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कॉन्ग्रेस राज में चमचमाने वाला राज ठाकरे बल्ब फ्यूज, चुनावी राजनीति से तौबा करने के दिए संकेत

कॉन्ग्रेस राज में उभरने वाले राज ठाकरे की राजनीतिक दुकान अब बंद होने के कगार पर पहुॅंच चुकी है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के सुप्रीमो ने लोकसभा चुनाव की तरह ही विधानसभा चुनाव भी नहीं लड़ सकती है। ईवीएम से छेड़छाड़ की आशंका और फंड की कमी का हवाला दे राज ठाकरे ने इसके संकेत दिए हैं। ईवीएम का बहाना उन्होंने आम चुनावों में भी बनाया था।

चाचा बाल ठाकरे से राजनीति के दॉंव-पेंच सीखने वाले राज ने मार्च 2006 में शिवसेना छोड़ मनसे का गठन किया था। फरवरी 2008 में मुंबई में उनके कार्यकर्ताओं ने जमकर गुंडई दिखाई थी। उत्तर भारतीयों को निशाना बनाया गया था। उस समय केंद्र और महाराष्ट्र दोनों जगहों पर कॉन्ग्रेस की सरकार हुआ करती थी और राज खूब दहाड़ते थे। 2014 के आम चुनावों से पहले उन्होंने मोदी के भी कसीदे पढ़े थे। लेकिन, भाव नहीं मिलने के बाद उनके खिलाफ खूब जहर उगला। नतीजतन, 2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी का खाता तक नहीं खुला।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, राज ठाकरे की चुनावी राजनीति से दिलचस्पी इस कदर कम हो गई है उन्होंने पार्टी के नेताओं को सलाह दी है कि देश की इकॉनामी ठीक न होने के कारण आगामी विधानसभा चुनाव से उन सबको दूर रहना चाहिए। उन्होंने अपनी बात के समर्थन में जो तर्क दिए हैं वो उनके ही पार्टी के नेताओं के गले के नीचे नहीं उतर रही है। इससे पार्टी नेताओं का एक बड़ा वर्ग नाराज बताया जा रहा है।

राज ठाकरे ने चुनाव नहीं लड़ने के संकेत अपने घर पर पार्टी नेताओं की बैठक में दिए। बैठक आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर पार्टी की दिशा एवं रणनीति पर चर्चा के लिए थी। कुछ नेताओं ने कहा कि चुनाव लड़ना चाहिए तो कुछ ने इसके खिलाफ अपनी राय रखी। इसके बाद राज ठाकरे ने अगली बैठक में अपना निर्णय सुनाने की बात कही। हालाँकि मंदी का हवाला देकर चुनाव से दूर रहने की सलाह देकर उन्होंने बता दिया कि उनके मन में क्या चल रहा है।

‘फंड हासिल करना मुश्किल है’

राज ठाकरे ने बैठक में कहा, “देश की खराब आर्थिक हालत को देखते हुए अपने पैसे संभाल कर रखिए और सोच समझ कर खर्च कीजिए। EVM पर होने वाले चुनाव निष्पक्ष नहीं होंगे। अगर पार्टी ने चुनाव मैदान में उम्मीदवार उतारे तो फंड हासिल करना मुश्किल होगा।”

राज ठाकरे की अध्यक्षता वाली पार्टी की हालात कितनी नाजुक चल रही है, इस बात का अंदाजा मनसे (MNS) नेताओं द्वारा बैठक में दिए गए बयान से लगाया जा सकता है। इस बैठक में कुछ नेताओं ने कहा, “चुनाव लड़ने में करोड़ों रुपए डालकर अगर हारना ही है, तो चुनाव लड़ने से क्या फ़ायदा? बीजेपी का ईवीएम के जोर पर सत्ता में आना तय है तो ऐसे में चुनाव लड़ने का निर्णय सही नहीं होगा।”

हिन्दी दिवस: एक भाषा ज़्यादा सीख लेने से संस्कृति कैसे बर्बाद होती है?

भारत में लगभग 19,500 मातृभाषाएँ हैं। मातृभाषा यानी वह भाषा जो बच्चे अपनी माँ से सीखते हैं। कुल 121 ऐसी भाषाएँ हैं जिन्हें 10,000 से ज्यादा लोग बोलते हैं। इसमें से 22 ऐसी भाषाएँ हैं जिन्हें भारत की 96% से ज्यादा जनता बोलती है। लगभग एक चौथाई लोग दो भाषाएँ बोल सकते हैं, और 7% को तीन भाषाएँ आती हैं। शहरी युवाओं की बात करें तो आधे लोग दो भाषाएँ जानते हैं, और 18% तीन।

हर राज्य में अपनी भाषाएँ हैं, कुछ में एक तो कुछ में एक से ज्यादा। इसका मतलब क्या है? मतलब यह है कि भाषाएँ बहुत हैं, लोग भी बहुत हैं और इन्हीं भाषाओं की विविधता, सांस्कृतिक विरासतों के कारण राज्यों का बँटवारा हुआ था। एक भाषा-संस्कृति के लोग, एक राज्य को अपना मान कर, अपनी छोटी-छोटी संस्कृतियों को सहेजते हुए, भारत की चलायमान सभ्यता के सहभागी बने।

जब राष्ट्र इतना विविध हो, तो जाहिर है कि संवाद के लिए किसी एक भाषा की जरूरत पड़ेगी। उत्तर भारत में हिन्दी की छतरी के नीचे आने वाली भाषाओं के केन्द्र में एक ही तरह का व्याकरण और शब्दावलियाँ हैं। तो लोग, एक दूसरे को आसानी से समझ लेते हैं।

फिर राजनीति आ गई पिक्चर में और भारत की भाषाई विविधता को ऐसे दिखाया गया मानो ये सभ्यताओं का महायुद्ध चल रहा हो। नेताओं को सत्ता से मतलब होता है, नागरिकों की बेहतरी से नहीं। यही कारण है कि ‘हिन्दी थोपना बंद करो’ जैसी बातें सामने आईं।

हमारा पूरा जीवन अंग्रेजी सीखने और एक्सेंट पकड़ने में चला जाता है। अंग्रेजों ने हमें गुलाम बनाया, लूटा, नरसंहार किए और उसकी भाषा हमने सीखने में जी-जान लगा दिया, लेकिन भारत की ही एक भाषा का, दूसरे राज्यों के बोर्ड पर निर्देशों की तरह इस्तेमाल करने से वो हिन्दी थोपना हो गया, तमिल-कन्नड़-तेलुगु-मलयालम संस्कृतियों पर हमला हो गया!

मैं यह नहीं मानता कि हिन्दी सबसे महान भाषा है और सब बोलें। जी नहीं, हर भाषा किसी संयोग के कारण किसी क्षेत्र की भाषा बनती है, फिर उसमें संस्कृति के अवयव जुड़ते हैं, साहित्य उपजता है, कलाएँ जन्म लेती हैं और वो अपनी पूर्णता को प्राप्त करती है। भाषा का कार्य संस्कृति को जीवित रखना है, अगली पीढ़ी तक पहुँचाना है। इसलिए चाहे वो बहुत छोटे सिक्किम की भाषा हो, या बहुत बड़े महाराष्ट्र की, दोनों ही किसी से कमतर नहीं।

हिन्दी को पूरे भारत को जोड़ने वाली भाषा के तौर पर इसलिए रखा गया कि किसी भी एक भारतीय भाषा की बात करें तो हिन्दी सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली, या समझी जाने वाली भाषा थी। इसलिए दक्षिण भारत के लोगों के लिए एक भाषा सीखना एक सहज उपाय था, ताकि वो कभी उत्तर भारत जाएँ, या उत्तर वाले दक्षिण जाएँ तो आपस में संवाद स्थापित हो सके।

इससे ज्यादा और कुछ भी नहीं। आप सोचिए कि हिन्दी जानने से आपकी संस्कृति कैसे प्रभावित हो रही है? अगर यह कहा जाए कि तुम तेलुगु छोड़ दो, और हिन्दी पढ़ो; तमिल में लिखे सारे निर्देश हटा कर तमिलनाडु में सिर्फ हिन्दी में निर्देश लिखे जाएँगे; कन्नड़ में अब नाटक या फिल्म नहीं बनेंगे, हिन्दी में ही सब होगा; मलयालम की किताबों को जला दो और हिन्दी अनुवाद पढ़ाओ, तब उसे हम कहेंगे कि ‘हिन्दी थोपी जा रही है।’

हमारे देश की केन्द्र सरकार वाली नौकरियों में कई बार एक क्षेत्र के लोगों को दूसरे क्षेत्र में नौकरियाँ करनी पड़ती हैं, उनके ट्रांसफर होते हैं, उन्हें दूसरी जगहों पर लम्बे समय तक रहना पड़ता है। हमारे पास दो उपाय होते हैं: नौकरी छोड़ दें, या वहाँ के हिसाब से खुद को समृद्ध करें। वहाँ का भोजन, वहाँ की भाषा, पहनावा आदि अपनाते हुए, भारत की विविधता को स्वयं में समाहित कर लें।

ये प्रक्रिया हर वो व्यक्ति अपनाता है जो उत्तर प्रदेश का होते हुए चेन्नई में नौकरी करता है, या तमिलनाडु का होते हुए लखनऊ में जीवनयापन करता है। इसे सकारात्मक तौर पर देखते हुए, हमें समझना चाहिए कि हम एक भाषा को, एक नई संस्कृति को, अपने देश के एक अलग राज्य को अपना कह रहे हैं। ये मेरी जन्मभूमि है, ये मेरी कर्मभूमि और पूरा भारत मेरी मातृभूमि है। सिर्फ बिहार या तमिलनाडु मातृभूमि नहीं होती, भारतभूमि हमारी मातृभूमि है।

अब बात आती है कि अंग्रेज़ी को लिंक-लैंग्वेज की तरह प्रमोट करना चाहिए। दुर्भाग्य से सरकारी कार्यलयों में अंग्रेजी को यह ओहदा मिला हुआ है। दुर्भाग्य इसलिए कि भारत में कुल मिला कर पाँच प्रतिशत लोग नहीं हैं जो अंग्रेजी सही से बोल और लिख लें, लेकिन इसे सरकारी काम-काज की भाषा मान लिया गया। लोगों को इससे दिक्कत नहीं है।

इसे इसलिए रख लिया कि इससे किसी को दिक्कत नहीं होगी! ये किस तरह का तर्क है कि जो भाषा किसी को नहीं आती, या बहुत कम लोगों को आती है, उसे ही रख लो। इससे सरकारी काम-काज तो हो जाएगा लेकिन उड़ीसा के बालासोर का एक परिवार जब तमिलनाडु की सड़कों पर तमिल और अंग्रेजी में निर्देश पढ़ेगा तो उसे दोनों में एक भी समझ में नहीं आएगा। ऐसा नहीं है कि दक्षिण भारत में सब लोग अंग्रेजी समझते हैं। बिलकुल नहीं।

वहाँ के नवयुवक अंग्रेजी समझते हैं, लेकिन बड़े शहरों में ही। छोटे शहरों में स्थानीय भाषा छोड़ कर और कोई भाषा काम नहीं करती। इसलिए अंग्रेजी को बढ़ावा देना, और इस तर्क से बढ़ावा देना कि किसी को समस्या नहीं होगी तो फिर हमें नॉर्वेजियन सीखनी चाहिए, उससे पूरी दुनिया में किसी को समस्या नहीं है।

नेतागीरी और राजनीति की नकारात्मकता

बिहार के किसी गाँव में आखिर अंग्रेजी माध्यम के स्कूल क्यों हैं जहाँ न तो मैथिली भाषा है, न भोजपुरी और हिन्दी इसलिए पढ़ते हैं कि खानापूर्ति करनी है? उत्तर भारत के लोगों में अपनी ही भाषा और संस्कृति को लेकर एक हीन भावना घुसी हुई है कि वो किसी भी तरह अपने आप को अपनी भाषा से अलग करने की कोशिश करता है। वो न तो वैसा पहनावा पहनना चाहता है, न अपनी बोली बोलना चाहता है, बस उसे अंग्रेजी रॉक सुनना है और खराब अंग्रेजी बोलना है।

समस्या अंग्रेजी पढ़ने से नहीं है, समस्या इससे है कि अंग्रेजी ही सही भाषा है, भोजपुरी तो बेकार है। अगर तमिल लोगों के मन में यह भय है कि हिन्दी के आने से उनके मन में हीन भावना भर दी जाएगी कि हिन्दी महान है, तमिल कमतर, तो उनका डर सही है। लेकिन, सरकार की मंशा ऐसी नहीं रही। केन्द्र सरकार ने हिन्दी को, एक एक्सट्रा लैंग्वेज की तौर पर शामिल करने की बात कही ताकि लोगों का लोगों से जुड़ाव बन सके। पॉसिबिलिटी और प्रोबेबिलिटी के हिसाब से जो भाषा सबसे ज्यादा लोगों को समझ में आती हो, या सबसे कम लोगों को समझ में न आती हो, उसे उस समूह को सिखाने से सबका लक्ष्य सधता है।

लेकिन, फिर राजनीति कैसे होगी? फिर उत्तर बनाम दक्षिण कैसे होगा? नेताओं को एक मुद्दा चाहिए कि मराठों की नौकरियाँ बिहारी खाए जा रहे हैं, भगाओ इनको। मराठी लाठी ले कर पिल गए। उन्होंने ये भी नहीं सोचा कि सब्जी का ठेला लगाने के लिए परीक्षा नहीं पास करनी होती, फिर भी उन्होंने सब्जीवाले का ठेला उलट दिया।

दक्षिण भारत में नेताओं ने एक नकली मुद्दा उठाया, उसे खूब हवा दी, आगजनी की, दंगे और हिंसा हुई, फिर एक नाम खड़ा हो गया जिसने ‘हिन्दी’ से अपने राज्य को बचा लिया। किसी ने यह सोचा तक नहीं कि एक ज्यादा भाषा सीखने से नुकसान क्या है? जो भी इस बात को लेकर जज्बाती हो जाते हैं, उनसे पूछिए कि हिन्दी पढ़ना-लिखना आ जाएगा तो उससे तुम्हारा नुकसान क्या है? ये डर तुम्हारे मन में किसने बिठाया कि तुम्हारी संस्कृति बर्बाद हो जाएगी? अंग्रेजी पढ़ने से तो तमिल या मलयालम संस्कृति बर्बाद नहीं हुई, फिर हिन्दी से कैसे हो जाएगी?

हाँ, अगर इस शैक्षणिक बदलाव को, कोई भी नेता ऐसे भुनाता दिखे कि देखो हमने तो आंध्र प्रदेश वालों की भी हिन्दी पढ़ा दिया, अब हम सबसे महान भाषा हो गए, तो वैसे नेता को आड़े हाथों लेना चाहिए और सार्वजनिक तौर पर जलील करना चाहिए क्योंकि ये एकता को विखंडित करने की कोशिश है। जहाँ आपने एक को दूसरे से बेहतर कहने की कोशिश की, वहीं समस्या खड़ी हो जाती है।

समाधान क्या है?

समाधान यही है कि प्राथमिक विद्यालयों में, पूरे देश में, बचपन से ही तीन भाषाएँ पढ़ाई जाएँ। बच्चे एक साथ, अलग-अलग भाषाएँ सीख सकते हैं, और बहुत जल्दी भी सीखते हैं। उस भाषा का साहित्य उसके सिलेबस में हो और स्कूलों में उन राज्यों के जनजीवन को समझाने के लिए साल में एक लम्बा ट्रिप हो। वो बच्चा घर में अपनी मातृभाषा तो सीखेगा ही, उसके अलावा उसके पास भारत के दूसरे राज्यों के बारे में बचपन से जानकारी होगी, तो कहीं भी जाने पर, उसे अजनबी जैसा महसूस नहीं होगी।

आप यह सोचिए कि यहाँ जर्मन तक को केन्द्रीय विद्यालयों में पढ़ाया जाता रहा है! फिर बिहार के बच्चों को तमिल या मणिपुरी सीखने में क्या हर्ज होगा? आखिर किस राज्य के व्यक्ति को दूसरे राज्य के व्यक्ति के मुंह से, उनकी अपनी भाषा में, ‘अरे भैया, आप कैसे हैं’, ‘दीदी मुझे हनुमान मंदिर का रास्ता बता दोगी’ जैसे वाक्य सुन कर खुशी नहीं होगी?

दूसरे राज्य का व्यक्ति हमेशा इस बात को लेकर आह्लादित होता है कि कोई उसकी भाषा में बोलने की कोशिश करता है। ये तो सकारात्मक बात है, इससे ये कैसे साबित होता है कि बिहार की बच्ची तमिल सीखेगी तो वो मैथिली, मगही या भोजपुरी बोलना भूल जाएगी?

हम एक लगातार छोटी हो रही दुनिया में जी रहे हैं। हमारी खुशकिस्मती है कि हमारे देश में हर राज्य में अलग भाषाएँ हैं, अलग संस्कृतियाँ हैं। लोग हमसे जलते हैं कि इतनी विविधताओं के बावजूद यह देश बिखरता कैसे नहीं। अंग्रेजों ने इंतजार किया था कि यह देश पाँच साल भी नहीं चल पाएगा। लेकिन हम सत्तर साल से बढ़ रहे हैं। उनसे बेहतर गति से बढ़ रहे हैं। हमने अपनी विविधता का जश्न मनाया है।

अगर तमिलनाडु में किसी दुकानदार को सिर्फ ‘हलो अन्ना’ बोलने से उसकी आँखों में चमक आ जाती है, तो इस सहृदयता को बचाने की जरूरत है। हमारी पीढ़ी का दुर्भाग्य है कि हम राजनीति में उलझ कर हिन्दी और अंग्रजी, तमिल और अंग्रजी, गुजराती और अंग्रेजी, असमिया और अंग्रेजी, मलयालम और अंग्रेजी सीखने में रह गए। अंग्रेजी सीखने से गुरेज नहीं है क्योंकि वो अंतरराष्ट्रीय भाषा बन चुकी है और उसके अनेकों फायदे हैं, लेकिन अपने ही देश की भाषाओं को न सीख पाना दुर्भाग्य के सिवा कुछ भी नहीं।

बिहार में गठबंधन तो राजस्थान में संगठन पर फोकस: BJP ने जायसवाल और पूनिया को दी कमान

भाजपा ने बिहार और राजस्थान में नए प्रदेश अध्यक्ष बनाए हैं। बिहार में पश्चिम चम्पारण लोकसभा क्षेत्र से सांसद डॉक्टर संजय जायसवाल को कमान दी गई है। वहीं राजस्थान में सतीश पूनिया यह ज़िम्मेदारी संभालेंगे। बिहार में नित्यानंद राय के केंद्रीय गृह राज्यमंत्री बनने के बाद से ही नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति के कयास लगाए जा रहे थे। राजस्थान में इसी साल जून में वयोवृद्ध नेता मदन लाल सैनी के निधन के बाद से पद खाली पड़ा था।

डॉक्टर संजय जायसवाल अपने पिता मदन जायसवाल की तरह ही लोकसभा चुनाव में जीत की हैट्रिक लगा चुके हैं। पश्चिम चम्पारण की राजनीति में जायसवाल परिवार पिछले 3 दशक से प्रभावी रहा है। संजय जायसवाल ने पटना मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई की और दरभंगा मेडिकल कॉलेज से एमडी की डिग्री ली। बिहार में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं। संजय जायसवाल के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से भी अच्छे सम्बन्ध रहे हैं।

वहीं, दूसरी तरह राजस्थान में भाजपा फ़िलहाल सत्ता से बाहर है। भाजपा के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया 14 वर्षों तक संगठन में महामंत्री रहे हैं। इसके बाद उन्हें प्रदेश प्रवक्ता बनाया गया था। संघ की पृष्ठभूमि से होने के कारण उनकी दावेदारी पहले से ही मजबूत थी। जाट समुदाय से आने वाले पूनिया अम्बेर से विधायक हैं। पूनिया को राजस्थान भाजपा संगठन में अभी तक निर्णायक भूमिका में रहीं वसुंधरा राजे के कैम्प का नहीं माना जाता है। ऐसे में, यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्य में भाजपा का रुख क्या रहता है?

बिहार में संजय जायसवाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाने से यह लगता है कि भाजपा गठबंधन साधने के प्रयास में है। वहीं राजस्थान में गजेंद्र सिंह शेखावत को कैबिनेट मंत्री बनाने, ओम बिरला को लोकसभा अध्यक्ष बनाने, राज्यवर्धन सिंह राठौड़ का कद बढ़ाने और सतीश पूनिया को प्रदेश अध्यक्ष बनाने से साफ़ ज़ाहिर है कि अब पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पहले की तरह निर्णायक की भूमिका में नहीं रह गई हैं।

एक ही आउटलेट से मुर्गा और गाय का दूध बेचेगी कमलनाथ सरकार, भाजपा ने जताया एतराज

मध्य प्रदेश में एक ही आउटलेट में चिकन और गाय का दूध बेचने की कमलनाथ सरकार की परियोजना पर विवाद खड़ा हो गया है। राज्य सरकार के अधीन आने वाले पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम ने कड़कनाथ चिकन और गाय का दूध बेचने का फैसला लिया है। निगम ने भोपाल में ऐसा एक आउटलेट खोला है। प्रयोग सफल होने पर पूरे राज्य में ऐसे आउटलेट खोले जाएँगे।

भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने इसकी आलोचना करते हुए कहा कि इससे लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचेगी, क्योंकि गाय का दूध पवित्र माना जाता है। इसका इस्तेमाल धार्मिक उद्देश्य के लिए किया जाता है। इसे त्योहारों और उपवासों के दौरान भी प्रयोग किया जाता है। ऐसे में जो व्यक्ति चिकन बेच रहा है, वही व्यक्ति गाय का दूध ना बेचे।

उन्होंने कहा, “चिकन के साथ दूध बेचे जाने पर हमें आपत्ति है, क्योंकि यह लोगों की धार्मिक भावना को आहत कर रहा है। सरकार अपने फैसले पर गौर करे। मिल्क पार्लर और चिकन पार्लर एक दूसरे से कुछ दूरी पर खोले जाने जाए और दो अलग-अलग व्यापारियों को मिल्क पार्लर और चिकन पार्लर दिए जाने चाहिए।”

बता दें कि, प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार ने राज्य भर में एक ही आउटलेट में चिकन और दूध बेचने की परियोजना शुरू की है। भोपाल में इसका एक आउटलेट खोला गया है। राज्य के पशुपालन मंत्री लाखन सिंह यादव का कहना है कि इससे लोगों को अच्छी गुणवत्ता वाले अंडे और दूध मिलेंगे। लाखन सिंह ने कहा कि वो राज्य भर में ऐसे ही पार्लर खोलने पर विचार कर रहे हैं और प्रयोग के तौर पर भोपाल में आउटलेट खोला भी गया है। उनका कहना है कि इसकी सफलता के आधार पर भविष्य की परियोजना को आकार दिया जाएगा।

वहीं, एक ही पार्लर में चिकन और दूध बेचे जाने को लेकर हो रहे विरोध पर लाखन सिंह ने कहा कि दोनों उत्पादों को बेचने के लिए पार्लर के अंदर अलग केबिन बनाए जाएँगे। दूध और चिकन को अलग-अलग केबिन में बेचा जाएगा। हालाँकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि दूध और चिकन एक ही व्यापारी द्वारा बेचे जाएँगे, अथवा दो अलग-अलग व्यापारियों द्वारा।

पुलिस की मॉब लिंचिंग: अलवर में भीड़ ने इस तरह धुना कि अस्पताल पहुँच गए थानेदार, सिपाही

राजस्थान का अलवर जिला लगातार पुलिस और कानून व्यवस्था की बदहाली की नई मिसाल कायम कर रहा है। इस बार एक अलग ही प्रकार की घटना में अलवर पुलिस पर स्थानीय लोगों ने हाथ आजमा दिए। यह मामला अलवर जिले के मुंडावर थाना इलाके की है, जहाँ पुलिस खुद मॉब लिचिंग की शिकार हो गई और उन्हें मुंडावर अस्पताल में प्राथमिक उपचार देकर रात करीब 2 बजे अलवर रेफर कर दिया गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भीड़ ने नशे में घटनास्थल पर एक मामला सुलझाने पहुँचे दो पुलिसकर्मियों की जमकर धुनाई कर डाली। ग्रामीणों का आरोप है कि पुलिसकर्मी शराब के नशे में एक पारिवारिक विवाद का निपटारा करने आए थे। फ़िलहाल दोनों घायल पुलिसकर्मियों का अलवर के अस्पताल में इलाज चल रहा है।

घटना अलवर जिले के मुंडावर के जागीवाड़ा गाँव से प्रकाश में आया। शुक्रवार (सितंबर 14, 2019) रात में सर्किल गश्त के दौरान भिवाड़ी पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना मिली थी कि जागीवाड़ा गाँव में दो महिलाओं को उनके ससुराल में बंधक बनाकर मारपीट की जा रही है।

सूचना पर उप निरीक्षक रामस्वरूप और कॉन्स्टेबल शिवरतन समेत 3-4 पुलिसकर्मी गाँव गए। पुलिस के साथ ही महिलाओं के पीहर पक्ष के (बहरोड़ थाना क्षेत्र के) लोग भी घटनास्थल पर पहुँच गए। ग्रामीणों का आरोप है पुलिसकर्मी शराब के नशे में थे और जबरन महिलाओं को ले जाने की कोशिश कर रहे थे। इस पर ग्रामीणों ने आपत्ति जताते हुए कहा कि महिला पुलिसकर्मी के बिना वे महिलाओं को नहीं भेजेंगे, लेकिन पुलिसकर्मियों ने उनकी बात नहीं सुनी।

ग्रामीणों ने बताया कि एक पुलिसकर्मी के मुँह से शराब की बदबू आने पर लोगों ने उसे पकड़ लिया। उसे बचाने के चक्कर में जब उप निरीक्षक रामस्वरूप और कॉन्स्टेबल शिवरतन आगे आए तो भीड़ ने उनकी जमकर धुनाई कर दी।

घटना की सूचना मिलते ही मौके पर ततारपुर सहित अन्य थानों व क्यूआरटी टीम जागीवाड़ा गाँव पहुँची और दो व्यक्तियों को गिरफ्तार किया, जबकि अन्य फरार हो गए। नीमराना वृताधिकारी हरीराम कुमावत के अनुसार, मामले की जाँच जारी है। पुलिस उक्त लोगों के खिलाफ राजकार्य में बाधा में मारपीट का मामला दर्ज करेगी।

इस पिटाई के बाद फिलहाल दोनों का अलवर के अस्पताल में इलाज चल रहा है। घायल पुलिसकर्मियों का कहना कि ग्रामीणों ने उन्हें बंधक बनाई गई महिलाओं के पीहर पक्ष के साथ आने और जबरन दबाव बनाकर महिलाओं को ले जाने की बात समझकर पिटाई कर दी। बाद में किसी तरह से पुलिसकर्मियों को भीड़ से छुड़वाया गया और उन्हें स्थानीय अस्पताल ले जाया गया। वहाँ दोनों को प्राथमिक उपचार के बाद अलवर रेफर कर दिया गया।

शाहबानो मामले में कहा था फिर भी यूनिफॉर्म सिविल कोड पर कुछ नहीं किया, गोवा से सीखें: SC

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता का मसला फिर से चर्चा में आ गया है। भाजपा शुरुआत से ही इसके पक्ष में रही है। वहीं, इसके विरोधियों का कहना है कि यह सब पर हिंदू कानून थोपने जैसा होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने यूनिफॉर्म सिविल पर टिप्पणी करते हुए इस बात पर नाराज़गी जताई है कि अभी तक इसे लागू करने के लिए कोई प्रयास नहीं हुए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में गोवा से सीख लेने की सलाह दी, जहाँ यूनिफॉर्म सिविल कोड सभी पर लागू होता है, चाहे वो किसी भी धर्म का व्यक्ति हो। जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने कहा कि गोवा में कुछ बदलावों के साथ पुर्तगाली सिविल कोड ही लागू है। गोवा के स्थानीय निवासी किसी भी अन्य राज्य में भी बसे हों, तब भी वो इसके दायरे में आते हैं।

कोर्ट ने गोवा की चर्चा करते हुए कहा कि वहाँ मुस्लिम नागरिक एक से ज्यादा निकाह नहीं कर सकते और न ही मौखिक तलाक़ ही दे सकते हैं। लेकिन, देश के अन्य हिस्सों में वे अपने पर्सनल लॉ से चलते हैं। जब कभी यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की बात होती है तो इसका मुस्लिम प्रतिनिधि यह कह कर विरोध करते हैं कि यह सब पर हिंदू कानून थोपने जैसा है।

संपत्ति विवाद के एक मामले में टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभी तक देश के सभी हिस्सों में सामान रूप से सिविल कोड लागू करने के लिए किसी भी प्रकार का प्रयास नहीं किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो मामले में अपने फैसले की याद दिलाते हुए कहा कि उसने इस सम्बन्ध में ध्यान भी दिलाया लेकिन तब भी सरकारों ने प्रयास नहीं किए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गोवा में उत्तराधिकार, दहेज़ और संपत्ति मामलों में क़ानून बेहद स्पष्ट है और धर्म इसके आड़े नहीं आता। वहाँ शादी के बाद पति-पत्नी अपनी शादी के पहले और बाद की सम्पत्तियों पर संयुक्त स्वामित्व रखते हैं। अगर तलाक होता है तो इस संपत्ति का बराबर बँटवारा किया जाता है। हाँ, शादी से पहले संपत्ति के सम्बन्ध में मनमाफिक करार किया जा सकता है कि बँटवारा किस प्रकार से होगा?

कोर्ट ने आर्टिकल 44 की चर्चा करते हुए कहा कि इसमें सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता की बात कही गई है लेकिन फिर भी इसकी तरफ़ कोई ध्यान नहीं देता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“लोगों की सोच यह बन गई है कि अगर पर्सनल कोड को लेकर कोई बदलाव होता भी है तो मुस्लिमों को आगे आकर इसकी पहल करनी चाहिए। अभी तक यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर सरकार की तरफ से किसी भी प्रकार की आधिकारिक गतिविधियों की सूचना नहीं है। ये सरकार की ही ज़िम्मेदारी है और विधायिका के पास ही इसे लागू करने की क्षमता भी है।

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया में भी यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर बहस छिड़ गई। हालाँकि, आरएसएस और भाजपा लम्बे समय से इसे लागू करने की माँग कर रहे हैं। अनुच्छेद 370, एनआरसी और तीन तलाक़ को लेकर अहम निर्णय लेने वाली मोदी सरकार से लोगों ने अपेक्षा जताई है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की दिशा में भी प्रयास किए जाएँगे।

पप्पू पीएम नहीं चाहिए, मोदी बढ़िया काम कर रहे: NDTV पर भारत के #1 निवेशक

किसी के घर में घुस कर उसे बेइज़्ज़त करना अमूमन अच्छा नहीं माना जाता। लेकिन भारत के चोटी के निवेशकों में शुमार राकेश झुनझुनवाला ने NDTV के पत्रकार श्रीनिवास जैन के साथ ऐसा ही सुलूक किया। उनके शो में बैठकर झुझुनावाला ने न केवल प्रधानमन्त्री मोदी की तारीफ की, बल्कि राहुल गाँधी के प्रधानमन्त्री बनने पर “I don’t want Pappu to be my Prime Minister” की बिजली से कुठाराघात भी कर दिया। जैन के ‘Executive Decision’ शो में झुनझुनवाला ने राम मन्दिर और कश्मीर के मुद्दों पर ही नहीं, बैंकिंग एनपीए और अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर भी मोदी के प्रति अपना समर्थन दोहराया।

मोदी के समर्थन में झुनझुनवाला की बातों पर जब श्रीनिवास जैन ने झुनझुनवाला से पूछा कि क्या वे पिछली सरकारों (यानीमनमोहन सरकार) के कार्यकाल में भी कुछ तारीफ़ करने लायक देखते हैं, तो सवाल से बचते हुए झुनझुनवाला ने कहा कि जो बीत गया, उसे जाने देना चाहिए। लेकिन वे (झुनझुनवाला) मोदी-समर्थक हैं, और वे ‘पप्पू’ को अपना प्रधानमन्त्री नहीं देखना चाहते। उन्होंने साथ ही यह भी जोड़ा कि भारत के अब तक के सभी प्रधानमन्त्रियों में मोदी सबसे अधिक लोकप्रिय हैं।

‘वोटरों ने माँगा, मोदी ने दिया’

झुनझुनवाला से जैन ने सवाल किया कि क्या मोदी ने जनता से वह वादे पूरे किए, जिसके लिए जनता ने उन्हें 2014 में चुना था। तो झुनझुनवाला ने जवाब दिया कि मोदी के वोटर जो चाहते थे, वह सब मोदी ने किया। “उनके वोटर 370 हटाना चाहते थे। उनके वोटर राम मन्दिर चाहते हैं। उन्होंने इन वादों पर काम किया है।” इसके अलावा झुनझुनवाला ने मोदी सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का भी ज़िक्र किया, जिनमें मोदी के पहले कार्यकाल की उज्ज्वला के अलावा उनके दूसरे कार्यकाल में ज़ोर पा रही “नल में जल” योजना भी है। झुनझुनवाला के अनुसार चूँकि भारत की 40% बीमारियाँ जलजनित हैं, अतः इस योजना से लोगों को बहुत लाभ होगा।

इससे नीचे नहीं जाएगा बाज़ार

गहराती आर्थिक निराशा के बारे में झुनझुनवाला ने दावा किया कि आर्थिक परिदृश्य उतना भी बुरा नहीं है, जितना दिखाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि उनके ‘सूत्रों’ ने उन्हें बताया कि वर्तमान और निकट भूतकाल भले ही मंदी के रहे हों, लेकिन अर्थव्यवस्था सुधार की ओर बढ़ रही है। मिडकैप शेयरों का उदाहरण देते हुए झुनझुनवाला ने दावा किया कि पिछले 18 महीनों से इनमें गिरावट का दौर देखा जा रहा है, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि वे इससे नीचे नहीं जा सकते और अब उनमें बढ़ोतरी देखने को मिलेगी।

हालाँकि उन्होंने निवेश के बारे में अंतिम निर्णय लेने के पहले लोगों को अपने निजी वित्तीय सलाहकारों से मशविरा कर लेने के लिए आगाह भी किया, लेकिन एक आम राय दी कि चूँकि मिडकैप बाज़ार में गिरावट चल रही है, स्तर न्यूनतम है और उछाल की आशा है, अतः यह इस सेगमेंट में निवेश का सबसे अच्छा समय हो सकता है।

लोहिया ट्रस्ट की बिल्डिंग यादव परिवार के कब्जे से मुक्त, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर योगी सरकार ने की कार्रवाई

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मुलायम परिवार से लोहिया ट्रस्ट बिल्डिंग खाली करवा ली है। राज्य संपत्ति विभाग ने शनिवार (सितंबर 14, 2019) को विक्रमादित्य मार्ग स्थित लोहिया ट्रस्ट का बंगला खाली करा लिया। बता दें कि, मुलायम सिंह यादव ट्रस्ट के अध्यक्ष और शिवपाल सिंह यादव सचिव हैं। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और कई शीर्ष नेता ट्रस्ट के सदस्य हैं।

लोहिया ट्रस्ट की यह बिल्डिंग शिवपाल यादव की पार्टी के कब्जे में थी और पिछले कुछ महीने से इसका बाजार दर पर किराया वसूला जा रहा था। राज्य संपत्ति विभाग ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर यह कार्रवाई की है। राज्य संपत्ति विभाग ने कड़ी सुरक्षा के बीच लोहिया ट्रस्ट को अपने कब्जे में लिया।

सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश के 6 पूर्व मुख्यमंत्रियों से सरकारी बंगला खाली करने का आदेश भी दिया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राज्य संपत्ति विभाग की तरफ से सबको 15 दिन के भीतर बंगला खाली करने का नोटिस भी भेजा गया था।

उल्लेखनीय है कि रिटायर आईएएस अधिकारी एसएन शुक्ला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि लोहिया ट्रस्ट बंगला नियमों का उल्लंघन करके आवंटित किया गया है। इसी के साथ कई अन्य बंगले भी नियम के खिलाफ आवंटित किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई करते हुए ट्रस्ट और सोसाइटी के अनाधिकृत बंगलों को 4 महीने में खाली करने का आदेश दिया था।

फैजान को पीटने, धमकाने पर AAP विधायक अमानतुल्लाह खान के खिलाफ चार्जशीट दायर

दिल्ली पुलिस ने शुक्रवार  (सितंबर 13, 2019) को आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान के खिलाफ मारपीट के एक मामले में चार्जशीट दायर की है। मामला 2018 का है। एसएम फैजान ने 10 अक्टूबर 2018 को दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी दर्ज कराई थी।

बता दें कि फैजान ने इससे पहले भी खान के खिलाफ दिल्ली के जामिया पुलिस स्टेशन में एक एफआईआर दर्ज करवा रखी थी। इसके मुताबिक खान ने फैजान की गाड़ी को टक्कर मार दी थी और जब उसने इसका विरोध किया तो बंदूक दिखाकर उसके साथ मारपीट की और धमकी दी। इसके बाद से ही अमानतुल्लाह केस वापस लेने के लिए उसे लगातार धमका रहे थे।

अमानतुल्लाह ने फैजान के साथ दूसरी बार तब मारपीट की थी, जब वह काका नगर में अपने एक दोस्त की बहन की शादी में गया था। AAP विधायक ने फैजान को पिछला मुकदमा वापस लेने के लिए धमकाया। जाँच के दौरान पुलिस को सबूत के तौर पर शादी में फैजान के साथ हुई मारपीट के चश्मदीद गवाह और कुछ वीडियो फुटेज मिले हैं। फैजान ने बताया कि शादी समारोह के दौरान अमानतुल्लाह खान और उनके सहयोगियों ने विवाह भवन से बाहर जाने के रास्ते को बंंद कर दिया और फिर पिछली घटना को लेकर एफआईआर दर्ज कराने के लिए उसके साथ मारपीट की थी। 

AAP विधायक अमानतुल्लाह खान के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। पिछले साल दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ सीएम के आवास पर हुई मारपीट में भी कथित तौर पर शामिल थे।

इसके अलावा, भ्रष्टाचार, दिल्ली वक्फ बोर्ड में अनियमितता, धमकी और यौन उत्पीड़न के मामले में AAP विधायक के खिलाफ आरोपों की एक लंबी सूची है। पिछले साल, वह सिग्नेचर ब्रिज के एक कार्यक्रम में दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी के साथ धक्का-मुक्की करते हुए भी पकड़े गए थे।

हिंदुस्तान ने मार गिराए दो पाकिस्तानी सैनिक, सीजफायर के उल्लंघन पर चखाया मज़ा

हिंदुस्तान की सेना ने दो पाकिस्तानी सैनिकों को हाजीपुर सेक्टर में ढेर कर दिया। घटना तीन दिन पहले (10-11 सितम्बर) की है। पाकिस्तान की ओर से सीजफायर का उल्लंघन किए जाने के बाद भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई में उसक दोनों सैनिक मार गिराए।

मारे गए सैनिकों में से एक का नाम गुलाम रसूल है। वह हिन्दुस्तानी सेना की जवाबी कार्रवाई में मारा गया। ANI के अनुसार गुलाम रसूल पाकिस्तानी पंजाब के बहावलनगर का रहने वाला है। उसकी लाश उठाने के लिए पाकिस्तान ने पहले तो फायरिंग तेज कर हिन्दुस्तानी सेना को पीछे धकेलने की कोशिश की। लेकिन वे न केवल इसमें नाकाम रहे, बल्कि दूसरे मजहब के अपने एक और पंजाबी सैनिक को गँवा दिया। इसके बाद कल (13 सितंबर) सफ़ेद झंडा दिखा पाकिस्तान दोनों के शव ले गया।

यहाँ मारे गए सैनिकों की जाति और प्रांत बताना इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि पाकिस्तानी सेना अपने ही सैनिकों की लाशों के साथ जातीय भेदभाव करती रहती है। मारे जाने वाले सैनिक कश्मीरी (गुलाम कश्मीर/POK के निवासी) या नॉर्दर्न लाइट इन्फेंट्री (NLI) के होते हैं तो पाकिस्तान उनकी लाशें लेने में हिचकता है, जबकि समुदाय विशेष के पंजाबी सैनिकों की लाशें वह हर कीमत पर पाने का प्रयास करता है।

कारगिल युद्ध के समय भी उसने मारे गए कश्मीरी/NLI सैनिकों को ‘नॉन-स्टेट एक्टर्स’/‘नॉन-सिटिज़न्स’ बताकर उनकी लाशें और उनके किए की ज़िम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया था और उन्हें हिंदुस्तान ने दफनाया। पंजाबी समुदाय का पाकिस्तान के राजनीतिक जीवन में वर्चस्व है। सेना में भी उनसे पहले कश्मीरियों और NLI को आगे धकेल दिया जाता है, ताकि अधिकतम जान के जोखिम से पंजाबी बचे रहें और कश्मीरी/NLI होने के नाते मारे गए सैनिकों के शव लाने का दबाव भी न हो।

करीब 4 मिनट के इस वीडियो में  सफ़ेद झंडा लहराते हुए एक आदमी सामने की पहाड़ी से उतर कर तलहटी के पास एक टीले के पास आता है। उसके बाद कुछ दो-तीन और लोग उसके बुलाने पर आते हैं, और एक-एक कर दो शव उठाकर ले जाते हैं।

इससे पहले पाकिस्तान ने केरन सेक्टर में नियंत्रण रेखा के पास पाँच से सात BAT (Border Action Team) कमांडो के शव को LOC पर से उठाने से मना कर दिया था, जबकि हिन्दुस्तानी सेना ने पेशकश की थी कि पाकिस्तानी सेना सफेद झंडे के साथ आकर इन शवों को ले जा सकती है। उस समय भी खबरें चलीं थीं कि मारे गए सैनिकों में मजहब विशेष के पंजाबी न होने के चलते ही पाकिस्तान ने शवों को ले जाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।