15 अगस्त 1947 को हर भारतवासी आज़ादी के जश्न के रूप में मनाता है। 1765 की इलाहाबाद संधि से ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में जो शासन स्थापित हुआ था, उसकी समाप्ति 15 अगस्त 1947 को हुई थी। भारत के इस गौरवपूर्ण क्षण के गवाह न सिर्फ़ देशवासी बने बल्कि देश और दुनिया के लोग भी इसका गवाह बने।
ऐसे में वो क्षण भुलाए नहीं भूलता जब 15 अगस्त 1947 को एक तरफ लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा फहराया जा रहा था, तो दूसरी तरफ़ लंदन के इंडिया हाउस में लाल कुमार नृपेंद्र नाथ शाहदेव ने तिरंगा फहराया था। बता दें कि शाहदेव भारतीय स्काउटिंग टीम के कप्तान थे। उस समय इंडिया हाउस में कार्यक्रम आयोजित कर यूनियन जैक की जगह भारतीय तिरंगा फहराया गया था, और इसकी अध्यक्षता अनुग्रह नारायण सिंह ने की थी।
ख़बर के अनुसार, कुमार नृपेंद्र नाथ शाहदेव जुलाई 1947 में संयुक्त भारत की स्काउटिंग टीम लेकर फ्रांस के मॉयजोन में आयोजित छठी विश्व जंबूरी में भाग लेने गए थे। पूरी टीम कोलकाता से स्ट्रेथमोर जहाज़ से समुद्र के रास्ते फ्रांस गई थी। वहाँ विश्व जंबूरी में स्काउटिंग के सर्वश्रेष्ठ सम्मान बुशमैन थॉग्स से शाहदेव को सम्मानित किया गया था।
शाहदेव, ब्रिटिश भारत की स्काउटिंग टीम के अंतिम व स्वतंत्र भारत के पहले कप्तान थे। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बुलावे पर फ्रांस से लौटकर टीम दिल्ली पहुँची थी। वहाँ नेहरू ने स्काउटरों को स्वतंत्रता वाहकों की टोली की संज्ञा दी थी।
एनएन शाहदेव के पुत्र कुमार एएन शाहदेव के अनुसार, देश के बंटवारे का असर विश्व जंबूरी में भाग लेने फ्रांस गई संयुक्त भारत की टीम पर भी पड़ा था। देश में बंटवारे की स्थिति से टीम के सदस्य सदमे में थे। उनके बीच भारत-पाकिस्तान के नाम से टीम बाँटने पर विवाद हो गया।
इस विवाद की सुलह के लिए जो कमिटी बनाई गई उसमें कुमार एनएन शाहदेव को सदस्य बनाया गया। इसके बाद शांतिपूर्ण तरीके से संयुक्त भारत की टीम भारत और पाकिस्तान के नाम से बाँटी गई। फ्रांस जाने वाली संयुक्त भारत की टीम के आधे सदस्य भारत वापस नहीं आए। हुआ यह कि बंटवारे के बाद बनी पाकिस्तान की टीम के सदस्य फ्रांस से सीधे कराची चले गए।
हमारा देश आज आज़ादी की 73वीं सालगिरह मना रहा है। आज़ादी का यह जश्न मनाने वाला भारत अकेला देश नहीं है बल्कि पाँच और देश हैं जो आज ही के दिन आज़ाद हुए थे। आज वो भी आज़ादी के इस जश्न को धूमधाम से मना रहे हैं। वो पाँच देश हैं:
दक्षिण कोरिया
उत्तर कोरिया
कांगो
बहरीन
लिहटेंस्टाइन (Liechtenstein)
हम आपको बारी-बारी से इन देशों के बारे में बताते हैं कि आख़िर कैेसे और कब इन देशों ने आज़ादी प्राप्त की।
दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया
दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया को आज 74 साल पहले जापानी कॉलोनािजेशन से 15 अगस्त 1945 को आज़ादी मिली थी। दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया आज अपना 75वाँ स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं। इस दिन को दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया के लोग राष्ट्रीय अवकाश को तौर पर मनाते हैं। छुट्टी का दिन होने की वजह से यहाँ शादी की एक परंपरा चल पड़ी है।
कांगो
रिपब्लिक ऑफ़ कांगो मध्य अफ्रीकी देश है, जिसे 15 अगस्त 1960 को आज़ादी मिली थी। अफ्रीका के इस देश को फ्रांस की दासता से आज़ादी मिली थी। 1880 से फ्रांस का क़ब्ज़ा कांगो पर था, इसे फ्रेंच कॉन्गो के तौर पर जाना जाता था। इसके बाद 1903 में ये मिडिल कॉन्गो बना। इस हिसाब से कांगो देश आज अपना 60वाँ स्वतंत्रता दिवस मना रहा है।
बहरीन
15 अगस्त 1971 को ब्रिटेन के क़ब्ज़े वाले बहरीन को आज़ादी मिली थी। इस प्रकार बहरीन ने 15 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस घोषित कर दिया। लेकिन बहरीन की जनता ने ब्रिटिश सरकार द्वारा दिए गए स्वतंत्रता दिवस को मनाने से इनकार कर दिया था और देश के पूर्व बादशाह सलमान अल खलीफ़ा के राजतिलक के दिन यानी 16 दिसंबर को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का ऐलान किया गया। दरअसल, ब्रिटेन के मध्य एक करार हुआ था जिसके बाद बहरीन ने आज़ाद देश के तौर पर ब्रिटेन के साथ अपने संबंध रखे। इसलिए बहरीन अपना स्वतंत्रता दिवस 16 दिसंबर को मनाता है।
लिहटेंस्टाइन
यूरोपीय देश लिहटेंस्टाइन को 15 अगस्त 1866 में जर्मनी से आज़ादी मिली थी। यह देश 1940 से 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाता है। इस देश के बारे में बता दें कि क्षेत्रफल के आधार पर यह दुनिया का सबसे छोटे देशों में से एक है। मात्र 160 वर्ग किलोमीटर वाले इस देश की कुल आबादी 35,000 है। लिहटेंस्टाइन दुनिया का जर्मन भाषी इकलौता अल्पाइन राज्य है, जो पूरी तरह से आल्पस पर स्थित है। यह देश एकमात्र ऐसा जर्मनभाषी राज्य है, जिसकी सीमा जर्मनी से नहीं मिलती।
अवध के नवाबी खानदान से आने वाले भाजपा नेता बुक्कल नवाब ने आज रक्षाबंधन (अगस्त 15, 2019) के मौके पर गायों को राखी बाँधने का ऐलान किया है। लखनऊ में इसके लिए उन्होंने एक कार्यक्रम का भी आयोजन किया है, जिसमें कई लोग शामिल होंगे। उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष भी उन्होंने ऐसा ही एक कार्यक्रम आयोजित किया था। भाजपा विधान पार्षद बुक्कल ने कहा कि उन्होंने रक्षाबंधन के अवसर पर ‘गौ पूजा’ का आयोजन किया है।
बुक्कल नवाब ने कहा कि इस कार्यक्रम से मनुष्य और गायों के बीच के बंधन का महत्त्व उजागर होगा और गोहत्या के ख़िलाफ़ जागरुकता भी पैदा होगी। बुक्कल नवाब पहले समाजवादी पार्टी में थे और उन्हें सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव का करीबी माना जाता था। जुलाई 2017 में उन्होंने सपा छोड़ कर भाजपा का दामन थाम लिया था। इससे पहले भी वह विवादित बयानों के कारण सुर्ख़ियों में रहे हैं।
MLC बुकक्ल नवाब ने इस कार्यक्रम के लिए मीडिया को भी निमंत्रित किया है
उन्होंने हनुमान को मुस्लिम बताया था। उन्होंने कहा था कि कई नवाब हनुमान के भक्त थे और उनके पूर्वजों ने लखनऊ से लेकर अयोध्या तक हनुमानजी के मंदिरों का निर्माण कराया है। बुक्कल के अनुसार, लोकप्रिय हनुमान मंदिर हनुमानगढ़ी का जीर्णोद्धार भी उनके ही पूर्वजों ने कराया है। दिसम्बर 2018 में बुक्कल ने कहा था कि इस्लाम में कई ऐसे नबी आए हैं जिनके नाम नहीं पता और हनुमान उनमें से एक हो सकते हैं। उन्होंने दावा किया था कि जैसे सुलेमान, रहमान और रेहान मुस्लिम नाम हैं, उसी तरह हनुमान भी मुस्लिम नाम है क्योंकि यह इन नामों से मिलता-जुलता है।
2004 में मुलायम सरकार ने बुक्कल नवाब को लेबर डिपार्टमेंट का अध्यक्ष बना कर राज्यमंत्री पद का दर्जा दिया था। बुक्कल नवाब के उस बयान से सपा में खलबली मच गई थी जिसमें उन्होंने राम मंदिर निर्माण के लिए वित्तीय मदद देने की बात कही थी। उनका 2015 में दिया गया वह बयान पार्टी को नागवार गुजरा था।
जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 पर फैसले को लेकर सोशल मीडिया से लेकर समाचार चैनल्स में होने वाली डिबेट तक में बहस जारी है। इस बीच CPM के एक नेता ने रिटायर्ड मेजर जनरल के साथ लाइव बहस के दौरान अपनी सारी हदें लाँघ दी।
आज तक समाचार चैनल पर बहस के दौरान एक रिटायर्ड मेजर जनरल के साथ बहस में CPM के एक नेता ने रिटायर्ड मेजर जनरल से कहा कि क्या हिंदुस्तान तुम्हारे बाप का है? बहस का मुद्दा अनुच्छेद 370 को लेकर हो रहे विरोध था, जिसमें TV एंकर एक-एक कर सवाल कर रहीं थीं।
इस चर्चा में रिटायर्ड मेजर जनरल ने कहा- “हमारी राजनीतिक पार्टियाँ इस मुद्दे पर अपनी रोटियाँ ना सेकें। हमारा संविधान डायनमिक है यह सभी को पता है। पहले कुछ चीजों की जरूरत थी लेकिन अब इन चीजों की जरूरत नहीं है। वैश्विक और देश के दोनों के माहौल के हिसाब से यह काफी सही है। अब यहाँ से आगे बढ़ो। 1965 में किसी ने दिवाली नहीं मनाई। देश में जैसी परिस्थिति होती है, देश को उसी हिसाब से काम करना चाहिए।”
रिटायर्ड सेनाधिकारी ने कहा कि देश में जब तक सेना है, वो अपना पेट काटकर दे देगी लेकिन कश्मीर को भूखा नहीं रहने देगी। वहाँ कोई बीमारी से नहीं मर सकता, सेना मदद करती है। हम वहाँ कर्फ्यू के लिए भी हैं और अपने लोगों के लिए भी हैं। रिटायर्ड मेजर जनरल ने आगे कहा कि धारा 144 है, वो धीरे-धीरे खुलेगी और यह पहली बार नहीं लगी है। देश में हालात कहीं भी ऐसे होंगे तो सुरक्षाबल तैनात होंगे।
इस पर CPM के नेता सुनीत चोपड़ा भड़क गए और उन्होंने कहा कि पहली बार देशद्रोही लोगों ने ऐसा काम किया है। इसके बाद सुनीत चोपड़ा ने कहा- “आप बकवास बंद कीजिए और आर्टिकल 370 को फिर से लागू कीजिए। क्या हिंदुस्तान तुम्हारे बाप का है?”
विवादित अयोध्या भूमि पर दावा करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के सामने ऐतिहासिक तथ्यों और पुरातात्विक सबूतों को रखते हुए, बुधवार को पेश वकील ने कहा कि बाबरी मस्जिद शरिया कानून के तहत ‘अमान्य’ थी क्योंकि इसे मंदिर के खंडहरों पर बनाया गया था। इस भूमि का संबंध हिंदुओं से था।
तेरहवीं शताब्दी में भारत की यात्रा करने वाले विभिन्न पश्चिमी और चीनी तीर्थयात्रियों का हवाला देते हुए, वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन ने मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और जस्टिस एसएपी चड्डे, डी वाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एसए नज़ीर की पीठ को बताया कि हिंदुओं की आस्था है कि अयोध्या भगवान राम का जन्म स्थान है जिसका इतिहास सदियों पुराना है। उन्होंने विभिन्न पश्चिमी और चीनी तीर्थयात्रियों के कई दस्तावेजी सबूतों का हवाला दिया, जो तेरहवीं सदी में भारत और अयोध्या आए थे, जहाँ उन्होंने उनकी पूजा की थी। उन्होंने बताया कि विवादित भूमि हमेशा से ही हिंदुओं के लिए काफ़ी मायने रखती है, उसे हिंदुओं ने भगवान राम की जन्मभूमि के रूप में हमेशा पूजा है।
वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन ने 1608-1611 के दौरान भारत आए अंग्रेज व्यापारी विलियम फिंच के यात्रा वृतांत का उल्लेख किया, जिसमें दर्ज किया गया था कि अयोध्या में एक किला या महल था जहाँ, हिन्दुओं का विश्वास है कि भगवान राम का जन्म हुआ था।
सीएस वैद्यनाथन ने बेंच को बताया कि विवादित भूमि पर एक मंदिर था और इसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्वीकार किया था। मस्जिद का निर्माण मंदिर के खंडहरों पर किया गया था और यह मंदिर के खंडहर पर है तो यह एक वैध मस्जिद नहीं हो सकती। यह शरिया क़ानून के विपरीत है, जिसमें कहा गया है कि मस्जिद को बेकार ज़मीन पर नहीं बनाया जा सकता है।
उन्होंने आगे कहा कि विदेशी यात्रियों में एक विरोधाभास था क्योंकि उनमें से कुछ ने कहा था कि यह मुगल सम्राट बाबर था जिसने मंदिर को ध्वस्त कर दिया था जबकि कुछ का कहना है कि इसे दूसरे मुगल शासक औरंगजेब के कार्यकाल के दौरान नष्ट किया गया। लेकिन उनके बीच अयोध्या में भगवान राम के जन्मस्थान होने को लेकर कोई मतभेद नहीं था।
पीठ ने तब सवाल उठाया कि मस्जिद का नाम बाबरी मस्जिद कैसे रखा गया और क्या इस बात का कोई सबूत है कि बाबर ने मंदिर को ध्वस्त किया था या उसे ध्वस्त करने का कोई आदेश दिया था। वैद्यनाथन ने उत्तर दिया कि मस्जिद का नाम केवल 19वीं शताब्दी में बाबरी मस्जिद रखा गया था और मंदिर के विध्वंस में बाबर की भागीदारी साबित करने के लिए कोई प्रामाणिक दस्तावेजी सबूत नहीं है। उन्होंने कहा कि ‘बाबरनामा’ में भी बाबर की अयोध्या यात्रा पर कुछ नहीं लिखा।
लेकिन मुस्लिम पक्षकारों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कहा कि बाबर अयोध्या आया था। लेकिन उसने वहाँ क्या किया इस संदर्भ में कोई जानकारी इसलिए नहीं है कि क्योंकि उस पुस्तक के कुछ पृष्ठ ग़ायब हैं।
जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 के प्रभाव को समाप्त करने के बाद विपक्षी दलों से बयानबाजी लगातार जारी है। इसी विरोध के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक खुलासा किया है।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) अध्यक्ष ममता बनर्जी ने खुलासा किया है कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 के कुछ प्रावधान समाप्त किए जाने से पहले वहाँ के एक पूर्व मुख्यमंत्री ने उनसे मदद माँगी थी।
तृणमूल कॉन्ग्रेस प्रमुख ने कहा, “यह सब होने से एक दिन पहले, एक पूर्व मुख्यमंत्री ने मुझे फोन किया और कहा कि हम बहुत डरे हुए हैं, यदि हमारे सामने कोई दिक्कत आती है तो क्या आप हमारे साथ खड़ी होंगी? यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मैं उनके साथ नहीं खड़ी हो सकी। भले ही शारीरिक रूप से नहीं लेकिन मानसिक रूप से हम उनके साथ हैं।”
M. Banerjee: A day before everything happened,one of the former CMs called me saying,’we are very scared,will you stand with us if we face any trouble?’ It’s unfortunate that I couldn’t stand in solidarity with them. Though not physically, our mind is always with them.#Article370pic.twitter.com/R0vO7WUK5s
बुधवार (14 अगस्त, 2019) को एक कार्यक्रम में ममता ने यह दावा किया। उन्होंने कहा- “मैं संविधान के अनुच्छेद 370 के बारे में अधिक बात नहीं करना चाहती हूँ, पर जिस तरह से उसे निरस्त किया गया, वह तरीका गलत था। क्या मुझे जम्मू और कश्मीर के तीन पूर्व सीएम के बारे में जानने का अधिकार भी नहीं है? वे लोगों द्वारा चुन कर सीएम बने थे।”
West Bengal CM Mamata Banerjee: I don’t want to discuss much about #Article370 but the process of scrapping was wrong. Don’t I have the right to know the whereabouts of three former Chief Ministers of J&K? They were elected by the people. pic.twitter.com/6L8sM3wOqT
प्रोग्राम के दौरान ममता बनर्जी ने कहा, “8-10 दिनों से उनके (तीनों सीएम) के बारे में देश को कोई खबर नहीं है। अगर आज मैं यह सवाल पूछती हूँ, तब मुझे केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) या फिर प्रवर्तन निदेशालय (ED) गिरफ्तार कर लेगा? मैं अभी भी मानती हूँ कि इस मसले पर सभी पार्टियाँ शांतिपूर्ण ढंग से बातचीत कर हल निकाल सकती हैं।”
West Bengal CM Mamata Banerjee: Since the last 8-10 days, no one in the country knows where they (CMs) are? If I ask this question today, will I be arrested by CBI or ED? I still believe peaceful negotiation could have been done by discussing the issue with all the parties. https://t.co/sLN0sNp3vk
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से देश को सम्बोधित किया। उन्होंने अपना सम्बोधन देश के कई हिस्सों में बाढ़ से जूझ रही जनता को यह एहसास दिलाते हुए किया कि संकट की इस घड़ी में केंद्र सरकार की तरफ से हरसंभव सहायता दी जाएगी। पीएम मोदी ने लोगों को याद दिलाया कि दूसरी बार उनकी सरकार का गठन हुए अभी बस 10 हफ्ते ही हुए हैं लेकिन उनकी सरकार ने इतने कम अंतराल में ही कई बड़े निर्णय लिए हैं।
जम्मू कश्मीर का पुनर्गठन और तीन तलाक के खात्मे को प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार के दूसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धियाँ बताईं। प्रधानमंत्री द्वारा कही गई मुख्य बातें:
अगर 2014 से 2019 आवश्यकताओं को पूरा करने का दौर था तो 2019 के बाद का कालखंड देशवासियों की आकांक्षाओं की पूर्ति का कालखंड है, उनके सपनों को पूरा करने का कालखंड है।‘सबका साथ, सबका विकास’ का मंत्र लेकर हम चले थे लेकिन 5 साल में ही देशवासियों ने ‘सबका विश्वास’ के रंग से पूरे माहौल को रंग दिया।
समस्याओं का जब समाधान होता है तो स्वावलंबन का भाव पैदा होता है, समाधान से स्वालंबन की ओर गति बढ़ती है। जब स्वावलंबन होता है तो अपने आप स्वाभिमान उजागर होता है और स्वाभिमान का सामर्थ्य बहुत होता है।
जम्मू, कश्मीर और लद्दाख में जो पुरानी व्यवस्था थी उसने वंशवाद और भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया। महिलाओं, बच्चों व दलितों के साथ भेदभाव हो रहा था। अनुच्छेद 370 पर हमारे निर्णय का विरोध करने वालों से मेरा सवाल यह है कि अगर ये इतना ही महत्वपूर्ण था तो इसे स्थायी क्यों नहीं बनाया गया?
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख सुख-समृद्धि और शांति हेतु भारत के लिए प्रेरक बन सकता है और भारत की विकास यात्रा में बहुत बड़ा प्रेरक बन सकता है। धारा 370 को हटाने के लिए हर कोई प्रखर रूप से समर्थन देता रहा लेकिन राजनीति के गलियारों में चुनाव के तराजू से तौलने वाले कुछ लोग 370 के पक्ष में कुछ कहते रहे हैं।
देश को नई ऊँचाइयों को पार करना है, विश्व में अपना स्थान बनाना है और हमें अपने घर में ही गरीबी से मुक्ति पर बल देना है और ये किसी पर उपकार नहीं है। भारत के उज्ज्वल भविष्य के लिए हमें गरीबी से मुक्त होना ही है और पिछले 5 वर्षों में गरीबी कम करने की दिशा में, गरीब को गरीबी से बाहर लाने की दिशा में बहुत सफल प्रयास हुए हैं।
स्वतंत्रता दिवस पर पीएम मोदी का सम्बोधन
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जन-संरक्षण पर बल देते हुए इसे जनांदोलन बनाने की बात कही। जनसंख्या विस्फोट की गंभीर समस्या पर बोलते हुए पीएम ने कहा कि हमें इसके बारे में सोचने की ज़रूरत है। प्रधानमंत्री ने जनता की सरकार पर निर्भरता कम करने की बात करते हुए पूछा कि क्या हम ऐसा माहौल तैयार नहीं कर सकते जिसमें हरेक व्यक्ति को अपने सपने को पूरा करने के लिए उचित माहौल मिले? भ्रष्टाचार और कालाधन को उन्होंने आजादी के बाद की सबसे बड़ी समस्या करार दिया। पीएम ने अपने संबोधन में कहा:
आज देश में 21वीं सदी की आवश्यकता के मुताबिक आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण हो रहा है। देश के इंफ्रास्ट्रक्चर पर 100 लाख करोड़ रुपए का निवेश करने का फैसला किया गया है।
पहले सिर्फ़ रेलवे स्टेशन की बात होती थी, अब एअरपोर्ट की होती है। पहले मोबाइल फोन की बात की जाती थी, अब डेटा स्पीड की बात होती है। समय बदल रहा है और हमें इसे स्वीकार करना चाहिए।
आज देश में 21वीं सदी की आवश्यकता के मुताबिक आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण हो रहा है। देश के इंफ्रास्ट्रक्चर पर 100 लाख करोड़ रुपए का निवेश करने का फैसला किया गया है।
हमारी अर्थव्यवस्था के बुनियाद बहुत मजबूत हैं और ये मजबूती हमें आगे ले जाने का भरोसा दिलाती है।
2001 की जनगणना के अनुसार मैथिली बोलने वालों की संख्या करीब 1.21 करोड़ है, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि नेपाल के अलावा बिहार के 38 जिलों में से आधी की भाषा मैथिली है। झारखंड के भी करीब आधा दर्जन जिलों की यह प्रमुख भाषा है। 22 सांसद और बिहार विधानसभा के 126 सदस्य उन इलाकों से आते हैं जहां की भाषा मैथिली है। इन इलाकों की आबादी पांच करोड़ से ज्यादा है। यहां तक कि देश की राजधानी दिल्ली में भी रहने वाले करीब 30 लाख लोगों की भाषा मैथिली है।
लेकिन, अपनी लिपि और संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल होने के बावजूद मैथिली आज भी अपना हक पाने को जूझ रही है। इसकी वजहों की पड़ताल के लिए रचना कुमारी ने मैथिली साहित्यकार हरिश्चंद्र हरित से बातचीत की। हरिश्चंद्र हरित की छुच्छे अकटा (गीत संग्रह), नै लिखू इतिहास (कविता संग्रह), मैथिली गीता (संस्कृत से मैथिली रुपांतरण) और कालिन्दी चरण पाणिग्रही (अंग्रेजी से मैथिली भावानुवाद) नामक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। नागार्जुन के प्रिय रहे हरित से बातचीत के महत्वपूर्ण अंश;
मैथिली को 2003 में अष्टम अनुसूची में जगह मिल गई। बावजूद इसके उसे वह सम्मान नहीं मिली जिसकी वह हकदार है?
इसके पीछे और कुछ नहीं, हमारी अपनी अकर्मण्यता है। आज भी हम मैथिली को हिंदी या अंग्रेजी की तुलना में कमतर मानते हैं। घर से निकलते ही हम मैथिली से हिंदी या अंग्रेजी में स्विच करने में देर नहीं लगाते। बंगालियों या तमिल लोगों की तरह हम अपनी भाषा से प्रेम नहीं करते। हमें महानगरों में, मॉल्स में, कॉरपोरेट दफ्तरों में, मैथिली बोलने में शर्म आती है। यह हीन भावना हम मैथिली बोलने वालों ने खुद ही विकसित की है।
अष्टम अनुसूची में स्थान मिलने, अच्छा साहित्य लिखे जाने, अच्छी फिल्म बनने और गीत लिखे जाने के बावजूद हमने कभी मैथिली का सेहरा उस गर्व से नहीं पहना, जैसे भोजपुरी वालों ने पहना है। यही वजह है कि आधिकारिक मान्यता के बाद भी लोगों में इस बात को लेकर जागरूकता नहीं है। जरूरत है हम सभी पूर्वाग्रह से बाहर निकलकर बिना किसी झिझक के मैथिली बोलें। लोगों को अपनी भाषा के समृद्ध साहित्य और इतिहास से परिचित कराएँ।
मैथिली को अष्टम अनुसूची में जगह मिले तकरीबन 16 साल हो गए। इस सफर को आप किस तरह देखते हैं?
मुझे याद है कि इस संबंध में 2003 में दरभंगा से आकर एक प्रतिनिधिमंडल ने दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी से मुलाकात की थी। इस दौरान उन्हें 5 किताबें भेंट की गई थी। इनमें दो शब्दकोश थे- एक मैथिली में अनुवादित रामायण, एक महाभारत और एक मेरे द्वारा संस्कृत से मैथिली में रूपांतरित मैथिली गीता। कुछ दिनों बाद, जब मैथिली को भाषा का दर्जा देने का विधेयक संसद से पास हुआ, तो हम लोगों को लगा जैसे हमने एक बहुत बड़ी लड़ाई जीत ली।
एक तरफ जहाँ हमें इस बात की खुशी थी कि हमारी दशकों की मेहनत रंग लाई, वहीं दूसरी तरफ हमारे ज़ेहन में एक सवाल भी था कि अब आगे क्या? उसके बाद से हमारा अगला लक्ष्य था मैथिली को प्राथमिक शिक्षा में शामिल कराना। हमारा ध्येय था कि मैथिली स्कूलों में भाषा के तौर पर पढ़ाई जाए और बच्चे बड़े होकर अपनी भाषा में रोजगार की संभावनाएँ तलाश सकें। हमने सोचा था कि मैथिली भाषा बहुत बड़े स्तर पर विस्तृत हो जाएगी। लेकिन हकीकत यह है कि 16 साल बाद भी हम कुछ खास हासिल नहीं कर पाएँ हैं।
प्राथमिक स्तर की शिक्षा में मैथिली को शामिल करने में किन वजहों से देरी हो रही है?
इसके पीछे एक ही वजह है। वह है मैथिली के प्रति अभिभावकों की उपेक्षा का भाव। हम घर में तो मैथिली बोलते हैं, मगर स्कूलों में मैथिली में पढ़ाई हो इसके लिए आवाज नहीं उठाते। आज लगभग हर राज्य में क्षेत्रीय भाषा पढ़ाई होती है। पश्चिम बंगाल में बांग्ला, तमिलनाडु में तमिल, कर्नाटक में कन्नड़ भाषा के रूप में पढ़ाई जाती है। यदि वहाँ की सरकारें सिलेबस से क्षेत्रीय भाषा को अलग करने के बारे में सोचेगी भी तो लोग सड़क पर उतर जाएँगे। आंदोलन करेंगे। वो आवाज उठाएँगे, क्योंकि यह उनके लिए अस्मिता, पहचान का सवाल है। लेकिन, मैथिली बोलने वाले लोगों के साथ ऐसा नहीं है। मैथिल बातों के वीर हैं, जमीनी स्तर पर काम करना उन्हें पहाड़ तोड़ने जैसा लगता है।
भाषा को अष्टम अनुसूची मे जगह दिलाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। क्या आपको लगता है कि जिन उद्देश्यों के लिए ये सब किया गया वो पूरा हो पाया है?
साहित्य अकादमी द्वारा मैथिली को भाषा की सूची में शामिल करने के बाद भी अष्टम अनुसूची में स्थान मिलने में काफी वक्त लग गया। इसके लिए काफी आंदोलन करना पड़ा। 2003 में मैथिली को अष्टम अनुसूची में जगह मिली। हम कह सकते हैं कि जो लक्ष्य था वह पूरा हुआ। लेकिन, इसका उद्देश्य था मैथिली भाषा के प्रति सरकार और लोगों को जागरूक करना। स्कूली शिक्षा में मैथिली को शामिल करवाना। अपनी भाषा में रोजगार के अवसर पैदा करना। इनमें हम पीछे रह गए। अब तक कोई उद्देश्य पूरा नहीं हो पाया है।
अपनी लिपि फिर भी उपेक्षा का भाव
अमूमन यह भी दिखता है कि सार्वजनिक मंचों पर मैथिली को लेकर बड़े-बड़े दावे करने वाले अपने परिवार और बच्चों के साथ हिंदी या अंग्रेजी में बात करते हैं। इसका क्या कारण है?
मिथिलावासियों ने खुद से एक धारणा बना ली है कि वो दूसरों से कम हैं। खुद को कमतर मानने की इसी पूर्वधारणा की वजह से वो मंचों पर पर तो मैथिली प्रेमी होने का ढोल पीट लेते हैं, लेकिन अपने घर में मैथिली नहीं बोलते।
हर भाषा अपने आप में खूबसूरत और समृद्ध होती है। उसका अपना हुस्न होता है, अपनी विशेषताएँ होती हैं। इसीलिए जरूरत है कि हम इस बात को समझे कि जिस तरह मैथिली भाषा संस्कृत, हिंदी, इंग्लिश या किसी अन्य भाषा का विकल्प नहीं है, ठीक उसी तरह कोई भी अन्य भाषा मैथिली का विकल्प नहीं हो सकती। हमें यह जानने और स्वीकार करने की जरूरत है कि मैथिली भाषा अपने आप में समृद्ध और विशेष है। जरूरत है तो बस इसे प्यार करने की। इसे अपनाने की और अपने प्रतिदिन के व्यवहार में लाने की।
मैथिली भाषा से शिक्षा हासिल करने वाले छात्रों के लिए रोजगार की कितनी संभावनाएँ हैं?
मैथिली की फिलहाल स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती। लेकिन कॉलेज में आप मैथिली को एक विषय के तौर पर चुन सकते हैं। रिसर्च कर सकते हैं, नेट का एग्जाम निकालकर प्रोफेसर बन सकते हैं। हर साल सैकड़ो लोग मैथिली भाषा से केंद्रीय लोकसेवा आयोग की परीक्षा पास कर शासनिक सेवा का हिस्सा बनते हैं। कई सारे रिसर्च ऑर्गेनाइजेशंस हैं, जो अलग-अलग भाषाओं पर शोध करते हैं। यहॉं भी संभावनाएँ हैं। लेकिन सारे अवसर सरकारी क्षेत्र में ही उपलब्ध हैं। प्राइवेट सेक्टर में मैथिली को लेकर मौके नहीं हैं। इसलिए मुझे लगता है कि स्कूलों में पहली कक्षा से ही मैथिली भाषा पढ़ाने की जरूरत है।
आज से 10 साल बाद आप मैथिली को कहाँ देखते हैं?
जैसा कि हम देख रहे हैं कि अष्टम अनुसूची में शामिल होने के 16 साल बाद भी मैथिली भाषा कोई खास तरक्की नहीं कर पाई है। ऐसे में मुझे नहीं लगता कि 10 साल कोई बड़ी अवधि होगी मैथिलों के मन में अपनी भाषा के प्रति प्रेम जगाने का। हो सकता है कि 10 साल बाद भी कमोबेश यही स्थिति रहे। फिर भी इस पर फिलहाल कुछ कहना जल्दबाजी होगी। यह पूर्णतया इस बात पर निर्भर करती है कि मैथिली बोलने वाले लोग सिर्फ संगठन बनाकर राजनीति करने के बजाए मातृभाषा को अपनाने और उसका प्रचार-प्रसार करने को कितनी प्राथमिकता देते हैं।
जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने कहा था कि अगर अनुच्छेद 370 से छेड़छाड़ की गई तो राज्य में तिरंगे को कंधा देने वाला भी कोई नहीं बचेगा। पूर्व मुख्यमंत्री की यह धमकी ऐसे समय में आई थी, जब लोग अंदेशा लगा रहे थे कि कश्मीर में कुछ बड़ा होने वाला है। और हुआ भी। अनुच्छेद 370 के उन सारे प्रावधानों को निरस्त कर दिया गया, जिनके कारण जम्मू-कश्मीर को विशेषाधिकार मिले हुए थे। राज्य का पुनर्गठन कर के अब्दुल्ला व मुफ़्ती परिवारों के एकछत्र राज्य का भी अंत कर दिया गया। अब जम्मू-कश्मीर की सत्ता में जम्मू, कश्मीर और लद्दाख- तीनों क्षेत्रों का संतुलित प्रतिनिधित्व होगा।
महबूबा मुफ़्ती के बयानों को तूल देकर कुछ मिलने वाला नहीं लेकिन आज स्वतंत्रता दिवस के दिन चहुँओर लहराते तिरंगे को देख कर अचानक से उनके इस बयान का जेहन में आना लाजिमी है, जिसमें उन्होंने कहा था कि राज्य को मिले विशेषाधिकार के साथ छेड़छाड़ की गई तो जम्मू-कश्मीर में तिरंगे को कोई कन्धा देने वाला भी नहीं मिलेगा। अब अनुच्छेद 370 के कई प्रावधान तो नहीं रहे लेकिन तिरंगा आज भी लहरा रहा है। जम्मू- कश्मीर विशेष राज्य नहीं रहा लेकिन तिरंगे के प्रति प्यार मौजूद है। हाँ, जिहाद को (चार) कंधे की ज़रूरत पड़ गई है।
जरा नीचे संलग्न की गई इस तस्वीर को ध्यान से देखिए। ये कुपवाड़ा की छात्राएँ हैं। इन्होने अपने स्कूल की ड्रेस पहन रखी है और स्वतंत्रता दिवस पर आयोजित कार्यक्रम के लिए रिहर्सल कर रही हैं। ये तस्वीर स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) से 2 दिन पहले की है। इस तस्वीर को देख कर हिमालय से निकलने वाली किशनगंगा नदी (नीलम नदी) भी ख़ुशी से मचल रही होगी और इन बच्चियों को आशीर्वाद दे रही होगी। कुपवाड़ा से गुजरती नीलम भारत की सीमाओं को पार करते हुए पाकिस्तान में पहुँचती है और झेलम में मिल जाती है। खैर, वह नदी है। उसके लिए आज भी भारत अखंड भारत ही है। आप तस्वीर देखिए:
Moving photograph of Kashmiri girls in Kupwara of North Kashmir today during the full dress rehearsal of the Independence Day function. The tricolor is flying high. Hope to see the official tricolor soon at Lalchowk and the Shankaracharya Hill as well. pic.twitter.com/eFuRocVmMh
तिरंगा झंडा ऊँचा लहरा रहा है। यह सुरक्षित है। देश के नौनिहालों को इसे कंधा देने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि उन्होंने अपने दिल इस पर न्योछावर कर दिया है। आज इन्हें रोकने के लिए महबूबा मौजूद नहीं है। अपनी हरकतों के कारण महबूबा मुफ़्ती आज नजरबन्द हैं। अपने ही देश की सत्ता को धमका कर रखने वाला अब्दुल्ला गिरोह भी नजरबन्द है। अलगावादियों को न तो दिल्ली के सत्ताधीश पूछ रहे हैं और न ही जम्मू-कश्मीर की जनता। शाह फैसल तो भागने की फ़िराक़ में थे लेकिन पुलिस ने उन्हें भी शिकंजे में ले लिया है। ऐसे में डर लाजिमी है। डर जिहादियों में है क्योंकि आज वो न तो कश्मीर में सुरक्षित हैं और न ही सीमा पार।
महबूबा मुफ़्ती के बयान में अगर तिरंगे को निकाल कर जिहादी कर दें तो यह आज की वास्तविकता में फिट बैठ जाता है। कंधे की ज़रूरत आतंकियों को पड़ रही है। पिछले 3 वर्षों में 700 से भी अधिक आतंकियों को एक नहीं बल्कि चार-चार कंधों की ज़रूरत पड़ी है। यह आँकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है और कुछ दिनों बाद वह स्थिति भी आएगी जब इन्हें कोई कन्धा भी नहीं मिलेगा। पत्थरबाजों को उकसाने वाले सैकड़ों अलगाववादी आज जेल में बंद हैं। डॉक्टर मनमोहन सिंह की सरकार को ब्लैकमेल कर अपने आप को सत्ताधीशों का फेवरिट बना कर रखने वाला यासीन मलिक आज तिहाड़ जेल में सजा काट रहा है।
हाँ, यासीन की बीवी ज़रूर इस्लामाबाद की सभाओं में कविताएँ पढ़ने में व्यस्त हैं। ये वही मोहतरमा हैं, जिन्होंने टेरर फंडिंग के मामले में एनआईए द्वारा अपने शौहर को गिरफ़्तार किए जाने के बाद अपनी 7 वर्षीय बेटी को लाकर प्रेस कॉन्फ्रेंस में बैठा दिया था। रोना-धोना काम नहीं आया, ब्लैकमेलिंग का जमाना बीत गया और अब दिल्ली दलालों को नहीं पूछती और आतंकवाद के ख़िलाफ़ जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम किया जा रहा है। अपने बच्चों को विदेश भेज कर कश्मीरी युवाओं को पत्थर थमाने वाले अलगाववादियों को आज कंधे की ज़रूरत है।
आज अलगाववादियों, आतंकियों और भारत विरोधी कश्मीरी नेताओं को कंधे की ज़रूरत है लेकिन कोई कन्धा देने को तैयार नहीं। ऐसा इसीलिए, क्योंकि इन्हें कन्धा देने की सोच रखने वाले लोगों को बखूबी पता है कि अगर उन्होंने ऐसा किया तो कल को उन्हें भी कन्धों की ज़रूरत पड़ सकती है। कन्धों के इस खेल में बाजुओं ने बाजी मारी है क्योंकि कश्मीर के बच्चे-बच्चियों ने अपने हाथों में तिरंगा थाम रखा है। हो सकता है कि इन विद्यार्थियों को देख कर गिरोह विशेष के कुछ सदस्य कहें कि अरे ये तो कश्मीरी नहीं हैं।
भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन मिले इन सरकारी महलों को खुद के अनुकूल बनाने पर ओमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती ने सीएम रहते हुये 50 करोड़ रु खर्च किये थे। फारूख अब्दुल्ला सरकारी घर मे नहीं रहते हैं क्योंकि उनके खुद के दो घर हैं। बदले में वो सरकार से किराया लेते हैं। pic.twitter.com/fLueJMJ48k
तो फिर कश्मीरी कौन होते हैं? क्या जो लड़कियाँ हिजाब में और जो महिलाएँ बुर्क़े में होंगी, उन्हें ही कश्मीरी माना जाएगा? क्या स्कूल ड्रेस में लड़कों से भी ज्यादा दमखम दिखाते हुए स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में अपना शानदार प्रदर्शन दिखने वाली छात्राएँ सिर्फ़ इसीलिए कश्मीरी नहीं मानी जाएँगी क्योंकि वे पत्थर नहीं फेक रहीं? क्या मॉडर्न कपड़े पहनने, स्वछन्द विचरण करने और फोटोशूट कराने का हक़ सिर्फ़ इर्तिजा इक़बाल और इर्तिका इक़बाल को ही है? इन दोनों का परिचय जानने के लिए आपको गूगल न करना पड़े, इसीलिए बताना ज़रूरी है कि ये दोनों ही महबूबा मुफ़्ती की बेटियाँ हैं।
2004 में इन्हीं महबूबा मुफ़्ती के पिता मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने ‘परमानेंट रेसिडेंस डिसक्वालिफ़िकेशन बिल’ पास कराया था, जिसके अनुसार जम्मू-कश्मीर से बाहर के व्यक्ति से शादी करने वाली कश्मीरी महिलाओं का अपने पिता की सम्पत्ति में सारे अधिकार छीन लिए गए थे। उस समय कश्मीरी महिलाओं ने बुलंद आवाज़ में पूछा था, “मुफ़्ती कौन होते हैं यह निर्णय लेने वाले कि हमें किस से शादी करनी है और किस से नहीं?” इस बिल का सबसे ज्यादा खामियाजा कश्मीरी पंडित लड़कियों को उठाना पड़ा था क्योंकि सारे कश्मीरी पंडितों को घाटी से भगा दिया गया था।
महबूबा मुफ़्ती आज भी वही शासन चलाना चाहती है, अब्दुल्ला परिवार आज भी दिल्ली को वैसे ही ब्लैकमेल करना चाहता है जैसे शेख अब्दुल्ला नेहरू को किया करते थे। वे भूल गए हैं कि जनता ऐसा नहीं चाहती क्योंकि जनता ने ऐसे नेताओं को भारी बहुमत से चुना है, जो तिरंगे का अपमान करने वाले और भारत विरोधी गतिविधियों में संलिप्त रहने वालों पर कहर बन कर टूटे हैं। अंत में हम एक बार फिर कहना चाहेंगे, “देखो महबूबा, आज अनुच्छेद 370 के प्रावधान तो नहीं रहे लेकिन तिरंगा सुरक्षित है, कश्मीरी बच्चों के हाथों में। लेकिन, तुम्हें कन्धा देने वाले को भी ये डर है कि उसे कन्धा कौन देगा?“
सुपरस्टार और तमिल राजनीति के नवागंतुक रजनीकांत ने मोदी सरकार की अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर से हटाने के लिए अपनाई गई रणनीति की तारीफ़ की है। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए इसे ‘मास्टर स्ट्रेटेजी’ करार दिया है।
Rajinikanth on #Article370: The way they planned the entire issue,it was a master strategy.First they imposed section 144 & ensured that people don’t create any trouble.Then they tabled the bill, first in Rajya Sabha where they don’t have majority& then got it passed in Lok Sabha pic.twitter.com/YV2eUtWeC9
अपने फैंस में ‘रजनी अन्ना’ के नाम से प्रख्यात रजनीकांत ने कहा कि मोदी सरकार ने जिस तरह से पूरे मसले पर तैयारी की, वह ‘मास्टर स्ट्रेटेजी’ है। पहले उन्होंने (सरकार ने) धारा 144 लगा दी, ताकि लोगों मुसीबत न खड़ी करें। फिर उन्होंने बिल पहले राज्य सभा में रखा, जहाँ उन्हें बहुमत भी प्राप्त नहीं है। और वहाँ से पास कराने के बाद उसे लोक सभा में पास कराया गया।
2016 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से पद्म-विभूषण प्राप्त करने वाले रजनीकांत शुरू में (1995 में) कॉन्ग्रेस-समर्थक हुआ करते थे। बाद में जब 1996 में कॉन्ग्रेस ने अन्नाद्रमुक का हाथ थम लिया तो वे द्रमुक समर्थक हो गए। 2017 के अंत में राजनीति में आगमन करने वाले रजनीकांत ने घोषणा कर रखी है कि तमिल नाडु के आगामी 2021 विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी सभी 234 विधानसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारेगी।