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भारत बंद के दौरान बंगाल में रेल पटरी को उड़ाने की साजिश, बसों पर पथराव: देखें Video

वाम दल समर्थक 10 ट्रेड यूनियनों के ‘भारत बंद’ के दौरान पश्चिम बंगाल से एक बार फिर अराजक तत्वों द्वारा हिंसा भड़काने और यातायात बाधित करने की खबरें आई हैं। राज्य के उत्तर 24 परगना में हृदयपुर के पास रेलवे ट्रैक से पुलिस ने चार देसी बम बरामद किए हैं। वहीं कूच बिहार में प्रदर्शनकारी एक बस में तोड़फोड़ करते और उसपर पथराव करते नजर आए।

राज्य में उपद्रव की आशंका पहले से ही जताई जा रही थी। यही कारण है कि सिलिगुड़ी में ड्राइवर सिर पर हेलमेट लगाकर बस चलाते दिखे। बस ड्राइवरों का कहना है कि यहाँ हिंसक प्रदर्शनकारियों से बचाव के लिए उन्हें हेलमेट पहनना पड़ा है।  

गौरतलब है कि इस बंद को कॉन्ग्रेस सहित कई विपक्षी दलों का भी समर्थन हासिल है।

बताया जा रहा है कि उत्तर बंगाल के कुछ इलाकों में तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) ने हड़ताल का विरोध करते हुए रैलियाँ निकाली हैं और लोगों से सामान्य स्थिति बनाए रखने का आग्रह किया है। बर्दवान में टीएमसी कार्यकर्ताओं और एसएफआई के बीच झड़प की भी एक वीडियो सामने आया है। जिसमें दोनों समूह के कार्यकर्ता भारत बंद के दौरान एक दूसरे से लड़ रहे हैं।

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गौरतलब है कि केंद्र सरकार की कथित ‘राष्ट्र विरोधी’ और ‘जन विरोधी’ आर्थिक नीतियों के खिलाफ बुधवार को वाम दल समर्थक 10 ट्रेड यूनियनों ने ‘भारत बंद’ का आह्वान कर रखा है। राहुल गाँधी ने ट्वीट कर भारत बंद को अपना समर्थन दिया है। उन्होंने लिखा, “मोदी-शाह सरकार की जनविरोधी, श्रमिक विरोधी नीतियों ने भयावह बेरोजगारी पैदा की है और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को कमजोर किया जा रहा है, ताकि इन्हें मोदी के पूंजीपति मित्रों को बेचने को सही ठहराया जा सके। आज 25 करोड़ कामगारों ने इसके विरोध में भारत बंद बुलाया है। मैं उन्हें सलाम करता हूँ।” राज्य में सीएए के विरोध के नाम पर भी जमकर हिंसा हुई थी।

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JNU में दीपिका पादुकोण का जाना प्रचार की पैंतरेबाजी, पाकिस्तान ने थपथपाई पीठ

प्रदर्शनकारी वामपंथी छात्रों का समर्थन करने के लिए मंगलवार (7 जनवरी 2020) को दीपिका पादुकोण जेएनयू पहुँची। हालाँकि भीड़ में नज़र आई दीपिका ने इस दौरान सार्वजनिक तौर पर तो कुछ नहीं कहा, लेकिन इस मामले ने सोशल मीडिया पर तूल पकड़ लिया। वामपंथी खेमा इसके लिए दीपिका पर फ़िदा हो गया। वहीं अधिकतर सोशल मीडिया यूजर्स इसे पीआर स्टंट करार दे रहे। ऐसा क्यों कहा गया? आइए जानें…

लोकतांत्रिक भारत में आम नागरिकों की तरह बॉलीवुड कलाकारों को भी अपनी राजनैतिक राय रखने और किसी एक विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता दिखाने का पूरा अधिकार है। लेकिन, ये भी सच है कि फिल्म की रिलीज डेट नजदीक आते-आते कलाकार अपनी फिल्म प्रमोशन के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं। जैसे शाहरुख खान ने अपनी रईस फिल्म का प्रमोशन करने के लिए मुंबई से दिल्ली आने वाली ट्रेन में सफर किया था। उसी तरह दीपिका ने भी अपनी नई फिल्म ‘छपाक’ के रिलीज से ठीक पहले ये स्टंट किया। वे जेएनयू में छात्रों पर हुई हिंसा के विरोध-प्रदर्शन में पहुँची। लेकिन यहाँ उन्होंने रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया के दौरान पीड़ित बच्चों से मिलकर पूरा मामला जानने-समझने की बजाए, जेएनयू अध्यक्ष आइशी घोष से और उनके दोस्तों से मिलना उचित समझा।

कुछ पाठक कह सकते हैं कि दीपिका की मंशा को सोशल मीडिया पर जानबूझकर पीआर स्टंट बताकर पेश किया जा रहा है। लेकिन, सच्चाई यही है। इसका खुलासा तब हुआ जब बीबीसी पंजाबी सोशल मीडिया पर प्रदर्शन में पहुँची दीपिका की एक फोटो अपने ट्वीट में डालता है। साभार ‘स्पाइस पीआर’ को देता है। इसके बाद साफ हो गया कि ये रैंडम क्लिक के नाम पर पीआर का हिस्सा है।

गौरतलब है कि दीपिका साल 2019 से स्पाइस पीआर की क्लाइंट हैं और साथ ही अपनी आने वाली फिल्म ‘छपाक’ की को-प्रोड्यूसर भी हैं। प्रदर्शन में पहुँचने के बाद इसका कन्हैया कुमार ने प्रचार भी किया।

साथ ही इस पीआर स्टंट के लिए दीपिका को सीमा पार से भी समर्थन मिला है। पाकिस्तान ने उनकी पीट थपथपाई है। पाकिस्तान आर्मी के प्रवक्ता आसिफ गफूर ने खुद ट्वीट कर उनकी प्रशंसा की है।

आसिफ गफूर का ट्वीट

हालाँकि कुछ समय बाद ही गफूर ने अपना ये ट्वीट डिलीट कर दिया। मगर, इससे पहले साफ हो गया कि जेएनयू जाने के पीछे कोई वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं थी, बल्कि ये सिर्फ़ प्रचार-प्रसार की पैंतरेबाज़ी थी। इस पर दीपिका पादुकोण खरी उतरीं और अब लोग उन्हें ‘वुमेन ऑफ स्टील’ तक कह रहे हैं।

गौरतलब है कि दीपिका के इस कदम के पीछे छिपी मंशा का खुलासा होने के बाद सोशल मीडिया पर कई यूजर्स उन्हें ट्रोल कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि दीपिका पादुकोण से नाराज होने की जरूरत नहीं हैं। वो आज तक जिसके साथ खड़ी दिखाई पड़ी, उसकी नैया डूब गई। पढ़िए ऐसा ही एक कमेंट;

सोशल मीडिया पर वायरल मैसेज

पाकिस्तान से सराहना पाने वाली दीपिका पादुकोण के पसंदीदा नेता भी पड़ोसी मुल्क को खूब भाते हैं। ये हैं कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी। राहुल के बयानों का इस्तेमाल पाकिस्तान कई बार वैश्विक मंचों पर भारत को घेरने के लिए कर चुका है। 2010 में डीडी न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में दीपिका ने राहुल गॉंधी को प्रधानमंत्री के तौर पर देखने की इच्छा जताई थी। उन्होंने कहा था कि राहुल जो देश के लिए कर रहे हैं वह नौजवानों के लिए क्लासिक उदाहरण है। इस इंटरव्यू में वह बीएसएनएल का एंबेसडर होने से खुद के हुए प्रचार का भी जिक्र करती हैं।

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कॉन्ग्रेस को नहीं मिल रहे मेंबर: 15 जनवरी तक बनाने थे 2 लाख, 2 महीने में 2600 ने ही थामा हाथ

कॉन्ग्रेस की मुसीबतें खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। पार्टी का सदस्यता अभियान गोवा में बुरी तरह विफल रहा है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में केवल 2600 लोगों ने पार्टी की सदस्यता ली है। 15 जनवरी तक यहॉं 2 लाख लोगों को सदस्य बनाने का लक्ष्य तय किया गया था। यह बात ऐसे वक्त में सामने आई है, जब पिछले ही हफ्ते चार नेताओं ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का समर्थन करते हुए पार्टी छोड़ दी थी।

गोवा में कॉन्ग्रेस इस समय सदस्यता अभियान एक एप के जरिए चला रही है। इसके तहत वोटर कार्ड सहित लोगों के अन्य विवरण लिए जा रहे हैं। यह ‘शक्ति एप’ का अपग्रेडेड वर्जन जैसा है। शक्ति एप कॉन्ग्रेस के डाटा एनालिटिक्स हेड प्रवीण चकवर्ती ने 2019 के आम चुनावों से पहले शुरू किया था और कॉन्ग्रेस समर्थकों और उसे मिलने वाली सीटों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया था। दिलचस्प यह है कि इसके अपग्रेडेड वर्जन में भी आँकड़े बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए जा रहे है। कॉन्ग्रेस के एक सूत्र ने द प्रिंट को बताया कि आधिकारिक तौर पर सदस्यता के आँकड़े 6,000 से 7,000 तक बताए जा रहे। लेकिन, वास्तव में यह संख्या 2,600 के करीब है।

इससे पहले चार नेताओं ने सीएए पर कॉन्ग्रेस के स्टैंड का विरोध करते हुए पार्टी छोड़ दी थी। इनमें से तीन ने भाजपा की सदस्यता ले ली है। इन नेताओं ने पार्टी पर नागरिकता कानून को लेकर जनता, खासकर मुसलमानों को बरगलाने का आरोप लगाया था। पिछले साल जुलाई में गोवा में कॉन्ग्रेस को सबसे बड़ा झटका लगा था। 15 विधायकों में से दो तिहाई यानी 10 सत्ताधारी भाजपा में शामिल हो गए थे।

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बंगाल में 17 साल की लड़की को गैंगरेप के बाद जलाया, मास्टरमाइंड महबूर मियाँ समेत 3 गिरफ्तार

हैदराबाद में गैंगरेप के बाद पशु चिकित्सक महिला को जलाने की घटना के दो महीने भी नहीं हुए हैं कि पश्चिम बंगाल से भी इसी तरह की एक घटना सामने आई है। राज्य के दक्षिणी दिनाजपुर के कुमारगंत में 17 साल की नाबालिग लड़की का शव बरामद किया गया है। सोमवार की सुबह स्थानीयों लोगों ने सफानगर और अशोकग्राम के बीच एक पुलिया के नीचे उसका शव देख पुलिस को जानकारी दी। स्थानीय लोगों के अनुसार इलाके से गुजरते हुए उन्होंने पहले कुछ कुत्तों को माँस के टुकड़े के लिए लड़ते देखा, फिर उन्हें पुलिया पर खून नजर आया। जब उन्होंने पास जाकर देखा तो वहाँ एक शव पड़ा था। जिसे कुत्ते और सियार आधा खा चुके थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मृतका की पहचान गंगारामपुर निवासी के रूप में हुई है। उसका शव घर से करीब 8 किमी दूर पाया गया। रविवार की शाम करीब 4 बजे नाबालिग लड़की अपने घर से बाजार जाने के लिए निकली थी, लेकिन उसके बाद वापस नहीं लौटी। अगली सुबह यानी सोमवार को उसका शव बरामद हुआ। जाँच में शव के हाथ, पाँव, गले पर तेजधार वाले हथियारों के निशान पाए गए। परिजनों ने रेप के बाद लड़की की हत्या कर उसका शव जलाने की आशंका जताई है। हालॉंकि पुलिस ने अभी आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं की है।

लड़की के भाई के मुताबिक, घर से निकलने के कुछ देर बाद ही उसकी बहन का फोन स्विच ऑफ हो गया था। इसके बाद परिवार वालों ने उसे खोजने की बहुत कोशिश की। अगले दिन उसका शव बरामद हुआ और उन्हें पुलिस ने शिनाख्त के लिए बुलाया।

पुलिस मामले की जॉंच कर रही है। तीन लोग गिरफ्तार किए गए हैं। इनकी पहचान महबूर मियॉं, पंकज बर्मन और गौतम बर्मन के तौर पर हुई है। स्थानीय मीडिया की रिपोर्टों में महबूर मियॉं को इस वारदात का मास्टरमाइंड बताया गया है। तीनों संदिग्ध उसी इलाके के रहने वाले हैं जहॉं लड़की रहती थी। हालॉंकि वे काम बंगाल से बाहर करते हैं। इनमें से एक को लड़की पहचानती थी और आखिरी बार उसे उसके साथ टू व्हीलर पर देखा गया था। इसी आधार पर गिरफ्तारियॉं हुई है। तीनों संदिग्ध 10 दिन की पुलिस हिरासत में भेजे गए हैं।

पुलिस पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने से पहले पुख्ता तौर पर कुछ भी कहने से बच रही है। लेकिन कई रिपोर्ट्स में और शव की हालत देखकर आशंका जताई जा रही है कि पहले लड़की के साथ रेप किया गया। फिर तेजधार वाले हथियार से उसकी हत्या कर शव को पेट्रोल डालकर आग के हवाले कर दिया गया।

मृतका के परिजन भाजपा के सदस्य हैं। स्थानीय भाजपा सांसद सुकंता मजूमदार ने ने गुनहगारों के जल्द नहीं पकड़े जाने पर आंदोलन की चेतावनी दी है। कुमारगंज से टीएमसी के विधायक ने भी घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए निष्पक्ष जॉंच की मॉंग की है।

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मुस्लिम महिलाओं के गर्भ गिरवा रहा है चीन, 35 साल से कम उम्र की हर औरत से रेप

चीन के शिनजिंग प्रांत में उइगर मुसलमानों की भाँति ही हजारों की संख्या में कजाकिस्तान के मुस्लिमों को भी बंदी बनाकर रखा गया है। कई कार्यकर्ताओं के अनुसार चीन के यातना गृहों में करीब 20 लाख से ज्यादा लोग कैद हैं। इनमें से अधिकतर उइगर हैं। कुछ कजाक मुस्लिमों जैसे अल्पसंख्यक समूह के भी हैं। इन्हें भी उइगर मुस्लिमों की तरह ही प्रताड़ित किया जा रहा है। इसके कारण कई सुनने में अक्षम हो गए हैं तो कुछ कि यादाश्त चली गई है।इसके अलावा उइगर मुस्लिम महिलाओं की तरह इस समुदाय की महिलाओं का भी पहले बलात्कार होता है और फिर बाद में जबरन इनका गर्भ गिरवा दिया जाता है।

अलजज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार, उसके संवाददाता ओसामा बिन जावेद ने कजाकिस्तान के सबसे बड़े शहर अलमाती में चीन से भागकर आए कुछ कजाकियों से मुलाकात की। इस दौरान उसे कई ऐसे सहमे लोग भी मिले, जिन्होंने अपनी पहचान बताने से मना कर दिया। उन्हें डर था कि अगर वे अपना मुँह खोलेंगे तो उनके रिश्तेदारों के साथ चीन के यातना गृह में और ज्यादा अत्याचार होगा।

रिपोर्ट के मुताबिक, एक समय तक चीन की हिरासत में बंदी बनकर रहे एक कज़ाकी ने बताया कि डिटेंशन कैंप में उसे ऐसी दवाइयाँ और इंजेक्शन लेने को मजबूर किया गया, जिससे उसका शरीर बर्बाद हो गया। उसके सुनने की क्षमता चली गई। कजाकी व्यक्ति के अनुसार आज उसकी स्थिति ये हो चुकी है कि उसे अब अपने साथ हुआ ज्यादा कुछ तो याद नहीं है, लेकिन चीनी कविताएँ उसे अच्छे से याद हैं। इन्हें पढ़ने के लिए मुस्लिम समुदाय के लोगों को कैंप में मजबूर किया जाता है।

इसके अलावा, चीन के नॉर्थवेस्ट इलाके के डिटेंशन कैंप में अरसे तक बंदी बनाकर रखी गई कजाकी महिलाओं ने बताया कि चीन के प्रशासन ने उनके साथ बहुत बर्बरता की और जबरन उनका गर्भपात करवाया।

सुनिए कजाक महिला की आपबीती (साभार: अलजजीरा)

गुलजीरा मॉडगिन नामक महिला, जिन्होंने कजाक की नागरिकता मिलने से पहले अपने कटु अनुभवों के बारे में कभी जुबान नहीं खोली थी, ने बताया कि यातना गृह में उन्हें जान से मारने की धमकी देकर डराया जाता था। उनको प्रताड़ित किया जाता था। गुलजीरा के अनुसार एक बार हिरासत के दौरान उन्हें मेडिकल चेकअप के लिए भेजा गया। जहाँ वे प्रेगनेंट निकलीं। जब अधिकारियों को ये बात पता चली, तो उनपर गर्भपात का दबाव बनाया गया। जब उन्होंने इससे मना किया तो उन्हें अकेला छोड़ दिया गया और बाद में एक क्लिनिक भेजा गया और टीबी की दवाइयों के नामपर कुछ दवाइयाँ खाने को कहा गया। लेकिन वो समझ गई वो क्या हैं।

यहाँ बता दें कि चीनी बर्बरता और उनके तौर-तरीके देख तुर्की के सदस्यों का कहना है कि चीनी प्रशासन गर्भपात को मुस्लिमों के ख़िलाफ़ एक हथियार की तरह इस्तेमाल करता है। जब भी वह इससे मना करते हैं, तो जबरन उनके साथ ऐसे काम किया जाता है।

वहीं इस संबंध में कई कजाकियों का कहना है कि चीन आतंक से लड़ने के नाम पर मुस्लिमों पर लगातार अत्याचार कर रहा है और हर बार मानवाधिकारों का उल्लंघन भी कर रहा है। लेकिन कोई भी नेता उनके पक्ष में नहीं खड़ा हो रहा। उनकी मुस्लिम होने की पहचान को समय से पहले ही मिटाया जा रहा है और उनके बच्चों को पैदा होने से पहले ही मारा जा रहा है।

इससे पहले डेली मेल ने ऐसी ही दो महिलाओं की आपबीती छापी थी। इन्हें 2009 में शिनजियांग में हिरासत में लिया गया था। 4 साल तक चीनी अधिकारियों की प्रताड़ना झेलने के बाद अब दोनों तुर्की में हैं। इन्होंने बताया था कि चीन में 35 साल से कम उम्र के हर आदमी और हर औरत का बलात्कार किया जाता है। कैंप के गार्ड जिसके साथ रात गुजारना चाहते हैं, उसके सिर पर बैग रखते हैं और फिर खींचते हुए बाहर ले जाते है। फिर पूरी रात उसका बलात्कार होता है।

गौरतलब है कि 2017 में उइगर मुस्लिमों, कजाकी मुस्लिमों, वीगर समुदाय के साथ हो रहे अत्याचारों का खुलासा हुआ था। इसके बाद इस मामले पर कई मीडिया रिपोर्ट्स सामने आईं। जिसमें खुलासा हुआ था कि चीन द्वारा री-एड्युकेशनल कैंपों के नाम पर चलाए जा रहे यातना गृहों में महिलाओं के साथ पहले रेप होता है और फिर उनका जबरन गर्भपात करवाया जाता है। इसके अलावा यहाँ महिलाओं के गुप्तांगों में मिर्ची के पेस्ट लगाए जाने भी बेहद आम हैं।

लेकिन फिर भी चीन की प्रवक्ता वैश्विक स्तर पर इस संबंध में बात करते हुए दावा करती हैं कि उइगर मुस्लिमों की तरह उनके देश में 56 और समूह रहते हैं। वे यहाँ बेहतर जिंदगी जी रहे हैं और अपनी आजादी एवं अधिकारों का इस्तेमाल कर रहे हैं। चाइना भी मुस्लिम बहुसंख्यक देशों से अपने दोस्ताना संबंधों को आनंद ले रहा है।

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111 पन्नों की उस रिपोर्ट के 6 पन्नों में प्रताड़ना की ऐसी कहानियॉं दर्ज हैं कि आप जितनी भी बार पढ़ें रोंगेटे खड़े हो जाते हैं। बात हो रही है टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टिस) के प्रोजेक्ट ‘कोशिश’ की उस रिपोर्ट की जिसने 2018 में पूरे देश को झकझोर दिया था। यह रिपोर्ट बिहार के बालिका गृह, बाल गृह, वृद्धाश्रम, अल्पावास वगैरह की सोशल ऑडिट पर थी। मुजफ्फरपुर बालिका गृह में बच्चियों के यौन शोषण की दास्तानें इसी रिपोर्ट की वजह से सामने आ पाई थी। लेकिन, इस रिपोर्ट में कुल 17 संस्थान थे जिनकी स्थिति बेहद चिंतनीय बताते हुए तत्काल ध्यान देने की जरूरत बताई गई थी। इनमें लड़के-लड़कियों के चिल्ड्रेन होम, शॉर्ट स्टे होम, सेवा कुटीर, स्पेशल एडॉप्शन एजेंसी, ऑब्जर्वेशन होम शामिल थे। इन संस्थाओं का जिक्र GRAVE CONCERNS– INSTITUTIONS REQUIRING IMMEDIATE ATTENTION के साथ किया गया था। इस रिपोर्ट की कॉपी ऑपइंडिया के पास भी है।

शुरुआती लीपापोती के बाद इस मामले की जॉंच सीबीआई को सौंप दी गई थी। सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल कर बताया है कि उसने सभी 17 मामलों की जॉंच पूरी कर ली है। 13 मामलों में चार्जशीट दाखिल कर दी गई है। चार मामलों में सबूत नहीं मिल पाए हैं। हलफनामे में जॉंच एजेंसी ने बताया है कि बच्चों का उत्पीड़न रोकने में सरकारी अधिकारी नाकाम रहे। कुल 71 अधिकारियों के खिलाफ एजेंसी ने कार्रवाई करने की सिफारिश बिहार सरकार से की है। इनमें 25 डीएम हैं। साथ ही 52 एनजीओ और निजी व्यक्तियों के खिलाफ भी कार्रवाई की अनुशंसा की गई है। उन एनजीओ पदाधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई को भी कहा गया है जिनके नाम रिपोर्ट में दर्ज हैं। मुजफ्फरपुर शेल्टर होम के मुख्य मामले में 14 जनवरी को दिल्ली के साकेत कोर्ट द्वारा फैसला सुनाए जाने की उम्मीद है।

टिस की रिपोर्ट में मोतिहारी के ब्वायज चिल्ड्रेन होम में भयावह शारीरिक और यौन हिंसा की बात कही गई थी। इसका संचालन ‘निर्देश’ नामक एनजीओ करता था। विवरण आप नीचे पढ़ सकते हैं,

ब्वायज चिल्ड्रेन होम, मोतिहारी को लेकर टिस की रिपोर्ट में दर्ज टिप्पणी

इस मामले में दो जिलाधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा सीबीआई ने की है। ब्वायज चिल्ड्रेन होम (गया) के मामले में 2 डीएम के अलावा एक अन्य सरकारी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई है। साथ ही चाइल्ड वेलफेयर कमिटी के सदस्यों सहित 13 लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की अनुशंसा की गई है। डीओआरडी द्वारा संचालित इस ब्वायज होम में महिला कर्मचारी लड़कों से गंदी बातें लिखवाती थीं। इस संस्थान के बारे में टिस की रिपोर्ट में कहा गया था,


ब्वायज चिल्ड्रेन होम, गया को लेकर टिस की रिपोर्ट में दर्ज टिप्पणी

टिस की रिपोर्ट में शॉर्ट स्टे होम (पटना) में एक लड़की द्वारा आत्महत्या करने की कोशिश किए जाने का जिक्र था। इसके अलावा बताया गया था कि लड़कियों को कपड़ा, दवाइयाँ वगैरह भी नहीं दी जाती। इसको लेकर एक डीएम और दो अन्य अधिकारी पर कार्रवाई को कहा गया है। तीन संस्थाओं को भी ब्लैकलिस्ट करने की सीबीआई ने सिफारिश की है।

शॉर्ट स्टे होम, पटना को लेकर टिस की रिपोर्ट में दर्ज टिप्पणी

शॉर्ट स्टे होम, कैमूर में रहने वाली लड़कियों और महिलाओं ने सोशल ऑडिट के दौरान सुरक्षाकर्मी के यौन दुर्व्यवहार को लेकर शिकायत की थी। उन पर फब्तियाँ कसता था और उनके निजी अंगों को छूने की कोशिश करता था। ग्राम स्वराज सेवा संस्थान की ओर से इसे शॉर्ट स्टे होम का संचालन किया जाता था। इस मामले में 7 डीएम और 11 सरकारी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के लिए जाँच एजेंसी ने राज्य सरकार से कहा है।


शॉर्ट स्टे होम, पटना को लेकर टिस की रिपोर्ट में दर्ज टिप्पणी

हलफनामे में जिन चार संस्थाओं के खिलाफ सबूत नहीं मिलने की बात कही गई है, उनमें स्पेशलाइज्ड एडॉप्शन एजेंसी (मधुबनी), स्पेशलाइज्ड एडॉप्शन एजेंसी (पटना), स्पेशलाइल्ड एडॉप्शन एजेंसी (कैमूर) और सेवा कुटीर (गया) है। सबूत नहीं मिलने के कारण भले इन मामलों में केस नहीं दर्ज किया गया है, लेकिन जॉंच एजेंसी ने यहॉं भी सरकारी अधिकारियों द्वारा लापरवाही दिखाए जाने की बात कही है। इसको लेकर डीएम सहित कई अधिकारियों और संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई है।

टिस की रिपोर्ट में मोतिहारी बाल गृह में भी यौन शोषण की बात कही गई थी। रिपोर्ट तैयार करने वाली टीम में शामिल रही अपूर्वा विवेक ने अगस्त 2018 में इस संवाददाता को बताया था कि जब उनकी टीम निरीक्षण करने पहुँची तो छोटे बच्चों ने बड़े बच्चों द्वारा यौन शोषण की शिकायत की थी। टिस की टीम को इस चिल्ड्रेन होम में करीब 25 बच्चे मिले थे। लेकिन, बाद में जब पुलिस जॉंच के लिए गई तो चार बच्चे ही मिले। बाकी बच्चे अन्य सेंटर में भेज दिए गए थे। इस मामले में सीबीआई ने 2 डीएम के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की है।

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बिहार की बच्चियों का कोई माय-बाप नहीं: बलात्कार से हत्या तक सिर्फ़ एक चुप्पी है

मुज़फ़्फ़रपुर शेल्टरहोम केस में मिली हड्डियों की पोटली: CBI ने जताई लड़कियों की हत्या की आशंका

CAA के समर्थन की ‘सज़ा’: इक़बाल हॉस्टल वालों ने छात्र का सिर फोड़ा, पप्पू यादव की पार्टी पर आरोप

जहाँ एक तरफ सीएए के विरोधी अभिव्यक्ति की आज़ादी का रोना रोते हैं और लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन को सही ठहराते हैं, वहीं दूसरी तरफ वो ख़ुद विरोधी विचार रखने वाले लोगों के साथ मारपीट करते हैं। ये उनकी असहिष्णुता नहीं है तो क्या है? पटना कॉलेज में एक छात्र को सिर्फ़ इसीलिए पीटा गया, क्योंकि उसने फेसबुक पर नागरिकता संशोधन क़ानून का समर्थन किया था। उसे इतना पीटा गया कि उसका सिर फट गया। फ़िलहाल पटना के पीएमसीएच में उसका इलाज कर रहे हैं। उसे गंभीर चोटें आई हैं।

पीड़ित छात्र ने इक़बाल हॉस्टल के छात्रों पर मारपीट का आरोप लगाया है। उसने बताया कि जब वो परीक्षा देकर लौट रहा था, तब उसपर हमला किया गया। उसका गुनाह सिर्फ़ इतना था कि उसने सीएए के समर्थन में एक फेसबुक पोस्ट लिखा था। पीड़ित छात्र पीयू छात्र संघ के कोषाध्यक्ष पद का प्रत्याशी भी रह चुका है। पिटाई के बाद वो काफ़ी देर तक बेहोश रहा था। पीएसीएच में उसे गंभीर स्थिति में भर्ती कराया गया था।

फ़िलहाल पीड़ित ख़तरे से बाहर है। उसका सिटी स्कैन किया गया है। पटना यूनिवर्सिटी के कैम्पस में इस घटना के बाद तनाव फैला हुआ है। इस घटना को जेएनयू हिंसा से भी जोड़ कर देखा जा रहा है। जेएनयू में हुई हिंसा के बाद पूरे देश में वामपंथियों का गैंग सड़क पर है। बता दें कि जेएनयू में वामपंथियों के एबीवीपी के कार्यकर्ताओं की जम कर पिटाई की है। हालाँकि, कुछ छात्र इसे आपसी रंजिश भी बता रहे हैं। पीड़ित छात्र राजनीति शास्त्र विभाग में स्नातक थर्ड इयर का छात्र है। उसे कुछ उपद्रवी छात्रों ने पकड़ लिया और गाली गलौज करने लगे। इसके बाद छात्र अमरेश की जमकर पिटाई कर दी।

‘प्रभात ख़बर’ के पटना संस्करण में छपी ख़बर

इक़बाल हॉस्टल के छात्रों पर ख़ूब गाली-गलौज करने का आरोप भी लगा है। पीड़ित छात्र को लाठी-डंडे से पीटा गया। पिटाई के बाद एबीपीवी में काफ़ी गुस्सा है और स्थानीय स्तर पर तनाव का माहौल है। पीड़ित छात्र के बयान के आधार पर तीन लोगों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज की गई है। पुलिस ने ही छात्र को पिटाई के बाद हॉस्पिटल पहुँचाया था, इसीलिए स्थानीय थाना इस मामले को लेकर पहले से ही अवगत है।

छात्रों का आरोप है कि पप्पू यादव की पार्टी ‘जन अधिकार पार्टी’ से जुड़े छात्र संगठन के गुंडों ने इस घटना को अंजाम दिया है। पप्पू यादव की पार्टी के छात्र नेता आज़ाद चाँद ने एबीवीपी के ख़िलाफ़ भड़काऊ पोस्ट डाला था और उनका ‘इलाज करने’ की धमकी दी थी।

हे मार्क्स बाबा के कॉमरेड, ठण्ड का मौसम तुम्हारी क्रांति के लिए सही नहीं है, रजाई में दुबके रहो

मैंने तमाम राजनैतिक विचारधाराओं का गहन अध्ययन किया है। ऐसा मैंने इसलिए किया क्योंकि राजनैतिक निबंधकारों का सभी जगह स्वागत होता है, चाहे उनके सब चुनाव अनुमान ग़लत ही क्यों ना लगे हों। राजनैतिक चिंतक बीच-बीच में उसी प्रकार चुनाव में भी उतर जाते हैं जैसे फ़िल्म निर्माता-निर्देशक सुभाष घई अचानक डिंग-डाँग करते हुए रजत पटल पर अवतरित होते थे और उसी चपलता के साथ सारे बुत उठाने का दावा करते हुए ग़ायब होते हैं मानो लपलपाती हुई लालटेन की लौ क्रूर पवन ने बुझा दी हो।

जब चुनाव हारने के बाद शहद और अदरक के पानी से गरारे कर के मृदु स्वर में निस्पृह भाव से ये नरपुँगव मतदाता को गरियाते हुए कॉलर पकड़कर झँझोड़ने का विचार प्रकट करते हैं तो उस स्वर में ऐसा स्नेह होता है कि मनुष्य मात्र का हृदय बोल पड़ता है- जान ले लें ज़ालिम। बहरहाल, कुल जमा निष्कर्ष यह है कि व्यंग्यकारी बड़ी बेगैरती का काम है, इसे इंदिरा जी के बाद से किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। विश्लेषकों का अलग है, फंड मिला तो चुनाव लड़ लिए, हार गए तो पुन: विश्लेषक हो गए। यह सब देख कर मैंने खूब राजनैतिक विचारधाराओं का जम कर अध्ययन किया और जम के गर्म पानी के गरारे लिए।

अपने इस महती अन्वेषण में मैंने पाया कि हर प्रकार का मौसम हर विचारधारा के उपयुक्त नहीं है। इस प्रकिया में मेरा शोध अभी प्रक्रिया में है। मौसम सर्दी का है और आंदोलनों का बाज़ार गर्म है। ऐसे में मैंने सर्दी में समाजवाद पर अध्ययन किया। दिल्ली की ठंड में मैंने रज़ाई में गुड़िमुड़ि होकर इस पर बहुत सघन शोध किया। ठंड में नहाने के प्रति अरुचि होने के कारण मैं आधा वामपंथी तो हो ही गया हूँ। मैंने यह पाया कि सर्दी का मौसम समाजवाद के लिए सर्वथा अनुचित है। वर्तमान में चल रहे आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में वामपंथ और ठंड के मध्य की तार्किक विसंगति स्पष्ट हो जाती है।

प्रथमतया सर्दी का मौसम सड़क पर धरना प्रदर्शन के लिए अनुकूल नहीं होता है। सर्दियों का समय समाजवाद के शीतनिद्रा में जाने के लिए उपयुक्त होता है। समाजवादी सौंदर्यशास्त्र के साथ भी सर्दियाँ ठीक नहीं जाती। एक अच्छा वामपंथी कम नहाया हुआ, दाढ़ी बढ़ाया हुआ, महँगा कुर्ता पहन कर ग़रीबों के लिए व्यथित भाव लिए दिखता है। ठंड में एक संघी भी ऐसा ही दिखने लगता है, और एक आम इंसान और वामपंथी में भिन्नता नगण्य सा रह जाता है। बचा कुर्ता, सो जैकेटों के बोझ के तले कुर्ते का हुस्न यूँ दम तोड़ देता है कि कुर्ताधारी उसे कहता ही रह जाता है- बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे- और ठंड से किटकिटाते दाँतों से एक बोल नहीं फूटता।

सीएए के ख़िलाफ देर रात में प्रदर्शन करते लोगों का फ़ाईल फ़ोटो

सांप्रदायिक सैनिकों का सेनापतित्व स्वत: ही धारण करके कोई वीर, रणबाँकुरा मैदान में उतर भी आए तो दक्षिणपंथी सरकारों की पुलिस मार्क्स का मुक्कों से और लेनिन का लाठी से देने को तत्पर दिखती है। चाय और समोसे, हीर और राँझा, लैला और मजनू के समान ठंड और लट्ठ का ऐसा अतुलनीय मेल होता है कि उसके परिणाम ऐतिहासिक होते हैं। ऐसे में कॉमरेड मित्रों के पास इसके अतिरिक्त कोई मार्ग बचता नहीं है कि वे ओजस्वी भाषणों द्वारा धर्म की अफ़ीम के नशे में डूबे सैनिकों को ओजस्वी भाषणों का च्यवनप्राश दे कर टीवी चैनलों की ओर निकल लें और मूँगफली खाते हुए सड़क पर होते दँगों को बहस-मुबाहिसों, संपादकीय लेखों के माध्यम से वैचारिक क्रांति का रूप दें।

किसी पिटते हुए युवा के चित्र को या किसी फेरेक्स की चाह में दुखी बालक और टीवी कैमरे की चाह में दुखी उसकी माता को आंदोलन का चेहरा बना कर संवेदना का संचार करें ताकि जनता जलती बसों, ट्रेनों और तमाम विध्वंस को भूल जाएँ, और एक ग्लानि के साथ कहें कि हाँ, धिक्कार है इस लोकतंत्र पर जो इन उद्वेलित हृदयों के आक्रोश को मार्ग देने के लिए चार अतिरिक्त गाड़ियाँ और दो अतिरिक्त ट्रेनें ना उपलब्ध करा सका। वामपंथी आँदोलनस्थल पर पैदल सैनिकों को उत्साह देकर अपने लेखों- भाषणों से ऐसा माहौल खींचता है मानो सरकारी बसें संविधान की रक्षकों उतरे सेनानियों को देख स्वयं बोल उठीं हों कि हे सखि, ऐसे क्रांति के समय में क्या यह धर्मसंगत होगा कि हम अपने स्पीड गवर्नर को धता बताते हुए निकल पड़े जब कि मुख्यमंत्री ही गवर्नर को भाव नहीं दे रहे हैं। हे सखी, क्यों ना हम आत्मदाह ही कर लें।

कॉमरेड जनता को समझा ही लेते हैं कि यह धर्मनिरपेक्ष शाँतिपूर्ण आंदोलन है। यह शुक्रवार को उग्र रूप सिर्फ़ इसलिये पकड़ लेता है क्योंकि माँ संतोषी के भक्त आज कल काफ़ी उग्र रहते हैं। अन्यथा कोई कारण नहीं है। परंतु संघर्ष स्थल से दूर होने के अपरिहार्य संकट आंदोलन के खिंचने की स्थिति में उभरने लगते हैं। जिन्हें धर्म युद्ध बता कर कॉमरेड धरना स्थल में बिठा कर कट लिए होते हैं, वे सैनिक भी उनके प्रचार से चिंतित हो उठते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं शर्मा जी के बेटे का विवाह के नेग के ग्यारह रुपए हम ग़लत पंडाल में घुसकर वर्मा जी के बेटे को थमा आए? ठंड के समय एक और संकट होता है कि अवकाश और त्योहारों का मौसम होता है। विदेश यात्राओं का भी संयोग इसी काल में बनता है।

जब शाहीन बाग में ठिठरता आंदोलनकारी शैम्पेन ले कर नववर्ष मनाते कॉमरेड को देखता है तो भड़क उठता है। व्याकुल हृदय कह उठता है कि भाड़ में गए तुम्हारे मार्क्स बाबा, अब तो सब बुत उठाए जाएँगे। सहसा ही युद्ध क्षेत्र में तख्ता पलट जाता है। कॉमरेड जब इंस्टाग्राम पर रेसिस्टेंस के फ़ोटो अपनी बिल्ली का आलिंगन लेते हुए डाल कर ठहरते हैं तो पाते हैं कि आंदोलन भूमि में विद्रोह हो चुका है। धर्मनिरपेक्षता का तंबू जो वे आंदोलनकारियों पर तान के फ्राँस गए थे, उसे चीर कर धार्मिक कट्टरता के संकेत निकल रहे हैं। महीनों खींचे संवैधानिक संघर्ष की मारीचिका जब छँटती है तो समाजवादी बँधु की स्थिति ठंड की भोर में शॉवर के नीचे धकेले उस व्यक्ति की सी हो जाती है जो निर्वस्त्र होकर पाता है कि गीज़र तो चालू ही नहीं था। अब उसके पास इसी ठंडे पानी में नहाने के अलावा कोई चारा नहीं है।

दिल्ली के शाहीन बाग में देर रात पुलिस कार्रवाई के विरोध में बैठे आंदोलनकारियों का फ़ाईल फ़ोटो

इस शोध का निष्कर्ष यही है कि सर्दियाँ समाजवाद के बिल्कुल भी अनुरूप नहीं है। समाजवादियों को जाड़े में मार्क्स बाबा की पुस्तक और बुड्ढे बाबा का गिलास लेकर रज़ाई में रहना चाहिए। प्रिय कॉमरेडों के लिए संघर्ष का शुभ समय ग्रीष्म ऋतु है। अत: हे कॉमरेड, तुम अपने होस्टलों के और कान्फ्रेंस हॉलों के गर्म कमरों में सिधारो और पुन: पोस्टर ले कर तब प्रकट हो जब शीत लहर पलायन पर हो। सर्दियों में समाजवाद पर तब तक मेरा शोध पूर्ण हो कर प्रकाशित हो चुका होगा और मैं एक महान नेता के रूप में तुम्हें पथभ्रमित करने को उपलब्ध हो जाऊँगा।

मैं तब गरारे कर करके तुम्हारे पक्ष में नैरेटिव बुनूँगा और तुम वीर सेनापति की भाँति अपनी सेना का नेतृत्व करना। तुम देखना मैं एक चुनावी चिंतक बन कर उभरूँगा और बीच-बीच में डिंग-डाँग करते हुए चुनाव भी लड़ ज़ाया करूँगा और चुनाव हार कर पुन: निष्पक्ष चिंतक बन ज़ाया करूँगा। एक डूबते हुए व्यंग्यकार के कैरियर की रक्षा के लिए आवश्यक है, हे कॉमरेड, कि तुम सर्दियों में बाहर आने से परहेज़ रखो और हमारे महान लेनिन के महान आंदोलन की सार्वजनिक का-का-छी-छी ना होने दो।

JNU पर वामपंथियों का रवीश ने किया बचाव: अजीत भारती का वीडियो | Ravish ignores Left involvement in JNU violence

रवीश कुमार ने वामपंथियों का जम कर बचाव किया और ABVP, दिल्ली पुलिस और प्रशासन पर सवाल उठाए। साथ ही ऐसी बातें कीं जैसे कि 5 जनवरी से पहले वहाँ कुछ हुआ ही नहीं!

पूरा वीडियो यहाँ क्लिक करके देखें

योगी की राह चला JNU प्रशासन: दंगाई छात्रों से वसूल कर होगी विवि को हुए नुकसान की भरपाई

जेएनयू हिंसा मामले में जहाँ एक तरफ़ पुलिस ने जाँच शुरू कर दी है, वहीं दूसरी तरफ दंगाइयों को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन भी सख्त हो गया है। जेएनयू के कुलपति एम जगदीश कुमार ने रविवार (जनवरी 5, 2020) को हुई हिंसा की वारदात पर बयान देते हुए कहा कि वो छात्रों को छात्रों के रूप में ही देखते हैं, ये नहीं देखते कि कौन किस राजनीतिक गुट से जुड़ा हुआ है। जेएनयू में वामपंथी गुंडों ने एबीवीपी के छात्रों को खोज-खोज कर पीटा। पत्थरबाज उपद्रवियों ने डंडों से छात्रों को मारा। हॉस्टल रूम के गेट तोड़ डाले गए। इसके बाद वामपंथियों ने ख़ुद को पीड़ित बताते हुए बचने का प्रयास किया।

वामपंथी छात्र कुलपति का इस्तीफा माँग रहे हैं। उनका कहना है कि कुलपति ने उन्हें बचाने के लिए कुछ नहीं किया। जगदीश कुमार ने कहा कि जेएनयू को गहन चर्चाओं और विचार-विमर्श के लिए जाना जाता है। उन्होंने हिंसा की वारदात को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। उन्होंने बताया कि इस बात की जाँच हो रही है कि हमलावर बाहर आए आए या नहीं। उधर रजिस्ट्रार प्रमोद कुमार ने जानकारी दी कि उपद्रवियों ने विश्वविद्यालय की संपत्ति को जम कर नुकसान पहुँचाया है। उन्होंने कहा कि चीजों को तहस-नहस कर डाला गया है।

रजिस्ट्रार ने बड़ा बयान देते हुए कहा कि जो भी छात्र इन दंगों में शामिल थे और जिन्होंने भी जेएनयू की संपत्ति को नुकसान पहुँचाया है, उन्हें चिह्नित करके इस नुकसान की भरपाई की जाएगी। रजिस्ट्रार ने कहा कि दंगाई छात्रों से ही रुपए वसूल कर नुकसान की भरपाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी एक ‘फ्री स्पेस’ है, जहाँ छात्रों की गतिविधियों पर कोई लगाम नहीं लगाया गया है। उन्होंने कहा कि वो ये नहीं देख रहे कि कौन से छात्र किस गुट के थे। बकौल प्रमोद कुमार, पुलिस की जाँच के बाद दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी।

जेएनयू प्रशासन ने बताया है कि मंगलवार (जनवरी 7, 2020) से रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया फिर से शुरू हो गई है और इस बार सबकुछ शांतिपूर्ण माहौल में हो रहा है। जेएनयू प्रशासन ने कहा कि अधिकतर छात्र ऐसे हैं, जो पठन-पाठन के कार्य में भाग ले रहे हैं और वो अकादमी कैलेंडर के अनुसार चल रहे हैं। लेकिन, कुछ छात्रों ने उन्हें बाधा पहुँचाने के उद्देश्य से हंगामा किया। बता दें कि यूपी में भी योगी आदित्यनाथ की सरकार ने दंगाइयों से वसूली कर के सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई करने का फैसला किया था। इस फ़ैसले पर अमल भी किया जा रहा है।