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मिशन समुद्र मंथन से अंडमान में मिला गैस का महाभंडार, मोदी सरकार ने पूर्वी तट पर बनाया ₹1.5 लाख करोड़ का मेगा प्लान: समझें कैसे ऊर्जा में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ा भारत

वैश्विक ऊर्जा संकट और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा संप्रभुता को मजबूत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। केंद्र सरकार के ‘मिशन समुद्र मंथन’ (राष्ट्रीय गहरे जल अन्वेषण मिशन) के तहत ऑयल इंडिया लिमिटेड (OIL) ने अंडमान सागर में ‘श्री विजयपुरम-3’ खोजी कुएँ में प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार की खोज की है। यह कुआँ तट से 15 किलोमीटर दूर और 355 मीटर गहरे पानी में स्थित है, जहाँ 1,900 मीटर से अधिक की गहराई पर इओसीन फॉर्मेशन में लगातार गैस फ्लेयरिंग देखी गई है।

वैसे वर्तमान समय में पूरी दुनिया एक अभूतपूर्व ऊर्जा संकट और भू-राजनीतिक तनावों के दौर से गुजर रही है। पश्चिम एशिया में जारी अशांति, लाल सागर का संकट और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे संवेदनशील समुद्री व्यापारिक मार्गों पर मंडराते खतरों ने दुनिया भर के देशों को अपनी ऊर्जा सुरक्षा की समीक्षा करने पर मजबूर कर दिया है। भारत भी इस वैश्विक संकट से अछूता नहीं है, क्योंकि देश को अपनी तेल की जरूरतों का एक बहुत बड़ा यानी 85% हिस्सा विदेशों से आयात करना पड़ता है। हर साल अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ पेट्रोल, डीजल और एलपीजी खरीदने में खर्च हो जाता है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर अंतरराष्ट्रीय बाजार की हर छोटी-बड़ी हलचल का सीधा असर पड़ता है।

इसी वैश्विक संकट के बीच भारत के पूर्वी समुद्र तट और पश्चिमी रेगिस्तान से ऐसी सुखद और ऐतिहासिक खबरें आई हैं, जो आने वाले समय में देश की पूरी ऊर्जा कहानी को बदलकर रख देंगी। केंद्र सरकार द्वारा शुरू किए गए ‘मिशन समुद्र मंथन‘ यानी ‘राष्ट्रीय गहरे जल अन्वेषण मिशन’ के तहत भारत ने गहरे और अति-गहरे समुद्र में छिपे हाइड्रोकार्बन के विशाल भंडार को खंगालना शुरू कर दिया है।

अंडमान सागर में एक के बाद एक मिली सफलताओं और देश के पूर्वी तट पर शुरू हुए डेढ़ लाख करोड़ रुपए के मेगा प्लान ने भारत के ऊर्जा स्वतंत्रता मिशन को एक नई और अचूक दिशा दे दी है। इस महा-मिशन का उद्देश्य देश के भीतर ही इतने ऊर्जा स्रोत विकसित करना है कि भविष्य में किसी भी वैश्विक संकट का असर देश के आम नागरिकों की जेब पर न पड़े।

अंडमान सागर से आई दूसरी बड़ी खुशखबरी

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का क्षेत्र सामरिक दृष्टि से जितना महत्वपूर्ण है, भूगर्भीय रूप से यह ऊर्जा का उतना ही बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि अंडमान सागर में एक और नए स्थान पर प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार का पता चला है।

यह ऐतिहासिक खोज सरकारी तेल कंपनी ऑयल इंडिया लिमिटेड द्वारा अंडमान द्वीप समूह के पूर्वी तट से लगभग 15 किलोमीटर दूर स्थित श्री विजयपुरम-3 नामक एक एक्सप्लोरेटरी यानी खोजी कुएँ में की गई है। यह कुआँ लगभग 355 मीटर गहरे समुद्री क्षेत्र में खोदा गया था, जो अपनी भौगोलिक बनावट के कारण बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है।

इस खोज की तकनीकी गहराइयों को समझें तो समुद्र के तल से नीचे करीब 1900 से अधिक की गहराई तक जाकर इस कुएँ की टेस्टिंग की गई है। यह खोज इओसीन फॉर्मेशन नाम की भूगर्भीय परत में हुई है, जो अपनी विशेष चट्टानी संरचना के लिए जानी जाती है।

परीक्षणों के दौरान इस कुएँ से लगातार गैस फ्लेयरिंग देखी गई, जो बेहद उच्च दबाव और बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस की निरंतर उपस्थिति को प्रमाणित करती है। पेट्रोलियम मंत्री ने देश को बधाई देते हुए साफ किया कि यह भारत के समुद्री तेल और गैस अन्वेषण कार्यक्रम के लिए एक मील का पत्थर है और इससे आने वाले दिनों में देश की गैस उत्पादन क्षमता में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिलेंगे।

अंडमान बेसिन की असली भूगर्भीय क्षमता से अभी दुनिया अनजान

यह खोज इसलिए भी बेहद खास है क्योंकि ऑयल इंडिया लिमिटेड ने मौजूदा अन्वेषण अभियान के तहत अंडमान बेसिन में कुल तीन खोजी कुएं खोदे थे, जिनमें से दो में हाइड्रोकार्बन यानी तेल और गैस की सफल मौजूदगी दर्ज की जा चुकी है। इससे पहले, वर्ष 2025 में इसी क्षेत्र के पास श्री विजयपुरम-2 कुएँ में भी प्राकृतिक गैस मिलने की पुष्टि हुई थी।

उस समय निकाली गई गैस के नमूनों की जाँच में पाया गया था कि उसमें लगभग सतासी प्रतिशत शुद्ध मीथेन गैस मौजूद है, जो व्यावसायिक उपयोग के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। पहली सफलता के तत्काल बाद सरकार ने बिना समय गँवाए इस क्षेत्र में अन्वेषण गतिविधियों को और तेज कर दिया, जिसका परिणाम अब श्री विजयपुरम-3 के रूप में सबके सामने है।

भूवैज्ञानिकों और ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अंडमान बेसिन की अंडरवाटर संरचना म्यांमार और इंडोनेशिया के उन समुद्री क्षेत्रों से बिल्कुल मिलती-जुलती है, जहाँ पिछले कई दशकों से बड़े पैमाने पर प्राकृतिक गैस और तेल का व्यावसायिक उत्पादन किया जा रही है। अब तक तकनीक की कमी और अत्यधिक गहराई के कारण अंडमान का यह क्षेत्र पूरी तरह अनछुआ रहा था, लेकिन अब यह साबित हो चुका है कि भारत के इस समुद्री क्षेत्र के नीचे गैस का एक विशाल खजाना दबा हुआ है।

फिलहाल ऑयल इंडिया लिमिटेड इस गैस भंडार का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन कर रही है ताकि इसके नमूनों को एकत्र कर इसकी गुणवत्ता, संरचना और ऊर्जा क्षमता का सटीक परीक्षण किया जा सके। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर सब कुछ योजना के अनुसार रहा, तो साल 2030 तक इस क्षेत्र से व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया जा सकता है।

पूर्वी तट पर भारत का सबसे बड़ा ऊर्जा अभियान

अंडमान की इस बड़ी सफलता ने भारत सरकार के हौसलों को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया है और यही कारण है कि देश की सबसे बड़ी तेल और गैस उत्पादक कंपनी ओएनजीसी यानी ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन ने भारतीय समुद्रों में गहरे पानी से तेल निकालने के लिए अपने इतिहास के सबसे बड़े प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी है।

ओएनजीसी ने गहरे और अति-गहरे पानी में तेल और गैस की खोज और ड्रिलिंग के लिए अठारह से बीस अरब डॉलर यानी लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपए से अधिक के भारी-भरकम निवेश की योजना तैयार की है। इसके लिए वैश्विक स्तर पर टेंडर जारी कर दिए गए हैं और मार्च के महीने में मुंबई में हुई प्री-बिड मीटिंग में दुनिया भर की एक दर्जन दिग्गज ड्रिलिंग कंपनियों ने हिस्सा लिया है।

इस मेगा प्रोजेक्ट के तहत दुनिया की सबसे अत्याधुनिक ड्रिलशिप और सेमी-सबमर्सिबल रिग्स को भारतीय समुद्रों में तैनात किया जा रहा है। भारत इस महा-मिशन में किसी भी तरह की तकनीकी कसर नहीं छोड़ना चाहता, इसलिए ओएनजीसी ने गहरे समुद्र की ड्रिलिंग में महारत रखने वाली दुनिया की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों जैसे ब्राजील की पेट्रोब्रास, फ्रांस की टोटल एनर्जी और अमेरिका की एक्सोनमोबिल के साथ रणनीतिक और तकनीकी सहयोग किया है।

यह प्रोजेक्ट केवल तेल खोजने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बहुत बड़ी आर्थिक और रणनीतिक सोच काम कर रही है, जो भारत को वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक मजबूत खिलाड़ी के रूप में स्थापित करेगी।

एडवांस्ड सिस्मिक इमेजिंग तकनीक का इस्तेमाल

इस बार भारत सरकार और उसकी तेल कंपनियाँ केवल पुराने और पारंपरिक तरीकों पर निर्भर नहीं हैं। मिशन समुद्र मंथन के तहत पूर्वी तट पर भारत का अब तक का सबसे आधुनिक और हाई-टेक सिस्मिक सर्वे शुरू किया जा रहा है, जिसके लिए वैश्विक जियोफिजिकल कंपनियों से निविदाएँ माँगी गई हैं। यह मिशन करीब छतीस महीने तक चलेगा, जिसके तहत समुद्र के नीचे की चट्टानों और उनकी जटिल संरचनाओं का एक हाई-टेक डिजिटल नक्शा तैयार किया जाएगा। इस तकनीक के माध्यम से उन क्षेत्रों की भी पहचान की जा सके की जिन्हें पहले तकनीकी सीमाओं के कारण पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया था।

इस हाई-टेक सर्वे में ब्रॉडबैंड थ्री-डी सिस्मिक इमेजिंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसमें विशेष सर्वेक्षण जहाज समुद्र के पानी में कई किलोमीटर लंबी केबल छोड़ते हैं। ये उपकरण समुद्र के नीचे शक्तिशाली ध्वनि तरंगें भेजते हैं, जो समुद्र की तलहटी और उसके नीचे स्थित विभिन्न चट्टानों से टकराकर वापस लौटती हैं।

जहाजों पर लगे अत्यधिक संवेदनशील सेंसर इन तरंगों की गूँज को रिकॉर्ड कर लेते हैं, जिसके बाद वैज्ञानिक इस विशाल डेटा को सुपरकंप्यूटरों के जरिए प्रोसेस करके समुद्र के नीचे कई किलोमीटर गहराई तक की एक स्पष्ट त्रिविमीय तस्वीर तैयार करते हैं। इससे यह साफ पता चल जाता है कि किस जगह की चट्टानी संरचना के बीच तेल या गैस फंसी हुई है और यही तकनीक दुनिया के सबसे बड़े ऑफशोर तेल क्षेत्रों की खोज में इस्तेमाल की जाती है।

नदी बेसिनों में छिपी ऊर्जा की असीम संभावनाएँ

इस आधुनिक तकनीक के निशाने पर मुख्य रूप से देश के चार सबसे बड़े नदी बेसिन हैं, जिनमें सबसे बड़ा दाँव कृष्णा-गोदावरी यानी केजी बेसिन पर माना जा रहा है। यह क्षेत्र पहले से ही भारत का प्रमुख गैस उत्पादन केंद्र है, लेकिन सरकार का मानना है कि नई तकनीक के जरिए इस बेसिन के और अधिक गहरे हिस्सों में छिपे जटिल पेट्रोलियम सिस्टम और गैस हाइड्रेट्स का पता लगाया जा सकता है।

इसी तरह ओडिशा के तट के पास स्थित महानदी बेसिन को भारत के सबसे संभावित और समृद्ध डीप-वॉटर क्षेत्रों में से एक माना जाता है, जहाँ वैज्ञानिकों को करीब आठ किलोमीटर से अधिक की गहराई तक तेल और गैस होने के प्रबल संकेत मिले हैं।

इसके अलावा बंगाल-पुर्णिया बेसिन को भूवैज्ञानिक एक बड़ा अवसर मान रहे हैं, क्योंकि यहाँ समुद्र के नीचे लगभग दस किलोमीटर तक मोटी अवसादी परतें मौजूद हैं। शुरुआती अध्ययनों से संकेत मिले हैं कि यहाँ मियोसीन युग के प्राचीन और विशाल हाइड्रोकार्बन भंडार छिपे हो सकते हैं, जो सफल होने पर पूरे पूर्वी भारत की ऊर्जा तस्वीर को बदल देंगे।

तमिलनाडु से लेकर बंगाल की खाड़ी तक फैला कावेरी बेसिन भी इस योजना का एक अहम हिस्सा है, जिसके ऑफशोर कार्बोनेट सिस्टम और जुरासिक सिं-रिफ्ट प्ले की जाँच की जाएगी। यहाँ आठ किलोमीटर की गहराई में और बड़े तेल भंडारों की उम्मीद जताई जा रही है, जिसके लिए भविष्य में बड़े स्तर पर ड्रिलिंग की जाएगी।

मल्टी-क्लाइंट मॉडल से बदलेगा पूरा खेल

इस विशाल और खर्चीले मिशन को तेजी से पूरा करने और सरकारी खजाने पर आर्थिक बोझ कम करने के लिए सरकार ने एक बेहद चालाकी भरी रणनीति अपनाई है, जिसे मल्टी-क्लाइंट मॉडल कहा जाता है। पारंपरिक तरीकों में सिस्मिक डेटा जुटाने का पूरा खर्च और उसका जोखिम सरकार या सरकारी तेल कंपनियों को उठाना पड़ता था, जिससे बजट की कमी के कारण काम काफी धीमा हो जाता था। लेकिन इस नए मॉडल के तहत अंतरराष्ट्रीय जियोफिजिकल कंपनियाँ अपने खर्च और अपने जोखिम पर समुद्र के नीचे का डेटा जुटाएंगी।

इसके बाद ये कंपनियाँ इस प्रामाणिक डेटा को दुनिया भर की विभिन्न ऊर्जा और तेल उत्पादक कंपनियों को बेच सकेंगी, जिससे उनका मुनाफा भी सुरक्षित रहेगा और सरकार पर शुरुआती वित्तीय बोझ भी नहीं पड़ेगा।

इस मॉडल का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि इसमें निजी क्षेत्र की भागीदारी और निवेश रातों-रात बढ़ जाएगा, जिससे भारत के समुद्रों में तेल की खोज का काम कई गुना तेजी से आगे बढ़ सकेगा। जब दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियाँ इस डेटा को खरीदेंगी, तो वे भारत में निवेश करने के लिए खुद-ब-खुद आकर्षित होंगी, जिससे देश में विदेशी निवेश भी बढ़ेगा।

पश्चिमी सीमा पर भी मिली बड़ी कामयाबी

एक तरफ जहाँ देश के पूर्वी समुद्री हिस्से में मिशन समुद्र मंथन इतिहास रच रहा है, वहीं दूसरी तरफ देश के पश्चिमी छोर से भी भारत के लिए एक और बड़ी खुशखबरी आई है। राजस्थान के जैसलमेर बेसिन में सरकारी तेल कंपनी ऑयल इंडिया लिमिटेड को एक और बड़ी कामयाबी हाथ लगी है, जिसने मरुभूमि में ऊर्जा की एक नई किरण जगाई है।

कंपनी ने जैसलमेर के प्रसिद्ध डांडेवाला फील्ड में एक नया गैस कुआँ खोजा है, जिसकी सबसे खास बात यह है कि यहाँ पहली बार बेहद कम गहराई पर स्थित सानू फॉर्मेशन से प्राकृतिक गैस निकलनी शुरू हुई है।

यह कुआँ केवल 950 मीटर की गहराई तक ही ड्रिल किया गया था और शुरुआती परीक्षणों में ही यहाँ से लगभग 25000 स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर प्रतिदिन गैस का प्रवाह दर्ज किया गया है। तकनीकी विश्लेषण और भूगर्भीय जाँच के आधार पर वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस विशिष्ट क्षेत्र में करीब 75 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस का कुल संसाधन मौजूद हो सकता है।

डांडेवाला फील्ड हालाँकि पहले से ही पारंपरिक गैस उत्पादन के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन सानू फॉर्मेशन में गैस का मिलना एक बड़ी रणनीतिक जीत है, जिसने इस पूरे रेगिस्तानी इलाके में भविष्य के लिए ड्रिलिंग की नई संभावनाएँ खोल दी हैं।

भारत की ऊर्जा जरूरतें और आयात का भारी बोझ

भारत की वर्तमान ऊर्जा स्थिति और उसकी जरूरतों को समझे बिना इस पूरे मिशन के महत्व को नहीं जाना जा सकता। भारत आज की तारीख में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता देश बन चुका है, जहां तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और शहरीकरण के कारण ईंधन की माँग आसमान छू रही है।

आँकड़ों के अनुसार, भारत में इस समय प्राकृतिक गैस की दैनिक खपत लगभग एक सौ सतासी मिलियन मीट्रिक स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर प्रति दिन तक पहुँच चुकी है। उद्योगों के संचालन, बड़े कारखानों, सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों के लिए सीएनजी और घरों की रसोई के लिए पीएनजी की माँग हर गुजरते दिन के साथ बढ़ रही है।

इस भारी माँग को पूरा करने के लिए भारत को अपनी कुल जरूरत का लगभग 50% हिस्सा विदेशों से लिक्विफाइड नेचुरल गैस यानी एलएनजी के रूप में आयात करना पड़ता है। कच्चे तेल के मामले में आत्मनिर्भरता की स्थिति और भी ज्यादा चिंताजनक है, क्योंकि भारत को अपनी दैनिक जरूरतों का लगभग पचासी प्रतिशत हिस्सा विदेशों से ही खरीदना पड़ता है।

देश में कच्चे तेल का आयात बिल हर साल लाखों करोड़ रुपए तक पहुँच जाता है, जिससे देश का एक बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ ईंधन खरीदने में ही स्वाहा हो जाता है। ऐसे माहौल में देश के भीतर ही नए गैस और तेल के भंडार मिलना सरकार के लिए बहुत बड़ी राहत की खबर है, जो देश को आर्थिक रूप से और मजबूत बनाएगी।

कच्चे तेल का दैनिक गणित और भारत का उत्पादन

भारत की तेल की दैनिक खपत और उसके घरेलू उत्पादन के बीच का गणित बेहद दिलचस्प है और यह दिखाता है कि देश को आत्मनिर्भर बनने के लिए कितने बड़े स्तर पर काम करने की जरूरत है।

भारत में रोजाना लगभग 55 लाख बैरल कच्चे तेल की खपत होती है, जो देश की विशाल आबादी और उसके परिवहन तंत्र की रीढ़ है। इस 55 लाख बैरल में से भारत अपने तमाम घरेलू स्रोतों जैसे मुंबई हाई, असम के तेल क्षेत्रों और कृष्णा-गोदावरी बेसिन को मिलाकर रोजाना लगभग 9 से 10 लाख बैरल कच्चे तेल का खुद उत्पादन कर पाता है।

यह घरेलू उत्पादन देश की कुल जरूरत के मुकाबले काफी कम है, जिसके कारण भारत को रोजाना लगभग 45 लाख बैरल कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार से खरीदना पड़ता है। यही वजह है कि जब भी खाड़ी देशों में या वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक डॉलर का भी उछाल आता है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर उसका अरबों रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ता है।

सरकार का पूरा ध्यान अब इसी अंतर को पाटने पर है ताकि घरेलू उत्पादन को 9 लाख बैरल से बढ़ाकर उस स्तर पर ले जाया जा सके जहाँ विदेशों पर निर्भरता न्यूनतम हो जाए।

भारत Vs पाकिस्तान: तेल और गैस उत्पादन का सच

जब भी भारत की सीमाओं के पास कोई भूगर्भीय खोज होती है, तो दोनों देशों की तुलना और उनके दावों की हकीकत जानना बेहद जरूरी हो जाता है। हाल ही में पाकिस्तान की सरकारी तेल कंपनी ओजीडीसीएल यानी ऑयल एंड गैस डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड ने भारत की सीमा से सटे अपने सिंध प्रांत के सांघड़ जिले में बॉबी डीप-1 नामक कुएँ में तेल और गैस मिलने की बड़ी घोषणा की है।

इस खबर के आते ही पाकिस्तान में जश्न का माहौल बन गया और वहाँ के लोगों को लगा कि उनकी किस्मत बदलने वाली है, लेकिन जब हम आँकड़ों की कसौटी पर दोनों देशों की तुलना करते हैं, तो पाकिस्तान की यह खोज भारत के सामने बहुत छोटी और नीचे दिखाई देती है।

भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो पाकिस्तान का सिंध प्रांत और भारत का राजस्थान राज्य आपस में जुड़े हुए हैं और दोनों तरफ थार का एक ही रेगिस्तान फैला हुआ है, जिसके कारण रेत के नीचे की चट्टानें पुरानी और तेल-गैस को जमा करने वाली हैं।

पाकिस्तान ने दावा किया है कि उसके सांघड़ जिले के इस नए कुएँ से शुरुआती टेस्टिंग के दौरान रोजाना 2000 बैरल कच्चा तेल और 11 लाख क्यूबिक फीट गैस निकल रही है। पाकिस्तान जैसी खस्ताहाल अर्थव्यवस्था के लिए यह एक राहत की खबर जरूर हो सकती है, लेकिन जब हम भारत के राजस्थान में पहले से चल रहे काम को देखते हैं, तो पाकिस्तान का यह दावा पूरी तरह फीका पड़ जाता है।

थार के रेगिस्तान में भारत की बादशाहत

भारत को राजस्थान के रेगिस्तान में बहुत पहले ही तेल का विशाल भंडार मिल चुका है और हमारी कंपनियाँ पिछले कई सालों से वहाँ से सफलतापूर्वक रिकॉर्ड उत्पादन कर रही हैं। राजस्थान के बाड़मेर में स्थित प्रसिद्ध मंगला ऑयलफील्ड से भारत अकेले रोजाना लगभग 80000 बैरल कच्चे तेल का उत्पादन कर रहा है। इसके अलावा बाड़मेर और जैसलमेर के अन्य छोटे-बड़े तेल कुओं को मिला दिया जाए तो भारत केवल राजस्थान के इस अकेले इलाके से ही रोजाना करीब 2 लाख बैरल कच्चे तेल का उत्पादन सफलतापूर्वक कर रहा है।

इसका सीधा सा मतलब यह हुआ कि पाकिस्तान को अपने जिस सिंध प्रांत के सांघड़ जिले में तेल मिलने पर इतना नाज है, भारत उससे 100 गुना ज्यादा तेल राजस्थान के रेगिस्तान से पहले ही रोजाना निकाल रहा है। पाकिस्तान को सांघड़ से सिर्फ दो हजार बैरल तेल मिलने की उम्मीद है, जबकि भारत वहाँ 2 लाख बैरल रोज निकाल रहा है।

आगे चलकर पाकिस्तान वहाँ और कुएँ खोदे तो बात अलग है, लेकिन फिलहाल जो घोषणा की गई है, उसकी असलियत भारत के मुकाबले कुछ भी नहीं है। भारत की कंपनियाँ पहले से ही इस पूरे बॉर्डर इलाके में अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं और लगातार नए कुओं की ड्रिलिंग कर रही हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर दोनों देशों की क्षमता का विशाल अंतर

अगर हम राष्ट्रीय स्तर पर दोनों देशों की कुल तेल खपत और उनके घरेलू उत्पादन की तुलना करें, तो यह अंतर और भी ज्यादा हैरान करने वाला है। पाकिस्तान को अपनी पूरी राष्ट्रीय व्यवस्था चलाने और अपनी जनता की जरूरतों को पूरा करने के लिए रोजाना लगभग 5 लाख बैरल कच्चे तेल की आवश्यकता होती है। इसके मुकाबले जैसा कि हम जानते हैं, भारत अपने घरेलू कुओं से रोजाना लगभग 9 से 10 लाख बैरल कच्चे तेल का उत्पादन खुद कर लेता है।

इसका अर्थ यह हुआ कि भारत रोजाना जितना कच्चा तेल अपने देश की जमीन और समुद्र से निकालता है, वह मात्रा पाकिस्तान की कुल राष्ट्रीय जरूरत से लगभग दोगुनी है। पाकिस्तान को कुल पाँच लाख बैरल चाहिए और भारत 10 लाख बैरल रोज खुद पैदा करता है, भले ही भारत की अपनी जरूरत 55 लाख बैरल की है।

इस लिहाज से देखा जाए तो पाकिस्तान की सांघड़ की यह खोज भारत के राजस्थान और अंडमान के हाइड्रोकार्बन साम्राज्य के सामने कहीं नहीं ठहरती और बेहद नीचे नजर आती है। असली कहानी और ऊर्जा सुरक्षा की वास्तविक बाजी पूरी तरह से भारत के हाथ में है, जो समुद्र और जमीन दोनों मोर्चों पर पाकिस्तान से कई गुना आगे चल रहा है।

ऊर्जा स्वतंत्रता और आर्थिक संप्रभुता का भविष्य

मिशन समुद्र मंथन के तहत देश के भीतर मिल रहे तेल और गैस के ये नए भंडार आने वाले समय में भारत की पूरी आर्थिक और रणनीतिक स्थिति को बदलने की ताकत रखते हैं। जब देश के भीतर ही कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का उत्पादन बड़े पैमाने पर शुरू हो जाएगा, तो आयात बिल में होने वाली भारी कटौती से देश का अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा कोष सुरक्षित रहेगा।

इस बचे हुए पैसे का उपयोग देश के आंतरिक विकास, आधुनिक बुनियादी ढाँचे के निर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और तकनीकी अनुसंधान पर किया जा सकेगा, जो अंततः देश के नागरिकों के जीवन स्तर को सुधारेगा।

इसके साथ ही भारत वैश्विक तेल बाजार के उतार-चढ़ाव और मिडिल ईस्ट के तनावों से भी काफी हद तक सुरक्षित हो जाएगा, जिससे देश में ईंधन की कीमतों में स्थिरता आएगी।

प्रधानमंत्री द्वारा शुरू किया गया यह मिशन अब धरातल और समंदर की गहराइयों में पूरी तरह से रंग लाने लगा है, जो भारत को आने वाले दशकों के लिए न केवल आत्मनिर्भर बनाएगा बल्कि उसकी आर्थिक संप्रभुता को भी अक्षुण्ण रखेगा। वैश्विक मंच पर भारत का यह ऊर्जा सुरक्षा मॉडल और आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ते कदम आज दुनिया के तमाम विकासशील देशों के लिए एक महान प्रेरणा बन चुके हैं।

कॉकरोच जनता पार्टी: ‘क्रांति’ की रील और लोकतंत्र की रियलिटी

भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में तीन चूरन सबसे अधिक चटाया जाता है;

  • वामपंथ
  • समाजवाद
  • क्रांति

हम भारतीयों का सौभाग्य देखिए कि तीनों ही चूरन असफल रहे हैं। कभी भी हमारी व्यवस्था का स्थायी आधार नहीं बन पाए। इसका सबसे बड़ा कारण भारत की वह जनता है, जिसके पास मत देने का अधिकार है। बौद्धिक बहसों में इसी जनता के बुद्धि और विवेक पर ‘विद्वतजन’ संदेह करते हैं, क्योंकि वह चूरन का हैवी डोज लेती ही नहीं।

राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी के उभार और बीजेपी के राजनीतिक विस्तार के बाद तो अलग-अलग मुखौटों में इस चूरन का डेली डोज बाँटा जा रहा है। नया मुखौटा है- कॉकरोच जनता पार्टी (CJP- Cockroach Janata Party)।

आंदोलनजीवी ऐसे हर चूरन के सफल होने के दो आधार अतीत से लाते हैं। पहला, जेपी की संपूर्ण क्रांति और दूसरा अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन। अव्वल तो जेपी ने जब आंदोलन किया था, तब लोकतंत्र पर ही सीधा हमला हुआ था। वोट देने वाली जनता के अधिकारों को ही कुचल दिया गया था। इसी तरह अन्ना हजारे का आंदोलन जब हुआ, तब कॉन्ग्रेस के नेतृत्व में चल रही केंद्र सरकार का इकबाल वोट देने वाली जनता की नजरों में पूरी तरह समाप्त हो चुका था। यही कारण है कि इन दोनों आंदोलनों को भले तात्कालिक समर्थन मिला और सत्ता परिवर्तन भी हुआ, पर वह हमारी व्यवस्था का स्थायी आधार नहीं बन सकी।

उलटे इसके राजनीतिक परिणामों ने वोट देने वाली जनता को पहले की तुलना में अधिक सावधान बना दिया है। अब वह केवल यह सुनकर उत्साहित नहीं हो रहा है कि कोई नया समूह पुरानी राजनीति को समाप्त करने का दावा कर रहा है। वह पूछ रहा है कि सत्ता परिवर्तन के बाद क्या होगा?

यह सत्य है कि कॉकरोच जनता पार्टी ने 6 जून 2026 को जंतर-मंतर पर शिक्षा से जुड़े जिन मुद्दों को लेकर कथित प्रदर्शन किया है, उसको लेकर लोगों की नाराजगी बीजेपी की सरकार से है। कुछ स्थानीय प्रशासनिक समस्याओं और कई सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों को लेकर भी असंतोष है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह स्वभाविक है। विशेषकर तब जब कोई पार्टी 12 सालों से लगातार देश की सत्ता में बनी हुई हो। जब देश के 22 राज्यों की सत्ता उस पार्टी या उसके सहयोगियों के हाथों में हो।

पर मूल प्रश्न यह नहीं है कि नाराजगी है या नहीं? प्रश्न यह है कि क्या यह नाराजगी इतनी व्यापक और संगठित है कि वह सत्ता परिवर्तन का आधार बन सके? अभी ऐसा कोई संकेत स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता। यदि 2019 के आम चुनावों में बीजेपी की ताकत घटने को इसका संकेत मान लिया जाए तो इसका दूसरा पक्ष यह है कि उसके बाद हुए राज्यों के चुनावों में बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए ने चौंकाया है। जिस महाराष्ट्र और ​हरियाणा में उसकी पराजय तय बताई जा रही थी, वहाँ धमक के साथ वह सत्ता में लौटी। जिस बिहार में नीतीश कुमार की सरकार को बीमार-लाचार बताया जा रहा था, वहाँ ​राजद किसी तरह विपक्ष की हैसियत बचा पाई। जिस ममता बनर्जी के किले को अभेद्य बताया जा रहा था, उसे ताश के पत्तों की तरह बीजेपी ने ढाह दिया।

जाहिर है कि वोट देने वाली जनता में एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो चाय की गुमटी से लेकर सोशल मीडिया की गलियों तक आज सरकार की आलोचना करता दिख रहा है। पर वह विकल्प को लेकर आश्वस्त नहीं है। वह सरकार की किसी नीति को लेकर मुखर असहमति दर्ज करा रहा है, पर इसका अर्थ यह नहीं है कि वह पूरी व्यवस्था बदल देना चाहता है।

ध्यान रखिएगा भारतीय लोकतंत्र में कोई सरकार केवल इसलिए नहीं हारती कि लोग नाराज हैं। वे तब हारती हैं जब कोई अधिक विश्वसनीय विकल्प दिखाई देता है। विरोध पर्याप्त नहीं होता। विश्वसनीय विकल्प भी चाहिए होता है। यदि नाराजगी से ही सरकारें जाती तो बिहार में लालू यादव का जंगलराज डेढ़ दशक का नहीं होता। पश्चिम बंगाल में वामपंथी आतंक साढ़े तीन दशक और फिर टीएमसी का आतंक समाप्त होते डेढ़ दशक नहीं लगते। कॉन्ग्रेस के एकछत्र शासन को समाप्त करने के लिए कभी जेपी, कभी वीपी, कभी अटल बिहारी तो कभी नरेंद्र मोदी का चेहरा नहीं लगता।

जब केवल व्यवस्था विरोध ही आधार हो तो उस प्रयोग की एकमात्र राजनीतिक पूँजी असंतोष होता है। विश्वास नहीं। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था का अनुभव बताता है कि बिना विश्वास के असंतोष और सत्ता परिवर्तन के बीच बहुत लंबी दूरी होती है।

हमारी राजनीतिक व्यवस्था में केवल विरोध पर कोई दल नहीं टिकता। उन्हें समाज के सामने एक व्यापक आख्यान प्रस्तुत करना पड़ता है। उसे विश्वसनीय तरीके से जमीन पर उतारना पड़ता है। कॉन्ग्रेस ने ऐसा ही आख्यान अपने प्रोपेगेंडा तंत्र के बल पर देश को आजादी दिलाने की बुनी। इसके बल पर ही लंबे समय तक राजनीति में उसका आधिपत्य रहा।

आज जो राजनीति में बीजेपी का वर्चस्व दिख रहा है, वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और विकास के विश्वसनीय आख्यान के इर्द-गिर्द खड़ी है। इसी तरह राज्यों में समाजवादियों ने जो छिटपुट सफलता हासिल की वह ‘सामाजिक न्याय’ के आख्यान में लपेटकर परोसी गई, तभी संभव हो पाया।

इन आख्यानों से किसी की सहमति या असहमति हो सकती है। लेकिन ये आख्यान केवल विरोध पर आधारित नहीं थे। इनके पास विश्वास की जमीनी पूँजी भी थी और एक बड़ा जन समूह उससे जुड़ भी रहा था।

2014 के बाद अलग-अलग मुखौटों में तात्कालिक असंतोष को भुनाने के जो भी प्रयास हुए हैं, वे जनता के सामने न तो व्यापक आख्यान प्रस्तुत कर पाएँ हैं और न ही बेहतर व्यवस्था चलाने की क्षमता का विश्वास पैदा कर पाए हैं। यहीं कारण है कि कुछ राज्यों में विपक्ष को कभी-कभार सफलता मिल जाती है, 2019 के आम चुनाव जैसे कुछ झटके बीजेपी को भी लगते हैं, पर दूर-दूर तक उसकी राजनीतिक व्यवस्था का विकल्प बन जाने की कोई गंभीर संभावना नहीं दिखाई देती है।

संगठन, विचार, नेतृत्व और विश्वसनीयता की कसौटी पर बीजेपी का मूल्य जनता की दृष्टि में आज भी उसके विरोधियों से कहीं अधिक है। लोकतंत्र में राजनीतिक विकल्प बनने के यही चार स्तम्भ हैं।

कॉकरोच जनता पार्टी जैसे प्रयोग तो इस अर्थ में और भी हास्यास्पद हैं कि उसका आधार उस सोशल मीडिया पर टिका है, जो भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक जमीन है ही नहीं। सोशल मीडिया में भले ट्रेंड बने, पर व्यवस्था जमीन पर ही खड़ी होती है। सोशल मीडिया में भले रील से क्रांति की मुनादी हो, पर सफल होने के लिए उसे भी जमीन ही चाहिए।

पोस्ट-रील-फॉलोवर से सोशल मीडिया में कंटेंट की बाढ़ लाना अलग बात है। ‘सनस्क्रीन’ लगाकर दिल्ली के उस जंतर-मंतर पर कथित प्रदर्शन कर लेना भी अलग बात है, जो मीडिया और यूट्यूबर्स के कैमरों से घिरी होती है। लेकिन जमीन पर जनता के असंतोष को झेलकर उसे अपने पक्ष में वोट के लिए प्रेरित कर लेना, 45 डिग्री के तापमान में सुदूर देहातों में कैमरे और ताली बजाने वाली भीड़ के बिना घर-घर जाकर अपनी पार्टी-नेता के किसी विचार के लिए समर्थन जुटाना बिल्कुल अलग बात है।

ये जो बाद वाली अलग बात है- वही भारतीय लोकतंत्र का अंतिम तत्व है, क्योंकि सत्ता परिवर्तन सोशल मीडिया की टाइमलाइन पर नहीं, मतदाता सूची में दर्ज नामों से निश्चित होता है।

आज कॉकरोच हैं, कल पेंगुइन होंगे, परसों कुछ और। भारत में क्रांति का चूरन बेचने वाले हमेशा मिलेंगे। खरीदार भी खूब दिखेंगे। पर वास्तविक धरातल पर क्रांति शायद ही कभी स्थायी तौर पर गोदाम से बाहर निकल पाए। क्योंकि व्यवस्था बदलने की शक्ति उस जनता के हाथ में है जो टीवी स्टूडियो, कंस्टीट्यूशन क्लब की कथित बौद्धिक बहसों और सोशल मीडिया स्पेस की बकलोली से बहुत दूर रहती है, लेकिन चुनाव के दिन मतदान केंद्र तक अवश्य पहुँचती है।

यह जनता असंतुष्ट होने पर भी केवल विरोध नहीं देखती, विकल्प भी देखती है। उसे केवल व्यवस्था की कमियाँ नहीं लुभाती, वह संभावित विकल्प की क्षमताओं को भी तौलती है। वह भले हैशटैग नहीं बनाती है, पर व्यवस्था वही बनाती है।

अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में लगे खालिस्तानी नारे, आतंकी भिंडरावाले को सेना ने इसी दिन 42 साल पहले किया था ढेर: जानें कट्टरपंथी क्यों इसी दिन करते हैं हंगामा

पंजाब की ऐतिहासिक और धार्मिक धरती अमृतसर से एक बार फिर तनाव और संवेदनशीलता की तस्वीरें सामने आई हैं। ऑपरेशन ब्लू स्टार की 42वीं बरसी के मौके पर शुक्रवार को अमृतसर के पवित्र स्वर्ण मंदिर (हरिमंदिर साहिब) परिसर में एक बार फिर ‘खालिस्तान जिंदाबाद’ के नारे गूँज उठे। श्री अकाल तख्त साहिब के नजदीक बड़ी संख्या में कट्टरपंथी और उनके समर्थक इकट्ठा हुए, जिन्होंने हाथों में प्रतिबंधित संगठन और जरनैल सिंह भिंडरावाले के पोस्टर लहराए।

हर साल 6 जून की यह तारीख भारतीय राजनीति, सिख समुदाय और देश की आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में बेहद संवेदनशील मानी जाती है। इसी दिन साल 1984 में भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर परिसर को भारी हथियारों से लैस आतंकियों के चंगुल से मुक्त कराया था। इस कार्रवाई के दौरान आतंकी जरनैल सिंह भिंडरावाले को सेना ने ढेर कर दिया था। यही वजह है कि हर साल इस दिन भिंडरावाले और ऑपरेशन में मारे गए लोगों की याद में विशेष अरदास की जाती है, जिसकी आड़ में कट्टरपंथी तत्व हंगामा और नारेबाजी करते हैं।

इस बेहद संवेदनशील और तनावपूर्ण मौके को देखते हुए पंजाब पुलिस, खुफिया एजेंसियाँ और अर्धसैनिक बल पूरी तरह से अलर्ट मोड पर रहे। स्वर्ण मंदिर के आसपास के पूरे इलाके की सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद की गई थी। हालाँकि परिसर के भीतर नारेबाजी और पोस्टरबाजी के कारण माहौल में भारी तनाव देखा गया, लेकिन प्रशासन और सुरक्षाबलों की मुस्तैदी के कारण स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में बनी रही।

इंदिरा गाँधी और कॉन्ग्रेस ने पंजाब में खड़ा किया था भिंडरावाले नाम का भस्मासुर

इतिहास के पन्नों को पलटें तो जरनैल सिंह भिंडरावाले एक ऐसा नाम है जिसने पूरे पंजाब को आतंकवाद की आग में झोंक दिया था। शुरुआत में भिंडरावाले को खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और कॉन्ग्रेस सरकार ने अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने और अकाली दल के प्रभाव को कम करने के लिए बढ़ावा दिया था। लेकिन बाद में वही भिंडरावाले भस्मासुर बन गया और उसने पंजाब में सिखों के लिए एक अलग देश ‘खालिस्तान’ की हिंसक मांग शुरू कर दी।

भिंडरावाले का प्रभाव 1978 के बाद तेजी से बढ़ा और उसने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव का समर्थन करते हुए उग्रवाद का रास्ता चुन लिया। उसके इशारे पर पंजाब में हिंदुओं और निरंकारियों की सरेआम हत्याएँ होने लगीं। जब कानून का शिकंजा कसने लगा, तो भिंडरावाले ने अपने सैकड़ों हथियारबंद आतंकियों के साथ सिखों के सबसे पवित्र स्थल स्वर्ण मंदिर परिसर पर अवैध कब्जा कर लिया और उसे एक अभेद्य किले तथा आतंकी मुख्यालय में तब्दील कर दिया।

आतंकियों से सिखों के पवित्र स्थान को मुक्त कराने के लिए सेना ने चलाया था ऑपरेशन ब्लू स्टार

जब पंजाब में कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई और आतंकवाद चरम पर पहुँच गया, तब इंदिरा गाँधी सरकार के आदेश पर भारतीय सेना को ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार‘ चलाना पड़ा। 1 जून से 8 जून 1984 के बीच चले इस भीषण सैन्य अभियान का मुख्य उद्देश्य स्वर्ण मंदिर परिसर को जरनैल सिंह भिंडरावाले और उसके घातक हथियारों से लैस समर्थकों से मुक्त कराना था। भारी गोलीबारी के बीच 6 जून 1984 को सेना ने भिंडरावाले को मार गिराया।

श्री अकाल तख्त साहिब को पहुँचा था नुकसान

इस सैन्य कार्रवाई के दौरान सिखों के सर्वोच्च धार्मिक स्थल ‘श्री अकाल तख्त साहिब’ को भारी नुकसान पहुँचा था, जिसे सिख समुदाय का एक बड़ा वर्ग आज भी अपनी धार्मिक भावनाओं पर गहरी चोट और बेअदबी के रूप में देखता है। यही कारण है कि 42 साल बीत जाने के बाद भी यह मुद्दा भावनात्मक और राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील बना हुआ है और इसके जख्म आज भी ताज़ा हैं। इस ऑपरेशन के बाद देश का माहौल बिगड़ गया था और इसके प्रतिशोध में ही इंदिरा गाँधी की उनके सिख अंगरक्षकों ने हत्या कर दी थी, जिसके बाद देश में सिख विरोधी दंगे भड़क उठे थे।

इस बरसी के मौके पर स्वर्ण मंदिर परिसर में मौजूद प्रदर्शनकारियों ने भारतीय राज्य के खिलाफ अपनी भड़ास निकाली। एक कट्टरपंथी संगठन के नेता ने वहाँ मौजूद भीड़ के सामने बयान देते हुए कहा, “1984 की सैन्य कार्रवाई ने पूरे सिख समुदाय को एक ऐसी गहरी पीड़ा दी है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। हमारे पवित्र अकाल तख्त पर हमला करके हमारी धार्मिक पहचान को कुचलने की कोशिश की गई थी। हम अपनी स्वायत्तता और हक की लड़ाई को हमेशा जिंदा रखेंगे और शहीदों की कुर्बानी बेकार नहीं जाने देंगे।”

ऑपरेशन ब्लू स्टार की बरसी के समय हर साल हंगामा करते हैं खालिस्तानी कट्टरपंथी

दूसरी तरफ देश की सुरक्षा एजेंसियाँ और भारत सरकार इसे देश की अखंडता, एकता और संप्रभुता से जुड़ा मामला मानती हैं। उनके लिए भिंडरावाले एक खूँखार आतंकी था जिसने देश को बाँटने की साजिश रची थी, जबकि अलगाववादी और कट्टरपंथी संगठनों के लिए वह आज भी एक बड़ा प्रतीक बना हुआ है। यही विरोधाभास हर साल 6 जून को स्वर्ण मंदिर परिसर में टकराव और हंगामे की स्थिति पैदा करता है।

प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि लोकतांत्रिक देश में शांतिपूर्ण अरदास की अनुमति है, लेकिन देश विरोधी गतिविधियों और कानून हाथ में लेने वालों पर सख्त नजर रखी जा रही है। सोशल मीडिया पर भी इस बार नारेबाजी और पोस्टरों के कई वीडियो तेजी से वायरल हुए, जिस पर साइबर सेल लगातार नजर बनाए हुए है ताकि पंजाब का भाईचारे वाला माहौल दोबारा न बिगड़ सके।

₹15 लाख करोड़ के संदिग्ध रेवेन्यू से SEBI की कार्रवाई तक: जानिए कौन हैं राजेश मेहता और क्यों घिरी उनकी कंपनी Rajesh Exports

सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने 3 जून 2026 को बेंगलुरु स्थित जेम्स एंड ज्वेलरी कंपनी राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड (REL), उसके प्रमोटर, चेयरमैन और प्रबंध निदेशक राजेश मेहता के खिलाफ एकपक्षीय अंतरिम आदेश जारी किया।

इसके तहत कंपनी और मेहता को प्रतिभूति बाजार (Securities market) तक पहुँच से प्रतिबंधित कर दिया गया। इसका सीधा मतलब है कि अगले आदेश तक राजेश मेहता REL के शेयरों की खरीद-बिक्री या किसी भी प्रकार का लेनदेन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नहीं कर सकेंगे।

राजेश एक्सपोर्ट्स की 99% आय फर्जी: राजेश मेहता की गोल्ड एक्सपोर्ट कंपनी के खिलाफ SEBI ने क्यों शुरू की कार्रवाई?

SEBI ने राजेश मेहता और राजेश एक्सपोर्ट्स पर वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच लगभग 15.15 लाख करोड़ रुपए के राजस्व को गलत तरीके से दिखाने या बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप लगाया है। सरल शब्दों में कहें तो कंपनी और उसकी सहयोगी इकाइयों द्वारा इस अवधि में दिखाई गई आय का लगभग 99.8 प्रतिशत हिस्सा वास्तविक नहीं था।

SEBI के 109 पन्नों के आदेश में कहा गया है कि कंपनी का समेकित वित्तीय प्रदर्शन लगभग पूरी तरह उसकी विदेशी सहायक कंपनियों, विशेष रूप से वैलकैम्बी एसए (Valcambi SA), पर निर्भर बताया गया है। इसके बावजूद कंपनी ने लगातार इन कंपनियों के वित्तीय विवरण सार्वजनिक नहीं किए।

इतना ही नहीं बार-बार समन भेजे जाने के बावजूद कंपनी ने जाँच अधिकारियों को विक्रेताओं, ग्राहकों और अन्य आवश्यक वित्तीय जानकारियों का विवरण भी उपलब्ध नहीं कराया। SEBI के अनुसार, राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड ने अपनी सहायक (Subsidiaries) और स्टेप-डाउन सहायक कंपनियों के वित्तीय विवरण जाँच एजेंसी को उपलब्ध नहीं कराए।

इनमें वित्त वर्ष 2023-24 और 2024-25 के लिए REL Singapore, वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 तक के लिए Bab Al Rayan Jewellery LLC, वर्ष 2024 के लिए GGR तथा उसके 2020 से 2024 तक के स्टैंडअलोन वित्तीय विवरण, वर्ष 2020 से 2024 तक के लिए Valcambi USA Inc और वित्त वर्ष 2022-23 से 2024-25 तक के लिए ACC Energy के स्टैंडअलोन वित्तीय विवरण शामिल हैं। SEBI का कहना है कि इन दस्तावेजों के अभाव में कंपनी के वित्तीय दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना मुश्किल हो गया।

SEBI के आदेश में कहा गया कि जाँच के दौरान राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड अपनी सहायक कंपनियों से जुड़े कई महत्वपूर्ण रिकॉर्ड उपलब्ध कराने में विफल रही। इनमें बिक्री रजिस्टर, खरीद रजिस्टर, ग्राहकों के अनुसार बकाया रकम (डेब्टर्स) का विवरण, विक्रेताओं के अनुसार देनदारियों (क्रेडिटर्स) का ब्योरा, तथा संबंधित पक्षों (Related Parties) और उनसे हुए लेनदेन की सूची शामिल थी। SEBI का कहना है कि इन दस्तावेजों के अभाव में कंपनी की सहायक कंपनियों के वित्तीय लेनदेन और दावों की जाँच करना मुश्किल हो गया।

SEBI ने कहा कि कई बार ईमेल और समन भेजने के बावजूद राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड (REL) ने माँगी गई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई। इससे जाँच प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न हुई और SEBI के लिए कंपनी के समेकित वित्तीय विवरणों (Consolidated Financial Statements) की सत्यता की जाँच करना मुश्किल हो गया।

SEBI के अनुसार, यह SEBI अधिनियम, 1992 की धारा 11(2)(ia) और 11C(3) का उल्लंघन है। इसके अलावा कंपनी ने अपनी सहायक और स्टेप-डाउन सहायक कंपनियों के ऑडिट किए गए वित्तीय विवरण अपनी वेबसाइट पर अपलोड नहीं किए।

SEBI का कहना है कि इससे सूचीबद्ध कंपनियों से जुड़े LODR नियमों के रेगुलेशन 46(2)(s) और कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 136(1) का भी उल्लंघन हुआ।

राजेश एक्सपोर्ट्स की जाँच में SEBI को क्या निष्कर्ष मिले?

SEBI द्वारा राजेश एक्सपोर्ट्स, वैलकैम्बी और उसकी अन्य सहायक कंपनियों के वित्तीय रिकॉर्ड की जाँच में पाया गया कि कंपनी ने समेकित स्तर (Consolidated Level) पर लाखों करोड़ रुपए का राजस्व दिखाया था, लेकिन स्टैंडअलोन स्तर पर उसकी आय इसका केवल एक छोटा हिस्सा थी।

वित्त वर्ष 2020-21 में राजेश एक्सपोर्ट्स का समेकित राजस्व 2,58,306 करोड़ रुपए बताया गया था, जबकि उसका स्टैंडअलोन रेवेन्यु सिर्फ 2,060 करोड़ रुपए था। 2020-21 से 2025-26 के बीच समेकित और स्टैंडअलोन दोनों तरह की आय बढ़ी, लेकिन दोनों के बीच का बड़ा अंतर लगातार बना रहा।

वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी का समेकित राजस्व 7,78,716 करोड़ रुपए तक पहुँच गया, जबकि उसका स्टैंडअलोन राजस्व केवल 9,189 करोड़ रुपए था।

राजेश एक्सपोर्ट्स (REL) का कहना था कि उसके समेकित और स्टैंडअलोन रेवेन्यु के बीच इतना बड़ा अंतर इसलिए है क्योंकि उसकी अधिकांश आय उसकी विदेशी सहायक कंपनियों से आती है। इनमें वैलकैम्बी एसए (Valcambi SA) प्रमुख है, जिसे कंपनी अपनी मुख्य परिचालन इकाई बताती है।

हालाँकि उपलब्ध आँकड़ों से पता चलता है कि GGR समेत REL से जुड़ी कई अन्य कंपनियाँ या तो केवल होल्डिंग कंपनियाँ हैं, जिनका कोई वास्तविक कारोबार नहीं है, या फिर उन्होंने अभी तक अपना संचालन शुरू ही नहीं किया है।

REL और उसकी सहायक कंपनियों के वित्तीय रिकॉर्ड की जाँच के आधार पर SEBI के प्रारंभिक निष्कर्ष बताते हैं कि कंपनी के समेकित राजस्व का लगभग 97 से 99 प्रतिशत हिस्सा विदेशी सहायक और स्टेप-डाउन सहायक कंपनियों से जुड़ा हुआ बताया गया।

हालाँकि बार-बार समन भेजे जाने के बावजूद कंपनी इन राजस्व दावों के समर्थन में सत्यापित किए जा सकने वाले दस्तावेज उपलब्ध नहीं करा सकी। SEBI ने यह भी कहा कि REL Singapore और कंपनी की अन्य कई सहायक इकाइयों की वास्तविक कारोबारी गतिविधियाँ बहुत कम थीं या लगभग नहीं थीं।

SEBI के अनुसार, कंपनी की मुख्य परिचालन इकाई के रूप में पेश की गई Valcambi SA ने अपने ऑडिट किए गए वित्तीय विवरणों में केवल बहुत मामूली स्टैंडअलोन आय दिखाई थी, जो मुख्य रूप से प्रोसेसिंग शुल्क और वैल्यू एडिशन से जुड़ी थी।

नियामक ने यह भी कहा कि GGR द्वारा समेकित स्तर पर दिखाई गई भारी-भरकम लेकिन अनऑडिटेड आय का समर्थन न तो उसके ऑडिट किए गए स्टैंडअलोन वित्तीय विवरणों से होता है और न ही उपलब्ध लेनदेन रिकॉर्ड या सामान्य अकाउंटिंग सिद्धांतों से। SEBI ने जोर देकर कहा कि समस्या केवल कुछ जानकारी उपलब्ध न होने की नहीं है।

असली मुद्दा यह है कि कंपनी द्वारा समेकित स्तर पर दिखाई गई आय को लंबे समय तक बार-बार माँगे जाने और पर्याप्त अवसर दिए जाने के बावजूद सत्यापित नहीं किया जा सका। SEBI के आदेश में कहा गया है कि कंपनी ने लेनदेन से जुड़े रिकॉर्ड, ग्राहकों का विवरण, विक्रेताओं की पुष्टि, चालान, स्टॉक संबंधी रिकॉर्ड और अन्य मूल साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराए।

वहीं जिस विदेशी इकाई को मुख्य कारोबारी इकाई बताया गया, उसने भी बहुत कम स्टैंडअलोन आय दिखाई। इसके अलावा अन्य सहायक कंपनियों की ओर से भी कोई ठोस कारोबारी गतिविधि साबित नहीं की जा सकी। ऐसे में कंपनी द्वारा घोषित समेकित राजस्व के आँकड़े व्यावसायिक रूप से अविश्वसनीय प्रतीत होते हैं।

SEBI की जाँच में यह भी सामने आया कि वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच कंपनी ने अपनी सहायक कंपनियों से जुड़ी लगभग 15,15,385 करोड़ रुपए की आय को कथित तौर पर गलत तरीके से प्रस्तुत किया। यह राशि कंपनी द्वारा दिखाई गई कुल आय का करीब 99.80 प्रतिशत हिस्सा है।

SEBI का कहना है कि पहली नजर में ऐसा लगता है कि कंपनी की इन गतिविधियों ने निवेशकों और शेयर बाजार के सामने राजेश एक्सपोर्ट्स के कारोबार के आकार, उसकी वित्तीय स्थिति और आर्थिक मजबूती की एक बढ़ी-चढ़ी और भ्रामक तस्वीर पेश करने में मदद की।

राजस्व को बढ़ाकर दिखाने के आरोपों के अलावा SEBI ने कंपनी से जुड़े कुछ संदिग्ध लेनदेन की भी जाँच की। जाँच के दौरान पाया गया कि राजेश एक्सपोर्ट्स ने Affluence Shares and Stocks Pvt Ltd के साथ 11,487 करोड़ रुपए की बिक्री और 11,488 करोड़ रुपए की खरीद दिखाई थी।

हालाँकि इस कंपनी ने राजेश एक्सपोर्ट्स के साथ किसी भी प्रकार के कारोबारी संबंध होने से इनकार किया और कहा कि उसका लेनदेन सीधे कंपनी के बजाय व्यक्तिगत रूप से राजेश मेहता के साथ था। SEBI की जाँच में यह भी सामने आया कि कंपनी का पैसा पहले राजेश मेहता से जुड़ी संस्थाओं तक पहुँचाया गया और फिर वहां से उनके निजी खातों में भेजा गया।

हालाँकि इन लेनदेन को कंपनी के खातों में दर्ज किया गया था, लेकिन कुछ धनराशि का इस्तेमाल बोर्ड की मंजूरी और संबंधित पक्षों (Related Party Transactions) से जुड़े आवश्यक खुलासों के बिना व्यक्तिगत डेरिवेटिव ट्रेडिंग में किया गया। बाद में इस धन का कुछ हिस्सा वापस भी लौटा दिया गया।

SEBI के आदेश में कई अन्य संदिग्ध पहलुओं का भी उल्लेख किया गया है। इनमें अफ्रीका में सोने की खदान से जुड़े एक निवेश का मामला भी शामिल है, जिसमें लगभग 10.35 करोड़ रुपए लगाए गए थे। जाँच के दौरान इस निवेश से जुड़े पर्याप्त दस्तावेज, मूल्यांकन रिपोर्ट और ग्राहकों, विक्रेताओं तथा सहायक कंपनियों के वित्तीय रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं मिले।

गौरतलब है कि राजेश एक्सपोर्ट्स के खिलाफ जाँच मार्च 2024 में शुरू हुई थी। यह जाँच एक शेयरधारक की शिकायत के बाद शुरू की गई, जिसमें दो साल से अधिक समय से बकाया पड़े असामान्य रूप से बड़े व्यापारिक देयों (Trade Receivables) पर सवाल उठाए गए थे।

अब SEBI ने राजेश एक्सपोर्ट्स और उसके प्रबंध निदेशक राजेश मेहता को प्रतिभूति बाजार में कारोबार करने से रोक दिया है। हालाँकि राजेश एक्सपोर्ट्स ने अपने ऊपर लगाए गए सभी आरोपों को खारिज किया है, लेकिन SEBI की कार्रवाई का असर कंपनी और उसके निवेशकों पर साफ दिखाई दिया।

4 जून को कंपनी का शेयर 5 प्रतिशत के लोअर सर्किट पर पहुंच गया और करीब 104 रुपए पर कारोबार करता दिखा। पिछले तीन वर्षों में कंपनी के शेयर की कीमत 80 प्रतिशत से अधिक गिर चुकी है। इसका असर भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) पर भी पड़ा है, जिसके पास राजेश एक्सपोर्ट्स में 10.8 प्रतिशत हिस्सेदारी है।

इस हिस्सेदारी का मूल्य करीब 334 करोड़ रुपए बताया जाता है। रिपोर्टों के अनुसार, 2023 से अब तक निवेशकों को कुल मिलाकर लगभग 12,700 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है, जिससे करीब 1.94 लाख शेयरधारक प्रभावित हुए हैं।

सफलता की मिसाल से लेकर SEBI की जाँच तक: कौन हैं राजेश मेहता?

20 जून 1964 को बेंगलुरु में जन्मे राजेश जसवंत राय मेहता खुद के दम पर सफल हुए कारोबारी माने जाते हैं। उनका परिवार मूल रूप से गुजरात के मोरबी का रहने वाला जैन परिवार है। राजेश मेहता का सपना डॉक्टर बनने का था और उन्होंने नेशनल कॉलेज में पढ़ाई भी की लेकिन वे अपनी उच्च शिक्षा पूरी नहीं कर सके।

इसके बाद उन्होंने पारिवारिक कारोबार में हाथ बँटाना शुरू किया। वर्ष 1985 में उन्होंने अपने भाई प्रशांत मेहता के साथ मिलकर चाँदी के व्यापार की एक कंपनी शुरू की। इसके लिए शुरुआती पूँजी उनके दूसरे भाई बिपिन मेहता से उधार ली गई थी। मेहता बंधु चेन्नई से आभूषण खरीदते थे और उन्हें गुजरात व दक्षिण भारत के विभिन्न बाजारों में मुनाफे के साथ बेचते थे।

धीरे-धीरे राजेश मेहता ने आभूषणों का एक बड़ा थोक कारोबार खड़ा कर लिया। उन्होंने भारतीय पारंपरिक डिजाइनों को अलग-अलग बाजारों तक पहुँचाने में भी भूमिका निभाई और ‘राजेश आर्ट ज्वेलर्स’ के नाम से कारोबार संचालित किया। वर्ष 1989 में राजेश मेहता ने बेंगलुरु के एक गैरेज में केवल 10 कर्मचारियों के साथ राजेश एक्सपोर्ट्स की स्थापना की।

रिपोर्टों के अनुसार, यह भारत की शुरुआती संगठित स्वर्ण आभूषण निर्माण इकाइयों में से एक थी। कंपनी का मुख्य कारोबार संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ब्रिटेन, ओमान, कुवैत, अमेरिका और यूरोप को सोने के आभूषणों का निर्यात करना था। 1992 तक कंपनी का कारोबार लगभग 2 करोड़ रुपए तक पहुँच गया था।

इसके बाद इसमें तेजी से वृद्धि हुई और 1998 तक इसका टर्नओवर करीब 120 करोड़ रुपए हो गया। 1994 तक राजेश एक्सपोर्ट्स भारत की सबसे बड़ी स्वर्ण आभूषण निर्यातक और थोक विक्रेता कंपनियों में शामिल हो चुकी थी। वर्ष 1995 में कंपनी ने अपना IPO लाया, जिससे लगभग 10 करोड़ रुपए जुटाए गए।

इसके बाद कंपनी ने सोने के पूरे कारोबार में विस्तार किया, जिसमें रिफाइनिंग, निर्माण और खुदरा बिक्री शामिल थी। राजेश एक्सपोर्ट्स ‘शुभ ज्वेलर्स’ नाम से रिटेल ज्वेलरी चेन भी संचालित करती है। कंपनी की वेबसाइट के अनुसार, राजेश एक्सपोर्ट्स दुनिया में उत्पादित होने वाले लगभग 35 प्रतिशत सोने को प्रोसेस करने का दावा करती है।

वर्ष 2015 में राजेश एक्सपोर्ट्स ने स्विट्जरलैंड की कंपनी वैलकैम्बी एसए (Valcambi SA) का लगभग 40 करोड़ डॉलर (400 मिलियन डॉलर) के नकद सौदे में अधिग्रहण करके बाजार विशेषज्ञों को चौंका दिया था। उस समय वैलकैम्बी दुनिया की सबसे बड़ी गोल्ड रिफाइनिंग कंपनी मानी जाती थी।

हालाँकि अधिग्रहण के बाद वैलकैम्बी भी विवादों में घिर गई। कंपनी पर दुबई से आने वाले कथित ‘डर्टी गोल्ड’ (संदिग्ध स्रोतों से प्राप्त सोना) को प्रोसेस करने के आरोप लगे थे। इन विवादों के बीच ऐसी खबरें भी सामने आईं कि वैलकैम्बी ने स्विस गोल्ड एसोसिएशन की सदस्यता छोड़ दी थी।

एक समय राजेश एक्सपोर्ट्स का नाम फॉर्च्यून 500 कंपनियों की सूची में शामिल था। राजस्व के आधार पर इसे भारत की सबसे बड़ी सूचीबद्ध कंपनियों में गिना जाता था। हालाँकि अब SEBI की जाँच में आरोप लगाया गया है कि हाल के वर्षों में कंपनी द्वारा दिखाए गए राजस्व का बड़ा हिस्सा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया था और वास्तविक नहीं था।

राजेश मेहता को अपने कारोबारी जीवन में कई पुरस्कार और सम्मान मिले। उन्हें ‘उद्योग श्री’, कर्नाटक सरकार का ‘ज्वेलर ऑफ द ईयर’ पुरस्कार, चीन में ‘आउटस्टैंडिंग बिजनेसमैन’ सम्मान और फोर्ब्स की 2017 की भारत के सबसे अमीर लोगों की सूची में भी जगह मिली थी। राजेश एक्सपोर्ट्स को कई सरकारी योजनाओं का लाभ भी मिला।

वर्ष 2022 में कंपनी एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (ACC) बैटरी स्टोरेज के लिए घोषित 18,100 करोड़ रुपए की PLI योजना के लाभार्थियों में शामिल थी। हालाँकि राजेश एक्सपोर्ट्स 2024 में SEBI की जाँच के दायरे में आई, लेकिन उससे पहले भी कई विश्लेषक और निवेशक कंपनी की असाधारण रूप से ऊँची आय, बड़े नकद भंडार और उसकी सहायक कंपनियों से जुड़ी सीमित पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाते रहे थे।

कुछ लोगों ने तो राजेश एक्सपोर्ट्स की स्थिति की तुलना गीतांजलि जेम्स के पतन से भी की, जिसे भारत के सबसे चर्चित ज्वेलरी निर्यात घोटालों में से एक माना जाता है।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

पंजाब के ‘शिक्षा सुधारों’ का श्रेय लेने पर कॉन्ग्रेस और AAP में जंग, पढ़े- जब दिल्ली में केजरीवाल पर शीला दीक्षित के काम को अपना बताने के लगे थे आरोप

पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर पंजाब के ‘शिक्षा क्षेत्र में नंबर-1’ बनने की काफी चर्चा हो रही है। स्कूल शिक्षा में शीर्ष स्थान मिलने के बाद इस बात पर राजनीतिक बहस शुरू हो गई है कि इसका श्रेय किसे मिलना चाहिए।

आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार इसे अपनी शिक्षा सुधार नीतियों का नतीजा बता रही है। पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने कहा कि भगवंत मान सरकार के दौरान पंजाब 27वें स्थान से पहले नंबर पर पहुँचा है।

हालाँकि, कॉन्ग्रेस विधायक और पंजाब के पूर्व शिक्षा मंत्री परगट सिंह ने इस दावे पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पंजाब में शिक्षा सुधार की शुरुआत पिछली कॉन्ग्रेस सरकार के समय ही हो गई थी और 2022 में AAP के सत्ता में आने से पहले हुए बड़े शिक्षा सर्वे में इसके संकेत दिखने लगे थे।

यह विवाद दिल्ली की उस पुरानी बहस की याद दिलाता है, जब कॉन्ग्रेस नेताओं ने AAP पर आरोप लगाया था कि उसने शिक्षा क्षेत्र में उन सुधारों का श्रेय लिया, जिसकी नींव शीला दीक्षित सरकार के दौरान रखी गई थी। अब पंजाब में भी यही सवाल उठ रहा है कि शिक्षा जैसे लंबे समय के सुधार का असली श्रेय किसे मिलना चाहिए।

क्या है AAP का दावा?

यह विवाद तब शुरू हुआ जब पंजाब सरकार ने हालिया रैंकिंग में अपने प्रदर्शन को लेकर हुए दावा किया कि राज्य स्कूल शिक्षा में देश में नंबर-1 बना है। अरविंद केजरीवाल, मुख्यमंत्री भगवंत मान और अन्य AAP नेताओं ने इस उपलब्धि का श्रेय 2022 में पार्टी के सत्ता में आने के बाद किए गए शिक्षा सुधारों को दिया।

सरकार का कहना है कि स्कूल्स ऑफ एमिनेंस, फिनलैंड और सिंगापुर जैसे देशों में शिक्षकों की ट्रेनिंग, शिक्षकों और स्टाफ की भर्ती, स्मार्ट क्लासरूम का विस्तार और स्कूलों के बुनियादी ढाँचे में सुधार जैसे कदमों से सरकारी स्कूलों में बड़ा बदलाव आया है।

AAP का दावा है कि इन पहलों की वजह से पंजाब की शिक्षा व्यवस्था मजबूत हुई और राज्य शिक्षा रैंकिंग में शीर्ष स्थान तक पहुँचा है। केजरीवाल ने यह भी कहा कि पहले पंजाब शिक्षा रैंकिंग में निचले पायदान पर था लेकिन अब नंबर-1 बन गया है जिसे AAP सरकार के शिक्षा मॉडल की सफलता के तौर पर पेश किया जा रहा है।

रियलिटी चेक: क्या पंजाब की शिक्षा में सुधार AAP के आने से पहले शुरू हो गया था?

AAP पंजाब के शिक्षा क्षेत्र में सुधार का श्रेय अपनी सरकार को दे रही है लेकिन घटनाक्रम की टाइमलाइन बताती है कि राज्य में सुधार की शुरुआत पार्टी के सत्ता में आने से पहले ही हो चुकी थी। AAP सरकार ने मार्च 2022 में पंजाब में सत्ता संभाली थी लेकिन जिन अहम सर्वे और रिपोर्टों का हवाला दिया जा रहा है, उनमें से कुछ का डेटा 2022 से पहले का है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस उपलब्धि का पूरा श्रेय AAP सरकार को मिलना चाहिए या फिर वह पहले से किए गए काम का फायदा उठा रही है?

उदाहरण के तौर पर, नेशनल अचीवमेंट सर्वे (NAS) 2021 जो देशभर में छात्रों की पढ़ाई और सीखने के स्तर को मापता है, AAP सरकार बनने से कई महीने पहले किया गया था। इस सर्वे में पंजाब का प्रदर्शन अच्छा रहा था और राज्य बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों में शामिल था। इसी तरह कॉन्ग्रेस नेताओं ने पहले की परफॉर्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स (PGI) रिपोर्टों का हवाला देते हुए दावा किया है कि पंजाब में शिक्षा क्षेत्र में सुधार के संकेत सरकार बदलने से पहले ही दिखने लगे थे।

हालाँकि इसका यह मतलब नहीं है कि मौजूदा सरकार की कोई भूमिका नहीं रही। सत्ता में आने के बाद AAP सरकार ने स्कूल्स ऑफ एमिनेंस शुरू किए, शिक्षकों के लिए ट्रेनिंग कार्यक्रम चलाए, भर्ती अभियान शुरू किए और स्कूलों के बुनियादी ढाँचे को बेहतर बनाने पर काम किया। लेकिन शिक्षा क्षेत्र में सुधार आमतौर पर लंबे समय में असर दिखाते हैं और इनके नतीजे सामने आने में कई साल लग सकते हैं। ऐसे में किसी एक सरकार को पूरे सुधार का श्रेय देना आसान नहीं होता।

इसलिए टाइमलाइन से यह संकेत जरूर मिलता है कि पंजाब की शिक्षा में सुधार की प्रक्रिया AAP के सत्ता में आने से पहले ही शुरू हो चुकी थी। हालाँकि, मौजूदा सरकार ने अपने स्तर पर कई नई पहलें जारी रखीं और सुधारों को आगे बढ़ाने की कोशिश की।

एक और महत्वपूर्ण बात जो अक्सर राजनीतिक बहस में छूट जाती है, वह यह है कि पंजाब को भारत का कुल मिलाकर शिक्षा में नंबर-1 राज्य घोषित नहीं किया गया है। AAP सरकार जिस रैंकिंग का हवाला दे रही है, वह केवल स्कूल शिक्षा के संकेतकों और छात्रों के सीखने के परिणामों (learning outcomes) से जुड़ी है। इसमें पूरे शिक्षा क्षेत्र को नहीं मापा गया है, जिसमें उच्च शिक्षा, विश्वविद्यालय, रिसर्च आउटपुट, शिक्षकों की गुणवत्ता, रोजगार क्षमता और अन्य कई मानक शामिल होते हैं। इसलिए यह कहना कि पंजाब पूरे शिक्षा क्षेत्र में भारत का नंबर-1 राज्य बन गया है, पूरी तरह गलत है। ऐसे दावों का प्रचार लोगों के बीच भ्रम फैला सकता है लेकिन सच को लंबे समय तक छिपाए नहीं रहा जा सकता है।

दिल्ली जैसा विवाद: बेहतर शिक्षा का श्रेय किसे?

पंजाब में शिक्षा को लेकर छिड़ी बहस नई नहीं है। इससे पहले दिल्ली में भी ऐसा ही विवाद हुआ था। AAP सरकार ने शिक्षा मॉडल को अपनी बड़ी उपलब्धि बताया लेकिन कॉन्ग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि पार्टी उन सुधारों का श्रेय ले रही है जिसकी नींव पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित सरकार के दौरान रखी गई थी।

शीला दीक्षित के 15 साल के कार्यकाल में स्कूलों के बुनियादी ढाँचे, नई कक्षाओं, सुविधाओं और शिक्षा बजट पर काफी काम हुआ था। वहीं सत्ता में आने के बाद AAP ने शिक्षक प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम सुधार और स्कूलों के आधुनिकीकरण जैसे कई नए कदम उठाए।

कॉन्ग्रेस का कहना था कि AAP जिन सुधारों का प्रचार कर रही है, वे पहले से किए गए निवेश का नतीजा थे। हालाँकि AAP ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उसने अपनी नीतियों और सुधारों से शिक्षा व्यवस्था को बदला है। इसके बाद यह बहस शुरू हो गई कि शिक्षा में सफलता का असली श्रेय उस सरकार को मिलना चाहिए जिसने सुधार शुरू किए या उस सरकार को जिसने उन्हें आगे बढ़ाया और बड़े स्तर पर लागू किया।

अब पंजाब में भी कॉन्ग्रेस इसी तरह के आरोप लगा रही है तो इससे यह बहस फिर से तेज हो गई है कि शिक्षा जैसे लंबे समय में दिखने वाले सुधारों का असली श्रेय किसे मिलना चाहिए।

निष्कर्ष

पंजाब की हालिया शिक्षा रैंकिंग ने निश्चित तौर पर AAP सरकार के इस दावे को मजबूत किया है कि उसके शिक्षा सुधारों का असर दिख रहा है। लेकिन इस उपलब्धि को लेकर पैदा हुआ राजनीतिक विवाद एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि ऐसे सुधारों का श्रेय किसे मिलना चाहिए, जिनका असर दिखने में कई साल लगते हैं?

टाइमलाइन यह संकेत देती है कि पंजाब में शिक्षा सुधार की शुरुआत 2022 में AAP सरकार आने के तुरंत बाद नहीं हुई थी। सरकार बदलने से पहले हुए सर्वे और मूल्यांकन के आँकड़े बताते हैं कि राज्य में सुधार के संकेत पहले ही दिखाई देने लगे थे। हालाँकि, मौजूदा सरकार ने भी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए अपनी तरफ से कई नई पहलें शुरू की हैं।

यह विवाद दिल्ली की उस पुरानी बहस जैसा भी नजर आता है जब कॉन्ग्रेस नेताओं ने AAP पर आरोप लगाया था कि वह उन सुधारों का श्रेय ले रही है जिसकी नींव शीला दीक्षित सरकार के दौरान रखी गई थी। चाहे कोई इस तुलना से सहमत हो या नहीं लेकिन दोनों मामले यह दिखाते हैं कि शिक्षा सुधार आमतौर पर कई सरकारों के प्रयासों का नतीजा होते हैं।

यह भी समझना जरूरी है कि पंजाब का हालिया प्रदर्शन मुख्य रूप से स्कूल शिक्षा और छात्रों के सीखने के परिणामों से जुड़ा है। इसलिए यह दावा करना गलत होगा कि पंजाब पूरे शिक्षा क्षेत्र में भारत का नंबर-1 राज्य बन गया है। ऐसा दावा करने के लिए उच्च शिक्षा संस्थानों, विश्वविद्यालयों, रिसर्च, रोजगार क्षमता और शिक्षा से जुड़े अन्य मानकों की भी तुलना जरूरी होती है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

‘BJP सहयोगियों को खा जाती है’: अन्नामलाई के जाने के बाद फिर उठा पुराना आरोप, लेकिन बिहार से महाराष्ट्र तक क्या कहते हैं तथ्य?

ना केवल तमिलनाडु बल्कि पूरे दक्षिण में बीजेपी के सबसे चर्चित चेहरों में शामिल के. अन्नामलाई ने पार्टी छोड़ दी है। अन्नामलाई ने ‘वी द लीडर्स’ नाम से अपनी पार्टी का गठन किया है और वो अब तमिलनाडु में जन आंदोलन करेंगे और चुनाव भी लड़ेंगे। अन्नामलाई के जाने के बाद सोशल मीडिया पर यह बात तैरने लगी है कि बीजेपी बीच सफर में अपने नेताओं या अपने सहयोगियों को छोड़ देती हैं।

हालाँकि, इस बात में कितनी सच्चाई है ये हम इस लेख में जानेंगे। पहली शुरुआत BJP और अन्नामलाई से ही करते हैं। चाहते तो अन्नामलाई तमिलनाडु में बैठ इस्तीफा दे देते लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

बीजेपी ने उन्हें साथ रखने की लगातार कोशिशें कीं, पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन से लेकर गृह मंत्री अमित शाह ने उनसे बातचीत की उनकी शिकायतों को समझा और साथ देने की भी बात कही। लेकिन बात नहीं बनी और इसमें अन्नामलाई की भी अपनी वजह रही होंगी।

वो बीजेपी ही थी जिसने अन्नामलाई को तमिलनाडु में पार्टी का नेतृत्व करने का मौका दिया और पूरी ताकत उनके पीछे लगा दी। सार्वजनिक मंचों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर बीजेपी के तमाम बड़े नेता जिस अपनेपन के साथ अन्नामलाई को संबोधित करते उससे साफ नजर आता था कि वो अन्नामलाई में एक भविष्य का नेता देखते हैं लेकिन ये साथ लंबा नहीं चला तो इसके लिए बीजेपी ही जिम्मेदार नहीं।

यह आरोप कि बीजेपी अपने सहयोगियों को खत्म कर देती है, उन्हें धीरे-धीरे कमजोर कर देती है और अंततः उनकी राजनीतिक जमीन अपने कब्जे में ले लेती है। यह आरोप इतना दोहराया गया है कि कई लोगों ने इसे लगभग सत्य मान लिया। लेकिन क्या वास्तव में तस्वीर इतनी सीधी है? क्या हर राज्य में BJP ने अपने सहयोगियों को किनारे लगाया या कई मामलों में उसने राजनीतिक लाभ की स्थिति में होते हुए भी सहयोगियों को नेतृत्व, सम्मान और जगह दी?

अगर भारतीय राजनीति को सिर्फ आरोपों से नहीं बल्कि उदाहरणों और घटनाओं के क्रम से समझा जाए, तो एक दूसरा पक्ष भी साफ दिखाई देता है कि BJP की गठबंधन राजनीति का एक बड़ा आधार सहयोगियों को साथ लेकर चलने की रणनीति रही है। यह रणनीति हमेशा सफल रही हो, ऐसा नहीं है। मतभेद भी हुए, रिश्ते टूटे भी लेकिन यह कहना कि BJP का स्वभाव ही सहयोगियों को खत्म करना है, तथ्यों के सामने अधूरा तर्क नजर आता है।

सबसे पहले बिहार को देखिए। नीतीश कुमार की जेडीयू और BJP के बीच लंबे समय से संबंध है। नीतीश लंबे वक्त तक बीजेपी के साथ राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं। 2020 विधानसभा चुनाव में BJP ने 74 सीटें जीतीं जबकि जेडीयू 43 सीटों पर सिमट गई। BJP स्पष्ट रूप से बड़ी पार्टी बन चुकी थी। सामान्य राजनीतिक गणित कहता कि मुख्यमंत्री BJP का होना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही बने। BJP ने अपने बड़े जनादेश के बावजूद गठबंधन धर्म को प्राथमिकता दी और सहयोगी दल के नेता को शीर्ष पद पर बनाए रखा। यह कोई छोटी राजनीतिक घटना नहीं थी। भारतीय राजनीति में सत्ता अक्सर संख्या के हिसाब से चलती है लेकिन यहाँ BJP ने संख्या से ऊपर गठबंधन को रखा।

बाद में 2022 में जेडीयू ने खुद NDA छोड़ा और महागठबंधन में चली गई यानी रिश्ता टूटने की शुरुआत BJP की ओर से नहीं हुई। अब दोनों दल साथ हैं और जेडीयू का राजनीतिक स्पेस आज भी उनता ही मजबूत है।

बिहार की बात सिर्फ जेडीयू तक सीमित नहीं है। भाजपा ने जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) को लगातार राजनीतिक स्पेस दिया। मुकेश सहनी की VIP पार्टी को भी गठबंधन में जगह दी गई, चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास) लगातार NDA में है और राजनीतिक महत्व बना हुआ है।

ये वे दल थे जिनकी अपनी सीटें सीमित थीं लेकिन BJP ने उन्हें राजनीतिक प्रासंगिकता दी। अगर उद्देश्य केवल सहयोगियों को खत्म करना होता, तो छोटे दलों को सीटें देकर अपने वोट बैंक का हिस्सा साझा करने की मजबूरी BJP क्यों स्वीकार करती?

महाराष्ट्र का उदाहरण भी कम दिलचस्प नहीं है। भाजपा और शिवसेना का रिश्ता कोई 5-10 साल का नहीं था बल्कि यह लगभग तीन दशक तक चला। 1980 के दशक के अंत से दोनों दल साथ आए और महाराष्ट्र की राजनीति में एक वैचारिक साझेदारी बनी।

2019 विधानसभा चुनाव में दोनों ने साथ चुनाव लड़ा और बहुमत हासिल किया। भाजपा 105 सीटों पर और शिवसेना 56 सीटों पर जीती। लेकिन सरकार गठन के समय मुख्यमंत्री पद को लेकर विवाद हुआ और उद्धव ठाकरे ने कॉन्ग्रेस और NCP के साथ सरकार बनाने का फैसला किया। यहाँ भी यह गठबंधन तोड़ने की पहल भाजपा की तरफ से नहीं की गई थी।

हाँ, बाद के वर्षों में शिवसेना में विभाजन हुआ और एकनाथ शिंदे गुट भाजपा के साथ आया। आलोचक इसे भाजपा की रणनीति कह सकते हैं लेकिन उतना ही बड़ा तथ्य यह भी है कि भाजपा चाहती तो मुख्यमंत्री पद अपने पास रख सकती थी, फिर भी शिंदे को मुख्यमंत्री बनाया गया। महाराष्ट्र में सबसे बड़ी ताकत होने के बावजूद सहयोगी चेहरे को आगे रखना भाजपा की गठबंधन शैली का हिस्सा था।

पंजाब में शिरोमणि अकाली दल भाजपा का सबसे पुराना सहयोगी था। दोनों का रिश्ता दो दशक से अधिक समय तक चला। कृषि कानूनों के मुद्दे पर मतभेद बढ़े और 2020 में अकाली दल ने एनडीए छोड़ने का फैसला किया। यह अलग बात है कि किसान आंदोलन के दबाव और पंजाब की राजनीति ने अकाली दल को यह निर्णय लेने पर मजबूर किया, लेकिन तथ्य यह है कि गठबंधन से बाहर निकलने की घोषणा अकाली दल की ओर से हुई थी। भाजपा ने अपने सबसे पुराने सहयोगी को बाहर नहीं किया बल्कि सहयोगी ने खुद रास्ता अलग चुना।

उत्तर प्रदेश में भाजपा की राजनीति को देखें तो यहाँ भी सहयोगियों को साथ रखने का एक मॉडल दिखता है। अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल हों या निषाद पार्टी के संजय निषाद दोनों दलों को भाजपा ने केवल चुनावी समय की जरूरत नहीं माना।

मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व दिया गया, सीटों में भागीदारी दी गई और सामाजिक समीकरणों में उन्हें जगह मिली। भाजपा समझती रही कि उत्तर प्रदेश जैसी विशाल राजनीति केवल अकेले नहीं लड़ी जा सकती, सामाजिक आधार का विस्तार सहयोगियों के साथ ही संभव है।

पूर्वोत्तर में भाजपा की गठबंधन नीति शायद सबसे अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। नागालैंड में भाजपा ने नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (NDPP) के साथ चुनाव लड़ा और क्षेत्रीय नेतृत्व को स्वीकार किया। असम में असम गण परिषद (AGP) को साथ रखा गया।

मेघालय और मणिपुर में भी क्षेत्रीय दलों के साथ साझा सत्ता मॉडल अपनाया गया। भाजपा चाहती तो अपनी राष्ट्रीय ताकत के आधार पर ‘बड़े भाई’ की राजनीति कर सकती थी लेकिन पूर्वोत्तर में उसने स्थानीय नेतृत्व और क्षेत्रीय आकांक्षाओं के साथ समन्वय का रास्ता चुना। यही कारण है कि एनडीए का विस्तार पूर्वोत्तर में सबसे तेज हुआ।

आंध्र प्रदेश इसका नया उदाहरण है। 2024 के बाद जब चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी एनडीए के लिए अहम सहयोगी बनकर उभरी, तब भाजपा ने न केवल उन्हें महत्व दिया बल्कि गठबंधन को स्थिर बनाए रखने की कोशिश की। राष्ट्रीय स्तर पर बहुमत के समीकरण में सहयोगियों की अहमियत को भाजपा ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया। यह वही राजनीति है जिसमें ‘एकला चलो’ के बजाय ‘साथ लेकर चलो’ का संकेत दिखता है।

दिलचस्प बात यह है कि भाजपा पर सबसे ज्यादा आरोप वही लोग लगाते हैं जो कॉन्ग्रेस की गठबंधन राजनीति को भूल जाते हैं, इतिहास में ऐसे तमाम उदाहरण भरे पड़े हैं। हाल ही में तमिलनाडु में भी ऐसा ही दिखा। कॉन्ग्रेस वर्षों तक DMK के साथ रही लेकिन राजनीतिक समीकरण बदलते ही रिश्तों में दूर बढ़। कॉन्ग्रेस ने DMK की पीठ में छुरा घोंप दिया और विजय की TVK के साथ हाथ मिला लिया।

यह भी सच है कि गठबंधन राजनीति हमेशा बराबरी का रिश्ता नहीं होती। बड़ी पार्टी स्वाभाविक रूप से प्रभावशाली होती है। भाजपा भी अपवाद नहीं। कई सहयोगी कमजोर भी पड़े, कुछ दलों का जनाधार भाजपा के विस्तार से प्रभावित भी हुआ। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह भाजपा की ‘साजिश’ थी या भारतीय राजनीति का स्वाभाविक परिणाम।

इतना जरूर दिखता है कि भाजपा ने कई बार राजनीतिक लाभ की स्थिति में होते हुए भी सहयोगियों को नेतृत्व दिया, मुख्यमंत्री पद छोड़ा, सीटें साझा कीं और छोटे दलों को राष्ट्रीय राजनीति में जगह दी। बिहार में नीतीश कुमार, महाराष्ट्र में शिंदे, उत्तर प्रदेश में अपना दल और निषाद पार्टी और भी तमाम उदाहरण केवल संयोग नहीं लगते।

इसलिए जब यह कहा जाता है कि भाजपा सहयोगियों को ‘खा जाती’ है, तब शायद यह भी पूछना चाहिए कि अगर ऐसा ही होता तो इतने क्षेत्रीय दल बार-बार उसके साथ क्यों लौटते?

भारत-म्यांमार-थाईलैंड हाईवे चीन-पाकिस्तान के CPEC को देगा मात, लुक-ईस्ट नीति को मिलेगी मजबूती: जानें 24 साल के गतिरोध को कैसे तोड़ रही मोदी सरकार

दुनिया की सियासत आजकल इतनी तेज रफ्तार से भाग रही है कि पलक झपकते ही पुराने समीकरण ध्वस्त हो जाते हैं और नए गठजोड़ आकार ले लेते हैं। आज पूरी दुनिया का ध्यान मिडिल ईस्ट के तनाव, ईरान और इजरायल के बीच छिड़ी जंग और पश्चिमी देशों की अंदरूनी उठापटक पर टिका हुआ है। लेकिन इसी वैश्विक शोर-शराबे के बीच भारत के पूर्वी छोर पर एक ऐसी खामोश मगर बेहद आक्रामक और रणनीतिक बिसात बिछाई जा रही है, जो आने वाले समय में पूरे एशिया की भूगोल और अर्थव्यवस्था को हमेशा के लिए बदलकर रख देगी।

अभी कुछ दिन पहले ही म्यांमार के राष्ट्रपति अपने पहले आधिकारिक विदेश दौरे पर किसी और देश जाने के बजाय सीधे भारत की धरती पर कदम रखते हैं। नई दिल्ली के गलियारों में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और म्यांमार के शीर्ष नेतृत्व के बीच आमने-सामने की बातचीत हुई, तो कई ऐसे मुद्दों पर जमी हुई बर्फ पिघली जो सालों से ठंडे बस्ते में अटके पड़े थे। इस रणनीतिक और कूटनीतिक मुलाकात ने भारत की ‘लुक ईस्ट’ और ‘एक्ट ईस्ट’ पॉलिसी में एक नया बारूद भरने का काम किया है, जिसकी गूंज बीजिंग से लेकर इस्लामाबाद तक सुनाई दे रही है।

इस पूरी भू-राजनीतिक हलचल के केंद्र में एक ऐसा महा-प्रोजेक्ट है, जो चीन के सबसे महात्वाकांक्षी और प्रचारित प्रोजेक्ट यानी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के घमंड को चूर-चूर करने का दम रखता है। हम बात कर रहे हैं इंडिया-म्यांमार-थाईलैंड हाईवे की, जिसे संक्षेप में आईएमटी हाईवे भी कहा जाता है। यह सिर्फ कोलकाता से बैंकॉक को जोड़ने वाली कोई साधारण पक्की सड़क नहीं है, बल्कि यह भारत का वो ब्रह्मास्त्र है जो दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के विशाल बाजारों में भारत की आर्थिक धाक जमाने की नीव रखने जा रहा है।

क्या है IMT हाईवे और इसका पूरा मास्टरप्लान?

अगर आप भारत का नक्शा ध्यान से देखें, तो हमारे पूर्वोत्तर के राज्य चारों तरफ से जमीन से घिरे हुए हैं और उनके पास अपना कोई स्वतंत्र समुद्र तट नहीं है। अब तक की स्थिति यह रही है कि अगर पूर्वोत्तर के राज्यों से कोई सामान विदेश भेजना हो या देश के बाकी हिस्सों में लाना हो, तो उसे ‘चिकन नेक’ कहे जाने वाले बेहद संकरे सिलीगुड़ी कॉरिडोर से घुमाकर कोलकाता बंदरगाह तक लाना पड़ता है। इसके बाद ही उसे पानी के जहाज के जरिए दुनिया भर में भेजा जाता है, जिससे समय और पैसा दोनों पानी की तरह बहते हैं।

लेकिन प्रकृति ने भारत को पूर्व की तरफ एक और ऐसा रास्ता दिया है जो सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय बाजारों का द्वार खोलता है। मणिपुर की सीमा सीधे म्यांमार से लगती है और म्यांमार की भौगोलिक सीमाएँ आगे बढ़कर सीधे थाईलैंड को छूती हैं। भारत ने इसी भूगोल का रणनीतिक फायदा उठाने के लिए आज से लगभग चौबीस साल पहले यानी साल 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी प्लान तैयार किया था, जिसे आज हम कोलकाता-बैंकॉक एक्सप्रेसवे के नाम से भी जानते हैं।

कोलकाता से बैंकॉक का सफर कार से पूरा करने का रूट मैप

यह अंतरराष्ट्रीय हाईवे कुल 1,360 किलोमीटर लंबा है और इसका पूरा खाका इस तरह तैयार किया गया है कि यह भारत के पूर्वोत्तर को दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार बना दे। यह पूरा रूट कोलकाता से शुरू होकर पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी, असम के गुवाहाटी और नागालैंड के कोहिमा शहर से गुजरता हुआ मणिपुर के सीमावर्ती और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कस्बे मोरेह तक पहुँचता है। भारत के अंदर-अंदर ही इस हाईवे की कनेक्टिविटी का दायरा लगभग 2,800 किलोमीटर तक फैल जाता है।

जैसे ही कोई वाहन मणिपुर के मोरेह की अंतरराष्ट्रीय सीमा को पार करता है, वह म्यांमार के तामू शहर में एंट्री कर जाता है। इसके बाद यह हाईवे म्यांमार के कालेवा, मांडले, और म्यावाडी जैसे प्रमुख व्यापारिक शहरों, दुर्गम पहाड़ों और घने जंगलों से गुजरता है। म्यांमार की सीमा खत्म होते ही यह सड़क सीधे थाईलैंड के माए सोट शहर में दाखिल होती है और वहां से थाईलैंड के बेहतरीन रोड नेटवर्क के जरिए सीधे राजधानी बैंकॉक को जोड़ देती है।

सबसे दिलचस्प और रणनीतिक बात यह है कि भारत का इरादा सिर्फ थाईलैंड की सीमा पर जाकर रुकने का बिल्कुल नहीं है। भारत सरकार की आने वाले समय की योजना इस हाईवे को और आगे विस्तार देने की है, जिसके तहत इसे कंबोडिया, लाओस और अंततः वियतनाम तक ले जाने का एक बड़ा मेगा प्लान तैयार किया जा चुका है। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि भविष्य में आप कोलकाता या गुवाहाटी से अपनी गाड़ी में बैठकर सीधे वियतनाम के समुद्र तट तक का सफर सड़क मार्ग से तय कर सकेंगे।

फोटो साभार: AI ChatGPT

चीन के CPEC को कैसे पटखनी देगा यह हाईवे?

जब भी दुनिया में कनेक्टिविटी, इंफ्रास्ट्रक्चर या नए व्यापारिक रास्तों की बात होती है, तो वैश्विक मीडिया में चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ और पाकिस्तान में बन रहे सीपीईसी का बहुत ढोल पीटा जाता है। चीन ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से जबरन रास्ता निकालकर अरब सागर के ग्वादर पोर्ट तक एक बड़ा कॉरिडोर खड़ा कर लिया है ताकि वह अपने शिनजियांग प्रांत को सीधे समुद्र से जोड़ सके। चीन इसी तर्ज पर म्यांमार और बांग्लादेश में भी भारी निवेश करके भारत को तीनों तरफ से घेरने की गहरी साजिश रच रहा था।

लेकिन भारत का यह त्रिपक्षीय हाईवे चीन के इसी चक्रव्यूह को तार-तार करने का सबसे अचूक और ठोस कूटनीतिक जवाब बनकर उभरा है। चीन का सीपीईसी प्रोजेक्ट पूरी तरह से कर्ज के बोझ और तानाशाही शर्तों पर टिका हुआ है, जिसने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह वेंटिलेटर पर ला खड़ा किया है। इसके विपरीत, भारत का यह हाईवे एक ‘साझा समृद्धि’ और समान विकास के मॉडल पर आधारित है, जहां भारत म्यांमार को वित्तीय और तकनीकी मदद दे रहा है, न कि उसे किसी कर्ज के जाल में फंसा रहा है।

इसके अलावा चीन का सीपीईसी जिस इलाके से गुजरता है, वह अत्यधिक अशांत, आतंकी हमलों से ग्रस्त और स्थानीय विद्रोह का सामना कर रहा है, जिससे उसका भविष्य हमेशा अधर में लटका रहता है। इसके उलट, भारत-म्यांमार-थाईलैंड रूट एक प्राकृतिक, ऐतिहासिक और बेहद सुरक्षित व्यापारिक गलियारा साबित होने जा रहा है। यह दक्षिण-पूर्व एशिया की लगभग सत्तर हजार करोड़ डॉलर की संयुक्त अर्थव्यवस्था को सीधे भारत के एक अरब से ज्यादा आबादी वाले विशाल बाजार से जोड़कर चीन के आर्थिक वर्चस्व को सीधी चुनौती देगा।

बांग्लादेश आउट… कैसे पलटी शतरंज की बाजी?

इस पूरे क्षेत्र की भू-राजनीति में एक बहुत बड़ा और अप्रत्याशित मोड़ बांग्लादेश को लेकर आया है, जिसने भारत की रणनीति को और अधिक आक्रामक बना दिया है। शेख हसीना के शासनकाल के दौरान बांग्लादेश इस पूरे कनेक्टिविटी प्लान में बहुत गहरी दिलचस्पी दिखा रहा था और चाहता था कि वह त्रिपुरा के रास्ते इस नेटवर्क का हिस्सा बन जाए ताकि ढाका का व्यापार भी बढ़ सके। लेकिन बांग्लादेश में अचानक हुए तख्तापलट के बाद वहां जो नई कार्यवाहक सरकार बनी है, उसके तेवर थोड़े बदले-बदले और असहयोग वाले नजर आ रहे हैं।

बांग्लादेश के कुछ नए रणनीतिकारों को शायद यह गलतफहमी हो गई थी कि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के पास अंतरराष्ट्रीय व्यापार करने या समुद्र तक पहुँचने के लिए बांग्लादेश के अलावा कोई दूसरा भौगोलिक विकल्प ही नहीं है। वे इसी गुमान में बैठे थे कि भारत को अपनी जरूरतों के लिए हर हाल में उनके सामने झुकना ही पड़ेगा। लेकिन भारत ने म्यांमार के साथ अपनी बातचीत को तेज करके और इस हाईवे को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बनाकर बांग्लादेश की इस गलतफहमी को पूरी तरह दूर कर दिया है।

देसी अंदाज में कहें तों बांग्लादेश सोच रहा था कि उनके बिना भारत का पत्ता भी नहीं हिलेगा, लेकिन भारत ने पूरब से म्यांमार का पत्ता खोलकर बांग्लादेश का झुनझुना बजा दिया।

भारत की इस कूटनीतिक चाल ने साफ कर दिया है कि आधुनिक विदेश नीति में किसी एक रास्ते या किसी एक पड़ोसी पर पूरी तरह निर्भर रहना आत्मघाती हो सकता है। अगर बांग्लादेश की नई सरकार अपने रुख को लेकर संशय में है या भारत विरोधी ताकतों को बढ़ावा देती है, तो भारत के पास म्यांमार के रास्ते थाईलैंड और पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में सीधे दाखिल होने का एक परमानेंट और बेहद मजबूत विकल्प तैयार है। अब यह पूरी तरह बांग्लादेश को तय करना है कि वह इस महाद्वीपीय विकास की रफ्तार में शामिल होना चाहता है या किनारे बैठकर पछताना चाहता है।

आखिर क्यों लग रहे 26 साल? पेच कहाँ फंसा था?

अब स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि अगर इस हाईवे का खाका साल 2002 में ही खींच लिया गया था, तो इसे पूरा होने में आखिर ढाई दशक का लंबा वक्त क्यों लग गया। इस असाधारण देरी के पीछे कोई एक प्रशासनिक कारण नहीं था, बल्कि इसके पीछे म्यांमार की जटिल आंतरिक राजनीति, बेहद कठिन भूगोल और कई अंतरराष्ट्रीय रोड़े जिम्मेदार थे, जिन्होंने इस प्रोजेक्ट की रफ्तार पर बार-बार ब्रेक लगाने का काम किया।

म्यांमार का गृहयुद्ध और तख्तापलट: इस देरी की सबसे बड़ी और मुख्य वजह म्यांमार की आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और वहां का गृहयुद्ध रहा है। साल 2021 में म्यांमार की सेना ने लोकतांत्रिक सरकार का तख्तापलट कर दिया, जिसके बाद म्यांमार के चिन और सागाइंग जैसे प्रांतों में सेना और स्थानीय अलग-अलग जातीय विद्रोही गुटों के बीच भयंकर सशस्त्र संघर्ष छिड़ गया। चूंकि इस हाईवे का एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा इन्हीं अशांत इलाकों से होकर गुजरता है, इसलिए वहां काम कर रहे इंजीनियरों और मजदूरों की सुरक्षा के चलते काम बार-बार ठप होता रहा।

खतरनाक पहाड़ी और जंगली रास्ता: म्यांमार का भूगोल भी इस प्रोजेक्ट के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती साबित हुआ। म्यांमार के हिस्से में आने वाला कालेवा से यागी तक का जो एक सौ बीस किलोमीटर का खंड है, वह बेहद ऊंचे पहाड़ों, घने जंगलों और भूस्खलन वाले क्षेत्रों से भरा हुआ है। ऐसे दुर्गम और टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर एक आधुनिक और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप पक्की सड़क का निर्माण करना दुनिया के बेहतरीन इंजीनियरों के लिए भी किसी बड़े इम्तिहान से कम नहीं था।

जर्जर बुनियादी ढाँचा: एक और बड़ी तकनीकी बाधा यह थी कि म्यांमार के इस रूट पर अंग्रेजों के जमाने के लगभग सत्तर पुराने और जर्जर लोहे के पुल थे, जो आज के भारी-भरकम ट्रकों और कंटेनरों का वजन संभालने में पूरी तरह अक्षम थे। भारत ने इस समस्या को भांपते हुए म्यांमार को करीब एक हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की वित्तीय मदद दी ताकि इन सभी पुराने पुलों को तोड़कर उनकी जगह आधुनिक कंक्रीट के मजबूत पुल बनाए जा सकें, जिससे व्यापार में कोई बाधा न आए।

अब कैसे आएगी प्रोजेक्ट में रफ्तार?

हालाँकि अब म्यांमार के हालात में धीरे-धीरे एक सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है और वहां का सैन्य नेतृत्व भी इस बात को समझ चुका है कि विकास के बिना सत्ता को संभालना नामुमकिन है। म्यांमार के राष्ट्रपति का अपने पहले विदेश दौरे के लिए भारत को चुनना और प्रधानमंत्री मोदी के साथ इस प्रोजेक्ट को फास्ट ट्रैक पर डालने का संकल्प लेना यह साबित करता है कि अब दोनों देश इस हाईवे को हर हाल में पूरा करने के लिए कटिबद्ध हैं। इस समय इस पूरे हाईवे का लगभग सत्तर प्रतिशत से ज्यादा काम मुकम्मल हो चुका है और बाकी बचे काम को निपटाकर इसे अगले दो से तीन साल के भीतर पूरी तरह चालू करने का लक्ष्य रखा गया है।

परदे के पीछे का खेल: जापान की एंट्री और भारत की ‘सॉफ्ट पावर’

इस पूरे खेल के पीछे एक और बहुत बड़ी वैश्विक महाशक्ति भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी है, और वह देश है जापान। जापान इस पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में भारत का सबसे भरोसेमंद और रणनीतिक पार्टनर बनकर उभरा है। जापान म्यांमार के भीतर कई बड़े रेलवे प्रोजेक्ट्स, पुलों के निर्माण और सड़कों के आधुनिकीकरण में भारी-भरकम निवेश कर रहा है, क्योंकि जापान का भी सीधा रणनीतिक मकसद हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की विस्तारवादी नीति और आर्थिक दादागिरी को मजबूती से रोकना है।

म्यांमार की मजबूरी और भारत की व्यावहारिक कूटनीति

दुनिया के कई पश्चिमी और यूरोपीय देशों ने म्यांमार में सैन्य शासन होने की वजह से उससे अपने सभी कूटनीतिक और व्यापारिक रिश्ते पूरी तरह तोड़ लिए हैं और उस पर कई तरह के कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं। लेकिन भारत ने यहां अपनी व्यावहारिक और यथार्थवादी कूटनीति का परिचय देते हुए म्यांमार की सरकार से बातचीत का रास्ता हमेशा खुला रखा। भारत इस बात को अच्छी तरह जानता है कि पड़ोसियों को बदला नहीं जा सकता और उनसे मुंह मोड़ना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घातक हो सकता है।

भारत के कूटनीतिक विचारकों का मानना है कि किसी देश से पूरी तरह संबंध तोड़ लेने से वहां कभी भी लोकतंत्र की बहाली नहीं होती, बल्कि ऐसा करने से वहां एक बड़ा राजनीतिक और आर्थिक शून्य पैदा हो जाता है। अगर भारत म्यांमार से दूरी बना लेता, तो चीन तुरंत उस खाली जगह पर कब्जा कर लेता और म्यांमार की जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ करने लगता। इसलिए भारत ने म्यांमार की सेना और वहां के स्थानीय विद्रोही गुटों के बीच एक बेहद बारीक और चतुर संतुलन बनाकर अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखा है।

कालादान मल्टीमॉडल प्रोजेक्ट से ‘चिकन नेक’ की टेंशन खत्म

इस हाईवे के समानांतर भारत म्यांमार के ही भीतर एक और अत्यंत महत्वपूर्ण और गेम-चेंजर प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है, जिसे कलादान मल्टीमॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट कहा जाता है। यह प्रोजेक्ट भी भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए एक जीवनरेखा साबित होने जा रहा है क्योंकि यह कोलकाता बंदरगाह को समुद्र के रास्ते म्यांमार के सितवे बंदरगाह से जोड़ता है। सितवे बंदरगाह को पूरी तरह भारत ने ही विकसित और फंड किया है ताकि चीन के बढ़ते समुद्री प्रभाव को बंगाल की खाड़ी में काउंटर किया जा सके।

सितवे बंदरगाह पर माल उतरने के बाद उसे कलादान नदी के जरिए अंतर्देशीय जलमार्ग से पलेटवा नामक स्थान तक ले जाया जाएगा, और फिर वहां से एक नए सड़क नेटवर्क के जरिए माल सीधे हमारे मिजोरम राज्य की सीमा में प्रवेश कर जाएगा। यह पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर नेटवर्क तैयार होने के बाद भारत की सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर निर्भरता हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी, और युद्ध जैसी किसी भी आपातकालीन स्थिति में भी हमारे पूर्वोत्तर राज्य पूरी तरह सुरक्षित और दुनिया से जुड़े रहेंगे।

इस हाईवे के पूरा होने से भारत के हाथ लगेगी कौन-कौन सी लॉटरी?

$7000 करोड़ डॉलर की इकोनॉमी और नौकरियाँ: आर्थिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस रूट के पूरी तरह एक्टिव होते ही भारत और आसियान देशों के बीच व्यापार में 20 से 30 फीसदी का उछाल आएगा। इससे लगभग 2 करोड़ नए रोजगार पैदा होंगे और उत्तर-पूर्व के राज्यों में विकास की बाढ़ आ जाएगी। आर्थिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस रूट के पूरी तरह एक्टिव होते ही भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच का द्विपक्षीय व्यापार कई गुना बढ़ जाएगा।

पूर्वोत्तर बनेगा ‘ग्लोबल ट्रेड हब’: मणिपुर, नागालैंड, मिजोरम और असम जैसे राज्य जो आजादी के बाद से भौगोलिक दूरी और बुनियादी ढाँचे की कमी के कारण देश की मुख्यधारा के आर्थिक विकास से थोड़े अलग-अलग से पड़े थे, वे अचानक से अंतरराष्ट्रीय व्यापार के सबसे बड़े और जीवंत हब बनकर उभरेंगे। इन राज्यों की सीमाओं पर बड़े-बड़े लॉजिस्टिक्स पार्क, अत्याधुनिक कोल्ड स्टोरेज, अंतरराष्ट्रीय होटल और मैन्युफैक्चरिंग फैक्ट्रियां स्थापित होंगी, जो वहां के युवाओं के पलायन को हमेशा के लिए रोक देंगी।

बौद्ध पर्यटन (Buddhist Tourism) को महा-बूस्ट: म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया, लाओस और वियतनाम… ये सभी मुख्य रूप से बौद्ध संस्कृति वाले देश हैं। इन देशों के करोड़ों लोग हर साल बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर जैसे पवित्र बौद्ध स्थलों के दर्शन करना चाहते हैं। इस हाईवे के बनने से बौद्ध सर्किट का ऐसा विकास होगा कि भारत के टूरिज्म सेक्टर की किस्मत बदल जाएगी। इस सड़क मार्ग के सुलभ होते ही इन देशों से लाखों की संख्या में तीर्थयात्री और पर्यटक सीधे अपनी गाड़ियों या बसों से भारत आ सकेंगे, जिससे हमारे सांस्कृतिक संबंध और मजबूत होंगे। खुद म्यांमार के राष्ट्रपति ने अपने इस दौरे में बोधगया जाकर इस बात के संकेत दे दिए हैं।

यूरोप जैसा सफर (IMT मोटर वाहन समझौता): वर्तमान में तीनों देश एक बेहद खास और ऐतिहासिक मोटर वाहन समझौते पर भी काम कर रहे हैं, जो इस हाईवे की सफलता की असली चाबी है। इस समझौते के लागू होते ही तीनों देशों के वाणिज्यिक और निजी वाहनों को सीमाओं पर किसी जटिल कागजी कार्रवाई, लंबी कस्टडी या बार-बार सामान उतारने की जरूरत नहीं पड़ेगी। गाड़ियां एक देश से दूसरे देश में इस तरह आ-जा सकेंगी जैसे यूरोपीय संघ के भीतर गाड़ियां बिना किसी बाधा के एक देश से दूसरे देश की सीमा पार कर जाती हैं।

पूरब का नया सुल्तान बनेगा भारत

देर से ही सही लेकिन भारत का यह पूर्वी कूटनीतिक दाँव अब पूरी तरह से सटीक और अचूक बैठ चुका है। म्यांमार के ऊँचे पहाड़ों को चीरकर, घने जंगलों के बीच से रास्ता बनाते हुए और चीन के तमाम मंसूबों को धूल चटाते हुए बन रहा यह हाईवे सिर्फ डामर और गिट्टी से बनी कोई सड़क नहीं है। यह नए भारत की उभरती हुई वैश्विक कूटनीति, उसके फौलादी इरादों और दुनिया की एक बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने की जिद का एक अटूट और जीता-जागता प्रतीक है।

बांग्लादेश अपनी राजनीतिक अस्थिरता और गलतफहमियों के दौर से गुजरता रहे या चीन अपनी तमाम आर्थिक और सैन्य ताकत के दम पर भारत को घेरने की साजिशें रचता रहे, भारत ने पूरब का वो अभेद्य रास्ता खोल दिया है जिसकी अंतिम मंजिल सीधे वैश्विक नेतृत्व की कुर्सी पर जाकर ही खत्म होती है। अब बस कुछ सालों का और इंतजार है, जिसके बाद इस ऐतिहासिक हाईवे पर भारत की प्रगति, समृद्धि और सामरिक शक्ति का पहिया पूरी दुनिया के सामने दहाड़ते हुए दौड़ने लगेगा।

हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन के विकिपीडिया पेज पर वामपंथियों का प्रोपेगेंडा: सामने आए Kautilya3, Shahinshah121 व TrangaBellam जैसे नाम, जानें इनका इतिहास

कई वर्षों से ऑपइंडिया यह बात उठाता रहा है कि खुद को ‘मुक्त ज्ञानकोश’ (free encyclopedia) कहने वाला विकिपीडिया न तो पूरी तरह निष्पक्ष है और न ही पूरी तरह स्वतंत्र। विकिपीडिया भारत और हिंदुओं के खिलाफ पक्षपात करने वाले संपादकों (Editors) को मंच देता है जो लोगों और संस्थाओं के बारे में भ्रामक और एकतरफा जानकारी डालते हैं। अब नैचुरल पॉइंट ऑफ व्यू (NPOV) मीडिया की नई शोध रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कुछ हिंदू विरोधी संपादक अमेरिका स्थित ‘हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन’ (HAF) के खिलाफ विकिपीडिया पर प्रोपेगेंडा फैला रहे हैं।

कुछ विकिपीडिया संपादकों ने हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन की कई गतिविधियों को ‘हिंदुत्व’ से जोड़ने की कोशिश की। इसका उद्देश्य यह नैरेटिव बनाना है कि HAF एक हिंदू समर्थक राजनीतिक एजेंडा को आगे बढ़ाने वाला संगठन है।

HAF के विकिपीडिया पेज के अनुसार, यह हिंदू अधिकार संगठन ‘हिंदू अधिकारों’ के नाम पर हिंदुत्व को नए रूप में प्रस्तुत कर रहा है। इसमें कहा गया है कि संगठन अमेरिका में हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों का मुद्दा उठाता है, योग जैसी हिंदू परंपराओं के सांस्कृतिक दुरुपयोग का विरोध करता है और ऐसे कानूनों का विरोध करता है जिनका इस्तेमाल कथित जातिगत भेदभाव के नाम पर हिंदुओं को निशाना बनाने के लिए किया जाता है।

विकिपीडिया पर HAF के पेज पर लिखा है, “यह संगठन दावा करता है कि उसका काम अमेरिका में हिंदुओं के अधिकारों की रक्षा करना, विदेशों में हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों की ओर ध्यान दिलाना, योग के सांस्कृतिक दुरुपयोग का विरोध करना और जाति आधारित भेदभाव को रोकने वाले कानूनों का विरोध करना है। हालाँकि, इन प्रयासों को हिंदुत्व को ‘हिंदू अधिकार’ के रूप में पेश करने की कोशिश माना जाता है ताकि इसे अमेरिका की मुख्यधारा की बहुसांस्कृतिक (Multiculturalism) राजनीति में आसानी से स्वीकार किया जा सके।”

3 जून को प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में एशले रिंड्सबर्ग के नेतृत्व वाले NPOV Media ने दावा किया कि कुछ गिने-चुने गुमनाम संपादकों ने HAF के विकिपीडिया पेज के 80% से अधिक हिस्से को नियंत्रित किया हुआ है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि HAF के विकिपीडिया पेज पर दिखाई देने वाली लगभग 80% पक्षपातपूर्ण जानकारी के पीछे केवल चार एडिटर्स की भूमिका है। ये एडिटर्स TrangaBellam, Kautilya3, Llightex और Shahinshah121 हैं। इसके अलावा Vanamonde93 नाम का एक हिंदू विरोधी एडिटर भी इन लोगों का समर्थन करता है।

NPOV की रिपोर्ट ‘Wikipedia’s India War’ में कहा गया है, “HAF की छवि बदलने की कोशिश 2021 की शुरुआत में शुरू हुई थी। उसी समय विकिपीडिया के कुछ अत्यधिक सक्रिय एडिटर्स ने HAF, उसके आलोचकों और उससे जुड़े संगठनों के चारों ओर आपस में जुड़े पृष्ठों का एक तंत्र तैयार करना शुरू किया। इनमें TrangaBellam, Kautilya3, Llightex और Shahinshah121 शामिल हैं। वहीं, वेबसाइट के सबसे प्रभावशाली प्रशासकों में शामिल Vanamonde93 कई बार ऐसे हस्तक्षेप करता दिखाई दिया जिससे इस समूह को लाभ होता नजर आया।”

यह भी याद रखने वाली बात है कि वर्ष 2021 में ही हिंदू विरोधी ‘इतिहासकार’ ऑड्रे ट्रुश्के (Audrey Truschke) ने HAF के खिलाफ बड़ा ऑनलाइन अभियान शुरू किया था। उन्होंने HAF पर अमेरिका में ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ को बढ़ावा देने का आरोप लगाया था। मई 2021 में HAF ने ट्रुश्के के खिलाफ मुकदमा भी दायर किया था।

इसी दौरान HAF के विकिपीडिया पृष्ठ पर कथित रूप से कई हिंदू विरोधी एडिटर्स द्वारा नकारात्मक और पक्षपातपूर्ण जानकारी जोड़ी जा रही थी। साथ ही संगठन के खिलाफ नए-नए लेख और सामग्री भी लगातार जोड़ी जा रही थी।

NPOV की रिसर्च में यह भी सामने आया है कि HAF द्वारा ऑड्रे ट्रुश्के, जॉर्ज सोरोस से फंडेड ‘हिंदूज फोर ह्यूमन राइट्स’ (Hindus for Human Rights) और इस्लामी संगठन इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल के खिलाफ मुकदमा दायर करने से लगभग दो महीने पहले ‘TrangaBellam’ ने ट्रुश्के का विकिपीडिया पेज बनाया था। आज भी उस पृष्ठ पर सबसे अधिक योगदान (57% से अधिक) उसी एडिटर का है।

एक ओर HAF के विकिपीडिया पेज पर संगठन के खिलाफ कथित रूप से पक्षपातपूर्ण जानकारी डाली जा रही थी तो वहीं दूसरी ओर ट्रुश्के के विकिपीडिया पेज पर उनके खुद को पीड़ित बताने वाले दावों को प्रमुखता दी जा रही थी। ट्रुश्के X पर अपने पोस्ट में लगातार यह दावा करती रही हैं कि उन्हें ‘हिंदू राष्ट्रवादियों’ से धमकियाँ मिल रही हैं।

दिलचस्प बात यह रही कि विकिपीडिया के संपादकों ने ट्रुश्के द्वारा लिखे गए वाशिंगटन पोस्ट के एक ओपिनियन पोस्ट को इस दावे के ‘स्रोत’ के रूप में इस्तेमाल किया कि ट्रुश्के को ‘हिंदुत्व से जुड़े लोगों’ द्वारा परेशान किया जा रहा था। दूसरा स्रोत ‘हिंदुत्व उत्पीड़न फील्ड मैनुअल’ था जिसे साउथ एशिया स्कॉलर एक्टिविस्ट कलेक्टिव (SASAC) ने तैयार किया था। इस ग्रुप के सह-संस्थापक खुद ट्रुश्के थीं।

यानी ट्रुश्के ने दावा किया कि HAF जैसे हिंदू अधिकार संगठनों द्वारा उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने अपने लेखों और ‘मैनुअल’ में भी यही बातें दोहराईं। इसके बाद विकिपीडिया संपादकों ने उन्हीं दावों को उठाकर उनके विकिपीडिया पेज पर जोड़ दिया। TrangaBellam और अन्य हिंदू विरोधी एडिटर्स ने मूल रूप से ऐसा माहौल तैयार किया कि पेज पढ़ने वाले लोग या तो इन दावों के स्रोत को नजरअंदाज कर दें या यह मान लें कि अगर ट्रुश्के कह रही हैं कि हिंदू उन्हें परेशान कर रहे हैं तो यह सच ही होगा।

NPOV रिपोर्ट के अनुसार, “कुछ ही हफ्तों में Truschke के विकिपीडिया पेज की शुरुआती पंक्तियों में ही लिखा गया कि ‘ट्रुश्के अक्सर हिंदुत्व समर्थकों द्वारा परेशान की जाती रही हैं जो उन पर हिंदू धर्म के प्रति पक्षपातपूर्ण सोच और आपत्तिजनक बयान देने का आरोप लगाते हैं जबकि विद्वान इन आरोपों को खारिज करते हैं।” विकिपीडिया पर ट्रुश्के को हिंदू ‘चरमपंथियों’ द्वारा परेशान किए जाने वाला विवरण 10 जुलाई 2021 को TrangaBellam द्वारा जोड़ा गया था।

रिपोर्ट में आगे बताया गया कि कुछ ही दिनों बाद TrangaBellam ने HAF के पेज पर अपना पहला और सबसे महत्वपूर्ण बदलाव किया। TrangaBellam ने दावा जोड़ा कि HAF द्वारा दायर मुकदमा अकादमिक स्वतंत्रता पर हमला था। इस एडिटर ने HAF के विकिपीडिया पेज पर HAF के खिलाफ कई दावे जोड़े और मंच के नियमों का उल्लंघन करते हुए Hindus for Human Rights की वेबसाइट का हवाला दिया जबकि यह संस्था HAF द्वारा दायर मुकदमे में पक्षकार थी।

TrangaBellam के अलावा Shahinshah121 नाम के एक एडिटर ने ट्रुश्के की नई SASAC वेबसाइट के कई लिंक जोड़े और HAF के पृष्ठ को संपादित करते हुए यह दावे भी जोड़े कि संगठन के कुछ सदस्यों में मुस्लिम विरोधी भावना मौजूद है। इससे पहले 8 जुलाई 2021 को Shahinshah121 ने ट्रुश्के के SASAC के लिए विकिपीडिया पेज बनाने की कोशिश की थी। यह प्रयास SASAC का डोमेन पंजीकृत होने के केवल दो दिन बाद किया गया था। Shahinshah121 ने ऐसे तीन और असफल प्रयास किए।

Shahinshah121 ने HAF के पेज पर 24 बदलाव किए और उसके बाद सबसे अधिक एडिटिड पेज ‘हिंदुत्व’ पर 6 बदलाव किए। इस संपादक के कुल बदलावों का लगभग आधा हिस्सा HAF के पेज पर था जबकि दूसरे नंबर पर ‘हिंदुत्व’ का पेज था। बाकी कामों में Shahinshah121 ने केवल एक-एक बदलाव किए। NPOV विश्लेषण के अनुसार, TrangaBellam, Shahinshah121 और इस समूह के अन्य एडिटर द्वारा किए गए बदलावों ने यह नैरेटिव स्थापित किया कि HAF, RSS से जुड़ा और BJP समर्थक ‘हिंदुत्ववादी चरमपंथी’ संगठन है जो खुद को केवल हिंदू अधिकारों के लिए काम करने वाला संगठन बताता है।

रिपोर्ट में 2025 की एक घटना का जिक्र करते हुए बताया गया कि विकिपीडिया एडिटर्स ने अस्पष्ट पत्रों और सामान्य समाचार रिपोर्टों के आधार पर यह संकेत देने की कोशिश की कि HAF अमेरिकी न्याय विभाग की निगरानी में था। HAF के विकिपीडिया पेज पर लिखा गया, ‘2025 में HAF का नाम न्याय विभाग में की गई एक शिकायत में शामिल किया गया, जिसमें आरोप लगाया गया कि HAF भारत की BJP के बिना पंजीकरण वाले विदेशी एजेंट की तरह काम करता है।”

हालाँकि, असल में खालिस्तान समर्थक ‘फ्रेमोंट गुरुद्वारा साहिब’ ने अमेरिकी न्याय विभाग के माध्यम से एक लॉ फर्म को एक पत्र भेजा था जिसमें ‘विदेशी एजेंट’ वाले दावे किए गए थे। इस घटना को मदर जोन्स, बाज न्यूज और ब्रिटेन के द गार्जियन जैसे प्रोपेगेंडा मीडिया संस्थानों ने भी प्रकाशित किया था।

Shahinshah121 ने इस घटना का जिक्र HAF के विकिपीडिया पेज पर किया लेकिन यह जानकारी नहीं जोड़ी कि अमेरिकी न्याय विभाग ने HAF के खिलाफ किसी जाँच की घोषणा नहीं की थी।

HAF के विकिपीडिया पेज को इस तरह बदलने वाला एक और प्रमुख हिंदू विरोधी एडिटर Kautilya 3 था, जिसने हिंदू अधिकार संगठन को एक भ्रामक राष्ट्रवादी चरमपंथी संगठन की तरह दिखाने के लिए कई महत्वपूर्ण बदलाव किए।

Kautilya3 द्वारा HAF के विकिपीडिया पेज पर लिखा गया, “इस संगठन की नींव हिंदू राष्ट्रवादी संगठन विश्व हिंदू परिषद अमेरिका और उसकी छात्र शाखा हिंदू छात्र परिषद से जुड़ी हुई हैं। इसके आलोचकों के अनुसार, HAF ने ‘हिंदू अधिकारों’ की भाषा में हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे को दोबारा प्रस्तुत किया है ताकि वह अमेरिकी मुख्यधारा की राजनीति में आसानी से फिट हो सके।”

HAF पृष्ठ पर योगदान देने के अलावा Kautilya 3 ने ‘भारतीय अमेरिकी मुस्लिम परिषद’ के विकिपीडिया पेज पर 25.3% लेखन योगदान दिया है। इसके साथ ही, अमेरिका में जातिगत भेदभाव (caste discrimination in the US) वाले विकिपीडिया पृष्ठ का 41.4 प्रतिशत योगदान भी Kautilya 3 के पास है।

Kautilya 3 ब्रिटेन का विकिपीडिया एडिटर उदय रेड्डी है जिसके खिलाफ 2024 में मणिपुर पुलिस ने विभिन्न समुदायों के बीच दुश्मनी फैलाने और मैतेई समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने के आरोप में मामला दर्ज किया था।

2024 में ऑपइंडिया ने एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें बताया गया था कि विकिपीडिया विचारधारा मुक्त और समर्थित हस्तक्षेप से मुक्त ज्ञानकोश नहीं है जैसा कि विकिमीडिया फाउंडेशन का दावा है कि यह दुनिया भर में हजारों स्वतंत्र और उत्साही स्वयंसेवकों की सहायता सेवा है। ऑपइंडिया ने बताया था कि विकिपीडिया के ‘NPOV’ (तटस्थ दृष्टिकोण) दिशा-निर्देशों का मतलब यह नहीं है कि किसी भी लेख में हर तरह के विचारों को समान स्थान मिलेगा।

TrangaBellam, Shahinshah121 और Kautilya 3 के अलावा, हिंदू विरोधी विकिपीडिया एडिटर्स के इस समूह में Vanamonde93 नाम का एक एडिटर भी शामिल है। अन्य हिंदू विरोधी विकिपीडिया बदलावों के अलावा, इसने HAF के पेज पर भी महत्वपूर्ण बदलाव किए थे। खास बात यह है कि Vanamonde93 विकिपीडिया के उन केवल 32 प्रशासकों में शामिल है, जिनके पास एक साथ जाँचकर्ता (checkuser) और निरीक्षणकर्ता (oversighter) दोनों अधिकार मौजूद हैं।

NPOV रिपोर्ट के अनुसार, “16 सितंबर को Vanamonde93 ने एक ऐसा बदलाव किया जो देखने में छोटा था लेकिन उसका असर दूरगामी था। इस एडिटर ने पेज के एक सेक्शन का शीर्षक ‘Alleged Hindu Nationalist Ties’ (कथित हिंदू राष्ट्रवादी संबंध) से बदलकर केवल ‘Hindu nationalist ties’ (हिंदू राष्ट्रवादी संबंध) कर दिया। केवल एक मिनट में यह दावा आरोप से बदलकर स्थापित तथ्य की तरह दिखने लगा।”

साल 2018 में ट्रुश्के ने एक ट्वीट किया था जिसमें उन्होंने भगवान राम को ‘misogynist pig’ (स्त्री द्वेषी सुअर) कहा था। उन्होंने वाल्मीकि रामायण के एक हिस्से का अपने तरीके से अनुवाद करते हुए दावा किया था कि अग्निपरीक्षा वाले प्रसंग में माता सीता ने भगवान राम को ‘misogynist pig’ कहा था।

विवाद बढ़ने के बाद ट्रुश्के ने सफाई दी थी कि उन्होंने केवल बर्कले के संस्कृत विद्वान रॉबर्ट गोल्डमैन द्वारा किए गए अनुवाद का हवाला दिया था। हालाँकि, गोल्डमैन ने ट्रुश्के के इस वर्णन को खारिज करते हुए कड़ा बयान जारी किया था। उन्होंने कहा था, “ट्रुश्के ने ‘किसी भी तरह से हमारे अनुवाद का हवाला नहीं दिया’, और उनकी भाषा ‘अत्यंत अनुचित’ थी।”

सितंबर 2021 में Vanamonde93 ने इस विवाद से जुड़े हिस्से में बदलाव किया। NPOV रिपोर्ट के अनुसार, “उन्होंने गोल्डमैन की प्रतिक्रिया से जुड़े संदर्भ हटा दिए जिसमें ‘चौंकाने वाली और बेहद अनुचित’ भाषा वाला हिस्सा और पूरे विवाद का संदर्भ शामिल था। अपने बदलाव के सारांश में उसने लिखा:- ‘BLP में बिना स्रोत बताए विवादास्पद दावों के लिए यह स्रोत किसी भी तरह से स्वीकार्य कैसे हो सकता है’?”

हाल ही में 23 फरवरी 2026 को Vanamonde93 ने HAF के पेज पर कई बदलाव किए। इस दौरान उसने HAF की कार्यकारी निदेशक सुहाग शुक्ला का वह सार्वजनिक बयान हटा दिया जो ट्रुश्के, H4HR और IAMC के खिलाफ मुकदमे को लेकर दिया गया था। बदलाव के लिए विकिपीडिया की प्राथमिक स्रोतों (primary sources) से जुड़ी नीति का हवाला दिया गया।

NPOV रिपोर्ट में कहा गया, “जनवरी 2021 में Kautilya3 ने इसी नियम का इस्तेमाल करते हुए HAF की सफाई को हटा दिया था। अपने ही मुकदमे पर HAF का खुद का बयान स्वीकार नहीं किया गया लेकिन मुकदमे को अकादमिक स्वतंत्रता पर हमला बताने वाले कार्यकर्ता स्रोत और राय लेख बने रहे।”

NPOV Media की रिपोर्ट में एक अन्य विकिपीडिया एडिटर Llightex की करतूतों का भी खुलासा हुआ है। Llightex ने सुनीता विश्वनाथ के नेतृत्व वाले हिंदू विरोधी संगठन, हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स (H4HR) का पेज बनाया था और पहले वहीं काम करता था। Llightex ने केवल H4HR का ही नहीं बल्कि IAMC के पेज को भी एडिट किया। HAF मुकदमे के दौरान सुनीता विश्वनाथ का अलग विकिपीडिया पेज भी बनाया गया। मुकदमा खत्म होने के बाद Llightex ने HAF के पृष्ठ में भी बदलाव किए जिससे हिंदू अधिकार संगठन को और अधिक नकारात्मक रूप में दिखाया गया।

HAF की कार्यकारी निदेशक ने विकिपीडिया पेज में बदलाव को बताया ‘अंदरूनी साजिश’

HAF की कार्यकारी निदेशक सुहाग शुक्ला ने HAF के विकिपीडिया पेज में की गई एडिटिंग और बदलावों को ‘अंदरूनी साजिश’ बताया है। NPOV Media की रिपोर्ट सामने आने के बाद प्रतिक्रिया देते हुए सुहाग शुक्ला ने कहा कि संगठन के विकिपीडिया पेज को खराब करने और उसकी पहचान बदलने का काम ‘भीतर’ से किया गया।

सुहाग शुक्ला ने X पर लिखा, “यह एक ‘अंदरूनी काम’ था। हमने पिछले 5 वर्षों से अपने विकिपिडया पृष्ठ को पूरी तरह खराब होते देखा है जिससे संगठन की असली पहचान ही बदल गई। एशले रिंड्सबर्ग और NPOV Media की यह जाँच उस चीज का पर्दाफाश करती है जो HAF पर 4 एडिटर्स के एक समूह द्वारा सुनियोजित हमला लगता है, जिनमें से दो का संबंध ट्रुश्के और ‘हिंदूज फोर ह्यूमन राइट्स’ जैसे संगठन से जुड़ा दिखाई देता है।”

HAF के विकिपीडिया पृष्ठ को खराब करने में चार एडिटर्स की भूमिका को लेकर शुक्ला ने लिखा, “Trangabellam, Kautilya3, Lightex और Shainshah121 HAF के विकिपीडिया पेज की 80% सामग्री के लिए जिम्मेदार हैं। ये लोग कौन हैं? Trangabellam ने ट्रुश्के का विकिपीडिया पृष्ठ बनाया, उसे प्रोटेक्ट किया और उसे आकार दिया जबकि HAF के पेज पर बिना प्रमाण वाले आरोप जोड़े। Lightex ने खुद स्वीकार किया कि वह पहले ‘हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स” के साथ काम कर चुका है, उस समूह का विकिपीडिया पृष्ठ बनाया (जो विकिपीडिया के अपने नियमों के खिलाफ था) और फिर HAF के पृष्ठ को बदलते हुए उसे ‘अति राष्ट्रवादी संगठन’के रूप में दिखाने की कोशिश की।”

शुक्ला ने आगे लिखा, “Shahinshah121 ने HAF के खिलाफ यह आरोप जोड़े कि यह ‘हिंदुत्व’ से जुड़ा है और ‘विदेशी एजेंट के रूप में काम करने के मामले में अमेरिकी न्याय विभाग की जाँच के दायरे में है।’ साथ ही, साउथ एशियन स्कॉलर्स कलेक्टिव बनने के कुछ ही घंटों के भीतर ट्रुश्के के इस समूह को बढ़ावा दिया गया। HAF पेज के दूसरे सबसे सक्रिय संपादक Kautilya3 ने उन सभी जानकारियों को हटा दिया जो आरोपों पर HAF का पक्ष दिखाती थीं जिनमें यह बात भी शामिल थी कि ‘HAF का विभिन्न विदेशी संगठनों से कोई संबंध नहीं है’। इसके बाद उसने जोड़ा कि ‘HAF ने अमेरिकी मुख्यधारा की राजनीति के अनुरूप खुद को ढालने के लिए हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे को हिंदू अधिकारों की भाषा में दोबारा पेश किया है’।”

Wikipedia निष्पक्ष नहीं बल्कि पक्षपातपूर्ण है: OpIndia की रिसर्च में क्या सामने आया?

साल 2024 में ऑपइंडिया ने एक विस्तृत दस्तावेज जारी किया था जिसमें बताया गया था कि विकिपीडिया वैसा मुक्त और संपादकीय हस्तक्षेप से मुक्त ज्ञानकोश नहीं है, जैसा विकिमीडिया फाउंडेशन दावा करता है। विकिमीडिया फाउंडेशन का कहना रहा है कि विकिपीडिया दुनिया भर के हजारों निःशुल्क और उत्साही स्वयंसेवकों के योगदान से चलता है।

ऑपइंडिया की शोध रिपोर्ट में सामने आया कि विकिपीडिया की संरचना ही ऐसी है जिसमें कुछ गिने-चुने लोगों को अत्यधिक अधिकार दिए गए हैं। इन लोगों को ‘administrators’ कहा जाता है। पूरी दुनिया में केवल 435 सक्रिय administrators हैं जिनके पास एडिटर्स को प्रतिबंधित करने, स्रोतों को ब्लैकलिस्ट करने, योगदानकर्ताओं को रोकने और किसी लेख में क्या बदलाव किए जाएँ या हटाए जाएँ, यह तय करने की शक्ति होती है।

ऑपइंडिया द्वारा यह दस्तावेज जारी किए जाने के कुछ समय बाद फेसबुक ने भी इस रिपोर्ट को प्रतिबंधित कर दिया। फेसबुक पर पहले भी अमेरिका में चुनावी हस्तक्षेप और एक खास विचारधारा के राजनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के आरोप लगते रहे हैं।

विकिपीडिया एक ऐसा बिचौलिया होने का दावा करता है जो बिना किसी कंटेंट दखल और एडिटोरियल लाइन के लोगों की समझ पर निर्भर करता है, ‘भरोसेमंद सोर्स’ पर आधारित है और न्यूट्रल नज़रिया बनाए रखता है। हालांकि, यह सच से बहुत दूर है, जैसा कि ऑपइंडिया रिसर्च में साबित हुआ है। विकिपीडिया पब्लिशर्स के सभी स्टैंडर्ड को पूरा करता है। वे मौजूदा और ऐतिहासिक घटनाओं पर जानकारी इकट्ठा करते हैं, वे अपने एडिटर्स और एडमिनिस्ट्रेटर्स को पेमेंट करते हैं और इंटरनेट पर आम लोग उन्हें आसानी से एक्सेस कर सकते हैं।

ऑपइंडिया की एडिटर-इन-चीफ नूपुर जे शर्मा के द्वारा किए गए रिसर्च पेपर के नतीजों से पता चलता है कि भारत में ऑफिस या मौजूदगी न होने के बावजूद, विकिपीडिया देश में अपने बिजनेस और सोच के फायदे के लिए भारत विरोधी सोच वाली संस्थाओं और लोगों को फंडिंग कर रहा है और यहाँ तक ​​कि इस्लामिस्ट और खालिस्तानियों से भी जुड़ा है। विकिपीडिया न सिर्फ भारत से डोनेशन के रूप में फंड इकट्ठा करता है बल्कि भारत में लाखों डॉलर खर्च भी करता है और पूरी तरह से एकतरफा और सख्त एडिटोरियल लाइन पर चलता है जबकि यह सब एक बिचौलिया होने का दावा करता है पब्लिशर नहीं ताकि भारतीय कानून के सामने किसी भी जवाबदेही से बच सके।

विकिपीडिया को पब्लिशर घोषित करने के अलावा, ऑपइंडिया ने यह भी सिफारिश की कि विकिपीडिया के फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन की जाँच की जाए। ऑपइंडिया का ‘भारत पर विकिपीडिया का युद्ध’ (Wikipedia’s War on India) डोजियर यहाँ पढ़ा जा सकता है।

विकिपीडिया के सह-संस्थापक जिम्मी वेल्स ने एक बार कहा था कि विकिपीडिया का उद्देश्य ‘मानव ज्ञान के पूरे संग्रह को सभी लोगों के लिए उपलब्ध कराना’ है। लेकिन आज यह उद्देश्य शर्तों वाला दिखाई देता है क्योंकि ज्ञान को तभी जगह मिलती है, जब वह किसी खास राजनीतिक विचारधारा के अनुरूप हो। ‘Neutral Point of View’ यानी निष्पक्ष दृष्टिकोण का नियम भी कमजोर पड़ गया है क्योंकि निष्पक्षता अब इस बात पर निर्भर दिखती है कि चर्चा में किन स्रोतों को शामिल होने की अनुमति मिलती है।

जैसा कि ऑपइंडिया के डॉसियर में कहा गया, “यदि विश्वसनीय स्रोतों का समूह ही वैचारिक पक्षपात से प्रभावित हो, तो ‘न्यूट्रल पॉइंट ऑफ व्यू’ सिर्फ एक जरूरत रह जाती है जिसमें वामपंथी विचारधारा के अलग-अलग रूपों को प्रमुखता मिलती है।”

हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन के पेज से लेकर बंगाल फाइल्स, द कश्मीर फाइल्स, द केरल स्टोरी, धुरंधर, ऑपइंडिया और हाल में बने कॉकरोच जनता पार्टी जैसे ऑनलाइन अभियान तक विकिपीडिया ऐसे हिंदू विरोधी और भारत विरोधी इस्लामो-वामपंथी समूहों को मंच दे रहा है जो अपनी वैचारिक सोच के आधार पर व्यक्तियों और संस्थाओं के पेज बना रहे हैं, बदल रहे हैं या उन्हें एक खास रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं जबकि विकिपीडिया खुद को बिना संपादकीय हस्तक्षेप वाला ज्ञानकोश बताता है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

राहुल गाँधी जिस इमरजेंसी के नाम पर डरा रहे हैं, क्या भारत के मौजूदा हालात में वो संभव है? जानिए संवैधानिक प्रक्रिया और इमरजेंसी लागू करने के सभी रास्ते

बीते कुछ समय से देश की राजनीति में एक अजीब सा डर का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। कॉन्ग्रेस पार्टी और विशेषकर राहुल गाँधी लगातार जनता के बीच जाकर यह नैरेटिव सेट करने में जुटे हैं कि देश में ‘इमरजेंसी’ (आपातकाल) आने वाली है, लोकतंत्र खतरे में है और संविधान को कुचला जा रहा है।

राहुल गाँधी सार्वजनिक मंचों से, प्रेस कॉन्फ्रेंस में और अपनी रैलियों में बार-बार देश की जनता को यह कहकर डरा रहे हैं कि भारत एक बार फिर 1975 के काले दौर की तरफ बढ़ रहा है। लेकिन यहाँ सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह उठता है कि क्या सचमुच आज के भारत में इमरजेंसी लगाना संभव है? या फिर राहुल गाँधी और उनकी पार्टी सिर्फ एक कोरी अफवाह फैलाकर, देश के भीतर अशांति और अविश्वास का माहौल पैदा करना चाहती है?

जब हम भारतीय संविधान, वर्तमान आर्थिक स्थिति और देश की न्यायपालिका के कड़े नियमों को देखते हैं, तो राहुल गाँधी का यह दावा पूरी तरह से खोखला, अतार्किक और हास्यास्पद नजर आता है। आज के मजबूत और डिजिटल भारत में किसी भी सरकार के लिए मनमाने ढंग से आपातकाल लागू करना नामुमकिन है।

अगर ऐसा हो तो फिर राहुल गाँधी ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्या वो देश की जनता को भड़काकर, विदेशी ताकतों के इशारे पर भारत को गृहयुद्ध की तरफ ढकेलने की साजिश रच रहे हैं? क्या अपने राजनीतिक फायदे के लिए देश में अराजकता फैलाना सीधे-सीधे देश के साथ गद्दारी नहीं है? आइए इस पूरे विषय को संवैधानिक प्रक्रिया, इतिहास और वर्तमान वैश्विक और राष्ट्रीय हालातों के चश्मे से विस्तार से समझते हैं।

कितने प्रकार की होती है इमरजेंसी और क्या हैं संवैधानिक रास्ते?

सबसे पहला और बुनियादी सवाल तो यह है कि राहुल गाँधी जिस इमरजेंसी का डर दिखा रहे हैं, वो आखिर कौन सी इमरजेंसी है? हमारे भारतीय संविधान में आपातकाल से जुड़े बेहद स्पष्ट और कड़े प्रावधान दिए गए हैं। अगर हम राज्यों में लगने वाले राष्ट्रपति शासन (स्टेट इमरजेंसी) को थोड़ी देर के लिए अलग रख दें, तो देश के स्तर पर मुख्य रूप से दो अलग-अलग प्रकार की इमरजेंसी का जिक्र संविधान में मिलता है। संविधान निर्माताओं ने इसके लिए बकायदा कानून तय किए हैं, जो इस प्रकार हैं:

आर्थिक आपातकाल (अनुच्छेद 360): संविधान की धारा यानी अनुच्छेद 360 के तहत देश में आर्थिक आपातकाल (Financial Emergency) लगाने का प्रावधान है। यह आपातकाल तब लगाया जाता है जब देश की वित्तीय स्थिरता, साख या आर्थिक ढांचा पूरी तरह से तबाह होने की कगार पर पहुँच जाए।

राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352): संविधान का अनुच्छेद 352 राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency) से जुड़ा है। यह आपातकाल बेहद असाधारण और गंभीर परिस्थितियों में ही लगाया जा सकता है। इसके तहत देश की सुरक्षा और संप्रभुता सर्वोपरि होती है।

इन दोनों धाराओं के अलावा राज्यों में संवैधानिक तंत्र विफल होने पर अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है, जिसे आम बोलचाल में स्टेट इमरजेंसी कहा जाता है। लेकिन राहुल गाँधी जिस देशव्यापी आपातकाल का हौव्वा खड़ा कर रहे हैं, उसके लिए केवल अनुच्छेद 352 या 360 का ही सहारा लिया जा सकता है।

अब चलिए देखते हैं कि क्या आज इन दोनों में से किसी भी धारा को लागू करने की 1% भी गुंजाइश देश में बची है?

क्या देश में आर्थिक इमरजेंसी संभव है?

आर्थिक आपातकाल यानी अनुच्छेद 360 को लागू करने के लिए देश की वित्तीय स्थिति का पूरी तरह से वेंटिलेटर पर होना जरूरी है। इसका इस्तेमाल तब किया जा सकता है जब देश की तिजोरी (ट्रेजरी) खाली हो जाए, सरकार के पास अपने कर्मचारियों को सैलरी देने के पैसे न बचें, देश में अनाज और भुखमरी का संकट आ जाए, या देश पूरी तरह दिवालिया हो जाए। ऐसी भयावह स्थिति में ही देश की रक्षा और संतुलन बनाए रखने के लिए ट्रेजरी पर बैन लगाया जाता है और राष्ट्रपति आर्थिक आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं।

वैसे, फिलहाल भारत के इतिहास को उठाकर देखिए। भारत ने अपने जीवनकाल में बड़े से बड़े आर्थिक संकटों का सामना किया है। साल 1991 का वो दौर याद कीजिए, जब भारत की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि देश को अपना सोना तक विदेशी बैंकों में गिरवी रखना पड़ा था।

खाड़ी युद्ध (Gulf War) की वजह से दुनिया भर में तेल का संकट था, भारत को पेट्रोल-डीजल नहीं मिल पा रहा था, देश में विदेशी मुद्रा का भारी अकाल था और अनाज की किल्लत थी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भारत को आसानी से पैसा देने से मना कर दिया था। भारत की खराब से खराब और सबसे दयनीय हालत में भी देश के कर्णधारों ने कभी अनुच्छेद 360 यानी आर्थिक आपातकाल का इस्तेमाल नहीं किया।

आज जब हम 2026 के भारत को देखते हैं, तो स्थिति 1991 के बिल्कुल विपरीत और स्वर्णिम है। आज भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया के लिए एक मिसाल बनी हुई है। भारत पूरी दुनिया में इकलौता ऐसा देश बनकर उभरा है, जिसके पास ऐतिहासिक रूप से बेहद मजबूत और विशाल विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) मौजूद है। दुनिया की तमाम बड़ी और प्रतिष्ठित रेटिंग एजेंसियाँ, वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ चीख-चीखकर कह रहे हैं कि भारत में आर्थिक समस्या दूर-दूर तक नहीं दिखती। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है।

ऐसे दौर में राहुल गाँधी का यह कहना कि देश में आर्थिक तानाशाही या संकट आने वाला है, समझ से परे है। क्या आज देश में ट्रेजरी बैन होने जा रही है? क्या सरकारी कर्मचारियों की सैलरी रुकने वाली है? क्या देश में अनाज की कमी है? जवाब है- बिल्कुल नहीं। जब देश आर्थिक रूप से महाशक्ति बनने की राह पर है, तो आर्थिक आपातकाल का डर दिखाना देश की जनता की बुद्धिमत्ता का अपमान करना है।

अनुच्छेद 352: क्या कॉन्ग्रेस देश को गृहयुद्ध की तरफ ढकेल रही है?

अब बात करते हैं दूसरी बड़ी धारा की, जिसके दम पर देशव्यापी इमरजेंसी लगाई जा सकती है वह है अनुच्छेद 352। संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति इस धारा का उपयोग केवल दो ही सूरतों में कर सकते हैं: या तो भारत पर किसी विदेशी शत्रु ने आक्रमण कर दिया हो (बाहरी युद्ध), या फिर देश के भीतर सशस्त्र विद्रोह यानी गृहयुद्ध (Civil War) जैसी स्थिति पैदा हो गई हो, जिससे देश की सुरक्षा पूरी तरह खतरे में आ गई हो।

यहाँ राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस से देश की जनता को बहुत सीधे और कड़े सवाल पूछने की जरूरत है। राहुल गाँधी जिस इमरजेंसी का जिक्र करके देश के युवाओं, अल्पसंख्यकों और आम नागरिकों को डरा रहे हैं, क्या उनके पास ऐसी कोई गुप्त सूचना है कि भारत पर कोई विदेशी ताकत हमला करने वाली है? क्या चीन या पाकिस्तान भारत पर कोई बड़ा आक्रमण करने जा रहे हैं, जिसकी जानकारी सिर्फ राहुल गाँधी को है? अगर नहीं, तो फिर वह किस आधार पर आपातकाल का भय पैदा कर रहे हैं?

अगर विदेशी आक्रमण की कोई आशंका नहीं है, तो इसका दूसरा सीधा और खतरनाक मतलब यह निकलता है कि क्या राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस खुद देश के भीतर गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं? क्या वे देश की जनता को भड़काकर, समाज में जाति, धर्म और वर्ग के नाम पर ऐसी नफरत फैलाना चाहते हैं जिससे कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाए? क्या वे चाहते हैं कि देश में दंगे हों, हिंसा हो और सरकार के हाथ से नियंत्रण पूरी तरह निकल जाए, ताकि सरकार मजबूर होकर आपातकाल की घोषणा कर दे?

अगर ऐसा है, तो यह बेहद गंभीर और चिंताजनक मामला है। जिस तरह हमारे पड़ोसी देशों जैसे बांग्लादेश, श्रीलंका या पाकिस्तान में जनता को उकसाकर, सड़कों पर हिंसा करवाकर तख्तापलट और अराजकता का माहौल पैदा किया गया, क्या ठीक वैसा ही टूलकिट भारत में भी लागू करने की कोशिश की जा रही है?

राहुल गाँधी अक्सर विदेशी दौरों पर जाकर भारत के लोकतंत्र को कमतर आँकते हैं और विदेशी ताकतों से हस्तक्षेप की गुहार लगाते दिखते हैं। देश में झूठ का ऐसा नैरेटिव फैलाना जो लोगों को सरकार और संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ हिंसक होने के लिए उकसाए, देशद्रोह की श्रेणी में आता है। अगर कॉन्ग्रेस और उनके नेता जानबूझकर देश को गृहयुद्ध की आग में झोंकने की कोशिश कर रहे हैं, तो वक्त आ गया है कि उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए और उनकी गद्दारी का पर्दाफाश किया जाए।

साल 1978 का संविधान संशोधन: अब मनमानी मुमकिन नहीं

राहुल गाँधी शायद यह भूल जाते हैं कि आज का भारत 1975 का भारत नहीं है, जब उनकी दादी इंदिरा गाँधी ने आधी रात को बिना कैबिनेट की लिखित मंजूरी के सिर्फ अपनी सत्ता बचाने के लिए पूरे देश को जेलखाना बना दिया था। 1975 में इंदिरा गाँधी ने आंतरिक अशांति के नाम पर जो आपातकाल लगाया था, उसकी कड़वी यादें आज भी देश के जेहन में ताजा हैं। लेकिन उस काले दौर के बाद देश के संविधान को और अधिक अभेद्य और मजबूत बनाया गया।

साल 1978 में संविधान में 44वाँ संशोधन (44th Constitutional Amendment) किया गया। इस संशोधन ने सरकार की मनमानी शक्तियों पर हमेशा के लिए लगाम लगा दी। इस कानून के तहत यह अनिवार्य कर दिया गया कि-

  • आपातकाल लगाने के लिए केवल प्रधानमंत्री की सलाह काफी नहीं होगी, बल्कि पूरी कैबिनेट की ‘लिखित मंजूरी’ राष्ट्रपति को देनी होगी।
  • ‘आंतरिक अशांति’ शब्द को हटाकर उसकी जगह ‘सशस्त्र विद्रोह’ (Armed Rebellion) शब्द जोड़ा गया, ताकि कोई भी सरकार राजनीतिक विरोध को दबाने के लिए इमरजेंसी न लगा सके।
  • सबसे महत्वपूर्ण बात अगर सरकार संसद से आपातकाल को मंजूरी दिलवा भी देती है, तो भी हमारी न्यायपालिका यानी सुप्रीम कोर्ट के पास उसका ज्यूडिशियल रिव्यू (Judicial Review – न्यायिक पुनरावलोकन) करने का पूरा अधिकार होगा।

इंदिरा गाँधी के समय न्यायपालिका के हाथ बंधे हुए थे, लेकिन आज ऐसा नहीं है। अगर आज की तारीख में कोई भी सरकार मनमाने ढंग से आर्थिक या राष्ट्रीय आपातकाल लगाने की हिमाकत करती है, तो न्यायपालिका तुरंत उसका रिव्यू करेगी। कोर्ट में सरकार को देश के सारे आर्थिक आँकड़े, खुफिया रिपोर्ट और पुख्ता सबूत सामने रखने होंगे कि आपातकाल क्यों लगाया गया।

चूँकि आज देश में आपातकाल लगाने की 0.1% आशंका या आधार भी मौजूद नहीं है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ऐसी किसी भी कोशिश को एक मिनट में असंवैधानिक घोषित कर खारिज कर देगा। आज के समय में देश में आपातकाल लगाना कानूनी और संवैधानिक रूप से लगभग असंभव हो चुका है।

अनुच्छेद 356 का इतिहास और कॉन्ग्रेस का दोहरा चरित्र

आपातकाल और लोकतंत्र की दुहाई देने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी का अपना इतिहास लोकतांत्रिक मूल्यों का गला घोटने से भरा पड़ा है। अतीत में केंद्र की कॉन्ग्रेस सरकारों ने संविधान की धारा 356 (राष्ट्रपति शासन) का सबसे ज्यादा और सबसे गंदे तरीके से दुरुपयोग किया। जब भी केंद्र में कॉन्ग्रेस की सरकार होती थी और किसी राज्य में विपक्षी दल की सरकार बनती थी, तो गवर्नर के माध्यम से बहुत ही आसानी से चुनी हुई राज्य सरकारों को गिरा दिया जाता था और वहाँ इमरजेंसी (राष्ट्रपति शासन) थोप दी जाती थी।

इतिहास गवाह है कि कॉन्ग्रेस ने देश भर में करीब 90 से 100 बार अलग-अलग राज्यों की चुनी हुई लोकप्रिय सरकारों को ताश के पत्तों की तरह बिखेर दिया। अकेले इंदिरा गाँधी के कार्यकाल में दर्जनों बार इस धारा का दुरुपयोग हुआ। लेकिन आज के दौर में क्या यह संभव है?

एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994): इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद अब अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग भी पूरी तरह से बंद हो चुका है। अब अगर केंद्र सरकार किसी एक राज्य में भी दुर्भावना से धारा 356 का इस्तेमाल करती है, तो ज्यूडिशियल रिव्यू के सामने केंद्र को मुँह की खानी पड़ती है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार अवैध रूप से गिराई गई राज्य सरकारों को दोबारा बहाल करके यह साबित किया है कि अब केंद्र की तानाशाही नहीं चलेगी।

जब आज एक छोटे से राज्य में भी धारा 356 लगाना इतना मुश्किल और कानूनी पेचीदगियों से भरा है, तो फिर राहुल गाँधी पूरे देश में धारा 352 और 360 के तहत बड़ी इमरजेंसी लगने का डर कैसे दिखा सकते हैं? यह जानते हुए भी कि कानूनी तौर पर यह असंभव है, वे लगातार झूठ क्यों बोल रहे हैं?

क्या राहुल गाँधी के खिलाफ कानूनी एक्शन का समय आ गया है?

पूरे मामले का लब्बोलुआब यह है कि संवैधानिक, आर्थिक और कानूनी रूप से आज के भारत में किसी भी प्रकार की इमरजेंसी का दूर-दूर तक कोई वजूद या अंदेशा नहीं है। भारत आर्थिक रूप से समृद्ध है, देश की सीमाएँ सुरक्षित हैं और न्यायपालिका पूरी तरह स्वतंत्र और सतर्क है। ऐसे में राहुल गाँधी का इमरजेंसी वाला राग सिर्फ और सिर्फ एक राजनीतिक एजेंडा है, जिसका मकसद देश के भीतर असंतोष पैदा करना और वैश्विक मंच पर भारत की छवि को खराब करना है।

राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस पाने के लिए देश की जनता को एक काल्पनिक डर का शिकार बना रही है। जब आप बिना किसी ठोस आधार के जनता को लगातार यह विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि उनके अधिकार छीने जा रहे हैं, तो आप अनजाने में या जानबूझकर उन्हें अराजकता की तरफ धकेल रहे होते हैं। यह ठीक वैसा ही खतरनाक खेल है जैसा हमारे पड़ोसी देशों में देखा गया, जहाँ अफवाहों और प्रायोजित आंदोलनों के दम पर पूरे देश को बर्बाद कर दिया गया।

अपने ही देश की सेना, न्यायपालिका, चुनाव आयोग और संसद पर अविश्वास जताना और जनता को विद्रोह के लिए उकसाने का प्रयास करना देशहित के खिलाफ है। यदि राहुल गाँधी के पास अपने दावों को साबित करने के लिए कोई संवैधानिक या तार्किक आधार नहीं है, तो देश की सुरक्षा एजेंसियों और कानूनी संस्थाओं को इस गंभीर झूठ का संज्ञान लेना चाहिए।

देश को गुमराह करने, समाज को बाँटने और भारत को गृहयुद्ध की तरफ ढकेलने की इस खतरनाक राजनीतिक गद्दारी के खिलाफ अब सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी बेहद जरूरी है, ताकि भविष्य में कोई भी नेता अपने निजी स्वार्थ के लिए देश की शांति और सुरक्षा से खिलवाड़ न कर सके।

विवादों में ‘कॉकरोचों’ का 6 जून का प्रदर्शन, दिपके ने माना- ‘नहीं ली प्रोटेस्ट की परमिशन’: समझें- SC का फैसला, 7 दिन वाला नियम और पूरा कानूनी ढाँचा

दिल्ली के जंतर-मंतर पर 6 जून 2026 को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हो रही है। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने अमेरिका से भारत लौटकर यहाँ प्रदर्शन करने की घोषणा की है।

लेकिन विवाद इस बात को लेकर खड़ा हो गया है कि प्रदर्शन की घोषणा के बावजूद पार्टी ने दिल्ली पुलिस को पहले से लिखित सूचना नहीं दी और न ही अनुमति लेने की प्रक्रिया पूरी की। CJP का कहना है कि जंतर-मंतर एक निश्चित विरोध स्थल है, इसलिए वहाँ प्रदर्शन के लिए अलग से अनुमति की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जारी एक वीडियो में समर्थकों से अपील की थी कि वे उनके भारत पहुँचने पर दिल्ली एयरपोर्ट पर जुटें और वहाँ से संसद मार्ग थाने तक मार्च करते हुए जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करें।

दिपके ने इसे ‘शांतिपूर्ण’ और ‘संवैधानिक’ विरोध बताया था। हालाँकि इसी घोषणा के साथ यह सवाल भी उठने लगा कि क्या प्रस्तावित प्रदर्शन के लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया है और क्या दिल्ली पुलिस को इसकी पूर्व सूचना दी गई है।

यहीं से सवाल उठता है कि आखिर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने का वास्तविक नियम क्या है? क्या कोई भी संगठन सीधे पहुँचकर धरना या प्रदर्शन शुरू कर सकता है या फिर इसके लिए पहले से पुलिस की मंजूरी जरूरी होती है? इस पूरे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट के फैसले और दिल्ली पुलिस के नियमों को समझना जरूरी हो जाता है।

जंतर-मंतर क्यों बना देश का प्रमुख प्रदर्शन स्थल?

दिल्ली का जंतर-मंतर कई दशकों से देशभर के आंदोलनों, धरनों और विरोध प्रदर्शनों का केंद्र रहा है। संसद और केंद्रीय मंत्रालयों के नजदीक होने के कारण विभिन्न संगठन अपनी माँगों को सरकार तक पहुँचाने के लिए यहाँ जुटते रहे हैं।

हालाँकि समय के साथ स्थानीय निवासियों ने शोर, यातायात बाधा और सुरक्षा संबंधी समस्याओं की शिकायतें उठाईं। इसके बाद राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने 2017 में यहाँ प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

जुलाई 2018 में मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है। लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है और इस पर सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा तथा अन्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ, जुलाई 2018 के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला

यह मामला तब शुरू हुआ था जब 2017 में मजदूर किसान शक्ति संगठन ने दिल्ली पुलिस द्वारा धारा 144 के तहत लगाए गए प्रतिबंधों और NGT के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें जंतर-मंतर रोड पर प्रदर्शनों पर लगभग पूर्ण रोक लगा दी गई थी। स्थानीय निवासियों ने शोर, ट्रैफिक जाम और अन्य असुविधाओं की शिकायतें की थीं, जिसके बाद यह विवाद अदालत तक पहुँचा था।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। साथ ही यह भी कहा कि प्रदर्शनकारियों के अधिकार और स्थानीय लोगों के जीवन एवं शांति के अधिकार के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। अदालत ने दिल्ली पुलिस को प्रदर्शनों के लिए विस्तृत दिशानिर्देश तैयार करने का निर्देश दिया और यह भी कहा कि ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें प्रदर्शन से पहले पुलिस को लिखित रूप से सूचित किया जाए।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए क्या प्रक्रिया है?

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दिल्ली पुलिस ने 2018 में जंतर-मंतर और अन्य निर्धारित स्थानों पर प्रदर्शन के लिए दिशानिर्देश लागू किए।

इन दिशानिर्देशों के अनुसार:

  • प्रदर्शन या सार्वजनिक कार्यक्रम के लिए पहले से लिखित आवेदन देना होता है।
  • आवेदन नई दिल्ली जिला पुलिस के संबंधित अधिकारी को दिया जाता है।
  • प्रस्तावित कार्यक्रम से कम से कम 7 दिन पहले आवेदन देना आवश्यक होता है।
  • पुलिस, ट्रैफिक विभाग, विशेष शाखा और अन्य एजेंसियाँ सुरक्षा एवं कानून-व्यवस्था के पहलुओं की समीक्षा करती हैं।
  • स्थान की उपलब्धता और सुरक्षा मूल्यांकन के बाद ही अनुमति दी जाती है।
  • एक से अधिक आवेदन होने पर प्राथमिकता पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर तय की जा सकती है।
  • सुरक्षा कारणों, VIP मूवमेंट या अन्य आपात परिस्थितियों में अनुमति बाद में भी रद्द की जा सकती है।

दिल्ली पुलिस लंबे समय से यह कहती रही है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए पूर्व अनुमति और पूर्व सूचना आवश्यक है। इसलिए पूर्व अनुमति की व्यवस्था कोई नया नियम नहीं बल्कि कई वर्षों से लागू कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है।

अभिजीत दिपके और आम आदमी पार्टी से जुड़ाव

अभिजीत दिपके का नाम पहले भी राजनीतिक अभियानों से जुड़ता रहा है। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार वह 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी (AAP) के सोशल मीडिया और डिजिटल प्रचार तंत्र से जुड़े रहे थे।

उन्हें उन लोगों में गिना जाता था जो सोशल मीडिया कंटेंट, मीम्स, वीडियो और डिजिटल कैंपेन तैयार करने में भूमिका निभाते थे। दिपके का नाम AAP की चुनावी वॉर-रूम और सोशल मीडिया समन्वय गतिविधियों से भी जोड़ा जाता रहा है।

इंटरव्यू में उन्होंने युवाओं और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं तक पहुँचने की रणनीतियों पर भी चर्चा की थी। सोशल मीडिया पर उनके राजनीतिक विचार भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। यही कारण है कि आलोचकों का कहना है कि दिल्ली में प्रदर्शनों से जुड़े नियमों और अनुमति प्रक्रिया से दिपके पूरी तरह अनजान नहीं हो सकते।

दिलचस्प बात यह भी है कि वर्ष 2020 में AAP की नेता आतिशी समेत अन्य नेताओं ने प्रदर्शन संबंधी अनुमति के मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था। उस दौरान दिल्ली पुलिस ने अदालत में दाखिल हलफनामे में 2018 के उन्हीं दिशानिर्देशों का हवाला दिया था, जिनके तहत जंतर-मंतर समेत संवेदनशील स्थानों पर प्रदर्शन के लिए पूर्व लिखित आवेदन आवश्यक बताया गया था।

क्या कॉकरोच जनता पार्टी ने इन नियमों का पालन किया?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कॉकरोच जनता पार्टी ने 6 जून 2026 के प्रदर्शन की घोषणा तो कर दी लेकिन प्रदर्शन से पहले आवश्यक अनुमति लेने की प्रक्रिया पूरी नहीं की थी।

विवाद तब और बढ़ गया जब बुधवार (3 जून 2026) को पत्रकार अजीत अंजुम को दिए एक इंटरव्यू में अभिजीत दिपके ने स्वयं स्वीकार किया कि उन्होंने प्रदर्शन के लिए पुलिस से अनुमति नहीं ली है। जब उनसे पूछा गया कि क्या आवश्यक अनुमति प्राप्त कर ली गई है, तो उन्होंने सीधे ‘नहीं’ में जवाब दिया।

बातचीत के दौरान जब उन्हें बताया गया कि आयोजकों को आमतौर पर पहले से आवेदन देकर प्रतिभागियों की संख्या, समय और अन्य विवरण उपलब्ध कराने होते हैं, तब दिपके ने कहा कि वह प्रदर्शन वाले दिन ही पुलिस स्टेशन जाकर अनुमति माँगेंगे।

जब उनसे पूछा गया कि पहले से आवेदन क्यों नहीं किया गया, तो उनका जवाब था, “हम अपने तरीके से काम करना चाहते हैं और उसी पर कायम रहेंगे।” एक अन्य सवाल पर उन्होंने कहा कि यदि जरूरत पड़ी तो वह अनुमति मिलने तक पुलिस स्टेशन में इंतजार करेंगे।

इन बयानों के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई कि यदि प्रदर्शन को शांतिपूर्ण और संवैधानिक बताया जा रहा है, तो स्थापित कानूनी प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं किया जा रहा।

CJP प्रवक्ताओं ने भी उठाए अनुमति व्यवस्था पर सवाल

3 जून 2026 को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में CJP के प्रवक्ताओं ने पूर्व अनुमति की आवश्यकता पर भी सवाल उठाए। पार्टी प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि यदि प्रदर्शन के लिए पहले से आवेदन करना पड़े, अनुमति न मिले और फिर अदालतों का दरवाजा खटखटाना पड़े, तो ऐसी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि जंतर-मंतर पर कुछ घंटों के लिए नारे लगाकर वापस लौट जाना लोकतांत्रिक विरोध की प्रभावी संस्कृति नहीं हो सकती। इन बयानों के बाद यह चर्चा और तेज हो गई कि पार्टी मौजूदा कानूनी ढाँचे के भीतर प्रदर्शन करना चाहती है या उसी ढाँचे को चुनौती देना उसकी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है।

क्या सिर्फ निश्चित विरोध स्थल होने से अनुमति की जरूरत खत्म हो जाती है?

नहीं। यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। जंतर-मंतर को प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थान माना जाता है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई भी संगठन बिना सूचना और बिना अनुमति के वहाँ कार्यक्रम कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं अपने फैसले में कहा था कि प्रदर्शन को नियंत्रित और विनियमित तरीके से आयोजित किया जाना चाहिए तथा पुलिस पूर्व अनुमति संबंधी व्यवस्था बना सकती है। यानी जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का अधिकार है लेकिन वह नियमों और प्रशासनिक प्रक्रिया के अधीन है।

अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी

लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन एक महत्वपूर्ण अधिकार है और सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे मौलिक अधिकार माना है। लेकिन अदालत ने साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि यह अधिकार असीमित नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा और आम लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक है।

कॉकरोच जनता पार्टी का मामला इसी वजह से चर्चा में है। सवाल उनके प्रदर्शन के मुद्दे से ज्यादा उस प्रक्रिया को लेकर उठ रहा है, जिसका पालन किसी भी संगठन को करना होता है।