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RSS के विकिपीडिया पेज से छेड़छाड़, इस्लामी यूजर ने लिख दिया ‘हिंदू आतंकी संगठन’

विकिपीडिया पर हिंदुओं को नीचा दिखाने की फिर से कोशिश की गई है। एक इस्लामी यूजर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS के पेज के साथ छेड़छाड़ की कोशिश की। उसने RSS के परिचय में हिंदू आतंकी संगठन लिख दिया।

विकिपीडिया पर छेड़छाड़ Ahmedfalah7711 नामक अकाउंट से किया गया। इसी अकाउंट से RSS को ‘राष्ट्रवादी संगठन’ की जगह ‘आतंकी संगठन’ लिखा गया। इसके बाद कई अन्य संपादकों ने इस जानकारी को संपादित किया। लेकिन अहमद के अकाउंट से बार-बार छेड़छाड़ जारी रहा। जब काफी कोशिश के बाद भी जानकारी सही नहीं हो पाई तो आर्टिकल को सेमी प्रोटेक्शन में रख दिया गया। लेकिन, इसके बाद एडिटिंग का यह खेल जारी रहा। ऐसा इसलिए, क्योंकि Ahmedfalah7711 नाम का यूजर इस जानकारी को संपादित करने के लिए लॉग इन वेबसाइट का इस्तेमाल कर रहा था।

अहमद ने सबसे पहले आरएसएस के परिचय में एडिटिंग रात के 12 बजे की। जब इसकी जानकारी अन्य एडिटर्स को मिली तो उनमें से कइयों ने उसे सुधारना चाहा। लेकिन बार-बार वही लिखा लौट के आता रहा। यानी आरएसएस को आतंकी संगठन साबित करने के लिए उक्त यूजर लगातार सक्रिय रहा।

Ahmedfalah7711 के टॉक पेज को देखने पर मालूम चलता है कि वे ऐसे कारनामों वह लगातार ऐसी हकरतें करता रहता है। इसके लिए कई बार उसे चेतावनी मिल चुकी है। पिछले महीने की बात करें तो उसने गृह मंत्री अमित शाह की छवि को धूमिल करने के लिए लिख दिया था कि अमित शाह जैन परिवार में पैदा हुए थे और वे खुद को हिंदू कहते हैं।  उन्हें कई बार जैन मंदिरों में अर्चना करते भी देखा गया है।

इसके अलावा इस यूजर पर ये भी आरोप है कि इसने विकिपीडिया पर मौजूद उस पेज से भी छेड़खानी की, जहाँ इस बात की जानकारी मौजूद थी कि कौन-कौन से गैर-इस्लामिक धार्मिक स्थलों को मस्जिदों में बदला गया। इतना ही नहीं, इस शख्स ने इस आर्टिकल से राम जन्मभूमि के पूरे सेक्शन को ही गायब कर दिया था।

गौरतलब है कि इस्लामिक कट्टरपंथियों की ये हरकत विकिपीडिया पर हैरान करने वाली नहीं है। विकिपीडिया पर इन्हें समय-समय पर कोई भी एडिंटिंग करने की आजादी है। अभी दो हफ्ते पहले नोआखाली दंगों में हिंदू-मुस्लिम शब्दों में हेर-फेर कर दिया गया था और हिंदू विरोधी दंगों को मुस्लिम विरोधी दंगे दर्शाने की कोशिश हुई थी। इसके अलावा विकिपीडिया के लेखों में संपादन करने का अधिकार रखने वालों ने तबलीगी जमातियों के कोरोना हॉटस्पॉट होने की जानकारी को भी डिलीट किया था और इसे मुस्लिम विरोधी कहा था।

IIT हैदराबाद में वेतन और घर वापसी को लेकर 2400 प्रवासी मजदूरों का हंगामा, पुलिस पर भी पथराव

आईआईटी (IIT) हैदराबाद में निर्माण स्थल पर काम कर रहे लगभग 2,400 प्रवासी मजदूरों ने बुधवार (अप्रैल 29, 2020) सुबह घर वापस भेजने की माँग को लेकर विरोध-प्रदर्शन किया। देखते ही देखते मजदूरों की भीड़ उग्र हो गई और कुछ मजदूरों ने वहाँ तैनात पुलिस टीम पर पथराव किया। इसमें एक पुलिसकर्मी को चोट आई और पुलिस की गाड़ी क्षतिग्रस्त हुई। यह जानकारी संगारेड्डी ग्रामीण पुलिस ने दी।

पहले दिल्ली, फिर सूरत और मुंबई के बाद अब तेलंगाना में फँसे मजदूर घर वापस जाने के लिए इकट्ठा हो गए। इस दौरान लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जी उड़ाई गई और पुलिसकर्मियों पर भी हमला किया गया। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि इस हमले में तीन पुलिसकर्मी घायल हो गए।

जानकारी के मुताबिक संगारेड्डी जिले के कंडी स्थित आईआईटी हैदराबाद में वेतन ना मिलने से गुस्साए सैकड़ों प्रवासी मजदूरों ने पहले निर्माण कम्पनियों के कुछ अधिकारियों पर हमला किया और बाद में मौके पर पहुँची पुलिस पर भी पथराव किया, जिसमें एक उप-निरीक्षक और दो पुलिस कर्मी घायल हो गए।

पुलिस ने बताया कि निर्माण स्थल के पास ये मजदूर प्रदर्शन कर रहे थे। ये दिहाड़ी माँग रहे थे और कोरोना वायरस से निपटने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के दौरान अपने घर वापस जाने देने की माँग कर रहे थे। संगारेड्डी जिले के पुलिस अधीक्षक एस चंद्रशेखर रेड्डी ने बताया कि प्रवासी मजदूरों ने कथित तौर पर पुलिस पर पथराव किया। इसमें पुलिस का एक वाहन क्षतिग्रस्त हो गया और एक उप-निरीक्षक ताथा दो पुलिस कर्मी घायल हो गए।

अधिकारियों के अनुसार मजदूरों का आरोप है कि आईआईटी से जुड़ी एक निर्माण कंपनी ने उन्हें मार्च का वेतन नहीं दिया था और उनसे बुधवार को आगे का काम शुरू करने को कह रहे थे। उग्र मजदूरों ने निर्माण कंपनी के अधिकारियों पर हमला कर दिया। मजदूरों को नियंत्रित करने के लिए पुलिस फोर्स को बुलानी पड़ी।

पुलिस अधीक्षक ने बताया कि अब मामला नियंत्रण में है। उन्होंने कहा कि इस बात की जाँच की जा रही है कि इस हमले में कौन-कौन लोग शामिल थे। जिला कलेक्टर हनुमंत राव ने बताया कि यहाँ पर झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा समेत 10 जिलों के मजदूर हैं, जो अपने घर वापस जाना चाहते हैं। जिला अधिकारियों ने प्रवासी श्रमिकों और निर्माण कंपनी के प्रतिनिधियों के बीच एक बैठक बुलाई।

प्रदर्शनकारी मजदूरों को प्रबंधन की ओर से कल शाम तक उनके बकाया वेतन के भुगतान का आश्वासन दिया गया था। इसके वे काम फिर से शुरू करने के लिए सहमत हुए। कलेक्टर ने कहा, “हम फिर से उनके साथ बातचीत करेंगे और उनकी सहमति देने के बाद काम शुरू किया जाएगा।” कलेक्टर ने बताया कि मजदूरों की मुख्य माँग घर जाने देने की थी।

पालघर मॉब लिंचिंग: असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर और दो हेड कांस्टेबल निलंबित

महाराष्ट्र के पालघर लिंचिंग मामले में कासा पुलिस स्टेशन के एक सहायक उप निरीक्षक और दो हेड कांस्टेबलों को निलंबित कर दिया गया है। इससे पहले इस मामले में मंगलवार (अप्रैल 28, 2020) को दो पुलिस निरीक्षकों को निलंबित किया गया था। 35 पुलिसकर्मियों का तबादला हो चुका है। यह जानकारी पालघर पुलिस के जनसंपर्क अधिकारी ने दी।

निलंबित किए गए पुलिसकर्मियों को प्राथमिक जाँच में हिंसा न रोक पाने का दोषी ठहराया गया था। साथ ही ये भी कहा गया कि और लोगों पर भी इस तरह की कार्रवाई हो सकती है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों महाराष्ट्र के पालघर के गड़चिनचले गाँव में दो साधुओं और एक ड्राइवर की पीट-पीटकर निर्मम हत्‍या कर दी गई थी। यह पूरी घटना वहाँ मौजूद कुछ पुलिसकर्मियों के सामने हुई। इसके बाद हुई जाँच में भी पुलिस की लापरवाही सामने आई है। इन तीनों के भीड़ के हाथों पीट-पीटकर मारे जाने की घटना पर पूरे देश में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। फिलहाल इस पूरे मामले की जाँच सीआईडी कर रही है।

पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई करते हुए 110 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। इनमें से 101 को 30 अप्रैल तक पुलिस हिरासत में भेज दिया गया है। नौ नाबालिगों को एक किशोर आश्रय गृह में भेज दिया गया है। वहीं अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरी ने उद्धव सरकार और पुलिस को साधुओं की हत्या के लिए ज़िम्मेदार ठहराया है। उन्‍होंने यह भी कहा कि समझौतावादी राजनीति के चलते शिवसेना और उद्धव ठाकरे हिदुत्‍ववादी एजेंडे से भटक गए हैं। उन्‍होंने कहा कि महाराष्ट्र में साधु-संत सुरक्षित नही हैं।

वहीं अखिल भारतीय संत समिति केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर इस मामले की सीबीआई जाँच की माँग कर चुकी है। पत्र में उन्होंने हत्या के पीछे बड़ी साजिश की आशंका जताते हुए कहा कि उन्हें महाराष्ट्र के गृह मंत्री पर भरोसा नहीं है।

इसके साथ ही आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, “2 साधुओं की हत्या। क्या यह होना चहिए? क्या कानून-व्यवस्था किसी को हाथ में लेना चाहिए था? ऐसे में पुलिस की भूमिका क्या होनी चाहिए थी? ये सभी चीजें ऐसी हैं जिन पर सोचा जाना चाहिए।” 

फिल्मकार मनीष मुंद्रा ने बताया कैसे ट्विटर पर एकजुट हुए अनजान लोग, लॉकडाउन में मदद को आए आगे

कोरोना वायरस महामारी की वजह से दुनिया भर में तहलका मचा हुआ है। इस खतरनाक बीमारी ने लोगों के सामने कई संकट और कठिनाइयॉं पैदा की। मौत के आँकड़ों में हो रही वृद्धि के साथ ही लॉकडाउन की वजह से भी लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। भारत में 25 मार्च से देशव्यापी लॉकडाउन लागू हुआ और इसका सबसे ज्यादा असर प्रवासी मजदूरों पर पड़ा। संकट की इस घड़ी में सभी लोग अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंदों की मदद के लिए आगे आए। इन्हीं में से एक हैं- लोकप्रिय बॉलीवुड फिल्म मसान के प्रोड्यूसर मनीष मुंद्रा।

बता दें कि मनीष मुंद्रा लॉकडाउन से पहले भी संकट में फँसे लोगों की मदद के लिए योगदान देते रहे हैं। उन्होंने 22 मार्च को हुए जनता कर्फ्यू से पहले भी भाजपा नेता कपिल मिश्रा की अपील पर दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगे में पीड़ित परिवार को 10 लाख रुपए की मदद दी थी। वहीं जनता कर्फ्यू से एक दिन पहले कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों के इलाज के लिए 70 वेंटिलेटर्स के लिए 3 करोड़ रुपए देने का संकल्प लिया था।

इसके बाद से मनीष मुंद्रा वुहान कोरोना वायरस के खिलाफ भारत की लड़ाई में सक्रिय रूप से भाग ले रहे है। वह अस्पतालों में पीपीई किट वितरित कर रहे हैं। उन्होंने नागपुर, देहरादून, मुरैना, यवतमाल, दरभंगा और अहमदाबाद जैसे स्थानों पर भी पीपीई किट वितरित किए हैं। इस जगहों के अलावा भी उन्होंने कई अस्पतालों में पीपीई किट वितरित किए हैं। साथ ही वो उन लोगों के लिए पाइपलाइन की तरह भी काम कर रहे हैं, जो जरूरतमंदों की मदद करना चाहते हैं, लेकिन उनके पास इसका जरिया नहीं है।

मनीष मुंद्रा ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा, “मेरा सबसे बड़ा मकसद अपने देश का इस कठिन समय में मदद करना है और विशेष रूप से फ्रंटलाइन मेडिकल और सपोर्ट स्टाफ का। अगर हम उनकी रक्षा कर सकते हैं तो हम लंबी लड़ाई लड़ सकते हैं। यह कोरोना वायरस की लड़ाई जीतने की मूल बातें हैं। अगर डॉक्टर और नर्स हारते हैं तो इसका मतलब है कि हम हारते हैं।” उन्होंने बताया कि लॉकडाउन के दौरान शुरुआत में उन्हें थोड़ी सी परेशानी हुई, मगर फिर सभी चीजें ठीक हो गईं।

प्रोड्यूसर आगे कहते हैं, “जैसा कि कहा गया है कि जब हम अच्छा काम करते हैं, तो भगवान भी हमारी मदद करते हैं। ऐसा ही मेरे साथ हुआ। मुझे ट्विटर पर अनुभूति के रूप में एक बहुत ही बेहतरीन शख्स मिली। वो संचालन और सुचारू रूप से व्यवस्था करने में काफी माहिर थी। वो हमारी टीम का हिस्सा बनीं और फिर तब से हमें किसी तरह की मदद पहुँचाने में कोई समस्या नहीं हुई।”

इसके बाद मुंद्रा और उनकी टीम ने पके हुए भोजन के पैकेट भी वितरित करने शुरू कर दिया। रोजाना 3-4 लाख रुपए का खाना सप्लाई किया जा रहा है।

इसके अलावा मनीष मुंद्रा उन लोगों की भी मदद कर रहे हैं जो लॉकडाउन से प्रभावित लोगों को राशन किट दान कर रहे हैं। लोगों ने अन्य लोगों की मदद करने के लिए उनके प्रति आभार व्यक्त किया है। मनीष कुंद्रा से प्रेरणा लेकर कई अन्य लोगों ने भी अपने तरीक से जरुरतमंदों की मदद के लिए हाथ बढ़ाया है।

इसके साथ ही कुंद्रा बॉलीवुड इंडस्ट्री और स्पोर्ट्स इंडस्ट्री से भी महामारी के खिलाफ देश की इस लड़ाई में योगदान देने की अपील की है। उन्होंने जोर दिया कि सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में यथासंभव पीपीई वितरित करने की आवश्यकता है। इसके अलावा, मनीष मुंद्रा ने वितरण को योजनाबद्ध तरीके से करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “हमें महाराष्‍ट्र, एमपी, यूपी, राजस्‍थान, बिहार, झारखंड के सभी प्रमुख अस्‍पतालों में पीपीई वितरण के लिए एक राज्‍यवार योजना बनाने की जरूरत है। वहाँ के हॉटस्पॉट में प्रमुख अस्पतालों की पहचान करें और उन्हें पीपीई किट भेजें।”

इस महामारी के बीच, मनीष मुंद्रा ने “लेट्स डू मोर” का नारा दिया है। वह कहते हैं कि पूरी टीम जो कोरोना से लड़ने के लिए ट्विटर पर एक साथ आई है, उनमें से अधिकांश लोग कभी एक-दूसरे से मिले भी नहीं हैं। उन्होंने कहा, “पूरी टीम ट्विटर के माध्यम से बनी। अब हमारे पास कुछ और टीम के सदस्य हैं जो भारतीय रेल, भारतीय डाक और अन्य कूरियर सेवाओं की मदद से हमारे लिए 3-4 दिनों में दूर के गंतव्यों तक पहुँचना संभव बना रहे हैं।अनुभूति, देवांग दवे, अंकित जैन, भूमिका, धर्मेंद्र चोंकर… हम सभी ट्विटर पर एक साथ आए।”

कानपुर में पुलिस और मेडिकल टीम पर पथराव: योगी सख्त, रासुका और गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई

कानपुर में कोरोना संक्रमण के हॉटस्पॉट चमनगंज में पुलिस और मेडिकल टीम पर स्थानीय लोगों ने हमला किया। टीम एक कोरोना पॉजिटिव मरीज के परिवार को क्वारंटाइन कराने के लिए उनके घर लेने पहुॅंची थी। पुलिस ने स्वास्थ्य विभाग व संक्रमित मरीज के परिवार को किसी तरह हॉटस्पॉट से बाहर निकाला।

इसके बाद पथराव कर रहे लोगों को खदेड़कर स्थिति पर काबू पाया। तनाव को देखते हुए पीएसी ने फ्लैग मार्च किया है। पथराव करने वालों को चिह्नित कर पुलिस उनकी गिरफ्तारी में जुट गई है।

कानपुर में अब तक 200 कोरोना पॉजिटिव मिल चुके हैं। यहाँ चमनगंज थाना क्षेत्र हॉटस्पॉट एरिया घोषित है। बुधवार को गुलाब घोषी मस्जिद के पास स्वास्थ्य विभाग और पुलिस की टीम एक कोरोना संक्रमित मरीज के परिवार के सदस्यों को क्वारंटाइन कराने के लिए लेने के लिए गई थी। स्वास्थ्य टीम संक्रमित मरीज के परिवार के सदस्यों को साथ लेकर चलने लगी तभी काफी सारे लोग घरों से बाहर निकल आए।

सभी परिवार के सदस्यों को ले जाने का विरोध करने लगे। जब पुलिस ने उन्हें रोकने का प्रयास किया तो पथराव शुरू कर दिया। पुलिस ने किसी तरह से स्वास्थ्य विभाग की टीम को मौके से निकाल दिया। इसके बाद कई थानों के फोर्स को बुलाकर पत्थरबाजों को खदेड़ दिया। घटना स्थल पर भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।

सीओ त्रिपुरारी पांडेय ने कहा, “एक शख्स कोरोना पॉजिटिव निकला था, जिसको हम लोग पहले ही क्वारंटाइन करा चुके हैं। उसके परिवार वालों को चिन्हित किया गया था। बुधवार को स्थानीय पुलिस और मेडिकल टीम मौके पहुँची तभी आस-पड़ोस के लोग 50 से 60 की संख्या में आए और पत्थरबाजी करने लगे। इसमें कुछ लोगों को चिह्नित कर लिया गया है। उनके विरूद्ध मुकदमा दर्ज कर कठोर कार्रवाई की जा रही है। किसी को किसी प्रकार की चोट नहीं आई है।”

मुख्यमंत्री ने कहा- हमला करने वालों पर लगाया जाए रासुका

इस घटना पर तुरंत सज्ञान लेते हुए सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि पुलिस और स्वास्थ्यकर्मियों पर हमला करने वालों की जल्द पहचान की जाए। ऐसे लोगों के खिलाफ महामारी अधिनियम और आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया जाए। इसके साथ ही सीएम योगी ने कहा कि आरोपितों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) और गैंगस्टर एक्ट के तहत भी सख्त कार्रवाई की जाए। कोरोना योद्धाओं पर हमले बर्दाश्त नहीं किए जाएँगे।

पुलिस पर पथराव की यह पहली घटना नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसी घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। मंगलवार (अप्रैल 28, 2020) को पश्चिम बंगाल के हावड़ा में लॉकडाउन का पालन करवाने गई पुलिस के ऊपर हमला किया गया था। आक्रामक भीड़ को काबू करने के लिए रैपिड एक्शन फोर्स को बुलाना पड़ा था। सोमवार (अप्रैल 27, 2020) को महाराष्ट्र के औरंगाबाद में मस्जिद में नमाज पढ़ने को रोकने गई पुलिस पर लोगों ने पथराव किया। इस घटना में 1 पुलिसकर्मी घायल हो गए। मामले में पुलिस ने अब तक 15 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया है। पुलिस पर पथराव करने वाली भीड़ में महिलाएँ भी शामिल थीं।

इससे पहले शुक्रवार को उत्तर प्रदेश में कई स्थानों पर लॉकडाउन का उल्लंघन कर सामूहिक रूप से नमाज अदा की गई। बहराइच, शाहजहाँपुर में नमाजियों ने पुलिस टीम पर हमला कर दिया। फिरोजाबाद में घंटों मजहबी नारे लगाए। इसके बाद एम्बुलेंस को निशाना बनाते हुए तोड़फोड़ की गई। इसी तरह दिहवाकला स्थित मस्जिद में नमाजियों ने सिपाहियों पर हमला बोल दिया।

लॉकडाउन की 3 बड़ी उपलब्धियाँ, आगे की योजनाएँ ताकि बेहतर तरीके से हो सके चुनौती का सामना

विश्वव्यापी कोरोना संकट ने अब तक 2 लाख से अधिक लोगों की जीवन-लीला समाप्त कर दी है। विश्व के बड़े-छोटे सभी देश इस अदृश्य और अति सूक्ष्म शत्रु के सामने विवश नज़र आ रहे हैं। अभी तक के अनुभव के आधार पर बचाव ही इसका सबसे कारगर उपचार है। इसी मूलमंत्र का अनुसरण करते हुए भारत में 25 मार्च से 14 अप्रैल तक लॉकडाउन किया गया। इस लाइलाज महामारी से लड़ने में लॉकडाउन की प्रभावी भूमिका और सकारात्मक परिणामों को दृष्टिगत रखते हुए इसे 3 मई तक के लिए और बढ़ा दिया गया।

40 दिन लम्बे इस लॉकडाउन का निर्णय सरकार ने इसके नफ़ा-नुकसान का समुचित आकलन करके ही लिया था। तमाम अर्थशास्त्रियों ने इस लॉकडाउन के आर्थिक दुष्परिणामों के प्रति सरकार को आगाह करते हुए कहा था कि इतना लम्बा लॉकडाउन न सिर्फ भारतीय अर्थव्यवस्था को धराशायी कर देगा, बल्कि देश की जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को भूख और बेकारी से पूरी तरह तबाह करके जन-हानि को कोरोना से कई गुना अधिक कर देगा।

महामारी और रोजी-रोटी के दो पथरीले पाटों के बीच पिसने वालों में मजदूर, रेहड़ी-ठेला-रिक्शा वाले, सीमान्त किसान, छोटे दुकानदार आदि प्रमुख हैं। ये भारत की जनसंख्या का 40 प्रतिशत से अधिक हैं। सरकार ने अर्थव्यवस्था की सेहत की जगह देशवासियों की सेहत को प्राथमिकता देते हुए इतने लम्बे लॉकडाउन का दूरदर्शी और साहसिक निर्णय लिया। साथ ही, उसने इतने लम्बे लॉकडाउन के नकारात्मक परिणामों और प्रभावों से निपटने की भी अत्यंत मानवीय पहल करते हुए सबके लिए भोजन, दवाई आदि का समुचित प्रबंध किया। सरकार के इन प्रयासों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे तमाम स्वयंसेवी संगठनों और नागरिक समाज ने भी अभूतपूर्व सहयोग किया। इस आपदा ने ‘राष्ट्रभाव’ का पुनर्भव करके राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण और एकात्म संस्कृति की संभावना का संकेत दिया है।

लेकिन यह भी सत्य है कि लॉकडाउन एक अस्थायी व्यवस्था या अंतरिम इलाज ही है। इसे अनिश्चित काल तक लागू नहीं किया जा सकता है। इसलिए अब आवश्यकता इस बात की है कि इस दिशा में गंभीरतापूर्वक विचार किया जाए कि लॉकडाउन को कब और कैसे समाप्त किया जाए और वर्तमान महामारी से आगे कैसे निपटा जाए! साथ ही, इस आपदाकाल के अनुभवों का आत्मसातीकरण किया जाए। निःसंदेह, ये अनुभव राष्ट्रीय आत्मा के भावी दिशा-निर्देशक हैं।

40 दिन लम्बे इस लॉकडाउन के तीन सबसे बड़े प्राप्य ये हैं कि इस बीच सरकार ने इस महामारी से निपटने के लिए आवश्यक स्वास्थ्य-सेवा ढाँचे को विकसित और उससे सम्बंधित प्रबंधों को चुस्त-दुरुस्त कर लिया है। यानी कि इस महामारी से निपटने के लिए सरकार को तैयारी का पर्याप्त समय मिल गया है। दूसरे, भारत में यह संक्रमण तीसरे चरण अर्थात् सामुदायिक संक्रमण स्तर पर नहीं पहुँच सका है।

यूरोप के देशों का अनुभव बताता है कि सामुदायिक संक्रमण स्तर पर पहुँचकर यह महामारी अनियंत्रित हो जा रही है और परिणामस्वरूप जन-हानि कई गुना बढ़ जाती है। इस अर्थ में यह विशेष उपलब्धि है कि भारत जैसे देश में, जहाँ जनसंख्या बेहिसाब है और उसके अनुपात में स्वास्थ्य-सेवाओं और जागरूकता का चिंताजनक अभाव है, इस भयावह संक्रमण को सामुदायिक स्तर पर फैलने से पहले ही रोक लिया गया है। हालाँकि, दिल्ली के निज़ामुद्दीन में हुए तबलीगी जमात के जमावड़े और संक्रमित जमातियों द्वारा देश भर में इस संक्रमण का पैगम्बर (ब्रांड एम्बेसैडर) बन जाने और शासन तथा स्वास्थ्यकर्मियों के साथ पूर्ण असहयोग और अभद्रता करने के कारण स्थिति जैसे-तैसे नियंत्रित हो सकी है।

लॉकडाउन की तीसरी और बड़ी उपलब्धि लोगों के बीच इस महामारी को लेकर पैदा हुई जागरूकता है। तमाम तरह की सांस्कृतिक-भौगोलिक विविधता, धार्मिक संकीर्णता और शैक्षणिक-आर्थिक पिछड़ेपन के बावजूद प्रत्येक देशवासी इस महामारी की गंभीरता से परिचित हो गया है और मुट्ठीभर अपवादों के अलावा सभी देशवासी एक राष्ट्र के रूप में संगठित होकर मनसा, वाचा, कर्मणा मनुष्यता के इस सबसे बड़े शत्रु से निपटने में एकमत और एकजुट हैं।

कोरोना के खिलाफ जारी इस लड़ाई में राष्ट्र-रक्षकों- जिनमें कि स्वास्थ्यकर्मी, पुलिसकर्मी, मीडियाकर्मी, सफाईकर्मी और रोजमर्रा की वस्तुएँ उपलब्ध कराने वाले शामिल हैं, की भूमिका निर्णायक रही है। उन्होंने अपने घर की चारदीवारी की सुरक्षा से बाहर निकलकर और अपनी जान जोखिम में डालकर लॉकडाउन की उपरोक्त उपलब्धियों को संभव किया है। केंद्र सरकार की तरह पहल करते हुए प्रत्येक राज्य सरकार को भी कोरोना से लड़ने वाले सभी स्वास्थ्य-कर्मियों (डॉक्टर से लेकर आशा कार्यकर्ता और सफाई कर्मी तक) के लिए 50 लाख रुपए के जीवन बीमे का अतिरिक्त प्रावधान करना चाहिए।

यह मानवीय निर्णय न सिर्फ कोरोना योद्धाओं के परिवार को सामाजिक सुरक्षा कवच प्रदान करेगा, बल्कि उनके मनोबल को बढ़ाकर इस अभूतपूर्व युद्ध में उनकी मनोयोगपूर्ण भागीदारी सुनिश्चित करके विजयश्री दिलाएगा। स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा और सम्मान के मद्देनजर केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए ताजा कानून से वे बिना किसी बाधा या व्यवधान के अपना काम कर सकेंगे। इस कानून में स्वास्थ्यकर्मियों पर हमला करने वालों या उनके काम में बाधा उत्पन्न करने वालों के लिए 7 साल की सजा का प्रावधान किया गया है।

अब भारत को दो तरह की योजना बनाकर काम करने की महती आवश्यकता है- एक ओर, तात्कालिक योजनाएँ बनाते हुए इस महामारी से निपटते हुए लॉकडाउन की क्रमिक समाप्ति की जाए। और दूसरी ओर, दूरगामी योजनाएँ बनाकर भारत की अर्थनीति और भारतवासियों की जीवन-शैली में आमूल-चूल परिवर्तन की दिशा में काम किया जाए।

भारत को विकास की वैकल्पिक परिभाषा गढ़ने की आवश्यकता है। एक ग्रामोन्मुखी और विकेन्द्रीकृत विकास मॉडल ही “सर्वे भवंतु सुखिनः, सर्वे संतु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिददुखभागभवेत।।” जैसी सर्व-कल्याण कामना को सार्थक और संभव कर सकता है। भारत को पश्चिमोन्मुखी और पूँजीवादी विकास मॉडल को निरस्त करते हुए एक देशज और अधिक भारतीय विकास मॉडल दुनिया के सामने प्रस्तावित करना चाहिए। महात्मा गाँधी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय की वैचारिक विरासत भारतवासियों की इस तलाश का पाथेय है।

3 मई के बाद लॉकडाउन को हटाने के लिए भी दो स्तरों पर काम करने की आवश्यकता है। अब भारत को कनाडा, रूस, जर्मनी जैसे देशों की तरह ‘सीमित लॉकडाउन’ और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की तरह ‘असीमित परीक्षण’ का मिश्रित मॉडल अपनाने की आवश्यकता होगी। अभी तक कोरोना संक्रमण के ‘हॉट स्पॉट्स’ की पहचान कर ली गई है। अगले सप्ताह तक स्थिति और भी स्पष्ट हो जाएगी। चिह्नित किए गए सभी ‘हॉट स्पॉट्स’ को पूरी तरह सील कर दिया गया है। आगे भी पकड़ में आने वाले ‘हॉट स्पॉट्स’ के मामले में कोई ढील न देते हुए सील करने की कार्रवाई को पूरी सख्ती से जारी रखने की आवश्यकता है।

पूरे देश को कोरोना संक्रमण के फैलाव की संभावना के अनुसार रेड जोन, ऑरेंज जोन और ग्रीन जोन में बाँटा जा रहा है। इसी प्रकार ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ और संक्रमण फैलने के खतरे के आधार पर सामाजिक/सार्वजनिक जीवन की तमाम गतिविधियों और कार्यालयी/औद्योगिक कामों को भी रेड केटेगरी, ऑरेंज केटेगरी और ग्रीन केटेगरी में बाँटा जाना चाहिए। यह वर्गीकरण अन्य देशों के साथ-साथ भारत के संक्रमण सम्बन्धी अनुभवों और सम्बंधित विशेषज्ञों से व्यापक विचार-विमर्श के आधार पर किया जाना चाहिए।

रेड जोन वाले क्षेत्रों और गतिविधियों को अभी लॉकडाउन में ही रखा जाना चाहिए। ऑरेंज जोन वाले क्षेत्रों और गतिविधियों को भारी एहतियात बरतते हुए लॉकडाउन मुक्त किया जा सकता है। इस जोन में असीमित परीक्षणों पर निरंतर ध्यान देने की आवश्यकता होगी। ग्रीन जोन वाले क्षेत्रों और गतिविधियों को सामान्य सुरक्षात्मक सावधानियों के साथ लॉकडाउन से मुक्त किया जा सकता है।

भीड़भाड़ वाली गतिविधियों और अपेक्षाकृत कम जरूरी धार्मिक-सामाजिक कार्यक्रमों और मेल-मिलाप को कम-से-कम 6 माह के लिए पूर्ण प्रतिबंधित रखा जाना चाहिए। सार्वजनिक परिवहन को भी अत्यंत नियंत्रित रखा जाना चाहिए और प्रवेश द्वार पर ही यात्रियों के संक्रमण-परीक्षण की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। सार्वजनिक वाहनों और सम्बंधित परिसरों का नियमित सैनिटाइजेशन भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

शिक्षा क्षेत्र भी लॉकडाउन से अप्रभावित नहीं रहा है। ज्यादातर विश्वविद्यालयों में इस सेमेस्टर की परीक्षाएँ नहीं हो सकी हैं। उच्च-स्तरीय नीति-निर्माताओं द्वारा ऑनलाइन परीक्षा लेने के विषय में गंभीरतापूर्वक विचार किया जा रहा है। लेकिन देश में ई-इन्फ्रास्ट्रक्चर की वर्तमान स्थिति और उपलब्धता को देखते हुए यह व्यावहारिक विकल्प नहीं है। इसलिए अभी सिर्फ अंतिम सेमेस्टर के विद्यार्थियों की परीक्षा लेने पर ही ध्यान दिया जाना चाहिए। स्थिति में थोड़ा और सुधार आते ही उनकी परीक्षा ‘सोशल डिस्टेन्सिंग’ का पालन करते हुए कराई जा सकती है।

लॉकडाउन समाप्त होने पर ज़ोन विशेष के संक्रमण स्तर के अनुसार इस विषय में निर्णय लिया जा सकता है। शेष विद्यार्थियों की परीक्षा या तो अगले सेमेस्टर के साथ कराई जा सकती है या फिर पिछले सभी सेमेस्टरों के परीक्षाफल का औसत निकालकर इस सेमेस्टर का परीक्षाफल तैयार किया जा सकता है। विद्यार्थी के पूर्ववर्ती परीक्षाफल पर आधारित होने के कारण इससे ‘गुणवत्ता’ भी प्रभावित नहीं होगी।

असाधारण स्थितियों में असाधारण निर्णय लेने होते हैं। यदि केंद्र सरकार से परामर्श करके विश्वविद्यालय अनुदान आयोग केन्द्रीय स्तर पर ऐसा कोई निर्णय करता है तो फिर विद्यार्थियों के करियर पर भविष्य में भी कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। भविष्य में विश्वविद्यालयों में कक्षाएँ भी एकसाथ प्रारम्भ न करके तीन-चार चरणों (फेज) और दो पालियों (शिफ्ट) में शुरू की जानी चाहिए। इससे परिसर में एकसाथ बहुत ज्यादा भीड़भाड़ नहीं होगी और सोशल डिस्टेन्सिंग का सीमित अनुपालन करते हुए विद्यार्थियों का संक्रमण-परीक्षण आदि भी भली प्रकार किया जा सकेगा। ग्रीन जोन और ऑरेंज जोन क्षेत्र में आने वाले विश्वविद्यालयों और विद्यालयों में ग्रीष्मावकाश में से लॉकडाउन के दिनों को काटकर शिक्षण की भरपाई भी की जा सकती है।

लॉकडाउन के दौरान मानव संसाधन विकास मंत्रालय के निर्देश पर विभिन्न विश्वविद्यालयों और विद्यालयों में ‘ऑनलाइन शिक्षण’ किया गया है। हालाँकि, इस कार्य में शिक्षकों और शिक्षार्थियों को विविध और व्यापक समस्याओं का सामना करना पड़ा है। फिर भी, इस अनुभव ने भविष्य के लिए एक मार्ग सुझाया है- वह मार्ग है ऑनलाइन शिक्षण का। निश्चय ही, ऑनलाइन शिक्षण कक्षा-शिक्षण का स्थानापन्न नहीं हो सकता; किन्तु विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम और शिक्षकों के वर्कलोड के एक चौथाई (25%) भाग को ऑनलाइन पढ़ाने के प्रावधान किए जाने चाहिए।

इसी प्रकार जिन सरकारी और गैर-सरकारी कार्यालयों में संभव हो, वहाँ भी कम-से-कम एक चौथाई (25%) काम ‘वर्क फ्रॉम होम’ कराने का नीतिगत निर्णय सरकार द्वारा लिया जाना चाहिए। इससे न सिर्फ भविष्य में ऐसी किसी आपदा के समय बड़ी सहायता मिलेगी, बल्कि ध्वनि एवं वायु प्रदूषण और ट्रैफिक जाम से भी बड़ी राहत मिलेगी। आवागमन में शिक्षकों और विद्यार्थियों के नियमित लगने वाले बहुमूल्य समय की भी कुछ बचत हो सकेगी। पेट्रोल-डीजल जैसे आयात किए जाने वाले ईंधन की खपत कम होने से अरब देशों पर भारत की निर्भरता भी कुछ कम होगी।

जहाँ एक नपुंसक ने मुग़ल शहजादों को औरतों के कपड़े में नचाया: लाल किला की कहानी

लाल किला का भारत के इतिहास में अहम स्थान है। हर स्वतंत्रता दिवस पर 15 अगस्त को भारत के प्रधानमंत्री यही पर झंडोतोलन करते हैं और फिर यहाँ से राष्ट्र को सम्बोधित करते हैं। अप्रैल 29 के दिन ही 1639 में इसकी नींव पड़ी थी।

इससे कुछ ही दूरी पर स्थित है सलीमगढ़ किला, जिसे शेरशाह सूरी ने बनवाया था। लाल किले के बनने से पहले मुग़ल जब आगरा से दिल्ली आते थे तो इसे ही अपना ठिकाना बनाते थे। ख़ासकर गर्मियों में ऐसा होता था। जहाँ पर किला-ए-कहुना, यानी पुराना किला स्थित था, उस जगह को मुग़ल मनहूस मानने लगे थे क्योंकि वहाँ हुमायूँ की असमय मृत्यु हुई थी।

कैसे बना था लाल किला?

शाहजहाँ चाहता था कि वो एक नया शहर बसाए, आगरा की तरह- नदी के किनारे बसा हुआ। मकरमत खान को इस किले के निर्माण के निगरानी की जिम्मेदारी दी गई और ग़ैरत ख़ान को उसकी सहायता करने भेजा गया। उस्ताद हामिद और उस्ताद अहमद को इस किले के निर्माण की जिम्मेदारी सौंपी गई। शाहजहाँ ख़ुद इसके निर्माण में दिलचस्पी ले रहा था और वास्तुकला से जुडी चीजों की भी समीक्षा करता था। जब वो शहजादा था, तब अहमदाबाद का गवर्नर रहते हुए उसे आर्किटेक्चर की अच्छी ट्रेनिंग मिली थी। लिहाजा उसे इन चीजों की समझ थी। ऐसा कहा जाता है कि शाहजहाँ वेश बदल कर भी निर्माण स्थल पर जाता था।

हालाँकि, लाल किला की नींव भले ही 29 अप्रैल को पड़ गई थी लेकिन इसके निर्माण की प्रक्रिया 12 मई को शुरू हुई थी। इतने दिन का अंतराल रखने की वजह यह पता लगाना था कि कुछ ही दूर बह रही यमुना से इस निर्माण को ख़तरा तो नहीं होगा? लाल किला 1648 में बन कर अंतिम रूप से तैयार हुआ। दीवान-ए-आलम की दीवालों को सिल्क से ढका गया और दरबार में फर्श पर महँगे कार्पेट बिछाए गए। चीन और तुर्कमेनिस्तान से सिल्क और वेलवेट मँगाए गए थे। शाहजहाँ ने नदी की तरफ वाले गेट से किले में पहली बार क़दम रखा और उसके बेटे ऊपर से उस पर स्वर्णमुद्राओं की बारिश कर रहे थे।

शाहजहाँ भी ख़ुश था। उसने अपनी बेटी जहाँआरा को 1 लाख रुपए दिए और बेटे दारा के रैंक को बढ़ा दिया। उसे उम्दा हथियार व 20 हज़ार घोड़े दिए। प्रिंस सुलेमान और सिफर को क्रमशः 300 और 250 रुपए का भत्ता देने की घोषणा की गई, जो पहले से ज्यादा था। मकरमत खान को भी ‘पंज हजारी’ का खिताब देकर उसे 5000 घोड़ों से नवाजा गया। ऊँटों, घोड़ों और हाथियों के बड़े-बड़े जत्थों ने पूरे शहर में एंट्री ली। इस तरह का दृश्य 1911 में ही इसके बाद देखने को मिला था, जब अँग्रेजों ने नई दिल्ली में जॉर्ज V और क्वीन मेरी का राज्याभिषेक किया। ऐसी ही चहल-पहल तब भी थी।

लाल किला को बनाने में उस समय खुल कर रुपए लुटाए गए थे। दीवालों और उसके चारों तरफ घेरा बनाने के लिए 21 लाख खर्च किए गए थे। पूरे पैलेस पर 67 लाख रुपए खर्च किए गए थे। पैलेस में स्थित पब्लिक बिल्डिंग पर 28 लाख रुपए खर्च किए गए। दीवान-ए-ख़ास को बनाने में 14 लाख रुपए और दीवान-ए-ख़ास को बनाने में ढाई लाख लगे थे। रंग महल और ख़ास महल के निर्माण में साढ़े 5 लाख रुपए ख़र्च किए गए। 6 लाख रुपए में हयात बख्श बाग़ को तैयार किया गया। जहाँआरा बगल और अन्य मुग़ल घराने की महिलाओं ने ज़नाना इमारत बनाने में 7 लाख रुपए अलग से ख़र्च किए।

जब नपुंसक रोहिल्ला ने मुगलों के बीच जाकर मचाया कोहराम

लाल किले की अब कुछ अन्य पहलुओं पर चर्चा करते हैं, जो इसके इतिहास से आपको रू-ब-रू करवाएगा। वो 1739 का समय था, जब पर्शिया के नादिर शाह ने दिल्ली पर आक्रमण किया और यहाँ ऐसा कत्लेआम मचाया कि किसी की भी रूह तक काँप उठे। नादिर शाह ने मुग़ल बादशाह शाह आलम को हरा दिया। उसकी फ़ौज ने दिल्ली को लूटना शुरू कर दिया। लोगों को मारा जाने लगा। यहाँ तक कि आम लोगों को भी मार कर उसके शवों को क्षत-विक्षत किया गया। वो मार्च 7, 1739 का दिन था जब नादिर शाह लाल किले में घुसा। 10 मार्च को 30,000 लोगों का क्रूरता से कत्लेआम किया गया।

मई 1739 में नादिर शाह पर्शिया तो लौटा लेकिन साथ में वो लाल किले से ‘पीकॉक थ्रोन’ लूट कर ले गया। उसके साथ कई ऐसी चीजें थीं, जो उसने दिल्ली से लूटी थीं। इसके 7 साल बाद अफ़ग़ानिस्तान से अहमद शाह दुर्रानी दिल्ली पहुँचा। उसने दिल्ली पर कब्जा कर लिया और लूट शुरू कर दी। इसके बाद रोहिल्ले लड़ाके दिल्ली पहुँचे और उन्होंने कब्ज़ा कर लूट मचाई। उस समय के बादशाह शाह आलम II को क़ैद कर अंधा कर दिया गया। ये रेड डालने वाले रोहिल्ला का नाम था गुलाम कादिर खान। उसके आदमी ‘छिपे खजाने’ की तलाश में लाल किले की छान मारते रहे।

गुलाम कादिर का किस्सा काफ़ी महशूर और रोचक है। उसने शाह आलम के सभी 19 बेटों को जेल में ठूँस दिया और प्रताड़ित करवाया। उसने लगभग ढाई महीने तक मुगलों को अपने कब्जे में रखा। शहजादों को कोड़े से पिटवाया और शहजादियों का यौन शोषण किया गया। इसके बाद जैसे ही मराठा महादजी शिंदे को ये सब पता चला, उन्होंने पुणे में बैठे पेशवा की अनुमति लेकर दिल्ली की तरफ ख़ुद मार्च किया और यहाँ क़ानून-व्यवस्था को नियंत्रित किया। इतिहासकार डब्ल्यू फ्रैंकलिन लिखते हैं कि रोहिल्लों ने लाल किले में जो किया, वो उन्हें 18वीं शताब्दी के सबसे क्रूर विलेन्स में से एक बनाता है। गुलाम कादिर को महादजी सिंधिया ने धर-दबोचा था और उसे उसके किए की ऐसी सज़ा दी गई कि दुनिया के सामने ये एक मिसाल बना।

सबसे बड़ी बात कि रोहिल्ला ने मुग़ल बादशाह शाह आलम के सारे बेटों-पोतों को औरतों के वस्त्र पहना कर नचवाया और अपने फ़ौज के मनोरंजन के लिए उनका इस्तेमाल किया। शहजादियों के कपड़े फाड़ डाले गए और उन्हें नंगा कर उनका यौन शोषण किया गया। इसके पीछे की एक दिलचस्प कहानी है, जो आपको लाल किले में हुए इस हादसे का बैकग्राउंड समझने में मदद करेगी। दरअसल, शाह आलम ने गुलाम कादिर के पिता को हरा दिया था। तब कादिर मात्र 10 साल का था और देखने में काफी अच्छा था। बादशाह ने उसका लिंग कटवा दिया और उससे महिलाओं के वस्त्र में डांस करवाया जाता था।

गुलाम कादिर के बारे में ये भी कहा जाता है कि बादशाह ने उसके साथ काफी समय तक अप्राकृतिक सेक्स किया था। इन्हीं चीजों के कारण गुलाम कादिर ने इस तरह का बदला लिया। तो ये कहानी थी लाल किले के अच्छे और बुरे दिनों की, मुगलकाल में।

आज ये लालकिला देश की शान है, जहाँ से दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री हर स्वतंत्रता दिवस पर देश को संबोधित करते हैं।

(सोर्स: Red Fort: Remembering the Magnificent Mughals By Debasish Das)
(सोर्स 2: The Blinding of a Mughal emperor by Manu S. Pillai)

इरफान खान की मौत पर बाहर निकला कट्टरपंथियों का मजहबी टार, भद्दी गलियों से दी आखिरी विदाई

बॉलीवुड अभिनेता इरफान खान की मौत की खबर से देश शोक में डूबा है। लेकिन इस्लामिक कट्टरपंथी अपनी मजहबी घृणा का प्रदर्शन करने से बाज नहीं आए। इसकी वजह है इरफ़ान खान द्वारा इस्लाम की कुरीतियों और मजहबी कट्टरता पर बेबाकी से रखे गए विचार हैं।

इरफ़ान खान की मौत की खबर के बाद सोशल मीडिया पर कट्टरपंथियों ने उनकी मौत का उपहास बनाने का काम किया है। इरफ़ान खान को गन्दी गालियाँ दी जा रही हैं और कहा जा रहा है कि वह इस्लाम के नाम पर धब्बा थे। यह सब सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने इस्लाम, आतंकवाद, रोजा और रमजान के साथ ही बकरीद पर पशुओं को काटे जाने पर अपनी राय रखते हुए इन्हें कुर्बानी के नाम पर किया जाने वाला पाखंड बताया था।

सज्जाद हैदर नाम के युवक ने इरफ़ान खान की मौत पर उनकी एक ऐसी खबर शेयर की है, जिसमें इरफ़ान खान ने दो दिन पहले खरीदी हुई बकरी की कुर्बानी देने को गलत बताया था। सज्जाद ने इस खबर के साथ लिखा है- “Mar gye mardood, Fateha na darood” उर्दू में मरदूद शब्द का इस्तेमाल ‘नीच या तिरस्कृत’ के लिए किया जाता है।

वहीं ट्विट्टर पर अक्सर भड़काऊ और हिन्दुओं के विरोध में लिखने के लिए कुख्यात कथित जर्नलिस्ट अली शोहराब (Ali Sohrab) जो कि आखिरी बार हिंदू समाज पार्टी के नेता कमलेश तिवारी की हत्या पर जश्न मनाने वाले ट्वीट को लेकर हुई गिरफ्तारी से चर्चा में आया था, ने लिखा है – “इस्लाम या इस्लाम के रुकन खासकर कुर्बानी के कट्टर विरोधी थे इरफ़ान खान। खैर, खेल दिखाकर चला गया ‘मदारी।’

एक अन्य ट्वीट में काकावाणी नाम के इसी अकाउंट से लिखा गया है, “नाम में खान तो चंगेज और हलाकु के भी थे।… इस्लाम को सबसे अधिक नुकसान इन दोनों ने ही पहुँचाया। कुर्बानी व रोजे से इनको दिक्कत थी… अगर नाम में खान होने की वजह से ‘मगफिरत की दुआ’ करनी ही है तो हलाकु खान… चंगेज खान के लिए भी करो।”

ऐसे ही कई और पोस्ट आज सोशल मीडिया पर देखे गए जिनमें इरफ़ान खान को सिर्फ मजहबी कट्टरता के कारण निशाना बनाया है। यह भी देखने लायक बात है कि एक ओर जिन हिन्दुओं पर लिबरल गिरोह अक्सर इस्लामोफ़ोबिक होने का आरोप लगाते फिरते हैं, वो सभी इरफ़ान की लोकप्रियता और उनके प्रति स्नेह के कारण शोक में डूबे हैं।

यह भारत जैसे देश की वास्तविकता भी बनती जा रही है कि वह मजहब विशेष के लोग, जो अपने कार्यों, मेहनत के कारण लोकप्रिय बने, इस्लामिक कट्टरपंथियों ने उन्हें अक्सर निशाना बनाया है। बजाए आत्मविश्लेषण के, खुद को मजहब का मसीहा बताने वाले लोगों ने कट्टरपंथियों को गलत राह की ओर ही अग्रसर होने का निर्देश दिया है, जबकि वो सिर्फ भड़काऊ बयानबाजी कर चर्चा का विषय बने रहना ज्यादा पसंद करते हैं।

लॉकडाउन में फँसे लोगों को बड़ी राहत: प्रवासी मजदूरों, छात्रों और सैलानियों को घर लौटने की इजाजत

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने देश के अलग-अलग जगहों पर फँसे प्रवासी मजदूरों, पर्यटकों, विद्यार्थियों आदि को आवाजाही की अनुमति दे दी है। गृह मंत्रालय की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि सभी राज्य और केंद्रशासित प्रदेश अपने यहाँ फँसे लोगों को उनके गृह राज्यों में भेजने और दूसरी जगहों से अपने-अपना नागरिकों को लाने के लिए स्टैंडर्ड प्रॉटोकॉल तैयार करें। यानी, अब हर प्रदेश दूसरे प्रदेशों से अपने नागरिकों को वापस ला पाएगा और अपने यहाँ फँसे दूसरे प्रदेशों के नागरिकों को वहाँ भेज पाएगा।

गृह मंत्रालय ने जारी ऑर्डर में कहा है कि राज्य और केंद्रशासित प्रदेश इस काम के लिए नोडल अथॉरिटीज नामित करेंगे। फिर ये अथॉरिटीज अपने-अपने यहाँ फँसे लोगों का रजिस्ट्रेशन करेंगी। जिन राज्यों के बीच लोगों की आवाजाही होनी है, वहाँ की अथॉरिटीज एक-दूसरे से संपर्क कर सड़क के जरिए लोगों की आवाजाही सुनिश्चित करेंगी।

हालाँकि, जो लोग जाना चाहेंगे, उनकी स्क्रीनिंग की जाएगी। अगर उनमें कोविड-19 के कोई लक्षण नहीं दिखेंगे तो उन्हें जाने की अनुमति होगी। लोगों की आवाजाही के लिए बसों का उपयोग किया जा सकेगा। बसों को सैनिटाइज करने के बाद उसमें सोशल डिस्टेंसिंग के नियम के मुताबिक ही लोगों को बिठाया जाएगा।

कोई भी राज्य इन बसों को अपनी सीमा में प्रवेश करने से नहीं रोकेगा। डेस्टिनेशन पर पहुँचने के बाद लोगों की लोकल हेल्थ अथॉरिटीज की ओर से जाँच की जाएगी। बाहर से आए लोगों को घूमने-फिरने की अनुमति नहीं होगी और उन्हें होम क्वारंटाइन में ही रहना होगा। जरूरत पड़ी तो उन्हें अस्पतालों/स्वास्थ्य केंद्रों में भी भर्ती किया जा सकता है। उनकी समय-समय पर जाँच होती रहेगी। ऐसे लोगों को आरोग्य सेतु का इस्तेमाल करना होगा ताकि उनके स्वास्थ्य पर नजर रखी जा सके।

बता दें कि स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी ताजा आँकड़ों के मुताबिक भारत में कोरोना वायरस संक्रमितों की संख्या 31787 हो गई है। पिछले 24 घंटों में कोरोना के 1813 नए मामले सामने आए हैं और 71 लोगों की मौत हुई है। वहीं, देश में कोरोना से अब तक 1008 लोगों की मौत हो चुकी है, हालाँकि राहत की बात यह है कि 7797 मरीज इस बीमारी को हराने में कामयाब भी हुए हैं।

गौरतलब है कि पिछले दिनों दिल्ली और महाराष्ट्र में घर जाने के लिए प्रवासियों का जमावड़ा देखने को मिला था। दिल्ली से प्रवासियों के भारी पलायन को लेकर उपराज्यपाल अनिल बैजल ने दिल्ली सीएम अरविंद केजरीवाल को एक चिट्ठी लिखी थी। चिट्ठी में बैजल ने कड़े शब्दों में केजरीवाल से कहा था कि लॉकडाउन को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए दिल्ली सरकार के पास सभी शक्तियाँ थीं, फिर भी ऐसा नहीं हो सका।

वहीं महाराष्ट्र के बांद्रा में हज़ारों की संख्या में प्रवासी मजदुर जुट गए, जो अपने घर जाने की माँग कर रहे थे। पुलिस ने उन मजदूरों को तितर-बितर करने के लिए लाठियाँ चटकाई। ये मजदूर माँग कर रहे हैं कि इन्हें वापस इनके घर भेजा जाए, जो दूसरे राज्यों में है।

2895 मस्जिदों को 5450 टन फ्री चावल, 47 मंदिरों को देने होंगे ₹10 करोड़: तमिलनाडु सरकार का आदेश

तमिलनाडु सरकार ने 47 मंदिरों को CM राहत कोष में ₹10 करोड़ रुपए देने का आदेश दिया है। इसके विपरीत राज्य सरकार ने 16 अप्रैल को रमजान के महीने में प्रदेश की 2,895 मस्जिदों को 5,450 टन मुफ्त चावल वितर‌ित करने आदेश दिया था, ताकि रोजेदारों को परेशानी ना हो। वास्तव में मदिरों को ऐसा आदेश देने के पीछे तमिलनाडु सरकार की तुष्टिकरण की नीति जिम्मेदार है।

ऐसे समय में, जब मंदिर प्रशासन को सरकार के चंगुल से मुक्त कराने के लिए संघर्ष तेज हो रहा है, तमिलनाडु सरकार के हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग (HR and CE) ने 47 मंदिरों को गरीबों की देखभाल करने के लिए निर्धारित राशि के अलावा CM राहत कोष में 10 करोड़ रुपए अतिरिक्त देने का निर्देश दिया है।

भाजपा ने लगाईं मंदिरों में भोजन करवाने की स्वीकृति की गुहार

भाजपा की तमिलनाडु इकाई के अध्यक्ष एल मुरुगन ने शनिवार को अन्नाद्रमुक सरकार से गरीबों और साधुओं को भोजन कराने के लिए राज्य में हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग के रखरखाव वाले मंदिरों में अन्नदानम (भूखों को भोजन परोसना) फिर से शुरू करने का आग्रह किया। मुरुगन ने कहा कि सरकार ने समुदाय विशेष के लोगों की दलीलों का सम्मान किया है और रमज़ान के खाने के लिए मुफ्त चावल आवंटित किया है।

तमिलनाडु सरकार के इस निर्देश की आलोचना की मुख्य वजह यह भी है कि इस प्रकार का निर्देश इसाई और मजहबी संस्थानों को नहीं दिया गया है, जिन्हें सालाना सरकारी अनुदान प्राप्त होते रहते हैं। इससे पहले मद्रास हाईकोर्ट ने रमजान के महीने में मस्जिदों में मुफ्त चावल वित‌रित करने के तमिलनाडु सरकार के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिका को खारिज कर दिया था।

इसके लिए पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के उस बयान को नजीर बनाया जिसमें शीर्ष अदालत ने कहा था कि सरकार किसी भी समुदाय को तीर्थयात्रा के लिए मदद देने के विचार के ‌विरोध में नहीं है। उदाहरण के लिए सरकार द्वारा कुंभ का खर्च वहन करने और भारतीय नागरिकों को मानसरोवर तीर्थ यात्रा में मदद का जिक्र किया था। हालाँकि पीठ ने यह जिक्र नहीं किया कि कोरोना के दौरान बंद मंदिर ऐसी स्थिति में सरकार के फैसले का क्या करें?

HR और CE के नियंत्रण में हैं राज्य के 47 मंदिर

HR और CE के प्रधान सचिव के पनिंद्र रेड्डी ने मदुरै, पलानी, थिरुचेंदुर, तिरुतनी, तिरुवन्नमलई, रामेश्वरम, मयलापुर सहित 47 मंदिरों में उनके अधीन काम करने वाले सभी अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे लॉकडाउन के कारण गरीबों को भोजन खिलाने की दिशा में सरप्लस फंड से 35 लाख रुपए का योगदान दें। अन्य मंदिरों को 15 लाख रुपए से 25 लाख रूपए तक की राशि देने के लिए निर्देशित किया गया है। सभी 47 मंदिरों को दस करोड़ के अधिशेष कोष को सीएम कोरोना रिलीफ फंड में स्थानांतरित करना है।

उल्लेखनीय है कि HR और CE तमिलनाडु में 36,612 मंदिरों का प्रबंधन करते हैं। ये संपन्न मंदिर अपने अधिशेष कोष से संरक्षण/ नवीकरण/बहाली करते हैं। लाखों पुजारी पूर्ण रूप से श्रद्दालुओं के दान पर निर्भर रहते हैं। कोरोना महामारी और देशव्यापी बंद के कारण अब वे असहाय हो चुके हैं और भुखमरी का सामना कर रहे हैं। इस पर तमिलनाडु राज्य सरकार ने उनकी मदद करने के बजाए अपनी तुष्टिकरण की राजनीति को साधने के लिए हिंदू मंदिरों की संपत्ति को निशाना बनाया है।

HR और CE द्वारा जारी सरकारी आदेश

रमजान के पर्व की शुरुआत में ही, तमिलनाडु राज्य सरकार ने कथित अल्पसंख्यकों को एक बड़ा लाभ देने की घोषणा की थी। दिवंगत सीएम जयललिता ने मजहब विशेष के दिल और वोटों को जीतने के लिए इसे शुरू किया था। तमिलनाडु सरकार ने घोषणा की थी कि इस साल दलिया तैयार करने के लिए 2,895 मस्जिदों को 5,450 टन चावल दिया जाएगा, जो कि साधारण गणना के अनुसार 2,1,80,00,000 रुपए निकल आती है।

कथित अल्पसंख्यकों की तरह हिन्दुओं को नहीं मिलती है त्योहारों में कोई छूट

जबकि इसी प्रकार की कोई मदद या योजना चित्रा और अनादि महीनों के दौरान हिंदुओं के ग्राम देवताओं को प्रसाद तैयार करने के लिए नहीं दी जाती हैं। सभी लोग इस बात को जानते हैं कि लॉकडाउन के कारण मंदिरों में उत्सव रद्द कर दिए गए हैं लेकिन ऐसा लगता है कि हिंदू मंदिर के पैसे की कीमत पर मजहब विशेष का तुष्टिकरण सरकार के लिए महत्वपूर्ण है।

वर्तमान तमिलनाडु सरकार की नीति से लगता है कि वह हिंदू मंदिरों को पूरी तरह से निचोड़ने का प्रयत्न कर रही है। तमिलनाडु सरकार हिंदुओं के मंदिरों से हंडी संग्रह, प्रसाद, विभिन्न दर्शन टिकट, विशेष कार्यक्रम शुल्क, आदि के माध्यम से प्रतिवर्ष 3000 करोड़ रुपए से अधिक वसूल करती है, जबकि केवल 4-6 करोड़ रुपए रखरखाव के लिए दिए जाते हैं। बाकी 2,995 करोड़ रुपए सरकार के पास रहते हैं।

वहीं, श्रीविल्लिपुथुर वैष्णवित मठ प्रमुख सदगोपा रामानुज जियार ने तमिलनाडु सरकार से मंदिर के पैसे को पुजारी और सेवकों को देने के लिए खर्च करने का आग्रह किया है। पुथिया तमीजगम के प्रमुख डॉ. कृष्णस्वामी ने सीएम से मंदिरों से प्राप्त 10 करोड़ रुपए की राशि वापस करने की अपील की है।