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PM मोदी ने भूटान में लॉन्च किया भारत का RuPay कार्ड, कुल 9 MoU पर हस्ताक्षर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार (अगस्त 17, 2019) को अपने दो दिवसीय भूटान यात्रा पर पहुँचे। इस मौके पर भारत और भूटान के बीच हाइड्रो पॉवर प्रोजेक्ट, नॉलेज नेटवर्क, मल्टी स्पेशलिएटी हॉस्पिटल, स्पेस सैटेलाइट, रूपे कार्ड के इस्तेमाल समेत कुल 9 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। प्रधानमंत्री मोदी की इस भूटान यात्रा को दोनों देशों के बीच साझेदारी को मजबूत करने की दिशा में निरंतर किए जा रहे प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

भूटान के पीएम लोते शेरिंग और पीएम मोदी ने संयुक्त बयान जारी किया है। इस दौरान पीएम मोदी ने कहा कि अपने दूसरे कार्यकाल के शुरुआत में भूटान आना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। नरेंद्र मोदी ने कहा, “हमने भूटान के छात्रों से मुलाकात की। हमें खुशी है कि भूटान में आज हमने रुपे कार्ड को लॉन्च किया है। इससे व्यापार में मदद मिलेगी और हमारी साझा विरासत भी मजबूत होगी।”

नोटबंदी के बाद भारत ने RuPay कार्ड लॉन्च की थी। अब इसकी शुरुआत भूटान में भी की गई है।

प्रधानमंत्री मोदी के स्वागत में भूटान की सड़कों पर लोगों का हुजूम भी उमड़ा। पारो से थिम्पू जाने वाली रोड पर सैकड़ों लोग भारत और भूटान के झंडे लेकर खड़े रहे। लोगों ने पीएम मोदी का अभिवादन किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एयरपोर्ट पर ही गार्ड ऑफ ऑनर भी दिया गया।

इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी भूटान के प्रधानमंत्री डॉ. लोते शेरिंग से संसद में मुलाकात की। प्रधानमंत्री भारतीय समुदाय के लोगों से भी मिले। इस दौरान ‘भारत माता की जय’ और ‘मोदी जिंदाबाद’ के नारे लगे।

इस अवसर पर पीएम मोदी ने भारत की पनबिजली कंपनी एनएचपीसी के सहयोग से मध्य भूटान के ट्रोंगसा डोंग्खग जिले के मंगदेछु नदी पर 720 हजार मेगावाट की क्षमता वाली बिजली परियोजना का उद्घाटन भी किया। इस परियोजना की कुल लागत 1 बिलियन डॉलर है।

नेहरू-शेख की दोस्ती के कसीदों में ही छिपा है कश्मीर का शोकगीत, खुसरो की कविता से नहीं बदलेगा इतिहास

जम्मू-कश्मीर में जब से मोदी सरकार ने आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी किया है, ​इसके विरोधियों से लेकर समर्थक तक न केवल इतिहास के प्रसंगों से जूझ रहे हैं, बल्कि अपने तर्क को धार देने के लिए गद्य और कविता तक का हवाला दे रहे हैं। इसी कड़ी में कश्मीर को लेकर जवाहरलाल नेहरू की भूमिका का बचाव करने के लिए अमीर खुसरो की एक फारसी कविता परोसी जा रही है। यह कविता विशारदों से लेकर सोशल मीडिया तक आजकल नजर आ रही है।

श्लाघ्य विचारकों की मानें तो नेहरू ने कहा था कि कश्मीर के भाग्य का का फैसला कश्मीर की जनता ही करेगी और उसे अपने राजनैतिक भविष्य को चुनने का मौका दिया जाएगा। नेहरू ने यह बयान नवंबर 02, 1947 को दिया था। कश्मीर के भविष्य को लेकर यह बयान उस शख्स का है जिसके फैसलों का आज तक वहॉं के लोग भुगत रहे। इन फैसलों के पीछे एक बड़ी वजह शेख अब्दुल्ला से नेहरू की गाढ़ी दोस्ती भी थी।

श्रीनगर का लाल चौक इस दोस्ती का गवाह रहा है। यहीं शेख अब्दुल्ला ने अपने दोस्त पंडित नेहरू की जमकर प्रशंसा करते हुए खुसरो की वह कविता पढ़ी थी जो आजकल इनके गुनाह छिपाने के लिए इस्तेमाल की जा रही है। फ़ारसी की वह कविता है;
मन तू शुदम तू मन शुदी
मन तू शुदम, तू जान शुदी

इस कविता का अर्थ है-
मैं अब तुम हो जाता हूँ और तुम मैं बन जाओ
मैं तुम्हारा शरीर और तुम मेरी आत्मा बन जाओ
ताकि कोई यह न कह सके कि हम-तुम अलग-अलग हैं।

हैरानी की बात है कि अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किए जाने के बाद प्रगतिशील इस कविता की दुहाई दे रहे। नेहरू की गलती को उनकी यारी-दोस्ती में पढ़े गए कसीदों से भुलाया जा रहा है ताकि किसी को नेहरू के किए छल की भनक भी ना लग सके। कश्मीर में आज मानवता की दुहाई देने वाले लोग नेहरू की गलती के कारण सदियों से चले आ रहे रक्तपात और वैमनस्य को नेहरू-शेख की शायरी और नज्मों के आवरण में छुपा देना चाहते हैं।

विचारकों को नेहरू के जुमले याद हैं, ताकि वो उस भीषण गलती को भूल सकें जो नेहरू की कमजोरियों का परिणाम थी। वही नेहरू, जिन्हें सरदार पटेल अविवेकी नेता कहते थे। हालाँकि, वर्तमान प्रगतिशील विचारक चाहें तो वो सरदार पटेल को भी नेहरू के प्रति इस मत के लिए ‘हाइपर नेश्नलिस्ट’ का विशेषण देकर नेहरू के गुनाहों को फिर से नजरअंदाज कर सकते हैं।

एक समय था जब 1946 में महाराजा हरि सिंह ने शेख अब्दुल्ला को जेल में डाल दिया था और जवाहरलाल नेहरू इससे इतने आक्रोशित हो गए थे कि अपने मित्र की वकालत करने तुरंत कश्‍मीर पहुँच गए थे। नेहरू स्वयं एक कश्मीरी थे और राज्य के प्रति उनका रवैया निहायत भावुकतापूर्ण था। जून, 1946 में अपने गिरफ्तार मित्र शेख अब्दुल्ला को वे प्रोत्साहित करना चाहते थे, लेकिन राज्य सरकार ने उनके प्रवेश पर रोक लगा दी। फिर भी नेहरू नहीं माने और गिरफ्तार कर लिए गए। कॉन्ग्रेस वर्किंग कमेटी इसके पक्ष में नहीं थी कि नेहरू राज्य का कानून तोड़ें और वहाँ गिरफ्तार कर लिए जाएँ, फिर भी नेहरू गए।

सरदार पटेल की नजरों में भावुक और अविवेकी नेता थे नेहरू

शेख अब्दुल्ला से मित्रता के पीछे जवाहरलाल नेहरू की इस दीवानगी से सरदार पटेल बेहद नाराज थे। सरदार पटेल ने जुलाई 11, 1946 को डीपी मिश्र लिखे एक पत्र में कहा था-

अभी- अभी उन्होंने (नेहरू ने) ऐसी अनेक नादानियाँ की हैं, जिनकी वजह से हमें बड़ी परेशानियाँ हुई हैं। कश्मीर में उठाया गया उनका कदम, संविधान सभा के लिए किए गए सिख चुनाव में उनका हस्तक्षेप और कॉन्ग्रेस महासमिति की बैठक के तुरंत बाद उनका अखबारी परिषद, ये सब भावुकतापूर्ण अविवेक के कृत्य हैं। इनकी वजह से परिस्थितियों को सही मार्ग पर ले जाने में हमें जबर्दस्त तनाव से गुजरना पड़ता है। परंतु इन सारे अविवेक के बावजूद जवाहरलाल में स्वाधीनता के लिए अनुपम उत्साह और उत्कट लगन है।

नेहरू के मित्र शेख अब्‍दुल्‍ला के खानदान ने जम्मू-कश्मीर को हमेशा त्रिशंकु बने रहने दिया। इसी दोस्ती की वजह से अब्दुल्ला की सांप्रदायिक, राजनैतिक महत्वकांक्षा कश्मीर की नियति बन गई। अलीगढ़ से पढ़े शेख अब्दुल्ला प्रगतिशील विचारक माने जाते थे। इस तरह से वो हर समय, हर काल के ‘प्रगतिशील विचारकों’ के मानसिक खोखलेपन का प्रतीक भी अपने आप बन जाते हैं। शेख के दादा एक हिंदू थे और उनका नाम था राघौराम कौल। शेख अब्दुल्ला के जन्‍म के महज 15 साल पूर्व ही, यानी वर्ष 1890 में उन्‍होंने इस्‍लाम स्‍वीकार किया था।

दोस्ती की वजह से हाशिए पर सरदार के विचार

नेहरू और शेख की इसी मित्रता ने कश्मीर के अत्याचार और नरसंहार की पटकथा लिखी। कालांतर में इसी मित्रता ने बहुसंख्यक आबादी के नेता शेख़ अब्दुल्ला को जम्मू-कश्मीर के आपातकालीन प्रशासन का मुखिया बना दिया। इसके बाद इतिहास गवाह है कि आपातकालीन प्रशासन के मुखिया बनते ही शेख़ अब्दुल्ला तानाशाही पर उतर गए। कुछ ही दिन बाद शेख़ सरकारी ही नहीं, व्यक्तिगत तौर पर भी महाराजा हरि सिंह का कड़ा विरोध करने लगे। यह वो समय था जब नेहरू की नीतियों से नाराजगी के बावजूद उनके सम्मान में सरदार पटेल का अस्तित्व हाशिए पर जाता रहा।

प्रोग्रेसिव, सेकुलर, लिबरल शेख़ अब्दुल्ला अचानक से सांप्रदायिक नहीं हुए, वो बस इस मौके के इन्तजार में थे। उन्होंने हिन्दुओं को जेल में डालना और मुस्लिमों को प्रश्रय देना शुरू कर दिया था। शेख़ की साम्प्रदायिकता का जिक्र महाराजा हरि सिंह के वैधानिक सलाहकार मेहरचंद महाजन द्वारा सरदार पटेल को लिखे गए पत्रों में मिलता है।

कश्मीर के इतिहास में हमारे नेताओं की, जिन्हें महामानव बनाने में एक पूरे इकोसिस्टम ने आज भी पूरा जोर लगाए रखा है, की अनगिनत ग़लतियाँ स्पष्ट नज़र आती हैं। मुद्दा चाहे रक्तपिपासु वामपंथियों के प्रतीक लाल चौक का हो, या फिर घाटी में तनाव का, इन सबके पीछे नेहरू-शेख की जुगलबंदी सबसे ज्यादा जिम्मेदार थी। यह कहना कोई अतिरेक नहीं होगा कि नेहरू खुद को जहाँ भारत का प्रधानमंत्री मानते थे वहीं शेख को जम्मू कश्मीर का प्रधानमंत्री देखना चाहते थे। दूसरी ओर, इस सब घटनाक्रम के बीच सरदार पटेल को नजरअंदाज किया जाना, नेहरू की अनीतियों के सामने नतमस्तक होते रहना जारी रहा।

इस सारे घटनाक्रम के बीच जम्मू-कश्मीर और उसकी जनता का भाग्य तय होता रहा। इन्हीं कमजोर नीतियों की वजह से इस राज्य में अलगाववाद,आतंकवाद, चरमपंथ, वामपंथ आराम से पैर पसारता रहा। हालत इस तरह बन गए कि महाराजा हरि सिंह को ही कश्मीर से निकाल दिया गया। पहले शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी और फिर उन्हीं की संतुष्टि के लिए उनकी रिहाई की गई।

इसके बाद एक विशेष विचारधारा के तुष्टिकरण के लिए घाटी में हमेशा के लिए अनुच्छेद-370 का बीजारोपण कर दिया गया। यह विशेष राज्य का दर्जा जम्मू-कश्मीर की जनता के लिए कम और नेहरू की ओर से शेख अब्दुल्ला के लिए मित्रता का उपहार ज्यादा था।

वर्ष 2013 में भाजपा नेता अरुण जेटली ने जम्मू में आयोजित नरेंद्र मोदी की ललकार रैली के बाद अपने ब्लॉग में लिखा था- “जम्मू और कश्मीर को भारत में पूरी तरह मिला लेना भारतीय जनसंघ और अब बीजेपी की विचारधारा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।” अनुच्छेद-370 भाजपा सरकार की एक बड़ी विजय है, इसीलिए इसे श्यामा प्रसाद मुखर्जी को समर्पित किया जा रहा है।

नेहरू की कविताएँ शायद तब लोगों का दिल जीतने के लिए काफी थीं, जब घाटी में भारतीय सेना पर पत्थरबाजी करने के लिए किराए पर लोग नहीं बुलाए जाते थे। आज कश्मीर पर जनमत का विचार उठाने वाले पकिस्तान द्वारा दिए गए घावों का जिक्र नहीं करना चाहते हैं। कश्मीर की समस्या के मूल में जाए बिना कश्मीर का समाधान एक कोरी कल्पना ही है।

आज चाहे बुद्धिजीवी किसी भी पक्ष की वकालत कर रहे हों लेकिन यह तो स्पष्ट है कि वो कम से कम मानवता की वकालत नहीं कर रहे हैं। मोदी सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 पर लिया गया फैसला इस सरकार के विराट स्वरुप और उसकी इच्छाशक्ति का प्रतीक है। यह निर्णय ऐतिहासिक है।

हम कह सकते हैं कि इस सरकार ने नेहरू की एक महान भूल को ठीक करने का काम किया है। इसलिए खुसरो की कविताओं से पहले कल्हण की राजतरंगिणी को याद करना जरूरी है, जिसमें कश्मीर को ‘कश्यपमेरू’ बताया गया है।

कल्हण की राजतरंगिणी में कश्मीर का वृहद इतिहास है। इसमें कश्मीर के इतिहास को अति प्राचीनकाल से दर्शाया गया है। कश्यपमेरू या कश्यपमीर; कहा जाता है कि महर्षि कश्यप श्रीनगर से तीन मील दूर हरि-पर्वत पर रहते थे। जहाँ आजकल कश्मीर की घाटी है, वहाँ अति प्राचीन प्रागैतिहासिक काल में एक बहुत बड़ी झील थी, जिसके पानी को निकाल कर महर्षि कश्यप ने इस स्थान को मनुष्यों के बसने योग्य बनाया था। यही कश्मीर आठवीं सदी के सम्राट मुक्तापीड ललितादित्य की भूमि है, यह विवरण भी राजतरंगिणी में ही मिलता है।

हमारा इतिहास हर तरह से सम्पन्न है, और इसे ठीक करने की दलीलों के लिए हमें ना ही फ़ारसी कविता की जरूरत है और ना ही किसी अंतरराष्ट्रीय सुलह संस्था की। इसलिए नेहरू-शेख़ की मित्रता के क़सीदों को शोक गीत की तरह ही देखा जाना चाहिए न कि नेहरू की गौरवगाथा के तौर पर।

भारत के खिलाफ इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस जाने वाले थे शाह फैसल: सूत्र

सिविल सर्विसेज छोड़कर नेता बने शाह फैसल को हाल ही में दिल्ली एयरपोर्ट से हिरासत में लेकर कश्मीर में नजरबंद किया गया था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अगर 14 अगस्त को शाह फैसल दिल्ली में नहीं रोके गए होते तो वह इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ) में भारत के खिलाफ मामला दर्ज करा चुके होते। वह घाटी में अनुच्छेद-370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी करने के केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ याचिका दायर करने की तैयारी में थे।

फिलहाल, जम्मू कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट के नेता शाह फैसल को शेर-ए-कश्मीर इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर में नजरबंद रखा गया है। वहाँ पीडीपी, पीपुल्स कॉन्फ्रेंस, जेकेपीएम और नेशनल कॉन्फ्रेंस के कई नेता और कार्यकर्ता भी रखे गए हैं।

तुर्की से हेग जाने वाले थे

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, शाह फैसल गत बुधवार तुर्की के लिए रवाना हो रहे थे, जहाँ से वो हेग (नीदरलैंड) ICJ जाने की योजना बना रहे थे। हालाँकि, संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के मुताबिक कोई भी आम आदमी निजी हैसियत से ICJ में केस दायर नहीं कर सकता है।

370 पर फैसले के बाद से पकिस्तान और विरोधी संगठन लगातार सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घेरने की साजिश रच रहे हैं। शाह फैसल ने कश्मीर को लेकर विवादित बयान देते हुए कहा था कि हमारे सामने दो ही रास्ते हैं- कश्मीर कठपुतली बने या फिर अलगाववादी। उन्होंने कहा कि इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है। 370 पर केंद्र सरकार के फैसले के बाद शाह फैसल ने कहा था कि राजनीतिक अधिकारों को दोबारा पाने के लिए कश्मीर को लंबे, निरंतर और अहिंसक राजनीतिक आंदोलन की जरूरत है।

डरा-सहमा पाक अब दे रहा मोदी को नेहरू की दुहाई, कहा- ‘डोवाल डॉक्ट्रिन’ पर अमल कर रहा हिन्दुस्तान

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मुॅंह की खानी के बाद पाकिस्तान अब कश्मीर पर भारत को नेहरू की दुहाई दे रहा। पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने नरेंद्र मोदी पर नेहरू के भारत को दफन करने का आरोप लगाते हुए कहा है कि हिन्दुस्तान की नीति ‘डोवाल डॉक्ट्रिन’ के इर्द-गिर्द सिमट गई है।

जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 के प्रावधानों के निष्प्रभावी होने के बाद से गीदड़ भभकी पर उतरे पाकिस्तान को न केवल संयुक्त राष्ट्र से निराशा मिली है, बल्कि उसके रुख का किसी भी देश ने अब तक समर्थन नहीं किया है।

कुरैशी ने कहा, “नरेंद्र मोदी ने नेहरू के भारत को दफन कर दिया है।” आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद पाकिस्तान की ओर से बनाई गई हाई लेवल कमेटी की बैठक के बाद वे पत्रकारों से बात कर रहे थे।

कश्मीर पर इस कमेटी की यह पहली बैठक थी। कमेटी का गठन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने छह अगस्त को किया था। इसके एक दिन पहले ही जम्मू-कश्मीर से 370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी करने का बिल मोदी सरकार ने पेश किया था।

प्रेस कॉन्फ्रेन्स में DG ISPR मेजर जनरल आसिफ़ गफ़ूर भी मौजूद थे। दरअसल, जम्मू-कश्मीर के हालिया घटनाक्रम और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मुँह की खाने के बाद पाकिस्तान में एक हाई लेवल की मीटिंग आयोजित की गई थी। इस मीटिंग में क़ुरैशी ने कई मुद्दों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि दुनिया का ध्यान कश्मीर से भटकाने के लिए भारत किसी मिसएडवेंचर गतिविधि को अंजाम दे सकता है। 

कुरैशी ने कहा कि पाकिस्तानी सेना और पूरा देश भारत का मुकाबला करने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि अगर भारत की तरफ से कोई भी मिसएडवेंचर होता है तो माकूल जवाब दिया जाएगा।

11 मरीजों की आँखों की रोशनी गई, मध्य प्रदेश के इंदौर में अस्पताल की बड़ी लापरवाही

मध्य प्रदेश के इंदौर में एक अस्पताल की बड़ी लापरवाही सामने आई है। एमोजी लाइन स्थित नेत्र चिकित्सालय में मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराने आए मरीजों को अपनी आँखों की रोशनी से ही हाथ धोना पड़ गया। ऑपरेशन के दौरान 11 लोगों के आँखों की रोशनी चली गई। अस्पताल के डॉक्टर पर ऑपरेशन में लापरवाही करने के आरोप लगे हैं।

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी प्रवीण जड़िया ने शनिवार (अगस्त 17, 2019) को बताया कि 8 अगस्त को राष्ट्रीय अंधत्व निवारण कार्यक्रम के तहत इंदौर आई हॉस्पिटल में 13 मरीजों के मोतियाबिंद का ऑपरेशन किया गया। इनमें से दो मरीजों को ठीक होने के बाद निजी अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। लेकिन शेष 11 मरीजों ने आँखों की रोशनी बाधित होने की शिकायत की है।

इस बीच राज्य प्रशासन ने इस मामले में 72 घंटे के भीतर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया है और साथ ही अस्पताल का लाइसेंस निलंबित करने पर विचार किया जा रहा है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इस मामले पर संज्ञान लेते हुए कहा कि 9 साल पहले इसी अस्पताल में मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद करीब 20 लोगों की आँखों की रोशनी चली गई थी। इस घटना के बाद भी कैसे हॉस्पिटल को वापस अनुमति प्रदान की गई, इस संबंध में जाँच कर प्रबंधन व दोषियों पर कड़ी कार्यवाही हो। साथ ही मुख्यमंत्री ने पीड़ितों को 50-50 हजार रुपए की मदद देने का ऐलान भी किया है।

राज्य के स्वास्थ्य मंत्री तुलसी सिलावट ने इस घटना पर दुख जताते हुए स्वीकार किया कि आई हॉस्पिटल में ऑपरेशन के बाद 11 मरीजों की आँखों की रोशनी चली गई है। इन मरीजों की आँखों की रोशनी वापस लाने के लिए चेन्नई से विशेषज्ञ डॉक्टरों को बुलाया जा रहा है। स्वास्थ्य मंत्री के निर्देश पर पूरे मामले की जाँच इंदौर कमिश्नर की अगुवाई में सात सदस्यीय कमिटी करेगी, जिसमें इंदौर कलेक्टर समेत स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी शामिल हैं। स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि अस्पताल का लाइसेंस निरस्त करने के साथ ही पीड़ित परिवार को 20-20 हजार रुपए की सहायता प्रदान की जाएगी।

Video Viral: एम्बुलेंस को रास्ता दिखाने के लिए गहरे पानी में उतर गया 12 साल का वेंकटेश

देश के कई राज्य बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हैं। कर्नाटक भी इन राज्यों में है। बचाव दल के अलावा स्थानीय लोग भी मुसीबत में फँसे लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए खुद जोखिम उठा रहे हैं। ऐसी ही एक घटना में एम्बुलेंस को रास्ता दिखाने के लिए 12 साल का वेंकटेश गहरे पानी में उतर गया। सोशल मीडिया पर उसकी बहादुरी का वीडियो वायरल हो गया है।

वेंकटेश की बहादुरी पर एक नज़र:

वीडियो में आप देख सकते हैं कि बाढ़ के पानी से घिरे एक पुल से गुजरने का रास्ता एम्बुलेंस को नहीं मिलता तो वेंकटेश गहरे पानी में उतर जाता है। अपनी जान की परवाह किए बिना वेंकटेश पानी में कूद जाता है और आगे-आगे चलकर एम्बुलेंस को रास्ता दिखाता है।

रायचूर के पुलिस अधीक्षक सीबी वेदमूर्ति ने न्यूज़ एजेंसी IANS को बताया कि जैसा कि वेंकटेश 500 मीटर सड़क पुल से परिचित था, उसने एम्बुलेंस के आगे चलकर ड्राइवर का मार्गदर्शन किया। उसने यह काम बिना देरी के और बिना अपनी जान की परवाह किए बिना किया।

पुलिस अधीक्षक वेदमूर्ति ने कहा,

“मैंने वेंकटेश की अध्यापिका वीना और उनके पिता देवप्पा से कहा है कि मैं डिग्री कॉलेज तक उनकी शिक्षा शुल्क का भुगतान करूँगा क्योंकि अभी वो कक्षा 6 में पढ़ रहा है।”

वेंकटेश के जज़्बे को अधिकारियों ने सराहा और 73वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर 15 अगस्त को रायचूर के ज़िला उपायुक्त बी शरत ने उसे बहादुरी के लिए सम्मानित किया।

सोशल मीडिया पर यूज़र्स ने भी वेंकटेश की बहादुरी की सराहना की। एक ट्विटर यूज़र ने लिखा, “इस लड़के ने वास्तव में बहादुरी का काम किया है।”


8 बच्चों का अब्बा अरशद 75 बरस में करना चाहता था निकाह, रोका तो पंखे से लटककर जान दे दी

आठ बच्चों का पिता अरशद 75 साल की उम्र में दूसरी शादी करना चाहता था। परिजनों ने रोका तो उसने आत्महत्या कर ली। घटना उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के थाना सीबीगंज क्षेत्र का है। बताया जाता है कि शादी को लेकर बुजुर्ग अरशद का परिजनों से विवाद हुआ था। इसके बाद गुस्से में उसने कमरे में पंखे से लटककर जान दे दी।

जानकारी के मुताबिक, काशीराम कॉलोनी के पास सनौआ में रहने वाले अरशद की पहली पत्नी की मौत हो चुकी है। उसके 5 बेटे और 3 बेटियाँ हैं। सभी शादीशुदा हैं और उनके भी बच्चे हैं। अरशद पिछले कुछ दिनों से दूसरी शादी करने की जिद पर अड़ा था। बच्चों को जब यह बात पता चली, तो लोक-लाज की दुहाई देकर उन्होंने पिता को समझाना चाहा। लेकिन, अरशद नहीं माना।

शादी को लेकर गुरुवार (अगस्त 15, 2019) को भी परिवार में झगड़ा हुआ। गुस्से में आकर अरशद ने शुक्रवार (अगस्त 16, 2019) देर रात पंखे से लटककर खुदकशी कर ली। शुक्रवार सुबह परिजन जब जागे तो उन्हें घटना का पता चला। 

पुलिस ने बताया कि दूसरी शादी करने से मना करने की वजह से अरशद ने आत्महत्या कर ली। उन्होंने बताया कि उनके साथ तीन बेटे रहते थे, जबकि दो बेटे अन्य जगह रहते हैं और तीनों बेटियों की शादी हो चुकी है।

रोम पहुँची केरल में रेपिस्ट पादरी से मोर्चा लेने वाली नन की लड़ाई, आवाज उठाने पर चर्च से कर दिया था बेदखल

केरल की सिस्टर लूसी कलपूरा ने रोम के कैथोलिक चर्च में अपील कर अपने खिलाफ हुए अनुशासनात्मक कार्रवाई को गलत बताया है। रेप के आरोपी बिशप फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ कोच्चि में हुए प्रदर्शनों में शामिल होने के कारण सिस्टर लूसी को चर्च की गतिविधियों से दूर कर कुराविलंगद कॉन्वेंट स्कूल छोड़ने के कहा गया था।

इस साल जनवरी की शुरूआत में ख़बर आई थी कि बिशप फ्रैंको मुलक्कल पर आरोप लगाने वाली पीड़िता नन का समर्थन करने वाली पाँच ननों में से चार को कुराविलंगद कॉन्वेंट स्कूल छोड़ने के कहा गया है।

ग़ौरतलब है जब सिस्टर लूसी कलपुरा ने छह ननों के साथ मुलक्कल का विरोध शुरू किया तो कैथोलिक क्रिश्चन सोसायटी फ्रासिस्कन क्लेरिस्ट कॉन्ग्रिगेशन (FCC) ने नियमों का हवाला देकर उनकी आवाज दबाने की कोशिश की।

क्रिश्चन कैथोलिक संस्था FCC के ख़िलाफ़ जाकर बिशप फ्रैंको मुलक्कल पर आरोप लगाए जाने के बाद से ही सभी छह ननों को FCC द्वारा उनके कथित अपराधों के लिए कई बार धमकियाँ तक दी गई हैं। इससे पहले, कैथोलिक चर्च ने सिस्टर कलापुरा को ‘चैनल चर्चा में भाग लेने’, ‘ग़ैर-ईसाई अख़बारों में लेख लिखने’ और कैथोलिक नेतृत्व के ख़िलाफ़ ‘ग़लत आरोप लगाने’ के लिए चेतावनी भेजी थी।

सिस्टर लूसी को वायनाड में मंथावैदी से 260 किलोमीटर दूर अलुवा में FCC मुख्यालय में अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया गया था। कलपुरा ने यह कहते हुए कि उसने कोई ग़लती नहीं की है, FCC के मुख्यालय में जाने से मना कर दिया। कलपुरा ने यह भी कहा था कि बिशप मुलक्कल के ख़िलाफ़ होने वाले विरोध-प्रदर्शन में वह फिर से भाग लेंगी।

बिशप फ्रैंको मुलक्कल पर मई 2014 में कुराविलांगड़ के एक गेस्ट हाउस में 44 वर्षीय नन के साथ बलात्कार करने और उसके बाद यौन शोषण का आरोप है। नन ने जून 2018 में एक शिक़ायत दर्ज की थी और यह भी दावा किया था कि उनकी शिक़ायतों के बावजूद, चर्च ने बिशप पर कोई कार्रवाई नहीं की। यही नहीं कैथोलिक संस्था भी बलात्कार के अभियुक्त बिशप के साथ खड़ी हो गई थी और बिशप को “निर्दोष आत्मा” के रूप में प्रस्तुत किया गया।

फ्रैंको बिशप को जाँच दल द्वारा उसके ख़िलाफ़ सबूत मिलने के बाद गिरफ़्तार कर लिया गया था, लेकिन बाद में उसे सशर्त ज़मानत पर रिहा कर दिया गया, जिससे उसे हर दो सप्ताह में एक बार जाँच टीम के सामने पेश होने और अपना पासपोर्ट सरेंडर करने के लिए कहा गया।

ओवैसी जैसे लोग शरीर पर विष्ठा लेप लेंगे अगर मोदी कह दे कि फ्लश करना चाहिए

प्रधानमंत्री मोदी ने जब-जब लाल किले से बोला है तो वो महज अपने सरकार की उपलब्धियाँ ही नहीं गिनाते बल्कि उनके भाषण में सारे मंत्रालयों के लिए अगले साल की प्राथमिकताएँ भी शामिल होती हैं। उनके भाषणों से सार्वजनिक अभियानों ने सफलता पाई हैं। इनमें ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’, ‘स्वच्छता अभियान’, ‘सिलिंडर सब्सिडी छोड़ो’ जैसे अभियान शामिल हैं। इस बार के भाषण में प्लास्टिक से लेकर जल संरक्षण और जनसंख्या नियंत्रण जैसे मुद्दे शामिल रहे।

हर भारतीय जानता है कि बड़ी जनसंख्या और कम संसाधन हमारे देश की हर समस्या की जड़ है। यह एक बिगड़ा हुआ अनुपात है जो कि किसी भी क्षेत्र में अच्छा नहीं है। आप स्कूल बनाइए, कम पड़ जाएँगे; कॉलेज बनाइए, कम पड़ जाएँगे; हॉस्पिटल बनाइए, कम पड़ जाएँगे; सब्सिडी देते रहिए, लोग पैदा होते रहेंगे; योजनाएँ बनाइए, पैसे कम पड़ जाएँगे; हर ढाँचा हमेशा ही सीमा से ज्यादा लोड उठाता रहेगा और समय से पहले टूट जाएगा…

आप चाहे शिक्षा की गुणवत्ता की बात कीजिए या स्वास्थ्य सेवाओं की, जड़ में जनसंख्या कहीं न कहीं आती ही है। क्योंकि बच्चे उतने ही होने चाहिए जितने पाले जा सकें, न कि उन्हें हमने ऊपर वाले की नेमत समझ कर पैदा तो किया ही, पलने भी छोड़ दिया जबकि इसमें ऊपर वाले का कोई हाथ नहीं। बच्चों को हम पैदा करते हैं, और हमारी जिम्मेदारी है कि हम उन्हें एक बेहतर जीवन स्तर उपलब्ध कराएँ।

बेहतर जीवन स्तर से मतलब है: पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य। एक परिवार में जितने सदस्य बढ़ेंगे, आमदनी विभाजित होगी। चाहे सरकार से ही सब्सिडी क्यों न मिले, संख्या बढ़ते ही वो बँटेगा ही। एक बच्चे को पढ़ाना, उसे पालना, शिक्षित करना, और भविष्य के लिए तैयार करना, तीन बच्चों को पढ़ाने, पालने, शिक्षित करने और नौकरी योग्य बनाने की अपेक्षा आसान है। और, ये बात मैं भारतीय समाज की विषमताओं को देखते हुए कर रहा हूँ जहाँ, वैश्विक संदर्भ में देखा जाए तो हम एक लोअर मिडिल इनकम देश हैं।

गरीबी और परिभाषा के हिसाब की गरीबी

भारत में 95% लोग या तो गरीब हैं, या बहुत गरीब। ये परिभाषा मैं किसी कमिटी के ‘बीस रुपए प्रतिदिन’ पर नहीं बता रहा। वो टेक्निकल बात है कि आदमी जिंदा है। वो गरीबी नहीं, सर्वायवल है, जिंदा रहना है। उसे सिर्फ भोजन मिल रहा है। गरीबी यह भी है कि आपके सर पर छत नहीं, शिक्षा नहीं, स्वास्थ्य सुविधाएँ नहीं, आपकी आशाओं की पूर्ति के साधन नहीं हैं।

आपका जीवन एक संघर्ष है, आप परिवार चला रहे हैं, आपके बच्चे में काबिलियत है लेकिन पैसों के कारण वो पढ़ नहीं पा रहा, आपका जीवन बच सकता है लेकिन आप दवाई नहीं खरीद पा रहे। इस दायरे में आपको यह जानना चाहिए कि भारत की एक प्रतिशत जनता के पास देश का 73% पैसा है। मतलब, बाकी के 27% में 99% जनसंख्या का काम चलता है। सिर्फ 9 करोड़ ऐसे हैं जिनकी आमदनी ₹2.5 लाख से ज़्यादा है। इसमें से दो करोड़ लोग टैक्स के दायरे में नहीं आते।

कहने का तात्पर्य यह है कि हम एक गरीब देश हैं और हर टैक्स अदा करने वाले पर चार लोग और आश्रित होंगे। आमदनी सीमित हो, और बच्चे ज्यादा, तो उसके जीवन स्तर पर बिलकुल असर पड़ेगा। ऊपर के पाँच प्रतिशत लोग दस बच्चे भी पाल लेंगे, लेकिन नीचे के लोगों के पास एक बच्चे को भी ठीक से पालने का सामर्थ्य नहीं है। अगर आप उन्हें इस दुनिया में ला रहे हैं तो ये आपकी जिम्मेदारी है कि ऊपर वाले पर फेंकने की बजाय उन्हें एक बेहतर जीवन दें।

जब प्रधानमंत्री ने इस पर बोला तो चिदंबरम जैसे घोषित विरोधियों ने भी इसका स्वागत किया। कोई भी विवेकशील व्यक्ति इसका स्वागत ही करेगा। हर वो व्यक्ति जो हमारी और आपकी तरह निम्न मध्यम वर्ग से ताल्लुक रखता है, जिसने अपने माँ-बाप को लगातार मेहनत करते देखा है, खुद कम खा कर, कर्ज लेकर बच्चों को पढ़ाया है, पड़ोस के लोगों को बच्चों को न पढ़ा पाने का दर्द महसूस करते देखा है, वो जानता है कि जनसंख्या कितनी बड़ी समस्या है।

हर साल लाखों बच्चे बीटेक करके निकलते हैं, एमबीए पढ़ते हैं, पत्रकारिता करते हैं, यूपीएससी के लिए बैठते हैं, और हर साल उनके चयनित होने का, नौकरी पाने की संभावना कम होती जाती है। हर साल एक नौकरी पर आवेदकों की संख्या बढ़ती जाती है। हर व्यक्ति को एक ही तरह की नौकरी नहीं दी जा सकती, लेकिन बीटेक की डिग्री ले कर सड़क बनाने में जुटना भी तो अच्छी बात नहीं है। सरकार चाह कर भी इस तरह के रोजगार के अवसर पैदा नहीं कर सकती।

ऐसे में भविष्य को ध्यान में रखते हुए, जनसंख्या पर नियंत्रण एक बेहतर कदम है। हम चीन की तरह नीति नहीं बना सकते क्योंकि हम एक लोकतंत्र हैं। लोगों तक ज्यादा बच्चों के होने से आने वाली समस्याओं पर जागरूकता ला कर ही इस पर काबू किया जा सकता है।

ओवैसी की दिक्कत और मुस्लिमों की हालत

अगर गरीबी रेखा की ही बात करें तो मुस्लिम लोगों में 25.4% लोग तेंदुल्कर कमिटी की गरीबी रेखा से नीचे हैं। मुस्लिम घरों की आय देश की औसत आय से सात प्रतिशत नीचे है। शिक्षा की बात करें तो 14% जनसंख्या वाले मुस्लिमों में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे बच्चों में उनका प्रतिशत 4.4 है। सच्चर कमिटी की एक रिपोर्ट के अनुसार, सेकेंडरी स्कूल जाने वाले मुस्लिम बच्चों में से आधे बीच में पढ़ाई छोड़ देते हैं। यही रिपोर्ट हमें यह भी बताती है कि 25 स्नातक (अंडर ग्रेजुएट) विद्यार्थियों में से सिर्फ एक, और 50 परास्नातकों (पोस्ट ग्रेजुएट) में सिर्फ एक विद्यार्थी इस्लाम मजहब का होता है। 2011 के आँकड़ों के हिसाब से मात्र 2.75% मुस्लिम बच्चे ग्रेजुएट हैं। मुस्लिम लड़कियों का हाल और भी बुरा है।

एक जगह यह भी पढ़ा कि मुस्लिमों को आरक्षण और ‘फेयर रिप्रेंजेंटेशन’, यानी उचित प्रतिनिधित्व दे कर इस विषमता को पाटा जा सकता है। पढ़ाई में फेयर रिप्रेंजेंटेशन कैसे दिया जाए? जबकि इस्लामी स्कूल हैं, कॉलेज भी हैं। ये सुविधा एससी और एसटी समुदायों को हासिल नहीं। वो इसलिए नहीं है क्योंकि ऐसे कॉलेज और स्कूल का मतलब है कि आप उन्हें अलग करने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए उन्हें बाकी स्कूल-कॉलेजों में ही पढ़ने का विकल्प दिया जाता है।

लोग यह नहीं सोचते कि अगर हर परिवार में कम बच्चे होंगे तो परवरिश में बेहतरी आएगी, बच्चे को स्कूल में पढ़ाना सहज हो सकेगा। चाहे वो परिवार हिन्दू हो, या मुस्लिम, कम बच्चे का सीधा मतलब है, उसका हिस्सा बढ़ना। उसे स्कूल छोड़ना नहीं पड़ेगा। उसे बचपन से ही बाल मजदूरी नहीं करनी पड़ेगी। उसे परिवार में बचपन से ही आमदनी का स्रोत बनने को मजबूर नहीं होना पड़ेगा। उसके जीवन का स्तर सुधरने की संभावना है।

लेकिन ओवैसी जैसे लोग इन बातों को कॉन्सपिरेसी बता कर, चिल्लाते हुए कि ये विदेशियों की साजिश है, अपने मजहब के लोगों के उस प्रचलित विश्वास को बल देते हैं कि सरकार पोलियो के ड्रॉप में नपुसंकता की दवाई मिला रही है। उन्हें हर बात एक साजिश लगती है कि सरकार मुस्लिमों की जनसंख्या पर नियंत्रण करते हुए, उन्हें गायब कर देना चाहती है।

जबकि, ये एक तथ्य है कि मुस्लिमों की वृद्धि दर हिन्दुओं से हमेशा ज़्यादा रही है। किसी सरकार ने उन्हें गायब करने की बात नहीं की। ये बात हर व्यक्ति को समझनी चाहिए कि बच्चे पैदा करना और उन्हें अपने हाल पर छोड़ देना उस बच्चे पर अत्याचार है। आप लगातार बच्चे भी पैदा करेंगे, आपके पास साधन भी नहीं हैं, और फिर आप सरकार को ही अपनी दुर्गति के लिए कोसेंगे, यह तो मूर्खता है। ये मूर्खता इसलिए है कि सरकार आपको चावल और गेहूँ तो दे सकती है, आरक्षण से शायद स्कूल में भी दाखिला दे दे, लेकिन उसके बाद हर जगह संभावनाओं की कमी होती जाती है।

ओवैसी के ट्वीट और रीट्वीट

राजनीति आपसे बहुत कुछ करवाती है। राजनीति में अपना स्वार्थ अगर सर्वोपरि हो तो फिर आप स्टेज से मुस्लिमों की बेहतरी की बात करते हैं, लेकिन उसके भीतर ‘किसी भी हद तक गिरते जाने’ का ध्येय वाक्य रहता है। ओवैसी जैसों की राजनीति अपने ही समुदाय को डरा कर रखने पर है। कश्मीर के मुस्लिमों की स्थिति से भले ही उत्तर प्रदेश के मुस्लिमों का कोई वास्ता नहीं, लेकिन ओवैसी उन्हें यह बता देगा कि आज कश्मीर के मुस्लिमों का ‘हक’ छीना गया, कल तुम्हारा छीन लेगा। भले ही उत्तर प्रदेश के मुस्लिमों का वो ‘हक’ क्या है, ये न तो ओवैसी बताता है, न वो भीड़ वापस पूछती है।

इसीलिए, मुस्लिमों को हिन्दुओं का दुश्मन बना कर रखना महबूबा, ममता, अब्दुल्ला, अखिलेश, लालू, ओवैसी जैसे स्वघोषित मजहबी नेताओं का स्वार्थ साधता है। ये हमेशा भीम-मीम से लेकर तमाम अदरक-लहसुन करते रहते हैं। और सबके केन्द्र में यही बात होती है कि देखो हिन्दू तुमको काटने की तैयारी में है, तुम्हारे बकरीद का बकरा छीन लेगा, तुम्हें अब बच्चे पैदा नहीं करने देगा, तुम्हारे बच्चों को नपुंसक बना देगा।

जबकि वास्तवकिता यही है कि पाँच साल हो गए, कोई हिन्दू तलवार लेकर सड़कों पर नहीं दौड़ा, लेकिन मुस्लिम एक झूठे डर के कारण हिंसक होते गए। उन्होंने काँवड़ियों पर पत्थरबाजी की, उनकी गाड़ियों पर हमले किए, रामनवमी के जुलूस पर पत्थर फेंके, दुर्गा के पंडालों पर ईंट फेंके। ये सब तब से ज़्यादा हुआ है जबसे इन नेताओं ने मोदी और भाजपा के नाम पर मुस्लिमों को उकसाना शुरू किया। आप सर्च कर लीजिए कि काँवड़ियों पर पत्थरबाजी किस साल से शुरू हुई, और 2019 में इतनी ज़्यादा क्यों हो रही है। आप खोजिए जा कर कि हिन्दुओं के मंदिरों पर चढ़ाई करना और उन्हें तोड़ने की घटनाएँ अचानक से आम कैसे हो गई हैं।

जवाब है मजहब के नेताओं की स्वार्थसिद्धी की बलि चढ़ता मुस्लिम समुदाय। ओवैसी ने प्रधानमंत्री की इस बात को बेकार सोच का नतीजा कहा, और कहा कि ये दूसरों के जीवन में दखलंदाजी करने जैसा है। उसके बाद उसने कुछ ट्वीटों को रीट्वीट किया जिसमें अमेरिका भारत की जनसंख्या पर नियंत्रण की बात कर रहा था।

ओवैसी पढ़े-लिखे आदमी हैं, और मुस्लिम जनता उनकी आलोचना पर सीधे गाली दे कर ‘तूने ओवैसी साहब को ऐसा कहा कैसे’ से शुरू करते हुए बताते हैं कि लिखने वाला उनके चरणों की धूलि भी नहीं है। लेकिन वो बेचारे यह नहीं जानते कि ओवैसी को अपनी राजनीति दिखती है, मुस्लिमों के जीवन स्तर से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। वो ये बात बखूबी जानते हैं कि छोटे भाई को खुल्ला छोड़ कर, शेरवानी पहन कर वो जब तक मोदी के विरोध में दिखेंगे, मुस्लिम उन्हें बंगाल में भी वोट देंगे।

यही कारण है कि मोदी की सही बात भी इन्हें खराब लगती है। हर बेहतर कदम में मुस्लिमों के ख़िलाफ़ साजिश की बात ले आने वाले ओवैसी यह भूल रहे हैं कि 15% मुस्लिम आबादी, देश की दूसरी बड़ी बहुसंख्यक आबादी, इस देश की सच्चाई है। इसे यहाँ से कोई नहीं हटा सकता। जिन्हें हटना था, वो पाकिस्तान में हैं। बेहतर यही होगा कि वो अपने आप को मुस्लिम कम और भारतीय नागरिक ज़्यादा समझें, जिसे भारतीय संविधान ने बराबरी का अधिकार दिया हुआ है। यही उनकी बेहतरी का रास्ता है।

वरना, नेता आते-जाते रहेंगे और अपनी रैलियों की भीड़ के लिए बच्चे पैदा करने को उकसाते रहेंगे। इसका हासिल कुछ नहीं होता। ओवैसी के लिए हर मुस्लिम महज एक वोट है, जिसके सहारे वो अपनी राजनीति चमकाना चाहता है। और इसे चमकाने के लिए वो किसी भी हद तक गिरता रहेगा। लालू इसका बेहतर उदाहरण है जिसने अपने वोटबैंक के लिए पूरी जनसंख्या को अशिक्षित और गरीब रखा, ताकि वो न तो दुनिया को जान सकें, न ही उसकी धूर्तता को समझ सकें। यही कारण है कि बिहार आज की तारीख में सबसे ज़्यादा गरीबी, अशिक्षा और बीमारी झेल रहा है।

भारत के मुस्लिम जितनी जल्दी अपने नेताओं को समझ लेंगे, उतना ही बेहतर होगा क्योंकि अपने समर्थन के लिए ओवैसी को एक दुश्मन, यानी मोदी चाहिए, जो कि बाय डिफॉल्ट पूरे इस्लाम का दुश्मन हो जाता है, और फिर वो दुश्मन जो भी बात कहे, उसका ‘मुँहतोड़ जवाब दिया ओवैसी साहब ने’ के चक्कर में ओवैसी एक दिन मानव विष्ठा का फेसपैक लगा कर, आँखों पर खीरा-टमाटर रखे मुस्लिमों को विश्वास दिलाता रहेगा कि मोदी ने जो कहा है कि मल त्यागने के बाद पानी डालना चाहिए, वो गलत है क्योंकि उसे चेहरे पर लगाने से चमक आती है। पसंद आपकी, आप क्या करना चाहते हैं।

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस-जेडीएस सरकार की कब्र खोदने वाले नागराज ने खरीदी 11 करोड़ की लग्जरी कार

कर्नाटक विधानसभा स्पीकर द्वारा अयोग्य ठहराए गए विधायक एमटीबी नागराज फिर से सुर्खियों में हैं। उन्होंने रोल्स रॉयस फैंटम VIII नामक 11 करोड़ रुपए की कार खरीदी है। नागराज उन 14 बागी विधायकों में शामिल थे जिनके पार्टी से इस्तीफे के कारण राज्य में कॉन्ग्रेस-जेडीएस की सरकार को जाना पड़ा था। जानकारी के मुताबिक, उन्होंने अभी अपनी कार पर टैक्स अदा नहीं किया है। टैक्स चुकाने के बाद इस लग्जरी कार की कीमत और भी बढ़ जाएगी।

गौरतलब है कि, कर्नाटक में कॉन्ग्रेस के 17 विधायकों ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद कुमारस्वामी की सरकार अल्पमत में आ गई थी और कुमारस्वामी को सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा था। कुमारस्वामी के इस्तीफे के बाद बीजेपी नेता येदियुरप्पा ने प्रदेश में अपनी सरकार बनाई। 

तब बीजेपी पर यह इल्जाम लगा था कि 17 बागी विधायकों से पैसे के दम पर इस्तीफा दिलाया गया है। इन्हीं विधायकों में एमटीवी नागराज भी शामिल थे। इन 17 में से 14 विधायक को स्पीकर ने सदस्यता से अयोग्य घोषित कर दिया था।

वैसे, नागराज की गिनती देश के सबसे अमीर विधायकों में होती रही है। इतनी महँगी कार खरीदने वाले भी वे कर्नाटक के पहले नेता नहीं हैं। खनन कारोबार के लिए चर्चित जनार्दन रेड्डी के पास भी ऐसी ही कार है। लेकिन कॉन्ग्रेस से बगावत और कुमारस्वामी सरकार को डूबोने के बाद नागराज का इतनी महँगी कार खरीदना चर्चा का विषय बन गया है।