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सेक्युलर सरकारों ने हिंदुओं को बनाया दोयम दर्जे का नागरिक, मंदिरों की संपत्ति पर किया कब्जा

बरसों तक वन में घूम-घूम,
बाधा विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप, घाम, पानी, पत्थर,
पांडव आये कुछ और निखर!

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने ये पंक्तियाँ पांडवों के अज्ञातवास और वनवास से लौटने पर लिखी थीं। इसके साथ ही उन्होंने जोड़ा था, ‘सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें आगे क्या होता है!’

लगातार चल रही राम मंदिर मामले की अदालती सुनवाई पर ये पंक्तियाँ अपने-आप ही याद आ जाती हैं। शुरुआती पंक्तियाँ इसलिए क्योंकि अयोध्या में राम मंदिर तक पहुँचने के लिए पाँच सुरक्षा जाँच की रुकावटें पार करनी पड़ती हैं। हिन्दुओं के बड़े तीर्थ देखें तो उनमें से अधिकतर दुर्गम स्थानों पर मिलेंगे। संभवतः ऐसे दुर्गम स्थानों पर ये तीर्थ इसलिए बने क्योंकि ये सबके मुँह उठाकर पहुँच जाने की जगहें नहीं थीं। जिसने इस दिशा में विशेष प्रयास किए हों, वही यहाँ तक पहुँचे, ऐसी सोच शायद रही हो।

यही वजह थी कि गाँधी भारतीय रेलवे के प्रखर विरोधी थे। वो कहते थे कि रेलवे और ट्रेन के होने से हिन्दुओं के लिए उनके तीर्थों तक पहुँचना सुगम हो गया है (और होता जा रहा है)। इससे अयोग्य और अनाधिकारी भी मंदिरों में पहुँचने लगेंगे, जिससे की तीर्थ की शुचिता भंग होती है। मेरे ख़याल से इसकी एक और वजह भी रही होगी। ऐसे एकांत और निर्जन स्थलों पर साधु-सन्यासियों ने बरसों साधना की होगी। लगातार योगियों, सिद्धों आदि के संसर्ग से उस क्षेत्र पर भी असर पड़ा होगा। ऐसे साधु आमतौर पर नगरों से दूर ही रहते हैं, इसलिए भी तीर्थ आम लोगों की भीड़-भाड़ से अलग, कहीं दूर ही स्थापित हुए।

अभी जब राम मंदिर मामले पर सुनवाई चल रही है, तब क्या आम भारतीय भी इस मामले पर पढ़ना-सुनना और जानना चाहता होगा? अगर ख़रीदी जा सकने वाले मीडिया चैनलों के हिसाब से सोचें तो इसका जवाब होगा नहीं। अख़बारों, टीवी की बहसों या रेडियो पर शायद ही कुछ देखने-सुनने को मिलता है। इसकी तुलना में सोशल मीडिया पर किसी आम आदमी का मैसेज वायरल होता नजर आता है। इसमें कहा गया है कि रावण पर राम की विजय के उपलक्ष्य में मनाए जाने वाले दशहरा की वजह से अदालत 7 से लेकर 12 अक्टूबर तक छुट्टी पर है और राम के अयोध्या लौटने की ख़ुशी में मनाई जाने वाली दीपावली पर वो 28 से 31 तक बंद रहेगी। इसके बाद अदालत इस बात पर सुनवाई करेगी कि राम जन्मभूमि थी भी या नहीं!

इसके आधार पर देखें तो ऐसा लगता है कि आम आदमी की भावना को ख़रीदी जाने वाली मीडिया समझ नहीं पा रही, या जान बूझकर नकार रही है। समझ नहीं पा रही का सवाल तो पैदा ही नहीं होता, क्योंकि वहाँ काम करने वाले लोग भी समाज से ही आते हैं और दिन भर में कई आम लोगों से मिलते भी रहते हैं। फिर क्या वजह हो सकती है कि इसके बारे में कुछ बोला-लिखा नहीं जा रहा? असल में इस पर बात करना कई स्थापित शहरी मिथकों की धज्जियाँ उड़ा देता है।

उदाहरण के तौर पर ये कहा जाता है कि मंदिरों की कमाई बहुत है और उससे आम आदमी का भला होना चाहिए। समस्या ये है कि मंदिर और उसकी आय की बात करते ही नजर आने लगेगा कि मंदिरों की संपत्ति तो पहले ही सरकारी कब्जे में है। फिर ये भी बताना पड़ेगा कि भारत की सेक्युलर-धर्मनिरपेक्ष सरकार बहादुर ने सबसे ज्यादा जमीनों वाले चर्च और वक्फ बोर्ड को तो सरकारी नियंत्रण से मुक्त रखा है लेकिन मंदिरों की जमीनें समय-समय पर, किसी न किसी बहाने से बेचती रही है।

अयोध्या राम जन्मभूमि के दर्शनों के लिए हर रोज पाँच सुरक्षा घेरे पार करके करीब चार सौ श्रद्धालु पहुँचते हैं। इस मंदिर के “रिसीवर” अयोध्या के डिवीज़नल कमिश्नर (नाम पर गौर कीजिए – मनोज मिश्रा) होते हैं जो मंदिर को मिलने वाले चढ़ावे को एक अलग बैंक अकाउंट में रखते हैं। प्रति माह ये आय करीब छह लाख होती है। सन 1992 से यहाँ के महंत (नाम पर ध्यान दीजिए– महंत सत्येन्द्र दास) मंदिर के रख-रखाव के लिए मिलने वाले पैसे को कुछ बढ़ाने की बात कर रहे थे। उन्हें 26,000 रुपये प्रति माह मिलते थे, जिसे अभी-अभी बढ़ाकर 30,000 (पहले से चार हजार ज्यादा) करने की महती कृपा “मनोज मिश्रा” जी ने की है। हर महीने मिलने वाले छह लाख में से सरकार बहादुर, तम्बू में रह रहे श्री राम के रख-रखाव के लिए तीस हजार ही क्यों देगी- ये हमें पता नहीं।

मंदिर से जुड़े खर्चे और भी हैं। महंत और उनके सहयोगियों की मासिक तनख्वाह भी बढ़ाने का फैसला सरकार बहादुर की तरफ से रिसीवर “श्री मनोज मिश्रा” कर चुके हैं। पहले मिलने वाले 12,000 की तुलना में अब महंत सत्येन्द्र दास को 13,000 मिलेंगे। उनके साथ काम करने वाले करीब आठ लोगों को 7,500 से 10,000 रुपए के बीच की तनख्वाह मिलती थी। इसमें भी सरकार बहादुर ने कृपा बरसाते हुए हरेक के लिए पूरे 500 रुपए की बढ़ोत्तरी करने की मेहरबानी की है।

मेरा विश्वास है कि बिकाऊ मीडिया चैनलों के जरिए ऐसी मोटी तनख्वाह और भत्तों की बात अगर फैलती तो जैसे-तैसे गुजारा कर रहे स्किल्ड लेबर या सेमी स्किल्ड लेबर (जो पता नहीं किस न्यूनतम दैनिक मजदूरी पर काम करते हैं) जरूर नाराज होकर हड़ताल करते। अच्छा ही है कि ज्यादा बिकने वाले समाचार-पत्रों या प्राइम टाइम पर ये चर्चा नहीं हुई।

बाकी जिन्हें लगता हो कि भारतवर्ष में हिन्दुओं को दोयम दर्जे के नागरिकों की तरह नहीं रहना पड़ता, वो ढूँढने के प्रयास करें। अगर तुलनात्मक रूप से हिन्दुओं को अपने धर्म और पूजा-पद्धतियों के पालन के संवैधानिक अधिकार दिए जाने का एक भी उदाहरण दिखता हो, तो हम भी उस एक उदाहरण को देखना चाहेंगे।

30 लोगों ने 2 साल तक नाबालिग लड़की का किया बलात्कार, अशरफ सहित 3 गिरफ़्तार

केरल में एक नाबालिग लड़की के साथ दरिंदगी का भयावह मामला सामने आया है। घटना मल्ल्पुरम जिले में स्थित चेलारी क्षेत्र की है। यहाँ एक 12 वर्षीय लड़की के साथ 30 लोगों ने बलात्कार किया। पीड़िता 7वीं की छात्रा है। पुलिस ने आरोपितों के ख़िलाफ़ पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है। पुलिस ने इस मामले में 3 लोगों को गिरफ़्तार भी किया है। गिरफ़्तार आरोपितों में से एक की पहचान 36 वर्षीय अशरफ के रूप में हुई है और दूसरे का नाम शिजु है। केरल की स्थानीय मीडिया के अनुसार, लड़की के माँ-बाप की सहमति से उसके साथ बलात्कार किया गया।

पुलिस ने इस मामले में पीड़िता के पिता को भी गिरफ़्तार कर लिया है। यह मामला तब सामने आया, जब स्थानीय लोगों ने स्कूल के ‘पेरेंट्स टीचर्स एसोसिएशन’ को बताया कि पीड़िता कुछ दिनों से पढ़ाई नहीं कर रही थी। शिक्षकों ने पाया कि वह कई दिनों तक क्लास में अनुपस्थित रहती थी और मानसिक रूप से काफ़ी परेशान लग रही थी। स्कूल ने इसकी सूचना चाइल्डलाइन अथॉरिटी को दी। अथॉरिटी के सदस्यों ने जब लड़की से पूछताछ की, तब उसके साथ बलात्कार और यौन शोषण का मामला सामने आया।

इसके बाद पीड़िता को चाइल्ड वेलफेयर कमिटी के समक्ष पेश किया गया, जहाँ से उसे चिल्ड्रन शेल्टर होम भेज दिया गया है। रविवार (सितम्बर 22, 2019) को पुलिस ने इस समबन्ध में मामला दर्ज किया और उसी दिन पीड़िता ने मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश होकर अपना बयान दर्ज कराया। फिलहाल तीनों आरोपितों को जुडिशल कस्टडी में भेजा गया है। यह भी पता चला है कि यह सब पूरे 2 साल से चल रहा था और इस दौरान विभिन्न लोगों ने पीड़िता का बलात्कार किया।

चाइल्ड वेलफेयर कमिटी के अध्यक्ष ने बताया कि इस पूरे मामले में पीड़िता का पिता ही सबसे ज्यादा दोषी है। उन्होंने बताया कि लड़की के माता-पिता ने अपनी बेटी के साथ बलात्कार करने के लिए सहमति दी। चूँकि, इस मामले में कई लोग आरोपित हैं, कमिटी ने पुलिस से बड़े स्तर पर जाँच करने की अपील की है।

7 साल में 4000 ईसाई लड़कियाँ ‘लव जिहाद’ की शिकार: अल्पसंख्यक आयोग ने अमित शाह से लगाई गुहार

हिंदू ही नहीं ईसाई लड़कियाँ भी ‘लव जिहाद’ का शिकार हो रही हैं। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NMC) ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को इस सम्बन्ध में पत्र लिखा है। केरल के कोझीकोड में एक ईसाई व्यक्ति ने अपने बेटी के साथ ब्लैकमेलिंग का मामल दर्ज कराया था। अपनी शिकायत में उसने कहा था कि उसकी बेटी को ब्लैकमेल कर उसे इस्लाम कबूलने के लिए मजबूर किया जा रहा है। अल्पसंख्यक आयोग ने इस ख़बर को गंभीरता से लेते हुए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का ध्यान इस तरफ आकृष्ट कराया है।

अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष जॉर्ज कुरियन ने पत्र में स्वीकार किया है कि धर्मान्तरण के मामले काफ़ी ज्यादा बढ़ गए हैं। उन्होंने बताया कि इस कार्य को एक सुनियोजित तरीके से और संगठनात्मक रूप से अंजाम दिया जा रहा है। कुरियन के अनुसार, पीड़ितों को ‘लव जिहाद’ के तहत फँसा कर आतंकी गतिविधियों में उनका इस्तेमाल किया जा रहा है। केरल से आने वाले जॉर्ज कुरियन ख़ुद ईसाई हैं और उन्हें मई 2017 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का उपाध्यक्ष बनाया गया था।

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने गृह मंत्रालय को लिखा पत्र: ईसाई लड़कियाँ बन रही हैं लव जिहाद’ की शिकार

जॉर्ज कुरियन ने कहा कि ईसाई लड़कियाँ ‘लव जिहाद’ का सबसे आसान शिकार बन रही हैं। उन्होंने गृह मंत्रालय से इस ख़तरनाक चलन को रोकने और इस मामले में एनआईए से जाँच कराने की माँग की। बकौल अल्पसंख्यक आयोग, ईसाई लड़कियाँ इस्लामिक कट्टरवादियों के लिए एक ‘सॉफ्ट टारगेट’ बन गई हैं। आयोग ने कहा कि अब इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा चलाए जा रहे धर्मान्तरण अभियान को रोकने के लिए क़ानून बनाने का समय आ गया है। कुरियन ने कहा:

“कई अभिभावकों में ‘लव जिहाद’ को लेकर डर का माहौल है और उनका ये डर जायज भी है। पूर्व में कई मामले ऐसे आ चुके हैं, जहाँ ईसाई लड़कियों को ‘लव जिहाद’ का शिकार बनाया गया। केरल के 21 लोग खूँखार वैश्विक आतंकी संगठन आईएसआईएस में शामिल हो गए। इनमें से 5 ऐसे थे, जो पहले ईसाई थे और बाद में उन्हें धर्मान्तरण के जरिये इस्लाम कबूलवाया गया था।”

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की यह चिंता 2 हालिया घटनाओं के कारण बढ़ गई है। पहली घटना केरल के कोझीकोड की है, जहाँ एक कॉलेज छात्रा के साथ बलात्कार किया गया और फिर उसका वीडियो बना लिया गया। पीड़िता ईसाई समुदाय से आती है। आरोपितों ने रेप का वीडियो बनाया और फिर उस वीडियो के जरिए पीड़िता को इस्लाम कबूलने के लिए ब्लैकमेल करते रहे। जब पीड़िता ने ऐसा करने से मना कर दिया, तब उसके हॉस्टल से ही उसका अपहरण कर लिया गया। एक अन्य घटना में ईसाई लड़की का रेप किया गया और उससे इस्लाम कबूल करवाया गया।

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने लिखा कि अधिकतर मामलों में पीड़ितों का ब्रेनवाश किया गया। आयोग ने चिंता जताई है कि अगर यह सब चालू रहा तो केरल में सांप्रदायिक सौहार्द की स्थिति बिगड़ सकती है। कई मामलों में पीड़ितों के परिवार वालों ने डर के कारण चुप रहना ही उचित समझा, क्योंकि धर्मान्तरण लॉबी काफ़ी शक्तिशाली और संगठित है। कैथोलिक कॉन्फ्रेंस ने भी स्वीकारा है कि ‘लव जिहाद’ एक समाजिक बुराई बन गई है, जिसके तहत ईसाई लड़कियों का यौन शोषण किया जाता है और फिर उनकी पूरी जिंदगी नरक बन जाती है। अधिकतर जवान ईसाई लड़कियों को ही निशाना बनाया जा रहा है।

‘TOI’ के कोच्चि संस्करण में में छपी ख़बर

केरल बिशप कैथोलिक कॉन्फ्रेंस ने इस सम्बन्ध में एक रिपोर्ट तैयार की है। इस रिपोर्ट के अनुसार, 2005 से लेकर 2012 तक, 7 वर्षों में 4000 ईसाई लड़कियों को ‘लव जिहाद’ का शिकार बनाया गया था। इन सबको प्यार के जाल में फँसाया गया और जबरन धर्मान्तरण कर के इस्लाम कबूल करवाया गया। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने भी ‘Kerala Catholic Bishops Conference’s Commission for Social Harmony and Vigilance’ की इस रिपोर्ट का जिक्र करते हुए चिंता जताई है।

सिख नरसंहार: CM कमलनाथ तक पहुँची आँच, चश्मदीद ने SIT के समक्ष दर्ज कराया बयान

1984 सिख नरसंहार मामले में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही है। कॉन्ग्रेस नेता कमलनाथ के ख़िलाफ़ गवाह मुख्तयार सिंह ने मामले की जाँच कर रही एसआईटी के समक्ष पेश होकर अपना बयान दर्ज कराया। गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब के पास 2 सिखों को भीड़ द्वारा मार डालने के मामले में कमलनाथ के ख़िलाफ़ बयान दर्ज किया गया। दिल्ली गुरुद्वारा कमिटी के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा ने इसे सिख समुदाय के लिए बड़ी जीत करार दिया है।

मुख्तयार सिंह जब अपना बयान दर्ज कराने के लिए एसआईटी के दफ्तर पहुँचे, तब उनके साथ सिरसा भी थे। अकाली दल के नेता सिरसा दिल्ली के राजौरी गार्डन से विधायक हैं। उन्होंने इससे पहले गवाह मुख्तयार की सुरक्षा के लिए उचित बंदोबस्त करने की माँग की थी, क्योंकि हाई प्रोफाइल केस होने के कारण उन्हें नुकसान पहुँचाया जा सकता है। मुख्तयार सिंह अगले सप्ताह कुछ डॉक्युमेंट्स के साथ फिर एसआईटी के समक्ष पेश होंगे। उनके साथ पत्रकार संजय सूरी की गवाही भी दर्ज की जाएगी।

दोनों ही गवाहों के बयान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए दर्ज किए जाएँगे। गवाह मुख्तयार सिंह ने सार्वजनिक रूप से यह बताने से इनकार कर दिया कि उन्होंने एसआईटी से क्या कहा, क्योंकि मामले की अभी चल रही है। जाँच कमिटी में डिस्ट्रिक्ट पुलिस कमिश्नर और रिटायर्ड डिस्ट्रिक्ट जज शामिल हैं। 72 वर्षीय कमलनाथ को गाँधी परिवार का विश्वस्त माना जाता है। बता दें कि गृह मंत्रालय ने सिख दंगे से जुड़े कई मामलों की फाइलें फिर से खोलने का निर्णय लिया है, जिसके परिणामस्वरूप कमलनाथ व अन्य नेताओं के ख़िलाफ़ फिर से इन मामलों की जाँच चल रही है।

वरिष्ठ अधिवक्ता एचएस फुल्का ने अपनी पुस्तक में रकाबगंज गुरुद्वारा पर हमले का जिक्र किया है। फुल्का ने लिखा है कि भीड़ द्वारा गुरुद्वारा को नुक़सान पहुँचाया गया था और 2 सिखों को ज़िंदा जला डाला गया था। फुल्का लिखते हैं कि हत्यारों द्वारा 5 घंटे तक उत्पात मचाया गया और कहा जाता है कि कॉन्ग्रेस नेता कमलनाथ पूरे 2 घंटे तक भीड़ के साथ रहे। तत्कालीन कमिश्नर और एडिशनल कमिश्नर ने भी मौके पर कमलनाथ की मौजूदगी की पुष्टि की थी। अगले दिन इंडियन एक्सप्रेस में ख़बर छपी थी कि कमलनाथ ने ही भीड़ का नेतृत्व किया था।

कमलनाथ से जुड़ा ये केस FIR संख्या 601/84 पर आधारित है। 1 नवम्बर 1984 की यह घटना उन 7 मामलों में से एक है, जिन्हें फिर से खोला गया है। ये मामला उन बयानों और संजय सूरी (क्राइम पत्रकार) जैसे गवाहों पर आधारित है। हालाँकि उस समय इस मामले में हुई FIR में कमलनाथ का नाम नहीं था और ट्रॉयल रूम ने ये केस बंद कर दिया था, लेकिन अब जैसे ही ये मामला खुला है, लोगों की नजरे फिर से कमलनाथ पर अटक गई हैं।

गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब दिल्ली में संसद भवन के पास स्थित है। इसे सन 1783 में सिख योद्धा बघेल सिंह द्वारा बनवाया गया था। नौवें सिख गुरु तेग बहादुर ने कश्मीरी पंडितों पर इस्लामिक आक्रांताओं के अत्याचारों का विरोध किया तो उन्हें औरंगजेब ने उनका शीश काटने का हुक्म दे दिया। गुरु तेग बहादुर के बलिदान के बाद इसी ऐतिहासिक स्थल पर उनका अंतिम संस्कार किया गया था।

बाबा सिद्दीकी के बेटे को टिकट मत दो, वह दागदार है: कॉन्ग्रेस के 12 नेताओं ने खोला मोर्चा

महाराष्ट्र में अब कॉन्ग्रेस के नेता ही अपनी पार्टी में चल रहे वंशवाद के ख़िलाफ़ मुखर हो रहे हैं। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के लिए तारीखों का ऐलान हो चुका है और कॉन्ग्रेस-एनसीपी गठबंधन बना कर चुनाव लड़ रही है। दोनों ही दलों के कई बड़े नेता भाजपा में शामिल हो चुके हैं। एनसीपी की हालत तो यह है कि इसके संस्थापक सदस्यों में अब सिर्फ़ अकेले शरद पवार ही पार्टी में बचे रह गए हैं। वह एनसीपी के अध्यक्ष भी हैं। मुंबई में 12 कॉन्ग्रेस नेताओं ने पूर्व विधायक बाबा सिद्दीकी के बेटे को टिकट दिए जाने के ख़िलाफ़ प्रेस कॉन्फ्रेंस किया।

बता दें कि 1997 से 2014 तक लगातार 17 वर्षों तक विधायक रहे बाबा सिद्दीकी महारष्ट्र सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। अपनी इफ्तार पार्टी के लिए सुर्खियाँ बटोरने वाला बाबा जियाउद्दीन सिद्दीकी को मुंबई भाजपा के अध्यक्ष आशीष शेलार ने हरा दिया था। हर साल होने वाली उनकी इफ्तार पार्टी में बॉलीवुड की ख़ान त्रिमूर्ति से लेकर कई अभिनेता-अभिनेत्री शामिल होते हैं। उनके बेटे ज़ीशान सिद्दीकी को टिकट दिए जाने का विरोध करते हुए मुंबई कॉन्ग्रेस के कई नेताओं ने इसे वंशवाद करार दिया।

हालाँकि, अभी तक कॉन्ग्रेस ने उम्मीदवारों की सूची नहीं ज़ाहिर की है लेकिन बांद्रा ईस्ट कॉन्ग्रेस के 12 नेताओं ने पार्टी आलाकमान से कहा है कि किसी बाहरी उम्मीदवार के बजाय स्थानीय नेता को टिकट दिया जाए। प्रेस कांफ्रेंस करने वालों में मुंबई कॉन्ग्रेस के जनरल सेक्रेटरी, सेक्रेटरी, मुंबई महिला कॉन्ग्रेस की उपाध्यक्ष सहित कई अधिकारी शामिल थे। कॉन्ग्रेस नेताओं ने कहा कि ख़राब समय से गुजर रही पार्टी अगर स्थानीय नेताओं को टिकट दिया तभी वे पार्टी को जीता पाएँगे। उन्होंने वंशवाद को बढ़ावा न देने की अपील की।

कॉन्ग्रेस नेताओं ने कहा कि अगर ज़ीशान सिद्दीकी को टिकट दिया गया तो वे सभी न सिर्फ़ कॉन्ग्रेस पदाधिकारी के पद से बल्कि पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से भी इस्तीफा दे देंगे। कॉन्ग्रेस नेताओं का कहना है कि ज़ीशान का आपराधिक इतिहास भी है। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस पर प्रतिक्रिया देते हुए कॉन्ग्रेस के बड़े नेताओं ने कहा कि स्थानीय नेताओं को प्रेस के पास जाने की बजाय आलकमान से बात करनी चाहिए थी। हालाँकि, उन्होंने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की कि बाबा सिद्दीकी के बेटे ज़ीशान को टिकट दिया जाएगा या नहीं।

महाराष्ट्र में पहले से ही बुरी स्थिति में चल रही कॉन्ग्रेस के लिए यह अच्छी ख़बर नहीं है, क्योंकि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर तो विपक्षी दशकों से वंशवाद का आरोप लगाते रहे हैं लेकिन अब निचले स्तर पर कॉन्ग्रेस के ही नेता इसके ख़िलाफ़ मुखर हो रहे हैं।

रामलला की सैलरी ₹1000 प्रतिदिन, लोगों ने पूछा- हर महीने दान में मिलने वाले ₹6 लाख कहाँ जाते हैं?

अयोध्या विवाद पर इन दिनों सुप्रीम कोर्ट में रोजाना सुनवाई चल रही है। दलीलों से दूर रामलला अभी भी जन्मस्थान पर एक टेंट में विराजमान हैं। वहाँ साथ में लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न की प्रतिमाएँ भी हैं। राम जन्मभूमि अयोध्या में स्थापित इस मंदिर में रामलला व उनके भाइयों को सरकार से मिलने वाले पेमेंट में बढ़ोतरी की गई है। प्रतिमाओं को प्रतिदिन नहलाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। चन्दन और पुष्पहारों से की जाने वाली इस पूजा प्रक्रिया में कुल 16 चीजों का प्रयोग किया जाता है।

मंदिर में एक कूलर और ब्लोअर भी लगा है, जिसे मौसम के हिसाब से चलाया जाता है। प्रत्येक वर्ष रामनवमी के अवसर पर सभी प्रतिमाओं के लिए नए कपड़े ख़रीदे जाते हैं। कुल मिला कर देखें तो रामलला के लिए पूरी व्यवस्था करने में प्रतिदिन 1000 रुपए का ख़र्च आता है। कई वर्षों से मंदिर के कर्मचारी और पुजारी पेमेंट बढ़ने की माँग कर रहे थे। पिछले महीने उत्तर प्रदेश सरकार ने पेमेंट राशि को 26,200 रुपए से बढ़ा कर 30,000 रुपए कर दिया।

आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि मात्र 3,800 रुपए की यह बढ़ोतरी 1992 के बाद पिछले 27 सालों में अब तक की सबसे बड़ी बढ़ोतरी है। मुख्य पुजारी महंत सत्येंद्र दास के वेतन में भी 1,000 रुपए का इजाफा किया गया है। अब उन्हें प्रति महीने 13,000 रुपए मिलेंगे। वह 1992 से ही इस पद पर हैं। उन्होंने कहा कि अब रामलला की पूजा प्रक्रिया और बेहतर तरीके से हो पाएगी। मंदिर में अन्य 8 कर्मचारियों की सैलरी 7,500 रुपए से 10,000 रुपए के बीच है। उनकी सैलरी में भी 500 रुपए का इजाफा किया गया है।

महंत दास ने कहा कि पेमेंट बढ़ाए जाने से रामलला मंदिर के लिए प्रसाद, भोजन, पानी, बिजली की व्यवस्था सही से हो पाएगी। उन्होंने बताया कि पहले मिलने वाली राशि पर्याप्त नहीं थी और कई बार उन्हें अपनी जेब से रुपए लगाने पड़ते थे। उन्होंने बताया कि उनके पास पूजा व अन्य प्रक्रिया के लिए सामान ख़रीदने के लिए फण्ड नहीं होते हैं। महंत ने जानकारी दी कि उन्हें राशन की दुकानों, माली और मिठाई वगैरह में भी रुपए ख़र्च करने पड़ते हैं।

महंत सत्येंद्र दास ने सरकार से माँग करते हुए कहा कि रामलला व अन्य प्रतिमाओं के लिए साल में 4 बार नए कपड़े ख़रीदे जाने चाहिए, लेकिन ऐसा वर्ष में एक बार सिर्फ़ रामनवमी के अवसर पर ही होता है। विश्व हिन्दू परिषद के स्थानीय प्रवक्ता शरद शर्मा ने कहा कि बहुत सारे श्रद्धालु अब रामलला को कपड़े चढ़ा रहे हैं, जिससे अब पुजारियों के लिए काम आसान हो गया है।

एक और जानने लायक बात यह है कि मंदिर को प्रत्येक महीने 6 लाख रुपए दान में मिलते हैं, जो सरकार द्वारा संचालित बैंक खाते में जाते हैं। मंदिर रोज सुबह 7 बजे खोला जाता है और 11 बजे तक श्रद्धालु दर्शन कर सकते हैं। इसके बाद रामलला को भोग लगाया जाता है। दोपहर 2 बजे से 6 बजे तक मंदिर श्रद्धालुओं के लिए बंद रहता है और फिर इसे शाम 8 बजे तक के लिए खोला जाता है और पूजा होती है।

सोशल मीडिया पर श्रद्धालुओं ने माँग करते हुए कहा कि जब मंदिर को मिलने वाले दान का प्रबंधन सरकार के हाथों में है तो रामलला की पूजा और व्यवस्था के लिए इतने कम रुपए क्यों दिए जाते हैं? लोगों ने रामलला की पेमेंट बढ़ाने की माँग की। सवाल यह भी है कि जब मंदिर को दान में प्रति महीने 6 लाख रुपए मिलते हैं तो इसे रामलला और मंदिर की व्यवस्था में ख़र्च क्यों नहीं किया जाता?

कॉन्ग्रेस सरकारों की कर्जमाफी: किसानों को नहीं मिली राहत, यूपी पर गला फाड़ने वाला मीडिया भी चुप

पिछले वर्ष के अंत में हुए विधानसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कर्जमाफी का वादा कर सरकार गठन में सफलता प्राप्त की। अपने तरकश के सारे तीर फेल हो जाने के बाद कॉन्ग्रेस ने कर्जमाफी का दाँव खेला था, क्योंकि पंजाब में भी यह फॉर्मूला कामयाब रहा था।अर्थशास्त्रियों ने इसे लेकर आपत्ति जताई कि इससे बैंकों पर दबाव बढ़ेगा और वे किसानों को क़र्ज़ देना ही बंद कर देंगे, लेकिन वोट बैंक की चिंता में दुबले होते जा रहे राजनीतिज्ञों ने इसे नज़रअंदाज़ कर दिया। ख़ैर, उससे पहले भाजपा भी यूपी में कर्जमाफी का वादा कर चुकी थी।

योगी आदित्यनाथ सरकार के पास किसानों की कर्जमाफी के लिए योजना थी, क्योंकि सरकार ने बॉन्ड्स बेच कर बैंकों को नुक़सान होने से रोका। वहीं, कॉन्ग्रेस के पास ऐसी कोई योजना नहीं थी। जैसे-तैसे कर उसने सरकार का गठन तो कर लिया, लेकिन कर्जमाफी अधर में लटक गई। मध्य प्रदेश में तो लोकसभा चुनाव का बहाना बना कर इसे टरकाया गया। आम चुनाव के लिए आचार संहिता लागू होने से पहले ही किसनों को मैसेज जाने लगे कि कर्जमाफी अब चुनाव के बाद होगी।

इन सबके बावजूद मीडिया ने इन ख़बरों को तवज्जो नहीं दी, जबकि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में कर्जमाफी को लकीर बड़ा दुष्प्रचार अभियान चलाया गया। इसमें मुख्यधारा की मीडिया से लेकर प्रोपगेंडा पोर्टल्स तक शामिल रहे। मीडिया ने ऐसी ख़बरें चलाईं कि कई किसानों का 10 रुपए और 20 रुपए का क़र्ज़ माफ़ हुआ है। स्थानीय स्तर पर अधिकारियों द्वारा की गई गड़बड़ियाँ हाइलाइट की गई, जबकि कॉन्ग्रेस शासित प्रदेशों में सीधे राज्य सरकार के स्तर पर हुई बड़ी धांधलियों को कवर तक नहीं किया गया। मध्य प्रदेश में तो कर्जमाफी पर सवाल पूछने पर किसान को ज्योतिरादित्य सिंधिया की सभा से ही भगा दिया गया।

आजतक ने यूपी में कर्जमाफी की ख़बर चलाई कि किसानों को सर्टिफिकेट तो मिल गया लेकिन उसमें लिखी रक़म संदिग्ध थी, क्योंकि 10-20 लेकर 100-200 रुपए तक के क़र्ज़ माफ़ किए गए। जबकि, मंत्रियों का कहना था कि ये वो राशि थी जो कर्जमाफी के बाद बच गई थी। योगी सरकार ने कहा कि उसने ढाई साल में 43 लाख किसानों का 25 हज़ार करोड़ रुपए का क़र्ज़ माफ़ किया। कई फ़र्ज़ी व्यक्तियों ने भी इस योजना का लाभ उठा लिया, बाद में जिसकी जाँच हुई। यूपी में लघु व सीमान्त किसानों का 1 लाख रुपए तक का क़र्ज़ माफ़ किया गया था।

कॉन्ग्रेस के कर्जमाफी स्कीम की पोल इसी से खुल गई कि लोकसभा चुनाव में भी पार्टी ने इसी को मुद्दा बनाया और मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान- तीनों ही राज्यों में पार्टी को बुरी हार मिली। जिन किसानों ने कर्जमाफी की उम्मीद में कॉन्ग्रेस को वोट दिया था, कुछ ही महीने बाद वे कॉन्ग्रेस से रूठ गए। इससे पता चलता है कि इन राज्यों में कर्जमाफी की प्रक्रिया ठीक से पूरी नहीं की गई। मध्य प्रदेश में तो राज्य सरकार ने पीएम किसान निधि को भी कई दिनों तक सिर्फ़ इसीलिए रोक कर रखा, क्योंकि राज्य सरकार कर्जमाफी पर काम करने का दावा कर रही थी।

लोकसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि कमलनाथ सरकार ‘पीएम किसान सम्मान निधि’ के अंतर्गत लाभार्थी किसानों की सूची केंद्र सरकार को भेजने में देरी कर रही है, क्योंकि कॉन्ग्रेस को शक है कि इससे भाजपा और मोदी को चुनावी लाभ मिल जाएगा। इस योजना के पहले पहले फेज में 1 करोड़ से भी अधिक किसानों के खाते में 2000 रुपए गए, लेकिन उनमें मध्य प्रदेश का एक भी किसान नहीं था। इसका मतलब ये कि कर्जमाफी में गड़बड़ी तो हुई ही, केंद्र सरकार की योजना को भी रोक कर रखा गया और यही किसानों के आक्रोश का कारण बना।

मध्य प्रदेश में कर्जमाफी फेल हुई है, ऐसा सिर्फ़ विपक्ष का ही नहीं मानना है। ख़ुद कॉन्ग्रेस के नेता भी ऐसा ही मानते हैं। एक दशक तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह कॉन्ग्रेस के बड़े नेता हैं। उनके भाई लक्ष्मण सिंह ने सीधा कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी के कर्जमाफी के वादे पर ही सवाल उठा दिए। उन्होंने साफ़-साफ़ कहा कि चुनाव के दौरान राहुल को कर्जमाफी का वादा नहीं करना चाहिए था। उन्होंने कर्जमाफी को असंभव करार दिया। उन्होंने कहा कि 45 हज़ार करोड़ की कर्जमाफी आसान काम नहीं है। उन्होंने कहा कि कमलनाथ सरकार कर्जमाफी का आकलन करने में विफल साबित हुई है।

जब पार्टी के बड़े नेता ही स्वीकार कर रहे हैं कि कर्जमाफी किसी भी क़ीमत पर संभव नहीं है तो मीडिया में इस पर सन्नाटा क्यों है? यूपी से ढूँढ-ढूँढ कर कर्जमाफी को लेकर गड़बड़ियों की ख़बर को हाइलाइट करने वाला और दुष्प्रचार फैलाने वाला मीडिया मध्य प्रदेश में कर्जमाफी की खस्ता हालत को राष्ट्रीय स्तर पर क्यों नहीं हाइलाइट कर रहा? राजस्थान की भी यही स्थिति है। कई किसानों ने कर्जमाफी न होने के कारण विरोध प्रदर्शन किया। ‘ऑल इंडिया किसान सभा’ ने इस वर्ष जनवरी में प्रदर्शन किया।

बता दें कि यह संगठन भाजपा से सम्बद्ध नहीं है। ‘ऑल इंडिया किसान सभा’ कम्युनिस्ट पार्टी से सम्बद्ध किसान संगठन है। किसानों ने आरोप लगाया कि गहलोत सरकार ने कई ‘नियम एवं शर्तों’ के साथ कर्जमाफी की, वो भी आधी-अधूरी। किसानों का कहना था कि पहले कहा गया कि सभी किसानों का कर्ज माफ़ किया जाएगा, बाद में कहा जाने लगा कि केवल राष्ट्रीय बैंकों से कर्ज लेने वाले किसानों का ही कर्ज माफ़ होगा। किसानों का यह गुस्स्सा लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस की हार के पीछे के कई प्रमुख कारणों में से एक रहा।

राजस्थान में कर्जमाफी में शर्तों की बानगी देखिए। एक तो कहा गया कि केवल राष्ट्रीय बैंकों से लिया गया क़र्ज़ ही माफ़ होगा। दूसरे यह कि पंचायत या नगर पंचायत जनप्रतिनिधियों, सरकारी नौकरों व पेंशनधारियों के परिवारों को इस सूची से बाहर रखा जाएगा। इससे कई लोग ऐसे ही कर्जमाफी की सूची से बाहर हो गए। 23 जून को राजस्थान के श्री गंगानगर में सोहन लाल नामक किसान ने आत्महत्या कर ली। आत्महत्या से पहले उन्होंने एक वीडियो बनाया, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि कॉन्ग्रेस की कर्जमाफी स्कीम से किसानों को कोई फ़ायदा नहीं हुआ है।

उन्होंने वीडियो में अशोक गहलोत सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि बैंक अभी भी किसानों को परेशान कर रहे हैं और इसके गहलोत सरकार को परिणाम भुगतने होंगे। राजस्थान भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और दिवंगत वयोवृद्ध नेता मदन लाल सैनी ने दावा किया था कि 3 किसानों ने राजस्थान सरकार की कर्जमाफी योजना का लाभ न मिलने के कारण आत्महत्या कर ली। कॉन्ग्रेस नेता या तो ये कहते रहे कि कर्जमाफी की प्रक्रिया सफलतापूर्वक संपन्न हो गई है या फिर लोकसभा चुनाव को लेकर लागू आचार संहिता पर उन्होंने सारा ठीकरा फोड़ दिया। राजस्थान में तो सरकार बनने के बाद जारी हुए बजट में भी कर्जमाफी को लेकर एक शब्द भी नहीं कहा गया।

कॉन्ग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गाँधी ने राजस्थान और मध्य प्रदेश में सरकार गठन के 10 दिनों के भीतर कर्जमाफी का ऐलान किया था। गड़बड़ियाँ तो होनी ही थीं, क्योंकि बिना किसी योजना के इतना बड़ा चुनावी वादा और वो भी इतनी कम समयसीमा में कर दी गई। तभी उनकी ही पार्टी के नेता अब उन्हें नसीहत दे रहे हैं। मध्य प्रदेश में तो स्थिति यह हो गई कि सरकार गठन के 4 महीने बाद किसानों ने 3 दिन का विरोध प्रदर्शन किया, क्योंकि उन्हें कर्जमाफी का लाभ नहीं मिला। बैंक लगातार किसानों को नोटिस भेजते रहे कि उन्हें डिफॉल्टर घोषित कर दिया जाएगा। मध्य प्रदेश के कृषि मंत्री से मिलने के बावजूद किसानों ने प्रदर्शन जारी रखा।

कॉन्ग्रेस शासित पंजाब की स्थिति भी गड़बड़ है। वहाँ के तो अधिकारियों ने ही स्वीकार किया कि राज्य सरकार वित्तीय कारणों ने किसानों की कर्जमाफी करने में विफल साबित हुई है। किसान नेताओं का कहना था कि छोटे कृषकों को कर्जमाफी का कोई लाभ नहीं मिला। छत्तीसगढ़ की स्थिति और और भी बदतर है। बस्तर सहित कई नक्सल प्रभावित इलाक़ों में किसानों के सरकारी डेटाबेस में ही खामी आ गई और इस वजह से कर्जमाफी लागू ही नहीं हो सकी। वहाँ भी कर्जमाफी न होने की वजह से एक किसान द्वारा आत्महत्या की ख़बर आई।

यहाँ सवाल यह उठता है कि उत्तर प्रदेश में इतने बड़े स्तर पर कर्जमाफी हुई और वहाँ की सरकार ने बैंकों पर बोझ न पड़ने के लिए योजना भी बनाई, फिर भी मीडिया के एक वर्ग द्वारा स्थानीय स्तर पर हुई ग़लतियों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया। राष्ट्रीय स्तर पर फेक नैरेटिव चलाया गया। जबकि, कॉन्ग्रेस शासित राज्यों में बड़े-बड़े चुनावी वादों के बावजूद किसानों ने आत्महत्या किया, विरोध प्रदर्शन किया, लेकिन इन ख़बरों को प्राथमिकता नहीं दी गई। कर्जमाफी पर मीडिया की सेलेक्टिव रिपोर्टिंग के बावजूद विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस को जिताने वाले किसानों ने लोकसभा चुनाव में उससे मुँह मोड़ लिया।

…अल्लाह का सम्मान नहीं किया तो भारत के टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे: सुप्रीम कोर्ट से मुस्लिम पक्षकार

राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट में आज मुस्लिम पक्षकार राजीव धवन ने अपनी दलीलें पेश की। जन्मस्थान को ‘न्यायिक व्यक्ति’ माने जाने पर धवन ने आपत्ति जताई। उन्होंने कहा विवाद ही इस बात को लेकर है कि राम का जन्मस्थान कहाँ है?

सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से पेश धवन ने दलील दी “हम राम का सम्मान करते हैं, जन्मस्थान का भी सम्मान करते हैं। इस देश में अगर राम और अल्लाह का सम्मान नहीं होगा तो देश खत्म हो जाएगा।” उन्होंने कहा कि अगर मान भी लिया जाए राम का जन्म वहाँ हुआ था, तो भी जन्मस्थान के रूप में उतने बड़े क्षेत्र पर दावा ठोकना एक निहायत ही कमज़ोर दलील है। धवन ने हिन्दू पक्ष की उस दलील पर आपत्ति जताई, जिसमें कहा गया था कि विवादित स्थल के सारे ढाँचों को ध्वस्त कर एक भव्य मंदिर का निर्माण होना चाहिए।

धवन ने कहा कि हिन्दू पक्ष सिर्फ़ यहाँ राम का जन्म होने की बात करते हैं, लेकिन उनकी अर्जी में कहीं भी उस क्षेत्र की बाउंड्री का जिक्र नहीं है। पूरी विवादित जमीन जन्मस्थान नहीं हो सकती। कुछ तो निश्चित स्थान होगा। पूरा क्षेत्र जन्मस्थान नहीं हो सकता।

धवन ने राम के साथ अल्लाह का भी नाम लिया। उन्होंने कहा:

“इसमें कोई शक नहीं है कि राम का सम्मान किया जाना चाहिए। अगर राम और अल्लाह का सम्मान नहीं किया गया तो भारत जैसा विविधताओं से भरा देश अलग-थलग हो जाएगा। हिन्दू पक्ष ने यह दिखाया है कि जन्मस्थान को लेकर आस्था है, लेकिन उन्होंने यह नहीं साबित किया है कि यहाँ पूजा होती थी। हाँ, ये कहा जा सकता है कि चबूतरे पर प्रार्थना होती थी लेकिन पूरे क्षेत्र के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। 1949 तक तो भीतरी क्षेत्र में एक प्रतिमा तक नहीं थी।”

धवन ने बाबरी मस्जिद को लेकर कहा कि वहाँ हमेशा से नमाज़ पढ़ी जाती रही है। उन्होंने दावा किया कि मस्जिद कभी भी वीरान नहीं पड़ा। अर्थात, इतिहास में किसी भी समय मस्जिद सुनसान नहीं रहा। राजीव धवन ने दावा किया कि ज्यादा से ज्यादा यह हुआ होगा कि कुछ दिनों तक मस्जिद का प्रयोग किसी ने नहीं किया गया होगा। धवन ने कहा कि जो भी शासक रहा हो और उसने धर्म या क़ुरान में से किसी का भी उल्लंघन किया हो, फ़ैसला संविधान के अनुरूप ही होना है।

राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि 18 अक्टूबर तक सुनवाई पूरी हो जाने की उम्मीद है, ताकि कोर्ट को फ़ैसला लिखने के लिए पर्याप्त समय मिल सके। सुब्रह्मण्यम स्वामी सहित तमाम विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया है कि 17 नवम्बर से पहले इस मामले में निर्णय आ जाएगा।

हॉस्टल में मृत मिली हिंदू मेडिकल छात्रा की ‘हत्या’ की न्यायिक जॉंच नहीं कराएगा पाकिस्तान

अपने हॉस्टल के कमरे में मृत मिली मेडिकल छात्रा नमृता चंदानी को इंसाफ दिलाने के लिए पाकिस्तान गंभीर नहीं है। एक पाकिस्तानी अदालत ने इस मामले की न्यायिक जॉंच की इजाजत देने से इनकार कर दिया है। प्रशासन पहले से ही इस मामले को आत्महत्या बता रफा-दफा करने की कोशिश में लगा है।

पाकिस्तान के लरकाना जिले के सत्र न्यायाधीश ने मृतका की मौत पर न्यायिक जाँच कराने से इनकार कर दिया है। नमृता सिंध के घोटकी शहर से थी, जहाँ हाल ही में एक हिंदू मंदिर में तोड़फोड़ की गई थी। उसका शव 17 सितंबर को हॉस्टल के कमरे में चारपाई पर संदिग्ध हालत में मिली थी। कमरा अंदर से बंद था और गले में रस्सी बंधी थी।

सिंध पुलिस ने 20 सितंबर को इस मामले में 2 लोगों को गिरफ्तार किया था। इनकी पहचान उसके सहपाठी अली शान मेमन और मेहरान अब्रो के तौर पर की गई थी। इनमें से एक नमृता का क्रेडिट कार्ड भी इस्तेमाल करता था।

ऐसा माना जा रहा है कि धर्मपरिवर्तन से इनकार करने पर नमृता की हत्या की गई थी। नमृता के भाई विशाल जो खुद मेडिकल कंसलटेंट हैं शुरुआत से इसे हत्या बता रहे हैं। उन्होंने नमृता की गर्दन पर तार के निशान देखने की बात कही थी। ऐसे ही निशान उसके हाथ पर थे। लेकिन नमृता की दोस्त का दावा है कि उसके गले में दुपट्टा बॅंधा था।

लेकिन, फिर भी स्थानीय पुलिस और प्रशासन इसे आत्महत्या साबित करने की कोशिश करता रहा। जबकि, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कहा गया था कि ‘गला घोंटने के साफ निशान दिखाई देते हैं।’ ऐसे में मामले की न्यायिक जॉंच की मॉंग अदालत द्वारा ठुकराए जाने से समझा जा सकता है कि पाकिस्तान की पूरी मशीनरी अल्पसंख्यकों को लेकर कितनी गंभीर है।

3 बीवी-15 बच्चे: जिले का सबसे बड़ा परिवार फिर भी मोहम्मद शरीफ को चाहिए और औलादें

देश में बढ़ती जनसंख्या जहाँ एक ओर चिंता का गंभीर विषय बना हुआ है, वहीं एक शख़्स ऐसा भी है जो 15 बच्चों का अब्बू होने के बावजूद संतुष्ट नहीं है। उत्तर प्रदेश में लखीमपुर के बौधियान कलां गाँव का रहने वाला मोहम्मद शरीफ़ का कहना है कि तीन बीवियों और 15 बच्चों का उसका परिवार इस ज़िले का सबसे बड़ा परिवार है। इस गाँव की कुल आबादी 6,000 है।

शरीफ ने बताया कि 1987 में जब जट्ट बेगम से उसका पहला निक़ाह हुआ तो उस वक़्त उसकी उम्र 14 साल की थी। पहली बीवी से उसके तीन बेटे और पाँच बेटियाँ हैं। शरीफ़ ने बताया कि नूर से मुलाक़ात होने के बाद नब्बे के दशक में उसने दूसरा निक़ाह किया। उससे चार बेटियाँ और एक बेटा है। इसके बाद 2000 में, शरीफ़ ने तरन्नुम बेगम (नेपाली) से तीसरा निक़ाह किया। उससे उसे एक बेटा और एक बेटी है।

दिलचस्प बात यह है कि खुद शरीफ़ को अपने सभी बच्चों के नाम याद नहीं रहते। उसने बताया कि हर शाम घर पहुँच कर वह बच्चों के सिर गिनता है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी बच्चे घर पर मौजूद हैं। शरीफ़ का सबसे बड़ा बेटा 24 साल का है और सबसे छोटी बेटी 2 साल की है।

मोहम्मद शरीफ़ का कहना है कि उसे बहुत प्यार करने वाला परिवार मिला है, जहाँ सभी एक साथ रहते हैं। यहाँ तक ​​कि उसकी तीनों बीवियाँ भी साथ रहती हैं। शरीफ़ ने बताया कि वो कभी ऐसी स्थिति नहीं आने देता जिससे परिवार में बीवियों और बच्चों के बीच किसी तरह की बहस या विवाद उत्पन्न हो जाए।

पेशे से किसान मोहम्मद शरीफ को इस बात पर पूरा भरोसा जताया कि अगर अल्लाह ने हमें धरती पर भेजा है, तो वह सुनिश्चित करता है कि कोई भी खाली पेट न सोए। शरीफ़ ने बताया कि उसे अक्सर मज़दूरी के बदले अनाज मिलता है और इससे परिवार का गुज़ारा चलता है।

हाल ही में शरीफ़ ने अपनी तीन बीवियों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत तीन आवासों के लिए आवेदन किया है। शरीफ परिवार नियोजन कार्यक्रमों से अनजान हैं और ज़ोर देकर कहता है कि बच्चे अल्लाह का उपहार हैं। उसने बताया कि अगर अल्लाह उसके परिवार को और औलाद दे तो उसे और ख़ुशी होगी।