Home Blog Page 5595

कोर्ट में काम न आईं सिब्बल की दलीलें, CBI को मिली 26 अगस्त तक की कस्टडी

पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम को आज गुरुवार (अगस्त 22, 2019) को सीबीआई की विशेष अदालत में पेश किया गया। सीबीआई ने आईएनएक्स मीडिया केस में पी चिदंबरम को 5 दिन के लिए कस्टडी में लेने की माँग की थी। सीबीआई ने अदालत में कहा कि कई ऐसे डाक्यूमेंट्स और जानकारियाँ हैं, जो चिदंबरम को कस्टडी में लेकर पूछताछ करने के बाद ही निकल सकती हैं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि पी चिदंबरम जाँच व पूछताछ में सहयोग नहीं कर रहे हैं, वह जवाब ही नहीं दे रहे हैं।

INX मीडिया मामले में पी. चिदंबरम को कोर्ट से झटका लगा है। कोर्ट ने पी. चिदंबरम को 5 दिन की CBI रिमांड में भेज दिया है। इसके साथ ही अब 26 अगस्त तक पी. चिदंबरम सीबीआई की हिरासत में रहेंगे। वहीं परिवार के लोग हर रोज आधे घंटे के लिए पी. चिदंबरम से मुलाकात कर सकते हैं।

इससे पहले हुई मामले की सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने कहा कि इस मामले में पहली गिरफ्तारी पूर्व केंद्रीय मंत्री के बेटे कार्ति के चार्टर्ड अकाउंटेंट भास्कर रमन की हुई थी, जो अभी जमानत पर जेल से बाहर हैं। सिब्बल ने कहा कि उसके अलावा मामले के अन्य आरोपी पीटर मुखर्जी और इंद्राणी मुखर्जी को भी जमानत मिल चुकी है लेकिन अन्य मामले में वे जेल में हैं।

सिब्बल ने कहा कि जमानत प्रदान करना एक नियम है और अदालत के समक्ष मुद्दा व्यक्तिगत स्वतंत्रता का है। पूछताछ के लिए चिदंबरम को 5 दिनों की हिरासत में सौंपे जाने की सीबीआई के माँग का विरोध करते हुए उन्होंने यह दलील दी थी।

सुनवाई के दौरान मेहता ने दिल्ली हाईकोर्ट का जजमेंट पढ़ा, जिसमें लिखा है कि आईएनएक्स मीडिया केस मनी लॉन्ड्रिंग का एक क्लासिक उदाहरण है। इस जजमेंट को जस्टिस सुनील गौड़ ने लिखा था, जिन्होंने चिदंबरम की अग्रिम जमानत याचिका ख़ारिज की थी। मेहता ने अदालत को बताया कि इस मामले में आरोपित का गंभीर और सक्रिय किरदार रहा है। सीबीआई को इस पूरे लेनदेन की जड़ तक पहुँचना है। मेहता ने जज के सामने केस की डायरी पेश की।

बता दें कि चिदंबरम पर वित्त मंत्री रहते आईएनएक्स मीडिया को एफआईपीबी से स्वीकृति दिलवाने के बदले रिश्वत लेने का आरोप है। उनके वकील कपिल सिब्बल ने अपनी दलील पेश करते हुए अदालत में कहा कि इस प्रक्रिया में भारत सरकार के 6 सचिव हिस्सा लेते हैं लेकिन किसी को भी गिरफ़्तार नहीं किया गया। सिब्बल ने इस बात पर आपत्ति जताई कि एफआईआर 10 वर्षों के बाद दर्ज किया गया। उन्होंने वादा किया कि जब भी पूछताछ के लिए बुलाया जाएगा, पी चिदंबरम हाजिर हो जाएँगे।

सिब्बल ने दावा किया कि सीबीआई को जो सवाल चिदंबरम से पूछने थे, वह पूरी तरह से तैयार नहीं हैं और चिदंबरम ने हर सवाल का जवाब दिया है। सिब्बल ने ‘उस तरीके’ पर आपत्ति जताई, जिससे चिदंबरम के ख़िलाफ़ केस चला और उन्हें गिरफ़्तार किया गया। वहीं अभिषेक मनु सिंघवी की आपत्ति इस बात को लेकर थी कि 2018 में इन्द्राणी मुखर्जी का बयान रिकॉर्ड करने के 4 महीने बाद चिदंबरम को पूछताछ के लिए बुलाया गया। उन्होंने कहा कि इन्द्राणी को अप्रूवर बना दिया गया है ताकि चिदंबरम को कस्टडी में लिया जा सके।

अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत में कहा कि भारत सरकार के जिन 6 सचिवों ने एफआईपीबी अप्रूवल दिया, उनमें से एक आगे जाकर रिज़र्व बैंक का गवर्नर बना। सिंघवी ने एक सुप्रीम कोर्ट जजमेंट का हवाला देते हुए कहा कि कस्टडी की माँग तभी की जाती है जब जाँच एजेंसी को लगे कि कस्टडी में लिए बिना आगे की जाँच प्रक्रिया पूरी करनी असंभव है।

सुनवाई के दौरान आरोपित पी चिदंबरम इस बात पर अड़ गए कि उन्हें भी कुछ बोलना है। सीबीआई की आपत्ति के बाद सिंघवी ने एक जजमेंट पढ़ा, जिसके अनुसार आरोपित ख़ुद का प्रतिनिधित्व कर सकता है।

सॉलिसिटर जनरल ने कहा की जाँच एजेंसी दिमाग वाले लोगों से डील कर रही है और ऐसे में इस केस की जड़ तक पहुँचना ज़रूरी है। हालाँकि, सिब्बल ने कहा कि वे नहीं चाहते कि चिदंबरम से पूछे जाने वाले सवाल सार्वजनिक हों, लेकिन वो सवालों की प्रमाणिकता की पुष्टि चाहते हैं।

फर्जी नारीवाद में मत फँसो लड़कियो, वरना प्रेम में सहमति से बना शारीरिक संबंध भी फर्जी बलात्कार ही लगेगा

बढ़ते समय में ‘स्पेस’ एक बहुत बड़ी माँग है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता से लेकर सार्वजनिक रूप से सहमति-असहमति दर्ज कराने के लिए हमें इसकी जरूरत पड़ती है। हमें अपनी बात कहनी होती है तो हम इसकी अपेक्षा करते हैं, हमें किसी की बात सुननी होती है तो हम इसे तलब करते हैं। बाहरी परिवेश से लेकर व्यक्तिगत जीवन तक हमें ‘स्पेस’ मिलना और ‘स्पेस’ देना ही हमारे भीतर सकारात्मक बदलाव लेकर आता है।

कल्पना करिए! आपसे अंजाने में हुई किसी गलती पर कोई आपसे झल्ला कर कहे “तुम इतनी बेवकूफों वाली हरकत कैसे कर सकते हो” या “तुमने ये किया भी कैसे” तो आपको कैसा लगेगा? और इसी परिस्थिति में कोई आपको समझते हुए कह दे, “ऐसा हो जाता है…कोई बात नहीं” तो कैसा लगेगा। एक ही स्थिति पर दो अलग ‘भाव’ और फर्क सिर्फ़ इतना कि आपकी गलती, आपकी भूल, आपके मत, आपके स्वभाव, आपके समाज और आपके परिवेश को सामने वाला स्पेस दे रहा है या नहीं। विपरीत परिस्थियों में भी मिला सही स्पेस आपको आगे बढ़ने के विकल्प देता है और इसकी गैर मौजूदगी सिर्फ़ अवसाद!!!

मुझे लगता है इस ‘स्पेस’ का अर्थ समझने की छोटे बच्चे से लेकर हर बड़े बुजुर्ग को जरूरत है। लेकिन जो सबसे ज्यादा इसके तलबगार हैं वो प्रेम संबंध में जकड़े प्रेमी-प्रेमिका हैं। जकड़े शब्द का इस्तेमाल मैं सोच-समझ कर रही रही हूँ। जिन्होंने अपने जीवन में प्रेम अनुभव किया है या जो अपने जीवन में किसी के प्रेम संबंधों के गवाह हैं, वो इस बात से सहमत रहेंगे। किसी व्यक्ति विशेष से हुआ प्यार हमें भावनाओं के प्रलोभ से ऊपर, उसमें जकड़ते जाने की ट्रेनिंग देता है। नतीजतन हम सामने वाले को अपनी निजी प्रॉपर्टी समझने लगते हैं। हम बिना उसकी व्यथा, मजबूरी, मानसिकता जाने उससे अपेक्षा करते हैं कि वो जो करे उसके मनमुताबिक हो। और जब ऐसा नहीं होता तो हम परेशान हो जाते हैं, घबराहट से भर उठते हैं, गुस्सा हमें खाने लगता है, हम चिड़चिड़े हो जाते हैं। और आखिर में कोई ऐसा कदम उठा लेते हैं जो न हमारे लिए सही होता है न किसी अन्य के लिए। अपने साथी और उसके फैसले को मात्र ‘स्पेस’ न देने के कारण हम खिन्नता के पात्र बन जाते हैं।

प्रेम संबंध के दौरान लड़के-लड़कियों के बीच ये बहुत बड़ा पेशोपेश होता है कि वो एक दूसरे से जुड़ते वक्त समाज से छिपकर स्वतंत्र रूप से फैसला लेते हैं लेकिन जब रिश्ता समाज के बीच पहुँचता है तो उन्हें कई तरह की बंदिशें और उलाहनाएँ झेलनी पड़ती हैं। इसके बावजूद हम क्या फैसला करते हैं और उस पर हमारा साथी क्या रिएक्ट करता है, उसे ही प्रेम में एक तरह से स्पेस देना और स्पेस मिलना कहा जाता है।

कल जब सुप्रीम कोर्ट की ओर से एक फैसला आया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अगर कोई महिला भविष्य में शादी की सुनिश्चतता जाने बिना किसी शख्स के साथ लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाती है तो वह उस पर यह कहकर बलात्कार का आरोप नहीं लगा सकती कि उस आदमी ने उससे शादी का वादा किया था।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक उदाहरण है कि अब न्यायपालिका भी प्रेम संबंधों में जोड़ों से स्पेस की मौजूदगी की अपेक्षा कर रहा है। मसलन इस केस में एक सेल्स टैक्स की असिसटेंट कमिश्नर ने आरोप लगाया कि सीआरपीएफ कमांडेंट ने उसे झूठे वादे देकर बलात्कार किया। सही पढ़ा आपने, महिला अधिकारी ने अपनी शिकायत में पुरुष अधिकारी और एक लंबे समय तक रहे अपने प्रेमी पर बलात्कार का आरोप लगाया। उन्होंने अपनी शिकायत में इस बात का जिक्र किया कि पुरुष अधिकारी ने झूठा वादा करके उसके साथ ये सब किया। लेकिन जब कोर्ट ने मामले में सारी दलीलें सुनीं तो उन्होंने फैसला किया कि 6 साल रिश्ते में रहने के बाद, अलग-अलग मौक़ों पर एक दूसरे के घर आने-जाने के बाद दोनों के बीच सहमति के रिश्ते थे। इसलिए बलात्कार का उनका आरोप खारिज किया जाता है।

साथ ही कोर्ट ने एक बहुत महत्तवपूर्ण बात कही, “झूठे वादे कर महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाने में और आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाने में फर्क है। झूठा वादा कर धोखा देना वह स्थिति है, जिसमें वादा करने वाले शख्स के मन में जुबान देते वक्त उसे निभाने की सिरे से कोई योजना ही न हो।”

कोर्ट ने महिला की शिकायत पर बारीकी से अध्य्यन करते हुए कहा कि 2008 में किया गया शादी का वादा 2016 में पूरा नहीं किया जा सका। सिर्फ इस आधार पर यह नहीं माना जा सकता है कि शादी का वादा महज शारीरिक संबंध बनाने के लिए था। कोर्ट ने यह भी कहा कि महिला शिकायतकर्ता को भी इस बात का पता था कि शादी में कई किस्म की अड़चनें हैं। वह पूरी तरह से परिस्थितियों से अवगत थीं।

ये पूरा मामला प्रेम संबंध में सहमति-असहमति को स्पेस न दिए जाने के कारण कोर्ट में पहुँचा। लेकिन आखिरकार कोर्ट के फैसले ने प्रेम संबंध में जकड़े लोगों की उस भावना को चोट किया, जो अपने साथी की निजता खत्म करके उसको अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाली वस्तु समझ लेते हैं। इस हालिया मामले में बलात्कार का आरोप मढ़ती हुई लड़की ने एक बार भी सोचने का प्रयास नहीं किया कि जो संबंध दोनों के बीच बने वो तब भी रहे जब लड़के ने शादी में असमर्थता दिखाते हुए अपनी मजबूरी उसके आगे रख दी। वो मजबूरी लड़की की जाति थी। जिसे लड़के का परिवार-समाज स्वीकारने को तैयार नहीं था, और लड़का अपने समाज की सोच के ख़िलाफ़ कदम उठाने के लिए तैयार नहीं था। लड़की चाहती तो उसे और उसके समाज को पिछड़ी सोच के लिए दुत्कार सकती थी, अपने तरीके से बहिष्कार कर सकती थी, घर में सबको सच्चाई बता सकती थी, उसके फैसले का और उसका विरोध कर सकती थी। लेकिन वो सीधे कोर्ट पहुँची और लड़के पर आरोप भी लगाया तो ये कि उसके प्रेमी ने उसका बलात्कार किया! क्या वाकई 6 साल के प्रेम संबंध में आपसी सहमति से आई करीबियाँ बलात्कार होती हैं? आप अपने स्तर पर सोचिए।

प्रेम के बाद अलग होना और प्रेम में दोषी होना, दो अलग बातें हैं। जिसे कोर्ट ने भी अपने फैसले के साथ स्पष्ट कर दिया। भारतीय संस्कृति के पटल पर नाक-साख, जाति-धर्म, माँ-बाप की इज्जत के नाम पर कितने जोड़े एक दूसरे से अलग हो जाते हैं, ये मुझे विस्तार से बताने की जरूरत नहीं है। हम नजर घुमाकर भी देखें तो इन कुप्रथाओं और भ्रांतियों से ग्रसित समाज में ऐसे पीड़ित प्रेम संबंध मिल जाएँगे जो अपने अटूट प्रेम के बावजूद भी टूट गए और अलग-अलग साथी के साथ न सिर्फ अपना जीवन गुजार रहे हैं बल्कि मस्त भी हैं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि उनमें से कोई एक अपनी कुंठा-गुस्सा-द्वेश निकालने के लिए संबंधों को बलात्कार बता दे।

फर्जी नारीवाद को दो पल के लिए कोने में रखकर एक बार इस बात पर गौर करिए कि हम कथित तौर पर महिला सुरक्षा और महिला अधिकारों के नाम पर क्या गंदगी फैला रहे हैं। हम अभिव्यक्ति की आजादी का प्रयोग कौन सी दिशा में कर रहे हैं? पूछिए एक बार खुद से क्या वाकई प्रेम में अलग होने के बाद आपसी संबंध बलात्कार हो जाते हैं? और अगर आपको इस सवाल का जवाब ‘हाँ’ दिखता है तो उस ‘भाई’ या उस ‘दोस्त’ या उस ‘रिश्तेदार’ के बारे में जरूर सोचिए, जिसे सामाजिक के दबाव में आकर अपने प्रेम को छोड़ना पड़ा, लेकिन फिर भी वो उसे भुलाने में असमर्थ रहा। अब ऐसे में क्या हो अगर उसकी प्रेमिका आकर उसे बलात्कारी बता जाए… शायद उस समय हमें उस लड़की से या पूरी लड़की जाति से नफरत हो जाएगी। एक आरोप एक लड़के की जिंदगी, एक पुरूष का भविष्य सब बर्बाद कर देती है। वो शादी का वादा करके मुकर जाने पर अपनी ओछी मानसिकता के लिए दोषी हो सकता है, वो समाजिक कुरीति बढ़ाने के लिए जिम्मेदार हो सकता है, लेकिन बलात्कार का आरोपी या दोषी बिल्कुल नहीं हो सकता।

ये बात सच है कि समाज में ऐसी घटनाएँ आए दिन घट रही हैं कि जहाँ पुरूष शादी का वादा करके एक महिला को भीतर तक छील जाते हैं, लेकिन इस बात से भी गुरेज नहीं किया जा सकता कि अब महिलाएँ अपनी कुंठा निकालने के लिए आपसी संबंधों को भी बलात्कार बता रही हैं। जिसमें दोषी न होते हुए एक पुरूष को जलालत झेलनी पड़ती है। इन्हीं सब कारणों से प्रेम संबंधों में स्पेस की जरूरत अत्यधिक है, ताकि हम अपने साथी को उसके स्वभाव, मनोभाव और उसकी हरकतों पर आँक सकें, न कि उस व्यक्तित्व के आधार पर जो ‘प्रेम की जकड़’ या ‘साथी की मंशा’ के दबाव के कारण बना। क्योंकि अगर ऐसा होगा तो सहमति से बनाया शारीरिक संबंध भी फर्जी बलात्कार ही लगेगा।

जयपुर में मुस्लिम भीड़ ने काँवड़ यत्रियों पर किया था हमला: तनाव के मद्देनज़र धारा-144 का विस्तार

हिंसक मुस्लिम भीड़ द्वारा जयपुर शहर में काँवड़ यत्रियों पर हुए हमले के एक सप्ताह बाद, शहर की पुलिस ने शुक्रवार, 23 अगस्त की मध्य रात्रि तक CRPF की धारा-144 का विस्तार करने का फ़ैसला किया है। पुलिस के सूत्रों ने कहा कि ताज़ा आँकड़े के अनुसार, पुलिस ने 149 लोगों को गिरफ़्तार किया है। इस मामले में अभी और गिरफ़्तारियाँ हो सकती हैं।

एडीजी अजय पाल लांबा ने बताया, “शहर में क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रतिबंध जारी रखा गया, ख़ासकर उस इलाक़े में जहाँ पिछले सप्ताह हिंसात्मक घटना हुई थी।”

2 दिन पहले, धारा-144 कार्यान्वयन को 21 अगस्त तक बढ़ा दिया गया था। जानकारी के अनुसार, प्रतिबंधों को अब दो और दिनों तक के लिए बढ़ा दिया गया है।

जयपुर में 12 अगस्त को बकरीद के मौक़े पर जमकर बवाल हुए था। यह बवाल एक मामूली कहासुनी से शुरू हुआ था। बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग जयपुर-दिल्ली रोड पर जमा हो गए और वाहनों पर जमकर पत्थरबाज़ी की। इस घटना में एक मुस्लिम भीड़ ने हरिद्वार जाने वाले काँवड़ियों को ले जा रही एक बस पर हमला किया था। घटना के दौरान 30 से अधिक काँवड़िए गंभीर रूप से घायल हो गए थे, वहीं क़रीब एक दर्जन से अधिक बसों को आग लगा दी गई थी।

राजस्थान में कॉन्ग्रेस की सरकार द्वारा विधानसभा में मॉब-लिंचिंग के ख़िलाफ़ सख़्त विधेयक पारित किए जाने के एक सप्ताह बाद काँवड़ यत्रियों पर भड़की हिंसा सामने आई थी। राजस्थान के मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कॉन्ग्रेसी नेता अशोक गहलोत मॉब लिंचिंग के ख़िलाफ़ एक बिल लेकर आए थे, क्योंकि ऐसा महसूस किया गया था कि भारतीय दंड संहिता और आपराधिक प्रक्रिया संहिता में वर्तमान प्रावधान भीड़ की घटनाओं से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं थे।

‘शेहला बिन बुलाए चली आई, अब उसे खदेड़ तो नहीं सकते… लेकिन हमने उसे बोलने नहीं दिया’

आज गुरुवार (अगस्त 22, 2019) को दिल्ली के जंतर-मंतर पर विपक्षी नेताओं का जमावड़ा लगा। मौक़ा था डीएमके द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन का, जिसमें जम्मू कश्मीर के पुनर्गठन और अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त करने वाले केंद्र सरकार के निर्णय के ख़िलाफ़ विपक्षी एकजुटता दिखाई गई। इस विरोध प्रदर्शन में कॉन्ग्रेस नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद और राजद नेता मनोज झा और सीपीएम नेता वृंदा करात सहित कई विपक्षी दलों के प्रतिनिधि वहाँ उपस्थित रहे। लेकिन, एक नाम चौंकाने वाला था।

जेएनयू की पूर्व छात्र नेता और जम्मू कश्मीर में राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाली शेहला रशीद भी मंच पर उपस्थित थी। शेहला ने हाल ही में ट्विटर पर बिना सबूत जम कर अफवाह फैलाया था और भारतीय सेना के फटकार के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने उनकी गिरफ़्तारी की भी माँग की थी। शेहला रशीद का विपक्षी मंच पर आना कई प्रश्नचिह्न खड़े कर गया। जब डीएमके से इस बारे में पूछा गया तो पार्टी ने कहा कि शेहला के आने से समस्या नहीं होनी चाहिए क्योंकि वह जम्मू कश्मीर की एक राजनीतिक पार्टी का प्रतिनिधित्व करती हैं।

डीएमके नेता टीकेएस इलानगोवन ने कहा, “हाँ वो मंच पर थीं लेकिन देखा आपने, हमनें उन्हें बोलने नहीं दिया। हमनें जिन्हें आमंत्रित किया था, केवल उन्हें ही बोलने का मौक़ा दिया गया। बाकी लोग बैठ कर समर्थन कर सकते हैं।” डीएमके की नाराज़गी मुख्य रूप से इस बात को लेकर है कि जम्मू कश्मीर के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया है। शेहला रशीद के बारे में बात करते हुए डीएमके नेता ने कहा कि कुछ लोग बिना बुलाए आ गए हैं तो अब भगाया तो नहीं जा सकता न।

डीएमके नेता ने कहा कि सीपीआइ ने भी इस विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया लेकिन उसे भी नहीं बुलाया गया था। डीएमके नेता टीकेएस ने कहा कि पार्टी शेहला रशीद द्वारा ट्विटर पर दिए गए बयानों से कोई इत्तेफाक नहीं रखती और उससे उनकी कोई सहमति नहीं है। टाइम्स नाऊ से बात करते हुए उन्होंने कहा कि अगर शेहला को बोलने की अनुमति दे दी जाती तो फिर सीपीआई को भी बोलने की अनुमति देनी पड़ती।

फोर्ब्स की रिपोर्ट में सबसे ज़्यादा कमाने वाले दुनिया के 5 एक्टर्स में अक्षय कुमार का नाम

फोर्ब्स मैगज़ीन ने 2019 में दुनिया के 10 सबसे ज़्यादा कमाई करने वाले अभिनेताओं की लिस्ट जारी की है। इस लिस्ट में बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार ने जून 2018 में 65 मिलियन अमरीकी डॉलर (लगभग 466 करोड़ रुपए) की कमाई के साथ चौथे स्थान पर क़ब्ज़ा कर लिया है।

इस लिस्ट में हॉलीवुड अभिनेता ड्वेन जॉनसन (Dwayne Johnson) शीर्ष स्थान पर हैं। ड्वेन जॉनसन को ही ‘द रॉक’ के नाम से भी जाना जाता है। फोर्ब्स की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि इस अवधि में उन्होंने 89.4 मिलियन अमरीकी डॉलर (लगभग 640 करोड़ रुपए) की कमाई की।

मिशन मंगल की सफलता के आधार पर, अक्षय कुमार बॉलीवुड के एकमात्र ऐसे अभिनेता हैं, जिन्हें दुनिया के 10 सबसे ज़्यादा कमाई करने वाले अभिनेताओं की लिस्ट में रखा गया है।

फोर्ब्स द्वारा जारी लिस्ट के अनुसार, दुनिया में दूसरे सबसे अधिक कमाने वाले ऑस्ट्रेलियाई अभिनेता क्रिस हेम्सवर्थ हैं, जो मार्वल के सुपरहीरो यूनिवर्स के कई अभिनेताओं में से एक है। क्रिस हेम्सवर्थ (Christopher Hemsworth) की कमाई जून 2018 से जून 2019 के बीच 76.4 मिलियन अमरीकी डॉलर (लगभग 547 करोड़ रुपए) है।

रॉबर्ट जॉन डॉनी जुनियर (Robert John Downey Jr.), जून 2018 और जून 2019 के दौरान 66 मिलियन अमरीकी डॉलर (लगभग 473 करोड़ रुपए) की कमाई के साथ तीसरे स्थान पर हैं। जैकी चैन 58 मिलियन अमरीकी डॉलर (लगभग 415 करोड़ रुपए) के साथ दुनिया में पाँचवें सबसे अधिक कमाने वाले अभिनेता हैं, जबकि छठे स्थान पर ब्रैडली कूपर और एडम सैंडलर ने 57 मिलियन अमरीकी डालर (लगभग 408 करोड़ रुपए) के साथ बने हुए हैं।

आठवें स्थान पर क्रिस इवांस (Chris Evans) हैं, जिनकी कमाई अमरीकी डॉलर 43.5 मिलियन (लगभग 311 करोड़ रुपए) है। पॉल रुड (Paul Rudd) 41 मिलियन डॉलर (लगभग 293 करोड़ रुपए) है, जो नौवें स्थान पर हैं। दसवें स्थान पर हैं विल स्मिथ (Will Smith), जिनकी कमाई 35 मिलियन डॉलर (लगभग 250 करोड़ रुपए) है।

पाकिस्तान को एक और झटका: अब नदी-पानी की जानकारी भी साझा नहीं करेगा हिंदुस्तान

370 हटने के बाद से पाकिस्तान के प्रोपेगंडा और जम्मू-कश्मीर पर नाजायज़ हक के खिलाफ हिंदुस्तान का रवैया दिन-ब-दिन सख्त होता जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी और विदेश मंत्रालय के दूसरे देशों को मामले से दूर रहने की सख्त हिदायत, पाकिस्तान के राजनयिक-व्यापारिक संबंध खत्म करने पर कोई अपेक्षित प्रतिक्रिया न देने, सिंधु जल-संधि का अपने हिस्से का पानी पाकिस्तान को और न देने के फैसले के बाद अब पाकिस्तान को हिंदुस्तान से नदियों के बहाव-संबंधी हाइड्रोलॉजिकल जानकारी भी नहीं मिलेगी।

भारतीय सिंधु जल आयोग के आयुक्त पीके सक्सेना के हवाले से टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने दावा किया है कि हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बीच 1989 में पहली बार हुए और सालाना तौर पर नवीनीकृत होने वाले इस बाबत समझौते को हिंदुस्तान ने आगे न बढ़ाने का निश्चय किया है। यह समझौता हमारी पाकिस्तान के प्रति सद्भावना के भाव-प्रदर्शन के तौर पर चलता था। अब हिंदुस्तान केवल जलबहाव की अति होने और बाढ़ के मामले में पाकिस्तान को कोई सूचना देगा।

सिंधु समझौता नहीं तोड़ेंगे

हालाँकि, हिंदुस्तान इस समझौते को आगे न बढ़ा कर बाढ़ के वार्षिक मौसम (1 जुलाई से 10 अक्टूबर) के समय में इस समझौते के अंतर्गत जो जानकारियाँ दी जानी हैं, वह अब और नहीं देगा, लेकिन सक्सेना ने यह साफ़ किया कि इस समझौते का सिंधु जल समझौते पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा; दोनों अलग-अलग हैं। सिंधु जल समझौते के अंतर्गत जो कुछ सूचना जलबहाव की अति होने और बाढ़ के मामले में पाकिस्तान को दी जानी है, हिंदुस्तान केवल उतनी ही बात पाकिस्तान को बताएगा।

इसके पहले केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने बयान दिया था कि हिंदुस्तान अब सिंधु जल समझौते के तहत अपने हिस्से का पानी पाकिस्तान को और नहीं लेने देगा। बुधवार को ANI से बात करते हुए शेखावत ने कहा, “हिंदुस्तान के हिस्से के पानी में से काफी ज्यादा पाकिस्तान को चला जाता है। इनमें से कई नदियाँ रावी, व्यास और सतलज तंत्र की उपनदियाँ हैं, और इनके कैचमेंट एरिया (हौज़, जलग्रहण क्षेत्रों) में से पानी उस तरफ (पाकिस्तान को ) चला जाता है। हम इस पर तेज़ी से काम कर रहे हैं कि कैसे हमारे हिस्से का पानी जो पाकिस्तान में चला जाता है, उसे घुमा कर अपने किसानों, उद्योगों और लोगों के प्रयोग के लिए इस्तेमाल किया जा सके।”

उन्होंने इस योजना की तकनीकी और जलशास्त्रीय (हाइड्रोलॉजिकल) अनुकूलता पर शोध शुरू करने की भी बात कही। उनके अनुसार उन्होंने इस विषय पर अध्ययन जल्दी खत्म करने का निर्देश दिया है, ताकि योजना को अमली जामा पहनाया जा सके।

‘कार्ति ने मुझसे 1 मिलियन डॉलर माँगे थे’- इन्द्राणी का वो वीडियो, जिसमें है ‘चिदंबरम मामले’ की असली कहानी

टाइम्स नाउ ने ट्विटर पर इन्द्राणी मुखर्जी का वो वीडियो शेयर किया है, जिसमें इंद्राणी ने बताया था कि चिदंबरम ने उनसे अपने बेटे कार्ति की मदद करने की बात की थी। कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम की गिरफ्तारी में इंद्राणी मुखर्जी बीच की एक अहम कड़ी हैं।

पी चिंदबरम से सीबीआई (CBI) ने गिरफ्तारी के बाद बृहस्पतिवार को करीब तीन घंटे से ज्यादा देर तक पूछताछ की। इस दौरान अधिकारियों ने उनसे आईएनएक्स मीडिया केस को लेकर कई सवाल पूछे। रिपोर्ट्स के अनुसार, सीबीआई ने उनसे पूछा कि चिदंबरम की इंद्राणी मुखर्जी और पीटर मुखर्जी से कितनी मुलाकातें हुईं? और वो इन्द्राणी मुखर्जी को कैसे जानते हैं? CBI द्वारा चिदंबरम से पूछा गया- “क्या पैसों की लेन-देन को लेकर कोई बात हुई थी? जब INX मीडिया मामला से जुड़े महत्वपूर्ण फैसला हुआ था, तो कितने लोग बैठक में थे?”

टाइम्स नाउ द्वारा जारी किया गया यह वीडियो 2018 का है। आईएनएक्स मीडिया मनी लॉन्ड्रिंग केस में इंद्राणी मुखर्जी ने जाँच एजेंसियों को दी गवाही में कहा था कि पी चिदंबरम से उनकी मुलाकात हुई थी। पूर्व वित्त मंत्री ने उनसे अपने बेटे के बिजनेस में मदद की बात कही थी। टाइम्स नाउ के पास इंद्राणी के साथ बातचीत का एक्सक्लूसिव वीडियो है। जिसमें इंद्राणी कहती दिख रही हैं कि उनकी चिदंबरम से मुलाकात हुई थी। चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम से मिलने और मदद की बात भी इंद्राणी ने स्वीकार की है।

इस विडियो में शुरुआत में इंद्राणी मुखर्जी कहती हैं- “आपको पता चल जाएगा… कल पता चल जाएगा।” लेकिन फिर वह मुलाकात की बात स्वीकार भी करती हैं।

वीडियो में बातचीत इस तरह से है –

रिपोर्टर: सिर्फ जानना चाहती हूँ, क्या आप चिदंबरम से 2008 में मिली थीं?
इंद्राणी: हाँ, कार्ति से
रिपोर्टर: नहीं, मिस्टर पी. चिदंबरम से
इंद्राणी: हाँ हाँ, 2007 में
रिपोर्टर: और पी. चिदंबरम ने क्या कहा था उस वक्त जब आप उनसे नॉर्थ ब्लॉक में मिलीं?
इंद्राणी: आपको पता चल जाएगा। मैं नहीं कर सकती हूँ प्लीज, ऐसा नहीं कर सकती। आप जानती हैं यह गोपनीय है।
रिपोर्टर: लेकिन कार्ति कह रहे हैं कि आप लगातार झूठ बोल रही हैं?
इंद्राणी: आपको पता चल जाएगा, आपको पता चल जाएगा, यह बात, वो जो भी कहना चाहें कह सकते हैं।
रिपोर्टर: क्या मिस्टर चिदंबरम ने वाकई आपसे अपने बेटे कार्ति की मदद करने के लिए कहा था?
इंद्राणी: मैं यहाँ पर कुछ नहीं कह सकती, सब पता चल जाएगा। हाँ-हाँ, कहा था उन्होंने। मैं यहाँ पर कुछ नहीं कह सकती। आपको समझना होगा मैं क्या कह रही हूँ, यह गोपनीय है।
रिपोर्टर: उन्होंने आपसे शब्दश: क्या कहा था?
इंद्राणी: मैं नहीं बता सकती हूँ, सीरियसली, यह गोपनीय है।
रिपोर्टर: हम सिर्फ समझने के लिए पूछ रहे हैं। मिस्टर चिदंबरम अपने वकीलों से बार-बार कह रहे हैं कि आप झूठ बोल रही हैं।
इंद्राणी: मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह अपने वकीलों से क्या कह रहे हैं। यह मेरी प्रॉब्लम नहीं है। मैं एक गवाह हूँ, इसलिए मुझे कोई परेशानी नहीं है।
रिपोर्टर: उन्होंने आपसे क्या कहा? क्या उन्होंने आपसे बेटे की मदद करने को कहा था?
इंद्राणी: हाँ, उन्होंने कहा था।

रिपोर्टर: क्या जब आप कार्ति से मिली थीं, तो कार्ति ने सीधे आपसे पैसों की माँग की?
इंद्राणी: हाँ, उन्होंने ऐसा ही किया
रिपोर्टर: डिमांड कितनी थी?
इंद्राणी: 1 मिलियन डॉलर
रिपोर्टर: कार्ति ने स्पष्ट तौर पर अपने मुँह से यह कहा?
इंद्राणी: हाँ, उन्होंने कहा था
रिपोर्टर: क्या आपने यह सब कोर्ट में कहा है कैमरे के सामने?
इंद्राणी: हाँ, मैंने कहा है।

रिपोर्टर: पिता और बेटे दोनों का कहना है कि आप ऐसी महिला हैं जिस पर यकीन नहीं किया जा सकता?
इंद्राणी: ये उनकी समस्या है और वो दोनों मुझ पर यकीन नहीं करते हैं, इससे मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है।
रिपोर्टर: क्या पैसा आपने दिया था?
इंद्राणी: कोर्ट को मुझ पर यकीन करना है, ये (पैसा देने की बात) आपको पता चल जाएगा।

जाँच एजेंसियों के अनुसार इंद्राणी और पीटर ने अपने बयान में कहा है कि वे एफआईपीबी की मंजूरी दिलाने के लिए पी. चिदंबरम से उनके नॉर्थ ब्लॉक स्थ‍ित ऑफिस में मिले थे। तब चिदंबरम ने उनसे कहा था कि वह उनके बेटे कार्ति की कारोबार में मदद करें। इंद्राणी मुखर्जी पहले ही शीना बोरा मर्डर केस में जेल की सलाखों के पीछे है।

‘चिदंबरम चोर है’ कहने पर कॉन्ग्रेसियों ने पीटा; ‘चलो, किसी के लिए तो ख़ून खौला’-The Hindu की संपादक का बयान

यदि मुख्यधारा के मीडिया के पत्रकारों की बात की जाए, तो वो भी किसी राजनीतिक दल से कम नहीं होता। ग़ौरतलब है कि INX मीडिया घोटाले में पी चिदंबरम की संलिप्तता के चलते उन्हें CBI और ED ने हिरासत में लिया था। इस दौरान उनके आवास पर कई कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता भी इकट्ठे थे। टाइम्स नाउ की पत्रकार पद्मजा जोशी ने कल (21 अगस्त) रात ट्वीट किया कि एक व्यक्ति जो ‘चिदंबरम चोर है’ चिल्ला रहा था, कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने उसकी पिटाई कर दी।

लोकसभा चुनाव के दौरान, तत्कालीन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने भी राफ़ेल डील को लेकर पीएम मोदी की छवि धूमिल करने के लिए ‘चौकीदार चोर है’ के जुमले को ख़ूब भुनाया था, जबकि इस डील की हक़ीक़त सबके सामने आ चुकी थी जब मोदी सरकार ने नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट संसद में पेश की थी। तब यह बात स्पष्ट हो गई थी कि UPA के मुक़ाबले NDA के शासनकाल में 2.86% सस्ती डील फाइनल की गई थी। पीएम मोदी ने कॉन्ग्रेस के ‘चौकीदार चोर है’ के हमले का पलटवार करते हुए ‘मैं भी चौकीदार’ अभियान शुरू किया, जहाँ उन्होंने कहा कि कुलीन वर्ग हमेशा मेहनतकश लोगों का मज़ाक उड़ाता आया है। अब बारी ‘चिदंबरम चोर है’ की है जिसका अभी विस्तार होना बाक़ी है।

हालाँकि, द हिंदू की पॉलिटिकल एडिटर, निस्तुला हेब्बर को यह बात अच्छी नहीं लगी और उन्होंने पद्मजा जोशी के ट्वीट का पलटवार करते हुए लिखा, “चलो, किसी के लिए तो ख़ून खौला! पॉलिटिकल पार्टी होने का एहसास तो हुआ।”

निस्तुला हेब्बर को एक ट्विटर यूज़र ने आइना दिखाते हुए लिखा, “ऐसे ही कोई गौ तस्कर पकड़ में आ जाए और पीट दिया जाए तो ये मोहतरमा सबसे पहले असहिष्णु और मॉब लिंचिंग का रोना रोएँगी।”

हेब्बर ने अपने हिंसा के समर्थन वाले ट्वीट का बचाव यह कहकर किया कि उनके ट्वीट को ग़लत संदर्भ से जोड़ा जा रहा है। उन्होंने यूज़र को जवाब में लिखा, “तुम्हारा दिमाग ख़राब है। यह टिप्पणी कॉन्ग्रेस की प्रतिक्रिया पर थी। इडियट।”

कुछ राजनेता पत्रकारों को ऐसा समझते हैं जैसे वो दूसरों की तुलना में अधिक ‘न्यूट्रल’ हों।

BJP को कश्मीर घाटी में मिली बड़ी जीत; बारामूला, अनंतनाग और श्रीनगर में पार्टी से जुड़े 23,000 कार्यकर्ता

भाजपा द्वारा 20 अगस्त को समाप्त हुए सदस्यता अभियान में तीन करोड़ से अधिक सदस्यों को शामिल किए जाने की ख़बर है, जो मौजूदा संख्या के 20 प्रतिशत के निर्धारित लक्ष्य से कहीं अधिक है।

पार्टी में 3,78,67,753 नए सदस्य शामिल हुए, जबकि नेताओं का कहना है कि इस आँकड़े को संशोधित किया जाएगा क्योंकि अभी कुछ विवरण आने बाक़ी हैं। यदि मौजूदा 11 करोड़ सदस्यों को ध्यान में रखा जाए तो सत्ताधारी पार्टी की वर्तमान सदस्यता संख्या 14,78,67,753 होगी।

इस बीच, जम्मू और कश्मीर में, पार्टी ने 3,50,174 नए सदस्यों (ऑनलाइन) का नामांकन किया है, जिनमें से 23,000 अशांत घाटी के तीन ज़िलों- बारामूला, श्रीनगर और अनंतनाग से हैं।

भाजपा के उपाध्यक्ष और अब केंद्र शासित प्रदेश के प्रभारी अविनाश राय खन्ना ने कहा कि यह संख्या बढ़ जाएगी जब अंतिम सात लाख सदस्यता पर्चियों की गिनती हो जाएगी। उन्होंने कहा कि पार्टी 20 प्रतिशत नए सदस्यों के लक्ष्य को पार कर जाएगी।

खन्ना का कहना है कि जम्मू-कश्मीर में भाजपा के 5,20,959 सदस्य थे, जिनमें से लगभग एक लाख अकेले घाटी में थे। उन्होंने कहा,

“जम्मू और कश्मीर में भी हम लक्ष्य से परे सदस्यों का नामांकन करने में सक्षम हैं। मुझे पूरा यकीन है कि नवगठित केंद्र शासित प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री भाजपा का होगा। केंद्र सरकार की योजनाओं से लोगों को वास्तव में लाभ हुआ है।” 

भाजपा के उपाध्यक्ष ने कहा कि वहाँ के लोगों की मानसिकता में सकारात्मक बदलाव आ रहा है। नेताओं को उम्मीद है कि देश भर से डेटा एकत्र होने के बाद देश भर में नए सदस्यों की संख्या लगभग 5 करोड़ तक बढ़ जाएँगे।

आजादी कॉन्ग्रेसियों की बपौती नहीं, कालिख पोत कर सावरकर को काला नहीं कर सकते

कॉन्ग्रेस के छात्र संगठन ‘नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI)’ ने आधी रात में वीर सावरकर की प्रतिमा को जूतों का हार पहनाया और चेहरे पर कालिख पोत दी। ऐसा करके वो यह सोच रहे होंगे कि सावरकर के पूरे योगदान पर कालिख पोत डाली। लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि आजादी के इतिहास पर कॉन्ग्रेसियों की बपौती नहीं। भले ही, कॉन्ग्रेस चाटुकार, उपन्यासकार रुपी इतिहासकार और नेहरू घाटी सभ्यता में पले नेताओं के लिए नेहरू ही पिस्तौल लेकर अल्फ्रेड पार्क गए थे, 23 मार्च 1931 को फाँसी भी नेहरू ही चढ़े, लंदन में जनरल डायर को भी नेहरू ने ही मारा… वस्तुतः नेहरू दशावतार में 11वें थे, लेकिन वास्तविकता इससे ज्यादा दूर नहीं हो सकती थी।

मैं हाल ही में वित्त मंत्रालय के प्रमुख आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल का एक पुराना वीडियो देख रहा था जिसमें वह हिंदुस्तान का इतिहास हिन्दुस्तानियों द्वारा लिखे जाने पर बल देते हैं। अंग्रेजों द्वारा बोगस ‘आर्य आक्रमण सिद्धांत’ (‘आर्यन इन्वेज़न थ्योरी’), भारत के इतिहास में केवल बाहरी संस्कृति और धर्म के लोगों के बारे में पढ़ाए जाने आदि को ब्रिटिश शासन का नैतिक औचित्य तैयार करने में उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने इस ओर इंगित किया किया कि आर्य आक्रमण सिद्धांत ने हिन्दुस्तानियों में यह भ्रान्ति भर दी कि हज़ारों वर्ष से बाहरियों से शासित होते रहना ही उनकी नियति है, तो एक और शासक (अंग्रेज़ों) के बूटों तले पिसने में अलग क्या है?

इसी तरह केवल आक्रांताओं की जीत का इतिहास पढ़ाना और इस देश के व्यक्तित्वों, जैसे ललितादित्य मुक्तपीड़, सुहेलदेव पासी (जिन्होंने 1033 में बहराईच की लड़ाई में मुहम्मद ग़ज़नवी के भतीजे को वह धूल चटाई कि अगले 170 साल इस्लामी आक्रांता हिंदुस्तान का रुख करने में घबराते रहे), डच ईस्ट इंडिया कम्पनी की सेना ही नहीं, कम्पनी तक की कब्र खोद देने वाले केरला के शासक मार्तण्ड वर्मा आदि को हटा देने से ‘हम जब सारी लड़ाईयाँ हार ही जाते रहे हैं तो अंग्रेज़ों से भी हार गए’ का झूठा कथानक (नैरेटिव) गढ़ना आसान हो गया।

कथानक की भूमिका के संदर्भ में उन्होंने एक पुरानी अफ़्रीकी कहावत उद्धृत करते हुए कहा, “जब तक शेरों के अपनी कहानी सुनाने वाले कहानीकार नहीं होंगे, शिकार का इतिहास हमेशा शिकारी की ही बड़ाई करेगा।” हिन्दुओं के लिए भी यह लागू होता है- जब तक हिन्दुओं की कहानी गैर-हिन्दू (विशेषतः अब्राहमी, मार्क्सवादी, हिन्दूफ़ोबिया पर आधारित भारतीय सेक्युलरिज़्म के कट्टरपंथी) सुनाते रहेंगे, विनायक दामोदर सावरकर जैसे हिन्दुओं के हितों की बात करने वाले किरदार ‘वीर’ की उपाधि खोते रहेंगे, उनके पत्र के एक वाक्य को उठाकर उन्हें ‘अंग्रेजों से माफ़ी के लिए गिड़गिड़ाने वाला चाटुकार’ कहकर अपमानित किया जाता रहेगा।

भ्रामक प्रोपेगेंडा पढ़ाएँगी किताबें

राजस्थान की इतिहास की किताबों में कॉन्ग्रेस लिखवा रही है कि सावरकर ने अपने साथ सेल्युलर जेल में हुए अत्याचार से टूट कर जेल से छूटने के लिए खुद को ‘पुर्तगाल का बेटा’ कह दिया, जेल से निकलने के बाद उन्होंने गाँधी के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का समर्थन नहीं किया, हिन्दुओं को ‘मिलिटराइज़’ करने (सीधी भाषा में, हिन्दुओं में नक्सली और तालिबान जैसे तत्व खड़े करने) का आह्वाहन किया, और गाँधी जी की हत्या के बाद उन्हें भी उस हत्या के मुकदमे में नामजद किया गया था।

ऊपरी तौर पर यह सभी ‘तथ्य’ सही मालूम पड़ते हैं- सिवाय इसके कि सावरकर ने खुद को ‘पुर्तगाल का बेटा’ (son of Portugal) नहीं, ‘भटका हुआ बेटा’ (Prodigal Son) कहते हैं। लेकिन इतिहास केवल सूखे तथ्यों से नहीं बनता, न ही परिप्रेक्ष्य, पृष्ठभूमि और परिणाम से काट कर किसी घटना का विश्लेषण किया जा सकता है। और इन सभी घटनाओं को, जो सावरकर के खिलाफ जाती हुई दिखतीं हैं, परिप्रेक्ष्य, पृष्ठभूमि और परिणाम के प्रकाश में देखें तो तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है।

सबसे पहले उनके खुद को ‘(अंग्रेज़ सरकार का) भटका बेटा’ कहने की अगर बात करें तो यकीनन उन्होंने ऐसा कहा ज़रूर (वैसे जिस दया-याचिका में यह कहा गया, वह 14 नवंबर 1911 की नहीं, 1913 की है। यह ‘भूल’ जान कर की गई, ताकि इंटरनेट पर ढूँढ़ने वालों को असली दस्तावेज मिलने में परेशानी हो, या फिर मात्र एक लिपिकीय/टाइपिंग की गलती है, वह अलग ही मसला होगा), लेकिन जिस पत्र में उन्होंने यह कहा, यदि उसे पूरा पढ़ा जाए तो हम पाएँगे कि यह ‘दया-याचिका’ कम, और राजनीतिक/मानवाधिकारों का माँग-पत्र अधिक है।

इसमें वे अंग्रेज सरकार के चरणों में नहीं गिर जाते। विनम्र लेकिन स्पष्ट शब्दों में अपने साथ हो रहे भेदभाव और अत्याचार, मसलन ‘विशेष कैदियों’ की श्रेणी के लाभ न देना लेकिन उसमें उल्लिखित प्रतिबंध अवश्य लगाना, कोल्हू में जोत कर काम कराना, उसी जेल में बंद दुर्दांत अपराधियों को सेल के बाहर खुली हवा में जाने का समय देना लेकिन सावरकर को न देना, का उल्लेख करते हुए वह सरकार पर न्यायपूर्ण तरीके से जेल प्रशासन चलाने का दबाव बनाते हैं। केवल और केवल अंत में जाकर वह खुद को ‘भटका हुआ बेटा’ बताते हुए सरकार को आश्वासन देते हैं कि यदि सरकार उन्हें रिहा कर दे तो वह सरकार के प्रति वफादार रहेंगे।

लेकिन क्या महज़ इन शब्दों के आधार पर उन्हें कायर या गद्दार करार दिया जा सकता है? सावरकर के जीवनीकार जेडी जोगलेकर के अनुसार, “क्या लेनिन ने पूँजीपति जर्मन राजा कैसर विल्हेल्म का सील ट्रेन (में बैठकर जर्मनी से गुज़र कर रूस पहुँचने) का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया था (जबकि लेनिन पूँजीपतियों से घृणा करता था)? उस ट्रेन में बैठकर रूस पहुँचे लेनिन ने बोल्शेविक पार्टी का नेतृत्व किया और सत्ता हासिल की। स्टालिन ने अपने परमशत्रु हिटलर के साथ समझौता किया। जो लेनिन और स्टालिन के मामले में प्रशंसा-योग्य है, वह सावरकर के मामले में निंदनीय हो जाता है। पीलिया की आँख से सब कुछ पीला ही दिखेगा।”

देश के अंदर भी उदाहरण हैं। शिवाजी ने भी बंदी बनाए जाने पर नम्रतापूर्ण पत्र लिखकर कैद से आजादी पाई, और उसके बाद मुगलों और आदिलशाही सल्तनत के पाँव भी उखाड़े, गर्दनें भी उड़ाईं। उसी तरह सावरकर ने भी अंततः आज़ाद होने के बाद अंग्रेज़ों की गुलामी नहीं की, हिन्दू महासभा का नेतृत्व किया। साक्ष्य अगर और चाहिए, तो और भी हैं। जिस अंग्रेज अफ़सर क्रेडॉक ने उनकी याचिका का विश्लेषण किया, उसने लिखा, ‘सावरकर कितना बड़ा खतरा होगा, इसका मूल्यांकन उसके जेल के अंदर व्यवहार से अधिक इस पर होगा कि बाहर क्या परिस्थितियाँ हैं। और बाहर 10-15-20 साल में क्या परिस्थितियाँ होंगी, कहा नहीं जा सकता।’

अब बाकी आरोपों को भी देखें तो वह भी पूरी तरह संदर्भ से परे तथ्यों को पकड़कर ‘फेक न्यूज़’ पढ़ाने से अलग कुछ नहीं है। गाँधी जी की हत्या में अगर ‘नामजद’ होने भर से सावरकर इतने बुरे हो गए तो सरकार उन्हें 1 महीने की भी सज़ा क्यों नहीं दिला पाई? क्यों गाँधी की हत्या के 18 साल बाद हुई सावरकर की मृत्यु के बाद भी उन्होंने सावरकर की स्मृति में डाक टिकट जारी किया, और उनकी स्मृति में ₹11,000 दान किए? हिन्दुओं को ‘मिलिटराइज़’ करने की जहाँ तक बात है तो ‘अहिंसक’ हिन्दुओं का नोआखली, कलकत्ता और पंजाब में जो हाल हुआ, उसे देखते हुए कहाँ तक गलत थे सावरकर? अपने सम्पूर्ण लेखन में सावरकर यह बार-बार साफ करते हैं कि वह हिन्दुओं को आत्मरक्षा में सक्षम होने का आह्वाहन कर रहे हैं, अन्य समुदायों के प्रति हिंसा शुरू करने का नहीं।

‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का समर्थन करने या न करने की जहाँ तक बात है तो उनकी किताब ‘हिन्दू राष्ट्र दर्शन‘ में वह साफ़ लिखते हैं कि उन्होंने समर्थन इसलिए नहीं किया क्योंकि कॉन्ग्रेस यह आश्वासन देने में नाकाम रही कि जिन्ना की विभाजन की माँग किसी भी कीमत पर नहीं मानी जाएगी, और किसी प्रान्त को अंग्रेजों के जाने के बाद भारतीय संघ से पृथक होने का अधिकार नहीं दिया जाएगा। आज अगर हम विभाजन को भूल मानते हैं, तो उसका विरोध करने की दूरदृष्टि रखना ही क्या सावरकर का अपराध था?

सावरकर का गलत चित्रण बिलकुल गलत है, लेकिन आप कर क्या लेंगे?

अब सवाल यह है कि कॉन्ग्रेस अगर सावरकर का गलत चित्रण करने पर उतारू है ही तो पहले तो ऐसा क्यों, और दूसरा इसमें किया क्या जा सकता है।

तो पहले सवाल का जवाब तो एकदम साफ़ है- सावरकर से दुश्मनी केवल इसलिए है क्योंकि वह हिंदूवादी थे, और कॉन्ग्रेस की राजनीति मुस्लिम तुष्टिकरण की है। हिन्दूफ़ोबिया इनकी वैचारिक नसों में है, तो इसलिए हिन्दू हितों की बात करने वाले को खलनायक या कमज़ोर दिखाना तो हिन्दूफ़ोबिया की तार्किक परिणति होगा ही।

दूसरा सवाल यह कि इसके लिए किया क्या जा सकता है। तो इसका पहला जवाब ‘कॉन्ग्रेस हटाओ’ हास्यास्पद रूप से नाकाफ़ी है। यह नैरेटिव (कथानक) की लड़ाई है, और इसमें दिल्ली (या किसी भी प्रदेश की राजधानी) में बैठा शासनिक मुखिया का हस्तक्षेप अविश्वसनीय रूप से सीमित होता है। आज कम्युनिस्टों के मुट्ठी भर विधायक और साँसद होने के बावजूद उनका फ़र्ज़ी कथानक अकादमिक सत्य है, और सच हमारे साथ होते हुए भी हिन्दू जदुनाथ सरकार-आरसी मजूमदार के बाद एक अदद इतिहासकार और सीताराम गोयल के बाद एक पठनीय ‘राइट विंग बुद्धिजीवी’ के लिए तरस रहे हैं।

जैसा कि संजीव सान्याल ने ऊपर कहा, यह सवाल कहानी सुनाने का है, सत्ता की गद्दी कब्जियाने का नहीं। तो बेहतर होगा हिन्दू हर बात में राजसत्ता का मुँह देखने की बजाय खुद अपनी कहानियाँ पहले जानने और फिर सुनाने में समय, धन और श्रम का निवेश करें। जब तक यह नहीं होगा, परिवर्तनशील सत्ता के साथ सावरकर जैसे हिंदूवादियों का अपमान बदस्तूर जारी रहेगा, हम इस पर आउटरेज करते रहेंगे, आप फेसबुक पर ‘एंग्री रियेक्ट’ करते रहेंगे, लेकिन बदलेगा कुछ भी नहीं। एक तिनका भी नहीं।