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J&K: सुरक्षा परिषद में भद पिटवाने के बाद ICJ के देहरी पर Pak, पहले भी खा चुका है यहाँ ‘मार’

जम्मू-कश्मीर मामले में सुरक्षा परिषद में निराश होने के बाद पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का रुख किया है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने इस आशय की जानकारी ARY न्यूज़ टीवी को दी। “कश्मीर का मुद्दा ICJ ले जाने का निर्णय सैद्धांतिक तौर पर ले लिया गया है।”

हिंदुस्तान ने पहले ही दे रखी है चेतावनी

हिंदुस्तान ने पहले ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह हिदायत दे दी थी कि कश्मीर उसका आंतरिक मसला है। अतः चाहे उसे पूर्ण राज्य से केंद्र-शासित प्रदेश में बदलना हो, या अनुच्छेद 370 के ज़रिए उसे मिले विशेष प्रावधानों को खत्म करना, हिंदुस्तान पूरे कश्मीर (POK और अक्साई चिन सहित) में किसी भी बाहरी शक्ति का हस्तक्षेप सहन नहीं करेगा। सुरक्षा परिषद में भी पाकिस्तान को किसी ने भाव नहीं दिया- सुरक्षा परिषद ने एक अनौपचारिक, अनाधिकारिक बैठक बुलाई, वह भी इसलिए कि हिन्दुस्तानी कार्रवाई लद्दाख में भी हुई, और लद्दाख पर चीन अपना दावा करता है। सुरक्षा परिषद की उस बैठक में भी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार स्थायी सदस्यों में 5 में से 4 और अस्थायी सदस्यों में 10 में से 9 ने हिंदुस्तान का पक्ष लिया।

कुलभूषण मामले में मुँह की खा चुका है इसी ICJ में

इसी अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में पाकिस्तान ने पूर्व नेवी अफसर कुलभूषण जाधव के मामले में हार का सामना किया था। ईरान से अगवा कर पाक कुलभूषण को रॉ एजेंट के तौर पर फाँसी पर चढ़ाना चाहता था, ताकि उनके और हिंदुस्तान के सर अपने अंदर फैले जिहाद का ठीकरा फोड़ा जा सके। लेकिन उस मामले में भी ICJ ने हिंदुस्तान का पक्ष सुनने के बाद जाधव की मौत की सज़ा पर पुनर्विचार करने और जाधव को हिंदुस्तानी कॉन्सुलेट से सम्पर्क का अधिकार (कॉन्सुलर एक्सेस) देने का आदेश दिया था।

अगर चपरासी पूर्व-सांसद से ज्यादा कमाते हैं, तो कॉन्ग्रेसी कब करियर बदल रहे हैं?

कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा फायर हैं, कि मोदी भला पूर्व सांसदों को एक हफ्ते में बंगले खाली करने को कह रहे हैं। उनके हिसाब से यह ‘harsh, Arbitrary and discriminatory’ है। शिकायत कर रहे हैं कि पूर्व सांसद को तो पेंशन एक चपरासी से भी कम मिलती है। और सरकार के सचिवों को मकान खाली करने के लिए 6 महीने का समय मिलता है।

आगे वह मामले को राजनीतिक से नैतिक चाशनी में लपेटने का प्रयास करते हुए पूछते हैं कि क्या मोदी चाहते हैं कि भारतीय सांसद अमीर और भ्रष्ट हो जाएँ? लोगों की बजाय कॉर्पोरेट और मल्टीनेशल कंपनियों के प्रतिनिधि बनें? ईमानदार वालों को परिवार की चिंता करनी होती है।

कॉन्ग्रेस की हाल-फ़िलहाल की पूरी राजनीति की तरह यह भी बोगस तर्कों का एक पुलिंदा है, जिसमें जान केवल इसलिए दिख रही है कि एक साथ 4-5 कुतर्कों और कमज़ोर तर्कों का पुलिंदा आपने साथ बाँध दिया है, इस उम्मीद में कि क्या पता, एक-आधा तीर अँधेरे में ही निशाने पर लग जाए!

पेंशन का झूठ

सांसदों की पेंशन के बारे में आनंद शर्मा जी अर्धसत्य बोल रहे हैं। ₹25,000 मासिक पेंशन सुनने में बिलकुल कम लगती है, लेकिन यह केवल पहली बार सांसद बन कर अगला चुनाव हार जाने वालों की है। उसके बाद दूसरे संसदीय कार्यकाल से इसमें ₹2000 प्रति महीना की वृद्धि होती है। यानि कोई व्यक्ति अगर तीन लोकसभाओं का कार्यकाल पूरा करके रिटायर हो तो उसकी कुल पेंशन होगी ₹25,000 + (अगली दो लोकसभाओं के कार्यकाल के 120 महीने का ₹2000 X 120 = ₹2,40,000) यानि ₹2,65,000।

अगर कोई दूसरे लोकसभा कार्यकाल में एक साल पूरा करके भी त्यागपत्र दे दे तो उसकी पेंशन ₹25,000 + (12 X ₹2000 = ₹24,000) = ₹49,000 होगी। महज़ 6 साल काम करके ₹49,000 की पेंशन किस चपरासी या किस सचिव को मिलती है?

अब ज़रा सांसदों के वेतन की बात करें। 2017 में इंडिया टुडे पर प्रकाशित एक आकलन के मुताबिक एक सांसद को केवल मूल वेतन ₹16,80,000 सालाना था; और सारे खर्चे मिलाकर सरकारी खजाने से ₹35,02,000 सालाना प्रति सांसद का खर्चा था। आनंद शर्मा जी बताएँगे नौकरी के पहले ही साल से ₹35,02,000 किस चपरासी या कितने सचिवों को मिल जाती है? देश के सबसे ‘तगड़े पैकेज’ वाली MBA के बाद की कॉर्पोरेट नौकरी में भी पहले साल से ही ₹35 लाख सालाना पाने वाले महज़ 5-10% होते हैं।

और एक बात, 7 दिन का यह नोटिस दिए जाने के पहले पूर्व सांसदों को चुनाव हारे लगभग 2 महीने बीत चुके हैं। कम होते हैं 2 महीने बोरिया-बिस्तर समेटने के लिए? या पूर्व-सांसद संसद से ‘एग्जिट’ करते समय कोई कसम खाते हैं, जैसे घुसने के समय शपथ ली जाती है संविधान की, कि आखिरी नोटिस, आखिरी धक्का खा के ही खाली करेंगे?

ईमानदारी सांसदों की बपौती नहीं होती

इसके अलावा आनंद शर्मा अपने अगले ट्वीट में जो एजेंडा धकेलने की कोशिश करते हैं ईमानदार “बनाम” कॉर्पोरेट का, वही कॉन्ग्रेस के गर्त में गिरते जाने का सबसे बड़ा कारण है- खुद चुनिंदा अमीरों के साथ मिलकर 2G, कोयला घोटाला से लेकर उनकी पार्टी के किए हुए घोटालों की परतें अभी तक उखड़ रही हैं, और इस देश में सबसे बड़े आयकरदाता कॉर्पोरेट जगत को वह बेईमान घोषित करना चाहते हैं। उन्हें यह पता होना चाहिए कि न केवल मुट्ठी भर कंपनियों द्वारा दिया जाने वाला कॉर्पोरेट टैक्स सरकार के राजस्व का सबसे बड़ा स्रोत है, बल्कि कॉर्पोरेट हवा या मंगल ग्रह से नहीं आते- उन्हीं लाखों-करोड़ों आम शेयरधारकों से बनते हैं, जिनका प्रतिनिधित्व करने का कॉन्ग्रेस पार्टी दावा करती है।

आनंद शर्मा यूपीए में उद्योग और वाणिज्य मामलों के मंत्री थे। उद्योग जगत की समस्याएँ सुलझाने के लिए कॉन्ग्रेस सरकार ने उन्हें रखा था; जब वह कॉर्पोरेट जगत के लोगों से मिलते थे तो क्या ऐसे मिलते थे जैसे कोई थानेदार किसी चोर से मिलता है?

अगर आनंद शर्मा जी को सच में लगता है कि एक सांसद की आर्थिक स्थिति किसी चपरासी से खराब होती है रिटायरमेंट के बाद, तो वे अपने बच्चों या अपने जानने वालों के बच्चों को “राजनीति में आने की बजाय चपरासी बनना बेहतर है” का चूरन चटाएंगे? और कोई नहीं, तो वे अपने भूतपूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी को क्यों नहीं कहते कि वे सांसदी-वांसदी छोड़ कर चपरासी ही बन जाएँ?

विंग कमांडर अभिनंदन को प्रताड़ित करने वाले पाक कमांडो अहमद खान को सेना ने किया ढेर

भारतीय वायुसेना के जाबांज पायलट विंग कमांडर अभिनंदन वर्थमान का बदला भारतीय सेना के जवानों ने पाकिस्तान से ले लिया है। पाकिस्तान में अभिनंदन के पकड़े जाने के बाद उन्हें प्रताड़ित करने वाले पाक कमांडो अहमद खान को सेना के जवानों ने मार गिराया है।

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के हटने के बाद से ही पाकिस्तान किसी भी तरह से जम्मू-कश्मीर की शांति को भंग करने की कोशिश कर रहा है। इसके लिए वह आतंकियों की एक बड़ी खेप भारतीय सीमा में भेजने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। इसी कड़ी में पाकिस्तानी कमांडो अहमद खान नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ कराने की कोशिश कर रहा था।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तानी सेना के विशेष सेवा समूह के सूबेदार अहमद खान को भारतीय सेना ने 17 अगस्त को एलओसी के नैकल सेक्टर में मार गिराया था, जब वह भारत में घुसपैठियों को दाखिल कराने का प्रयास कर रहा था। बता दें कि बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद एक दूसरे ऑपरेशन में 27 फरवरी को विंग कमांडर अभिनंदन के मिग-21 क्रैश होने के पश्चात उन्हें पाकिस्तान द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया था।

27 फरवरी को पाक द्वारा अभिनंदन को कब्जे में लेने के बाद पाकिस्तान द्वारा जारी तस्वीरों में दाढ़ी वाले अहमद खान को IAF अधिकारी के पीछे देखा जा सकता है। अभिनंदन ने पाकिस्तान के एफ-16 विमान को मार गिराया था, लेकिन उनका मिग-21 बाइसन पाकिस्तान द्वारे दागे गए मिसाइल से क्षतिग्रस्त हो गया था, जिसके बाद उन्हें इजेक्ट करना पड़ा था। इजेक्ट करके वो पाक-सीमा में चले गए थे, जहाँ उन्हें बंधक बना लिया गया था। पाकिस्तान द्वारा करीब 60 घंटे बाद उन्हें वाघा बॉर्डर से रिहा किया गया था।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अहमद खान ने कश्मीर में आतंकवादियों की घुसपैठ के लिए फारवर्ड पोस्ट पर जैश-ए-मोहम्मद के प्रशिक्षित आतंकवादियों को इकट्ठा किया था। 17 अगस्त को घुसपैठ कराने के लिए पाकिस्तान की सेना ने पुंछ के कृष्णाघाटी सेक्टर में मोर्टार से हमला किया। भारतीय सेना ने जिसका मुँहतोड़ जवाब देते हुए जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तानी कमांडो अहमद खान को मारा गिराया।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इससे पहले अहमद खान नौशेरा, सुंदरबनी और पल्लनवाला सेक्टरों में आतंकवादियों की भारत में घुसपैठ कराता रहा है। बताया जा रहा है कि घुसपैठ कराने के लिए पाकिस्तानी सेना ने उसे विशेष रूप से तैनात और प्रशिक्षित किया था। पाकिस्तान कश्मीर में एक बार से अपने आतंकी मॉड्यूल को सक्रिय करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है लेकिन मुस्तैद भारतीय सेना उसे हर मोर्चे पर खदेड़ रही है।

INX घोटाला: CBI के बाद अब ED की टीम पहुँची चिदंबरम के घर, HC ने बताया मुख्य साजिशकर्ता

आईएनएक्स मीडिया घोटाले (INX Media Scam) से संबंधित भ्रष्टाचार और मनी-लॉन्ड्रिंग मामलों में कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, मंगलवार शाम को दिल्ली के जोरबाग स्थित पी चिदंबरम के घर सीबीआई के 6 अधिकारियों की टीम पहुँची, लेकिन चिदंबरम घर पर नहीं थे और टीम वापस लौट गई। कुछ ही देर बाद ED (प्रवर्तन निदेशालय) की भी एक टीम चिदंबरम की तलाश में उनके घर पहुँची।

इससे पहले मंगलवार (अगस्त 20, 2019) को ही दिल्ली हाईकोर्ट चिदंबरम को ‘किंगपिन’ बताते हुए उनकी अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। HC ने चिदंबरम के मामले को मनी लॉन्ड्रिंग का ‘क्लासिक उदाहरण’ बताते हुए कहा कि ऐसे केस में यदि आरोपित को जमानत दी जाती है, तो इससे समाज में बेहद खराब संदेश जाएगा। 

सुप्रीम कोर्ट ने भी चिदंबरम की अग्रिम जमानत याचिका पर तुरंत सुनवाई से मना कर दिया है। अब चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की बेंच बुधवार (अगस्त 21, 2019) को इस मामले की सुनवाई करेगी।

क्या है पूरा मामला?

दरअसल, यह मामला वर्ष 2007 का है, जब वह यूपीए-1 के कार्यकाल में वित्त मंत्री थे। इस दौरान एफआईपीबी ने दो उपक्रमों को मंजूरी दी थी। INX मीडिया मामले में सीबीआई ने मई 15, 2017 को FIR दर्ज की थी। इसमें आरोप लगाया गया कि वित्त मंत्री के रूप में चिदंबरम के कार्यकाल के दौरान 2007 में 305 करोड़ रुपए की विदेशी धनराशि प्राप्त करने के लिए मीडिया समूह को दी गई एफआईपीबी मंजूरी में अनियमितताएँ हुईं थीं। इसके बाद ED ने पिछले साल इस संबंध में मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया था। 

J&K: सत्यपाल मालिक ने बचाई 70 कर्मचारियों की नौकरी, अब 2000 लोगों को देंगे रोजगार

जम्मू कश्मीर में एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी (MNC) द्वारा निकाल दिए जाने के बाद वहाँ के राजयपाल सत्यपाल मालिक ने रोजगार दिया है। 5 अगस्त से ही घाटी में अनुच्छेद 370 निष्क्रीय करने के बाद AEGIS BPO ने बिजनेस क्लाइंट्स न मिलने के कारण अपना ऑफिस बंद करना पड़ा।

इसके बाद जम्मू कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने तुरंत इस BPO को डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन का काम सौंप दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार, अगले 18 महीने में यहाँ लगभग 2,000 लोगों की नौकरी लगेगी। जिस MNC में ये लोग कार्य कर रहे थे, वहाँ करीब 500 लोगों के काम करने की जगह है।

कश्मीर प्रशासन को इन कर्मचारियों को निकालने की सूचना मिलते ही डॉक्टर शाहिद इक़बाल, डिप्टी कमिश्नर श्रीनगर ने संज्ञान लिया और गत शनिवार को AEGIS BPO पहुँचकर इन 70 कर्मचारियों को 3 महीने की सेलेरी दिलवाई।

BPO ने फिलहाल काम करने वाले सभी कर्मचारियों को तीन महीने तक सैलरी देने की बात कही है। जम्मू कश्मीर प्रशासन का कहना है कि उनका मकसद सभी लोगों की नौकरी को सुरक्षित रखना है और इसके लिए सभी जरूरी कदम उठाये जाएँगे। राज्य प्रशासन फिलहाल BPO को सरकार का काम देगा। इसके अलावा कंपनी के लिए क्लाइंट खोजने का भी काम करेगा। श्रीनगर के डिप्टी कमिश्नर ने खुद BPO सेंटर का दौरा किया और सभी कर्मचारियों को आश्वस्त किया कि उनकी हर संभव मदद की जाएगी।

मस्जिद बनाने के लिए तोड़ा गया था राम मंदिर – रामलला विराजमान के वकील ने पेश किए सबूत

सर्वोच्च न्यायालय में अयोध्या विवाद को लेकर लगातार सुनवाई जारी है। आज मंगलवार (अगस्त 20, 2019) को लगातार 8वें दिन इस मामले की सुनवाई हुई। रामलला विराजमान के वकील सीएस वैद्यनाथन ने मामले के पक्ष में बात रखते हुए दलीलें दी। उन्होंने कहा कि विवादित जमीन पर मस्जिद बनाने के लिए मंदिर ढहाया गया था।

उन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की खुदाई में मिली चीजों का हवाला देते हुए दावा किया कि मंदिर वहीं था जहाँ मस्जिद बनाया गया। रामलला विराजमान की ओर से वरिष्ठ वकील सीएस वैद्यनाथन ने इस दौरान कहा कि एएसआई की रिपोर्ट में मगरमच्छ और कछुए का जिक्र किया गया है, जो मुस्लिम संस्कृति का हिस्सा नहीं हैं।

उन्होंने एएसआई की रिपोर्ट के आधार पर कई अन्य पुरातात्विक सबूतों को न्यायालय के सामने पेश करते हुए कहा कि विवादित स्थल पहले एक हिंदू मंदिर था।

रामलला के वकील ने 12वीं सदी के शिलालेख का हवाला दिया और कहा कि साकेत मंडल के राजा गोविन्द चंद्र ने ग्यारहवी शताब्दी मे अयोध्या मे विष्णु हरि का सुन्दर मंदिर बनवाया था जिसकी पुष्टि वहाँ से मिले एक शिलालेख से होती है जिसमें इसका पूरा वर्णन है।

वैद्यनाथ के मुताबिक खुदाई से मिले अवशेष और वैज्ञानिक पड़ताल के बाद एएसआई की रिपोर्ट और मौक़े से मिले सबूतों के बाद कोई शंका या गुंजाइश नहीं रह जाती कि वहाँ पहले मंदिर था और 11 शताब्दी में वहाँ मस्जिद का निर्माण हुआ।

गौरतलब है कि सोमवार को पाँच जस्‍टिस वाले बेंच में से एक न्यायधीश जस्‍टिस बोबडे के अस्‍वस्‍थ होने के कारण कोर्ट सुनवाई नहीं हो पाई थी। जबकि बीते कुछ दिनों से कोर्ट इस मामले मे रोज़ाना सुनवाई कर रहा है।

इस मामले की सुनवाई चीफ जस्‍टिस रंजन गोगोई की अध्‍यक्षता में पाँच जस्‍टिस की बेंच कर रही है। चीफ जस्‍टिस गोगोई के अलावा, जस्‍टिस बोबडे, जस्‍टिस डी वाइ चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एस एस नजीर मामले की सुनवाई कर रहे हैं।

’14 अगस्त से गायब मेरी बेटी का आकिल और राशिद ने कराया धर्म परिवर्तन, पुलिस साथ देती तो…’

हरियाणा के मेवात में मुस्लिम युवक और हिन्दू युवती की शादी की खबरें सामने आने के बाद हिन्दूवादी संगठनों ने जमकर हंगामा किया। दरअसल, मेवात के फिरोजपुर झिरका गाँव में आकिल खान नाम के युवक ने हिन्दू युवती के साथ शादी कर ली। पीड़ित युवती के पिता ने पुलिस से की गई शिकायत में आकिल खान और उसके दोस्त राशिद के ऊपर युवती का धर्म परिवर्तन करवाने का आरोप लगाया है।

उन्होंने बताया कि उनकी बेटी 14 अगस्त को कॉलेज से ही गायब हो गई थी। जिसके बाद उन लोगों ने उसकी तलाश करनी शुरू की। काफी खोजबीन के बाद पता चला कि बिलाकपुर (छोटी सिधरावट) गाँव के आकिल खान ने अपने साथी राशिद के साथ उनकी बेटी का अपहरण किया है और उसे चंडीगढ़ में रखा है। इसी बीच आकिल खान और युवती का एक वीडियो सामने आया है। वीडियो में युवती कहती दिखाई दे रही है कि उन लोगों ने अपनी मर्जी से शादी की है। उस पर किसी भी तरह का कोई दबाव नहीं है।

पीड़ित युवती के पिता ने आरोप लगाया है कि आरोपितों ने उस पर जादू टोना करवाकर उसे व उसके परिवार को जान से मारने की धमकी देकर उसका धर्म परिवर्तन करवाया है। इसी दहशत की वजह बेटी ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया है। 

इससे नाराज हिन्दूवादी संगठनों ने बाजार बंद करा दिए। शहर के नेताओं के पोस्टर उतारकर आग लगा दिए। इस सबकी वजह से तकरीबन 11 घंटे तक दिल्ली-अलवर रोड जाम रहा। युवती के पिता ने पुलिस से अपहरणकर्ताओं के चंगुल से बचाकर उनकी बेटी को छुड़ाकर लाने की माँग की है। साथ ही उन्होंने उसका मेडिकल कराने और पूर्ण रूप से स्वस्थ होने के बाद ही पूरी सुरक्षा के बीच उससे पूछताछ की बात कही है।

पीड़िता के परिवार ने पुलिस पर आरोप लगाया है कि अगर पुलिस ने उनका साथ दिया होता, तो आज उनकी बेटी उनके पास होती। वो लोग लगातार युवती की बरामदगी की माँग कर रहे हैं। वहीं, पुलिस ने आकिल और राशिद के खिलाफ अपहरण का मामला दर्ज कर तलाश शुरू कर दी है।

कहानी Zomato के लालच और जबरदस्ती की: ‘डार्क किचन’ से लेकर रेस्टॉरेंट्स का बेड़ा गर्क करने तक

पिछले कुछ दिनों में जोमैटो को लेकर तरह-तरह के विवाद चल रहे हैं और कम्पनी ग़लत कारणों से सुर्ख़ियों में लगातार बनी हुई है। हलाल फ़ूड से लेकर मुस्लिम डिलीवरी बॉय तक, जोमैटो का विवादों से एक नाता सा जुड़ गया है। अब कई रेस्टॉरेंट्स जोमैटो से दूर हो रहे हैं। पक्षपात, मोनोपोली और डीप डिस्कॉउंटिंग के कारण डिलीवरी प्लैटफॉर्म्स और रेस्टॉरेंट्स के बीच खींचातानी चल रही है।

बिजनेस प्लान

जब जोमैटो की शुरुआत हुई, तब यह रेस्टॉरेंट्स की ऑनलाइन लिस्टिंग का कार्य करता था। एक पीले रंग के पेज खुलता था, जिसमें लोग विभिन्न रेस्टॉरेंट्स को रेटिंग दिया करते थे। वे अपने अनुभव शेयर करते थे कि खाना कैसा था, अनुभव कैसा रहा, माहौल कैसा था, स्टाफ कैसे थे इत्यादि। बाजार के बदलते समीकरणों और नए खिलाड़ियों के प्रतिस्पर्धा में उतरने के बाद जोमैटो ने नवंबर 2018 में ख़ुद को एक फ़ूड डिलीवरी एप्लीकेशन के रूप में बदल दिया।

क्या आपको पता है कि फ़ूड डिलीवरी के लिए जोमैटो रेस्टॉरेंट से कितने रुपए लेता है? जितने का बिल बनता है, उसका 18-25% जोमैटो उस रेस्टॉरेंट से ले लेता है। डिलीवरी फी के रूप में ग्राहकों को भी थोड़ा-बहुत ख़र्च करना पड़ता है। हालाँकि, यह कई अन्य चीजों पर भी निर्भर करता है। जोमैटो प्रचार के लिए ‘क्लिक पर व्यू’ का प्रयोग भी करता है, यानी किसी भी रेस्टॉरेंट को अपने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर दिखाना। इसका मतलब यह हुआ कि उस रेस्टॉरेंट को होमपेज पर खास जगह दी जाती है।

किस क्षेत्र में रेस्टॉरेंट्स को फ़्लैश किया जाएगा, यह पहले से ही निर्धारित होता है। इसके अलावा कम्पनी ‘जोमैटो गोल्ड’ की भी सुविधा देती है, जिसमें कुछ रेस्टोरेंट्स के द्वारा एक पर एक फ्री जैसी सुविधाओं का लाभ ग्राहकों को दिया जाता है। इसके लिए रेस्टॉरेंट्स से भी रुपए लिए जाते हैं। कितने रुपए लिए जाते हैं, यह रेस्टॉरेंट की लोकप्रियता, मोलभाव की क्षमता और लोकेशन के आधार पर तय किया जाता है। ग्राहकों को ‘गोल्ड’ की वार्षिक सदस्यता के लिए चार्ज किया जाता है।

रेटॉरेंट्स ग्राहकों की संख्या बढ़ाने के लिए ‘जोमैटो गोल्ड’ की सदस्यता लेते हैं। इसके तहत नियम है कि डिस्काउंट का लाभ उठाने के लिए रजिस्टर्ड यूजर के साथ कम से कम एक और व्यक्ति होना चाहिए। रेटॉरेंट्स भी सारी फ़ूड आइटम्स पर ऑफर का लाभ नहीं देते।

डार्क किचन

जोमैटो और स्विगी, दोनों ही भोजन की डिलीवरी करते हैं। डिलीवरी करने वाले कर्मचारी ग्राहकों को रेस्टॉरेंट्स से खाना पहुँचाते हैं और साप्ताहिक रूप से ग्राहकों द्वारा दिए गए रुपयों को रेस्टॉरेंट्स को ट्रांसफर करते हैं। लेनदेन रेस्टॉरेंट और ग्राहक के बीच होता है, जबकि जोमैटो और स्विगी एक मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं। इसीलिए ग्राहकों का डेटा भी रेस्टॉरेंट्स द्वारा ही लिया जाता है। लेकिन, जोमैटो और स्विग्गी ने यहीं से गड़बड़ियाँ शुरू कर दीं।

दोनों कंपनियों ने न सिर्फ़ ग्राहकों का डेटा चुराया बल्कि उसका इस्तेमाल करते हुए कई इलाक़ों में अपने ‘डार्क किचन’ स्थापित किए हैं। यह ग्राहकों के विश्वास के साथ धोखा है और उनकी प्राइवेसी का भी हनन है। संसद में एक ऐसा बिल भी इंट्रोड्यूस हो चुका है, जिसमें प्राइवेसी को किसी भी नागरिक का मूलभूत अधिकार बताया गया है और यह पास हुआ तो ऑनलाइन पोर्टल्स द्वारा ग्राहकों के डेटा का ग़लत उपयोग अपराध की श्रेणी में आ जाएगा।

अभी का विवाद क्या है?

हाल के कुछ दिनों में जोमैटो, स्विगी, उबेरीट्स और फ़ूडपांडा ने अपने-अपने प्लैटफॉर्म्स पर ग्राहकों की संख्या बढ़ाने के लिए पूरा ज़ोर लगा दिया है। कुछ ने भारी डिस्काउंट के जरिए ग्राहकों को लुभाने का प्रयास किया है। इन्होने कई ऐसे रस्टॉरेंट्स को इस ऑफर में शामिल किया, जो इंडस्ट्री में तरफदारी को बढ़ावा देता है। ऑनलाइन प्लैटफॉर्म्स पर मिल रहे ऑफर्स का लाभ उठाने के लिए लोगों ने भी रेस्टोरेंट्स में जाना कम कर दिया। अतः, इससे बिजनेस लाइन के ऊपर और नीचे, दोनों पायदानों को नुकसान पहुँचाया।

जनवरी 2019 में कई छोटे व मँझोले रेस्टॉरेंट्स ने प्रधानमंत्री कार्यालय को शिकायत देकर इस अनुचित व प्रतिबंधक ट्रेड प्रैक्टिस के बारे में सूचित किया और उचित कार्रवाई करने का आग्रह किया। ‘उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग’ ने इन कंपनियों के अधिकारियों को इस मामले पर बात करने के लिए तलब भी किया। इस बैठक के बाद जोमैटो ने अपने सभी ‘गोल्ड’ रेस्टॉरेंट्स को बता दिया कि अगस्त 14, 2019 को इसके तहत फिलहाल मिलने वाले सारे ऑफर्स ख़त्म हो जाएँगे और ‘गोल्ड’ का लाभ अब सिर्फ़ रेस्टॉरेंट जाकर खाने वालों को नहीं बल्कि ऑनलाइन ऑर्डर करने वालों को भी मिलेगा।

जोमैटो की O2 स्कीम के तहत, रेस्टॉरेंट ग्राहकों के पसंद का एक फ़ूड आइटम उन्हें मुफ्त में देगा और नेट बिल का 18-25% कमीशन भी पे करेगा। इससे रेस्टॉरेंट को ग्रॉस इनवॉइस का 38-42% हिस्सा ही मिलेगा। जोमैटो से रेस्टॉरेंट्स को दिक्कत यह है कि कम्पनी ने अपना कमीशन कम नहीं किया और डिस्काउंट का कोई भी हिस्सा वहन करने से मना कर दिया। अब रेस्टॉरेंट्स खफा हैं और जोमैटो के ख़िलाफ़ ‘लॉगआउट’ अभियान चला रहे हैं।

अब जोमैटो ने इन सभी रेस्टॉरेंट्स को लीगल नोटिस भेज दिया है। चूँकि, लॉगआउट करने के लिए 45 दिनों के नोटिस पीरियड की समयावधि तय थी, जोमैटो ने इन सबके ख़िलाफ़ अदालत जाने की धमकी दी है।

अभी की स्थिति क्या है?

लीगल नोटिस मिलने के बाद रेस्टॉरेंट्स और भी ज्यादा उग्र हो गए हैं और जोमैटो के ख़िलाफ़ अभियान चला रहे हैं। अब जोमैटो इस स्थिति को किसी तरह संभालने के लिए रेस्टॉरेंट्स को बातचीत करने के लिए कह रहा है। जोमैटो के सीईओ ने ट्वीट कर बातचीत के लिए कहा लेकिन उन्होंने लगे हाथ रेस्टॉरेंट्स को कॉस्ट घटाने और अच्छे तरीके से प्रबंधन करने की सलाह दे डाली। रेस्टॉरेंट्स के मालिकों में इससे ग़लत सन्देश गया।

जोमैटो: लालच की एक नई कहानी

जोमैटो व उसकी प्रतिस्पर्धी कंपनियों ने फ़ूड सेक्टर को इतना नुकसान पहुँचाया है कि अब सब कुछ सामान्य नहीं रहा। अगले राउंड की फंडिंग के चक्कर में इन्होने रेस्टॉरेंट्स की ऐसी की तैसी कर दी है। ख़ासकर छोटे व मँझोले रेस्टॉरेंट्स खाना और प्रबंधन का खर्च अपने उत्पाद बेच कर ही निकालती है। दीपेंद्र गोयल इस मामले में एकदम विफल साबित हुए हैं।

छोटे रेस्टॉरेंट्स को लगातार धमकाने में लगे जोमैटो ने बड़ी चालाकी से अपनी कॉन्ट्रैक्ट पॉलिसी में भी इच्छित बदलाव कर दिया। एक तरफ रेस्टॉरेंट्स से भी रुपए लेना और फिर ग्राहकों से भी वसूलना, दोनो हाथों में लड्डू रख कर व्यापार करने के लिए जोमैटो ख़ुद के लाभ के लिए कुछ भी करता जा रहा है।

(अंकुर पांडेय और चंद्रभूषण जोशी द्वारा OpIndia में लिखे अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद अनुपम के सिंह ने किया है।)

मैं अनुराग ‘समय’ कश्यप हूँ, मुझे हक़ीक़त से क्या, मेरी जिंदगी का एक्के मकसद है – प्रपंच और प्रलाप चलता रहे

नेटफ्लिक्स पर सेक्रेड गेम्स सीजन-2 के आने से ठीक पहले प्रधानमंत्री से ‘पत्राचार‘ के बाद अनुराग कश्यप की सोशल मीडिया से हाल ही में विदाई हुई है। यह विदाई बहुत ही ज्यादा द्रवित कर देने वाली थी। सोशल मीडिया से सिनेमा के विवादित नामों की जब भी विदाई का जिक्र होता है, AIB की विदाई भी याद आती है। लेकिन अनुराग कश्यप की विदाई इन सभी विदाइयों से ऊपर है। पहला कारण तो यह की गालियों के आविष्कार के लिए पूरी फिल्म और नेटफ्लिक्स सीरीज बना देने वाले अनुराग कश्यप को गालियों से डर लगता है, और दूसरा ये कि अनुराग कश्यप जाते-जाते एक फिल्म का जिक्र छेड़ गए। इस फिल्म का नामा है; राशोमोन!

राशोमोन से पहले अनुराग कश्यप के दर्द पर चर्चा करनी आवश्यक है। गालियों के शोध के लिए पूरी की पूरी फिल्म बना देने का जज्बा रखने वाले अनुराग कश्यप को सोशल मीडिया पर गाली देने वालों से डर लगता है। अनुराग कश्यप की मानें तो इसी कारण उन्हें सोशल मीडिया छोड़ना पड़ा। हालाँकि, ऐसा कहकर उन्होंने अपना सिर्फ ट्विटर एकाउंट डिलीट किया, लेकिन फेसबुक एकाउंट नहीं! ऐसा ही डर कुछ समय पहले ट्विटर पर पत्रकारिता की व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ कुलपति रवीश कुमार ने भी जाहिर किया था और ट्विटर से भाग खड़े हुए थे। भले ही इसके बाद रवीश ने खुलासा किया था कि डर से बचने के लिए वो कानों पर ईयर फोन लगाकर ड्राइव करते हैं और हिंदी नहीं पढ़ते और सुनते।

अनुराग कश्यप का सबसे मासूम डर, जिसके लिए बड़े प्यार से उनके दोनों गाल खींचे जाने चाहिए, ये है कि उन्हें ना ही कश्मीर, न अनुच्छेद 370 और ना ही किसी इतिहास की जानकारी है। लेकिन फिर भी उन्हें केंद्र सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने का विरोध करना था। ये मैं नहीं कह रहा बल्कि, खुद अनुराग कश्यप ने अपने ट्वीट में कहा है। यह ट्वीट उनका इकबालिया बयान था, या फिर कोई सस्ता नशा फूँकने का दुष्परिणाम, यह घोषणा करने से पहले उनका ट्विटर एकाउंट डिलीट हो चुका था।

अनुराग कश्यप की मासूमियत देखिए कि सोशल मीडिया से उपजे डर की शिकायत करने के लिए भी वो सोशल मीडिया का ही इस्तेमाल करते हैं और पुलिस में शिकायत दर्ज करने की जगह प्रेस में जाकर यह प्रलाप करते हैं, कि उन्हें सोशल मीडिया पर डर लगता है। रही ज्ञान की बात, तो जिस अनुराग कश्यप को जनादेश से चुने गए प्रधानमंत्री और 1,200,000,000 लोगों के बीच सम्बन्ध पता न हो उसके ट्वीट मासूमियत भरे ही कहे जा सकते हैं। इनकी बुद्धि और विवेक को देखते हुए ये चर्चा योग्य हैं तो नहीं लेकिन दुर्भाग्यवश जिस स्तर पर ये लोगों को अपनी बेवकूफी से प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं उसको देखते हुए अनुराग कश्यप पर बात करनी जरुरी हो जाती है।

सोशल मीडिया पर हर व्यक्ति, चाहे वो नेता हो, लेखक, विचारक, कलाकार, पत्रकार, कोई भी जब आता है तो वो सिर्फ ये सोचकर नहीं आता कि उसे एक रक्षाकवच का आवरण दिया जाएगा क्योंकि वो दिल से बहुत नाजुक है। अगर आपको झालमूड़ी से लेकर तेल के कुँए रखने वालों पर ज्ञान और विचार रखने की आदत है तो आपको दूसरों के विचार पढ़ने का भी अभ्यास होना ही चाहिए। इसके लिए जब आप ‘भक्त’ और ‘ट्रोल’ जैसे शब्दकोष अपने राजनीतिक और सामाजिक पूर्वग्रहों के कारण गढ़ने शुरू करते हैं तब आप गाली परोसे जाने की पटकथा खुद रख चुके होते हैं।

क्योंकि अनुराग कश्यप जैसे लोग जब स्वयं भी अपने तर्कों और तथ्यों के साथ खड़े नहीं रह पाते हैं तब वो लोग बेहद सोफिस्टिकेटेड रहते हुए शब्दकोश रचते हैं। इसके बदले में जब वो लोग, जिन्हें सोशल मीडिया पर प्रगतिशील विचारक अपना विरोधी कहते हैं, अपने शब्दकोश और रचनात्मकता का प्रयोग करते हैं तब आपको उनके शब्दकोश को गाली कहने का अधिकार नहीं होता है।

अनुराग कश्यप ने ट्विटर से भागने से पहले जिस राशोमोन फिल्म का जिक्र किया, वो फिल्म जब 1950 में जापान में रिलीज हुई थी तो जापानी समीक्षकों को उसमें कुछ खास नजर नहीं आया था। राशोमोन फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह से एक समुराई की हत्या पर चार लोगों के अलग-अलग तर्क आते हैं और विरोधाभास के कारण किसी भी तर्क को गलत साबित कर देना मुश्किल होता है।

अंत में सत्य, कि समुराई की हत्या का असल गुनेहगार कौन है, अंत तक ठगा खड़ा रहता है और आज तक भी किसी को पता नहीं चल पाया है कि आखिर समुराई को किसने और किस हथियार से मारा था। ऐसे ही हॉलीवुड में बनी एक फिल्म थी- 12 एंग्री मैन। जिसमें 12 लोग एक अपराध पर दलीलें देते हैं और किसी के भी तर्क से असहमत हो पाना मुश्किल होता है।

अब यदि वापस अनुराग कश्यप पर चर्चा करें कि बेहद वाहियात से तथ्य और तर्कों के साथ सेक्रेड गेम्स जैसी नेटफ्लिक्स सीरीज के आने से ठीक पहले अनुराग कश्यप को डर क्यों लगा? तो इसके पीछे कारण उनकी बनी बनाई योजना पर अनुच्छेद-370 द्वारा पानी फेर दिया जाना है। देश में ‘जय श्री राम’ के इस्तेमाल से घबराने पर अनुराग कश्यप ने अपने ही जैसे अन्य बेरोजगार फिल्म निर्देशकों के साथ मिलकर प्रधानमंत्री को एक चिठ्ठी लिखकर पत्राचार किया, जिसने हिन्दुओं द्वारा किए जा रहे अपराधों पर चल रहे डिबेट को हवा दी।

अनुराग कश्यप के साथ ही उनकी एक पूरी जमात ने अपने जहर को फेंकने के लिए अपनी कमर पेटिकाएँ कसी ही थीं कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 ने सब कुछ बदलकर रख दिया। अनुराग कश्यप के मानो एकदम से जज्बात बदल गए, जिंदगी बदल गई, सब कुछ बदल गया।

अब प्रोपेगेंडा और नैरेटिवबाजी में पीएचडी धारक यह समूह जान चुका था कि ये एकदम बैकफुट पर खड़ा है और इनकी सस्ती लोकप्रियता का इंतजाम तबाह हो चुका है। यही वजह है कि अनुराग कश्यप ने जाते-जाते एक विक्टिम कार्ड खेलकर जितनी सस्ती लोकप्रियता बटोर सकते थे वो भी बटोरी और पहली फुर्सत में निकल लिए।

अब सवाल यह है कि क्या लोगों ने अनुराग कश्यप को गाली देनी बंद कर दी है? जैसा कि एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार भी अक्सर कहते हैं- ‘मुझे हिंदी पढ़ने-लिखने वाले ‘भक्त’ और ‘ट्रोल’ गाली देते हैं’, अनुराग कश्यप ने भी ठीक वही किया।

असल में, इस प्रगतिशील लिबरल वर्ग का वास्तविक डर संवाद के साधनों का दोतरफा हो जाना है। अब यह संभव नहीं है कि आप टीवी स्क्रीन के पीछे बैठकर इकतरफा अपने कुतर्कों का ज्ञान बाँचें और श्रोता, दर्शक, पाठक आपसे सहमत होने के लिए मजबूर हों। यह समय त्वरित संचार और प्रतिक्रिया का है। जो प्लेटफॉर्म जितना ज्यादा प्रतिक्रिया करता है, ये प्रगतिशील वहाँ से अवश्य पलायन करेंगे।

यही एक बड़ी वजह है कि लेफ्ट-लिबरल्स ट्विटर जैसी माइक्रोब्लॉगिंग वेबसाइट्स पर बहुत कम हावी हैं, जबकि फेसबुक पर इन लोगों ने बहुत बड़ा तंत्र विकसित किया है। दक्षिणपंथियों के संदर्भ में यह एकदम उलट है। कारण स्पष्ट है कि दक्षिणपंथी प्रतिक्रियाओं से घबराते नहीं बल्कि उनका स्वागत करते हैं। क्या बस इतनी सी बात साबित करने के लिए नाकाफी है कि असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के सबसे बड़े दुश्मन लेफ्ट-लिबरल्स ही हैं? जबकि ये लोग दावा इसके विपरीत करते हैं।

प्रतिक्रियाओं से घबराने और डरने वाले प्रगतिशीलों पर ही प्रसिद्ध व्यंग्यकार नीरज बधवार जी को पढ़ा जाना चाहिए। नीरज बधवार जी लिखते हैं- “दरअसल समस्या गाली भी नहीं है। रवीश कुमार और अनुराग कश्यप जैसे लोगों के साथ दिक्कत ये है कि जब आपको सारी ज़िंदगी अपने ही जैसे लोगों के साथ बंद कमरों में अपने ही विचार को सही मानते हुए उस पर चर्चा करने की आदत पड़ चुकी हो, तो आप ट्वटिर पर सरेआम अपने विचार की धज्जियाँ उड़ते नहीं देख सकते।”

अनुराग कश्यप जिस रोशोमन फिल्म का जिक्र कर के भागे हैं उन्हें वह अपने संदर्भ में देखनी चाहिए। वो खुद सत्य से कितना दूर हैं, उनका खुद का ट्वीट ये साबित करता है। देखा जाए तो अनुराग कश्यप का ट्वीट हर उस प्रगतिशील विचारक का चेहरा है जिसका एकमात्र लक्ष्य सरकार और समाधान विरोधी एजेंडा है। जब भी कोई ‘लेफ्ट-लिबरल विचारक’ किसी मुद्दे पर ज्ञान बाँचना शुरू करता है तो अनुराग कश्यप का ये बयान स्मरण हो जाना चाहिए जिसमें वो कह रहे हैं- “पता, मैंने इतिहास भी नहीं पढ़ा है लेकिन सरकार के इस कदम से मुझे आपत्ति है।”

यह सूचना और अभिव्यक्ति का सबसे सुनहरा दौर है। देश के लेफ्ट-लिबरल विचारक अपने विष का इतना प्रलाप कर चुके हैं कि उन्होंने स्वयं की विश्वसनीयता को स्वयं ध्वस्त कर दिया है। चाहे रवीश कुमार हों, अनुराग कश्यप हों या फिर जेएनयू की फ्रीलांस प्रोटेस्टर शेहला रशीद हों, इन्होंने अपने नैरेटिव को खुद ही एक्सपोज कर लिया है। एक समय तक इनसे प्रभावित रहने वाला इनका ही प्रशंसक अब इनके किसी भी बयान से सतर्क हो जाता है कि अगर फलां लेफ्ट-लिबरल इस बात का पक्ष ले रहा है तो वास्तविकता जरूर इसके उलट होगी।

अनुराग कश्यप को राशोमोन से पहले उस झूठे चरवाहे गड़रिए की देशी कहानी को 100 बार पढ़ना चाहिए, जिसमें गड़रिया बार-बार गाँव वालों को ‘भेड़िया आया, भेड़िया आया’ कहकर बेवकूफ बनाता रहा, और जब एक दिन भेड़िया सच में आकर उसकी बकरी और भेड़ें उठा ले गया, तो गाँव वाले कहते रहे- ‘इग्नोर करो, ये परम-प्रलापी फिर से कोई प्रोपेगेंडा ही कह रहा होगा।’

असम बाढ़: चीन, रूस, फ्रांस ने बढ़ाया मदद का हाथ, साझा की सैटेलाइट तस्वीरें

असम में चल रहे बाढ़-राहत कार्य में चीन, रूस और फ्रांस ने तकनीकी सहायता के लिए हाथ बढ़ाया है। तीनों देश अपनी-अपनी सैटेलाइटों से बाढ़ की तस्वीरें भारत को मुहैया कराएँगे, जिस से बाढ़-क्षेत्र के फैलाव का दायरा पता चले। भारत The International Charter Space and Major Disasters के हस्ताक्षरकर्ताओं में से एक है, जिसका सदस्य होने के नाते वह इस 32-सदस्यीय संगठन के सदस्यों को ‘रिक्वेस्ट’ भेज कर चार्टर का आह्वाहन कर सकता है। इसके अंतर्गत उन सदस्य देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों में मौजूद कोऑर्डिनेटरों के माध्यम से तस्वीरें मिल सकतीं हैं, जिन देशों की सैटेलाइटें सबसे अच्छे तरीके से आपदा-प्रभावित क्षेत्रों को देख पा रहीं हैं।

ISRO द्वारा 17 जुलाई को भेजी गई रिक्वेस्ट के जवाब में फ्रांस के राष्ट्रीय अंतरिक्ष अध्ययन केंद्र (National Centre for Space Studies), चीन के राष्ट्रीय अंतरिक्ष प्रशासन (National Space Administration) और रूस के ROSCOSMOS ने अपने उपग्रहों से असम की मिल रहीं तस्वीरें साझा कीं। यह तस्वीरें धुबरी, मरीगाओं, बारपेटा, धेमाजी, लखमीपुर की थीं।

इसके अलावा अमेरिका के USGS (United States Geological Survey), ESA (European Space Agency) और तीन अन्य देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों से तस्वीरें मिलने की बात विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कही। यह सभी तस्वीरें इसरो के राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र ने प्राप्त कीं। इसरो के खुद के CARTOSAT उपग्रह ने भी बाढ़-प्रभावित क्षेत्र की तस्वीरें लीं।

आम बात है

मीडिया से बात करते हुए रवीश कुमार ने बताया कि विभिन्न अंतरिक्ष एजेंसियों के बीच यह तालमेल और सहयोग न केवल त्वरित प्रतिक्रिया में सहायक होता है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों में “आम बात” है। उन्होंने मीडिया को यह भी सूचित किया कि ISRO ने भी भूतकाल में ऐसा सहयोग अन्य देशों को दिया है। उन्होंने उदाहरण दिया कि 2014 के अगस्त में जब चीन के युनान प्रान्त में 398 लोगों की जान लेने वाला भूकंप आया था, उस समय इसरो ने भी CARTOSAT से ली हुई तस्वीरें चीन की एक्टिवेशन रिक्वेस्ट के बाद भेजी थीं