Home Blog Page 5676

हम्पी के पवित्र स्थलों पर तोड़फोड़, पुलिस ने बताया ‘खजाना खोजी’ बदमाशों की करतूत

बदमाशों की नज़र अब ऐसे प्राचीन भारतीय स्थलों पर है, जिनका हिन्दू समाज में ख़ासा महत्व है। कर्नाटक से आई ख़बर के मुताबिक़ हम्पी के नजदीक स्थित नव वृन्दावन में तोड़फोड़ की गई है। कभी हम्पी को विश्व के सबसे सुन्दर और समृद्ध नगरों में से एक गिना जाता था। कोप्पल जिले में ये घटना तुंगभद्रा नदी के किनारे स्थित माधव परंपरा के अनुयायियों द्वारा पूजित पवित्र स्थल पर घटी। गुरुवार की सुबह (जुलाई 18, 2019) की ये तोड़फोड़ आषाढ़ एकादशी जैसे संवेदनशील मौके पर की गई, जब वहाँ कई श्रद्धालु जुटते हैं।

नव वृन्दावन में माधव परंपरा के 9 संतों की समाधियाँ हैं। इस परंपरा के मानने वाले लोग ब्राह्मण हैं, जो तमिलनाडु और कर्नाटक से लेकर गोवा तक बसे हुए हैं। पुलिस का कहना है कि इस क्षेत्र में कुछ ऐसे बदमाश सक्रिय हैं, जो पुराने खजानों की खोज में पुरातन स्थलों को निशाना बनाते हैं।

मौसम की स्थिति को देखते हुए अनेगुंदी से बल्लारी तक सिर्फ़ नाव से ही पहुँचा जा सकता है। चूँकि यह स्थल तुंगभद्रा नदी में स्थित एक द्वीप पर है, यहाँ तक पहुँचने व वापस आने के लिए प्रशासन द्वारा नाव चलाया जाता है। यह सेवा शाम 4 बजते ही समाप्त कर दी जाती है। ऐसे में, पुलिस स्थानीय लोगों से पूछताछ कर ये जानने की कोशिश कर रही है कि क्या उन्होंने संदिग्ध लोगों को देखा था?

पुलिस ने बताया कि बदमाशों ने पवित्र स्थल की खुदाई व तोड़फोड़ से पहले कुछ कर्मकांड किया था, जिससे साफ़ होता है कि यह कृत्य ‘खजाना खोजी’ अपराधियों का ही है। दक्षिण भारत के पराक्रमी राजा कृष्णदेवराय के खजाने की खोज में ऐसी कई वारदातें सामने आई हैं। पाँच महीने पहले भी कुछ बदमाशों ने हम्पी में प्राचीन स्थलों को नुकसान पहुँचाया था।

पटना: समान काम के लिए समान वेतन मॉंग रहे शिक्षकों पर बरसाई लाठियाँ

बिहार में संविदा शिक्षकों का आंदोलन जारी है। समान काम के लिए समान वेतन माँग रहे शिक्षकों पर गुरुवार को राजधानी पटना में पुलिस ने लाठियाँ बरसाई।

विधानसभा के पास प्रदर्शन कर रहे संविदा शिक्षकों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने न सिर्फ़ आँसू गैस के गोले छोड़े, बल्कि वाटर कैनन का भी इस्तेमाल किया। इसके बाद शिक्षकों पर लाठियाँ भाजी गईं। उनकी जम कर पिटाई की गई।

पुलिस की कार्रवाई में कई शिक्षक घायल हुए। उग्र शिक्षकों ने ट्रैफिक जाम किया। ऐसा पहली बार हैं, जब शिक्षकों के 18 संगठन एक साथ सरकार के ख़िलाफ़ एकजुट हुए हैं। शिक्षकों ने गर्दनीबाग़ क्षेत्र का मेन गेट तोड़ डाला। बिहार में नियमित शिक्षकों को संविदा पर बहाल शिक्षकों से ज्यादा वेतन मिलता है। संविदा पर बहाल शिक्षकों की माँग है कि उन्हें भी उतना ही वेतन मिले, जितना नियमित शिक्षकों को दिया जाता है।

‘समान काम-समान वेतन’ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी इन शिक्षकों के ख़िलाफ़ ही फ़ैसला सुनाया था। बिहार के सभी जिलों से शिक्षक विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने के लिए पटना पहुँचे थे।

कर्नाटक: विश्वासमत पर नहीं हुई वोटिंग, सदन में धरने पर बैठे बीजेपी विधायक

कर्नाटक में चल रहे सियासी ड्रामे का खात्मा होता नहीं दिख रहा है। एचडी कुमारस्वामी की अगुआई वाली कॉन्ग्रेस-जदएस सरकार के विश्वासमत प्रस्ताव पर गुरुवार को मतदान के बिना ही विधानसभा अध्यक्ष रमेश कुमार ने सदन की कार्यवाही कल तक के लिए स्थगित कर दी। इसके विरोध में बीजेपी विधायक सदन में ही धरने पर बैठ गए हैं। उन्होंने पूरी रात धरने पर बैठने का ऐलान किया है।

विधायकों के एक वर्ग के बागी होने के कारण 14 महीने पुरानी कॉन्ग्रेस-जदएस सरकार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। आज सत्ताधारी गठबंधन के 19 विधायक गैरहाजिर रहे। इनमें मुंबई में डटे वे 15 बागी विधायक भी शामिल हैं, जिनके लिए बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि उन्हें सदन की कार्यवाही में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

बागी विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष पर उनके इस्तीफे जान-बूझकर स्वीकार नहीं करने का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सदन में कॉन्ग्रेस विधायक श्रीमंत पाटिल की गैर हाजिरी को लेकर भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोंक-झोंक हुई है। सूत्रों के अनुसार पाटिल को मुंबई के एक निजी अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया है। बुधवार को सीने में दर्द और सांस लेने में शिकायत के बाद वे मुंबई के लिए रवाना हो गए थे। लेकिन, कॉन्ग्रेस ने बेंगलुरू पुलिस को एक पत्र भेज उन्हें अगवा करने का आरोप बीजेपी पर लगाया है।

इससे पहले विश्वासमत के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस नेता सिद्धरमैया ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए बहुमत परीक्षण टालने की मॉंग की। वहीं, सत्ताधारी दल का संख्या बल कम होने के कारण कुमारस्वामी ने एक पंक्ति का प्रस्ताव पेश किया जिसमें कहा गया था कि सदन ने उनके नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल में विश्वास जताया।

जैसे ही प्रस्ताव लाया गया विपक्षी भाजपा नेता बीएस येद्दियुरप्पा खड़े हो गए और उन्होंने कहा कि विश्वास मत की प्रक्रिया एक ही दिन में पूरी होनी चाहिए। भाजपा इस बात को लेकर आशंकित है कि सत्तारूढ़ गठबंधन मतदान होने से पहले संख्या बल को मजबूत करने के अंतिम प्रयास में जितना संभव हो सके उतना समय बिताने के लिए बहस को लंबा खींचने की कोशिश करेगा।

बहस के दौरान ही बीजेपी के एक प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल वजुभाई वाला से मुलाकात कर मामले में हस्तक्षेप का अनुरोध किया था। इसके बाद राज्यपाल ने स्पीकर को पत्र लिखकर गुरुवार को ही विश्वासमत परीक्षण कराने पर विचार करने को कहा था। इसे लेकर बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बीएस येदियुरप्पा ने कहा कि चाहे रात के 12 ही क्यों न बज जाएँ, लेकिन विश्वासमत का परीक्षण आज ही होना चाहिए। इन सबके बावजूद स्पीकर रमेश कुमार ने बिना विश्वासमत परीक्षण कराए विधानसभा की कार्यवाही शुक्रवार तक के लिए स्थगित कर दी।

बीजेपी विधायकों ने स्पीकर से राज्यपाल के पत्र का जवाब देने की मॉंग की है। वहीं, कॉन्ग्रेस विधायक एचके पाटिल ने बहस में भाग लेते हुए कहा कि संविधान के मुताबिक राज्यपाल सदन की कार्यवाही में दखल नहीं दे सकते।

BBC और The Print को चाहिए खूब सारा ‘सेक्स’, वामपंथी करेंगे आपस में ही प्रेम

हर गली-मोहल्ले-कस्बे में लगे हाशमी दवाखाना वालों के इश्तिहार देखकर लगता है कि इस देश की सबसे बड़ी समस्या वामपंथ, आतंकवाद या फिर गरीबी नहीं बल्कि मर्दाना कमजोरी है। लेकिन हाशमी दवाखाने के इश्तिहारों को अब गली मोहल्ले से अपना पता बदल लेना चाहिए। अब हाशमी दवाखाने का पता तो छोड़िए, उनका धंधा भी मंदा होने के कगार पर है, क्योंकि BBC जैसा टक्कर का प्रतिद्वंद्वी मैदान में उतर चुका है और वो सुनिश्चित कर रहा है कि देश से मर्दाना कमजोरी को जड़ से मिटा दिया जाए। BBC का छोटा भाई The Print भी कम नहीं है। वो भी अनुसरण करते हुए एक कदम आगे बढ़ चुका है।

इस समस्या (मर्दाना कमजोरी) की जिम्मेदारी BBC ने अपने कन्धों पर ले ली है। हालात ये हैं कि गिरती लोकप्रियता के कारण BBC हाशमी दवाखाना के विज्ञापनों की तरह ही अपने होमपेज पर सेक्स ही सेक्स लिखते हुए घूम रहा है। हाशमी दवाखाना वालों के मार्केट पर इससे जरूर गहरी चोट लग सकती है। BBC और The Print एक दिन में इतनी बार “सेक्स” बेच रहे हैं कि लोगों को यकीन नहीं हो रहा है कि Jio ने वाकई में पॉर्न वेबसाइट्स को बंद कर दिया है क्योंकि उनका मानना है कि BBC और The Print वेबसाइट्स तो आराम से चल जाती हैं।

BBC पर लोग क्या पढ़ने जाते हैं, इस चित्र के माध्यम से समझें –

अंग्रजों द्वारा त्यागी गई शौच से जन्मे इस संस्थान यानी, BBC ने इस दौड़ में देश के युवाओं की मदद भी की है। देश का युवा तड़प रहा था कि सरकार आए दिन अश्लील वेबसाइट्स को ब्लॉक कर दे रही है। इसके बाद सबसे बड़ा कुठाराघात देश के युवा की भावनाओं पर रिलायंस Jio ने ‘गन्दी वेबसाइट्स’ बंद कर के किया। देश के युवा की भावनाओं पर यह दोतरफा हमला इतना मजबूत था कि हर कोई निराश था।

लेकिन पत्रकारिता की परिभाषा रचने वाले BBC ने युवाओं का मान रखा और अपनी वेबसाइट के चप्पे-चप्पे को सेक्स ही सेक्स, भरपूर सेक्स से लबरेज कर दिया। मनोहर कहानियाँ पढ़ने के शौक़ीन लोगों को पहले पता रहता था कि उन्हें इससे सम्बंधित ‘सामग्री’ किस चौराहे, रेलवे स्टेशन और कबाड़ी मार्केट में जाकर खरीदनी है। लेकिन पत्रकारिता के नाम पर भी यही सब धड़ल्ले से कर पाने का हौंसला BBC और The Print ही जुटा पाए हैं।

BBC को अपनी सेक्स ही सेक्स से लबरेज ख़बरों का प्रिंट निकालकर उसे समोसा पैक करने वालों को गिफ्ट कर देना चाहिए क्योंकि “Why should TOI have all the fun”

यह भी पढ़ें: नेहरूघाटी सभ्यता में पला BBC मोदी विरोध में बीमा और इलाज का अंतर भूला

जिस तरह से सूर्यवंशम फिल्म में हीरा ठाकुर की बस की टिकट बेचने के लिए अनुपम खेर और कादर खान ने बस को ‘सुपर डीलक्स’ बस बना कर टिकट बेचा था, उसी तरह से BBC खबर बेचने के लिए सेक्स ही सेक्स बेच रहा है। ख़ास बात ये है कि पत्रकारिता के इस नेहरू-स्तम्भ यानी, BBC का मुकाबला अब मशहूर सॉफ्ट पॉर्न वेबसाइट लाइम्स ग्रुप के साथ नहीं बल्कि हाशमी दवाखाने के साथ है।

‘ट्रैफिक’ के लिए हीरा ठाकुर द्वारा अपनाई गई वह कालजयी तरकीब जिससे BBC को प्रेरणा मिली है –

BBC आज के समय में पत्रकारिता के नाम पर तैमूर के डायपर से लेकर हिटलर के लिंग की नाप-छाप करने वाले लोगों की ही सुपरलेटिव डिग्री से ज्यादा कुछ नहीं है। आखिर क्या कारण है कि अपने अन्न का पहला हिस्सा नेहरू के लिए रखने वाला जर्नलिज़्म का ये नाम आज ‘ट्रैफिक’ और TRP के लिए सेक्स बेचने को मजबूर हो गया है? इससे अच्छा तो रवीश कुमार का प्राइम टाइम शो है, जो सिर्फ पतंजलि के विज्ञापनों पर जिन्दा है। लेकिन मैं यह उम्मीद करते हुए चल रहा हूँ कि जल्द ही NDTV भी TRP के लिए ट्रोल्स की जगह सनी लियोनी पर आधरित ‘विशेष प्रोग्राम’ चलाना शुरू करेगा। क्योंकि देश में डर का माहौल तो वैसे भी है ही।

The Print और सेक्स का रिश्ता बहुत पुराना है –

द प्रिंट नामक कथित न्यूज़ वेबसाइट और सेक्स का सम्बन्ध वैसा ही है जैसे एक वामपंथी का क्रांति से होता है। यानी, अगर शब्दकोष से क्रांति शब्द को हटा दिया जाए तो वह बिना पानी की मछली जैसा विचलित होने लगता है। वो तड़पने लगता है। इसी तरह द प्रिंट लोकसभा चुनाव से पहले भी यह कारनामा करते हुए देखा गया था।
इस बार द प्रिंट ने सोशल मीडिया एप्प के कंधे पर बन्दूक रखकर अपनी मानसिकता का जहर उड़ेला है।

ट्रैफिक और कंटेंट की कमी से जूझ रहे द प्रिंट की रिपोर्ट कहती है कि लोगों की सेक्स लाइफ पर राजनीति का असर देखने को मिल रहा है। लगे हाथ द प्रिंट ने बताया कि दिल्ली के निवासी जो पेशे से वकील हैं, का कहना है कि “I don’t f**k fascists” यानी, “मैं किसी फासिस्ट के साथ संभोग नहीं करूँगा।”

इसके साथ ही द प्रिंट ने एक पूरी रिसर्च बिठाकर अलग-अलग नामों के जरिए लोगों के सेक्स करने की प्राथमिकताओं को ‘Culture’ यानी संस्कृति की कैटेगरी में रखा है। जबकि लोगों की सेक्स की प्राथमिकताएँ उनके लाइफस्टाइल का हिस्सा होती हैं।

इसी लेख में यह भी बताया गया है कि वामपंथियों को फ़ासिस्ट पसंद नहीं हैं, लेकिन यह नहीं लिखा गया है कि क्या फ़ासिस्ट वामपंथियों से सेक्स करने के लिए मरे जा रहे हैं? क्या फासिस्ट हर वामपंथी को ‘कुंडी मत खरकाओ राजा, सीधा अंदर आओ राजा’ के सन्देश देते फिर रहे हैं?

इसी आर्टिकल में द प्रिंट किसी वीर मिश्रा नामक युवक से, जिसे समलैंगिक (Gay) बताया गया है, का भी प्रकरण जोड़ते हुए बताया है कि वीर मिश्रा डेटिंग एप्स पर ‘गौ-रक्षकों’ को देखकर हैरान था। वीर मिश्रा बताता है कि गौ-रक्षकों ने डेटिंग एप्स पर अपने परिचय में अपने गौरक्षक होने की बात लिखी थी। द प्रिंट ने वीर मिश्रा के हवाले से लिखा है कि समलैंगिकों की डेटिंग साइट पर भाजपा समर्थक भी थे।

प्रिंट की इस रिसर्च की पोल इसी बात से खुल जाती है कि LGBTQIA या धारा 377 पर फैसला भाजपा सरकार के कार्यकाल में ही आया है। दूसरी बात, प्रिंट को मिश्रा की बातों पर ही नहीं रुकना चाहिए। अगर ‘रिसर्च’ आर्टिकल लिख रहे हैं तो टिंडर पर शेखर गुप्ता (प्रिंट के फाउंडर) को पेड प्रोफ़ाइल बना कर देखना चाहिए कि वास्तव में ऐसे प्रोफ़ाइलों का प्रतिशत कितना है। सिर्फ किसी XYZ मिश्रा ने कहा और आपने मान लिया यह बात ज्यादा हैरान कर देने वाली है। साथ ही, द प्रिंट को समलैंगिक मिश्रा को यह जरूर याद दिलाना चाहिए कि मन में पूर्वग्रह पालना समलैंगिकों को शोभा नहीं देता क्योंकि उनकी कम्यूनिटी से बेहतर ये बातें कोई नहीं जानता। जिस सरकार ने फ़ैसले को न तो चुनौती दी, न संसद से फ़ैसला पलटा, उन्हें ऐसा कहना कि वो समलैंगिकों को देश से बाहर निकालना चाहते हैं, बेकार का लॉजिक है।

किसी भी व्यक्ति की सेक्सुअल प्रीफ्रेंस एकदम निजी मामला होता है। अखबारों के ‘वर-वधू चाहिए’ वाले पन्नों में यह दिख ही जाता है कि किस व्यक्ति को कैसी बहू या पति चाहिए। लेकिन इसके लिए एक पूरा मनगढंत लेख छापकर फर्जी के आँकड़ों को दर्शा कर यह साबित करने का प्रयास करना कि कौन वामपंथियों से और कौन राइट विन्गर्स से सेक्स करना चाहता है, एकदम निम्नस्तरीय पत्रकारिता को ही दर्शाता है।

यह भी पढ़ें: लोग नहीं चाहते कि नेहरूभक्त, गाँधीव्रता BBC अपने चक्रवर्ती सम्राट राहुल बाबा का बड्डे मनाए

हमारी राय :

हमारी राय यह है कि The Print और BBC को कम से कम पत्रकारिता के नाम पर सेक्स की खेती करने से बचना चाहिए। मनगढ़ंत साहित्य लिखने की यदि फिर भी रुचि हो तो, रेलवे स्टेशन के बाहर ऐसा पढ़ने की इच्छा रखने वालों को बहुत सारा सामान बेहद सस्ते दामों पर मिल जाता है। सूर्यवंशम फिल्म में भी हीरा ठाकुर ने कहा था कि जिस बस के टिकट बेचने के लिए वो एक महिला का इस्तेमाल कर रहे हैं, वह बस उसके बाबू जी के नाम पर है। हीरा ठाकुर से प्रेरणा लेते हुए BBC को भी यह स्मरण करना चाहिए कि इस BBC ने नेहरूघाटी सभ्यता का नमक खाया था और उसे इस तरह से सस्ती लोकप्रियता की आँधी में नहीं गँवा दिया जाना चाहिए। रीच आएँगी, जाएँगी लेकिन BBC को हाशमी दवाखाना का विकल्प बनने से बचना चाहिए।

सेक्स, सेक्स , सेक्स और सिर्फ सेक्स का मारक मजा उठाइए BBC पर –

उपरोक्त चित्र में BBC द्वारा पूछे गए सवाल के बाद ही शायद उसने खुद हाशमी दवाखाना बनने का निर्णय लिया है।


FaceApp: Privacy के इस नंगे नाच में 15 करोड़ लोगों के चेहरे व डिटेल्स का कोई माई-बाप नहीं

आजकल आपने फेसऐप का नाम ज़रूर सुना होगा। यह एक ऐसा एप्लीकेशन है, जिसके द्वारा आप अपने चेहरे में मनचाहा बदलाव कर ख़ुद को बदले हुए रूप में देख सकते हैं। आप गंजे होंगे तो कैसे दिखेंगे, आप बूढ़े होंगे तो कैसे दिखेंगे- यह ऐप सब कुछ बताता है। सिनेमा सेलेब्स से लेकर क्रिकेट खिलाड़ियों तक, न सिर्फ़ भारत बल्कि विदेश में भी लोग इस ऐप के दीवाने हो रहे हैं। इस एप्लीकेशन को एक रशियन कम्पनी ने डिजाइन किया है। अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ पोर्टल्स में इसे लेकर चिंता ज़ाहिर की जा चुकी है। चिंता का कारण है लोगों की प्राइवेसी। एक ऐसी विदेशी कम्पनी को आपके डिटेल्स मिल रहे हैं, जिसके साथ आपका कोई कागज़ी समझौता नहीं है।

सबसे पहले तथ्य की बात कर लेते हैं। आँकड़ों की मानें तो फेसऐप के पास 15 करोड़ लोगों के चेहरे, नाम व अन्य डिटेल्स हैं। उम्र वाली फ़िल्टर के लिए वायरल हो रहे इस ऐप के यूजर एग्रीमेंट की बात करें तो इसके पास ‘कभी न ख़त्म होने वाला’ और ‘जिसमें बदलाव न हो सके’, ऐसा लाइसेंस है। इस रॉयल्टी-फ्री लाइसेंस के मुताबिक़, यह ऍप्लिकेशन आपके डिटेल्स के साथ कुछ भी कर सकता है, उसका मनचाहा प्रयोग कर सकता है। सबसे बड़ी बात यह कि उससे जो कमाई होगी, आपको उसके रुपए भी नहीं मिलेंगे।

अब आते हैं भारत सरकार के ‘आधार’ की ओर। जब आधार कार्ड को तमाम सरकारी योजनाओं में मैंडेटरी किया गया था ताकि योजना का लाभ सही व्यक्ति तक पहुँचे, तब लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया था। ‘हम अपने बायोमेट्रिक डिटेल्स किसी को क्यों दें?’, ‘हमारी पुतलियों का विवरण लेकर सरकार न जाने क्या कर दे’, ‘सरकार को हमारे प्राइवेट डिटेल्स में दिलचस्पी है’, ‘हमारे इन डिटेल्स का ग़लत इस्तेमाल हुआ तो?’ जैसे कई सवाल पूछे गए थे। ये सवाल उन देश की सरकार से पूछे जा रहे थे, जो लगभग 130 करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। आधार कार्ड मंत्रियों से लेकर उच्चाधिकारियों तक के बने, लेकिन प्राइवेसी की चिंता कुछेक पत्रकारों व ज़रूरत से ज्यादा जागरूकता दिखाने वाले सेलेब्स को ही हुई।

आज जब फेसऐप इतना वायरल हो रहा है और लोगों को यह तक नहीं पता कि यह किस देश की कम्पनी है, इसके सर्वर कहाँ-कहाँ हैं, इसका मालिकाना हक़ किन-किन लोगों व कंपनियों के पास है और उनके डिटेल्स को लेकर यूजर एग्रीमेंट में क्या लिखा है- सभी कथित सामाजिक कार्यकर्ता गहरी नींद में हैं और सुसुप्त अवस्था में ध्यानमग्न हैं। जैसे ही सरकार जन-कल्याणकारी योजनाओं में ग़रीबों, मजदूरों व किसानों को लाभ पहुँचाने के लिए आधार के उपयोग पर बात करेगी, ये सभी लग जाएँगे। आधार से देश को करोड़ों की बचत हुई है और योजनाओं का लाभ सही व्यक्ति तक पहुँचा है, केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने हाल में में संसद में अपना आधार कार्ड दिखाते हुए ये बातें समझाई थीं।

फेसऐप का हक़ रखने वाली कम्पनियाँ मेटाडाटा को छाँट कर अलग रख रही हैं। ‘द वर्ज’ के अनुसार, ऐसा कई अन्य सोशल ऐप्स व अन्य ऐप्स भी कर रहे हैं लेकिन फेसऐप का रुख ज्यादा आक्रामक हो सकता है। विशेषज्ञों ने इस ओर ध्यान दिलाया है कि फेसऐप तो डिवाइस में रख कर भी उन फोटोज को फ़िल्टर कर सकता है जिसे यूजर द्वारा चुना गया हो, फिर भी उन फोटोज को सर्वर पर क्यों अपलोड किया जाता है? इसका मतलब है कि कम्पनी उन फोटोज को अपने सर्वर में सुरक्षित रख रही है। फेसऐप का इस बारे में क्या कहना है? कम्पनी का कहना है कि यूजर के निवेदन पर उनसे जुड़ा डाटा हटाया जा सकता है।

कम्पनी का कहना है कि यूजर एक प्रक्रिया के तहत निवेदन कर सकता है कि उससे जुड़े डाटा को हटा दिया जाए। लेकिन साथ ही कम्पनी यह भी कहती है कि अभी टीम ‘ओवरलोडेड’ है। और सबसे बड़ी बात कि साइबर छेड़खानी करने वालों का अड्डा बन चुके रूस के एप्पलीकेशन पर विश्वास करना मुश्किल है क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में जिस तरह से रूसी साइबर माफियाओं, हैकरों द्वारा छेड़खानी की गई, उससे जुड़े कई मुक़दमें यूएसए की अदालतों में चल रहे हैं और वहाँ की जाँच एजेंसियाँ भी सकते में हैं। कम्पनी ने हालाँकि यह भी दावा किया है कि डाटा को रूस नहीं भेजा जा रहा है।

जबकि ‘टर्म्स एंड कंडीशन’ वाले कॉलम को इस तरह की भाषा में लिखा जाता है कि यूजर बिना समाय गँवाए उसे टिक कर के आगे बढ़ जाए। उसमें साफ़-साफ़ लिखा है कि जहाँ कम्पनी की फैसिलिटी हो वहाँ पर डाटा ट्रांसफर किया जा सकता है। कहाँ पर फैसिलिटी है? रूस में? उस सेक्शन में उनका पता भी रूस वाला ही है। एक और बड़ी बात यह भी है कि अधिकतर मामलों में फेसऐप को यूजर सिर्फ़ एक फोटो की जगह पूरी गैलरी एक्सेस करने की अनुमति दे देते हैं। गैलरी में तो आपके और आपके परिजनों व मित्रों के कई फोटोज होते हैं? इससे फ़र्क़ नहीं भी पड़ता तो आपके बैंक डिटेल्स और आईडी कार्ड जैसी चीजों के स्क्रीनशॉट्स भी तो होते हैं।

अंत में, जो बातें ऊपर हिंदी में लिखी हैं, उसे अंग्रेजी में उसके ओरिजिनल शब्दों में देखिए। फेसऐप के टर्म्स में लिखा है:

आपके यूजर कंटेंट को कहीं भी किसी भी रूप में प्रयोग में लाया जा सकता है

इसीलिए जो चीजें भारतीय कंपनियों के मालिकाना हक़ में है, उससे जुड़े विवाद के लिए आप अदालत जा सकते हैं। लेकिन, विदेशी कंपनियों का मालिकाना हक वाले ऐप्स (जिनका सर्वर भी भारत में नहीं है) से जुड़े विवाद में आप कहाँ जाएँगे? अगर भारत में इसे प्रतिबंधित कर दिया जाए, गूगल इसे प्ले स्टोर से हटा डी- फिर भी यह उपलब्ध रहेंगी और लोग इसे डाउनलोड करने में सक्षम रहेंगे। इसीलिए, कम से कम ‘प्राइवेसी’ वाले टर्म्स ज़रूर पढ़ लें। और हाँ, भारत सरकार के ख़िलाफ़ आधार के विरोध में मोर्चा खोलने वाले लोगों से जरूर पूछें कि फेसऐप को लेकर उनकी चिंता क्या है?

बाकी आधार और फेसऐप में अंतर है। आधार जन-कल्याण के लिए हैं, फेसऐप मनोरंजन के लिए। आधार के डाटा की ज़िम्मेदारी भारत सरकार के पास है जबकि फेसऐप का मालिकाना हक़ रूस की एक प्राइवेट कम्पनी के पास। आधार में आप जब चाहें तब अपने विवरण में बदलाव कर सकते हैं (सही बदलाव), फेसऐप में आपका डाटा के एक बार सर्वर पर जाने के बाद आपको पता ही नहीं चलता कि वह डिलीट हुआ भी या नहीं। आधार से सम्बंधित शिकायतों के निवारण के लिए स्थानीय से लेकर उच्च-न्यायिक स्तर तक कई सुविधाएँ हैं, जबकि फेसऐप के स्तर पर कुछ गड़बड़ियाँ होती हैं तो आप शायद ही कुछ कर सकें। जिस मामले में अमेरिका कुछ न कर पाया हो, उस मामले में आप कहाँ हैं- ख़ुद सोचिए।

15 दिन में 4 गोल्ड मेडल: हिमा दास ने फिर लहराया जीत का परचम, किया देश का नाम रोशन

भारत की स्टार एथलीट हिमा दास का शानदार प्रदर्शन जारी है। उन्होंने पिछले 15 दिन में अपना चौथा गोल्ड मेडल जीतकर अपनी विलक्षण प्रतिभा का प्रदर्शन किया। महिलाओं की 200 मीटर रेस में हिमा ने चेक रिपब्लिक में चल रहे टबोर एथलेटिक्स मीट में बुधवार (17 जुलाई 2019) को एक और गोल्ड मेडल अपने नाम कर लिया।

आपको बता दें कि 19 साल की हिमा दास ने यह दौड़ मात्र 23.25 सेकंड में पूरी कर ली थी। वहीं, नेशनल रिकॉर्ड होल्डर मोहम्मद अनस ने भी 400 मीटर रेस में गोल्ड मेडल जीता है। उन्होंने 45.40 सेकंड में अपनी रेस पूरी की।

हाल ही में, हिमा दास ने असम में बाढ़ पीड़ितों को अपनी आधी सैलरी डोनेट कर दी थी और साथ ही अन्य सक्षम लोगों से मदद करने की अपील भी की थी। इस जीत के मौक़े पर सोशल मीडिया पर देशवासियों ने उन्हें अपने-अपने शब्दों में बधाईयाँ दीं।

हिमा दास ने इससे पहले तीन गोल्ड मेडल जीते, वो इस प्रकार हैं:

  • पहला गोल्ड मेडल: 2 जुलाई 2019 को हिमा ने पोजनान एथलेटिक्स ग्रांड प्रिक्स में 200 मीटर रेस में हिस्सा लिया था। उन्होंने 23.65 सेकंड में उस रेस को पूरा कर पहला गोल्ड मेडल जीता था।
  • दूसरा गोल्ड मेडल: 7 जुलाई 2019 को पोलैंड में कुटनो एथलेटिक्स मीट में 200 मीटर रेस को 23.97 सेकंड में पूरा कर दूसरा गोल्ड अपने नाम किया था।
  • तीसरा गोल्ड मेडल: 13 जुलाई को चेक रिपब्लिक में हुई क्लांदो मेमोरियल एथलेटिक्स में महिलाओं की 200 मीटर रेस को 23.43 सेकंड में पूरा कर तीसरा गोल्ड मेडल अपने जीता।

Fact Check: जाधव केस में शशि थरूर ने की थी सुषमा स्वराज की मदद?

क्या शशि थरूर ने कुलभूषण जाधव मामले में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ ड्राफ्ट तैयार करने में भारत की तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और इस मामले में भारत की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे की मदद की थी? यह प्रश्न आज इस वजह से उठा है, क्योंकि ABP न्यूज़ के एक पत्रकार ने
ऐसा दावा किया है। ABP न्यूज़ के सीनियर कोरेस्पोंडेंट आदेश रावल ने यह बात कही है।

आदेश रावल अपने ट्वीट में लिखते हैं –

दरअसल, ये ट्वीट बुधवार (जुलाई 18, 2019) को कुलभूषण जाधव मामले में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय को लेकर किया गया था। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने पाकिस्तान को कुलभूषण जाधव को काउंसलर एक्सेस मुहैया कराने के साथ-साथ उनकी फाँसी की सज़ा पर रोक लगा दी है। पाकिस्तान की सैन्य अदालत ने जाधव को मौत की सज़ा सुनाई थी। इंटरनेशनल कोर्ट ने इस निर्णय की समीक्षा करने का भी आदेश दिया।

पत्रकार आदेश रावल ने अपने ट्वीट में लिखा हमें शशि थरूर को भी धन्यवाद देना चाहिए, क्योंकि सुषमा स्वराज के मार्गदर्शन में उन्होंने शुरुआत में जाधव वाले मामले में भारत की तरफ से ड्राफ्ट तैयार किया था। आदेश रावल के मुताबिक़, इंटरनेशनल कोर्ट का जो भारत के पक्ष में निर्णय आया है, उसका क्रेडिट थरूर को भी जाता है। जबकि, यह पूरी तरह ग़लत है। अपने ट्वीट के जरिए आदेश रावल ने झूठ फैलाया है।

आपको बता दें कि इससे पहले भी अप्रैल 2017 में ऐसी ही ख़बर आई थी, जब कहा गया था कि कुलभूषण जाधव को फाँसी की सज़ा दिए जाने के विरोध में भारत द्वारा तैयार प्रस्ताव में तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने थरूर की मदद ली थी। जब सुषमा के सामने यह सवाल आया तो उन्होंने इसे मीडिया में प्लांट की गई ख़बर बताया था। उन्होंने कहा था कि ये ख़बर बिलकुल झूठी है और दुष्टतापूर्वक प्लांट की गई है। सुषमा स्वराज ने कहा था:

“भारतीय विदेश मंत्रालय में टैलेंट की कमी नहीं है। मुझे मेरे योग्य व सक्षम सचिवों का सहयोग हर विषय पर मिलता रहता है।”

लेखक साकेत सूर्येश ने एबीपी न्यूज़ के पत्रकार को डाँट पिलाते हुए झूठ न फैलाने की सलाह दी। उन्होंने सुषमा स्वराज के बयान का स्क्रीनशॉट लगाते हुए ट्वीट किया कि एक प्रमुख चैनल के पत्रकार को फेक न्यूज़ नहीं फैलाना चाहिए।

भाई-बहन के साथ डूबा 3 महीने का अर्जुन, तीनों एक ही चिता पर जले, पर साहेब हैं कि मानते नहीं

बिहार पर बाढ़ का कहर टूटने के बाद से ही डूब कर लोगों के मरने की लगातार खबरें आ रही हैं। इनमें ज्यादातर बच्चे हैं। इन बच्चों में 3 महीने का अर्जुन भी है। मंगलवार को बागमती की उपधारा में अपने भाई-बहन के साथ वह डूब कर मर गया।

अर्जुन के शव निकालने की तस्वीर मुझे मुजफ्फरपुर के मीनापुर प्रखंड के एक स्थानीय पत्रकार ने कल दोपहर में भेजी थी। रात को ऑफिस से घर पहुँचने के बाद जब आँखें मूंदे, दोनों हाथ ऊपर उठाए अर्जुन की तस्वीर देखी तो दहल गया। तब तक यह तस्वीर सोशल मीडिया में भी वायरल हो चुकी थी।

आज जब मुजफ्फरपुर के शिवाईपट्टी थाना के शीतलपट्टी गाँव के अर्जुन, उसके 10 वर्षीय भाई राजकुमार और 12 वर्षीय बहन ज्योति के डूब मरने की कहानी लिखने बैठा हूँ तो शब्द नहीं मिल रहे हैं। लेकिन, ‘सुशासन बाबू’ के अफसरों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सरकार को चौतरफा थू-थू से बचाने के लिए वे एक नई थ्योरी गढ़ने में लग गए हैं।

इसके मुताबिक अर्जुन और उसके भाई-बहन की मौत बाढ़ में डूबने से नहीं हुई, बल्कि उसकी माँ ने बच्चों के साथ आत्महत्या करने की कोशिश की। एनडीटीवी के मुताबिक अर्जुन की माँ रीना देवी के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज की गई है।

पति से हुआ विवाद तो पानी में बच्चों को फेंका

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक डीएम ने कहा है,”ग्रामीणों और रीना की 7 साल की बच्ची ने जो बताया उसके मुताबिक रीना देवी का अपने पति के साथ विवाद हुआ था। इसके बाद रीना ने बच्चों को पानी में फेंक दिया था। गाँव वालों ने जब देखा तो उन्होंने बच्चों और रीना देवी को पानी से बाहर निकाला। इस मामले में कोई मुआवजे का ऐलान नहीं किया गया है, क्योंकि यह एक अपराध का मामला है। इसका बाढ़ से कोई लेना-देना नहीं है। इसे हत्या करने का प्रयास माना जा सकता है।”

डीएम के इस दावे की चुगली स्थानीय अखबारों की रिपोर्ट करते हैं। प्रभात खबर ने 17 जुलाई को प्रकाशित रिपोर्ट में बताया है कि रीना देवी अपने चार बच्चों को लेकर मंगलवार की दोपहर नदी किनारे कपड़े धोने गई थी। इसी दौरान नहाते वक्त अपने तीन बच्चों को डूबते देख उन्हें बचाने के लिए अर्जुन के साथ नदी में छलॉंग लगा दी। ग्रामीणों ने रीना और उसकी आठ साल की बेटी राधा को बचा लिया। बाकी तीन के शव बरामद हुए। अर्जुन का शव सबसे आखिर में बरामद हुआ।

आप वीडियो में देख सकते हैं कि मछुआरों ने इन शवों को निकाला।

कहाँ थे गोताखोर?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि बाढ़ से प्रभावित इलाके में जब घंटों बच्चों के शव की तलाश की जा रही थी तो प्रशासन के गोताखोर कहॉं थे? उसका बचाव दल कहॉं था? यदि आप स्थानीय अखबारों पर नजर डालें तो पता चलेगा कि जिनकी डूबने से मौत हुई है, उनमें से ज्यादातर के शव स्थानीय लोगों ने ही अपनी जान जोखिम में डालकर तलाशे हैं। इनमें से कुछ के शव तो 48 घंटे बाद मिले। लेकिन, इसका जवाब देने के लिए कोई अधिकारी तैयार नहीं है। बिहार सरकार के आँकड़ों की ही माने तो 17 जुलाई की शाम छह बजे तक 67 लोगों की बाढ़ में मौत हो चुकी थी।

अर्जुन के पिता थे पंजाब में, फिर पत्नी से कैसे हुआ झगड़ा

प्रभात खबर की रिपोर्ट यह भी बताती है कि घटना के वक्त अर्जुन के पिता पंजाब में थे। घटना की खबर मिलने के बाद उन्होंने घर की ट्रेन पकड़ी। अब ऐसे में सवाल उठता है कि जब वे घर पर ही नहीं थे तो उनका अपनी पत्नी से विवाद कैसे हो गया? खबरों के मुताबिक यह पिता बच्चों की मौत से इतना टूट चुका है कि उनको मुखाग्नि देने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। अंत में तीनों बच्चों को एक ही चिता पर लिटा कर दादी ने अंतिम संस्कार की रस्म पूरी की।

प्रभावित 47 लाख, राहत शिविर 137

बिहार सरकार बाढ़ से प्रभावित अपनी जनता के लिए कितनी फिक्रमंद है उसका अंदाजा इन आँकड़ों से लगाइए। यह बिहार सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग का डाटा है जो उन्होंने खुद अपनी वेबसाइट पर अपलोड कर रखा है। बाढ़ से 12 जिलों की करीब 47 लाख की आबादी प्रभावित है। लेकिन, इनके लिए अब तक केवल 137 राहत शिविर और 1116 सामुदायिक रसोई ही खोले गए हैं। राहत शिविरों में रहने वालों की संख्या करीब 1.15 लाख है। मधुबनी जिले की करीब 3.5 लाख प्रभावित आबादी के लिए केवल 4 राहत शिविर हैं, तो शिवहर की 1.69 लाख प्रभावित आबादी के लिए केवल 7।

राहत और बचाव के काम में जुटे एमएसयू कार्यकर्ता

एमएसयू जैसे संगठनों के भरोसे राहत कार्य

छह दिन बाद भी राहत और बचाव का काम मिथिला स्टूडेंट्स यूनियन (एमएसयू), मानव कल्याण केंद्र जैसी संस्थाओं के भरोसे ही है। बाढ़ में खुद की परवाह नहीं करते हुए इन संगठनों के कार्यकर्ता राहत सामग्री लेकर पीड़ितों तक पहुॅंच रहे हैं। एमएसयू प्रभावित इलाकों में सामुदायिक रसोई भी चला रहा है।

सरकार बहादुर देगी छह हजार

सरकार बहादुर ने ऐलान कर दिया है कि पीड़ितों के खाते में छह हजार राहत के पहुॅंच जाएंगे। यह दूसरी बात है कि प्रभावित इलाकों में सैकड़ों ऐसे लोग मिल जाएँगे जिन्हें पिछली राहत भी अब तक नहीं मिली है। क्यूंकि, उनका हक़ नेताओं-अधिकारियों-ठेकेदारों के उसी गिरोह ने हड़प लिया, जो हर साल तटबंधों की मजबूती के नाम पर करीब 600 करोड़ रुपए का बजट डकार जाते हैं।

बाढ़ से बेहाल है असम और ब्रांड एम्बेस्डर प्रियंका चोपड़ा मदद की बजाए सिर्फ़ दुआएँ भेज रही हैं!

असम में इन दिनों बाढ़ के कारण बिहार जैसे हालात हैं। देश के कोने-कोने से लोग अपने सामर्थ्य अनुसार इन दोनों राज्यों में बाढ़ पीड़ितों को मदद पहुँचाने की कोशिश कर रहे हैं। इसी कड़ी में एक ओर जहाँ बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार ने असम बाढ़ पीड़ितों के लिए 2 करोड़ रुपए की मदद की है, वहीं 15 दिन में 4 गोल्ड जीतने वाली हिमा दास ने भी अपनी आधी सैलरी बाढ़ राहत कोष में दान दे दी। लेकिन इस बीच प्रियंका चोपड़ा जैसी सेलेब्रटी जिन्हें असम टूरिज्म ने अपनी ब्रांड एम्बेस्डर चुना, उनकी तरफ से कोई मदद अब तक नहीं आई है।

मीडिया खबरों की मानें तो असम में बाढ़ के कारण अब तक 15 से ज्यादा लोग अपनी जानें गँवा चुके हैं और इस आपदा के कारण इस समय 43 लाख जिंदगियाँ प्रभावित हैं। इतना ही नहीं, इस बाढ़ में काजीरंगा नेशनल पार्क के काफ़ी तादाद में जानवर भी मारे गए हैं, लेकिन फिर भी असम की ब्रांड एम्बेस्डर ने इस पर अब तक मदद के लिए हाथ आगे नहीं बढ़ाए हैं। हालाँकि, उन्होंने इस मुद्दे पर बात करने/ ट्वीट करने/ पोस्ट करने के अलावा सोशल मीडिया को अपने से जुड़ी अन्य जानकारियाँ देने के लिए खूब उपयोग किया।

इस दौरान प्रियंका ने ट्विटर पर अपने फोटो शूट की तस्वीरें अपलोड की, मैग्जीन में कवर पेज बनने पर थैंक यू कहा।

वैकेशन की छुट्टियों पर पति द्वारा खींची तस्वीरें शेयर की और दुती चंद को उनकी जीत के लिए शुभकामनाएँ भी दीं।

उन्होनें इस बीच अपने एक मेकओवर की वीडियो शेयर की और बताया कि वह 10 जून को लॉस एजेंल्स में बतौर ब्यूटीकॉन की अम्बेस्डर के रूप में आ रही हैं। जिसके बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने उन्हें आड़े हाथों ले लिया। इस वीडियो को शेयर करने के बाद लोग उन पर सवाल उठा रहे हैं और कह रहे हैं कि शायद वो भूल गई हैं कि वो असम टूरिज्म की ब्रांड एम्बेस्डर भी हैं। राज्य के प्रति उनकी चिंता कहाँ है?

13 तारीख को प्रियंका के इस पोस्ट के बाद लोगों की तीखी प्रतिक्रिया आई और असम की ब्रांड एम्बेस्डर को राज्य के लिए आखिरकार 16 जुलाई को एक ट्वीट लिखना पड़ा। लेकिन इस ट्वीट में भी उन्होंने केवल असम बाढ़ प्रभावित लोगों को ऐसा संदेश लिखा, जिसे पढ़कर सोशल मीडिया पर यूजर्स का गुस्सा भड़क उठा और उनकी पोस्ट पर लोग अपनी नाराजगी जताने लगे।

दरअसल, उन्होंने राज्य की ब्रांड एम्बैसडर होने के बावजूद पीड़ितों की मदद की बजाए, ट्विटर पर प्रार्थना संदेश के साथ लोगों को एक लिंक दिया और अनुरोध किया कि लोग प्रभावित लोगों की मदद के लिए वहाँ (लिंक पर) डोनेट करें।

इसे देखकर यूजर्स उन पर भड़के और उनसे कहा, “आप भूल रही हैं कि आप असम की ब्रांड एम्बेसडर हैं। बाढ़ प्रभावितों के लिए लोगों से मदद की गुहार वाला आपका ये ट्वीट बेहद शर्मनाक है। हमें ऐसे ब्रांड एम्बेस्डर नहीं चाहिए। बिलकुल निराशाजनक।”

उनके इस ट्वीट पर किसी ने उन्हें बताया कि उन लोगों को इन डोनेशन लिंक के बारे में पहले से पता है, लेकिन वो ये बताएँ कि उन्होंने बतौर ब्रांड एम्बेस्डर असम के लोगों के लिए कितने रुपए डोनेट किए?

तो किसी ने उनकी यूएस के बीच पर खींची गई तस्वीरों को आधार बनाकर उनके ऊपर तंज कसा। यूजर ने प्रियंका से पूछा, “सच में…!! आप जिंदा हैं..? हमें लगा आप यूएस के बीच पर अपनी छुट्टियों का आनंद ले रही हैं।”

कुछ लोग सोशल मीडिया पर प्रियंका के समर्थन में भी आए और कहा कि प्रियंका पर सवाल उठाने वाले लोग नहीं जानते कि वो देश में नहीं हैं। उन्होंने असम के लिए बहुत किया और उन पर ऐसे सवाल नहीं उठाने चाहिए।

यहाँ सोचने वाली बात है कि आज जब राज्य इतनी बड़ी आपदा से ग्रस्त है और लाखों लोग उससे प्रभावित हैं तो फिर क्या ऐसे में असम टूरिज्म की ब्रांड एम्बेस्डर होने के नाते वाकई प्रियंका को सिर्फ़ प्रार्थना संदेश के साथ लोगों को दान के लिए लिंक शेयर करना चाहिए? या फिर खुद बाढ़ पीड़ितों को राहत देने के लिए मदद पहुँचानी चाहिए जैसे अक्षय कुमार और हिमा दास ने किया।

गाँजा कारोबारी विक्की खान ने अपने गुंडों के साथ किया पुलिस पर हमला, MP में लूटे हथियार

मध्य प्रदेश में कानून व्यवस्था दिन पर दिन चरमराती जा रही है। हालत ये हो गई है कि अब वहाँ अपराधी पुलिसकर्मियों पर भी हमला करने से नहीं चूक रहे। हालिया मामला सतना जिले का है। जहाँ कुछ बदमाशों ने पुलिस टीम पर हमला कर दिया और उनके हथियार लेकर फरार हो गए। हमले में 2 पुलिस वालों को चोटें भी आई हैं, जिसके कारण उनका इलाज अस्पताल में चल रहा है।

खबरों के अनुसार, ये बदमाश सतना जिले के कोलगाँव थाना क्षेत्र में ट्रक चालकों से वसूली कर रहे थे, तभी ट्रक ड्राइवरों ने इसकी सूचना पुलिस को दी। जानकारी मिलने के बाद पुलिस वहाँ पहुँची तो पुलिस और बदमाशों के बीच झड़प हो गई और अपराधियों ने पुलिस वालों पर हमला कर दिया।

हमले में शामिल 7 अपराधी इस दौरान पुलिसकर्मियों से उनके हथियार, वायरलेस सेट समेत अन्य सामान लूटकर फरार हो गए। पुलिस वालों पर हुए इस हमले के बाद पूरे शहर में हड़कंप मचा हुआ है। हमले में दो पुलिस वालों (संदीप नामदेव और मनोज सिंह) के घायल होने की खबर है।

एसपी ने मामले पर एक्शन लेते हुए पूरे शहर में नाकाबंदी कर दी है। घटनास्थल पर आला अधिकारियों ने पहुँचकर घायल जवानों को बिरला अस्पताल में भर्ती करवाया। वरिष्ठ डॉक्टरों की मौजूदगी में घायल पुलिस वालों को उपचार दिया जा रहा है। जानकारी के मुताबिक मनोज सिंह की हालत गंभीर बताई जा रही है, जिस कारण उन्हें आईसीयू में भर्ती किया गया है।

इन अपराधियों की संख्या अभी तक 7 बताई जा रही है, जिसमें एक का नाम विक्की खान है। विक्की के बारे में बता दें कि वह शातिर बदमाश होने के साथ-साथ गाँजे का भी कारोबारी है। उसके और उसके साथियों की तलाश में पुलिस जगह-जगह छापेमारी कर रही है।

विक्की खान (तस्वीर साभार:सतना पत्रिका का फेसबुक पेज)