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निजामुद्दीन मरकज में जुटी भीड़ को छिपाने में स्थानीय लोगों का हाथ, मदद के लिए गई एंबुलेंस रास्ते से लौटाई?

21 दिनों के लॉकडाउन का तय दिशा-निर्देशों के तहत पालन करने वाला भारत का नागरिक इस उम्मीद में है कि जब वह दोबारा बाहर आजादी से सड़कों पर निकलेगा तो उसे संक्रमण रहित वातावरण मिलेगा। मगर, मजहब के नाम पर देश को महासंकट में डालने वाले चंद कट्टरपंथियों का इससे कोई लेना-देना नहीं है। वे सब कुछ जानते-समझते हुए परिस्थितियों को चुनौतीपूर्ण बना रहे हैं। दिल्ली में निजामुद्दीन का मामला देखिए। यहाँ तबलीगी जमात के मजहबी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए सैंकड़ों लोग पहुँचे थे और कार्यक्रम खत्म होने के बाद भी मस्जिद में रुके रहे। लेकिन इसकी जानकारी किसी ने पुलिस या प्रशासन को नहीं दी। 

नतीजतन, थोड़े दिनों में इलाके में कोरोना के लक्षण वाले मामले दिखने लगे। नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार प्रशासन ने जब सूचना मिलते ही आवश्यक कार्रवाई करनी चाही, तो वहाँ के स्थानीय लोगों ने उनका साथ नहीं दिया और कड़ा विरोध करके एंबुलेंस को ही इलाके से लौटा दिया। बाद में जब मामला नियंत्रण से बाहर हो गया, तो डॉक्टरों की टीम को सहयोग करना शुरू किया गया। लेकिन पूरा मामला खुलासा होने के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या उस समय जब स्थानीय लोगों ने एंबुलेंस की गाड़ी लौटाई, तब क्या ये लोग इन लोगों को छिपाने का प्रयास कर रहे थे।

गौरतलब कि हजरत निजामुद्दीन स्थित मरकज में मलेशिया, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और किर्गिस्तान समेत कई देशों के करीब 2500 से अधिक लोगों ने 1 से 15 मार्च तक तब्लीग-ए-जमात में हिस्सा लिया था। जिनका पता लगने के बाद से पूरे इलाके की कड़ी निगरानी की जा रही है और हर संदिग्ध को अस्पताल में एहतियात के तौर पर भर्ती किया जा रहा है। इनमें से 24 लोगों की रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव निकल आई है। जबकि 860 लोगों को अस्पतालों में भर्ती किया जा चुका है और 300 लोग और भी अस्पताल भेजे जाने हैं।

बता दें कि दिल्ली में सोमवार को 25 और नए मरीज सामने आए थे। इनमें 18 कोरोना पीड़ित निजामुद्दीन में तब्लीगी मरकज में शामिल होने वाले निकले। आज के 24 लोग अब इस संख्या में और जुड़ गए। मतलब दिल्ली में कोरोना पॉजिटिव के हालिया मामले में से 50% से ज्यादा मामले सिर्फ इस एक कार्यक्रम में शामिल होने वाले लोग हैं। अब इन्हीं बिंदुओं को देखते हुए हजरत निजामुद्दीन के इस मरकज पर कानूनी कार्रवाई की तैयारी चल रही है। हालाँकि, मरकज में अपनी सफाई में कहा है कि वह लगातार प्रशासन के संपर्क में है।

20000 कोच, 320000 बेड्स: भारतीय रेलवे ने किया कमाल, क्वारंटाइन के लिए नहीं कमरों की कोई कमी

जहाँ एक तरफ दुनिया भर के कई देशों की प्रशंसा की जा रही है कि किसने कितने दिनों में कितने बिस्तरों वाला अस्पताल बनवा दिया, भारतीय रेलवे ने भी एक उल्लेखनीय कार्य किया है। भारत में कोरोना वायरस के मरीजों की संख्या डेढ़ हज़ार के पार जाने को है और उनमें से 47 की मौत हो चुकी है। ऐसे में भारत पर सबकी नज़र है क्योंकि कम जनसंख्या वाले विकसित देशों में कोरोना वायरस ने जिस तरह से तबाही मचाई है, उनके मुकाबले काफ़ी ज्यादा जनसंख्या और साधन-सुविधा का मामले में उनसे कम सम्पन्न भारत इससे कैसे निपटता है।

भारतीय रेलवे ने ट्रेनों के 20,000 कोच को क्वारंटाइन और आइसोलेशन कोच बना दिया है। इसके लिए पूरी तैयारी कर ली गई है। भारत में क्वारंटाइन फैसिलिटी के लिए बड़ी संख्या में कमरों की ज़रुरत है, इसी कमी को पूरा करने के लिए इंडियन रेलवे आगे आया है। कुल 5 जोनल रेलवे ने पहले ही उन क्वारंटाइन सेंटरों का प्रोटोटाइप तैयार कर लिया है। उन्हें ‘क्वारंटाइन/ आइसोलेशन कोचेज’ कहा जाएगा। इनमें आइसोलेशन की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए 3.2 लाख बिस्तर लगाए जा सकते हैं।

भारतीय रेल मंत्रालय ने जानकारी दी है कि इन 20 हजार कोच में कुल 3.2 लाख लोगों के लिए बेड्स की व्यवस्था की जा सकती है। भारतीय रेलवे अन्य तरीकों से भी इस आपदा की घड़ी में लोगों की सेवा करने में लगा हुआ है। हाल ही में पंजाब के मोगा से 390 टन खाद्य पदार्थों को एक पार्सल स्पेशल ट्रेन के जरिए असम के चंगसारी पहुँचाया गया। इनमें डेयरी प्रोडक्ट्स और नूडल्स सहित कई अन्य चीजें शामिल थीं। रेलवे ने जनता को जागरूक करते हुए बताया है कि भारतीय रेल सेवा कभी युद्धकाल में भी नहीं रुकी, ऐसे में वो स्थिति की गंभीरता को समझें और घरों में ही रहें।

भारत में अभी 15 अप्रैल तक लॉकडाउन चलेगा, जिसमें लोगों को घरों में ही रहने की सलाह दी गई है। रेलवे की सभी पैसेंजर ट्रेनों को बंद कर दिया गया है, ऐसे में उनका कोरोना वायरस के मरीजों के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। सारी ट्रेनों को सैनिटाइज्ड कर लिया गया है।

कोरोना ने इस्लाम को ख़तरे में डाल दिया है, या अल्लाह! इसे काफ़िर मुल्कों की तरफ़ मोड़ दो: मौलाना ने की दुआ

जहाँ एक तरफ कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया को हलकान कर रखा है और लोग इससे बचाव के उपाय करने में जुटे हैं, कुछ मुल्ला-मौलवी सिर्फ़ अन्धविश्वास की बातें कर अफवाह फैलाने में लगे हुए हैं। पाकिस्तान के एक मौलवी ने कबूतर के शरीर के एक विशेष स्थान को पका कर खाने को कोरोना वायरस से संक्रमण का इलाज बताया था। अब वहीं के एक और मौलवी ने अल्लाह से दुआ की है कि कोरोना वायरस ‘को काफिर मुल्कों’ की तरफ भेज दिया जाए।

समझा जा सकता है कि काफिर से उनका इशारा किस तरफ था। कट्टरपंथियों का मानना है कि इस्लाम को न मानने वाले लोग काफिर होते हैं। नीचे संलग्न किए गए वीडियो में आप उस पाकिस्तानी मौलवी को दुआ करते हुए देख सकते हैं। दुआ में वो कहता है कि “कोरोना वायरस ने इस्लाम को ख़तरे में डाल दिया है, या अल्लाह इसे काफिर मुल्कों की तरफ़ पलटा दे।” जहाँ पाकिस्तान ख़ुद कोरोना वायरस और कमजोर नेतृत्व के संकट से जूझ रहा है, वहाँ के मुल्ले-मौलवी लोगों को जागरूक करने की बजाए इसी तरह की हरकतों में लगे हुए हैं।

उक्त मौलवी ने कहा कि अल्लाह ने अगर मदद नहीं की तो कोरोना सब कुछ ख़त्म कर देगा। उधर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने पूरे देश में लॉकडाउन पर विचार करने से इनकार कर दिया है। उन्हें अर्थवयवस्था की चिंता सता रही है। वो पहले भी कह चुके हैं कि अगर पाकिस्तान में लॉकडाउन हुआ तो खाने के लाने पड़ जाएँगे। मुल्क में कोरोना वायरस के मरीजों की संख्या 2000 के पार होने को है लेकिन इमरान ने लोगों को घर में रहने और बीमार होने के बावजूद हॉस्पिटलों में लाइन न लगाने की सलाह दी है।

भारत में भी मौलवियों और मस्जिदों के नखरे नहीं थम रहे हैं। कई मस्जिदों को जानबूझ कर खुला रखा गया तो पटना, राँची और दिल्ली की मस्जिदों में विदेशी नागरिकों को छिपाया गया। इनमें से कई कोरोना पॉजिटिव मिले हैं। एक अन्य घटना के दौरान जब पुलिस एक मौलवी के पास मदद के लिए गई तो उसने लोगों को नमाज पढ़ने के लिए भीड़ न जुटाने की सलाह देने से इनकार कर दिया।

डॉक्टर ने गिनाई खामियाँ तो रातोंरात उठा कर ले गई पुलिस: ममता के बंगाल में चीन की तर्ज पर कार्रवाई

पश्चिम बंगाल के एक डॉक्टर को सरकार से शिकायत करने की सज़ा दी गई। कैंसर स्पेशलिस्ट इंद्रनील ख़ान ने शिकायत की थी कि पश्चिम बंगाल के अस्पतालों में डॉक्टर रेनकोट पहन कर अपना कार्य करने को विवश हैं। यहाँ तक कि वहाँ के डॉक्टरों को घटिया गुणवत्ता वाले मास्क पहनने को मजबूर होना पड़ रहा है। चूँकि कोरोना मरीजों का इलाज करने वाले डॉक्टर और मेडिकल कर्मचारी पहली पंक्ति में हैं, इसीलिए उनके संक्रमित होने का ज्यादा ख़तरा है। ऐसे में उन्हें ज़रूरी संसाधन और उपकरण न मुहैया कराया जाना ममता बनर्जी की सरकार की ग़लती है। इसी ग़लती को डॉक्टर ख़ान ने उजागर किया।

डॉक्टर ख़ान ने सीधा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से गुहार लगाई कि अगर स्थिति संभाली नहीं गई तो इससे बड़ी तबाही हो सकती है। उनकी इस शिकायत के बाद पश्चिम बंगाल के ‘स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग’ ने डॉक्टर ख़ान को इस मुद्दे को हाइलाइट करने के लिए धन्यवाद दिया। विभाग ने बताया कि डॉक्टरों को माइक्रो-फाइबर से बने ‘पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट’ देने की व्यवस्था की जा रही है, जो सभी मानकों पर खड़ा करें। इसके बाद डॉक्टर ख़ान ने विभाग को उनकी शिकायत सुनने के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि मेडिकल कर्मचारी व डॉक्टर्स सबसे ज्यादा कोरोना की जद में हैं, ऐसे में उनके लिए ये व्यवस्थाएँ होनी चाहिए।

अब ख़बर आई है कि ऑन्कोलॉजिस्ट डॉक्टर इंद्रनील ख़ान को रातोंरात माहेस्थाला पुलिस उठा कर ले गई और उन्हें हिरासत में रख लिया गया। कहा जा रहा है कि सरकार की खामियों को उजागर करने की उन्हें सज़ा दी गई है। बता दें कि चीन में जिन भी डॉक्टरों या प्रबुद्ध जनों ने कोरोना वायरस को लेकर आवाज़ उठाई थी, उन्हें कार्रवाई का सामना करना पड़ा था। कइयों को तो गायब भी कर दिया गया था। भाजपा आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने डॉक्टर ख़ान के ख़िलाफ़ कार्रवाई किए जाने का विरोध किया है।

कहा जा रहा है कि डॉक्टर ख़ान को जिंजीरा बाजार इन्वेस्टीगेशन सेंटर में हिरासत में लेकर रखा गया। उन्हें रविवार (मार्च 29, 2020) को रात 9:30 बजे उठाया गया और रात 2 बजे तक हिरासत में रखा गया। साथ ही उनका फोन सीज कर लिया गया। मालवीय ने आरोप लगाया है कि गंभीर रूप से बीमार उनके कैंसर मरीजों को भी प्रताड़ित किया जा रहा है। बता दें कि सोमवार को उनके ट्विटर हैंडल से पश्चिम बंगाल सरकार की तारीफ़ में ट्वीट किया था। मालवीय का आरोप है कि उन्हें इसी शर्त पर छोड़ा गया कि वो ममता सरकार की तारीफ़ करें।

बता दें कि पश्चिम बंगाल में कोरोना के अब तक 26 मामले सामने आ चुके हैं और उनमें से 4 की मृत्यु हो चुकी है। कुल 22 सक्रिय मामले अभी भी मौजूद हैं। इनमें से किसी को भी ठीक नहीं किया जा सका है। ऐसे में तृणमूल कॉन्ग्रेस की सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं पर ध्यान देने की बजाए खामियों की तरफ ध्यान दिलाने वालों पर कार्रवाई करने में लगी हुई है।

पाकः इस्लामी प्रचारक तबलीगी जमात के 27 सदस्य कोरोना पॉजिटिव, टेस्ट के दौरान एक ने पुलिस पर किया चाकू से हमला

पाकिस्तान में इस्लामिक प्रचारक तबलीगी जमात के 27 सदस्यों में कोरोना वायरस की पुष्टि हुई है। रायविंड के तबलीगी मरकज सेंटर में 35 लोगों की स्क्रीनिंग की गई थी। दरअसल, ऐसा संदेह था कि रायविंड रोड स्थित तबलीगी मरकज और विभिन्न मस्जिदों से कोरोना वायरस जगह-जगह फैला। इसके बाद ही स्थानीय प्रशासन ने तबलीगी के कई प्रचारकों को हिरासत में लेकर क्वारंटाइन किया था। 

पाकिस्तानी अखबार ‘द डॉन’ की रिपोर्ट के मुताबिक, जब क्वारंटाइन सेंटर में सभी तबलीगी जमातियों का टेस्ट किया जा रहा था तो उनमें से एक प्रचारक ने क्वारंटाइन से बचने के लिए पुलिस ऑफिसर SHO अशरफ मलिक माखी पर चाकू से हमला कर दिया और भागने की कोशिश की। हालाँकि, हमलावर को पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में स्वाबी जिले से पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। वहीं पुलिस अधिकारी को लेय्या में डीएचक्यू अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बताया जा रहा है कि फिलहाल पुलिस अधिकारी की हालत स्थिर बनी हुई है।

करीब 1200 तबलीगी जमात के प्रचारक 5 दिन के सम्मेलन में हिस्सा ले रहे थे जिनमें 500 विदेशी भी शामिल थे। इसके पहले फरवरी में प्रचार के लिए उन्होंने कई टीमें बनाई थीं। पंजाब सरकार ने आयोजकों से अपील की थी कि वह इस सम्मेलन को रद्द कर दें, लेकिन उन्होंने सरकार की नहीं सुनी। हालाँकि, बाद में उन्होंने मन बदल लिया और इसके बाद ही प्रांत में लॉकडाउन घोषित कर दिया गया था। जिसकी वजह से अब उनके घर जाने के लिए किसी तरह की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं थी। इसके बाद मरकज को सील कर दिया गया और 25 लोगों के आवास को क्वारंटाइन सेंटर में बदल दिया गया।

इससे पहले मार्च में तबलीगी जमात ने लाहौर के बाहरी इलाके में 1.5 लाख लोगों की एक मजहबी सभा का आयोजन किया था। इस सामूहिक सभा के परिणामस्वरूप कोरोना वायरस महामारी का भयंकर प्रसार देखा गया, क्योंकि इस सभा में हिस्सा लेने वाले लोगों ने सोशल डिस्टेंशिंग का पूर्ण रुप से उल्लंघन किया था।

इस मजहबी बैठक में भाग लेने वाले दो फिलिस्तीनी नागरिक कोरोना वायरस टेस्ट में पॉजिटिव पाए गए, और इन दोनों के संक्रमित होने की पुष्टि के साथ ही गाजा में कोरोना संक्रमण का पहला केस सामने आया। संक्रमित मरीजों को रफा शहर के एक अस्पताल में आइसोलेशन वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। इससे पहले इजराइल और मिस्र से गाजा में प्रवेश करने वाले लगभग 1,270 लोगों को क्वारंटाइन कर दिया गया था। वेस्ट बैंक में 55 लोगों में कोरोना वायरस का पता चला है। 

एहतियात के तौर पर वेडिंग हॉल और बाजार बंद कर दिए गए हैं। अब यहाँ पर सीमित परीक्षण क्षमताओं के साथ इस क्षेत्र में पैनिक की स्थिति पैदा हो गई है। गाजा में लगभग 20 लाख लोगों की देखभाल के लिए मात्र 60 ICU बेड हैं। कर्मचारियों की भारी कमी के कारण स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है।

वहीं भारत में दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन स्थित मरकज में मलेशिया, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और किर्गिस्तान समेत कई देशों के करीब 2500 से अधिक लोगों ने 1 से 15 मार्च तक तब्लीग-ए-जमात में हिस्सा लिया था। अब इनका पता लगने के बाद पूरे इलाके की कड़ी निगरानी की जा रही है और हर संदिग्ध को अस्पताल में एहतियात के तौर पर भर्ती किया जा रहा है। इनमें से 24 लोगों की रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव निकल आई है।

दिल्ली का वो अस्पताल जहाँ कोरोना संभावित 174 मरीज में से 163 निजामुद्दीन वाले: सरकार दर्ज कराएगी FIR

देश की राजधानी दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में मरकज तबलीगी जमात के मुख्यालय में 200 से ज्यादा लोगों के कोरोना संदिग्ध पाए जाने से हड़कंप मच गया है। दिल्ली सरकार ने मरकज के मौलाना के खिलाफ फौरन मुकदमा दर्ज करने को कहा है। उन पर आरोप है कि देश में लॉकडाउन होने के बाद भी उन्होंने इतना बड़ा धार्मिक आयोजन कराया। साथ ही इसके लिए उन्होंने कोई अनुमति भी नहीं ली थी।

दिल्ली मरकज की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि 24 मार्च को हजरत निज़ामुद्दीन थाने के SHO ने मरकज़ परिसर को बंद करने की माँग करते हुए एक नोटिस जारी किया था। 24 मार्च को इसका जवाब आया, जिसमें कहा गया कि मरकज़ को बंद करने के निर्देशों का पालन चल रहा है और पिछले दिन लगभग 1500 लोग वापिस भेज दिए गए हैं।

इसके बाद मरकज़ में विभिन्न राज्यों और देशों के लगभग 1000 विजिटर्स बच गए थे। यह भी बताया गया कि Ld. SDM को लोगों को उनके मूल स्थानों पर वापस भेजने के लिए वाहन के पास देने का अनुरोध किया गया था।

17 वाहनों के रजिस्ट्रेशन नंबर के साथ एक लिस्ट और ड्राइवरों के लाइसेंस का विवरण Ld. SDM को भेजा गया, ताकि फँसे हुए विजिटर्स को उनके मूल स्थान भेजा जा सके।

बताया जा रहा है कि इस मजहबी आयोजन में लगभग 300-400 लोग शामिल हुए थे। कोरोना संक्रमित होने की संभावना के बाद यहाँ मौजूद 163 लोगों को दिल्ली के लोक नायक अस्पताल में भर्ती कराया गया है। अस्पताल की ओर से कहा गया है कि उनके यहाँ कोरोना संक्रमण की संभावना वाले 174 मरीज भर्ती हैं, जिसमें से 163 निजामुद्दीन से ही आए हैं। 

बता दें कि इसमें शामिल होने वाले तेलंगाना के 6 लोगों की कोरोना वायरस से मौत हो गई। तेलंगाना के मुख्यमंत्री कार्यालय की तरफ से इस संबंध में बयान जारी करते हुए कहा गया है कि जिन लोगों ने 13 से 15 मार्च के बीच निजामुद्दीन इलाके के मरकज में मजहबी प्रार्थना सभा में भाग लिया था, उनमें से कुछ लोगों के बीच कोरोना वायरस का संक्रमण फैल गया है। इस मजहबी सभा में शामिल होने वालों में कुछ लोग तेलंगाना के भी थे, उनमें से 6 लोगों की मृत्यु हो गई। 

इधर दिल्ली सरकार ने भी इस पर संज्ञान लेते हुए मरकज के मौलाना के खिलाफ कड़ी कारर्वाई का निर्देश देते हुए कहा कि निजामुद्दीन मरकज के प्रशासकों ने कोरोना वायरस के मद्देनजर लागू लॉकडाउन की शर्तों का उल्लंघन किया और अब इसमें से कई लोगों को कोरोना पॉजिटिव पाया गया है। 

निजामुद्दीन मामले को लेकर दिल्ली सरकार की तरफ से जारी बयान में कहा गया कि 24 मार्च को पूरे देश में कोरोना की वजह से लॉकडाउन की घोषणा की गई थी। इसके बाद होटल, गेस्टहाउस, हॉस्टल और इस तरह के प्रतिष्ठानों के मालिक और प्रशासकों की यह जिम्मेदारी थी कि वह सोशल डिस्टेंशिंग का पूरी तरफ पालन करें। ऐसा लगता है कि यहां इसका पालन नहीं किया जा रहा था। यहाँ प्रशासकों ने कोरोना को लेकर जारी की गई गाइडलाइन का उल्लंघन किया और कोरोना पॉजिटिव रोगियों के कई मामले यहाँ पाए गए हैं। इस प्रतिष्ठान के प्रभारी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। लापरवाही के इस घिनौने कृत्य से कई जीवन खतरे में पड़ गए हैं। लॉकडाउन के दौरान लोगों का इस तरह के जमावड़े से बचना हर नागरिक की जिम्मेदारी थी और यह एक आपराधिक कृत्य के अलावा और कुछ नहीं है।

दिल्ली सरकार की तरफ से कहा गया है जब उन्हें केंद्र की तरफ से पहले कोरोना पॉजीटिव केस के बारे में बताया गया था और सहयोग के लिए कहा गया था, तभी उन्होंने उन सभी मरीजों को, जिनमें इस वायरस के लक्षण देखे गए उसे हॉस्पिटल में एडमिट किया गया और साथ ही जिनमें ये लक्षण नहीं पाए गए, उन्हें भी क्वारंटाइन सेंटर में शिफ्ट कर दिया गया।

मामला सामने आने के बाद दिल्ली पुलिस ने निजामुद्दीन इलाके में स्थित मस्जिद के आसपास के इलाके को खाली करा लिया है। यह मस्जिद निजामुद्दीन दरगाह के पास है। इसके अलावा यहाँ ड्रोन के माध्यम से निगरानी की जा रही है। दिल्ली पुलिस ने मजहबी कार्यक्रम आयोजित करने के मामले में आयोजकों को नोटिस जारी किया है। साउथ-ईस्ट दिल्ली के डीसीपी आरपी मीणा ने इसकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस मामले की जाँच की जा रही है। जरूरत पड़ने पर पुलिस इनके खिलाफ एक्शन लेगी और FIR दर्ज कर सकती है।

निजामुद्दीन के मरकज में मजहबी कार्यक्रम में आए कुछ लोगों के कोरोना पॉजिटिव मिलने की खबर के बाद दिल्ली पुलिस की टीम वहाँ पहुँची। वहाँ दिल्ली पुलिस के ज्वाइंट CP डीसी श्रीवास्तव भी मौजूद थे। यहाँ से कई लोगों को जाँच के लिए दिल्ली के अलग-अलग हॉस्पिटल ले जाया गया। मौके पर दिल्ली स्वास्थ्य अधिकारियों की टीम भी पहुँची थी, जिन्होंने रिपोर्ट दी थी कि इलाके में कुछ लोगों में कोरोना वायरस के लक्षण दिखाई दिए हैं। बता दें कि निजामुद्दीन स्थित मरकज इस्लाम की शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने वाला विश्व का सबसे बड़ा केंद्र है, जहाँ काफी देशों के लोग आते-जाते रहते हैं।

प्रशासन ने दिल्ली में उन मरीजों की जानकारी इकट्ठा की है, जिन्हें ठंड लगने या बुखार की समस्या हुई हो। दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज ने इससे संबंधित लिस्ट अधिकारियों को सौंपी है। निजामुद्दीन मरकज के प्रवक्ता मोहम्मद शोएब ने बताया कि यह लिस्ट प्रशासन को दी गई। इनमें से कई लोगों को उम्र के कारण और बाहर की यात्रा से लौटने के बाद हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। उनका कहना है कि इनमें से किसी के भी कोरोना पॉजिटिव होने की पुष्टि नहीं हुई है।

रामायण-महाभारत से चिढ़ते वो कुंठित हिन्दू-विरोधी पत्रकार, जो साध लेते हैं चुप्पी मस्जिदों व चर्चों के सवाल पर

भारत में जब से चाइनीज कोरोना वायरस (वुहान-2019) का खतरा बढ़ा है, तब से लगातार कुंठित पत्रकार कथित जागरूकता फ़ैलाने के नाम पर मेनस्ट्रीम मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से भाजपा शासित सरकारों और हिन्दू विरोध का घिनौना खेल खेल रहे हैं। चाइनीज वायरस के शुरुआती संक्रमण के दौरान ऐसे कुंठित लोगों ने कथित गो-मूत्र के नाम से हिन्दुओं का खूब मजाक भी उड़ाया। हिन्दुओं को अपमानित करने के उद्देश्य से मीम्स बनाए और स्टोरी प्लांट किया।

ऐसी ख़बरों के माध्यम से इन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि जैसे इस देश के गली-गली में गो मूत्र की दुकान हो और देश में गो मूत्र पीने के लिए हिन्दूवादी संगठन कोई फ़तवा जारी करते हों। इसलिए भारत में कोरोना का संक्रमण रोक पाना असंभव होगा। गोमूत्र से जुड़ी चक्रपाणि जैसे स्वयंभू ठीकेदारों की एक छोटी सी घटना को इन घटिया हिन्दुफोबिया से ग्रसित पत्रकारों ने इतना तूल दिया कि अतिश्योक्ति हो गया। जैसे चक्रपाणि हिन्दू धर्म का एक मात्र प्रतिनिधि हो जबकि ऐसे लोगों को सनातन में आस्था रखने वाले कोई भाव नहीं देते। यहाँ तक कि काशी विद्वत परिषद जैसे संस्थाओं ने उनकी इस हरकत पर लताड़ा भी।

बीबीसी का घोषित हिन्दूफोबिया?

इसी बीच देश चाइनीज वायरस (वुहान 2019) से जूझ रहा है। पूरा देश सामाजिक भेदभावों को भूला कर चाइनीज कोरोना वायरस के संक्रमण से लड़ रहा है। भारत के हजारों मंदिर और कई छोटे-बड़े हिन्दू और सिख स्वयंसेवी संस्थाओं ने इस चाइनीज संक्रमण से दुश्वारियाँ उठा रहे लोगों की मदद के लिए दिन रात तत्पर है। पटना के हनुमान मंदिर से लेकर तिरुपति बाला जी और शिरडी के साईं ट्रस्ट जैसे कई मंदिरों के ट्रस्ट ने अपने दान पात्र से सरकार को मदद दी है।

ऐसे दौर में भी बीबीसी जैसे एजेंडाधारी जिनका मकसद ही हिन्दू घृणा और भारत विरोध हो, कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते। इसी कड़ी में अगर बात करूँ तो बीबीसी हिंदी में राजेश प्रियदर्शी जो कि बीबीसी हिंदी के डिज़िटल एडिटर हैं। जो ‘कोरोना वायरस संक्रमण के आईने में दिखती वर्ण व्यवस्था की गहरी छाया’ ब्लॉग नामक एक लेख में बहुत ही हीन भावना से ग्रसित चाइनीज वायरस की आड़ में हिन्दुओं के बीच लगातार सामाजिक विभेद को हवा देकर एक काल्पनिक लेख लिख कर, अपने उसी एजेंडे को हवा देते हैं। बिना किसी सन्दर्भ के और वर्तमान में इस तरह के किसी विवाद के अस्तित्व की फर्जी बुनियाद पर ऐसे लोग हिन्दुओं को घेरने का काम कर रहे हैं।

बीबीसी का लेख

हिन्दूफोबिया से ग्रसित बीबीसी और इसका पत्रकार राजेश प्रियदर्शी लिखता है, (ऐसा इसलिए कि हिन्दू घृणा से सने ऐसे लोग सम्मान के काबिल नहीं हैं) कि “तिरुपति से लेकर वैष्णो देवी तक लोग मंदिरों में हज़ारों-लाखों रुपए दान करते हैं। विशाल मूर्तियाँ लगाने, भव्य मंदिर बनाने के नाम पर जितना भी चाहिए पैसा आ जाता है, मगर ग़रीबों के लिए हमारी मुट्ठी ज़रा कम ही खुलती है।”

मंदिरों और हिन्दुओं के प्रति घृणा से ग्रस्त बीबीसी जैसे मीडिया संस्थानों ने क्या कभी मस्जिदों और चर्चों से पूछा कि पूरी दुनिया में सैकड़ों इसाई और मुस्लिम मुल्कों से जुड़े मस्जिद और चर्च इस राष्ट्रीय आपदा में कितना सहयोग कर रहे हैं? या कितना दिया? क्या बीबीसी ने यह प्रश्न पूछा कि आत्मा की फसल काटने के लिए पूरी दुनिया से मिशनरी ताकत जब भारतीय हिन्दुओं के धर्म परिवर्तन पर करोड़ों रुपए खर्च करता है तो आज इस आपदा के समय वो क्या कर रहे हैं? 

जवाब बीबीसी जैसी संस्थाएँ नहीं देंगी, अगर नजर दौड़ाएँगे तो आपको हर तरफ दिखेगा कि एक तरफ जहाँ मंदिर बंद हैं और हिन्दुओं की संस्थाएँ कोरोना के समय में लॉकडाउन की वजह से प्रभावित लोगों की सेवा में लगी हुई हैं वही ऐसे कई मस्जिद और चर्च आज कोरोना फैलाने के केंद्र बने हुए हैं। तबलीगी जमात में निजामुद्दीन सहित देश के कई हिस्सों में जिस तरह से कोरोना के प्रसार में योगदान दिया है उस पर ये संस्थाएँ मौन हैं।

हिन्दू सॉफ्ट टारगेट है, इसलिए इनके खिलाफ जो मन होगा वो कोई भी हिन्दू घृणा से सना लिबरल वामपंथी से लेकर, इनके इकोसिस्टम का एक अदना सा बेवकूफ भी बोलने लगेगा। यहाँ तक कि, आपदा के समय को ये लोग हिन्दुओं के बीच विभेद को और गहराने के लिए एक मौके के रूप में देखते हैं?

बीबीसी के राजेश प्रियदर्शी जैसे लोगों को बताना चाहता हूँ क्योंकि इनकी ऑंखें हिन्दुओं में अच्छाई नहीं ढूँढ पाती हैं क्योंकि ये हिन्दू घृणा में अंधी हो चुकी हैं, ऊँचे-ऊँचे मंदिर बनवाते वक्त हिन्दुओं को हेल्थ सर्विस से लेकर कई मानवोपयोगी सेवाएँ याद रहती है। आज मंदिर और ऐसी हिन्दू संस्थाएँ करोड़ों लोगों के सेवा में तत्पर हैं। राजेश प्रियदर्शी एक उदाहरण आपके ही राज्य बिहार से देता हूँ। पटना का हनुमान मंदिर देखा है? ये मंदिर चढ़ावे के पैसे से एक सुन्दर कैंसर अस्पताल और एक दन्त चिकित्सालय बनवाया है।

देश में ऐसे हजारों उदाहरण हैं। हिन्दू इसाई मिशनरी की तरह नहीं कि आत्मा की फसल काटने के लिए ही अस्पताल बनवाएँ l शर्म करो और एक बात जायज समझो कि बेशक योगी जी कुम्भ में तीर्थ यात्रिओं के लिए पुष्प वर्षा करवाएँगे। काँवरियों के पाँव में कंकड़ ना चुभ जाए, इसके लिए सड़कों पर कालीन बिछाएँगे। अयोध्या में सैकड़ों लीटर तेल जला कर दीपोत्सव मनाएँगे। आखिर इन कामों से क्या समस्या है। कुछ भी हिन्दुओं के हित में हो यही नहीं देखा जाता न, यही सरकारें जब हज या मुस्लिम ईसाईयों को सुविधाएँ देती हैं, सैकड़ों योजनाएँ चल रही हैं। तब तो कोई विरोध करते हमने बीबीसी को आज तक नहीं देखा।

ऐसी सरकारें जिन वोटों से चुनकर आती हैं उनमें हिन्दू बहुतायत में हैं। और पैसा भी उन्हीं का है जो टैक्स के रूप में सरकारों को दिया जाता है। जिनके वोट से चुनकर आए हैं तो अगर उसी जनता को खुश करने के लिए सौ-पचास करोड़ खर्च कर ही दिए तो आपको जलन क्यूँ होती है? सिर्फ इसलिए कि ये पर्व और त्यौहार या उत्सव हिन्दुओं से जुड़े हैं।

देख नहीं रहे हैं कि आज योगी के नक़्शे-कदम पर पूरा देश चल रहा है। प्रदेश के लाखों दिहाड़ी मजदूरों के खाते में पैसा पहुँचा रहा हैं। केजरीवाल सरकार के द्वारा साजिशन दिल्ली की सीमा पर परित्यक्त मजदूरों को उन्होंने अपने सीने से लगाया। जलन तो इस काम से भी बीबीसी जैसों को होती होगी कि आखिर व्यवस्था बिगड़ी क्यों नहीं। केजरीवाल से सवाल तो करना नहीं है क्योंकि सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं।

पार्ट टाइम भोजपुरी पत्रकार और इसके जैसे लोग 

चाइनीज वायरस के इस आपदा काल में कुछ पार्ट टाइम भोजपुरी पत्रकार पत्रकारिता के नाम पर हिन्दू घृणा से डिस्टर्ब हो गए हैं। ऐसे डिस्टर्ब लोगों का लक्ष्य चाइनीज कोरोना वायरस (वुहान-2019) से लगातार सफलतापूर्वक लड़ रहे भारत की बड़ाई करना नहीं बल्कि हिन्दुओं और भाजपा सरकार को नीचा दिखाना है। ऐसे लोग आजकल इस बात से चिढ़े हुए हैं कि भारत सरकार ने दूरदर्शन पर रामायण और महाभारत का प्रसारण क्यूँ कर दिया।

अरे, ऐसे पार्ट टाइम भोजपुरी पत्रकार और हिन्दूफ़ोबिया से ग्रसित लिबरल वामपंथ के पुरोधाओं रामायण और महाभारत से भारत की पहचान है। इन दोनों कथाओं को सुन कर ये देश बड़ा हुआ है। भगवान श्री राम और भगवान श्री कृष्ण हमारे अराध्य हैं। अभी-अभी तो हिन्दुओं ने अयोध्या में भव्य श्री राम मंदिर को स्थापना को लेकर सैकड़ों वर्षों से चली आ रही लड़ाई जीता है। और इस लॉकडाउन में देश के करोड़ों हिन्दू तो घर पर हैं ना? वो बैठे-बैठे तुम जैसों का फेक न्यूज देखेंगे? तुम्हारी कुंठाओं को देखकर खुद कुंठित होंगे? सोचो खुद पार्टटाइम भोजपुरिया और फुल टाइम हिन्दूफ़ोबिया और हिन्दुओं से घृणा से सने पत्रकारों? 

तुम्हारा दर्द तो उसी समय स्वाभाविक हो गया था जब हाई टाउन से लेकर मेट्रो शहरो और देश के स्लम तक से थालियाँ पीटने की आवाजों ने तुम्हारे कलेजे का चीथड़ा उड़ा दिया था। और वो ताली और थाली ना सिर्फ एक सांकेतिक समर्थन था बल्कि कोरोना को हम हराएँगे, इसका आगाज था। चलते-चलते इतना बता दूँ कि इसी तरह के लोग देश में लाखों करोड़ों लोगों के मरने की झूठी खबर की भविष्यवाणियाँ कर रहे हैं। और ये वही लोग हैं जिन्हें चाइनीज कोरोना वायरस के खिलाफ भारत का सफल जंग देखा नहीं जा रहा है।

(नोट: यहाँ चाइनीज वायरस (वुहान 2019) शाब्द के इस्तेमाल का अर्थ किसी भी नृजातीय भावना से परे है। यहाँ चाइनीज (वुहान 2019) इसके भौगोलिकता की ओर इशारा कर रहा है।)

इंदौर में भयावह स्थिति: 8 कोरोना+ में से 5 की कोई ट्रेवल हिस्ट्री नहीं, खतरनाक स्थिति की तरफ बढ़ रहा शहर

कोरोना वायरस से देश में मृतकों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। मध्य प्रदेश के इंदौर में 49 वर्षीय महिला के सोमवार (मार्च 30, 2020) रात दम तोड़ने के बाद राज्य में कोरोना वायरस संक्रमित मरीजों की मौत की संख्या बढ़कर पाँच हो गई है। इनमें से तीन अकेले इंदौर शहर के निवासी थे, जिनमें से दो की मौत पिछले 24 घंटे में हुई। जबकि दो मरीज उज्जैन के थे।

शासकीय महात्मा गांधी स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय के एक अधिकारी ने मंगलवार (मार्च 31, 2020) को बताया कि चंदन नगर क्षेत्र में रहने वाली 49 वर्षीय महिला ने मनोरमा राजे टीबी (एमआरटीबी) चिकित्सालय में आखिरी साँस ली। मृत महिला का नाम जरीन बी बताया जा रहा है। अधिकारी ने बताया कि 23 मार्च को कोरोना वायरस से संक्रमित पाई गई थी। उन्हें 29 मार्च को अरिहंत अस्पताल से एमआरटीबी अस्पताल में शिफ्ट किया गया। 30 मार्च की रात 10.20 बजे मौत हो गई। डॉक्टर ने बताया कि महिला उच्च रक्तचाप और मधुमेह से पहले ही पीड़ित थी। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि कोरोना वायरस संक्रमण के बाद अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ने वाली महिला ने पिछले दिनों कोई यात्रा नहीं की थी। यानी कि इस मृतक महिला की न तो कोई ट्रैवल हिस्ट्री थी और न ही ये किसी संक्रमित मरीजों के संपर्क में आई थी।

सोमवार को इंदौर और उज्जैन में कोरोना के 8 नए मामले सामने आए। महात्मा गाँधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज के कोरोना बुलेटिन के मुताबिक पॉजिटिव पाए गए 8 मरीजों में से सिर्फ 3 मरीज की ही कांटेक्ट हिस्ट्री है, जबकि शेष 5 मरीजों की कोई ट्रेवल हिस्ट्री नहीं है। इंदौर जैसी घनी आबादी वाले शहर के लिए यह भयावह संकेत है। यहाँ अब तक जो मरीज कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं, उनमें से अधिकांश की कोई ट्रैवल हिस्ट्री नहीं है। यह एक गंभीर स्थिति है। देखा जाए तो यह सिर्फ इंदौर के लिए ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए खतरनाक है।

कोरोना संक्रमण से देश में 27 राज्य प्रभावित हैं। इसमें मध्य प्रदेश दसवें नंबर पर है। लेकिन अगर इसके शहरों की बात की जाए तो 24 मार्च तक कोरोना मुक्त रहा इंदौर बीते पाँच दिनों में देश के सबसे संक्रमित शहरों की सूची में आठवें नंबर पर आ गया है। केरल में देश का पहला मरीज 30 जनवरी को सामने आया था। महाराष्ट्र और दूसरी जगहों पर मार्च के पहले और दूसरे हफ्ते में मरीजों का आना शुरू हुआ। इंदौर में मरीज बढ़ने की रफ्तार जो रविवार तक 380% थी, वह अब 540% हो गई है।

मध्‍य प्रदेश के स्वास्थ्य अधिकारी के अनुसार, सोमवार तक मध्य प्रदेश में कोरोना वायरस से 47 लोगों के संक्रमित होने की पुष्टि हुई है। इनमें से सबसे अधिक 27 मरीज इंदौर में हैं, जबकि जबलपुर में आठ, उज्जैन में पाँच, भोपाल में तीन और शिवपुरी एवं ग्वालियर में दो-दो लोग संक्रमित हुए हैं। कोरोना के इन 47 मरीजों में से 43 का इलाज अलग-अलग अस्पतालों में किया जा रहा है। राज्‍य में कोरोना वायरस संक्रमित पाँच लोगों की मृत्यु हो चुकी है।

किसानों की तबाही का कारण बनेगा कोरोना: गाँवों से होकर देश भर में संक्रमण फैलने का ख़तरा

आज कोरोना संकट अंतरराष्ट्रीय आपदा बन चुका है। धीरे-धीरे विश्व के सभी देश इसकी चपेट में आते जा रहे हैं। भारत में भी यह महामारी क्रमशः अपने पाँव पसारती जा रही है। इससे निपटने के लिए प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने 25 मार्च से 14 अप्रैल तक 21 दिन का ‘लॉकडाउन’ लागू कर दिया है। इस ‘लॉकडाउन’ के दौरान सभी देशवासियों को अपने घरों में ही रहने के लिए कहा गया है। साथ ही, यह भी स्पष्ट निर्देश है कि जो अभी जहाँ है, वहीं रहे। कोरोना पर हुए अभी तक के शोधों से यही तथ्य उभरकर सामने आया है कि लोगों की आवाजाही और आपसी मेल-मुलाक़ात को रोककर ही इस महामारी को नियंत्रित किया जा सकता है। ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ से ही बचाव हो सकता है और बचाव ही इस समय सबसे बड़ा इलाज है।

कोरोना संकट विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और विश्व के अत्यंत संपन्न, सक्षम और विकसित देश चीन में शुरू हुआ। उसके बाद कोरोना संक्रमण वायुयान यात्रियों के माध्यम से यूरोप, अमेरिका और एशिया के अन्य देशों में फैलता चला गया है। आज एक अमीर देश में शुरू हुई यह महामारी समृद्ध संवाहकों द्वारा फैलकर न सिर्फ विश्वव्यापी हो गई है, बल्कि इसने गरीबों को भी अपनी चपेट में ले लिया है। उल्लेखनीय है कि पुराने समय में प्लेग आदि संक्रामक रोग गरीबों से अमीरों की ओर संक्रमित होते थे। कोरोना संक्रमण इस मायने में विशेष है कि यह अमीरों से गरीबों की ओर फैल रहा है। इसी का दुखद परिणाम है कि आज भारत देश की राजधानी दिल्ली के बॉर्डरों और बस-अड्डों पर भारत विभाजन के समय जैसे दृश्य नज़र आ रहे हैं।

दिल-दिमाग को झकझोर देने वाले भय, भूख और अनिश्चितता के दृश्य। रेहड़ी-ठेले वाले, रिक्शा-ऑटो चलाने वाले, छोटी-मोटी नौकरियाँ करने वाले, फैक्ट्रियों-कारखानों में काम करने वाले असंख्य अस्थायी/दिहाड़ी प्रवासी मजदूर स्त्री-पुरुष कट्टे–बोरियों और गठरियों में अपनी पूरी गृहस्थी समेटे अपने गाँव की ओर पलायन कर रहे हैं। ये हजारों स्त्री-पुरुष भूखे पेट हैं और पैदल हैं। भूख-प्यास से बिलबिलाते और बिलखते छोटे-छोटे बच्चे उनके साथ हैं। ऐसे में न तो उन्हें सोशल डिस्टेंसिंग की परवाह है, न ही उनके लिए वैसा कर पाना संभव ही है। ये लोग बिहार, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान आदि के प्रवासी मजदूर हैं। ऐसे दृश्य दिल्ली के आसपास कुछ ज्यादा जरूर हैं, किन्तु सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं हैं। रोटी-रोजगार के दिल्ली, मुंबई जैसे और भी जितने केंद्र हैं, वहीं भूख, संताप और पलायन के ऐसे हृदयविदारक दृश्य हैं।

ये प्रवासी मजदूर तमाम दुःख और कष्ट झेलकर जैसे-तैसे अपने घर, अपने गाँव पहुँच भी जाएँगे तो कहना मुश्किल है कि उनमें कितने स्वस्थ होंगे और कितने संक्रमित। अगर वे कोरोना संक्रमण के संवाहक बन गए तो जिन गाँवों में वे वापस जा रहे हैं, वहाँ तो तबाही आ जाएगी। कोरोना का कहर एक बार ग्रामीणों पर टूट पड़ा तो फिर क्या होगा, उसका अनुमान लगाना और सोचना तक मुश्किल है। गाँवों में न तो पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएँ हैं, न ही साधन-संसाधन। गरीबी और अभाव इक्कीसवीं सदी के भारत की भी वर्तमान वास्तविकता है। अभाव महज साधनों और सुविधाओं का ही नहीं है, जागरूकता का भी है। अभी भी भारत की दो-तिहाई आबादी गाँवों में ही बसती है।

जागरूकता और पर्याप्त साधनों और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में यह संक्रमण एक गाँव से दूसरे गाँव होता हुआ बड़ी तेजी से पूरे भारत में फ़ैल सकता है। इस पलायन को तत्काल रोककर इस आपदा को गाँवों तक पहुँचने से रोका जाना चाहिए। प्रवासियों को भोजन और भावनात्मक आश्वस्ति देकर ही ऐसा संभव है। दुःखद बात यह है कि सरकारों और नागरिक समाज के अभी तक के प्रयत्न पर्याप्त नहीं हैं। उनकी असफलता और अपर्याप्तता इस त्रासदी को गुणात्मक रूप से बढ़ाएगी। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, और बिहार सरकारों को ज्यादा सजग, सक्रिय और संवेदनशील होने की आवश्यकता है।

‘रोज कुआँ खोदकर पानी पीने वाले लोग’ जिस भी शहर में हैं, उनकी हालत बहुत खराब है, और आगे इससे भी बदतर होने की आशंका है। काम-धंधा ठप्प है। न रोजगार है, न रोटी है। न रहने-सोने का कोई ठौर-ठिकाना। भूख से बिलबिलाते इन पेटों को यह विश्वास देना आपद् धर्म है कि एक समाज के रूप में, एक राष्ट्र के रूप में हम साथ-साथ हैं। इसलिए सरकारों, स्वयंसेवी संस्थाओं  और नागरिक समाज को इस संकट की घड़ी में इन गरीब-वंचित और अभागे लोगों की मदद और भरण-पोषण के लिए आगे आना चाहिए। भूख की भयावह और कारुणिक तस्वीरें मीडिया में दिख रहीं हैं। इस संकट की खासियत यह है कि इसमें सबकी नियति परस्पर सम्बद्ध है। सिर्फ आगा-पीछा हो सकता है। इसलिए इस आपदा से हमें एक परिवार, एक राष्ट्र के रूप में मिलकर लड़ने की आवश्यकता है। संगठित कोशिशें ही मनुष्यता की इस सबसे बड़ी लड़ाई में फलीभूत होंगी।

यूँ तो कोरोना संकट ने वैश्विक अर्थ-व्यवस्था को ही धराशायी कर डाला है। अमेरिका, चीन, इंग्लैंड, जर्मनी, जापान और भारत जैसे देशों की आर्थिक-सामाजिक गतिविधियों को एकदम ठप्प कर दिया है। इसके प्रभावों से अब विश्व का कोई देश और समाज का कोई तबका अछूता और अप्रभावित नहीं है। मगर भारत जैसे विकासशील देशों में गरीबों पर कोरोना का सर्वाधिक कहर टूटेगा क्योंकि यहाँ सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा की न तो समुचित व्यवस्थाएँ हैं, और न ही पर्याप्त संसाधन हैं। कोरोना के चलते कामकाज ठप्प होने से सर्वाधिक गरीब तबका प्रभावित हुआ है। इसी प्रकार संक्रमित होने पर भी सर्वाधिक परेशानी उसे ही होने वाली है क्योंकि अभी तक तो इलाज सरकार की ओर से हो रहा है, परन्तु अगर यह संकट बढ़ता है तो न तो सरकारी अस्पताल और स्वास्थ्य सुविधाएँ पर्याप्त होंगी, न ही रूपए-पैसे के अभाव में गरीब लोग निजी अस्पतालों में इलाज करा सकेंगे। वे दवाई-गोली, खान-पान, आराम और परहेज की भी समुचित व्यवस्था न कर सकेंगे। इस संकट के समाप्त होने के बाद काम-धंधे चौपट होने का भी सबसे ज्यादा असर इसी वंचित वर्ग के ऊपर होगा। असंगठित क्षेत्र में कार्यरत मजदूरों के रोजगार अवसरों की समाप्ति, संगठित क्षेत्र में छँटनी, वेतन में कटौती आदि के शिकार यही लोग होंगे। अगर यह संकट तीन-चार महीने चलता है, तो यह तबका भूख और बेरोजगारी से पूरी तरह तबाह हो जाएगा।

इस साल सर्दियों में हुई बेमौसम भयानक वर्षा और ओलावृष्टि ने भारत के अन्नदाताओं को पहले से ही तबाह कर रखा है। खेतों में ही खड़ी फसलें बर्बाद हो गयीं हैं। जो थोड़ी-बहुत आस-उम्मीद बची थी उसे कोरोना के कहर ने तोड़ डाला। अभी आलू की खुदाई और भराई का समय है, कुछ दिन में सरसों और फिर गेहूँ की कटाई-मढ़ाई का समय आ जाएगा, लेकिन कोरोना के कहर के चलते ये काम कैसा और कितना हो सकेगा, कहना मुश्किल है। फसलों के नुकसान से किसान तो तबाह होगा ही, दाल-रोटी के दाम भी बढ़ जाएँगे और उससे भी सबसे ज्यादा मुश्किलें अगर किसी की बढ़ेंगी तो वह गरीब-वंचित तबका ही होगा।   

केंद्र सरकार की 1.70 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा स्वागत योग्य पहल है। परन्तु यह पर्याप्त नहीं है। इसे और भी बढ़ाए जाने की आवश्यकता है। मानव जीवन को रुपए-पैसे से खरीदा नहीं जा सकता, मगर सही समय पर जरूरतमंदों को साधन-सुविधाएँ मुहैया कराकर जिंदगियों को बचाया जरूर जा सकता है। समस्या बढ़ने और आवश्यकता पड़ने पर केंद्र सरकार द्वारा ‘वित्तीय आपातकाल’ भी लगाया जाना चाहिए। साथ ही, सभी राज्य सरकारों को भी अपने स्तर पर ऐसे आर्थिक पैकेज लागू करने चाहिए। इनमें गरीबों-वंचितों (मजदूरों-किसानों) को प्राथमिकता देनी चाहिए। ये जो सामाजिक-आर्थिक विकास की पंक्ति के आखिर में खड़े लोग हैं, दरिद्र नारायण हैं। सिर्फ भूखे पेट नहीं हैं, बल्कि भारत की अर्थ-व्यवस्था के मेरुदंड हैं। अंतिम जन की चिंता करना न सिर्फ राज्य का बल्कि समाज का भी प्राथमिक कर्तव्य है। इसलिए इस संकट-बेला में सभी व्यक्तियों-उद्योगपतियों, कलाकारों, नौकरीपेशाओं; सबको अपनी सामर्थ्य से बढ़कर सहयोग करना चाहिए। हम सबको भी अपने हिस्से का योगदान करना होगा। सिर्फ सरकारों के भरोसे हम इस महामारी से नहीं लड़ सकते हैं।

कोरोना के संदिग्ध मरीज़ों की सूचना देना बबलू को पड़ा महँगा, पीट-पीटकर गाँव वालों ने कर दी हत्या

कोरोना को लेकर लोगों के मन में व्यापक स्तर पर डर बसा हुआ है। लोग खुद को इससे बचाने के लिए हर मुमकिन प्रयास कर रहे हैं। लोगों की कोशिश है कि उन्हें जिन लोगो में इस बीमारी के लक्षण दिखाई दें, वे उससे दूरी बनाएँ और उसकी सूचना फौरन प्रशासन को दें। अब हालाँकि, जागरूकता अभियान के कारण कई जगहों पर लोग इसका अनुसरण कर रहे हैं। लेकिन बिहार के सीतामढ़ी में जागरूक होने के कारण एक व्यक्ति की हत्या कर दी गई। घटना सीतामढ़ी जिले रुन्नीसैदपुर थाना के मधौल गाँव में घटी। यहाँ कोरोना के संदिग्धों की सूचना प्रशासन को देने के कारण एक युवक को मार डाला गया।

न्यूज18 की खबर के अनुसार, आरोपित पक्ष युवक से सिर्फ इसलिए नाराज था क्योंकि उसने उनके कोरोना वायरस से संक्रमित संदिग्ध होने की सूचना मेडिकल हेल्पलाइन नंबर पर दे दी थी। बता दें कि युवक ने महाराष्ट्र से लौटे दो लोगों के कोरोना वायरस के संदिग्ध मरीज होने की सूचना दी थी। जिसके बाद मेडिकल टीम गाँव में पहुँचकर दोनों युवकों को जाँच के लिए ले गए। लेकिन कोरोना वायरस की पुष्टि नहीं होने पर दोनोंं को रिहा कर दिया गया।

अब घर पहुँचते ही दोनों युवकों ने सुरक्षा लिहाज से की गई इस जाँच को शान में गुस्ताखी समझ लिया और अपने परिवार के सदस्यों के साथ लड़के के घर पर पहुँच गए। दोनों ने परिजनों के साथ मिलकर युवक को खूब मारा और उसे पीट-पीटकर जख्मी कर दिया। 

गंभीर हालत देखकर उसे रुन्नीसैदपुर पीएचसी में भर्ती कराया गया। लेकिन वहाँ भी उसका इलाज संभव नहीं हुआ। जिसके बाद उसे मुजफ्फपुर रेफर कर दिया गया। मुजफ्फरपुर एसकेएमसीएच में ले जाने के दौरान उसकी मौत हो गई। मृतक की पहचान बबलू कुमार के रूप में हुई।

मृतक के घरवालों ने इस मामले में मुजफ्फरपुर के अहियापुर थाने में पुलिस को अपना बयान दर्ज करवा दिया है। पोस्टमॉर्टम के बाद बबलू का शव उन्हें सौंपा जाएगा। मृतक के भाई गुड्डू के बयान पर पुलिस ने गाँव के ठगा महतो, सुधीर कुमार, विकास महतो, मदन महतो, दीपक कुमार और मुन्ना महतो को अभियुक्त बनाया है। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दो आरोपितों सुधीर महतो और मुन्ना महतो को गिरफ्तार कर लिया है। अब इन पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।