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सोमनाथ जैसा हो राम मंदिर ट्रस्ट, अमित शाह और योगी आदित्यनाथ भी रहें: VHP

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद अयोध्या में अब रामलला के मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाने की प्रक्रिया तेज हो गई है। न्यायालय के आदेशानुसार केंद्र सरकार को 3 महीने में राममंदिर के लिए ट्रस्ट बनाना है। कहा जा रहा है कि मोदी सरकार जल्द से जल्द इस पर काम पूरा करके मंदिर निर्माण का कार्य शुरू कर सकती है। इस बीच खबर आई है विश्व हिंदू परिषद चाहती है कि मंदिर निर्माण के लिए बनाए जाने वाले ट्रस्ट में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी शामिल हों।

विहिप के प्रवक्ता शरद शर्मा ने बुधवार को ट्रस्ट निर्माण पर अपनी बात रखते हुए कहा, “हमें लगता है कि गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी इस ट्रस्ट में शामिल करना चाहिए। राम मंदिर ट्रस्ट का गठन सोमनाथ ट्रस्ट की तर्ज पर होना चाहिए।” उन्होंने बताया कि आजादी के बाद केएम मुंशी भी केंद्रीय मंत्री रहते हुए सोमनाथ ट्रस्ट से जुड़े थे।

उन्होंने उम्मीद जताई कि ट्रस्ट राम मंदिर का निर्माण रामजन्मभूमि न्यास द्वारा तैयार डिजाइन के अनुसार ही करेगा और ट्रस्ट में न्यास का भी प्रतिनिधित्व रहेगा। उन्होंने जानकारी दी कि राम मंदिर के लिए करीब 65 प्रतिशत नक्काशी का कार्य पूरा हो चुका है और न्यास के डिजाइन के अनुसार मंदिर के भूतल के लिए आवश्यक खंड भी तैयार है। उनके अनुसार 4 महीने पहले तक इस पर तेजी से तक काम चल रहा था, लेकिन फिलहाल ये रुका हुआ है।

यहाँ बता दें न्यास अयोध्या के कारसेवकपुरम में 1990 से कलाकारों और शिल्पकारों के लिए कार्यशाला चला रहा है। इसमें कलाकारों ने कई पत्थरों और खंभों पर कलाकृतियां उकेरी हैं, इस उम्मीद के साथ, कि जब भी रामलला का मंदिर बनेगा तो इन्हें उसमें लगाया जाएगा। इस कार्यशाला के प्रभारी 79 वर्षीय अन्नू भाई सोमपुरा ने बताया कि रामजन्मभूमि न्यास की योजना के मुताबिक मंदिर 268 फुट लंबा, 140 फुट चौड़ा और शिखर तक 128 फुट ऊंचा होगा। जिसमें कुल 212 खंभे होंगे।

‘भीम-मीम’ ट्विटर पॉलिटिक्स: ‘दलित’ दिलीप मंडल के बाद मुस्लिम संपादक शाहिद सिद्दीकी ने मॉंगा Blue Tick

ब्लू टिक देकर ट्विटर जानी-पहचानी हस्तियों का अकाउंट वेरिफाई करता है ताकि कोई और उस पहचान के साथ अलग अकाउंट बना धोखाधड़ी न करे। लेकिन, अब इसको लेकर ‘भीम-मीम’ टाइप पॉलिटिक्स शुरू हो गई है। कुछ दिन पहले शेखर गुप्ता के ‘द प्रिंट’ से जुड़े दिलीप मंडल ने आरोप लगाया था कि दलितों को ट्विटर ‘ब्लू टिक’ नहीं दे रहा है। अब मुस्लिम पत्रकार शाहिद सिद्दीकी ने उसी जुबान में बात करते हुए आरोप लगाया है कि उन्हें मजहब के कारण ब्लू टिक नहीं दिया गया।

दिलीप सी मंडल ने आरोप लगाया था कि ट्विटर दलितों को ब्लू टिक नहीं देता है। उन्होंने आरोप लगाया कि केवल ब्राह्मणों व कथित उच्च जाति के लोगों के एकाउंट्स ही वेरिफाई किए जा रहे हैं। इसके बाद तमाम कथित दलित कार्यकर्ताओं ने ट्विटर के ख़िलाफ़ अभियान चलाया। ट्विटर के दफ्तर के बाहर नारेबाजी की गई। वामपंथियों ने भी इस कार्य में भाग लिया और कविता कृष्णन सरीखे लोगों ने 24 घंटे तक अपना ट्विटर अकाउंट बंद कर विरोध दर्ज कराया। ख़ैर, दिलीप सी मंडल को तो ब्लू टिक मिल गया लेकिन उनके तमाशे कम नहीं हुए। अब इसी नुस्खे के साथ शाहिद सिद्दीकी ब्लू टिक मॉंग रहे हैं।

पूर्व सांसद शाहिद सिद्दीकी साप्ताहिक पत्रिका ‘नई दुनिया’ उर्दू के मैनेजिंग डायरेक्टर और मुख्य संपादक हैं। वो दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर भी रह चुके हैं। उपन्यास ‘The Golden Pigeon’ के लेखक शाहिद ने भी ट्विटर पर ब्लू टिक के लिए रोना रोया। उन्होंने ख़ुद को वरिष्ठ पत्रकार घोषित करते हुए लिखा कि वो उर्दू के लोकप्रिय सम्पादकों में से एक हैं। उन्होंने ख़ुद को पुराना राजनीतिक विश्लेषक घोषित किया है। ख़ुद को लेखक, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता का तमगा देते हए शाहिद ने आरोप लगाया कि ट्विटर उन्हें ब्लू टिक देकर उनके अकाउंट को वेरिफाई नहीं कर रहा है।

हालाँकि, शाहिद ने ये भी लिखा कि वो न तो जाति व्यवस्था की परवाह करते हैं और न ही इसके बारे में सोचते हैं। इसके बाद शाहिद ने समर्थकों सहित ‘Verify Muslim Activists’ नामक ट्रेंड चलाया, जिसमें माँग की गई कि मुस्लिम कार्यकर्ताओं व हस्तियों को ट्विटर पर ब्लू टिक देकर उनके अकाउंट को वेरिफाई किया जाए। राष्ट्रीय जनता दल ने भी इस ट्रेंड को अपना समर्थन दिया है। जेल में बंद लालू यादव की पार्टी ने कहा कि वो जाति, मजहब और समुदाय के आधार पर हो रहे किसी भी प्रकार के भेदभाव का विरोध करती है। राजद ने कहा कि वो बराबरी और सम्प्रभुता में विश्वास रखती है। राजद ने मुस्लिमों और एससी, एसटी के लोगों को ब्लू टिक देने की माँग की है।

युवा राजद के प्रदेश अध्यक्ष करि सोहैब ने लिखा कि ट्विटर को एससी, एसटी व मुस्लिम लोगों को ब्लू टिक देना चाहिए। बरौली के राजद विधायक मोहम्मद नेमतुल्लाह ने भी लिखा कि बराबरी का हक़ मुस्लिमों को भी दिया जाना चाहिए। जहाँ दिलीप सी मंडल ने ट्विटर को ‘ब्राह्मणवादी’ करार दिया था, मुस्लिम नाम वाले कई ट्विटर हैंडल्स ने ट्विटर को मुस्लिम-विरोधी होने का तमगा दे दिया।

चूँकि एक परमानेंट दुश्मन पहले से स्थापित है तो उसके प्रतीक जनेऊ को, जो अनभिज्ञता में ब्राह्मणों के ही साथ जोड़ा जाता है, उसको तुरंत खींच लिया जाता है। सी मंडल ने कहा कि ब्लू टिक नीला जनेऊ बना दिया गया है। चूँकि सी मंडल सी मंडल हैं, तो उनकी मजबूरी है कि उन्हें हर चीज नीली ही चाहिए, वरना उसमें ब्राह्मणवाद ठूँस देना है। इनसे पूछा जाए कि ब्राह्मणवाद है क्या, तो दो लाइन से आगे नहीं बढ़ पाएँगे। ऐसी शब्दावली गढ़ कर जातिवाद फैलाने के कुत्सित प्रयास कुछ सौ सालों से चल रहे हैं, और चूँकि ये सत्ता पाने की सीढ़ी भी है, तो पिछले कुछ दशकों की राजनीति में ये ज्यादा प्रबल हो चुका है। ब्राह्मणों की दुर्गति क्या है वो बिहार के गाँवों में यजमानी करने वाले ब्राह्मणों को जा कर कोई देखे।

मुस्लिमों को आरक्षण, ‘कर्जमाफी’ का भी पुराना पासा: शिवसेना, NCP और कॉन्ग्रेस ‘सरकार’ का एजेंडा

महाराष्ट्र में भले राष्ट्रपति शासन लग गया हो, लेकिन सरकार गठन के प्रयास जारी हैं। इस दिशा में शिवसेना, कॉन्ग्रेस और एनसीपी के बीच सहमति बनती दिख रही है। ट्विटर पर सुधीर सूर्यवंशी नामक पत्रकार द्वारा शेयर की गई ख़बर के अनुसार, तीनों ही दल एक कॉमन मिनिमम प्रोग्राम पर सहमति बनाने जा रहे हैं। इसके बाद सरकार का गठन होगा। कहा जा रहा है कि एनसीपी, कॉन्ग्रेस और अब तक उसकी विरोधी विचारधारा की पार्टी रही शिवसेना के बीच अगले 5 सालों के लिए कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बनाया गया है। एनसीपी नेता नवाब मलिक ने कहा कि अब उनकी पार्टी को बस कॉन्ग्रेस की सहमति का इन्तजार है।

कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में क्या तय किया गया है? सुधीर ने इस बाबत जानकारी देते हुए लिखा है कि किसानों की पूर्ण कर्जमाफी का मुद्दा इसमें शामिल किया गया है। बता दें कि कॉन्ग्रेस ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान का विधानसभा चुनाव इसी मुद्दे पर लड़ा था, लेकिन बाद में कर्जमाफी न होने या इसके त्रुटिपूर्ण होने के कारण किसानों में भारी असंतोष है। अब फिर से महाराष्ट्र में यही पासा फेंका जा रहा है। इसके अलावा किसानों की फसल के लिए ‘मिनिमम सपोर्ट प्राइस’ बढ़ाने को कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में रखा गया है। सुधीर सूर्यवंशी वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं। वे पूर्व में अंग्रेजी अखबार डीएनए से जुड़े हुए थे।

सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि शिवसेना अपने हिंदुत्व के एजेंडे से भी पीछे हट रही है। उसे उत्तर भारतीयों के ख़िलाफ़ भी विरोध प्रदर्शन न करने और नरमी बरतने को कहा गया है। कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के मुताबिक शिवसेना वीर सावरकर को भारत रत्न देने की माँग से भी पीछे हट जाएगी। हालॉंकि अभी इसका औपचारिक ऐलान बाकी है।

कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में मुस्लिमों को 5% आरक्षण देने की बात भी कही गई है। मुस्लिमों को सामान्य वर्ग के ग़रीबों को मिल रहे आरक्षण (EWS) और ओबीसी आरक्षण के तहत पहले से लाभ मिल रहा है। ऐसे में उन्हें अतिरिक्त आरक्षण देने की बात अजीब और तुष्टिकरण की नई मिसाल है। शिवसेना का इस पर सहमत होना और भी चौंकाने वाला है। देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार ने मुस्लिमों को अतिरिक्त आरक्षण देने से इनकार कर दिया था। अब देखना यह है कि सरकार गठन की सार्वजनिक घोषणा कब होती है?

कॉमन मिनिमम एजेंडा पर काम करने के लिए तीनों दलों के नेताओं को प्रतिनिधि के रूप में शामिल किया जाएगा। शारद पवार ने अपनी पार्टी से अजीत पवार, जयंत पाटिल, छगन भुजबल, धनञ्जय मुंडे और नवाब मलिक को इसमें शामिल किया है। नवाब मलिक पहले भी कह चुके हैं शिवसेना ने मुस्लिमों के लिए आरक्षण की माँग कर के अपने स्टैंड में बदलाव किया है।

राम मंदिर पर फैसला आते ही भावुक हो गए थे CM योगी, TV देख-देखकर बजा रहे थे ताली

अयोध्या फैसले के इंतजार में दशकों से उम्मीद जगाए बैठे लोगों के लिए 9 नवंबर का दिन भाव-विभोर करने वाला था। संत-महंतों की तो जैसे खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी अरसे से इस फैसले का इंतजार था। उनसे पहले गोरक्षपीठ के महंत रहे अवैद्यनाथ और दिग्विजयनाथ भी रामजन्मभूमि आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार जिस समय सर्वोच्च न्यायालय ने विवादित भूमि पर अपना निर्णय सुनाया उस समय योगी आदित्यनाथ की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। वे टेलीविजन पर फैसला सुनते ही तालियाँ बजाने लगे और काफी भावुक हो उठे। इस दौरान उनके साथ विश्व हिंदू परिषद के दिग्गज नेता दिनेश चंद्र भी थे।

खबरों के अनुसार संघ प्रमुख मोहन भागवत एवं सुरेश भैयाजी जोशी, कृष्णा गोपाल और दत्तात्रेय होसबोले जैसे संघ के दिग्गज नेताओं ने भी योगी आदित्यनाथ को फोन कर फैसला आने पर शुभकामनाएँ दी। विश्व हिंदू परिषद के अंतराष्ट्रीय मुख्य सचिव दिनेश चंद्र ने कहा कि ये फैसला योगी आदित्यनाथ के दो गुरुओं (महंत अवैद्यनाथ और महंत दिग्विजय नाथ) की मेहनत का फलितार्थ है।

खबरों के मुताबिक इस फैसले को सुनने के बाद मुख्यमंत्री बेहद खुश थे और चहक रहे थे। जैसे-जैसे निर्णय टीवी पर दिखाया जा रहा था, उनकी खुशी सातवें आसमान पर थी। इस दौरान वे बेहद भावुक थे और खुशी जाहिर करने के लिए टीवी देख-देखकर लगातार ताली बजा रहे थे।

यहाँ बता दें कि योगी आदित्यनाथ इस मामले पर एक रात पहले से ही नजर जमाए हुए थे। शुक्रवार को फैसले का समय घोषित होने के बाद उन्होंने डिविजनल कमिश्नर और एडिशनल डीजीपी से अलग-अलग खुद बात की थी और सुरक्षा के लिहाज से हर तैयारी रखने को कहा था।

इसके अलावा योगी आदित्यनाथ की कोर टीम के सदस्यों ने भी मीडिया से बातचीत में इस बात को कहा कि सीएम योगी के मुख्यमंत्री पद पर होने से इस मामले में तेजी आई। मायावती और अखिलेश यादव की सरकार तो 2010 से 2017 में सिर्फ़ दस्तावेजों का अनुवाद ही करवाने में जुटी थी। बतौर योगी आदित्नाथ ने ही इस अनुवाद के कार्य को 10 महीने में पूरा करवाया।

एक अन्य अधिकारी ने बताया कि मुख्यमंत्री रहते योगी आदित्यनाथ 18 बार अयोध्या गए। बीते 27 साल में वह भाजपा के दूसरे ऐसे सीएम थे जिन्होंने रामलला को लेकर अपनी श्रद्धा दिखाने से नहीं हिचके। सीएम रहते अखिलेश यादव कभी अयोध्या नहीं गए। यहॉं तक मुलायम सिंह यादव, मायावती, राहुल गॉंधी और प्रियंका गॉंधी जैसे नेताओं ने भी अयोध्या से 1992 से ही दूरी बनाकर रखी थी।

असम ही नहीं केरल भी पहुँच जाते हैं बांग्लादेशी और करते हैं मर्डर, 2 हत्यारों को खोज रही पुलिस

केरल के अलापुजहा में एक बुजुर्ग दम्पति की निर्मम तरीके से हत्या कर दी गई। पुलिस इस मामले में दो आरोपितों को ढूँढ रही है, जो बांग्लादेश के नागरिक हैं। इन दोनों बंग्लादेशियों के लिए लुक आउट नोटिस जारी कर दिया गया है। 75 वर्षीय एपी चेरियन और उनकी 68 वर्षीय पत्नी लिलिकुट्टी चेरियन को उनके रिश्तेदारों ने मंगलवार (नवंबर 12, 2019) को मृत पाया। ये दोनों घर में अकेले रहते थे। घटना चेंगन्नूर क्षेत्र की है। आसपास के लोगों ने देखा कि उनके घर के बाहर शाम से ही एक दूध की बोतल रखी हुई थी, जिसे उन्होंने अंदर नहीं लिया था। इसके बाद लोगों को शक हुआ और उन्होंने दरवाजा खोला।

मृत बुजुर्ग दम्पति के दो बेटे हैं, जो अरब में नौकरी करते हैं। बुजुर्ग दम्पति ने दो लोगों को अपने घर में साफ़-सफाई के लिए रखा हुआ था। वो उनसे नारियल तोड़वाने का काम भी करवाते थे। दोनों ही मजदूर शुक्रवार और शनिवार को बुजुर्ग दम्पति के घर पर ही थे। उन दोनों को एक लोकल कांट्रेक्टर के जरिए हायर किया गया था। जब लोगों ने देखा कि रात को चेरियन के घर की लाइट्स भी ऑन नहीं हुई, तो उन्हें शक हुआ। लेकिन फिर उन्होंने सुबह तक इंतजार करने की सोची।

मंगलवार की सुबह जब कुछ लोग वहाँ पहुँचे तो उन्होंने पाया कि उनके घर के आगे के दरवाजे को लॉक किया गया था, लेकिन पीछे का दरवाजा खुला था। जब वे पिछले दरवाजे से घर में पहुँचे तो उन्होंने देखा कि लिलिकुट्टी किचन के फर्श पर मृत पड़ी हुई हैं। इसके बाद पड़ोसियों ने तुरंत पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने बताया कि उनके चेहरे को कुदाल से काट डाला गया था। कुदाल का एक भाग लाश के पास ही पड़ा मिला। चेरियन भी घर के अंदर मृत मिले।

एपी चेरियन को लोहे के रॉड से मार डाला गया था। घर का आलमीरा खुला हुआ था। पुलिस बुजुर्ग दम्पति के दोनों बेटों के आने का इन्तजार कर रही है। इसके बाद यह पता लगाया जाएगा कि घर से बहुमूल्य चीजों की चोरी की गई है या नहीं। पुलिस ने मामले की जाँच के लिए एक एसआईटी बनाई है। दोनों ही आरोपित बांग्लादेशी हैं, जो पश्चिम बंगाल होकर आए थे और यहाँ अवैध रूप से रह रहे थे। उन दोनों को हायर करने वाले स्थानीय कांट्रेक्टर के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की जाएगी। पुलिस ने लोगों से कहा है कि विदेशी नौकरों को घर में न रखें।

मुंबई की काजल ने धर्म बदल Pak के राशिद से किया निकाह… अब 4 बीवी और 10 बच्चों के बीच कर रही ‘संघर्ष’

19 साल पहले एक पाकिस्तानी आदमी से शादी करने के लिए अपना नाम, धर्म, राष्ट्रीयता (भारतीय से पाकिस्तानी) बदलने वाली एक पूर्व भारतीय नागरिक को इन दिनों दुबई के शारजाह में अपनी पहचान को लेकर संघर्ष करना पड़ रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार महिला के पाकिस्तानी पहचान पत्र को रिन्यू होने में काफी समय लग रहा है। जिस कारण उसे वहाँ कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

महिला का नाम काजल राशिद खान है। उसने पाकिस्तानी प्रशासन के पास 31 जुलाई को अपना पहचान पत्र रिन्यू होने के लिए दिया था, लेकिन नवंबर आधा बीतने के बाद भी उसका पहचान पत्र उसे नहीं मिला। अमूमन इस प्रक्रिया में मात्र दस दिन लगते हैं।

काजल का पति मोहम्मद राशिद खान ने इस परेशानी के बारे में बात करते हुए मीडिया को बताया कि वो पिछले तीन महीने से NADRA (National Database and Registration Authority) को ईमेल भेज रहा है। उसने इसके लिए जरूरी दस्तावेज भी जमा करवा दिए हैं, लेकिन फिर भी मामला आगे बढ़ता नजर नहीं आ रहा।

मीडिया खबरों के मुताबिक काजल राशिद खान का बैंक खाता भी कराची में फ्रीज किया जा चुका है। उसे अपने बैंक खाते को चालू करवाने के लिए नए स्मार्ट पहचान पत्र की जरूरत है, लेकिन पाकिस्तानी प्रशासन का 3 महीने बाद भी ये कहना है कि काजल के दस्तावेज सत्यापित किए जा रहे हैं।

काजल का पति राशिद बताता है, “मुझे समझ नहीं आ रहा कि मेरी बीवी के आवेदन को क्यों अटकाया हुआ है। ये तो केवल पहचान पत्र का नवीनीकरण है। उसके पास वैध पाकिस्तानी पासपोर्ट और पाकिस्तानी नागरिकता का सर्टिफिकेट भी है।”

इसके अलावा राशिद ने बताया कि काजल के पास दुबई में मौजूद पाकिस्तान के महावाणिज्य दूतावास से मिला पत्र भी है। जो पुष्टि करता है कि उसने अपना भारतीय पासपोर्ट जमा करवा दिया है और उसे 2001 में नया पाकिस्तानी पासपोर्ट जारी हो चुका है।।

यहाँ बता दें कि 60 वर्षीय पाकिस्तान निवासी राशिद खान पेशे से आर्किटेक्ट है। उसने 1989 में दुबई आकर वहाँ के सुपरमार्केट में अपनी एक दुकान खोली थी। इसके बाद उसने 1996 में मुंबई आकर कल्पना से उसका धर्म और नाम बदलवाकर निकाह किया था।

प्राप्त जानकारी के अनुसार राशिद खान की कुल 4 बीवियाँ और 10 बच्चे हैं। इनमें से एक बीवी अपनी दो लड़कियों के साथ भारत में ही रहती है। जबकि पहली पत्नी पाकिस्तान में रहती है और उससे राशिद को दो लड़के-एक लड़की है। दूसरी पत्नी भी पाकिस्तान से ही है और उसके भी राशिद को दो लड़कियाँ और एक लड़का है। इसके अलावा काजल से भी उसे एक लड़का और एक लड़की है।

फिलिस्तीन के सबसे बड़े जिहादी को बीवी संग इजरायल ने मार गिराया, भारतीयों ने कहा- हम तुम्हारे साथ

इजरायल ने फिलिस्तीन के सबसे बड़े जिहादी को मार गिराया है। आतंकी सरगना बहा अबू अल-अता अपने घर में था, जब उसे निशाना बना इजरायल ने मिसाइल दागी। हमले में वह अपनी बीवी सहित मारा गया। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि अबू-अल अता एक ‘Ticking Bomb’ था, जो पूरे इजरायल को तबाह करने का सपना लिए कई आतंकी हमले की साजिश रच रहा था। इसके बाद आतंकी संगठन ‘फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद’ ने इजरायल की ओर कम से कम 200 रॉकेट दागे और बदला लेने की धमकी दी। इन हमलों में क़रीब 2 दर्जन इजरायली नागरिक घायल हुए हैं।

होलोन क्षेत्र में इस्लामिक आतंकियों द्वारा दागे गए रॉकेट के कारण एक 8 वर्षीय बच्ची बेहोश होकर गिर पड़ी, जिसे जल्दी अस्पताल पहुँचाया गया। इजरायल ने अकरम अल-अजुरी नामक आतंकी सरगना के बेटे को भी मार गिराया है। पीआईजे (पलेस्टाइन इस्लामिक जिहाद) ईरान समर्थित आतंकी संगठन है, जो इजरायल पर अक्सर हमला करता है। ये संगठन गाज़ा में सक्रिय है। स्थानीय लोगों ने बताया कि जब शीर्ष जिहादी मारा गया, तब कई किलोमीटर तक विस्फोट की आवाज़ सुनाई दी। नेतन्याहू ने अबू अल-अता को आतंकी वारदातों का सबसे बड़ा सरगना करार देते हुए कहा कि वो किसी बड़े हमले की साजिश रच रहा था।

उसने इजरायल की ओर सैकड़ों रॉकेट दागे थे। नेतन्याहू ने कहा कि उसके मारे जाने के बाद अगले कुछ दिन तनावपूर्ण होंगे। इस बीच भारत में भी ‘We Support Israel’ ट्रेंड हुआ। लोगों ने पीआईजे द्वारा इजरायल के निर्दोष लोगों को निशाना बनाए जाने की निंदा की। भारत में ‘Israel Under Fire’ ट्रेंड भी चला। जेरुसलम पोस्ट ने अपनी एक ख़बर में इस ट्रेंड को जगह दी और बताया कि इजरायल को भारत से ख़ूब समर्थन मिला। जेरुसलम पोस्ट ने इस दौरान पीएम मोदी और बेंजामिन नेतन्याहू की दोस्ती की चर्चा की।

अबू-अल अता को दफनाए जाने के समय वहाँ कई आतंकी मौजूद रहे। एक आतंकी सरगना खालिद अल-बत्स ने कहा कि इजराइल ने गाज़ा और सीरिया पर हमला किया, जो बताता है कि उसने युद्ध की घोषणा कर दी है। पीआईजे ने कहा कि अब आगे ‘सज़ा देने के लिए’ जो भी किया जाएगा, उसका जिम्मेदार इजरायल ही होगा। इजरायल की सेना ने गाज़ा में कई आतंकी प्रशिक्षण कैम्पों को भी निशाना बनाया, जहाँ हथियार बनाए जा रहे थे। हथियार बनाने वाली इन अस्थायी फैक्ट्रियों को इजरायल ने तबाह कर दिया।

बता दें कि पीआईजे और हमास के कारण इजरायल को अपनी सीमाओं पर अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ती है, क्योंकि ये दोनों लगातार वहाँ के निर्दोष लोगों को निशाना बनाने की जुगत में लगे रहते हैं। हालिया घटनाओं के बाद भारत में लोगों ने इजरायल के नागरिकों की सलामती के लिए प्रार्थना की। भारत स्थित इजरायली दूतावास ने भी भारतीयों को इस समर्थन के लिए धन्यवाद दिया है।

संजय राउत ने जब बना दिया ‘धोबी का कुत्ता’, तब उद्धव का इशारा- BJP से गठजोड़ की उम्मीद

महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगने के बाद सबसे बड़ा धक्का शिवसेना को लगा है। जहाँ मीडिया के बीच संजय राउत सरीखे शिवसेना नेता अपने पास बहुमत के लिए ज़रूरी विधायकों का समर्थन होने का दावा कर रहे थे, राज्यपाल के समक्ष उन्होंने अतिरिक्त समय की माँग की। शिवसेना ने राज्यपाल से 48 घंटे का अतिरिक्त समय माँगा, जिसे अस्वीकार कर दिया गया। इसके बाद पार्टी अब सुप्रीम कोर्ट पहुँच गई है, जहाँ कपिल सिब्बल वकील के रूप में राज्यपाल के फ़ैसले के ख़िलाफ़ जिरह करेंगे। इस बीच विधानसभा को निलंबन की अवस्था में रखा गया है। राज्यपाल ने केंद्र को भेजे गए रिपोर्ट में बताया कि चूँकि सभी दलों को सरकार बनाने का दावा पेश करने के लिए पर्याप्त समय दिया गया और वो विफल रहे, राज्य में राष्ट्रपति शासन आवश्यक हो गया है।

शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने राज्यपाल के इस निर्णय पर तंज कसा है। उद्धव ने कहा कि उन्होंने तो बस 48 घंटे ही माँगे थे लेकिन राज्यपाल ने पूरे 6 महीने दे दिए हैं। उद्धव ने कहा कि उनकी पार्टी जल्द ही कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ किसी फॉर्मूले पर पहुँचेगी। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे शिवसेना ने भाजपा के ‘बुरे दिनों’ में भी उसका साथ दिया। उद्धव ने स्पष्ट कर दिया कि एनसीपी और कॉन्ग्रेस से उनकी बातचीत चल रही है। उद्धव ने दावा किया कि भाजपा उनके पास रोज नए ऑफर लेकर आ रही है और अभी भी गठजोड़ की उम्मीद है। उधर जयपुर में रुके कॉन्ग्रेस विधायकों को वापस मुंबई बुलाया जा रहा है। मतलब कौन, कब, क्या बोल रहा है… किसी को भी नहीं पता। सत्ता के लिए जहाँ से भी समर्थन मिल सके, उन सब के लिए सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की बातें बोलते जाना है – हर दिन – फिलहाल यही दिख रहा है।

शरद पवार के साथ कॉन्ग्रेस नेताओं मल्लिकार्जुन खड़गे और अहमद पटेल ने बैठक की। बैठक के बाद अहमद पटेल ने कहा कि कॉन्ग्रेस और एनसीपी पहले अंदरूनी बैठकें करेंगे और फिर शिवसेना से बात करेंगे क्योंकि सही तरीके से सरकार चलाने के लिए ये ज़रूरी है। उधर गृह मंत्रालय ने भी स्पष्ट कर दिया है कि राज्य में राष्ट्रपति शासन क्यों लगा? कुछ लोगों का पूछना था कि एनसीपी को 24 घंटे, यानी मंगलवार (नवंबर 12, 2019) को रात 8.30 तक का समय दिया गया था, फिर उस समय तक इंतजार क्यों नहीं किया गया? गृह मंत्रालय ने कहा कि एनसीपी नेताओं ने मंगलवार को सुबह 11.30 में ही राज्यपाल से मुलाक़ात कर अतिरिक्त 3 दिन के समय की माँग की थी, जिसके बाद ये निर्णय लिया गया।

गृह मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया कि राज्यपाल ने सरकार गठन के लिए नियमानुसार सारे प्रयास किए और सभी दलों को उचित मौक़ा दिया। राज्यपाल ने पाया कि सभी दल सरकार बनाने में अक्षम साबित हुए। जबकि कॉन्ग्रेस का आरोप है कि राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने सरकार गठन के किए सारे विकल्पों को आजमाए बिना जल्दबाजी में राष्ट्रपति शासन को अनुशंसा कर दी।

महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता सचिन सावंत ने कहा कि वो राज्यपाल के इस ‘पक्षपाती रवैये’ की निंदा करते हैं। राज्य की 288 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा 105 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है जबकि शिवसेना 56 सीटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। एनसीपी को 54 और कॉन्ग्रेस को 44 सीटें मिली हैं। शिवसेना और भाजपा के चुनाव-पूर्व गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिला लेकिन शिवसेना ने अपनी पार्टी से सीएम होने की जिद पकड़ ली, जिसके बाद ये राजनीतिक गतिरोध पैदा हुआ।

महिला कमिश्नर (IAS) ने झुक कर छुआ कमलनाथ के मंत्री का पैर, हो गया Video Viral

मध्य प्रदेश के देवास जिले से एक वीडियो आया है। एकदम वायरल हो गया है। कारण है कमलनाथ सरकार में लोकनिर्माण मंत्री सज्जन सिंह वर्मा का इस वीडियो में होना। लेकिन इतना काफी नहीं होता। वीडियो वायरल हुआ है क्योंकि एक महिला ऑफिसर भीड़ के बीच में झुक कर मंत्री साहब के पाँव छूते नजर आ रही हैं। इस वीडियो को भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष विजेश लूनावत ने भी ट्वीट किया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस वीडियो में नजर आ रही महिला ऑफिसर का नाम संजना जैन है। यह ऑफिसर देवास में नगर निगम कमिश्नर के पद पर तैनात है। मंगलवार को गुरुनानक जयन्ती के अवसर पर जिले के एक गुरुद्वारे में धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन था। जिसमें कमलनाथ मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने भी शिरकत की। लेकिन तभी वहाँ मौजूद नगर निगम की आयुक्त संजना जैन उनके पास पहुँची और उन्होंने कमलनाथ मंत्री का पैर छूकर आशीर्वाद लिया।

इस वाकये का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगा है। तो भाजपा ने कॉन्ग्रेस को आड़े हाथों लिया है। भाजपा के सांसद महेंन्द्र सिंह सोलंकी ने कमलनाथ सरकार पर निशाना साधते हुए अधिकारियों को नेताओं की शरण में बताया है और साथ ही महिला ऑफिसर द्वारा मंत्री का पाँव छूना नियम के ख़िलाफ़ बताया है। उन्होंने इसके लिए उचित कार्रवाई की बात की है।

वहीं, भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष विजेश लूनावत ने भी इस को वीडियो ट्वीट करते हुए लिखा, “ये है नया मध्य प्रदेश, अफसरशाही मंत्री जी के चरणों में… देवास की नगर निगम कमिश्नर सुश्री संजना जैन मध्य प्रदेश के मंत्री सज्जन सिंह वर्मा की चरण वंदना करती हुई।”

हालाँकि, मध्य प्रदेश में प्रशासन व्यवस्था को लेकर अक्सर सवाल उठते रहते हैं, लेकिन किसी ऑफिसर द्वारा सार्वजनिक स्थान पर इस तरह की मंत्री के पाँव पड़ना, न केवल एक शर्मनाक घटना है बल्कि उस पद की भी तौहीन है, जिस पर वह नियुक्त हैं।

खुद सोशल मीडिया यूजर्स इस वीडियो को देखने के बाद अपनी तरह-तरह की प्रतिक्रिया देते नजर आ रहे हैं। यूजर्स का मानना है कि कॉन्ग्रेस के आने के वहाँ प्रशासन में बहुत तेजी से बदलाव आया है। क्योंकि यही वो महिला ऑफिसर हैं, जिन्होंने कुछ साल पहले देवास के युवराज और शिवराज सरकार के मंत्री तुकोजीराव पंवार को ऐसी अफसरी दिखाई थी कि हड़कंप मच गया था, लेकिन आज ये पाँव पड़ती नजर आ रही हैं।

जब पत्रकार निष्पक्षता का चोला ओढ़े वही काम करते हैं जैसे पाक सेना के लिए वहाँ के आतंकी

पत्रकारिता के बारे में ‘टीवी मत देखा कीजिए’, जिसका मतलब है कि सिर्फ मेरा प्राइम टाइम देखा कीजिए’ से ले कर चाय में बिस्कुट के टूट कर गिर जाने पर ‘यही तो आपातकाल है ब्रो’ कहने की बातें कॉन्ग्रेस के सत्ता से बाहर जाने पर पिछले पाँच सालों से खूब हो रही हैं। एक घंटे की एंकरिंग के बाद, फेसबुक पर पोस्ट के जरिए, या अपने गिरोह के लोगों के घर जा कर इंटरव्यू देते हुए, बार-बार ‘स्वतंत्रता का हनन’ और ‘आवाजों को दबाया जा रहा है’ जैसी बातें कहने वाले बहुतेरे लोग हैं, जो स्वयं को पत्रकार बताते हैं। इनके समर्थक इन्हें पत्रकार ही नहीं, ‘निष्पक्ष पत्रकार’ कहते हैं।

पत्रकारिता की दुनिया में एक और ब्रीड है जो स्वयं को ‘स्वतंत्र पत्रकार’ तो कहती है, लेकिन वाकई में परतंत्र है। ऐसे लोगों को तमाम अखबारों या चैनलों पर ‘स्वतंत्र पत्रकार’ के टैग के साथ एक खास पक्ष की वकालत करते देखा जा सकता है। ऐसे लोग आपको वायर, क्विंट, स्क्रॉल, एनडीटीवी से ले कर हर बड़े संस्थान में प्रोपेगेंडा ठेलते नजर आ जाएँगे।

ऐसे दोनों ही तरह के लोगों को पैसे देने के लिए दो तरह के संस्थान होते हैं। जैसे कि कॉन्ग्रेस का मुखपत्र नेशनल हेरल्ड है, जहाँ अगर कुछ छपता है तो आम आदमी जानता है कि ये तो कॉन्ग्रेस के ही पक्ष में लिखेगा। यहाँ कोई धोखा नहीं होता। यहाँ पता है कि इस वोबसाइट यह बताया जाएगा कि जीडीपी ऊपर जाने से गरीबों के पेट में भोजन नहीं पहुँचता, लेकिन वो नीचे जाए तो देश के आर्थिक स्वास्थ्यका एकमात्र परिचायक वही हो जाता है। यहाँ आपको कॉन्ग्रेस राज को छोड़ कर बाकी किसी भी राज्य या केन्द्र की एक भी योजना सही परिणाम लाती नहीं दिखती।

जैसे कि भाजपा ने पुल बनवाया तो कहेंगे कि नाव वालों के पेट पर लात मार दी! मोदी शासन में अगर चंद्रयान छोड़ा गया तो जमीन पर भात-दाल खाते गरीब की फोटो साथ में लगा देंगे। मोदी की गंगा आरती दिखावा हो जाएगी, लेकिन चुनावों के समय राहुल गाँधी के पैर के अंगूठे से टीक तक जनेऊ पहना दिया जाए, तो ये भाजपा के राजनीति का जवाब है, वरना ‘हम तो ये सब आज तक घर में ही करते थे’। अगर आपने ज्यादा पूछा तो हो सकता है कि एनडीटीवी वाले आपको थाईलैंड में राहुल गाँधी को सड़क किनारे, कान पर जनेऊ चढ़ा कर, लघुशंका करती तस्वीर दिखा देते।

जब बात नेशनल हेरल्ड से एनडीटीवी तक आ गई है, तो मकसद यही है कि नेशनल हेरल्ड की ईमानदारी तो ये है कि उनके मालिक कॉन्ग्रेस वाले हैं, तो वो उनका गुणगान ही करेंगे, लेकिन एनडीटीवी जैसी संस्थाएँ या आकार पटेल, सुजाता आनंदन जैसे लोग स्वतंत्र पत्रकार का तमगा सर पर चिपकाए, वही काम कर रहे हैं, पर उनकी कथित निष्पक्षता बरकरार रहती है।

जो व्यक्ति यदा-कदा ऐसे लोगों को देखता या पढ़ता है, उसे तो यही लगेगा कि ये निष्पक्ष व्यक्ति है, लेकिन वो काम तो कॉन्ग्रेस का कर रहा है। ऐसे लोगों में मृणाल पांडे जैसे लोग भी आते हैं जो हर बात पर यह विश्वास दिलाने में लगे रहते हैं कि भारत में तो आग लग गई है, सब कुछ बर्बाद हो गया है। ऐसे कई लोग हैं जो ट्विटर पर एक गिरोह के रूप में दिखते हैं, जिनकी मंशा यह बताने की होती है कि वो निष्पक्ष हैं, और निष्पक्ष विचार रख रहे हैं।

ये कुछ ऐसा ही है जैसे कि पैरोडी राष्ट्र पाकिस्तान में आंतकी को सेना ने पैसे देने शुरु किए कि जाओ बेटा, कश्मीर जाना और फट जाना। उनका टार्गेट भारत है। यहाँ सेना का काम सीमाओं को सुरक्षित रखना है, न कि दूसरे के सीमा में जा कर बम फोड़ना या आतंकी वारदातें करना। लेकिन वो कुछ आतंकियों को पाल लेते हैं ताकि उनके मतलब के काम तो वो करें, लेकिन उनका नाम न जाए।

उसी तरह, ये जो कुछ कथित ‘स्वतंत्र पत्रकार’ हैं, वो एक ऐसी ग़ैरज़िम्मेदार मीडिया के लिए लेख लिखते हैं, शो करते हैं, जो कहती तो ये है कि ‘हम तो निष्पक्ष मीडिया हैं’, बाक़ायदा, डिस्क्लेमर भी लगा देती है कि ये विचार लेखक के निजी हैं, और फलानी टीवी इसकी ज़िम्मेदारी नहीं लेती, लेकिन ये काम वो योजनाबद्ध तरीके से, ज़िम्मेदारी के साथ करते हैं। अब कोई यह बता दे कि वो एनडीटीवी की साइट है कि सरकारी पेशाबखाना कि जिसको मन आया यूरिनल छोड़ के हर जगह मूत्र विसर्जन करके चला गया!

हो तो वही रहा है और ये ‘डिस्क्लेमर’ बड़ी ही खूबसूरती से एनडीटीवी जैसों को नेशनल हेरल्ड से तकनीकी तौर पर अलग बना देता है। काम इनका भारत में बम फोड़ने जैसा ही है, भेज इनको पाकिस्तानी सेना ही रही है, लेकिन ‘स्वतंत्र पत्रकार’ और ‘ये उनके निजी विचार हैं’ के नाम पर, धमाका भी हो जाता है, और विश्व समुदाय में ऐसे मीडिया वाले गर्दन तान कर यह कहते हैं कि उनके शरीर पर हमारी वर्दी कहाँ है, वो तो निजी स्तर पर लेखन कर रहे हैं।

NDTV के सीनियर एडिटर हैं, लोकिन उनके लेखों के लिए संस्थान उत्तरदायी नहीं है!

पाकिस्तानी सेना ‘स्टेट एक्टर’ है, यानी कि सत्ता के अधीन और उसकी इच्छाओं के हिसाब से कार्य करने वाली संस्था। (ये बात और है कि वस्तुस्थिति इसके उलट यह है कि सत्ता पाकिस्तानी सेना के हिसाब से काम करती है।) उसके बाद, पाकिस्तानी सरकार के पास ‘अच्छे आतंकी’ हैं, जो उनकी इच्छा को फलित करने में सेना के आदेशानुसार उन आतंकी वारदातों को अंजाम देती है जो सेना स्वयं खुल्लमखुल्ला नहीं कर सकती। आतंकी ‘नॉन-स्टेट एक्टर’ हैं, यानी वैसे लोग जिन्हें ‘कथित तौर पर’ सत्ता के साथ नहीं होना चाहिए, लेकिन वो भी इनके कुत्सित मंशा को पूरा करने के लिए काम करते हैं। वैसे ही एनडीटीवी जैसों के पास ‘निष्पक्ष’ पत्रकार हैं जो ‘निजी राय’ के नाम पर कॉन्ग्रेस के लिए भाजपा-विरोधी अजेंडा चलाते हैं, क्योंकि वो खुल कर कॉन्ग्रेस का मुखपत्र नहीं बन सकते।

निष्पक्ष मीडिया एक मिथक है

आज के दौर में मीडिया से ले कर समाज तक, वामपंथी मीडिया की गोएबेलियन नीति और नैरेटिव बनाने के तरीकों के कारण, एक सहज घृणा दिखाती हुई, दो हिस्सों में बँट गई है, वहाँ से निष्पक्षता का लोप हो चुका है। आज समाज के साथ-साथ, मीडिया में भी एक धड़े को मोदी सरकार की हर नीति में, हर उपलब्धि में, हर योजना में असफलता या खामियाँ ही दिखती हैं। उनका एकसूत्री अजेंडा है सत्ता में बैठी भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना के नाम पर घृणा परोसना।

ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि वर्षों से कॉन्ग्रेस के टुकड़ों पर पलने वाले लोगों के हाथ से नियंत्रण चला गया। अब इन पत्रकारों को लोग संदेह से देखते हैं कि ये पत्रकार है या कॉन्ग्रेस का चरणचुंबन करने वाला व्यक्ति। इससे हुआ यह है कि लोग आज भी रवीश कुमार के, ‘द वायर’ के, ‘क्विंट’, ‘बीबीसी’, ‘स्क्रॉल’ आदि के लेखों पर कमेंट तो ज़रूर करते हैं लेकिन उन टिप्पणियों में तीन-चौथाई लोग बस उन्हें धिक्कारते दिखते हैं।

आप इन सबको ट्रोल नहीं कह सकते। इन लोगों ने सत्य को पहचान लिया है, इन्होंने मुखौटे नोचने शुरू कर दिए हैं। ऐसे लोगों को ट्रोल कह कर खारिज करना इन अजेंडाबाजों की मजबूरी है क्योंकि ये अपने आप को बेकार तो मानेंगे नहीं।

लोग कहते हैं कि एक हिस्सा अगर मोदी की हर बात की आलोचना (वस्तुतः घृणा) करता है, तो दूसरा हिस्सा भी तो मोदी का गुणगान ही कर रहा है। ये बात कुछ हद तक सही है लेकिन इसके कारण क्या हैं? कारण यह है कि दूसरा हिस्सा पुराने नैरेटिव को चुनौती दे रहा है, उसे संतुलित करना चाह रहा है। अगर दूसरा हिस्सा संतुलन बनाने के लिए मोदी की नीतियों पर चर्चा न करे, उसकी योजनाओं को लाभार्थियों की कहानी न दिखाए, हिन्दुओं की मॉब लिंचिंग पर बात न करे, तो ये वामपंथी गिरोह भारत की छवि ऐसी बना देगा जहाँ न तो सड़कें हैं, न अर्थव्यवस्था ठीक है, न इलाज मिल रहा है, कथित अल्पसंख्यकों को हिन्दू तलवार ले कर दौड़ा रहे हैं…

जिस दिन पहला धड़ा अपनी जिम्मेदारी समझ कर, उचित-अनुचित को तथ्यों के हिसाब से दिखाएगा, जहाँ प्रशंसा करनी हो वहाँ प्रशंसा करेगा, आलोचना योग्य बातों पर आलोचना करेगा, तो दूसरा धड़ा भी अपना काम सही तरीके से करने लगेगा।

लेकिन, जब तक कुछ लोग और संस्थान, व्यक्ति या पार्टी को निशाने पर ले कर, निष्पक्षता का चोला ओढ़े, स्वतंत्र पत्रकारों की सहायता से यहाँ-वहाँ कॉन्ग्रेस की अजेंडा बेचते रहेंगे, तब तक विचारधाराओं की यह लड़ाई जारी रहेगी क्योंकि पाकिस्तान कितना भी बड़ा हो जाए, कितने भी आतंकी पाल ले, एक्सपोज वो स्वयं हो रहा है।

वैसे ही, चाहे जितने बड़े नामों से प्रोपेगेंडा लिखवाया जाए, चाहे कॉन्ग्रेस के आधिकारिक मुखपत्र कॉन्ग्रेस का अजेंडा ठेलें, या ‘वानाबी मुखपत्र’ अपनी चाटुकारिता दर्ज करने को छटपटाता रहे, लोगों को इन सारे पत्रकारों और मीडिया की नग्नता का अहसास हो रहा है। ये सारे लोग खुद को सार्वजिनक तौर पर ज़लील कर रहे हैं। कुत्ते की पूँछ भले ही सीधी न हो, लेकिन एक दिन हर कुत्ता मरता तो है ही।