पाकिस्तान के सीनेटर (सांसद) और पूर्व आंतरिक मंत्री रहमान मलिक ने दावा किया कि कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम को इसलिए गिरफ़्तार किया गया क्योंकि उन्होंने अनुच्छेद-370 को निरस्त करने का विरोध किया था। इतना ही नहीं, मलिक ने यह तक दावा किया कि भारत के अगले प्रधानमंत्री चिदंबरम होंगे।
Yes he has been arrested for raising his voice agst PM Modi for his illegal acts in Kashmir by scraping the sp status of Kashmir.He raised his voice in favour of oppressed Kashmiris .Note it Mr.Chidanbaram is going to be ur next PM.He is capable politician.@cnni@narendramodihttps://t.co/IEexk2FhfA
इसके अलावा, पाकिस्तान के सीनेटर ने बिना सभ्य भाषा का इस्तेमाल किए लिखा कि नरेंद्र मोदी को जल्द ही युद्ध अपराधी के रूप में दिखाने की कोशिश की जाएगी। अपने खोखले दावे में उसने ये तक कह दिया कि वो ख़ुद मोदी के ख़िलाफ़ मामले में बहस करेगा और ज़ाहिर तौर पर, मोदी को पता है कि वो उसका सामना नहीं कर सकते।
Sorry I did not know that he is ur father- but tell ur father Modi that he will be soon go for trial as war criminal and I will argu the case my self agst him and he knows that he can not face me https://t.co/nZcMqnvFcx
अपने ट्वीट में रहमान ने न केवल प्रधानमंत्री मोदी, बल्कि NSA अजित डोभाल के संदर्भ में भी ट्वीट किया। अपने इस ट्वीट में पाकिस्तान के सीनेटर मलिक ने दावा किया कि उन दोनों ने ट्विटर पर भारतीय आरएसएस समर्थकों को उन पर हमला करने और उन्हें गाली देने के सीधे निर्देश दिए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि पाकिस्तानी सीनेटर को इस बात की जानकारी नहीं है कि भारतीय अपने हिसाब से पाकिस्तानियों का मजाक उड़ाते हैं। वास्तव में, यह उनका सबसे अच्छा टाइम पास है।
Just check / Indian RSS supporters are attacking and abusing me on the direct instructions of PM Modi and his NSA-Ask him he will tell you about me as I am giving him sleepless nights- soon he will be tried as war criminal and u will enjoy to see the eviifence agst him. https://t.co/JtbItANosR
मलिक ने आगे बढ़कर दावा किया कि पीएम मोदी और डोभाल लोगों से उसे (रहमान मलिक) परेशान करने के लिए कह रहे हैं। रहमान मलिक को यह भ्रम हो गया है कि उसने पीएम मोदी और डोभाल की नींद हराम कर दी है।
जब से अनुच्छेद-370 को निरस्त किया गया है, तब से सोशल मीडिया पर पाकिस्तानियों की बिलबिलाहट स्पष्ट दिख रही है। अपना मुँह छिपाने के लिए वो जमकर फ़ेक न्यूज़ का सहारा ले रहा है। लेकिन, तमाम कोशिशों के बावजूद भी उसके हर झूठ का पर्दाफ़ाश होता रहा।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल अनुच्छेद 370 के मुद्दे के बाद अब आर्थिक मोर्चे पर भी केंद्र की भाजपा सरकार के पक्ष में आ गए हैं। उन्होंने शुक्रवार (23 अगस्त, 2019) को कहा कि उन्हें पूरा विश्वास है केंद्र सरकार आर्थिक मंदी से निबटने के लिए ठोस कदम उठाएगी। उन्होंने साथ में जोड़ा कि यह समय देश के एक साथ आने और अर्थव्यवस्था को सुधारने का है।
This is one situation where the country has to stand as one and repair the economy, Delhi chief minister Arvind Kejriwal said. https://t.co/VN34RNhDXU
केजरीवाल ने केंद्र को दिल्ली सरकार के पूरे समर्थन और सहयोग का भरोसा भी दिया। “मुझे पूरा भरोसा है कि आने वाले समय में केंद्र इस पर (आर्थिक मंदी पर) ठोस कदम उठाएगा। जो भी कदम केंद्र उठाएगा, दिल्ली सरकार का उन्हें पूरा समर्थन मिलेगा। मैं नौकरियों के खोने को लेकर व्यक्तिगत रूप से चिंतित हूँ।”
केजरीवाल ने यह बातें एक कार्यक्रम से इतर हटकर मीडिया से बात करते हुए कहीं। उनका यह बयान उस समय आया है जब उद्योग जगत ने समूची अर्थव्यवस्था की नब्ज़ माने जाने वाले महत्वपूर्ण क्षेत्रों ऑटोमोबाइल, कपड़ा उद्योग, रियल एस्टेट आदि में मंदी होने की शिकायत की है। इसके लिए इंडिया इंक ने प्रोत्साहन पैकेज की माँग की है। केजरीवाल ने कहा कि इन सेक्टरों में मंदी गहराती जा रही है।
दिल्ली विश्वविद्यालय में सावरकर की मूर्ति पर कालिख पोतने के विवाद में अब शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भी कूद पड़े हैं। इस बाबत सवाल किए जाने पर उन्होंने कहा, “वीर सावरकर को जो मानता नहीं है, उसे चौक में पीटा जाना चाहिए। सावरकर का अपमान राहुल गाँधी ने भी किया था, ऐसे औलादों को स्वतंत्रता की अहमियत समझ में नहीं आएगी।”
NSUI ने पहनाई थी जूतों की माला, पोती कालिख
दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैम्पस में स्थापित सावरकर की प्रतिमा पर NSUI ने कालिख पोत दी थी, और जूतों की माला पहनाई थी। आरोप लगा था कि आर्ट्स फैकल्टी के गेट पर इन मूर्तियों को सोमवार (19 अगस्त) की देर रात को DUSU (दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र यूनियन) के अध्यक्ष शक्ति सिंह और ABVP ने लगाया था, और इसके लिए अनुमति नहीं ली गई।
वहीं DUSU अध्यक्ष शक्ति सिंह का कहना है कि मूर्ति लगाने के लिए कई बार DU प्रशासन से उन्होंने अनुमति माँगी, लेकिन उनकी माँग पर हर एक बार कोई ध्यान नहीं दिया गया। सावरकर के साथ-साथ भगत सिंह और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा भी लगाई गई थी।
2004 में बाला साहेब ने शुरू किया था ‘जूते मारो अभियान’
धुर-दक्षिणपंथी शिव सेना शुरू से वीर सावरकर के सम्मान को लेकर संवेदनशील रही है। 2004 में जब तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री मणि शंकर अय्यर ने स्वतंत्रता सेनानी का अपमान किया था, और कॉन्ग्रेस ने सावरकर के कथनों वाली पट्टिका अंदमान की सेल्युलर जेल से हटाई थी, तो तत्कालीन शिव सेना सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे ने इसके विरोध में ‘जूते मारो अभियान’ शुरू किया था। इसमें शिव सैनिकों ने अपने-अपने पैरों के जूते-चप्पल निकाल कर मणि शंकर अय्यर के पुतले को जूते मारे थे। उस समय अय्यर की आलोचना करते हुए बाला साहेब ने कहा था कि अय्यर को सावरकर का योगदान मालूम ही नहीं है- न केवल सावरकर ने मदनलाल ढींगरा (जिन्होंने इंग्लैण्ड में रहते हुए सर विलियम हट नामक अँगरेज़ अफ़सर को मौत के घाट उतार दिया था) का मार्गदर्शन किया था, बल्कि नेताजी बोस और डॉ. अंबेडकर ने भी विभिन्न अवसरों पर उनकी सलाह माँगी थी।
इस ऐतिहासिक कनेक्शन को रेखांकित करते हुए एक ट्विटर यूज़र ने पोस्ट भी किया है:
2004: Deriding Union Petroleum Minister Mani Shankar Aiyar, Shiv Sena supremo Bal Thackeray on Friday kickstarted the party’s “jode maara” campaign for insulting Savarkarhttps://t.co/KLbdpHLred
जोमैटो ने कुछ दिन पहले ज्ञान दिया था कि ‘भोजन का कोई मजहब नहीं होता’ और फिर तुरंत ही धर लिए गए थे कि समुदाय विशेष ने अगर उनसे ‘हलाल मांस ही चाहिए’ की बात की, तो कहने लगे कि उनकी सेवा में वो हमेशा तत्पर हैं। समस्या यह नहीं है कि एक कंपनी ख़ास मजहब को हलाल मांस दे रही है, बल्कि समस्या यह है कि वो हिन्दुओं को ज्ञान देने से नहीं चूकती।
ये सब इसलिए क्योंकि हिन्दुओं को इससे फर्क नहीं पड़ता कि वो कौन-सा मांस खा रहे हैं। जिन्हें फर्क पड़ा, तो उन्हें ‘बिगट’, ‘कम्यूनल’, ‘असहिष्णु’ और पता नहीं क्या-क्या कह दिया गया। क्योंकि बहुसंख्यकों का न तो कोई धर्म है, न उनकी भावना आहत होती है। ये भावना और धर्म सैकड़ों सालों से आतंक झेल रही है, मंदिर टूटते देख रही है, काँवड़ियों पर पत्थरबाजी झेल रही है, लेकिन फर्क नहीं पड़ता। फर्क नहीं पड़ता फिर भी हम ही इन्टॉलरेंट हो जाते हैं।
ये मसला दो धर्मों का नहीं है। यूज़र का नाम होता है, उसके हिसाब से उसे हलाल परोसते रहो। जिसको खाना है खाए। मुझे समस्या नहीं है इससे। लेकिन हाँ, कोई ऐसा करने के बाद ढाई किलो ज्ञान भी दे दे, तो लगता है कि ऐसी बातों पर बोलना ज़रूरी है कि कम्यूनल तो तुम हो जो जानबूझकर ऐसे कई धर्मों के लोगों की धार्मिक आस्था पर हमला बोल रहे हो जो हलाल मांस नहीं खाते।
आज मैक्डोनल्ड्स इंडिया ने सीधे शब्दों में बताया कि पूरे भारत में उनके हर रेस्तराँ में सिर्फ और सिर्फ हलाल मांस ही मिलता है। सीधा अर्थ यह है कि गैर-मुस्लिमों की आस्था उनके लिए मायने नहीं रखती। अब अगर आप हलाल की व्याख्या पढ़ेंगे तो उसकी एक पूरी प्रक्रिया है, जिसमें जानवर/पक्षी को काटने से लेकर, पैकेजिंग तक में सिर्फ और सिर्फ उसी विशेष सम्प्रदाय वाले ही शामिल हो सकते हैं। मतलब, इस पूरी प्रक्रिया में, पूरी इंडस्ट्री में एक भी नौकरी गैर-मुस्लिमों के लिए नहीं है। ये तो हर नागरिक को रोजगार के समान अवसर देने की अवधारणा के खिलाफ है।
All our restaurants have HALAL certificates. You can ask the respective restaurant Managers to show you the certificate for your satisfaction and confirmation. (2/2)
यहाँ सबसे ज़्यादा गलत बात जो है वो यह है कि हिन्दुओं ने इन बातों पर कभी भी आवाज नहीं उठाया, लेकिन फिर भी वो हमेशा इस चर्चा में दूसरे सिरे पर ही खड़े कर दिए गए। चूँकि, यहाँ व्यक्ति सहिष्णु है, तो उसकी इसी सहिष्णुता का लाभ उठाकर उसे असहिष्णु कह दिया गया कि वो सम्प्रदाय विशेष की आस्था का आदर नहीं कर रहा! जबकि, हिन्दुओं ने तो ऐसा कभी नहीं कहा कि दूसरे मजहब वालों को झटका मांस खिला दो। वो तो आज इस बात पर सवाल कर रहे हैं कि तुम्हारे व्यवसाय में सबसे ज़्यादा लाभ पहुँचाने वाले समुदाय की आस्था पर तुमने कभी ध्यान क्यों नहीं दिया?
क्या वो इसलिए कि तुम्हें भी पता है कि हिन्दुओं को इन बातों से न तो फर्क पड़ा है, न पड़ेगा। इस मामले की दूसरी बात जो है वो यह है कि अब इस बात पर जिन हिन्दुओं ने सवाल किया है, उन्हें मानवता का दुश्मन से लेकर, घृणा फैलाने वाला, दूसरे समुदाय से भेदभाव करने वाला, साम्प्रदायिक और पता नहीं क्या-क्या कह दिया जाएगा। जबकि एक ने भी यह नहीं कहा कि सम्प्रदाय विशेष को हलाल देना बंद कर दो।
अगर आज किसी को ये बात पता चली कि मैक्डोनल्ड्स सिर्फ हलाल मांस वाला भोजन ही बेच रहा है, तो उसे यह कहने का पूरा हक है कि वो इस जानकारी के मिलने के बाद से झटका मांस ही खाना चाहेगा। ये उसकी धार्मिक आस्था और निजी स्वतंत्रता का मुद्दा है। जैसे सम्प्रदाय विशेष की आस्था का ख्याल रखा जाता है, वैसे ही रेस्तराँ इन लोगों के लिए रेस्तराँ मैनेजर के पास झटका का भी सर्टिफिकेट देने की व्यवस्था करे। जिसको झटका चाहिए वो लेगा। जिसको हलाल से दिक्कत नहीं वो वैसे ही खाएगा।
निजी तौर पर मुझे हलाल या झटका से कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन किसी को पड़ता है तो वो अपने अधिकारों के दायरे में है। वो अपनी माँग के कारण कम्यूनल और दंगाई नहीं हो जाता क्योंकि सिर्फ हलाल दुकान से ही मांस लेने वाले ‘शांतिप्रिय’ कम्यूनल या दंगाई नहीं हो जाती। वो उसकी पसंद है वो कहाँ से मांस ले, कैसे पकाए, कैसे खाए।
आर्टिकल 370 को लेकर पाकिस्तान से आए दिन कोई न कोई जाना-माना चेहरा अपनी बौखलाहट निकालकर सुर्खियाँ बटोर रहा है। अब ये काम पाक क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान और अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के समधी जावेद मियांदाद ने किया है। उन्होंने अपनी तिलमिलाहट निकालने के लिए भारत को परमाणु बम की धमकी दी है। जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।
जिस देश का प्रधानमंत्री आए दिन ये साबित करने पर लगा हो कि वो शांति से मामलों का हल चाहते हैं, उसी देश के जावेद मियांदाद कश्मीर मामले पर खुलेआम कहते हैं कि अगर आपके पास लाइसेंसी हथियार है तो आपको हमला करना चाहिए। क्योंकि ये नियम हर जगह है कि बचाव में ऐसा किया जा सकता है।
वायरल वीडियो में मियांदाद अपने मुस्लिम भाईयों से गुहार लगाते हुए कह रहे हैं कि हर जगह यह नियम है कि अगर सेल्फ डिफेंस, अपनी प्रोटेक्शन के लिए कुछ चीज रख सकते हो तो रखो। वह बोलते हैं, “तुम मुस्लिम भाइयों, मारो तो जान से मारो, जब उनकी लाशें उनके घरों में जाएँगी फिर उनको एहसास होगा कि इंसान की जिंदगी क्या होती है?”
इसके अलावा भारत को संदेश देने की बात पर मियांदाद कहते हैं, “मोदी साहब को तो पता ही है, मैंने पहले भी कहा था ये डरपोक लोग हैं। अभी तक इन्होंने किया क्या? ये तो न्यूक्लियर पॉवर ऐसे ही है। लेकिन हम न्यूक्लियर पॉवर ऐसे नहीं हैं। हमने परमाणु बम चलाने के लिए रखे हैं, हमें मौक़ा चाहिए और हम साफ़ कर देंगें।”
गौरतलब है कि जावेद क्रिकेट क्षेत्र से जुड़े पहले ऐसे शख्स नहीं हैं जिन्होंने विवादित बयान दिया हो, इससे पहले शाहिद अफरीदी, शोएब अख्तर, सरफराज अहमद भी इसपर अपना गुस्सा निकाल चुके हैं।
हर देश अपने इतिहास पर, चाहे वो बुरा हो या फिर गौरवशाली, गर्व करता है। क्योंकि यह आवश्यक नहीं है कि हमारे लिए जो स्वर्णिम हो वह पाकिस्तान के लिए भी स्वर्णिम हो या फिर ब्रिटिशर्स भी उसे स्वर्णिम इतिहास की तरह ही याद रखें।
फिर भी, जितना विरोधाभास अपने इतिहास को लेकर हमारे देश में रहा है शायद ही किसी अन्य देश को इस तरह से जूझना पड़ा हो। बात चाहे वीर सावरकर की हो, जिन्ना की हो या फिर अलीगढ़ आंदोलन वाले सैयद अहमद खान की, हर किसी ने यहाँ इतिहास को अलग नजरिया दिया है।
इसमें सबसे बड़ा हास्यास्पद विरोधाभास यह भी है कि स्वयं को गाँधीवादी कहने वाले लोग आश्चर्यजनकरूप से द्विराष्ट्र सिद्धांत देने वाले और अलगावाद के जनक सैयद अहमद खान की भी भक्ति में लीन देखे जाते हैं। जबकि, हकीकत यह है कि आप या तो गाँधीवादी हो सकते हैं या फिर कश्मीर से बंगाल तक हिंदुओं के खिलाफ सशस्त्र जिहाद की घोषणा करने वाले सैयद अहमद खान के समर्थक।
यह हमारे पड़ोसी मुल्क का दुर्भाग्य ही हो सकता है कि उसे अपने क्रांतिकारियों और आजादी के नायकों को सिर्फ चंद नामों में समेटना पड़ा। 8वीं शताब्दी का लुटेरा मुहम्मद बिन कासिम पड़ोसी मुल्क के लिए मसीहा हो सकता है तो वहीं, हम इस नाम को इतिहास के काले अध्यायों में रखते हैं। पाकिस्तान जिन तीन नामों को अपना मसीहा मानता है उनमें जिन्ना, इकबाल और सर सैय्यद अहमद खान सबसे ऊपर हैं।
ये वही सैयद अहमद खान हैं, जिन्हें अंग्रेजों ने उनके बेहतरीन प्रदर्शन के लिए ‘सर’ की उपाधि से नवाजा था। वही सैयद अहमद खान, जिन्होंने माना था कि अंग्रेजों को अल्लाह ने उन पर हुकूमत करने के लिए भेजा है और यदि कोई ‘मोहम्मदन’ या फिर इस्लाम किसी का करीबी हो सकता है तो वो सिर्फ और सिर्फ ईसाई धर्म है। इस्लाम के महान विचारक सैयद अहमद खान ने 1857 की क्रांति को अंग्रेजों के सामने ‘हरामजदगी’ बताया था। क्रांति के दौरान अंग्रेजों की नजर में मजहब विशेष के लिए ‘दया’ पैदा करने के लिए उन्होंने राय दी थी कि अंग्रेजों को अपने राजकाज में मुस्लिमों की भर्ती करनी चाहिए जिससे इस तरह की ‘हरामजदगी’ फिर न हों।
साभार विकिपीडिया
इस देश में विरोधी विचारधारा को हमेशा ही आश्चर्यजनक रूप से सम्मान की नजर से देखा जाता है। यही सम्मान एक समय ईस्ट इण्डिया कम्पनी के व्हाइटमैन बर्डेन के सिद्धान्त को भी दिया गया था। यही सम्मान पाखंडी, धूर्त कम्युनिस्टों ने भी खूब कमाया है। सवाल यह है कि यदि सर सैयद अहमद खान को भारत में एक नायक के रूप में पेश किया जा सकता है तो फिर मोहम्मद इकबाल और मोहम्मद अली जिन्ना को भी सम्मान देने में हमें झिझक नहीं होनी चाहिए।
मुझे अक्सर आश्चर्य होता है कि देश के इतिहास पर चर्चा करते समय प्रगतिशील विचारक और लेफ्ट लिबरल वर्ग सर सैयद अहमद खान को इतने चुपचाप तरीके से क्यों स्मरण करता है। आखिर विचारकों को सैयद अहमद खान के नाम को खुलकर आगे करने में भय क्यों होता है? साथ ही यह भी देखा गया है कि दक्षिणपंथियों ने कभी भी सैयद अहमद खान के ‘सिद्दांतों’ पर चर्चा नहीं की। जबकि, सैयद अहमद खान के भ्रामक और मिथकीय महिमामंडन की पृष्ठभूमि में वास्तविकता की खोज हमेशा आवश्यक थी।
हम सावरकर को वीर साबित करते रह गए जबकि सर सैयद अहमद खान समय से काफी पहले दो राष्ट्र सिद्धांत के भड़काऊ ऐतिहासिक भाषणों में पहले ही बता चुके थे कि इस देश में ‘वीर’ सिर्फ वो बहादुर पठान बंधू थे, जो सर सैयद अहमद खान की नजर में हिंदुओं से कम भले ही थे लेकिन दुर्बल नहीं थे।
मार्च 14, 1888 को मेरठ में दिए गए भाषण में सैयद अहमद खान ने कहा था- “हमारे पठान बंधु पर्वतों और पहाड़ों से निकलकर सरहद से लेकर बंगाल तक खून की नदियाँ बहा देंगे। अंग्रेज़ों के जाने के बाद यहाँ कौन विजयी होगा, यह अल्लाह की इच्छा पर निर्भर है। लेकिन जब तक एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को जीतकर आज्ञाकारी नहीं बनाएगा तब तक इस देश में शांति स्थापित नहीं हो सकती।”
इतिहास बेवजह ‘वीर’ और क्रन्तिकारी शब्द पर चर्चा करता रहा, जबकि सर सैयद अहमद खान उसी वक़्त साबित कर चुके थे। उनके विचारों को आज अगर कोई जिन्दा रख पाया है तो वो AIMIM नेता अकबरुद्दीन ओवैसी है, जो सैयद अहमद खान के मेरठ में दिए गए भाषण की याद दिलाता है कि 15 मिनट के लिए अगर पुलिस हटा दी जाए तो देश को पता चल जाएगा कि ‘वीर’ कौन है। सावरकर की प्रतिमा पर स्याही फेंकने वाले लोग अपने ‘वीरों’ को कब का चुन चुके हैं।
सावरकर की प्रतिमा को लगाने-हटाने, उस पर स्याही फेंकने पर यह देश बेवजह अपना समय और संसाधन व्यर्थ करता है। सर सैयद अहमद खान के योगदान और उनके महान भाषणों को याद करने भर से ही तय हो जाता है कि इस देश को किन लोगों पर गर्व होना चाहिए।
अपने प्रेरणास्रोतों और आदर्शों के कारण अक्सर विवादों में रहने वाले अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना इन्हीं सर सैयद अहमद खान ने वर्ष 1875 में ‘मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज’ के नाम से की थी, आगे चलकर यही संस्था वर्ष 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) में बदल गई और आज तक कायम है।
अगस्त 31, 1941 को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रों को संबोधित करते हुए मुस्लिम लीग के नेता लियाकत अली खान ने कहा था- “हम मुस्लिम राष्ट्र की स्वतंत्रता की लड़ाई जीतने के लिए आपको उपयोगी गोला-बारूद के रूप में देख रहे हैं।” विभाजन के बाद वही लियाकत अली खान पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बने थे।
मौलाना आज़ाद ने एक बार अपने भाषण में सर सैयद अहमद खान के राजनीतिक विचारों को हिंदुस्तान के लिए सबसे बड़ी ग़लती बताया था। उन्होंने कहा था कि शिक्षा और सामाजिक कार्यों की आड़ में सैयद अहमद खान ने जो राजनैतिक एजेंडा चलाया, उसके लिए वे उन्हें कभी माफ़ नहीं कर पाएँगे। मौलाना आजाद का विचार था कि सैयद अहमद खान के विचारों ने भारतीय मुसलामानों के एक धड़े को ग़लत दिशा में सोचने पर उकसा दिया और जिसका परिणाम बँटवारा था।
मोहम्मद अली जिन्ना ने जब आजादी के समय दो राष्ट्र सिद्धांत की दलील दी थी, तब भी यही कहा था कि हिंदू और मुस्लिम न पहले साथ रहे हैं और न आगे रह पाएँगे, सो सम्प्रदाय के उत्थान की आड़ में जिस अलीगढ़ मूवमेंट के ज़रिए सर सैयद अहमद खान को पहचान मिली थी, वहीं से इंडियन मुस्लिम लीग का जन्म हुआ था और इसके आगे बाकी सब इतिहास है।
बाद में जिन्ना की इच्छा के अनुसार जो हुआ, उसका पितृत्व सर सैयद का है। पाकिस्तान शासन द्वारा प्रकाशित आज़ादी के आंदोलन के इतिहास में मोइनुल हक कहते हैं- “सच में, हिंद पाकिस्तान में मुस्लिम राष्ट्र स्थापित करने वाले संस्थापकों में से थे वे। उनके द्वारा ही डाली गई नींव पर कायदे आज़म ने इमारत बना कर पूरी की।”
सर सैयद अहमद खान से लेकर वीर सावरकर तक सोशल मीडिया के नायक
आजकल सोशल मीडिया पर वीर सावरकर को अंग्रेजों का करीबी बताकर हर तरह से उनकी छवि को धूमिल करने का प्रयास किया जाता है। लेकिन क्या वही लोग ये सच्चाई सुन पाने में समर्थ हैं कि 1857 की क्रान्ति के समय सैयद अहमद खान की क्या भूमिका थी? खान बहादुर के नाम से मशहूर सैयद अहमद समय के साथ ‘सर’ होते गए। दूसरे मजहब के प्रति ब्रिटिश आक्रोश को कम करने और ब्रिटिश सरकार व समुदाय विशेष के बीच सहयोग का पुल बनाने के लिए उन्होंने योजनाबद्ध प्रयास आरंभ किया।
ब्रिटिश आक्रोश को कम करने के लिए सैयद अहमद खान ने वर्ष 1858 में ‘रिसाला अस बाब-ए-बगावत ए हिंद’ (भारतीय विद्रोह की कारण मीमांसा) शीर्षक पुस्तिका लिखी, जिसमें उन्होंने प्रमाणित करने की कोशिश की कि इस क्रांति के लिए मुसलामन नहीं, बल्कि हिंदू जिम्मेदार थे।
सैयद अहमद खान का ‘सर’ से न्यायाधीश तक का सफर
उनकी वफादारी से खुश होकर ही ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें वर्ष 1898 में नाइटहुड भी दी। ब्रिटिशर्स का विश्वास जीतकर सैयद अहमद खान वर्ष 1867 में एक न्यायालय के न्यायाधीश भी बने और वर्ष 1876 में सेवानिवृत्त हुए। अप्रैल, 1869 में सैयद अहमद खान अपने बेटे के साथ इंग्लैंड गए, जहाँ 6 अगस्त को उन्हें ‘ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया’ से सम्मानित किया गया। वर्ष 1887 में उन्हें लॉर्ड डफरिन द्वारा सिविल सेवा आयोग के सदस्य के रूप में भी नामित किया गया। इसके अगले वर्ष उन्होंने अंग्रेजों के साथ राजनीतिक सहयोग को बढ़ावा देने और अंग्रेजी शासन में मुस्लिम भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अलीगढ़ में ‘संयुक्त देशभक्त संघ’ की स्थापना की।
‘मुस्लिम का दैवीय कर्तव्य है कि वे कॉन्ग्रेस से दूर रहें’
वर्ष 1885 में जब भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस की स्थापना के साथ देश औपनिवेशिक सरकार के बहिष्कार के लिए एकजुट हो रहा था, तब उन्होंने हिंदू बनाम मुस्लिम, हिंदी बनाम उर्दू, संस्कृत बनाम फारसी का मुद्दा उठाकर मुस्लिमों की मजहबी भावनाओं का दोहन किया और अपनी जहरीली विचारधारा के विष को खूब भुनाया था। उन्होंने यह विचार स्थापित किया कि मुस्लिम का दैवीय कर्तव्य है कि वे कॉन्ग्रेस से दूर रहें। इसके लिए उन्होंने ईसाईयों को इस्लाम का सबसे करीबी मित्र तक साबित करने के प्रयास किए थे।
अपने इस अभियान में वह काफी हद तक सफल भी हुए। स्वतन्त्रता आंदोलन में समय के साथ देश के बहुत कम मुस्लिम ही महात्मा गाँधी के अखंड भारत के सिद्धांत के साथ खड़े नजर आए। शेष मुस्लिम समाज की सहानुभूति पाकिस्तान के साथ होती गई, जिसके लिए बेशक सैयद अहमद खान की विषाक्त विचारधारा ही जिम्मेदार थी।
मेरठ में दिया गया ‘ऐतिहासिक सेक्युलर’ भाषण
मार्च 14, 1888 को मेरठ में दिए गए सैयद अहमद खान के भाषण ने भारत में मजहब आधारित विभाजन के वैचारिक दर्शन का शिलान्यास कर दिया था। उनका यह भाषण बेहद भड़काऊ था। इसमें वे हिंदुओं और मुस्लिमों को दो राष्ट्र (कौम) मानने लगे थे। उन्होंने यह बहस छेड़ दी थी कि अंग्रेज़ों के जाने के बाद सत्ता किसके हाथ में आएगी और उनका दृढ़ विश्वास था कि हिंदू-मुस्लिम मिलकर इस देश पर शासन नहीं कर सकते।
अलगाववाद के पिता सैयद अहमद को लगता था कि केवल गृहयुद्ध से ही इसका फैसला हो सकता है। विभाजन के समय हुए भीषण रक्तपात और नरसंहार की नींव सर सैयद बहुत पहले ही रख चुके थे। उन्होंने मुस्लिम हितों का स्वतंत्र और अलग तरीके से विचार करना शुरू किया। इस तरह हिंदुओं और मुस्लिमों में एक भेद निर्माण किया जिसका नतीजा इतिहास तो भुगत ही चुका है लेकिन वर्तमान और भविष्य भी इससे प्रभावित होते रहेंगे। उनका सिद्धांत द्विराष्ट्र से भी ज्यादा भयानक था क्योंकि वो चाहते थे कि एक देश दूसरे को जीतकर अपनी सत्ता विकसित करे।
वर्ष 1888 को मेरठ में दिए अपने भाषण (Allahabad: The Pioneer Press, 1888 में प्रकाशित) में उन्होंने कहा था- “सबसे पहला सवाल यह है कि इस देश की सत्ता किसके हाथ में आने वाली है? मान लीजिए, अंग्रेज अपनी सेना, तोपें, हथियार और बाकी सब लेकर देश छोड़कर चले गए तो इस देश का शासक कौन होगा? उस स्थिति में यह संभव है क्या कि हिंदू और मुस्लिम कौमें एक ही सिंहासन पर बैठें? निश्चित ही नहीं। उसके लिए ज़रूरी होगा कि दोनों एक दूसरे को जीतें, एक दूसरे को हराएँ। दोनों सत्ता में समान भागीदार बनेंगे, यह सिद्धांत व्यवहार में नहीं लाया जा सकेगा।”
हिंदुओं के खिलाफ सशस्त्र जिहाद की घोषणा
उन्होंने आगे कहा- “इसी समय आपको इस बात पर ध्यान में देना चाहिए कि मुस्लिम हिंदुओं से कम भले हों मगर वे दुर्बल हैं, ऐसा मत समझिए। उनमें अपने स्थान को टिकाए रखने का सामर्थ्य है। लेकिन समझिए कि नहीं है तो हमारे पठान बंधू पर्वतों और पहाड़ों से निकलकर सरहद से लेकर बंगाल तक खून की नदियाँ बहा देंगे। अंग्रेज़ों के जाने के बाद यहाँ कौन विजयी होगा, यह अल्लाह की इच्छा पर निर्भर है। लेकिन जब तक एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को जीतकर आज्ञाकारी नहीं बनाएगा तब तक इस देश में शांति स्थापित नहीं हो सकती।”
‘अल्लाह ने अंग्रेज़ों को हमारे शासक के रूप में नियुक्त किया हुआ है’
फिर समुदाय विशेष के कट्टरपंथियों को भड़काते हुए उन्होंने कहा-
“जैसे अंग्रेज़ों ने यह देश जीता वैसे ही हमने भी इसे अपने अधीन रखकर गुलाम बनाया हुआ था। वैसा ही अंग्रेज़ों ने हमारे बारे में किया हुआ है। …अल्लाह ने अंग्रेज़ों को हमारे शासक के रूप में नियुक्त किया हुआ है। …उनके राज्य को मज़बूत बनाने के लिए जो करना आवश्यक है उसे ईमानदारी से कीजिए। …आप यह समझ सकते हैं मगर जिन्होंने इस देश पर कभी शासन किया ही नहीं, जिन्होंने कोई विजय हासिल की ही नहीं, उन्हें (हिंदुओं को) यह बात समझ में नहीं आएगी। मैं आपको याद दिलाना चाहता हूँ कि आपने बहुत से देशों पर राज्य किया है। आपको पता है राज कैसे किया जाता है। आपने 700 साल भारत पर राज किया है। अनेक सदियाँ कई देशों को अपने आधीन रखा है। मैं आगे कहना चाहता हूँ कि भविष्य में भी हमें किताबी लोगों की शासित प्रजा बनने के बजाय (अनेकेश्वरवादी) हिंदुओं की प्रजा नहीं बनना है।”
भारत ने अपने बुरे और अच्छे के प्रतीकों का बंटवारा आजादी के समय कर लिया था। फिर भी कुछ महान भूलें विचारधारा के इस महान विभाजन के साथ न्याय नहीं कर सकीं। भाजपा सरकार के दौरान इतिहास लगातार चर्चा का विषय रहा है, यह आवश्यक भी है। क्योंकि जब जब सावरकर के वीर होने या न होने पर बहस होगी, तब तब सर सैयद अहमद खान आकर बताएँगे कि वीर कौन हो सकता है।
किसी भी चर्चा से ऊपर सबसे दुखद पहलू यह भी है कि मुस्लिम समाज में सर सैयद अहमद खान जैसे बहुत ही कम लोग, भले ही बहुत देर से शिक्षा और पुनर्जागरण के नाम पर जाने गए, लेकिन वह भी कट्टर और मज़हबी जिहाद की हर सम्भव योजना पर यकीन करते रहे।
सर सैय्यद अहमद खान भारत के महानतम मुस्लिम सुधारकों में से एक माने गए हैं और उन्होंने भी मजहबी और सांप्रदायिक उद्देश्यों की ही वकालत की। सदियों की कट्टरता, जुर्म और बर्बरता के इतिहास के बाद मुस्लिम समाज को एक ऐसा चेहरा मिला था, जो उनकी शिक्षा और सामाजिक हितों की वकालत चुन सकता था, लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि उसके जीवन का दर्शन भी कट्टरता तक सीमित हो गया।
बिहार में पटना ज़िले के मोकामा से बाहुबली निर्दलीय विधायक अनंत कुमार सिंह ने शुक्रवार (23 अगस्त) को दिल्ली की साकेत कोर्ट में सरेंंडर कर दिया। अनंत सिंह के घर से एके-47 राइफल और ग्रेनेड बरामद किया गया था, जिसके बाद से ही वो फ़रार चल रहे थे। कुछ दिनों पहले विधायक अनंत सिंह ने एक वीडियो जारी कर कहा था कि वो पुलिस के समक्ष नहीं बल्कि कोर्ट में सरेंडर करेंगे, क्योंकि उन्हें न्यायालय पर भरोसा है।
इससे पहले भी उन्होंने एक वीडियो जारी कर कहा था कि वो गिरफ़्तारी से नहीं डरते हैं, 3-4 दिनों में वो ख़ुद ही कोर्ट में सरेंडर कर देंगे।
Independent MLA from Mokama,Anant Singh who went missing after police recovered an AK-47 from his residence on Aug 16:I’m not scared of being arrested.I’ll surrender in next 3-4 days.I haven’t been to that house in last 14 yrs so there’s no question of keeping AK-47 there.#Biharpic.twitter.com/9oitRXZVIq
अनंत सिंह ने पुलिस पर आरोप लगाते हुए कहा कि राज्य की सत्ताधारी जेडीयू पार्टी के सांसद ललन सिंह, मंत्री नीरज कुमार और अपर पुलिस अधीक्षक लिपि सिंह ने उनके ख़िलाफ़ षडयंत्र रच कर एक रिश्तेदार के ज़रिए घर में हथियार रखवाए थे। बता दें कि एके-47 और ग्रेनेट की बरामदगी केस में बीते मंगलवार (20 अगस्त) को बाढ़ कोर्ट ने अनंत सिंह के ख़िलाफ़ गिरफ़्तारी का वारंट जारी कर दिया था। इसके लिए बाढ़ कोर्ट के अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी कुमार माधवेंद्र ने वारंट जारी करने की अनुमति दी थी।
अगर अनंत सिंह आज कोर्ट में सरेंंडर न करते तो उनके ख़िलाफ़ इश्तेहार और फिर कुर्की की कार्रवाई की जाती। इसके अलावा, उनके क़रीबी लल्लू मुखिया और उसके भाई रणवीर यादव पर हत्या की साज़िश रचने के मामले में कोर्ट ने कुर्की और ज़ब्ती का आदेश दे दिया था।
ख़बर यह भी है कि अनंत सिंह का यह असली चेहरा 10 साल पहले ही सामने आ जाता अगर आईपीएस अधिकारी अमिताभ कुमार दास की ख़ुफ़िया रिपोर्ट को गंभीरता से ले लिया जाता। 2009 में उन्होंने अपनी जान को जोखिम में डालकर रिपोर्ट में यह ख़ुलासा किया था कि विधायक अनंत सिंह के आवास पर एके-47 और एके-56 समेत अन्य आधुनिक हथियारों का बड़ा जखीरा है। ठीक 10 साल बाद यानी 10 अगस्त 2019 को विधायक अनंत सिंह के घर छापेमारी के दौरान एके-47 के साथ गोलियों और हैंड ग्रेनेड की बरामदगी हुई।
इस छापेमारी के बाद आईपीएस अमिताभ कुमार ने अपनी सुरक्षा के लिए BMP-1 से दो गोरखा अंगरक्षक उपलब्ध कराने की माँग की। उनकी इस माँग को पूरा करते हुए डीजीपी द्वारा उन्हें तत्काल सुरक्षा मुहैया भी करवाई और उनकी सुरक्षा में दो बॉडीगार्ड की तैनाती भी कर दी गई।
INX मीडिया और एयरसेल-मैक्सिस मामलों में पूर्व वित्त मंत्री की कस्टडी पाने की कोशिश में लगी ED (प्रवर्तन निदेशालय) को सुप्रीम कोर्ट ने झटका दिया है। ED को सोमवार तक कॉन्ग्रेस नेता को गिरफ्तार करने से रोकते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उनकी ED के खिलाफ अग्रिम ज़मानत याचिका और सीबीआई द्वारा गिरफ़्तारी के खिलाफ याचिका को भी सोमवार को सुनने का निश्चय किया है। हालाँकि अदालत ने उनकी सीबीआई को मिली सोमवार तक की रिमांड में हस्तक्षेप नहीं किया है, इसलिए फ़िलहाल चिदंबरम सीबीआई की हिरासत में ही रहेंगे।
सीबीआई जज ED के पक्ष में biased
चिदंबरम के पक्ष में वकील के तौर पर पेश हुए कॉन्ग्रेस नेताओं अभिषेक मनु सिंघवी और कपिल सिब्बल ने ED को गिरफ़्तारी की अनुमति देने का पुरज़ोर विरोध किया। जस्टिस आर बानुमति और एएस बोपन्ना की बेंच के सामने सीबीआई द्वारा भ्रष्टाचार-निरोधी अधिनियम और भारतीय दंड विधान (आईपीसी) के अंतर्गत दर्ज किया गया मामला था, और ED ने मनी-लॉन्ड्रिंग निरोधी कानून के अंतर्गत मामला दर्ज किया था। दोनों ही एजेंसियों की तरफ से बहस भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता कर रहे थे।
सिब्बल ने चिदंबरम का पक्ष रखते हुए कहा कि उनकी अग्रिम ज़मानत याचिका सुनवाई के लिए बुधवार को ही लगा दी गई थी, जिस पर सुनवाई हो नहीं पाई थी और फायदा उठाकर चिदंबरम को उसी शाम सीबीआई ने उसपर फैसला आने का इंतज़ार किए बिना ही गिरफ्तार कर लिया। उन्होंने दलील दी कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले मूलभूत अधिकारों के अंतर्गत चिदंबरम को भी बहस सुने जाने का अधिकार है।
ED द्वारा संभावित गिरफ़्तारी के खिलाफ सिब्बल ने दलील दी कि हाई कोर्ट के जज का झुकाव पहले से ही ED के पक्ष में है। अपनी दलील के पक्ष में उन्होंने दावा किया कि ED ने बहस खत्म होने के बाद उच्च न्यायालय के जज को एक नोट दिया था, जिसके कुछ हिस्से जज ने अपने फैसले में ‘कॉपी-पेस्ट’ कर दिए। इसको लेकर सिब्बल और मेहता के बीच छोटी-सी बहस भी हो गई। अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि जबकि हाई कोर्ट में मुकदमा INX मीडिया का चल रहा था, लेकिन उच्च न्यायालय के जज ने उससे किसी भी तरह से नहीं जुड़े मामले एयरसेल मैक्सिस का उल्लेख ज़मानत याचिका ख़ारिज करते हुए किया।
पूरी दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट बेंच ने सोमवार तक ED द्वारा गिरफ़्तारी पर सोमवार तक अंतरिम रोक लगाते हुए कहा कि आगे की सुनवाई उसी दिन होगी।
आरोपित शातिर, हिरासत में ही हो सकती है ढंग से पूछताछ
इसके पहले तुषार मेहता ने सभी ज़मानत याचिकाओं का सीबीआई और ED की तरफ से विभिन्न पहलुओं के आधार पर विरोध किया। अंतरिम ज़मानत याचिका का विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि यह तो गिरफ़्तारी से बचने के लिए होती है, और चिदंबरम को तो पहले ही सीबीआई की हिरासत में दिया जा चुका है। ऐसे में इस याचिका का कोई मतलब ही नहीं है।
इसके बाद ED के पक्ष में दलील देते हुए उन्होंने कहा कि आरोपित की (तीक्ष्ण) मानसिक क्षमताओं के देखते हुए बिना हिरासत में लिए ढंग से पूछताछ नहीं हो सकती। उनका इशारा चिदंबरम की कानून की डिग्री, हार्वर्ड विश्वविद्यालय से MBA और सालों तक देश के चोटी के वकीलों में से एक के रूप में अनुभव से था। इसके अलावा उन्होंने अदालत से सीलबंद लिफाफे में मौजूद केस-डायरी को स्वीकार कर और उसका अध्ययन करने के बाद सोमवार को ही किसी नतीजे पर पहुँचने का अनुरोध किया। लेकिन बेंच ने डायरी लेने से इंकार कर दिया।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने तत्काल प्रभाव से समाजवादी पार्टी के सभी युवा संगठनों, छात्र सभा, महिला संगठन एवं सभी प्रकोष्ठों के राष्ट्रीय अध्यक्ष, प्रदेश अध्यक्ष सहित राष्ट्रीय, राज्य कार्यकारिणी भंग कर दी है।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव जी ने तत्काल प्रभाव से समाजवादी पार्टी के सभी युवा संगठनों, छात्र सभा, महिला संगठन एवं सभी प्रकोष्ठों के राष्ट्रीय अध्यक्ष , प्रदेश अध्यक्ष,सहित राष्ट्रीय ,राज्य कार्यकारिणी भी भंग की गई है।
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने पीटीआई को बताया, “पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सभी राज्य कार्यकारिणी को भंग कर दिया है। सभी ज़िला, युवा और अन्य इकाइयों को भी भंग कर दिया है।
प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल के पद को छोड़कर अखिलेश ने सभी के पद ख़त्म कर दिए हैं। पार्टी अब नए सिरे से लोगों को ज़िम्मेदारी सौंपने का काम करेगी। ऐसी संभावना जताई जा रही है जल्द ही राष्ट्रीय स्तर पर भी बड़े बदलाव किए जा सकते हैं। अब पार्टी नए सिरे से प्रदेश के ज़िलाध्यक्ष और प्रवक्ताओं समेत अन्य सदस्यों की नियुक्ति करेगी।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव जी ने तत्काल प्रभाव से प्रदेश अध्यक्ष श्री नरेश उत्तम पटेल को छोड़कर, समाजवादी पार्टी की राज्य एवं ज़िला कार्यकारिणी सभी प्रकोष्ठ सहित भंग कर दी है ।
ग़ौरतलब है कि लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे आने के साथ ही अखिलेश यादव ने सबसे पहले अपने प्रवक्ता पैनल को भंग किया था। पार्टी की ओर से दिशा-निर्देश जारी किया गया था कि मीडिया में पार्टी के संदर्भ में कोई भी अधिकृत बयान जारी नहीं करेगा और हर किसी को मीडिया से दूर रहने की हिदायत दी गई थी।
पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनिल यादव के अनुसार, यह फ़ैसला रूटीन प्रक्रिया के तहत लिया गया है। हर बार चुनाव के बाद इन इकाइयों को भंग कर दिया जाता है। इससे पार्टी मेें नए लोगों को आने का मौक़ा मिलता है। उन्होंने बताया कि अब लोगों की मेहनत देखकर उन्हें पद दिया जाएगा। ऐसा माना जा रहा है कि यूपी में होने वाले उप चुनाव के मद्देनज़र यह फ़ैसला लिया गया है।
जयराम रमेश के बाद कॉन्ग्रेस के अन्य बड़े नेताओं से भी मानना शुरू कर दिया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बिना कारण गरियाने, विरोध-के-लिए-विरोध करने से न केवल कॉन्ग्रेस की विश्वसनीयता खत्म हो रही है, बल्कि मोदी को उलटे इसका फायदा मिल रहा है। इन नेताओं के बयानों का समय भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि लोकसभा 2019 के नतीजों के बाद से कॉन्ग्रेस लगातार नकार की मुद्रा में ही चल रही है- यहाँ तक कि कश्मीर मुद्दे पर उसके स्टैंड को भी कोई वैचारिक, नैतिक या तार्किक विरोध नहीं, केवल बदले और असहयोग की राजनीति के रूप में देखा जा रहा है। उसके खुद के कई बड़े नेताओं, जिनमें ‘टीम राहुल’ के माने जाने वाले सिंधिया और देवड़ा शामिल हैं, ने पार्टी लाइन से हटकर कश्मीर के विशेष दर्जे को खत्म करने का समर्थन किया था।
रमेश हैं पहला मुँह खोलने वाले
सबसे पहले यह उद्गार व्यक्त करने वाले कॉन्ग्रेस नेता हैं पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश, जिन्होंने कहा था कि कॉन्ग्रेस को मोदी के 2014-19 के बीच किए हुए काम को स्वीकार करना चाहिए, जिसके कारण उन्हें 30% वोटरों ने दोबारा मत दिया। उन्होंने यह बयान एक किताब की लॉन्चिंग के दौरान दिया। उन्होंने यह भी माना कि प्रधानमंत्री वह भाषा बोल रहे हैं, जो लोगों को उनसे जोड़ती है। “जब तक कि हम यह नहीं पहचानते कि वे ऐसे काम कर रहे हैं जिन्हें लोग मान रहे हैं, और जो भूतकाल में नहीं हुए, हम उनसे टक्कर नहीं ले पाएंगे। अगर उन्हें हर समय किसी दानव की तरह पेश करेंगे, तो उनका सामना नहीं कर पाएंगे।” रमेश ने यह भी साफ किया कि वे मोदी के लिए तालियाँ बजाने के लिए नहीं कह रहे हैं, बल्कि उन सचमुच में अच्छी चीज़ों को मानने की बात कर रहे हैं, जो मोदी प्रशासन में लेकर आए हैं।
‘उज्ज्वला सहित अच्छे काम भी हैं मोदी के’
रमेश के बाद अब अभिषेक मनु सिंघवी ने भी ट्वीट कर कहा कि हर समय मोदी को गाली देना न केवल इसलिए गलत है क्योंकि वे देश के प्रधानमंत्री हैं, बल्कि इससे उन्हें फायदा हो जाता है। उनके हर कार्य को उस काम के व्यक्तिगत पैमाने पर तौला जाना चाहिए, मोदी व्यक्ति के आधार पर नहीं। उन्होंने उज्ज्वला समेत भाजपा के कई अच्छे काम होने की बात मानी।
Always said demonising #Modi wrong. No only is he #PM of nation, a one way opposition actually helps him. Acts are always good, bad & indifferent—they must be judged issue wise and nt person wise. Certainly, #ujjawala scheme is only one amongst other good deeds. #Jairamramesh
शशि थरूर ने भी एक ट्विटर यूज़र के सवाल के जवाब में लिखा कि वे तो 6 साल से मोदी की न्यायोचित तारीफ पर ज़ोर दे रहे हैं, ताकि जब वे आलोचना करें तो उसमें कोई विश्वसनीयता हो।
. As you know, I have argued for six years now that @narendramodi should be praised whenever he says or does the right thing, which would add credibility to our criticisms whenever he errs. I welcome others in Oppn coming around to a view for which i was excoriated at the time!