नेहरूघाटी सभ्यता में पला BBC मोदी विरोध में बीमा और इलाज का अंतर भूला

हमें TRP की रेस में भागते BBC से प्रभावित होना छोड़कर इन शोध को पढ़ना चाहिए। यह शोध हमें विज्ञान से परिचित करवाकर जागरूक बनाते हैं और बीमारी का कारण जानने में मदद करते हैं ताकि हम किसी बीमा योजना को बीमारी का कारण न समझ बैठें।

बिहार में पिछले 20 दिनों में दिमागी बुखार के कारण 350 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं, जिसमें अब तक करीब 120 बच्चों की मौत हो चुकी है। मेडिकल की शब्दावली में इसी दिमागी बुखार का नाम है- एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) जिसे सामान्य भाषा में ‘चमकी बुखार‘ कहा जा रहा है।

यह इंसेफलाइटिस एक भीषण महामारी बनाकर सामने आया है और यह एकदम वाजिब बात है कि देशभर में शायद हर व्यक्ति इस महामारी के आतंक से भयातीत है। लेकिन, हर किसी का भय मानवीय संवेदना से उपजा हो यह आवश्यक नहीं है। कम से कम नेहरुघाटी सभ्यता के मीडिया गिरोह तो इस बुखार से बिलकुल भी चिंतित नजर नहीं आते हैं।

इसका उदाहरण हम BBC जैसे मीडिया गिरोहों की आजकल की गतिविधियों से देख सकते हैं। एक ओर जब सभी लोग इंसेफलाइटिस सिंड्रोम, यानी चमकी बुखार से प्रभावित बच्चों के लिए प्रार्थना कर रहे हैं, ऐसे समय में BBC अपने अन्नदाताओं की स्वामिभक्ति में मशगूल है और उनके दिशानिर्देशों पर ही आगे बढ़ रहा है।

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यह कोई हवा में कही गई बात नहीं बल्कि BBC की ही पत्रकारिता का एक नमूना खुद इस तथ्य को साबित कर रहा है। ब्रिटिश उपनिवेशवाद द्वारा त्यागी गई विष्ठा BBC को अब नेहरूवियन उपनिवेशवाद का कर्ज चुकाना है इसलिए राष्ट्रवादी सरकार के समय में वह पीड़ित, उपेक्षित और शोषित महसूस करने लगा है।

BBC की आज की सनसनाती हुई हेडलाइन का कहना है – “मुज़फ्फ़रपुर बुखार: मोदी के आयुष्मान भारत से क्यों नहीं बच रही बच्चों की जान”

इस पूरे लेख में BBC ने यह साबित करने का प्रयास किया है कि किस प्रकार से मुज़फ्फरपुर में बुखार से हो रही बच्चों की मृत्यु लिए मोदी सरकार द्वारा शुरू की गई आयुष्मान भारत योजना है। देश के वंचित वर्ग के लोगों को लाभ पहुँचाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘प्रधानमंत्री जन आरोग्य’ योजना (आयुष्मान भारत योजना यानी ABY) की घोषणा की थी, जिसे गत वर्ष पंडित दीन दयाल उपाध्याय की जयंती पर 25 सितंबर से देशभर में लागू कर दिया गया था।

यह एक प्रकार की बीमा योजना है जो खासतौर से गरीब और वंचित वर्ग के लोगों को ध्यान में रखकर जारी की गई थी। सरकार का मकसद ABY के माध्यम से गरीब, उपेक्षित परिवार और शहरी गरीब लोगों के परिवारों को स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध कराना है। और यह बड़े स्तर पर लोगों को लाभ देने में सक्षम रही है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि यही बात BBC के लेख के आखिरी के पैराग्राफ में भी कही गई है। लेकिन जब BBC नामक संस्थान का पहला मकसद प्रोपगैंडा से लेकर झूठी ख़बरों द्वारा जनता के दिमाग को ब्रेनवॉश करना हो तब किसी भी प्रकार के तथ्य को बेहद सुविधाजनक तरीके से पेश करने में BBC जैसे मीडिया गिरोहों को महारत हासिल है। अपने झूठे नैरेटिव को जमीन देने के लिए BBC जैसे सूचना के स्थापित स्तम्भों के पास ऐसे मक्कार और धूर्त लोगों की भी कोई कमी नहीं है जो महज देश विरोधी और सरकार विरोधी प्रपंच स्थापित करने के लिए हर वक्त तैयार रहते हैं।

यदि देश में किसी भी प्रकार का कोई षड्यंत्र, प्रपंच, अराजकता और उन्माद फैलाना हो तो इस काम के लिए BBC जैसे मीडिया गिरोह किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार रहते हैं। हालाँकि यह कहना निंदनीय है, लेकिन इसी देश का अन्न खाकर यहीं के खिलाफ प्रपंच रचने के लिए अगर बाहरी लोग किसी गन्दी चीज में भी रुपए फेंक दें, तो यही षड्यंत्रकारी, दुराग्रही, कपटी और लगभग प्रगतिशील लोग उसे मुँह से उठाने के लिए तैयार बैठे रहते हैं।

BBC को इस तथ्य के साथ बेहद सावधानी से खिलवाड़ करते हुए देखा गया है कि आयुष्मान भारत योजना का लक्ष्य वही लोग हैं, जो कि मुज़फ्फरपुर में दिमागी बुखार के लिए इलाज पा रहे हैं। चमकी बुखार जैसी किसी महामारी को कोई सरकार खुद बुलावा नहीं देती है और ना ही ऐसे हादसों से खुश होती है। लेकिन जो भी प्रयास ऐसे समय में किए जा सकते हैं, राज्य और केंद्र सरकारें कर रही हैं।

लेकिन इस सबसे हटकर, BBC को पहले यह तथ्य समझ लेना आवश्यक है कि बीमा योजना का उद्देश्य डॉक्टरों की भर्ती या फिर समाज में स्वच्छता कार्यक्रम चलना नहीं होता है। ना ही लोगों के घर घर जाकर किसी बीमा योजना के अंतर्गत आप सफाई और संक्रमण से बचने वाले रसायन छिड़क सकते हैं। यह संभव भी नहीं हैं, ना PM मोदी के लिए यह संभव है और ना ही नेहरू के लिए यह सम्भव हो पाता कि स्वच्छता मिशन चलाने के बाद हर आदमी के घर में सुबह शौचालयों की निगरानी करें और वहाँ पानी डालें। सफाई और स्वच्छता के प्रति जागरूकता के लिए अलग से कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

हम इस सच्चाई को भी नहीं नकार सकते हैं कि भारत एक सीमित संसाधनों वाला देश है और इसे अपनी सीमाओं के भीतर ही हर प्रकार की त्रासदी से निपटना होता है। हम स्वीडन जैसे आर्थिक रूप से सशक्त देश नहीं हैं जहाँ पर नागरिकों को स्वास्थ्य सुरक्षा और रेगुलर हेल्थ चेकअप के मौलिक अधिकार प्राप्त हैं। हमारे संसाधन इतने सीमित हैं कि कुल बजट का 2.5% हिस्सा स्वास्थ्य के लिए झोंकना अभी हमारा लक्ष्य ही है और वर्तमान सरकार इस लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रही है। लेकिन हमारा देश का अभी भी एक बड़ा वर्ग कुपोषित है और यही कुपोषण चमकी बुखार जैसी बिमारियों का पहला कारण है, ना की आयुष्मान भारत योजना।

सरकार जो कर सकती है वो कर रही है। पीड़ितों को स्वास्थ्य से लेकर आर्थिक मदद दे रही है। आज ही बिहार बीजेपी ने घोषणा की है कि उनका हर सांसद चमकी पीड़ितों को 25 लाख रुपए की मदद देगा। हम देख चुके हैं कि इस बीच BBC ही नहीं बल्कि अजीत अंजुम से लेकर अंजना ओम कश्यप जैसे पत्रकारों ने इस बाजी मारने के खेल में एक-दूसरे को कड़ी टक्कर दी है। इन सभी मीडिया गिरोहों ने सिर्फ हल्ला करने और छपास के उद्देश्य से अपनी मौजूदगी दर्ज करने का पूरा प्रयास किया है। जाहिर सी बात है, हल्ला करने से भी दिमागी बुखार द्वारा गई जानें वापस नहीं आ सकती हैं। यह भी जरूरी है कि जनता प्रश्न करे। प्रश्न करने और सुरक्षा के लिए ही शासन और प्रशासन होते हैं। लेकिन कम से कम BBC जैसे मीडिया का लक्ष्य तो इस सबके बीच न्याय माँगना नहीं लगता है।

100 से ज्यादा बच्चों की जान चली जाना हर किसी के लिए एक भयावह घटना है, लेकिन ऐसे समय में तमाम घटनाक्रम को नजरअंदाज कर के एक ऐसी योजना पर जिम्मेदारी थोपना, जो कि उस सरकार द्वारा जारी की गई हो जिससे आप निरंतर दुखी रहने का प्रयत्न करते हैं, BBC की पत्रकारिता नहीं बल्कि पत्थरकारिता का ही सबूत है।

मूल विषय से भटककर आयुष्मान भारत योजना, जो कि मूल रूप से एक बीमा योजना है का पीछा करना तो यही सन्देश देता है कि BBC इस योजना में जवाहरलाल नेहरू या फिर राजीव गाँधी का नाम तलाशना चाहती है, शायद तभी वो अपने लेख में कोई तार्किक चर्चा चमकी बुखार को लेकर कर पाते, या फिर इस बारे में सोचते। लेकिन BBC का मर्म यही है कि यह जवाहरलाल नेहरू नहीं बल्कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर शुरू की गई एक बीमा योजना है। अगर यह ‘जवाहर आयुष्मान भारत’ योजना होती तो या फिर ‘राजीव गाँधी आयुष्मान योजना’ होती तो BBC अपने लेख और हेडलाइन में सम्बन्ध बैठा पाने में सक्षम होता।

अफवाह फ़ैलाने से ज्यादा हमें इस बुखार पर प्रकाशित शोध पढ़ने की आवश्यकता है

यह जानना आवश्यक है कि अभी तक अधिकतर बच्चों की मौतें हाइपोग्लाइसीमिया या लो ब्लड शुगर के कारण हुई हैं। डॉक्टर मौतों का कारण बताते हुए कहते हैं कि बिहार में दिमागी बुखार के 98% मरीज हाइपोग्लाइसीमिया से पीड़ित हैं। वर्ष 2014 में एक रिसर्च पेपर ‘एपिडेमियोलॉजी ऑफ एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम इन इंडिया: चेंजिंग पैराडाइम एंड इम्प्लिकेशन फॉर कंट्रोल’ में बिहार के मुजफ्फरपुर और वियतनाम के बाक गियाँग प्रांत के मामलों में समानता पाई गई थी।

दोनों ही जगहों पर पड़ोस में ही लीची के बाग थे। हमें TRP की रेस में भागते एंकर्स से प्रभावित होना छोड़कर इन शोध को पढ़ना चाहिए। यह शोध हमें विज्ञान से परिचित करवाकर जागरूक बनाते हैं और बीमारी का कारण जानने में मदद करते हैं ताकि हम किसी बीमा योजना को बीमारी का कारण न समझ बैठें।

इस अध्ययन में कहा गया था कि इस बीमारी का लीची या पर्यावरण में मौजूद किसी जहर के साथ संभावित संबंध को दर्ज किया जाना चाहिए। पशुओं पर किए गए परीक्षण में हाइपोग्लाइसीमिया होने का कारण लीची में मौजूद मेथिलीन साइक्लोप्रोपिल ग्लिसिन को पाया गया था। इस रिसर्च के अनुसार – “यह बहुत ही सामान्य है कि बच्चे जमीन पर गिरी हुई लीचियों को खाते होंगे और फिर बिना खाना खाए सो जाते होंगे। इसके बाद रात के समय लीची में मौजूद विषाक्त पदार्थ उनका ब्लड शुगर लेवल कम कर देता है और ये बच्चे सुबह के समय बेहोश हो जाते हैं।

इसमें बताया गया है कि जहाँ दिमागी बुखार के कारण पर अभी भी शोध किया जा रहा है तो वहीं हाइपोग्लाइसीमिक दिमागी बुखार कारण कुपोषण, गर्मी, बारिश की कमी और अंतड़ियों से संबंधित संक्रमण हो सकते हैं।

मुजफ्फरपुर में दिमागी बुखार का पहला मामला 1995 में सामने आया था। वहीं, पूर्वी यूपी में भी ऐसे मामले अक्सर सामने आते रहते हैं। इस बीमारी के फैलने का कोई खास पैमाना तो नहीं है लेकिन अत्यधिक गर्मी और बारिश की कमी के कारण अक्सर ऐसे मामले में बढ़ोतरी देखी गई है।

प्रभावित एरिया में कुपोषण बहुत ही अधिक है और कुपोषित बच्चे जल्दी संक्रमित होते हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, देश भर में होने वाली बच्चों की कुल मौतों में से 35% उत्तर प्रदेश और बिहार में होती हैं। ये सभी आँकड़े हैं। आँकड़े मृतकों के साथ न्याय नहीं करते हैं लेकिन हमें भविष्य के लिए सावधान होने की राय जरूर देते हैं।

संयम और जागरूकता समाज के हर तबके के लिए आवश्यक है। खासतौर से तब, जब हम सूचना का एक साधन हों। संवाद की गुंजाईश के बीच BBC जैसे झूठे नैरेटिव और प्रोपेगैंडा विकसित करने वाले लोग तर्क को खोखला करते आए हैं और अब बेनकाब होने पर बौखला भी रहे हैं। फिलहाल पीड़ितों के प्रति सहानुभूति रखिए और उम्मीद करिए कि जल्दी ही समाज इस दुःस्वप्न से उबरने में कामयाब होगा। BBC से यदि ना हो पाए तो कम से कम दिखावा तो करे कि उसकी मुख्य चिंता बीमा योजना नहीं बल्कि नीतियों का ठीक से अनुसरण ना किया जाना है वरना मौन भी तो अभिव्यक्ति है।

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