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फेक न्यूज़ की रानी: पुराने माल के सहारे सेना और कश्मीर को बदनाम कर रही सागरिका घोष

लिबरल गैंग की राजकुमारी सागरिका घोष ने कश्मीर में शांति-भंग करने का ज़िम्मा अपने कंधों पर ले लिया है। ट्विटर पर एक तीन साल पुरानी रिपोर्ट को शेयर कर सागरिका ने पाकिस्तान का कश्मीरियों के साथ क्रूरता का प्रोपेगंडा आगे बढ़ाया है। इसके ज़रिए ऐसा जताने की कोशिश की कि कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने के बाद से शांति नहीं विद्रोह और असंतोष है, और भारतीय सुरक्षा बल उसे क्रूरतापूर्वक कुचल रहे हैं।

पुरानी रिपोर्ट, कोई संदर्भ नहीं

न केवल सागरिका घोष द्वारा शेयर की गई रिपोर्ट पुरानी थी बल्कि संदर्भ का भी नितांत अभाव जबकि मूल रिपोर्ट, सागरिका की शेयरिंग में भी है। यह रिपोर्ट केवल दुराग्रह से लिथड़ी हुई एकतरफ़ा रिपोर्टिंग है। इसमें यह तो बताया गया है कि सेना और पुलिस वाले कश्मीरियों की भीड़ को तितर-बितर करने के लिए गुलेल से पत्थर, काँच की गोलियाँ और मिर्ची पाउडर इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन यह नहीं बताया जाता है कि भीड़ कोई शांतिपूर्ण गाँधी बाबा के चेलों की नहीं बल्कि हिंसक, पत्थरबाज जिहादियों की थी, और न ही यह बताया जाता है कि गुलेल के अलावा सुरक्षा बलों के पास दूसरा विकल्प पैलेट गन और जानलेवा असॉल्ट राइफलों का था।

इसके अलावा यह रिपोर्ट तीन साल पुरानी थी, और सागरिका घोष ने इसे शेयर करते हुए यह बात नहीं बताई। और-तो-और, गुलेल से भीड़-नियंत्रण के इस तरीके को (तुलनात्मक रूप से) civilized (सभ्य) बताने को ‘ ‘ में डालकर भी उन्होंने सुरक्षा बलों के दानवीकरण (demonization) की कोशिश की।

चोरी के बाद सीनाज़ोरी

सागरिका घोष की बेशर्मी यहीं नहीं रुकी। जब एक ट्विटर यूज़र ने उनके प्रोपेगंडा पर ऊँगली उठाई और रिपोर्ट के पुराने होने का ज़िक्र किया तो भी उन्होंने अपनी गलती नहीं सुधारी। उलटे, वे उसी ट्विटर यूज़र को यह कुतर्क देने लगीं कि यह तो 2009 से ही चल रहा है। अपने इस दावे का भी उन्होंने कोई प्रमाण नहीं दिया।

प्रियंका गाँधी के गुर्गों पर चुप्पी जायज है, क्योंकि पीड़ित पत्रकार ने सेनाध्यक्ष को जनरल डायर नहीं कहा था

पत्रकरिता बँट गई है। इतनी बँट गई है कि पत्रकारों के हितों की बात करने का दावा करने वाला संगठन एडिटर्स गिल्ड भी अपने पास एक ऐसी सूची रखता है जिसमें इस बात का विवरण होता है कि फलाँ पत्रकार को अगर मार भी डाला जाए तो चूँ तक नहीं करना है और फलाँ पत्रकार को छींक भी आए तो 2-4 बयान यूँ ही जारी कर देने हैं। यह हद दर्जे का दोहरा रवैया है। बंगाल में एक टीवी चैनल के पत्रकारों को मार-मार कर घायल कर दिया जाता है लेकिन मीडिया के तमाम बड़े महारथी आँख मूँद लेते हैं। कर्नाटक में सीएम के बेटे के बारे में लिखने पर संपादक पर ही कार्रवाई हो जाती है लेकिन कहीं से कोई आवाज़ नहीं आती।

सोनभद्र में प्रियंका गाँधी के गुर्गों द्वारा एबीपी पत्रकार के साथ की गई अभद्रता पर चुप्पी भी इसकी ही एक कड़ी है। पत्रकार नीतीश पांडेय ने तो बस एक सवाल पूछा था। मामूली सा सवाल। इसमें अनुच्छेद 370 पर कॉन्ग्रेस की आपत्ति के बारे में पूछा गया था। प्रियंका गाँधी ने जवाब नहीं दिया। इसमें कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि जिस तरह किसी पत्रकार को हक़ है किसी राजनेता से सवाल करने का, उसी तरह राजनेता को भी पूरा अधिकार है कि वह सवाल को दरकिनार कर दे। लेकिन, इसके कई तरीके होते हैं।

अलग-अलग राजनेताओं ने इसके लिए विभिन्न प्रकार की बानगी पेश की है। पुराने उदाहरण की बात करें तो दिवंगत कांशीराम ने झापड़ लगाया था। ताज़ा उदाहरण की बात करें तो मणिशंकर अय्यर ने पत्रकार के पाँव छू कर माफ़ी माँगी। हाल ही में बाढ़ पर बुलाए गए प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल ने अनुच्छेद 370 पर टिप्पणी करने से मना कर दिया। आइए सबसे पहले जानते हैं कि प्रियंका गाँधी वाले मामले में हुआ क्या? प्रियंका सोनभद्र के दौरे पर थीं। वहाँ आदिवासियों की ज़मीन को लेकर ख़ून-ख़राबा हुआ था। प्रियंका पीड़ित परिवारों से मिलने गई थीं। इसी बीच एबीपी के रिपोर्टर ने उनसे सवाल पूछा।

प्रियंका ने सवाल का जवाब देने से मना कर दिया और कहा कि वो यहाँ लोगों से मिलने आई हैं। असली खेल इसके बाद शुरू हुआ। वामपंथी से कॉन्ग्रेसी बने संदीप सिंह ने रिपोर्टर को धमकाते हुए कहा, “सुनो-सुनो, ठोक के यहीं बजा दूँगा। मारूँगा तो गिर जाओगे।” रिपोर्टर ने प्रियंका से हस्तक्षेप करने को कहा और बताया कि उनके गुर्गे किस तरह से व्यवहार कर रहे हैं? प्रियंका गाँधी ने आसपास होते हुए भी उसे अनसुना कर दिया। प्रियंका के सहयोगी संदीप ने कहा कि उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता और कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। क्या पूछा जा सकता है कि इस आत्मविश्वास की वजह क्या है?

इस दौरान कैमरे को भी ढँकने का प्रयास किया गया ताकि चीजें ठीक से रिकॉर्ड न हो पाएँ। कैमरे को धक्का भी दिया गया। रिपोर्टर पर भाजपा से रुपए लेकर सवाल पूछ्ने यानी बिकाऊ होने के आरोप लगाए गए। अब आते हैं इस घटना के बाद इसे लेकर उठे सवाल पर। जैसा कि स्पष्ट है, एडिटर्स गिल्ड का कोई बयान नहीं आया। भाजपा सरकार के कार्यकाल में मीडिया की स्वतंत्रता के खतरे में होने का रोना रोने वाले गिरोह विशेष के सदस्यों ने इस घटना की निंदा तक नहीं की। क्यों नहीं की? इसके पीछे बहुतेरे कारण हो सकते हैं, जिनमें से 2 प्रमुख है।

कारण नंबर एक- वह पत्रकार डिज़ाइनर गिरोह का सदस्य नहीं था। उसने कभी सेनाध्यक्ष की तुलना जलियाँवाला नरसंहार कराने वाले जनरल डायर से नहीं की थी। वही सेना जो कन्याकुमारी से कश्मीर तक और असम से लेकर केरल तक में हर एक आपदा में लोगों के लिए रक्षक बन कर आती है। उस पत्रकार ने किसी आतंकी के मारे जाने के बाद उसके परिवार की ‘हालत’ दिखा कर उसके प्रति सहानुभूति उपजाने की कोशिश नहीं की थी। उस पत्रकार ने कभी पाकिस्तानी एजेंडा नहीं चलाया था। उसके लिए आउटरेज कर के क्या फायदा मिलता? अगर उसने मोदी को सुबह-शाम गाली दी होती तो शायद उसके पक्ष में पत्रकारिता के सभी पुरोधा आवाज़ उठाते।

कारण, नंबर दो- प्रियंका गाँधी कॉन्ग्रेस के शीर्ष परिवार से आती हैं, उनकी जगह अगर कोई भाजपा वार्ड सदस्य के साले के फूफे की बहन का भतीजा होता तो न्यूयॉर्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट में भी इस पर एकाध लेख लिखा जा चुका होता कि कैसे भारत की ‘राइट विंग हिंदुत्व पार्टी’ ने मीडिया की स्वतंत्रता पर ग्रहण लगा दिया है और देश में पत्रकारों को खतरा है। यह खेल नैरेटिव का है। ‘द प्रिंट’ की पत्रकार को चिदंबरम बेइज्जत भी कर दें तो चलता है क्योंकि वह ‘अपने’ हैं। वह दो-चार झापड़ लगा भी दें तो चलेगा। ताज़ा मामले में शेखर गुप्ता ने घटना की निंदा तो की लेकिन प्रियंका गाँधी को ‘सो पोलाइट’ बता कर।

मीडिया की स्वतंत्रता का अर्थ मीडिया कारोबारियों को अच्छी तरह पता है। शेयर्स की धोखाधड़ी से लेकर इनकम टैक्स चोरी तक, किसी न्यूज़ चैनल के ख़िलाफ़ सरकारी एजेंसियाँ जाँच करें तो बवाल खड़ा हो जाता है क्योंकि यह मीडिया की स्वतंत्रता का हनन है। हजारों करोड़ के मालिक भी ख़ुद को पत्रकार बता कर इस लिबर्टी को एन्जॉय करना चाहते हैं। पूरी बिरादरी एक हो जाती है, जैसे उनके ख़िलाफ़ सारे संवैधानिक नियम-क़ानून बौने हैं। ऐसे डिज़ाइनर पत्रकार जो भी करें, उनकी कम्पनी जो भी करे और उनके रिश्तेदार जो भी करें- किसी भी संवैधानिक संस्था को उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का हक़ नहीं है, क्योंकि यह मीडिया की स्वतंत्रता का मामला है।

अव्वल तो यह कि राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी की ट्वीट्स में अक्सर पत्रकारों व मीडिया हितों से जुड़े मुद्दे उठते हैं। दोहरेपन की पराकाष्ठा इतनी ऊपर पहुँच चुकी है कि एक ट्वीट से उन्हें गिरोह विशेष की वाहवाही भी मिल जाती है और पत्रकारों की बेइज्जती व उनके साथ बदतमीजी करने का सर्टिफिकेट भी। और हाँ, एडिटर्स गिल्ड तो इतना निष्पक्ष है कि कश्मीर में सुरक्षा-व्यवस्था को लेकर की गई व्यवस्थाओं को भी मीडिया से जोड़ कर देखता है और कहता है कि पत्रकारों को सही से रिपोर्टिंग नहीं करने दिया जा रहा। जब यह ख़बर आती है कि वित्त मंत्रालय में अपॉइंटमेंट लेने के बाद ही पत्रकारों को मिलने दिया जाएगा तो एडिटर्स गिल्ड उसकी निंदा करने लगता है।

एक विशेषज्ञ ने कहा था कि अब मनमोहन सिंह वाला दौर बीत चुका है और पत्रकारों को विशेष विमान में बैठा कर पीएम व मंत्रियों के विदेश दौरे पर साथ नहीं ले जाया जा रहा है। उन्हें इसी बात की खुन्नस है। या फिर अब उन्हें मंत्रियों व अधिकारियों से मिलने के लिए अपॉइंटमेंट लेना होता है, इसीलिए वे पुराने दिनों को याद कर उसी हताशा में जी रहे हैं। इससे पता चलता है कि 2014 में सरकार ही नहीं बदली बल्कि बहुत कुछ बदल गया है।

भाजपा के पिछले सदस्यता अभियान में 10 करोड़ से भी अधिक लोगों ने पार्टी की सदस्यता ग्रहण की थी। लगभग इतनी ही बिहार की जनसंख्या है। इतनी बड़ी पार्टी से जुड़ा कोई अदना सा व्यक्ति भी कुछ कह दे तो प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ जाती है। आनी भी चाहिए। लेकिन प्रियंका गाँधी के गुर्गों द्वारा एक रिपोर्टर के साथ की गई बदतमीजी और दुर्व्यवहार पर गिरोह विशेष की चुप्पी खलती है। उम्मीद है अगली बार ऐसी को घटना आया-वाया भाजपा जुड़ी तो यह चुप्पी टूटेगी।

कश्मीरी पंडितों की व्यथा ‘The Kashmir Files’ 15 Aug 2020 को होगी रिलीज़ विवेक अग्निहोत्री ने की घोषणा

फ़िल्मकार विवेक अग्निहोत्री ने अगले स्वतंत्रता दिवस पर फ़िल्म रिलीज़ की घोषणा कर दी है। ‘The Kashmir Files’ नाम की इस फ़िल्म का विषय उनके ट्वीट के अनुसार 90 के दशक में जिहादियों द्वारा किया गया कश्मीरी पंडितों का सामूहिक नरसंहार होगा।

इसके अलावा उन्होंने आम जनता से इस विषय पर रिसर्च करने के लिए उनकी सहायता करने की भी अपील की है।

ताशकंद फाइल्स, बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम, और अर्बन नक्सल्स के बाद अब…

विवेक अग्निहोत्री इसके पहले विवादास्पद और बहुचर्चित द ताशकंद फाइल्स और ‘बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम’ फ़िल्में भी बना चुके हैं। शहरी नक्सलियों के गिरोह के काम करने के त्रिकोण और उनके दोगलेपन का भंडाफोड़ करने वाली ‘बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम’ को लेकर विवेक अग्निहोत्री लिबरल गैंग के साथ-साथ अपने बॉलीवुड के साथियों के ही निशाने पर आ गए थे। उन्हें ‘राईट विंग ट्रोल’, ‘असफल फ़िल्मकार’ वगैरह कहा गया। इसी साल रिलीज़ ‘द ताशकंद फाइल्स’ पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की संदेहास्पद मौत और उसकी जाँच न होने की परिस्थितियों के बारे में थी। कॉन्ग्रेस और लिबरल गैंग ने फिल्म से भाजपा को चुनावी लाभ होने की आशंका से पुरज़ोर विरोध किया था।

2018 की उनकी किताब ‘अर्बन नक्सल्स’ भी 2014 की फिल्म ‘बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम’ के ही विषय का विस्तार थी। इस किताब में ‘बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम’ के निर्माण की कहानी के अलावा शहरों और तथाकथित ‘संभ्रांत’ लोगों के बीच फैल रही नक्सली विचारधारा के फैलाव की भी बात की गई है।

बॉलीवुड, मीडिया ने इस बार किया स्वागत

इन्दु विवेक के पिछले प्रोजेक्ट्स के मुकाबले इस बार बॉलीवुड और मीडिया ने The Kashmir Files की घोषणा का कहीं अधिक उत्साहजनक रूप से स्वागत किया है। फिल्म के लिए विवेक को बधाई देने वालों में ‘फैशन’, ‘जेल’ और ‘इन्दु सरकार’ के फ़िल्मकार मधुर भंडारकर, स्वराज्य की पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा, फिल्म कारोबार समीक्षक तरण आदर्श, 2 फ़िल्मफ़ेयर जीतने वाली लेखिका-निर्देशक ज्योति कपूर दास और मशहूर गायिका मालिनी अवस्थी प्रमुख हैं।

कश्मीर में होगी रियल लोकेशन पर शूटिंग

फिल्म खबरों की वेबसाइट कोईमोई ने दावा किया है कि The Kashmir Files की शूटिंग कश्मीर में ही होगी। यह प्रधानमंत्री की उस अपील के मुताबिक होगा, जिसमें उन्होंने मनोरंजन उद्योग से कश्मीर में शूटिंग को बढ़ावा देने की गुज़ारिश की थी

‘इस्लामी मानसिकता छिपा मत देना’

ट्विटर पर लेखक संक्रांत सानु ने विवेक अग्निहोत्री से अपील की कि ‘बैलेंस’ बनाने के चक्कर में वह उस इस्लामी नफ़रत को न छिपाएँ, जो कश्मीरी पण्डितों के साथ हुई बर्बरता के पीछे थी। विवेक अग्निहोत्री ने ऐसा न करने का संक्रांत सानु को आश्वासन दिया।

पाकिस्तान से हमदर्दी पर बोले ओवैसी- यकीन है एक दिन मुझे कोई भी गोली मार देगा

विवादित बयानों के कारण अक्सर चर्चा में रहने वाले हैदराबाद के सांसद और AIMIM अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कहा है कि उन्हें यकीन है कि एक दिन कोई उन्हें गोली भी मार देगा। अपने बयानों से पाकिस्तानी प्रोपगेंडा को हवा देने संबंधी आरोपों के जवाब में उन्होंने यह बात कही। जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी किए जाने के बाद से ही ओवैसी और अन्य विपक्षी नेता ऐसे बयान दे रहे हैं जिनकी मदद से पाकिस्तान कश्मीर पर अफवाहों को धार दे रहा है।

ओवैसी ने कहा, “मुझे यकीन है कि एक दिन मुझे कोई गोली भी मार देगा। मुझे यकीन है कि गोडसे की जो औलाद है वो मुझे ऐसा कर सकते हैं। हमारे मुल्क में अभी भी गोडसे की औलाद हैं।”

ओवैसी ने नगा अलगाववादियों जिक्र करते हुए कहा ,ये सरकार नगा अलगाववादियों से बात कर रही है, जिन्होंने अभी तक सरेंडर नहीं किया है।” उन्होंने कहा, “जब एक बड़े नगा नेता का निधन हुआ, तो तिरंगे के साथ वहाँ उनका अपना झंडा था, सरकार के लोग वहाँ गए, क्या तब उन्हें 2 झंडे याद नहीं आई? आप किसे मूर्ख बनाने की कोशिश कर रहे हैं?”

ओवैसी ने 35-ए पर बात करते हुए कहा, “मैं एक सांसद हूँ, लेकिन क्या मैं अरुणाचल प्रदेश और लक्षद्वीप जा सकता हूँ? मुझे इसके लिए परमिट लेना होगा। क्या मैं असम के अनुसूचित क्षेत्रों में जमीन खरीद सकता हूँ, मैं नहीं कर सकता। मैं नगालैंड, मिजोरम, मणिपुर, असम और हिमाचल के लोगों से कह रहा हूँ कि उनके यहाँ भी यही होगा।”

इससे पहले नरेंद्र मोदी की बौद्धिक क्षमता पर सवाल खड़े करते हुए ओवैसी ने कहा था कि मोदी की राजनीतिक बौद्धिक क्षमता उतनी नहीं है, जितनी नेहरू और पटेल की थी।

केजरीवाल के विधायक ने जल संकट का वीडियो पोस्ट करने पर AAP समर्थक को भेजा 1 करोड़ का मानहानि नोटिस

आम आदमी पार्टी के विधायक और दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष दिनेश मोहनिया ने अपने विधान सभा क्षेत्र के एक व्यक्ति को 1 करोड़ रुपए की मानहानि का नोटिस भेजा है। जिस व्यक्ति को नोटिस भेजा गया है उसने अपने इलाके में पानी की किल्लत को लेकर सोशल मीडिया में एक वीडियो पोस्ट कर मोहनिया को भ्रष्टाचारी कहा था।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक संगम विहार निवासी प्रदीप मौर्या को दिनेश मोहनिया के वकील द्वारा 1 करोड़ रुपए का मानहानि नोटिस भेजा गया है। इसमें सोशल मीडिया में वीडियो पोस्ट कर मौर्या पर मोहनिया की छवि धूमिल करने का आरोप लगाया गया है।

प्रदीप मौर्या का दावा है कि उन्हें संगम विहार में पानी संकट की वास्तविक स्थिति बयान करने के कारण निशाना बनाया जा रहा है। प्रदीप बताते हैं, “मैं भी आप समर्थक था, लेकिन जब पिछले 4 सालों में हमारी परेशानी का समाधान नहीं हुआ तो मैंने समस्या को प्रकाश में लाने के लिए यूट्यूब पर वीडियो डाला। मैं यहाँ किराए पर रहता हूँ और मुश्किल से 9,000 रुपए कमाता हूँ। लेकिन मैं उनसे डरता नहीं हूँ। मैं कोर्ट में केस लड़ूँगा। उन्होंने मेरी वीडियो भी डिलीट कर दी है। हो सकता है प्रशासन की ताकत उनके साथ हो, लेकिन स्थानीय लोग मेरे साथ हैं।

वहीं, मोहनिया के वकील ने साफ़ किया है कि आप नेता को इस बात से दिक्कत है कि प्रदीप ने अपनी वीडियो में उनके ख़िलाफ़ झूठे आरोप लगाए। आप नेता के वकील अनिल तोमर कहते हैं कि मोहनिया को वीडियो में भ्रष्टाचारी कहा गया है। साथ ही उनपर आरोप लगाया गया है कि वे माफिया के नेक्सस में काम कर रहे हैं।

इस मामले इंडिया टुडे से बातचीत में दिनेश मोहनिया ने कहा कि मौर्या ने अपनी वीडियो के जरिए उनके ख़िलाफ़ गलत जानकारी फैलाने का प्रयास किया है। वह कहते हैं, “मैंने कभी किसी को इलाके की तस्वीर उतारने से मना नहीं किया। मैं हमेशा लोगों को अपने संसदीय क्षेत्र की जमीनी हकीकत दिखाने के लिए आमंत्रित करता हूँ। ये लोगों पर है कि वो निर्णय ले कि इलाके में काम हुआ है या नहीं।

गौरतलब है कि मोहनिया की इस मसले पर आप के एक अन्य विधायक प्रकाश जरवाल से ट्विटर पर झड़प भी हो चुकी है।

ऐसा लगता है कि विधानसभा चुनाव नजदीक देख आप विधायक सुर्ख़ियों में आने का नया-नया तरीका खोज रहे हैं। जनता की समस्या सुलझाने के बजाय 9000 की नौकरी करने वाले आम आदमी को 1 करोड़ की मानहानि नोटिस भेजना भी इसमें शामिल है।

देश छोड़कर जा रहे थे शाह फैसल, पुलिस ने लिया हिरासत में, कश्मीर में नजरबन्द

सिविल सर्विसेज़ छोड़कर नेता बने शाह फैसल भारत छोड़कर जा रहे थे, उन्हें नई दिल्ली एयरपोर्ट पर गिरफ्तार कर वापस कश्मीर भेज दिया गया है। शाह फैसल को कश्मीर में ही नजरबंद (House Arrest) किया गया है।

स्वराज्य की रिपोर्ट के अनुसार, शाह फैसल को नई दिल्ली एयरपोर्ट से भारत छोड़ने से रोका गया है। गौरतलब है कि शाह फैसल जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 से काफी नाखुश थे। और वो इसको लेकर लगातार बयान भी दे रहे थे।

इससे पहले रायटर्स के पत्रकार घोषाल ने दवा किया था, उन्होंने शाह फैसल से बात की। पत्रकार ने जम्मू-कश्मीर में ‘संचार व्यवस्था पूरी तरह ठप्प’ होने का दावा करते हुए लिखा है कि सैटेलाइट टीवी चालू थे और कई लोगों को सरकार के निर्णय की ख़बर मिल चुकी थी। घोषाल से बातचीत में शाह फैसल ने कहा कि सुरक्षा कम होते ही कश्मीर के भभक उठने की संभावना है, क्योंकि लोग ख़ुद को छला महसूस कर रहे हैं। घोषाल ने दावा किया है कि इसके बाद पत्थरबाजी शुरू हो गई।

शाह फैसल ने कश्मीर को लेकर बुधवार (अगस्त 13, 2019) को विवादित बयान देते हुए कहा था कि हमारे सामने दो ही रास्ते हैं- कश्मीर कठपुतली बने या फिर अलगाववादी। उन्होंने कहा कि इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है। 370 पर केंद्र सरकार के फैसले के बाद शाह फैसल ने कहा था कि राजनीतिक अधिकारों को दोबारा पाने के लिए कश्मीर को लंबे, निरंतर और अहिंसक राजनीतिक आंदोलन की जरूरत है।

ईद-उल-अजहा (बकरीद) के अवसर पर भी शाह फैसल ने केंद्र सरकार पर बयानबाजी करते हुए कहा कि कश्मीर में ईद नहीं है। पूरी दुनिया में कश्मीर के लोग अपनी जमीन के गलत तरीके से भारत में शामिल होने से रो रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमारे यहाँ तब तक ईद नहीं होगी जब तक 1947 से मिला विशेष राज्य का दर्जा हमें वापस नहीं किया जाएगा।

कॉन्ग्रेस और सपा नेता हड़प रहे आदिवासियों की जमीन: प्रियंका की सोनभद्र यात्रा पर बोलीं मायावती

सोनभद्र हत्याकांड मामले में बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष और यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने सपा और कॉन्ग्रेस पर मंगलवार (अगस्त 13, 2019) को आधिकारिक रूप से गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने प्रियंका गाँधी द्वारा सोनभद्र कांड के पीड़ितों से मिलने पर भी निशाना साधा। साथ ही प्रदेश की भाजपा सरकार से सख्त कदम उठाकर आदिवासियों की जमीन उन्हें वापस दिलाने की गुहार लगाई।

पूर्व मुख्यमंत्री ने सोनभद्र हत्याकांड पर लगातार ट्वीट करते हुए पहले आदिवासियों की बात रखी। उन्होंने इस मामले में अपने पहले ट्वीट में कहा, “सोनभद्र काण्ड के पीड़ित आदिवासियों के मुताबिक पहले कॉन्ग्रेस व फिर सपा के भू-माफियाओं ने इनकी जमीन हड़प ली, जिसका विरोध करने पर, इनके कई लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया।”

फिर बसपा सुप्रीमो मायावती ने प्रियंका गाँधी द्वारा सोनभद्र में पीड़ितों के परिवारों से मिलने को लेकर कहा, “अब इस घटना को लेकर सपा व कॉन्ग्रेस के नेताओं को अपने घड़ियाली आँसू बहाने की बजाय, वहाँ पीड़ित आदिवासियों को, उनकी जमीन वापिस दिलाने हेतु आगे आना चाहिए। तो यह सही होगा।”

इसके अलावा मायावती ने अपने ट्वीट थ्रेड के आखिर में प्रदेश की भाजपा सरकार से गुहार लगाई है कि वो इस मामले के संबंध में सपा और कॉन्ग्रेस नेताओं पर सख्त कदम उठाएँ। साथ ही आदिवासियों को उनकी हड़पी हुई जमीनें वापस करवाएँ। बसपा अध्यक्ष ने यह माँग पूरी पार्टी की ओर से कॉन्ग्रेस और सपा नेताओं के ख़िलाफ़ उठाई है।

हैप्पी बर्थडे बेटा: हर पुत्र अपने पिता से जलता है…औलाद नालायक हो तो उसे भूल जाना चाहिए

आज ही के दिन 1947 में पाकिस्तान आधिकारिक तौर पर भारत से अलग होकर अस्तित्व में आया था। इसलिए पाकिस्तान में स्वतंत्रता दिवस भारतीय स्वतंत्रता दिवस से 1 दिन पहले यानी 14 अगस्त को मनाया जाता है। जम्मू-कश्मीर पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से समर्थन न मिलने के कारण बौखलाया पाकिस्तान अगर ट्विटर ट्रेंड्स देख ले तो उसे और मिर्ची लग सकती है।

इसकी वजह है कि ट्विटर पर लोग ‘हैप्पी बर्थडे बेटा’ हैशटैग को ट्रेंड कर रहे हैं। इसके तहत पाकिस्तान को अनोखे अंदाज में आजादी की बधाई दी जा रही है। हम यहाँ आपके लिए कुछ चुनिंदा ट्वीट्स लेकर आए हैं, जिसे देख कर आप भी खुद को हँसने से नहीं रोक पाएँगे। एक ट्विटर यूजर ने लिखा कि आपने (पाकिस्तान) तो ब्लड बैंक को छोड़ के हर बैंक से लोन ले रखा है।

एक ट्विटर यूजर ने नेटफ्लिक्स की लोकप्रिय सीरीज ‘सेक्रेड गेम्स’ में पंकज त्रिपाठी के डयलॉग को पाकिस्तान के परिप्रेक्ष्य में पेश किया:

एक अन्य ट्विटर यूजर में पाकिस्तान में महँगे होते टमाटरों पर कटाक्ष करते हुए लिखा कि पाकिस्तान में लड़की को प्रोपोज करने के लिए अँगूठी नहीं बल्कि टमाटर का इस्तेमाल किया जाता है।

एक व्यक्ति ने तो ऐसा वीडियो खोज कर निकाला, जिसमें पाकिस्तानी नेता जब झंडोतोलन करते हैं तो झंडा ही नीचे गिर जाता है। आप भी देखें इस मजेदार वीडियो को:

एक व्यक्ति ने ‘102 नॉट आउट’ फ़िल्म में अमिताभ बच्चन के उस डायलॉग को याद किया जिसमें वह कहते हैं कि अगर औलाद नालायक हो तो उसे भूल जाना चाहिए।

‘कश्मीर के कुछ मुस्लिम रमजान का भी नहीं करते सम्मान, भारतीयता सिखाने की जरूरत’

जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार ने ईकोनॉमिक टाइम्स से बातचीत के दौरान इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। ईटी की खबर के मुताबिक, उन्होंने कहा है कि अब अगला काम कश्मीर के कुछ मुस्लिमों को भारतीयता सिखाने का होना चाहिए।

उन्होंने पुलवामा हमले का हवाला देते हुए कहा, “कश्मीर में एक खास तरह का इस्लाम धर्म है जो रमजान और ईद का भी सम्मान नहीं करता। ये सिर्फ़ हिंसा फैलाता है, जिसे पुलवामा हमले ने साफ़ कर दिया है। कश्मीर के मुस्लिमों को इस तरह के इस्लाम से दूर रहना चाहिए। देश भर की अन्य जगहों पर अन्य मुस्लिमों ने एक राष्ट्र, एक झंडा और एक संविधान और एक नागरिकता के सिद्धांत को स्वीकार किया है, और अब यही तरीका है जिससे घाटी का विकास हो सकता है।

कश्मीर घाटी में आरएसएस की ओर से पिछले 18 साल से काम करने वाले इंद्रेश कुमार जम्मू-कश्मीर में 30 अलग-अलग संस्थान चलाते हैं। ये संस्थान उन मुस्लिमों तक पहुँचने का काम करते हैं जो पाकिस्तान की बजाए भारत का समर्थन करते हैं। ये संस्थान उन तक पहुँचकर उनके साथ काम करते हैं और उन्हें शिक्षा- स्वास्थ्य जैसी सुविधाएँ उपलब्ध करवाते हैं।

राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के संयोजक इंद्रेश की मानें तो पूरा जम्मू, लद्दाख और घाटी के भी एक चौथाई लोग अनुच्छेद 370 हटने से खुश हैं। केंद्र के फैसले से पूरे जम्मू-कश्मीर की करीब दो-तिहाई आबादी में खुशी की लहर है। आरएसएस नेता बताते हैं कि इस कदम से कश्मीर के पंडितों, डोगरों, सिखों, शिया, गुर्जर और दलितों को न्याय मिला है।

उनका कहना है कि घाटी में सिर्फ़ कुछ मुस्लिम हैं जो इस फैसले को नकार रहे हैं। ये लोग स्वघोषित नेताओं और कट्टरपंथी इस्लाम द्वारा बरगलाए गए हैं। इसलिए इन्हें भारतीयता से परिचित कराने की आवश्यकता है।

वह कहते हैं कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग हैं। घाटी के लोगों को राष्ट्रवाद और राष्ट्रहित की अवधारणा से जोड़ने की दिशा में कार्य करना होगा। यहाँ कश्मीरी मुस्लिमों की बहुत बड़ी आबादी है जो शांति और विकास चाहती हैं, जो निश्चित ही सिर्फ़ भारत उन्हें दे सकता है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार ने पूर्व सेना अधिकारियों के साथ सीमा पार आतंकवाद, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद, पाकिस्तान में भारतीयों के राज्य और कश्मीर घाटी में इस्लामी कट्टरपंथ का उदय जैसे विषयों पर बैठक की थी।

तिहाड़ में बंद यासीन मलिक की बीवी ने इस्लामाबाद के जलसे में पढ़ी भारत विरोधी कविता

पाकिस्तान की मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो कश्मीरी अलगाववादी यासीन मलिक की पत्नी मशाल मलिक ने पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में हिस्सा लिया। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आयोजित इस
कार्यक्रम में मशाल मलिक ने एक कविता भी पढ़ी। इस कविता में ‘भारत द्वारा कश्मीर में किए जा रहे अत्याचार की चर्चा’ थी। ये वही मशाल मलिक हैं, जिन्होंने अपने पति यासीन मलिक के जेल जाने के बाद प्रेस कॉन्फ़्रेंस बुला कर रोने-धोने का नाटक किया था।

मशाल मलिक ने जिस कार्यक्रम में हिस्सा लिया, उसमें पाकिस्तानी वक्ताओं ने अपना अधिकतर समय भारत के ख़िलाफ़ बोलने में लगाया। भारत सरकार और सेना के ख़िलाफ़ भी काफ़ी ग़लतबयानी की गई। अपने सम्बोधन के दौरान मशाल मलिक ने भी भारत विरोधी सुर अलापा। उन्होंने कश्मीर को ‘भारत के कब्जे वाला क्षेत्र’ कहा और ‘कश्मीर की आजादी’ की माँग की। बता दें कि यासीन मलिक अभी दिल्ली स्थित तिहाड़ जेल में बंद है।

उसकी गिरफ़्तारी के बाद मशाल मलिक ने अपनी 7 वर्षीय बेटी को प्रेस कॉन्फ़्रेंस में लाकर इमोशनल ब्लैकमेलिंग की कोशिश की थी। यासीन मलिक को एनआईए ने टेरर फंडिंग से जुड़े मामले में गिरफ़्तार किया था। यासीन और मशाल की शादी इस्लामाबाद में ही हुई थी। इस समारोह में पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर के कथित प्रधानमंत्री सहित पाकिस्तान व कश्मीर के कई नेता व अलगाववादी शामिल हुए थे।

यासीन मलिक की पत्नी द्वारा इस्लामाबाद में पाकिस्तानी स्वतंत्रता समारोह में हिस्सा लेने के बाद यह बहस और तेज़ हो गई है कि आखिर भारत सरकार इन अलगाववादियों को इतने दिनों से बर्दाश्त क्यों कर रही थी? अभी कुछ महीनों पहले तक इन्हें सरकार से सुरक्षा भी प्राप्त थी, जिसे गृह मंत्रालय ने वापस ले लिया। संसद में अमित शाह ने कहा था कि इन अलगावादियों के ख़ुद के बच्चे तो विदेशों में रह रहे हैं लेकिन ये कश्मीरी युवाओं के हाथों में पत्थर थमा देते हैं।