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NY टाइम्स ने JNU हिंसा पर कहा- लगाए गए थे ‘जय श्रीराम’ के नारे, जावड़ेकर ने कसा तंज- यही हैं सच्चे राम भक्त

फाइनेंशियल टाइम्स के बाद रविवार (जनवरी 5, 2019) को जेएनयू हिंसा पर टुच्ची और निराधार रिपोर्टिंग करने के लिए केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने आज न्यूयॉर्क टाइम्स का भी सोशल मीडिया पर मजाक उड़ाया। अपनी रिपोर्ट में एबीवीपी को आरोपित बताकर न्यूयॉर्क टाइम्स वे दावा किया कि विश्वविद्यालय के मुताबिक छात्रों के साथ मारपीट करने वाले लोग एक हिंदू समूह से थे। जबकि वास्तविकता में विश्वविद्यायल अपने प्रेस नोट में ये बात साफ कह चुका है कि विश्वविद्यालय में अराजकता फैलाने वाले छात्र वे थे, जो सेमेस्टर रजिस्ट्रेशन का विरोध कर रहे थे। इसके अलावा इस रिपोर्ट में बिना किसी जाँच-पड़ताल के ये भी कहा गया कि हमला करने वाले छात्र ‘जय श्री राम’ चिल्ला रहे थे।

हालाँकि, इस रिपोर्ट के सोशल मीडिया पर शेयर होते ही, भारतीय यूजर्स ने इसपर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए न्यूयॉर्क टाइम्स को खूब लताड़ा। लेकिन, केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इस बार न्यूयॉर्क टाइम्स को व्यंग्यात्मक लहजे में जवाब दिया। प्रकाश जावड़ेकर ने अभिनव प्रकाश नाम के यूजर की प्रतिक्रिया को अपने अकॉउंट से शेयर किया। जिसमें अभिनव ने न्यूयॉर्क टाइम्स के ‘जय श्रीराम’ वाले बिंदु का मजाक उड़ाते हुए लिखा था कि जिसे भारत के किसी पत्रकार ने नहीं सुना, उसे न्यूयॉर्क टाइम्स ने सुना। हैरानी नहीं होती कि आखिर इनके राष्ट्रपति ही इन्हें फेक न्यूज फैलाने वाला क्यों कहते हैं।

अभिनव के इस ट्वीट को शेयर करते हुए प्रकाश जावड़ेकर ने व्यंगात्मक लहजे में कहा कि ऐसा लगता है न्यूयॉर्क टाइम्स में ही भगवान राम के सबसे ज्यादा भक्त हैं। जो हर जगह राम को ढूँढ लेते हैं।

इसके बाद, उन्होंने गंभीर होते हुए कहा कि अब वे ननकाना साहिब में हुई हिंसा और धार्मिक रूप से प्रताड़ित किए गए लोगों पर न्यूयॉर्क टाइम्स की ग्राउंड रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं। ताकि जान सकें कि उन्होंने (न्यूयॉर्क टाइम्स) वहाँ कौन से नारे सुने?

गौरतलब है कि इससे पहले अभी बीते दिन ही प्रकाश जावड़ेकर ने विदेशी मीडिया फाइनेंशियल टाइम्स को लताड़ लगाई थी। क्योंकि फाइनेंशियल टाइम्स ने भी रविवार को जेएनयू मेंं हुई हिंसा को कवर करते हुए पूरी खबर को नया एंगल देने का प्रयास किया था और हेडलाइन में दंगा करने वालों के लिए उपद्रवी भीड़ (Rowdy Mob), हिंसक भीड़ (Violent MOB), दंगाइयों (Rioters) की भीड़ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने की बजाय ‘उत्पातियों’ को ‘राष्ट्रवादियों (nationalist)’ की भीड़ बताया था।

‘UP में हिंसा के लिए वित्तीय मदद कर रही हैं प्रियंका गाँधी’

सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ यूपी में दंगे भड़काने वाली भीड़ का कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय महिला सचिव प्रियंका गाँधी द्वारा लगातार बचाव किया जा रहा है। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने उनपर बड़ा बयान दिया है।

दरअसल, ईकाई अध्यक्ष ने कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा पर प्रदेश में हिंसा फैलाने के लिए वित्तीय मदद करने का आरोप लगाया है। स्वतंत्र देव सिंह का कहना है कि प्रियंका गाँधी प्रदेश में हिंसा भड़काने के लिए दूसरे प्रदेशों के दंगाइयों को ला रही हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक भाजपा नेता ने बरेली में एक जनसभा को संबोधित करते हुए अपना बयान दिया। उन्होंने कहा, “प्रदेश में पिछले तीन साल से शांति थी और मैं पूछना चाहता हूँ कि प्रियँका यहाँ दंगा क्यों कराना चाहती हैं? वह यह मध्य प्रदेश या राजस्थान में क्यों नहीं करतीं? वह हिंसा के लिए वित्तीय मदद कर रहीं और दूसरे राज्यों से दंगाइयों को ला रहीं है और शांति भंग करने के लिए उनसे पत्थरबाजी करवा रही हैं।”

स्वतंत्र देव सिंह ने इस दौरान नागरिकता संशोधन कानून को लेकर भी बयान दिया। उन्होंने कहा, “अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यक प्रताड़ित हो रहे थे, लेकिन ना ही नेहरू और न ही मनमोहन सिंह सरकार ने ये कानून लागू किया। पहली बार ऐसा हुआ जब राजनीतिक नेताओं ने ये बड़ा फैसला किया।”

उन्होंने कहा कि अब नागरिकता संशोधन कानून के जरिए अल्पसंख्यक शरणार्थियों को भारत की नागरिकता दी जाएगी, जिससे वह सम्मानजनक जीवन जी सकें। उन्हें पीएम आवास योजना के तहत घर और अन्य योजनाओं का लाभ मिल सके।

ईकाई अध्यक्ष ने सीएए का मतलब समझाते हुए विपक्ष के दावों को खारिज किया और जनता को कहा कि भारतीय मुस्लिम की नागरिकता छीनना नहीं है। उन्होंने आगे कहा, “यहाँ तक कि राम मनोहर लोहिया ने भी कहा था कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और उन्हें भारत की नागरिकता दी जानी चाहिए। लेकिन समाजवादी पार्टी को अपने संस्थापक के शब्द याद नहीं, क्योंकि उनके नेता सिर्फ पारिवार के लिए राजनीति करना चाहते हैं।”

JNU में वामपंथी छात्रों का समर्थन करने पहुँचीं दीपिका पादुकोण, मुंबई का फ़िल्मी गैंग भी सड़क पर

फ़िल्म अभिनेत्री दीपिका पादुकोण ने भी जेएनयू हिंसा को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया। मुंबई में दीया मिर्ज़ा, अनुराग कश्यप और विशाल भारद्वाज सहित कई फ़िल्मी हस्तियों ने मोदी सरकार पर निशाना साधा। बावजूद इसके कि जेएनयू प्रशासन ने जेएनयू छात्र संगठन की अध्यक्ष आइशी घोष सहित 19 छात्रों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया है। दीपिका पादुकोण ने कहा कि उन्हें इस बात से गर्व होता है कि आज लोग बिना डरे अपनी आवाज़ रख रहे हैं। दीपिका के विरोध प्रदर्शन में देखे जाने के बाद कई लोगों ने उनकी आलोचना भी की।

फ़िल्मी हस्तियाँ लगातार वामपंथी गुंडों को बचाने में लगी है। फ़िल्म निर्देशक अनुराग कश्यप ने तो भाजपा को ही आतंकवादी संगठन करार दिया। कश्यप ने पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को आतंकवादी बताया था। दीपिका पादुकोण ने अब तक इस मामले में चुप्पी साध रखी थी लेकिन अब जेएनयू विरोध प्रदर्शन में उन्होंने भाग लिया है। दीपिका पादुकोण की ‘छपाक’ रिलीज होने जा रही है, जिसमें उन्होंने एक एसिड अटैक पीड़िता का किरदार निभाया है।

जेएनयू हिंसा मामले में लगातार कई वीडियो वायरल हो रहे हैं। वामपंथी गुंडों के ख़िलाफ़ एक के बाद एक सबूत आ रहे हैं। बावजूद इसके बॉलीवुड का वामपंथी गैंग एबीवीपी पर हिंसा का इल्जाम डाल कर वामपंथी गुंडों को बचाने में प्रयासरत है।

पीएम मोदी के अंधविरोध में बॉलीवुड के लोगों ने जेएनयू के असली गुनहगारों के ख़िलाफ़ एक शब्द भी नहीं बोला। अब देखना यह है कि जेएनयू विरोध प्रदर्शन के नाम पर वामपंथी अजेंडे को आगे बढ़ाने में लगे फ़िल्मी गैंग की अगली प्रतिक्रिया क्या रहती है।

बुर्क़ा होता है मुस्लिम महिला की पहचान, घूँघट से रहती है हिंदू महिला परेशान: BBC की बिग BC

बीते दिनों से शाहीन बाग पर मुस्लिम महिलाओं के नेतृत्व में हुआ विरोध प्रदर्शन काफी चर्चाओं में रहा। इस बीच कई मीडिया संस्थान ऐसे दिखे जिन्होंने धरने पर बैठी मुस्लिम महिलाओं के ऊपर अपनी लगातार कवरेज की और उन्हें SHEORES बनाकर उभारा। सोशल मीडिया पर भी इन महिलाओं को नारी सशक्तिकरण का असली चेहरा बनाकर पेश किया गया। इसी क्रम में अपनी अजेंडापरस्त पत्रकारिता के लिए मशहूर बीबीसी ने कल अपनी एक रिपोर्ट की।

हालाँकि, बीबीसी ने रिपोर्ट में क्या लिखा? इस पर चर्चा करने से पहले ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि बीबीसी ने अपनी पूरी रिपोर्ट किसके पक्ष में और क्या एंगल रखकर की होगी… लेकिन फिर भी बता दें कि शाहीन बाग पर कवरेज करते हुए बीबीसी ने इस बार इस प्रोटेस्ट का समर्थन कर रही महिलाओं के हिजाब और बुर्के को केंद्र रखा। साथ ही आर्टिकल को हेडलाइन दी गई- “CAA: मुस्लिम लड़कियों का आंचल बना परचम, क्या हैं इसके मायने?”

बीबीसी की खबर

लेख की शुरुआत मजाज की लिखी पंक्तियों से हुईं- “तेरे माथे पर ये आंचल ख़ूब है लेकिन तू इस आंचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था।” इसके बाद लेख में बताया गया कि इन पंक्तियों को महिलाएँ अलग-अलग प्रदर्शन में गा रही हैं और पुलिस की क्रूरता के सामने तनकर खड़ी हैं। प्रदर्शन में मुस्लिम महिलाओं के योगदान को, उनकी प्रदर्शन के प्रति प्रतिबद्धता को उभारा गया और साथ ही उनके बुर्के-हिजाब पर भी बात हुई। अपने लेख और उसकी हेडलाइन में बीबीसी ने जिस बखूबी से उन्होंने बुर्के और हिजाब को घुसाया, वो देखने वाला है। बीबीसी लिखता है- “अपने हिजाब और बुर्के में वे (मुस्लिम महिलाएँ) पहचान की राजनीति के ख़िलाफ़ भी संघर्ष कर रही हैं।” इसके बाद आगे सारी बात और कुछ एक मुस्लिम महिलाओं के सीएए के ख़िलाफ़ विचार….

यहाँ गौर देने वाली बात है कि हिजाब और बुर्के से जोड़कर मुस्लिम महिलाओं के संघर्ष पर अपना लेख लिखने वाला बीबीसी अक्सर हिंदुओं की घूँघट प्रथा का पुरजोर विरोधी रहा है। लेकिन, मुस्लिम महिलाओं के प्रदर्शन की बात आते ही, वे यहाँ उन्हें बुर्के या हिजाब से आजाद होकर सामने आने की सलाह नहीं दे रहा। बल्कि मजाज की पंक्तियों का इस्तेमाल करते हुए उन्हे इस बंधन के साथ ‘लड़ने’ के लिए उकसा रहा है।

गौरतलब है कि बीबीसी की रिपोर्ट्स में हिंदू बनाम मुस्लिम ध्यान रखते हुए एकतरफा पत्रकारिता का फर्क़ पहली बार नहीं झलक रहा। बल्कि यदि बीबीसी की वेबसाइट पर जाकर सर्च बॉक्स में इन दोनों (घूँघट और बुर्का/हिजाब) शब्दों को टाइप किया जाए तो इनके इस पूरे अजेंडे का खुलासा होता है।

बीबीसी की वेबसाइट पर केवल दो कीवर्ड्स डालने के बाद फिल्टर होकर सामने आई खबरों के मात्र टाइटल भर से पता चल जाता है कि बीबीसी के लिए ‘घूंघट’ का तो पर्याय हिन्दू महिलाओं के विकास में बेड़ियों का चेहरा है। जबकि मुस्लिम महिलाओं के लिए बुर्का या हिजाब उनकी पहचान है, उनका अधिकार है। जिसे लेकर यदि वे आगे बढ़ने का सफर तय करती हैं, तो वे उसे उपलब्धि की तरह अपनी खबरों में जगह देते हैं। जैसे- ‘पुणे में हिजाब वाली क्रिकेटर्स’, ‘हिजाब वाली महिलाओं का खास सैलून’, ‘हिजाब वाली बाइकर’ आदि-आदि।

बीबीसी में घूँघट बनाम हिजाब पर पत्रकारिता में फर्क़

आधुनिकता के इस दौर में जहाँ निस्संदेह ही हर समुदाय की महिला को अपनी पहचान बनाने के लिए अपने स्तर पर संघर्ष करना पड़ रहा है। वहाँ हिंदू महिलाओं के लिए घूंघट और मुस्लिम महिलाओं के लिए बुर्का/हिजाब दोनों ही कुरीतियों और बंधनों का प्रतिबिंब है। जिसे उनके जीवन का अहम हिस्सा बनाकर ऐसे रचा-बसा दिया गया है कि वो चाहकर भी इससे उभर नहीं पा रहीं।

लेकिन, फिर भी यदि आज के समय में देश के कई हिस्सों मे देखा जाए तो मालूम चलेगा कि हिंदू महिलाएँ धीरे-धीरे घूँघट के बंधन को नकार रही हैं। मगर, मुस्लिम महिलाओं का पढ़ा-लिखा तबका अब भी बुर्के और हिजाब को अपनी निजी पसंद कहकर बढ़ावा दे रहा हैं। जिसका हालिया उदाहरण न केवल शाहीन बाग के प्रदर्शन में बैठी घरेलू मुस्लिम महिलाओं के रूप में देखने को मिला, बल्कि जामिया मिलिया इस्लामिया में हुए प्रदर्शन में शामिल छात्राओं के रूप में भी सामने आया।

गौरतलब है कि ऐसी स्थिति में बीबीसी जैसे मीडिया संस्थान, घूँघट और हिजाब पर अपनी अलग-अलग पत्रकारिता कर दोनों समुदायों के बीच समझ की, परिवेश की, अधिकारों की एक गहराई खाईं निर्मित कर रहे हैं। जिसमें शेष हिंदू महिलाएँ तो बढ़ते समाज में अपने विवेक-अपनी बुद्धि के आधार पर सही-गलत को चुनकर बाहर निकलने में सक्षम हो जाएँगी। लेकिन मुस्लिम महिलाएँ, इसे हमेशा अपनी आन-बान-शान समझकर धँसती जाएँगी। वे इस हिजाब को अपनी पहचान बनाकर हमेशा ओढ़े रहेंगी और कट्टरवादियों द्वारा गढ़े समाज में मजहब के नाम पर इनका बचाव भी करेंगी।

सोचिए! एक ओर जहाँ नारी सशक्तिकरण के नाम पर गई जगह अभियान चलाकर महिलाओं को घूँघट से आजादी दिलवाई जा रही है। वहीं, नाइकी जैसी बड़ी कंपनी अपना फायदा साधने के लिए बाजार में मुस्लिम एथलीटों के लिए हिजाब उतार रही हैं और उन्हें अपनी ओर आकर्षित भी कर रही हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि बीबीसी की तरह नाइकी और अन्य कंपनियाँ जानती हैं कि जिन मजहबी ठेकेदारों ने उन्हें बुर्के और हिजाब में बाँधा है, वे उसके बिना न तो उन्हें खुली हवा में सांस लेने देंगे, न बतौर खिलाड़ी दौड़ने देंगे और न ही शाहीन बाग में विरोध प्रदर्शन करने देंगे।

मैं ट्विटर पर किए गए अटैक के आधार पर अपने विचार तय नहीं करता: Zoho चीफ ने ‘लिबरल्स’ को दिया करारा जवाब

20 फरवरी 2020 को चेन्नई में होने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के एक कार्यक्रम में भारतीय सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट कंपनी जोहो के संस्थापक एवं सीईओ श्रीधर वेम्बु और एक्सेंचर के एमडी और चेन्नई ऑपरेशन्स के प्रमुख राम रामचंद्रन के चीफ गेस्ट और गेस्ट ऑफ ऑनर के तौर पर शामिल होने की सहमति देने को लेकर सोशल मीडिया पर ‘बुली’ किया गया।

RSS के इसी प्रोग्राम में चीफ गेस्ट हैं जोहो चीफ श्रीधर वेम्बू

बता दें कि इन कॉरपोरेट लीडर्स इस कार्यक्रम का हिस्सा बनने के लिए सहमत होने को लेकर स्वघोषित नेताओं द्वारा सोशल मीडिया पर ‘बुली’ किया गया।

इतना ही नहीं, लोगों ने तो जोहो के उत्पादों का बहिष्कार करने की भी धमकी दी।

अब जब दो शीर्ष कॉरपोरेटर लीडर्स को बुली किया जा रहा था, तो भला वो लोग पीछे कैसे रहते, जिनका करियर ही ‘बुली’ करने पर टिका हुआ है। उन्होंने भी इसमें हिस्सा लिया और आरएसएस के प्रोग्राम में शामिल होने को लेकर सवाल उठाए।

हालाँकि, जोहो प्रमुख श्रीधर वेम्बु पर ‘लिबरलों’ द्वारा किए गए इस बुली का कोई असर नहीं पड़ा। वो काफी स्थिर और अविचलित दिखे।

उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, “मैं ट्विटर पर किए गए अटैक के आधार पर अपने विचार तय नहीं करता। यदि आप उन इवेंट को नापसंद करते हैं जिसमें मैं हिस्सा लेता हूँ, तो कृपया वह करें जो आपका अंतरात्मा कहता है और मैं वही करूँगा जो मेरा अंतरात्मा कहता है। हम अपने काम की वजह से अपनी रोजी रोटी कमाते हैं और हम गुणवत्तापूर्ण काम करते रहेंगे। मैं इन हमलों का जवाब नहीं दूँगा।”

इसके बाद ‘लिबरल’ बुलियों ने जोहो के ग्राहकों और कर्मचारियों से कहा कि ‘वे वही करें जो उनका अंतरात्मा कहता है।’’ साथ ही वेम्बू को धमकी भी दी गई कि अगर वे इस लाइन से नहीं हटेंगे, तो उन्हें सोशल बायकॉट का भी सामना करना पड़ेगा।

वैसे यह पहली बार नहीं है जब ‘लिबरलों’ ने आरएसएस द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए लोगों को धमकाया है। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भी उस समय काफी रोष का सामना करना पड़ा था, जब उन्होंने 2018 में आरएसएस के एक कार्यक्रम में भाग लिया था।

तुम ‘दैनिक भास्कर’ से भी सस्ती बिकती हो: फ़िल्म निर्देशक ने मज़ाक-मज़ाक में स्वरा को जम कर लताड़ा

बॉलीवुड में जब कोई भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अथवा केंद्र सरकार के समर्थन में बोलता है, उसे वामपंथी गैंग की गालियाँ पड़ती हैं। जो हर मुद्दे पर बड़बोले की तरह अपनी राय नहीं रखता, उसे भी वामपंथी गैंग निशाने पर लेता है और रीढ़विहीन बताता है। इसी क्रम में आयुष्मान खुराना की फ़िल्म ‘ड्रीम गर्ल’ के निर्देशक राज शांडिल्य ने स्वरा भास्कर को लेकर ऐसी टिप्पणी की, जिससे वो भड़क गईं। हालाँकि, राज ने मज़ाक-मज़ाक में ये बात कही थी लेकिन अक्सर ट्विटर पर लोगों से लड़ते रहने वाले स्वरा भास्कर ने इसे गंभीरता से ले लिया और बौखलाहट में राज को झिड़क दिया।

दरअसल, राज ने लिखा कि स्वरा भास्कर से ज़्यादा महँगा तो ‘दैनिक भास्कर’ बिकता है, इसीलिए सस्ती चीजों पर लोगों को ध्यान नहीं देना चाहिए। बता दें कि ‘दैनिक भास्कर’ एक हिंदी समाचारपत्र है, जो भारत के कई राज्यों में अपनी सेवाएँ देता है। एक अख़बार से अपनी तुलना किए जाने और ख़ुद को ‘सस्ता’ बताने के राज के ट्वीट से भड़की स्वरा ने गुस्से में उन्हें भला-बुरा सुनाया। उन्होंने कहा कि राज उन्हें रोल ऑफर करते हैं और अपनी फ़िल्म का ट्रेलर शेयर करने का निवेदन करते हैं। स्वरा ने कहा कि राज को अगली बार ऐसा करने से पहले अपनी ‘सस्ती हरकतों’ के बारे में सोच लेना चाहिए।

इसके बाद बौखलाई स्वरा ने राज शांडिल्य को शुभकामनाएँ भी दी। बता दें कि शांडिल्य ‘वेलकम बैक और भूमि’ जैसी फ़िल्मों के लिए डायलॉग लिख चुके हैं। टीवी की दुनिया में ‘कॉमेडी सर्कस’ और ‘कॉमेडी नाइट्स विथ कपिल’ की सफलता के पीछे उनका अहम किरदार माना जाता है। उन्होंने इन शो के कई एपोसीड्स का निर्देशन किया व स्क्रिप्ट्स लिखे। राज शांडिल्य ने स्वरा भास्कर के बौखलाने के बाद उन्हें जवाब देते हुए लिखा:

“मेरी बात यदि आपको ठीक नहीं लगी तो दिल से माफ़ी चाहता हूँ। लेकिन आपसे भी मेरी एक गुज़ारिश है। आप भी किसी के बारे में कुछ बोलने से पहले सोचा करें, चाहे वो देश हो, लोग हों या फिर कोई व्यक्ति विशेष। रही बात मेरी तो अगली बार भी रोल ऑफर ज़रूर करूँगा क्योंकि मुझे आपके एक्टर होने पे कोई आपत्ति नहीं है।”

राज शांडिल्य के जवाब के बाद स्वरा ने आरोप लगाया कि राज ने उन्हें ‘सस्ती’ और ‘ओछी’ कहा है। स्वरा ने कहा कि ऐसे शब्दों से किसी भी सामान्य और शालीन इंसान को आपत्ति ही होगी। स्वरा ने दावा किया कि वो विचारधारा और तर्क के आधार पर विरोध करती हैं। साथ ही उन्होंने राज से पूछा कि वो किसी के एक्टर या नागरिक होने पर आपत्ति कैसे जता सकते हैं? बता दें कि ट्विटर ट्रोल बन चुकी स्वरा अक्सर ऐसे लड़ाई-झगड़ों में पड़ी रहती हैं।

CCTV सर्वर डैमेज होने से पुलिस परेशान, गुंडों का नेतृत्व करती देखी गई आइशी के ख़िलाफ़ मामला दर्ज

जेएनयू हिंसा मामले की जाँच में दिल्ली पुलिस को काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। ऑपइंडिया ने एक ख़बर में बताया था कि शुक्रवार (जनवरी 3, 2019) को वामपंथी उपद्रवियों ने विश्वविद्यालय के कम्युनिकेशन सेंटर में घुस कर वहाँ के सिस्टम को तहस-नहस कर दिया था। कर्मचारियों को भगा दिया गया था और इंटरनेट सर्विस के तार भी काट डाले गए थे। इस कारण रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया ठप्प हो गई थी। दिल्ली पुलिस ने कहा है कि सीसीटीवी के सर्वर को इतना नुक़सान पहुँचाया गया है कि फुटेज लेकर उपद्रवियों की पहचान करना मुश्किल हो रहा है।

दिल्ली पुलिस के क्राइम ब्रांच ने इस मामले की जाँच अपने हाथ में ली है। शुक्रवार को सर्वर डैमेज होने को लेकर जेएनयू प्रशासन ने एफआईआर भी दर्ज कराई थी। इसके अगले दिन गुंडे फिर से कम्युनिकेशन सेंटर में घुस गए थे और उन्होंने फिर से कर्मचारियों को भगा कर तकनिकी सिस्टम को तोड़फोड़ डाला था। जाँच में सीसीटीवी फुटेज की अहम भूमिका होगी, इसीलिए पुलिस उन फुटेज का जुगाड़ करने के अन्य उपाय तलाश रही है। बता दें कि जामिया हिंसा मामले में भी जब पुलिस सीसीटीवी फुटेज लेने पहुँची थी, तब छात्रों ने हंगामा किया था। जामिया प्रशासन ने सीसीटीवी फुटेज देने से इनकार कर दिया था।

इसके अलावा कई स्क्रीनशॉट भी शेयर हो रहे हैं। विभिन्न व्हाट्सप्प स्क्रीनशॉट्स से पता चल रहा है कि वामपंथियों ने ख़ूब सोच-समझ कर इस हिंसा की साज़िश रची थी। एबीवीपी वालों के हॉस्टल के कमरे तोड़ डाले गए और उनकी पिटाई की गई। पुलिस ने उन स्क्रीनशॉट्स में दिख रहे नंबरों को खँगाला है। अधिकतर नंबर स्विच ऑफ कर दिए गए हैं। लेकिन, हिंसा के समय उनकी लोकेशन क्या थी- ये ‘कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR)’ तकनीक की मदद से पता चल जाएगा। पुलिस उन नंबरों की जाँच कर रही है।

जेएनयू प्रशासन की शिकायत के बाद पुलिस ने छात्र संघ की अध्यक्ष आइशी घोष सहित 19 छात्रों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज की है। जावेद अख्तर ने आइशी के ख़िलाफ़ मामला दर्ज करने पर आपत्ति जताई। इस मामले में अब तक 3 एफआईआर दर्ज किए जा चुके हैं। हालाँकि, 3 दिन बीतने के बावजूद अभी तक कोई गिरफ़्तारी नहीं हुई है। आइशी घोष का दावा है कि उन पर भी हमला किया गया और उनका सिर फोड़ दिया गया। हालाँकि, वायरल वीडियो में वो नकाबपोश दंगाइयों के नेतृत्व करती दिख रही हैं। उनका सिर कैसे फूटा, इस बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं है।

मैं मंत्री बन गई हूँ, लेकिन अभी हमें अपनी जेबें भरनी बाकी है: महाराष्ट्र सरकार में कॉन्ग्रेसी मंत्री

तमाम विवादों के बाद जैसे ही महाराष्ट्र सरकार के मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ, मंत्रियों को उनके विभाग मिले, उनका ओहदा मिला वैसे ही उनके विवादित बयान शुरू हो गए हैं। इसी की एक बानगी देखने को मिली महाराष्ट्र के वाशिम जिले में। जहाँ एक मंच पर महाराष्ट्र सरकार की नवनिर्वाचित कैबिनेट मंत्री यशोमति ठाकुर ने शायद अपने मन की बात कह दी, जो विवाद का मुद्दा बन गया है। कैबिनेट मंत्री यशोमति ठाकुर ने मंच से कहा कि अभी-अभी हमने मंत्री पद की शपथ ली है, अभी हमारी जेबें गरम नहीं हुई हैं।

दरअसल महाराष्ट्र की महिला एवं बाल विकास मंत्री ने स्थानीय निकाय चुनाव में कॉन्ग्रेस प्रत्याशी के लिए वोट माँगने के दौरान यह बातें कहीं। यशोमति ठाकुर ने कहा, “हमारी सरकार अब तक सत्ता में नहीं थी। लेकिन अब आ गई है। अब मैं मंत्री बन गई हूँ, लेकिन अभी हमें अपनी जेबें भरनी बाकी है।” यहाँ पर ‘जेब भरने’ का तात्पर्य घूस लेने से है।

इसके साथ ही उन्होंने बीजेपी को निशाने पर लेते हुए कहा, “जो लोग विपक्ष में हैं उनकी जेबें काफी गहरी हैं। अगर वे आपके पास आएँ और अपनी जेब का कुछ हिस्सा दें तो उसे मना मत कीजिए। घर आई लक्ष्मी को कौन मना करता है, लेकिन वोट सिर्फ कॉन्ग्रेस को ही दीजिए।” वहीं नेता प्रतिपक्ष देवेंद्र फडणवीस ने यशोमति ठाकुर पर निशाना साधते हुए कहा, “वे (कॉन्ग्रेस) सरकार में जनता की सेवा के लिए नहीं, बल्कि पैसा बनाने के लिए हैं।”

फिलहाल इस बयान पर कॉन्ग्रेस की ओर से अभी तक कोई टिप्पणी सामने नहीं आई है। न ही सहयोगी पार्टी शिवसेना और एनसीपी की तरफ से कोई बयान सामने आया है।

बता दें कि ठाकुर कुछ महीने पहले मुंबई के एक अस्पताल में पुलिस और मेडिकल स्टाफ के साथ दुर्व्यवहार करने को लेकर भी चर्चा में थी। वहीं जब कॉन्ग्रेस नेता से इस विवादित बयान को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने टाइम्स नाउ से कहा कि उनके बयान को मीडिया ने तोड़ मरोड़ कर पेश किया है।

ईरानी कमांडर के जनाजे में इकट्ठा हुए 10 लाख लोग: भगदड़ में 48 से ज्यादा घायल, 35 की मौत

अमेरिकी ड्रोन हमले में 3 जनवरी को मारे गए ईरानी कमांडर कासिम सुलेमानी के जनाजे में आज 10 लाख लोग जुटे। लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस दौरान सुलेमानी के गृहराज्य केरमान में सुपुर्द-ए-खाक से पहले ही लोगों में भगदड़ मच गई। जिसके कारण वहाँ 35 लोगों की मौत हो गई। जबकि, 48 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए। इस खबर की पुष्टि समाचार एजेंसी एपी ने ईरानी टीवी के हवाले से की।

जानकारी के मुताबिक, एक ओर जहाँ रेवोल्यूशनरी गार्ड की विदेशी शाखा के कमांडर के गृह नगर में बहुत काफी बड़ी संख्या में लोग उन्हें अंतिम विदाई देने आए। वहीं, इतनी ही संख्या में तेहरान, कोम, मशहद और अहवाज में भी लोग सड़कों पर मौजूद थे। बड़ी संख्या में लोग आजादी चौक पर जमा हुए। जहाँ राष्ट्रीय झंडे में लिपटे दो ताबूत रखे गए। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि इनमें एक ताबूत सुलेमानी का और दूसरा ताबूत उनके करीबी सहयोगी ब्रिगेडियर जनरल हुसैन पुरजाफरी का है।

बता दें, जनाजे में शीराज से अपने कमांडर को अंतिम विदा देने के लिए केरमान आए लोगों में से एक ने मीडिया को बताया, “हम महान कमांडर को श्रद्धांजलि देने आए हैं।” वहीं, दूसरे ने कहा, “हज कासिम (सुलेमानी) से लोग ना सिर्फ केरमान या ईरान में मोहब्बत करते थे, बल्कि पूरी दुनिया में लोग उनसे मोहब्बत करते थे।”

गौरतलब है कि कमांडर के जनाजे में कई लाखों लोगों को इकट्ठा देख ईरान के विदेश मंत्री जावेद जरीफ ने कई ट्वीट किए। उन्होंने कहा, “क्या डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने पूरी जिंदगी में इतनी भीड़ देखी है? क्या तुम अब भी क्षेत्र के बारे में जानकारी के लिए अपने जोकरों पर निर्भर रहोगे? क्या तुम्हें अभी भी लगता है कि तुम इस महान देश और इसके लोगों को तोड़ सकते हो। पश्चिमी एशिया से अमेरिका की शैतानी मौजूदगी का खात्मा शुरू हो गया है। 

बता दें जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या होने के बाद ईरान ने अमेरिका की सभी सेनाओं को आतंकी घोषित कर दिया है। इसके बाद अब ईरान अपने क्षेत्र के आसपास मौजूद अमेरिकी सेना पर कार्रवाई कर सकता है। ईरानी संसद के मुताबिक, अब पश्चिमी एशिया में इन सेनाओं की किसी भी तरह की मदद (खुफिया, तकनीकी, वित्तीय) को आतंक का सहयोग करार दिया जाएगा।

AIIMS में भेदभाव, प्रियंका गाँधी के घायलों को दिए शॉल कॉन्ग्रेस समर्थकों ने लिए वापस: JNU की जख्मी छात्रा का दावा

दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में रविवार को हुई हिंसा में घायल विश्विद्यालय की छात्रा कृतिका सेन ने इंडिया टुडे को बताया कि एम्स में डॉक्टरों ने विचारधारा के आधार पर घायल छात्रों के साथ भेदभाव किया।

आज तक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जेएनयू की छात्रा और एबीवीपी की सदस्य कृतिका सेन ने आरोप लगाया है कि जब घायल छात्रों को एम्स में भर्ती कराया जा रहा था, तो वहाँ के डॉक्टर प्रत्येक छात्र से पूछ रहे थे कि वे एबीवीपी से जुड़े हैं या फिर वामपंथी संगठन से। कृतिका ने मेडिकल स्टाफ द्वारा दुर्व्यवहार का भी आरोप लगाया है।

साथ ही कृतिका सेन ने यह भी कहा कि जेएनयू कैंपस में एबीवीपी के सदस्य वामपंथियों की तुलना में कम हैं, अल्पसंख्यक हैं। ऐसे में वो सुरक्षित नहीं हैं। उसने यह भी आरोप लगाया कि वह शाम 6 बजे एम्स में भर्ती हुई थी, जबकि जेएनयूएसयू अध्यक्ष आइशी घोष को 9 बजे भर्ती कराया गया था। लेकिन फिर भी घोष के समर्थकों का पहले इलाज किया गया था। उन्हें प्राथमिकता दी गई।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि एम्स में इलाज करवाने वाले एबीवीपी सदस्यों ने यह भी आरोप लगाया है कि जब कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी वाड्रा घायल छात्रों से मिलने एम्स गईं थी, तो उनके समर्थकों ने सबसे पहले घायल छात्रों से यही पूछा कि उनका संबंध किस विचारधारा से है। एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने कहा कि प्रियंका गाँधी ने कुछ छात्रों को शॉल दी, लेकिन बाद में उनके कार्यकर्ताओं ने शॉल वापस ले ली।

कृतिका सेन ने कहा कि प्रियंका गाँधी एक नेता हैं। ऐसे में अगर वो शाम को हमला करने वाले लोगों पर सवाल कर रही हैं, तो फिर दिन में हमला करने वालों पर सवाल क्यों नहीं कर रही हैं? दिन में हमला करने वाले लोग कौन थे?

गौरतलब है कि जेएनयू में रविवार को बड़े पैमाने पर हिंसा और अराजकता देखी गई थी जब नकाबपोश हमलावरों ने हॉस्टल में प्रवेश किया था और छात्रों को लाठी और डंडों से पीटा था। इसके बाद स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कई सौ पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया। इस हिंसा के दौरान 30 से अधिक घायल हुए थे। बहरहाल इस हिंसा को लेकर लेफ्ट और एबीवीपी दोनों एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं।

हालाँकि, बहुत सारी ऐसी खबरें चली थीं, जिसमें कहा गया था कि वामपंथियों ने छात्र समूहों पर हमला करने के लिए जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों को बुलाया था। जेएनयू प्रशासन ने एक लिखित बयान में कहा है कि आंदोलनकारी छात्र समूहों ने रजिस्ट्रेशन प्रोसेस को रोकने के लिए कम्युनिकेशन रूम में सर्वर को क्षतिग्रस्त कर दिया था और गैर-आंदोलनकारी छात्रों को शैक्षणिक गतिविधियों के लिए अपने संबंधित संस्थानों में जाने से बलपूर्वक रोक दिया था।