब है कि ममता बनर्जी सरकार पर कोरोना संक्रमण की हकीकत को छिपाने के आरोप लग रहे हैं। हालाँकि सीएम बनर्जी ने दावा किया है कि उनके यहाँ लोगों के स्वास्थ्य का सबसे बेहतर ख्याल रखा जा रहा है। उन्होंने वायरल वीडियो का जिक्र करते हुए कहा है कि यह सब कुछ सरकार को बदनाम करने की साजिश का हिस्सा है। उन्होंने यह भी दावा किया कि कुछ लोग ऐसी खबरें चला रहे हैं कि पश्चिम बंगाल के अस्पतालों में कोरोना मरीजों के लिए पर्याप्त नहीं है। वे जानबूझकर सरकार को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं राज्यपाल का कहना है कि संकट की घड़ी में ममता बनर्जी उपयुक्त काम नहीं कर रही हैं।

क्या उद्धव ठाकरे की कुर्सी बचाएँगे मोदी, 28 मई से पहले सदन की सदस्यता जरूरी

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहने के लिए उद्धव ठाकरे को 28 मई से पहले किसी सदन की सदस्यता लेनी होगी। उनको एमएलसी नामित करने का प्रस्ताव महाराष्ट्र कैबिनेट दो बार गवर्नर भगत सिंह कोश्यारी को भेज चुकी है। कोश्यारी ने अब तक कोई फैसला नहीं किया है। लिहाजा उद्धव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हस्तक्षेप की अपील की है।

उद्धव ने बुधवार को मोदी को फोन कर महाराष्ट्र के राजनीतिक संकट में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया था। पीएम ने उन्हे मामले पर गौर करने का भरोसा दिलाया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ठाकरे ने महाराष्ट्र विधान परिषद में अपने मनोनयन को लेकर मोदी से फोन पर बात की और सरकार बचाने के लिए मदद माँगी। कथित तौर पर कहा कि अगर वह उच्च सदन में नामित नहीं होते हैं, तो उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना होगा।

उद्धव ठाकरे ने पीएम मोदी से यह भी कहा कि राज्य में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश की जा रही है। इससे पहले, ठाकरे द्विवार्षिक चुनावों के माध्यम से परिषद के लिए निर्वाचित नहीं हो सकते थे क्योंकि कोरोनोवायरस प्रकोप के कारण चुनाव स्थगित कर दिए गए थे। चूंकि ठाकरे विधायक नहीं हैं, इसलिए उन्हें अपने पद को बचाने के लिए 28 मई तक विधान परिषद की सदस्यता हासिल करनी होगी।

प्रधानमंत्री को फ़ोन करने से पहले महाराष्ट्र विकास अघाड़ी (Maharashtra Vikas Aghadi) सरकार का समर्थन करने वाले चार छोटे दलों के नेताओं ने बुधवार को राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को एमएलसी नामित करने के राज्य मंत्रिमंडल के प्रस्ताव पर निर्णय लेने का आग्रह किया था। कोश्यारी को भेजे पत्र में, सत्तारूढ़ एमवीए का समर्थन करने वाले दलों के नेताओं ने कहा कि राज्यपाल को कारणों को स्पष्ट करना चाहिए कि उन्होंने अब तक ठाकरे को क्यों नामित नहीं किया है।

पत्र में कहा गया था कि विधान परिषद में ठाकरे की नियुक्ति का प्रस्ताव 9 अप्रैल को भेजा गया। 28 अप्रैल को इस संबंध में दोबारा गवर्नर से आग्रह किया गया। लेकिन, उन्होंने कोई फैसला नहीं लिया है।

महाराष्ट्र के सियासी संकट के बीच अब सबकी नजरें राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी पर टिकी हुई हैं। उद्धव कैबिनेट के सदस्य ने कहा कि कोश्यारी ने हमारी बात सुनी लेकिन उनका रवैया टाल-मटोल वाला रहा। हमें नहीं पता कि वे इसे स्वीकार करेंगे या नहीं। उन्होंने कहा कि ठाकरे के नामांकन पर अनिश्चितता के मद्देनजर सरकार विधान परिषद चुनावों के लिए चुनाव आयोग से संपर्क करने पर विचार कर रही है।

ठाकरे ने 28 नवंबर, 2019 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। संविधान के अनुसार उन्हें छह महीने के भीतर सदन की सदस्यता लेनी होगी।

‘ऋषि कपूर की जगह नरेंद्र मोदी को उठा लो’: मौत के बहाने मोदी-विरोधियों ने उगला जहर

ऋषि कपूर और इरफान खान की मौत की खबरों के बीच भी कट्टरपंथी मुस्लिमों के साथ-साथ सोशल मीडिया के वाम-उदारवादियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी अपनी घृणा का निशाना बनाया है। कल ही बॉलीवुड अभिनेता इरफान खान की मौत की खबर के बाद कुछ लोगों को यह भी लिखते हुए देखा गया कि इरफान खान की जगह अक्षय कुमार को होना चाहिए था।

आज सुबह ही ऋषि कपूर की कैंसर से हुई मौत की खबरों के बाद सोशल मीडिया पर मोदी-विरोधियों ने अपनी घृणा को नया स्तर देते हुए लिखा कि ऋषि कपूर की जगह उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौत की खबरों का इंतजार है। खास बात यह है कि इस तरह के ‘मज़ाक’ करने वालों में अधिकतर नाम मुस्लिम हैं।

वास्तव में इन लोगों ने यही साबित करने का प्रयास किया है कि इनके लिए किसी भी व्यक्ति की मौत सिर्फ और सिर्फ उनके निजी प्रोपेगेंडा को सफल बनाने का अवसर मात्र है।

प्रोपेगेंडा चैनल NDTV की पत्रकार निधि राजदान ने अभिनेता ऋषि कपूर की मौत की खबर पर दुख व्यक्त करते हुए एक ट्वीट किया, जिसके जवाब में सैयद आतिब बुख़ारी नाम के ट्विटर हैंडल ने लिखा – “अब मोदी का इंतजार है”

That Kashmiri Guy नाम के ट्विटर हैंडल ने लिखा है -“ईश्वर हमें इरफान खान और ऋषि कपूर दे दे और इसके बदले में मोदी को ले ले।”

मुस्लिमों ने मोदी को हर उस ट्वीट में अपनी नफरत का निशाना बनाया है, जहाँ-जहाँ पर लोग ऋषि कपूर की मृत्यु पर अपनी संवेदनाएँ प्रकट कर रहे थे।

दिल्ली निवासी (ट्विटर पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार) बुरहान ने ऋषि कपूर की मृत्यु पर किए गए एक ट्वीट को शेयर करते हुए लिखा है – “नरेंद्र मोदी को भी ले जाओ, वो भी अच्छा कलाकार है।”

ज्ञात हो कि कल ही रचिता तनेजा नामक कॉमिक आर्टिस्ट ने इरफान खान की मृत्यु की खबर सुनने के बाद ट्विटर पर शोक जताते हुए लिखा, “अक्षय कुमार को ले लो और हमें इरफान खान वापस दे दो।”

वास्तव में सोशल मीडिया पर अक्सर यह देखा गया है कि केंद्र सरकार का समर्थन करने वाले लोगों और तार्किक बातें करने वालों को ही लेफ्ट-लिबरल गिरोह के द्वारा निशाना बनाया जाता है। इस द्वैष के पीछे मुख्य मकसद सत्ता का विरोध से लेकर उन लोगों को खुश करना होता है, जो कि इस तरह की बातें सुनना पसन्द करते हैं।

बैंक में चपरासी था डायरेक्टर, चेयरपर्सन को मिलते थे ₹1000 हर माह: RBI ने प्रतिबंध बढ़ाया

मुंबई स्थित द नीड्स आफ लाइफ को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड पर लागू प्रतिबंधों को भारतीय रिजर्व बैंक ने छह महीने के लिए बढ़ा दिया है। प्रतिबंध अब 31 अक्टूबर 2020 तक लागू रहेंगे। रिजर्व बैंक ने बैंक पर नया कर्ज देने और पुराने कर्ज का नवीनीकरण करने पर रोक लगा दी है। साथ ही बैंक से धन निकासी पर भी प्रतिबंध लगा दिया है।

बैंक को उसकी वित्तीय स्थिति में सुधार होने के साथ प्रतिबंधों के तहत ही बैंकिंग कारोबार करने की अनुमति दी गई है। केन्द्रीय बैंक ने अपने आदेश में कहा है कि उसके द्वारा 26 अक्टूबर 2018 को जारी किए गए निर्देश बैंक पर और छह माह (30 अप्रैल 2020 से 31 अक्टूबर 2020 तक) लागू रहेंगे।

दरअसल बैंक पर लगाए गए प्रतिबंधों के पीछे अभी तक पुलिस जाँच में जो बातें सामने आई हैं, वह बेहद चौंकाने वाली हैं। पुलिस जाँच में सामने आया है कि ‘द नीड्स आफ लाइफ को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड’ के अधिकारियों ने कथित तौर पर डायरेक्टर के पद पर एक चपरासी का नाम दिया हुआ था। चेयरपर्सन के तौर पर एक ऐसी महिला की नियुक्त थी, जो कि खुद ही इस बात से अंजान थी।

अमिता महाजन नाम की महिला ने पुलिस को बताया कि बैंक की सीईओ मनीषा जाधव के साथ उसकी दोस्ती एक लोकल ट्रेन में हुई थी। इस बीच मनीषा ने महिला से कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए, जिसके बदले मनीषा ने महिला को प्रति माह एक हजार रुपए देने की बात कही थी, जबकि महिला इस बात से एकदम अनजान थी कि वह उस बैंक की चेयरपर्सन है।

वहीं मुंबई मिरर से बात करते हुए बैंक की सीईओ मनीषा जाधव ने कहा है कि हमने अपने ग्राहकों को नहीं ठगा है, बल्कि हमने सिर्फ फंड को विभिन्न एनपीए खातों में भेजा है। बैंक वित्तीय तौर पर मजबूत है और कोई धोखाधड़ी नहीं हुई है। जब मनीषा से अमिता महाजन के बारे में पूछा गया तो उन्होंने जवाब दिया कि केस दर्ज होने के बाद अमिता महाजन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है और अब वह इस बैंक का हिस्सा नहीं है।

इसी बीच बैंक के वाइस चेयरमैन घनशानी और मनीषा जाधव की अंतरिम जमानत सत्र न्यायालय द्वारा खारिज कर दी गई है और उन्हें फिलहाल हाईकोर्ट द्वारा 7 दिसंबर तक अंतरिम संरक्षण प्राप्त है। आपको बता दें कि रिजर्व बैंक ने मडगांव अर्बन को-आपरेटिव बैंक लिमिटेड पर लागू प्रतिबंधों को भी तीन माह बढ़ाकर दो अगस्त तक कर दिया गया है। बैंक पर लागू प्रतिबंध दो मई 2020 को समाप्त हो रहे थे।

हिटलर ने बंकर में अपने डॉक्टर से पूछा- आत्महत्या का सबसे अच्छा तरीका क्या – जहर या बंदूक की गोली?

इतिहास में 30 अप्रैल की तारीख दुनिया के नक्शे पर जर्मन नेता अडोल्फ हिटलर की मौत के दिन के तौर पर दर्ज है। नाजी और ‘आर्यों’ के उद्भव (Good Aryan blood) का सपना लेकर अप्रैल 1945 में अडोल्फ़ हिटलर पचास फुट नीचे बने बंकर में भूमिगत हो गया था। उसने अपनी प्रेमिका ईवा ब्राउन को सलाह दी कि उसे शहर छोड़कर चला जाना चाहिए लेकिन ईवा ने उसकी बात नहीं मानी और आखिरी समय तक उसके साथ रहने का फैसला किया।

मरने से कुछ दिन पहले, 20 अप्रैल को एक वीभत्स दृश्य में, हिटलर ने अपने सैनिकों और साथियों के छोटे समूह के साथ अपना 56वाँ जन्मदिन मनाया। यह उसका आखिरी जन्मदिन होने वाला था। हिटलर उस दिन बंकर से बाहर आखिरी बार नजर आया था। उसने सोवियत संघ की रेड आर्मी से लड़ने वाले अपने सैनिकों को आइरन क्रॉस भेंट किए।

आखिरकार, हिटलर ने खुलकर अपने अंत के बारे में बात करनी शुरू करते हुए कहा-

“मैं व्यक्तिगत रूप से नहीं लड़ूँगा। हमेशा यह खतरा रहेगा कि मैं केवल घायल होकर रूस के लोगों के हाथों लग जाउँगा। मैं नहीं चाहता कि मेरे दुश्मन मेरे शरीर को अपमानित करें। मैंने आदेश दिया है कि मेरा अंतिम संस्कार किया जाए। ब्राउन ने मेरे साथ जीवन का अंत करने का फैसला किया है…।”

बर्लिन का युद्ध 16 अप्रैल को शुरू हुआ था। इसके बाद मित्र राष्ट्रों की सेनाएँ धीरे-धीरे बर्लिन की ओर बढ़ रही थीं। अब हिटलर के पास प्रतिक्रिया करने के लिए सेना नहीं थी। आखिर में उसने घोषणा की कि हम जंग हार चुके हैं।

आत्महत्या: सायनाइड या गोली से?

बंकर में उन लोगों के बीच चर्चा का विषय यह था कि आत्महत्या करने का सबसे अच्छा तरीका क्या हो सकता है- जहर या बंदूक की गोली? वहाँ पसरी उदासी के बीच भी जश्न का माहौल था। ईवा ब्राउन, हिटलर के बरगॉफ रिट्रीट में बिताए खुशनुमा पलों की यादें साझा कर रही थी।

हिटलर और ईवा ब्राउन

हिटलर ने एक चिकित्सक से सुझाव माँगा कि आत्महत्या किस तरह से की जाए। इस पर चिकित्सक ने उसे सायनाइड की गोली लेने या सिर में गोली मार लेने का सुझाव दिया था। हिटलर चाहता था कि सायनाइड की गोली से मौत का उसके पास प्रमाण हो, इसके लिए उसने इस दवा का प्रयोग अपनी प्यारी पालतू बिल्ली ब्लॉन्डी पर किया। उसके सैनिकों ने उसे बताया कि प्रयोग सफल रहा और बिल्ली ने बस कुछ ही पलों में दम तोड़ दिया था।

अप्रैल 25, 1945 के बाद से हिटलर पूरी तरह से अपनी मौत की तैयारियाँ करने लगा था। इसी दिन उसने अपने निजी अंगरक्षक हींज़ लिंगे को बुला कर खुद को गोली मारने के बाद उसके शव को जलाने की अपनी इच्छा के बारे में विस्तृत तरीके से समझाया। उसने कहा कि जब मैं खुद को गोली मारूँ तो वो मृत शरीर को चांसलरी के बगीचे में ले जा कर उसमें आग लगा दे ताकि मौत के बाद कोई उसे देख ना सके और न ही पहचान पाए।

हिटलर चाहता था कि उसके खुद को गोली मारते ही उससे जुड़ी सभी वस्तुओं को समाप्त कर दिया जाए। उसकी वर्दी, कागज़ और हर चीज़, जिसे उसने इस्तेमाल किया हो, उसे एकसाथ आग के हवाले कर दिया जाए। इसके साथ ही हिटलर ने अपने बॉडीगार्ड हींज़ लिंगे से कहा कि उसे सिर्फ़ अंटन ग्राफ़ के बनाए गए फ़्रेडरिक महान की आयल पेंटिंग को नहीं छूना है। हिटलर ने अपने ड्राइवर को उसकी मौत के बाद सुरक्षित बर्लिन से बाहर ले जाने का निर्देश दिया था।

आखिरी दिनों में बूढ़े गिद्ध जैसा दिखने लगा था हिटलर

हिटलर का आखिरी दिनों में बर्ताव पूरी तरह से हार चुके व्यक्ति के समान था। उसका शरीर जर्जर था, उसके कपड़े मैले थे। हिटलर के आखिरी दिनों की हालत का वर्णन हिटलर पर लिखी मशहूर पुस्तक ‘द लाइफ़ एंड डेथ ऑफ़ अडोल्फ़ हिटलर’ लिखने वाले रॉबर्ट पेन ने कुछ इस तरह लिखा है-

“तब तक हिटलर का चेहरा सूज गया था और उसमें असंख्य झुर्रियाँ पड़ गई थीं। उनकी आँखों में जीवन जाता रहा। कभी-कभी उसका दायाँ हाथ बुरी तरह से काँपने लगता और उस कंपकपाहट को रोकने के लिए वो उसे अपने बाएँ हाथ से पकड़ता था।”

रॉबर्ट पेन ने लिखा कि हिटलर किसी बूढ़े गिद्ध की तरह अपने कंधों के बीच अपने सिर को झुकाता था और उसकी चाल लडखड़ाने लगी थी। किताब में लिखा है- “शायद एक बम विस्फोट में उनके कान की एक बारीक झिल्ली को हुए नुकसान की वजह से ऐसा हुआ था। वो थोड़ी दूर चलते और रुक कर किसी मेज़ का कोना पकड़ लेते। छह महीनों के अंदर वो दस साल बूढ़े हो गए थे।”

ईवा हिटलर ब्राउन से शादी

हिटलर ने बंकर में बिताए अपने अंतिम दिनों में ही फैसला किया था कि वो ईवा ब्राउन से शादी कर उस रिश्ते को वैधता देगा। रॉबर्ट पेन ने इस पुस्तक में लिखा है कि किस तरह से शादी के लिए गवाह और आवश्यक लोगों को बंकर तक लाया गया। इसके बाद रॉबर्ट पेन इन दोनों की शादी के बारे में लिखते हैं –

“शादी के सर्टिफ़िकेट पर अडोल्फ़ हिटलर का हस्ताक्षर एक मरे हुए कीड़े की तरह नजर आ रहा था। ईवा ब्राउन ने एक बार शादी से पहले वाला अपना नाम ब्राउन लिखना चाहा। उसने ‘बी’ लिख भी दिया, लेकिन तभी उसे याद आया कि आखिरकार हिटलर के नाम के साथ अपना नाम लेने का सौभाग्य उसे प्राप्त हो रहा था। फिर उसने ‘बी’ को काटा और फिर साफ़-साफ़ ‘ईवा हिटलर ब्राउन’ लिखा। नाजी प्रोपेगेंडा मंत्री जोसेफ़ गोएबेल्स ने मकड़ी के जाले जैसा हस्ताक्षर किया और नाम के पहले वह डॉक्टर लगाना नहीं भूला। सर्टिफ़िकेट पर तारीख लिखी थी 29 अप्रैल जो कि ग़लत थी, क्योंकि शादी होते-होते रात के बारह बज कर 25 मिनट हो चुके थे। कायदे से उस पर 30 अप्रैल लिखा जाना चाहिए था।”

शादी की औपचारिकताएँ पूरी होने के बाद ईवा हिटलर के साथ वहाँ मौजूद लोगों ने शराब और शैंपेन पी। हिटलर ने बंकर के अंदर ही ईवा से शादी की और उसे अपनी पत्नी का दर्जा दिया। उनके आस-पास का इलाका आग में जल रहा था और वे बंकर में शादी कर रहे थे। हिटलर ने भी शैंपेन का एक घूंट लिया और वो भावुक होकर उन पुराने दिनों के बारे में बातें करने लगा, जब वो जोसेफ़ गोएबेल्स की शादी में शामिल हुए थे। बात करते हुए अचानक हिटलर का मूड बदल गया और उसने कहा- “सब ख़त्म हो गया, मुझे हर एक ने धोखा दिया।”

आखिरी दिन

अप्रैल 30, 1945 की दोपहर एक बजे दोनों ने अपने साथियों से विदा ली और बंकर में चले गए। कुछ देर बाद बाहर खड़े लोगों ने गोली की आवाज सुनी, दरवाजे पर खड़े गार्ड को जले हुए बारूद की बू आई। उन्हें आभास हुआ कि अंदर गोली चली है और सायनाइड का इस्तेमाल भी हुआ है।

जब वो लोग अंदर गए तो वहाँ दुल्हा-दुल्हन के शव पड़े हुए थे। हिटलर ने खुद को गोली मार ली थी और ईवा ने साइनाइड कैप्सूल खा कर अपने प्रेमी के साथ जान दे दी थी। यह बीसवीं सदी की एक प्रेम कहानी थी, जिसका नायक एक क्रूर तानाशाह था।

इसके बाद हिटलर और ईवा ब्राउन के शव को बंकर के बाकी लोग एक बागीचे में ले गए, जैसा कि हिटलर ने कहा था। वहाँ उस पर पेट्रोल डालकर जलाने की कोशिश की लेकिन पहली कोशिश नाकाम हो गई। सोवियत के सैनिक उनकी तरफ तेजी से बढ़ रहे थे। हिटलर के सैनिक उनके शव को बमों से बने एक गड्ढे में खींचकर ले गए जहाँ उसे आखिर में जला दिया गया।

अगले दिन रेडियो से हिटलर की मौत की घोषणा की गई। स्टालिन को जब हिटलर की आत्महत्या के बारे में पता चला तो उसने पहले इस बात की पुष्टि करनी चाही। हिटलर के जीवनी लिखने वाले इयान करशॉ (Ian Kershaw) लिखते हैं- “जैसे ही शवों को आग लगाई गई, वहाँ मौजूद सभी लोगों ने हाथ ऊँचे कर ‘हेल हिटलर’ कहा और वापस अपने बंकर में लौट गए।”

इयान ने इस जीवनी में आगे लिखा है – “जब लपटें कम हुई तो उन पर और पेट्रोल डाला गया। ढाई घंटे तक लपटें उठती रहीं। कुछ दिनों बाद जब सोवियत जाँचकर्ताओं ने हिटलर और उनकी पत्नी ईवा के अवशेषों को बाहर निकाला तो सब कुछ समाप्त हो चुका था। वहाँ एक डेंटल ब्रिज ज़रूर मिला। 1938 से हिटलर के दंत चिकित्सक के लिए काम करने वाले एक शख़्स ने इस बात की पुष्टि की कि वो डेंटल ब्रिज हिटलर के ही थे।”

हिटलर की मौत के बाद मई 08, 1945 को जर्मनी ने सरेंडर कर दिया। इसके लिए जर्मनी की ओर से किसी तरह की शर्त नहीं रखी गई थी। आख़िर में यहूदियों का नरसंहार करने वाले हिटलर के अध्याय को विराम मिला। वह नीली आँखों और ऊँचे कद वाले आर्यन्स की नस्ल का सपना देखता था।

अडोल्फ़ हिटलर के अंदर ‘शुद्ध नस्ल’ से लेकर अच्छी नई नस्ल का बीजारोपण वर्साय की संधि की निराशा ने किया था। यही वो समय था जब वो मानने लगा कि यहूदियों को अच्छे फैसले लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए और उसने यहूदियों के खिलाफ फतवा जारी कर एक क्रूरतम अध्याय की नींव रखी।

36 साल पहले जब देश ‘अनाथ’ होने से बचा लिया गया… धरती हिली लेकिन टिकी रही थी कॉन्ग्रेस की गाँधी भक्ति

विधाता के दरबार में जब भक्ति और भक्ति के तमगे का बँटवारा हो रहा था तब तमगा बीजेपी के हिस्से आया और भक्ति कॉन्ग्रेस के। दरअसल इस बँटवारे की नौबत इसलिए आई क्योंकि अन्य कालों में अनेक प्रकार की भक्तियों का बोलबाला था- मातृभक्ति, पितृभक्ति, गुरुभक्ति, गोभक्ति, मित्रभक्ति, ज्ञानभक्ति, विज्ञानभक्ति, राष्ट्रभक्ति, राजभक्ति। आपको ऐसे महापुरुषों के नाम भी याद होंगे, जिन्होंने इनमें से एक-एक भक्ति पर दृढ़ रहते हुए महानता हासिल की और नाम कमाया, लेकिन वर्तमान युग में राजभक्ति को छोड़कर बाक़ी भक्तियाँ इतनी शक्तिहीन हो गई हैं कि वो राजभक्ति के सहारे के बिना अकेले दम पर कुछ नहीं कर सकतीं। इसलिए आज भक्ति का मतलब ही है राजभक्ति। अब भक्ति एक थी और दावेदार दो-दो। अत: मजबूर होकर विधाता को इस बँटवारे का फैसला लेना पड़ा।

पूरे माजरे को समझने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं। हिन्दी कविता के बाद विपरीत काल व परिस्थितियों के थपेड़ों से बची थोड़ी-सी भक्ति ने भारत के स्वातंत्र्य समर व भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलनों में राष्ट्रभक्ति के रूप में अपना स्थान बनाया। जब देश आजाद हो गया तब चारों ओर अंग्रेजी हुकूमत की बेदर्दियों को समेटते भारत माँ के लाल भूखे भजन न होई गोपाला के तहत भक्ति से महरूम रह गए। तब और कोई स्थान न पाकर भक्ति ने राजसत्ता का सहारा लिया। उस समय सत्ता में बस कॉन्ग्रेस ही थी इसलिए वही उसका स्थायी निवास बन गई।

भक्ति को राजसत्ता और कॉन्ग्रेस में फर्क करने की कभी ज़रूरत महसूस नहीं हुई और उसने कोशिश भी नहीं की। उसका काम बढ़िया चल रहा था। धीरे-धीरे भक्ति कॉन्ग्रेस के साथ इतनी एकाकार हुई कि उसका स्वाभाविक अंग बन गई, मानो ये उसका जन्मजात गुण हो। कुछ समय बाद भक्ति के सामने असमंजस की स्थिति भी आई, जब उसे कॉन्ग्रेस-O/सिंडिकेट, कॉन्ग्रेस-R/कॉन्ग्रेस-I, वगैरह में से किसी एक को चुनना था, किन्तु इसका निर्णय तो डार्विन की थ्योरी के अनुसार स्वयं हो गया- ‘Survival of the Fittest’। यानी भक्ति के हिसाब से जो समूह सबसे अनुकूल था, वो बच गया। बची कॉन्ग्रेस-आई बाक़ी सब धराशाई।

फिर एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी, न केवल कॉन्ग्रेस के लिए बल्कि देश के लिए भी। देश की पहली महिला प्रधानमंत्री का निधन हो गया। देश ने खुद को आहत महसूस किया। बाकियों के लिए यह एक अहैतुकी वेदना थी, किन्तु कॉन्ग्रेस का नज़रिया अपनी मूल प्रवृत्ति के आस-पास ही मंडरा रहा था। इसलिए जब भक्ति का प्रतीक वृक्ष गिरा, तब धरती हिली, भूकंप आया, चीखें उठीं, जानें गईं, किन्तु भक्ति अडिग रही।

अब भक्ति के नए प्रतीक पुरुष को सत्ता के शिखर पर चढ़ाया गया। हालाँकि ये कोई श्रमसाध्य प्रक्रिया नहीं थी क्योंकि अगर आपकी चढ़ाई एवरेस्ट से शुरू होकर एवरेस्ट पर ही ख़त्म होनी हो तो पर्वतारोहण एक सपाट प्रक्रिया बन जाती है। भक्ति देवी की असीम अनुकम्पा से राजीव का बेस कैम्प एवरेस्ट पर ही मौजूद था। पायलट बाबू ने हवाई जहाज से सीधे कैम्प में लैंडिंग की और दो कदम चलकर सिंहासन तक पहुँच गए। मतलब किसी को नीचे से जोर लगाकर ऊपर ठेलने-चढ़ाने की ज़रूरत नहीं पड़ी। भक्ति ने देश को नेतृत्व हीनता की एक नई मुसीबत से बचा लिया।

भक्तिकाल के नाम पर अक्सर हमारा ध्यान हिन्दी-साहित्य की ओर ही जाता है। इस लिहाज से देखें तो वहाँ कालों में एक काल था भक्तिकाल, लेकिन यहाँ तो भक्ति में काल हैं- नाना काल, दादी काल+चाचा काल, पितृ काल, मातृ काल, पुत्र काल, पुत्री काल। अब चेहरा-मोहरा इन्हीं का मिलता है तो दूसरों को बीच में लाकर समदर्शी नाक की इज्जत दाँव पर थोड़ी लगानी है।

इस तरह सब ठीक चल रहा था, स्वाभाविक था, जायज था। लेकिन ये क्या हुआ? अचानक बीच में नमो-नमो की आवाजें कहाँ से आ गईं? वो भी एवरेस्ट की चोटी से नहीं बल्कि तलहटी से। कौन है ये नया देवता? नया भक्तिकेंद्र सा? वाजिब सवाल था। जन्मना सेठ की संपत्ति चर्चा का विषय नहीं होती। नई दौलत कमा कर लाया नया सेठ सबको शंका में डाल देता है। सवाल उठता है, कहाँ से लाया? कैसे कमाया? ज़रूर कोई धांधली की होगी।

खैर, जाँच-पड़ताल पूरी हुई। रिपोर्ट आई कि हुजूर ये कमल तो साक्षात् कीचड़ से ही निकला है। फिर पूरी कोशिशें शुरू हो जाती हैं कि किस तरह उस गरीबी, अभाव और वंचनाओं के कीचड़ को रक्त से सने कीचड़ में परिवर्तित किया जाए और शुरुआत होती है ‘मौत के सौदागर’ के विशेषण के साथ। उसके बाद लहु-पुरुष, हिटलर, गद्दाफी, मुसोलिनी, जवानों के खून का दलाल, जहर बोने वाला, चोर… विरुदावली बहुत लंबी है, अगर सारे कसीदे पढ़ दिए तो पक्का किसी न किसी खेमे की भक्ति का तमगा हासिल हो जाएगा। कुल मिलाकर उस कीचड़ को रक्त रंजित कीचड़ दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई, लेकिन आप इसकी आलोचना करोगे तो सीधे भक्त कहलाओगे।

देखा जाए तो भक्ति के मामले में बीजेपी कॉन्ग्रेस के आगे दूर-दूर तक नहीं टिकती। लेकिन भक्ति अपने पुश्तैनी निवास स्थान में प्रश्नों से परे है। उसे छोड़ कहीं और यदि भक्ति की सुगबुगाहट भी हुई तो शोर मच जाएगा। फब्तियाँ कसी जाएँगी। गाँव के रामलाल ने नवाब की गली में धर्मार्थ प्याऊ लगा दिया। अब ताने तो स्वाभाविक हैं- ‘क्यों भई! आज कल तू बड़ा नवाब बना फिर रहा है?’ नवाब तो वही है पुराना वाला, इस पर तो बस नवाबी का आरोप लग रहा है। भक्ति तो वहीं टिकी हुई है जहाँ उसका पुश्तैनी मकान था, थोड़ी सी खरोंच लगते ही बाहर भी निकल आती है। बस तमगा किसी और के हिस्से है।

देश और देश की जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले गरिमामय पद को गरिया दिया जाए तो कोई समस्या नहीं। आपसे कोई मामूली सा सवाल पूछ लो बवाल होना तय है। स्तरहीन गालियाँ सहन करना चायवाले की जन्मसिद्ध जिम्मेदारी है। और उधर जन्मसिद्ध अधिकार है देश के प्रधानमंत्री को इतना तक कह देना- ‘ये जो नरेन्द्र मोदी भाषण दे रहा है, छः महीने बाद ये घर से बाहर नहीं निकल पाएगा। हिन्दुस्तान के युवा इसको ऐसा डंडा मारेंगे, इसको समझा देंगे…’। और कुछ नहीं तो कम से कम इंसान उम्र का ख़याल तो करता ही है। लेकिन नहीं, बड़े विचित्र संस्कार हैं। संस्कृत की एक सूक्ति याद आ गई- ‘आचार: कुलमाख्याति’ यानी आपका आचरण आपके कुल का परिचायक होता है।

सच्चाई तो ये है कि आजादी के बाद से ही कॉन्ग्रेस ने दुनिया भर में एक परिवार का नाम रौशन किया है जबकि उसी समय देश को दुनिया में हीन दृष्टि से देखा जाता रहा। आज स्थिति यह है कि हाशिए से आए एक इंसान ने, जिसे दुनिया भर में बदनाम करने की भरपूर कोशिशें हुईं, जिसके परिवार का नाम न पहले था, न अब है, न बाद में होगा, उसने खुद गालियाँ खाकर देश का नाम ऊँचा किया है, जिसे देखकर हर भारतीय का सीना छप्पन इंच चौड़ा हो जाता है।

अंत में एक जेंटल रिमाइंडर- ये जो कुछ लिखा है उसे भक्ति नहीं, सच्चाई कहते हैं।

CRPF कमांडो सचिन सावंत मामले में खुद को बचाने में जुटी कर्नाटक पुलिस: शरीर पर दाग देख लोगों में आक्रोश

CRPF कमांडो सचिन सावंत के साथ जेल में मारपीट, गिरफ्तारी और अमानवीय व्यवहार किया गया। इस मामले में कर्नाटक सरकार और पुलिस प्रशासन के खिलाफ लोगों का आक्रोश चरम पर है। सीआरपीएफ अधिकारियों के कड़े विरोध के बाद कोबरा कमांडो पर दर्ज मुकदमे को पुलिस प्रशासन द्वारा वापस लेने की बात सामने आ रही है। राज्य पुलिस ने इस मामले में जाँच के आदेश दिए हैं। पीड़ित CRPF जवान सचिन सावंत के मित्र ने ऑपइंडिया को बताया कि पुलिस ने एक पुलिसकर्मी को सस्पेंड भी कर दिया है।

कर्नाटक के पुलिस महानिदेशक ने सीआरपीएफ (CRPF) के अधिकारियों को आश्वस्त किया है कि कोबरा कमांडो के खिलाफ दर्ज मुकदमे को वापस ले लिया जाएगा और आरोपित पुलिसकर्मियों की उचित जाँच की जाएगी।

उल्लेखनीय है कि कर्नाटक के बेलगावी (बेलगाम) जिले के CRPF की कोबरा बटालियन के कमांडो सचिन सावंत को कुछ पुलिसकर्मियों ने लॉकडाउन के नियमों की अवहेलना करने के आरोप में तब गिरफ्तार कर लिया था, जब वो अपने घर के सामने अपनी बाइक साफ कर रहे थे।

कुछ पुलिसकर्मी उनके पास गए और मास्क पहनने को लेकर उनके बीच बहस हुई। इस घटना के संबंध में वीडियो भी चर्चा का विषय रहा, जिसमें एक पुलिस कॉन्स्टेबल कमांडो सचिन सावंत को धक्का देते दिखाई दे रहा है। इसके बाद पुलिस सचिन को जंजीरों से बाँध कर थाने ले गई। थाने में सचिन सावंत के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया और उन्हें बुरी तरह से पीटा गया।

CRPF ने इस घटना पर कड़ी आपत्ति जताई थी। इसके बाद कर्नाटक पुलिस व सरकार के कई मंत्री हरकत में आए। बेलगावी जिले के चिकोडी तालुका स्थित एक अदालत ने मंगलवार (अप्रैल 28, 2020) को ही CRPF के कमांडो सचिन को जमानत दे दी थी। हालाँकि सचिन सावंत के करीबियों का मानना है कि इस मामले में पुलिस सिर्फ अपने अधिकारियों को बचाने का ही प्रयास कर रही है।

सचिन के मित्र ने फोन पर ऑपइंडिया को बताया कि इसके बाद से सचिन CRPF के साथ ही हैं और उनका मोबाइल फोन भी उनके पास नहीं है। सोशल मीडिया पर पुलिस के इस व्यवहार की काफी आलोचना हो रही है। ऐसे चित्र भी जारी किए गए हैं, जिनमें सचिन सावंत को टॉर्चर किए जाने के बाद उनके शरीर के घावों को आसानी से देखा जा सकता है।

ऋषि कपूर का निधन, 2 साल से कैंसर से लड़ रहे थे: बिग B ने कहा – टूट गया हूँ

बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता ऋषि कपूर का निधन हो गया। कल शाम ही उनकी तबीयत अचानक खराब हो गई थी, जिसके कारण उन्हें दक्षिण मुम्बई के सर एचएन रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल में भर्ती कराया गया था। कल ही बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता इरफ़ान खान की भी लम्बी बीमारी के बाद मृत्यु हो गई थी।

अमेरिका के कैंसर अस्पताल में ऋषि कपूर ने 11 महीने और 11 दिन गुजारे थे। अमिताभ बच्चन सहित ही कई अन्य बॉलीवुड की हस्तियों ने उनकी मृत्यु पर श्रद्धांजलि दी है।

67 साल के ऋषि कपूर पिछले साल सितंबर में ही न्यूयॉर्क में लगभग एक साल कैंसर का इलाज करवाने के बाद भारत लौटे थे। ऋषि कपूर को 2018 में कैंसर का पता चला था। जिसके बाद वो इलाज के लिए न्यूयॉर्क चले गए। वहाँ करीब एक साल उनका इलाज चला।

कल ही इरफान खान की मौत के बाद आज ऋषि कपूर की मौत ने सबको सदमे में डाल दिया है। यह बॉलीवुड के लिए लगातार दूसरे दिन में हुई बड़ी क्षति है। ऋषि कपूर बीते दौर के सबसे सफल अभिनेताओं में से एक थे। बॉबी, मेरा नाम जोकर, चाँदनी, हीना, अमर अकबर एन्थोनी आदि उनकी कुछ बेहद लोकप्रिय फ़िल्में थीं। वह समसामयिक घटनाओं को लेकर भी काफी मुखर रहा करते थे।

‘फितना-फसादी होते हैं साधु, इन्हें जलाकर ख़त्म कर दो’: मेवात में महंत रामदास पर जानलेवा हमला

हरियाणा के मेवात जिला स्थित पुन्हाना में मुक्तिधाम आश्रम के प्रमुख महंत रामदास महाराज के साथ मुस्लिम बहुल इलाके में कुछ लोगों द्वारा कथित तौर पर बदसलूकी, मारपीट और जान से मारने की नीयत से हमला करने का मामला सामने आया है। महंत के समर्थन में आए हिंदूवादी संगठनों ने ऑपइंडिया से बातचीत में बताया कि बुधवार (अप्रैल 29, 2020) की सुबह महंत रामदास महाराज पर आरोपितों ने धार्मिक भावनाओं को निशाना बनाते हुए अभद्र धार्मिक टिप्पणियाँ की। साथ ही इलाके के सभी साधु-संतों को पुन्हाना से भगा देने की धमकी भी दी।

महंत रामदास महाराज जब इस हमले के बाद किसी तरह जान बचाकर पुलिस के पास पहुँचे तो उसने कथित तौर FIR दर्ज करने से इनकार कर दिया। ऑपइंडिया ने इस मामले में जब पुलिस का पक्ष जानने की कोशिश की तो पुन्हाना थाना SHO ने इस मामले में किसी भी जानकारी के लिए हेडक्वार्टर से बात करने कहा। उन्होंने कहा कि उन्हें इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी नहीं है। वहीं हिंदूवादी संगठनों का आरोप है कि पुलिस FIR की बजाए हमलावरों से बातचीत कर मामले को सुलझाने की राय दे रही है।

हरियाणा के मेवात जिले स्थित पुन्हाना में आज सुबह हुई इस वारदात के बाद पुन्हाना के साथ साथ पिनगवां, नगीना, फिरोजपुर झिरका, नूंह, फरीदाबाद, पलवल, होडल  सहित अन्य शहरों के धार्मिक व सामाजिक संगठनों में गहरा रोष व्याप्त है।

इस घटना की शिकायत स्थानीय सिटी चौकी पुलिस को दे दी गई है। इस बाबत धार्मिक व सामाजिक संगठनों के प्रमुख लोगो ने बैठक कर घटना की कड़ी निंदा करते हुए पुलिस-प्रशासन से कार्रवाई की माँग की है। साथ ही कहा है कि यदि पुलिस-प्रशासन इस मामले में लापरवाही बरतता है तो वे प्रशासन के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन करने को मजबूर होंगे।  

हमले के समय दुकान से लौट रहे थे महंत

पीड़ित पक्ष ने ऑपइंडिया से बातचीत करते हुए कहा कि पुलिस को दी शिकायत में मुक्तिधाम आश्रम के प्रमुख महन्त रामदास महाराज ने बताया कि बुधवार (अप्रैल 28, 2020) सुबह महंत नजदीकी मेडिकल स्टोर से दवाई लेने के लिए गए थे तो वहाँ एक दुकान पर बैठे कुछ लोगों ने उन्हें देखकर अभद्र धार्मिक फब्तियाँ कसनी शुरू कर दीं।

महंत ने अपने साथ हुई घटना की जानकारी देते हुए बताया कि वहाँ मौजूद लोगों ने कहा कि इन बाबा और साधु-संतों ने ही माहौल खराब कर रखा है, ऐसे बाबाओं को पुन्हाना से भगा दो। अगर ये यहाँ से नहीं भागते हैं तो इन्हें जलाकर जान से मार दो, ये लोग ‘फितना-फ़सादी’ होते हैं।

इन टिप्पणियों पर महंत रामदास के विरोध करने पर वहाँ मौजूद लोगो ने हाथों में लाठी-डंडे लेकर महंत का पीछा किया और उन्हें जान से मारने की धमकी देते हुए उन पर हमला करने की कोशिश की। महंत वहाँ से किसी तरह जान बचाकर भागने में सफल रहे।

महंत रामदास महाराज

हिंदूवादी संगठनों ने की गिरफ्तारी की माँग

शिकायत में महन्त रामदास महाराज ने उक्त आरोपियों की पहचान कर उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई करने की माँग की है। महंत पर हमले की इस घटना की सूचना पाकर सैकड़ों की संख्या में शहर के सामाजिक व धार्मिक संगठनों से जुड़े लोग चौकी में एकत्रित हो गए। इस मौके पर डीएसपी अशोक कुमार, एसएचओ अजयवीर भड़ाना व चौकी प्रभारी जगदीश चंद ने मौजूद लोगों को कड़ी कानूनी कार्यवाही का भरोसा भी दिलाया। हालाँकि हिंदूवादी संगठनों ने यह भी कहा कि पुलिस कार्रवाई की जगह पर आरोपितों के साथ समझौता का मामले को रफा-दफा करने पर जोर दे रही है।

इसके बाद धार्मिक व सामाजिक संगठनों को एक बैठक कर मुक्तिधाम आश्रम में हुई। बैठक में साधु संतों ने एक स्वर में कहा कि किसी भी सूरत में इस तरह का अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

महंत पर हुए इस हमले की घटना से आक्रोशित लोगों ने कहा कि पुन्हाना की आज हुई यह घटना बहुत ही निंदनीय है और यह सिर्फ महन्त रामदास महाराज के साथ नहीं बल्कि पूरे हिन्दू समाज के ऊपर प्रहार है। संगठन से जुड़े लोगों ने पुलिस प्रशासन को चेतावनी देते हुए कहा कि इस मामले में पुलिस कड़ी कार्यवाही करें, यदि पुलिस लापरवाही बरतती है तो समाज पुलिस-प्रशासन के विरोध में प्रदर्शन करने को उतारू हो जाएगा।

इस बैठक में सामाजिक कार्यकर्ता धर्मवीर सैनी, पूर्व चेयरमैन कपूर चंद गोयल, बृज मोहन सैनी, वाइस चेयरमैन बलराज सिंगला, राजकुमार नैवनिया, रत्न लाल मेम्बर, बिजेंद्र साहू, रिंकू कुमार प्रधान, लालाराम भारद्वाज, दीपक राजस्थानी पार्षद, भाजपा मंडलाध्यक्ष खिलौनी राम पण्डित, अशोक गोयल प्रधान, भोलाराम दिवाकर, महेश चंद गोयल सहित काफी संख्या में लोग उपस्थित थे।

शाम 8.30 तक भी पुलिस की ओर से नहीं की गई कोई पहल

ऑपइंडिया से बात करते हुए स्थानीय हिंदूवादी संगठनों ने बताया कि दिन में पुलिस के आश्वासन के बाद शाम 8.30 बजे तक भी पुलिस ने इस मामले में कोई गिरफ्तारी तो दूर, किसी प्रकार की कोई कार्रवाई की पहल भी नहीं की है। इस से आक्रोशित लोगों ने कहा है कि यदि पुलिस कल सुबह 9 बजे तक भी कोई कार्रवाई नहीं करती है तो वो लोग थाने के सामने ही विरोध-प्रदर्शन करेंगे।

हिन्दुओं पर हमले की सप्ताह भर में तीसरी घटना

ऑपइंडिया से बात करते हुए स्थानीय जनता ने बताया कि वो जहाँ रहते हैं वह मुस्लिम बहुल इलाका है और इस सप्ताह में हिन्दुओं पर हुए हमले की यह तीसरी घटना है। पुलिस भी इस बारे में कोई कार्रवाई करने से कतराती रही है। कुछ दिन पहले ही एक हिन्दू के घर पर सोशल मीडिया पर किए गए किसी पोस्ट को लेकर हुई बहस के बाद 200-300 लोगों की भीड़ उसके घर पर एकत्रित हो गई और उनके परिवार के लोगों के साथ बदसलूकी की।

घटना से सम्बंधित बयान एवं मौजूद लोगों के हस्ताक्षर