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2 से अधिक संतान वाले नहीं लड़ पाएँगे पंचायत चुनाव, उत्तराखंड में पास हुआ विधेयक

उत्तराखंड विधानसभा में बुधवार (जून 26, 2019) को एक विधेयक पारित हुआ, जिसके मुताबिक 2 से अधिक संतान वाले लोग अब पंचायत का चुनाव नहीं लड़ पाएँगे। इस विधेयक में पंचायत चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम योग्यता भी तय की गई है और इसे अब पंचायत चुनाव से पहले राज्यपाल की मंजूरी मिलने की उम्मीद है।

पंचायत राज अधिनियम 2016 (संशोधन) विधेयक के जरिए राज्य सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव जीतने के बाद यदि किसी प्रतिनिधि की तीसरी संतान होती है तो उसकी सदस्यता समाप्त हो जाएगी।

गौरतलब है कि उत्तराखंड में पंचायत के चुनाव इस वर्ष के अंत में होने हैं। ऐसे में इस विधेयक के पारित होने पर संसदीय कार्य मंत्री मदन कौशिश ने कहा है कि विधेयक का उद्देश्य परिवार नियोजन को बढ़ावा देना और उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता को निर्धारित करना है।

नवभारत टाइम्स में प्रकाशित खबर के मुताबिक उन्होंने बताया है कि इस विधेयक में सभी पंचायत सदस्यों की शैक्षणिक योग्यता निर्धारित की गई है। इसके अनुसार सामान्य वर्ग के लिए न्यूनतम योग्यता कक्षा 10 है जबकि अनसूचित जाति और अनसूचित जनजाति की श्रेणियों में पुरूषों के लिए न्यूनतम योग्यता कक्षा 8 और महिलाओं के लिए कक्षा 5 है।

साथ ही यह विधेयक किसी भी पंचायत सदस्य को एक साथ 2 पद संभालने की अनुमति नहीं देता है। कौशिक के मुताबिक यह एक सुधारवादी विधेयक है और इसे ज़मीनी निकायों में सुधार के प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए।

बता दें कि सदन में मंगलवार (जून 25, 2019) को यह बिल पेश होने के बाद, विपक्ष के विरोध के बीच सरकार ने इस विषय पर विधिक राय ली। बुधवार को विधायक केदार सिंह रावत ने संशोधन प्रस्ताव रखे, जिन्हें स्वीकार कर लिया गया, इसके बाद संशोधन विधेयक ध्वनिमत से पारित हुआ।

तबरेज का बदला! ओवैसी की पार्टी के नेता गाँव में दे रहे रेप की धमकी, मंदिर को किया क्षतिग्रस्त, 34 महिलाओं की FIR

एआईएमआईएम के कुछ लोगों द्वारा महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करने का मामला सामने आया है। बता दें कि एआईएमआईएम असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी है। मामला झारखण्ड के सरायकेला का है। यहाँ ओवैसी की पार्टी के नेताओं ने महिलाओं के साथ गाली-गलौज किया और फिर रेप करने की धमकी तक की। एआईएमआईएम के नेताओं ने लूटमार की भी कोशिश की। बता दें कि सरायकेला में ही तबरेज अंसारी नामक व्यक्ति की भीड़ द्वारा हत्या कर दी गई थी। गाँव की 34 महिलाओं ने थाने में आवेदन देकर शिकायत की है कि ओवैसी की पार्टी के लोगों ने उनके साथ गुंडागर्दी की। यह घटना सोमवार (जून 24, 2019) की है।

चारपहिया वाहनों से पहुँचे आरोपितों ने महिलाओं से लूटपाट की, रेप और बम से उड़ा देने की धमकी भी दी। वे लोग जिस वाहन से गाँव में पहुँचे थे, उस पर भी ओवैसी की पार्टी का बोर्ड लगा हुआ था। हमले के दौरान उन्होंने मंदिर के ध्वज को भी क्षतिग्रस्त कर दिया। पूरी घटना के दौरान वो लोग आफताब अहमद सिद्दीकी जिंदाबाद, असदुद्दीन ओवैसी जिंदाबाद के नारे भी लगाते रहे। महिलाओं ने अपनी शिकायत में कहा कि उनकी इस गुंडागर्दी से गाँव में दहशत का माहौल है और पुरुष घरों को छोड़ कर पलायन कर रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बीते 17 जून को हुई घटना के बाद ऐसे लोगों की गुंडागर्दी काफ़ी बढ़ गई है। क्षेत्र के बुद्धिजीवी भी इन पर लगाम लगाने की माँग कर रहे हैं। गाँव में पुरुषों की हालत यह है कि उन्हें छिप कर रहना पड़ रहा है। सोशल मीडिया पर कई भड़काऊ बातें फैलाई जा रही हैं और भीड़ द्वारा हत्या वाली वीडियो को एडिट कर-कर के शेयर किया जा रहा है। ओवैसी की पार्टी के नेताओं द्वारा बलात्कार की धमकी देना इसी क्रम में हुई एक घटना है। इसके अलावा लोगों में पुलिस की धर-पकड़ का भी ख़ौफ़ है।

स्थानीय भाजपा नेताओं ने कहा है कि दोनों पक्षों को भड़काया जा रहा है। भाजपा जिलाध्यक्ष ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि निर्दोषों पर कार्रवाई की जा रही है और दोषियों को नहीं पकड़ा जा रहा है। गाँव के लोगों की माँग है कि किसी भी बाहरी व्यक्ति को कुछ दिनों तक गाँव में प्रवेश करने की अनुमति न दी जाए। वहीं कॉन्ग्रेस के स्थानीय नेताओं ने कहा कि भीड़ द्वारा हत्या की वारदातें भाजपा सरकार की देखरेख में ही हो रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी संरक्षण के कारण ऐसी घटनाएँ दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही हैं।

न्यूज़ 18 की ख़बर के अनुसार, ओवैसी की पार्टी के नेता कुल 30 गाड़ियों से आए थे, ताकि गाँव में दहशत फैलाई जा सके। बता दें कि तबरेज आलम की चोरी के शक में हत्या कर दी गई थी, उसके बाद से ही माहौल यहाँ गर्म है। ग्राम प्रधान का कहना है कि तबरेज के साथ कई अन्य चोर भी आए थे, जो भाग गए लेकिन तबरेज धर लिया गया। असदुद्दीन ओवैसी इस मामले पर संसद से लेकर मीडिया तक में आवाज़ उठा चुके हैं और मीडिया के एक वर्ग द्वारा इस घटना को हेट क्राइम करार दिया गया है।

महुआ मोइत्रा, देश में फ़ासीवाद ‘घुसता’ दिख गया, बंगाल में फासीवाद का नंगा नाच नहीं दिखा?

तृणमूल की नवनिर्वाचित सांसद और पूर्व इन्वेस्टमेंट बैंकर महुआ मोइत्रा ने लोक सभा में अपना पहला भाषण देते हुए देश में ‘फ़ासीवाद के पैर पसारने’ के ‘सात चिह्न’ गिनाए। इसमें नया कुछ नहीं था- वही पुराना रोना-गाना जिससे पिछले पाँच साल में एनडीटीवी-वायर गिरोह का रोटी-पानी चला और महुआ मित्रा और उनके जैसे ‘लिबरल, सेक्युलर नेताओं’ ने वोट बटोरे। लेकिन दिलचस्प बात यह है उनके इस भाषण में कि वह ममता बनर्जी की पार्टी से हैं- और तृणमूल कॉन्ग्रेस का किसी को फ़ासीवाद पर लेक्चर देना ‘सूप बोले तो बोले, छलनी क्या बोले जिसमें खुद ही बहत्तर छेद’ की मिसाल पर आराम से फिट बैठेगा।

पिछले दिनों ममता बनर्जी के तानाशाही रवैये ने जिस प्रकार से पश्चिम बंगाल ही नहीं, पूरे देश में एक मेडिकल संकट की स्थिति केवल अपनी अकड़ और अपने तुष्टिकरण से पैदा कर दी थी, वह अभी कोई नहीं भूला है। और उसी पार्टी की सांसद अगर किसी और को फ़ासीवाद का पाठ पढ़ाए, ये बताए कि मोदी सरकार की चाल-ढाल में फ़ासीवाद के ‘प्रारंभिक लक्षण’ हैं, तो यह गिनाना बनता है कि कैसे यही तथाकथित ‘प्रारंभिक लक्षण’ पश्चिम बंगाल, जो महुआ का गृह-राज्य भी है और निर्वाचन-क्षेत्र भी, में चौथी स्टेज का फासीवादी कैंसर बन गए हैं।

राष्ट्रवाद का राष्ट्रीय विमर्श में घुस जाना

पहली बात तो यह रुपए में बीस आने झूठ है हिंदुस्तान के मामले में कि राष्ट्रवाद से फासीवाद बढ़ता है, भले ही यह पाश्चात्य देशों (खासकर कि बीसवीं सदी में) के केस में सच रहा हो। कारण यह है कि भारत राष्ट्र उन बुनियादों पर नहीं खड़ा है जिनपर यूरोप के राष्ट्र-राज्य बने थे- अतः बात ही बेमानी है।

लेकिन अगर एक मिनट के लिए उनकी बात को सच मान भी लिया जाए कि भारतीय राष्ट्रवाद फ़ासीवाद का ही प्रारम्भिक रूप है, तो वह उस ‘बंगाली, गैर-हिंदुस्तानी राष्ट्रवाद’ को किस रूप में देखती हैं, जो उनकी पार्टी बंगाल में चलाती है? “अगर बंगाल में आ रहे हो तो बंगाली बोलनी ही पड़ेगी।” एक नारे (“जय श्रीराम”/”वन्दे मातरम”) के आग्रह से चिढ़ने वालीं, महुआ की सुप्रीम लीडर बंगाल में आने वाले देश के ही लोगों के लिए एक पूरी भाषा सीखना और बोलना जबरन करना चाहतीं हैं। राज्य सरकार के मेडिकल कॉलेजों में गैर-बंगाल निवासियों को (यानि मोटे तौर पर गैर-बंगालियों को) प्रवेश लेने से रोकना भी महुआ की नेत्री ममता बनर्जी की ही धमकी थी, जब उनसे डॉक्टरों का प्रदर्शन संभाला नहीं गया। महुआ मित्रा को यह सब नहीं दिखा?

मानवाधिकारों के लिए तिरस्कार का भाव

पंचायतों जैसे छोटे निर्वाचन के समय ममता की विरोधी माकपा के नेता-दम्पति देबू और उषा दास को जिन्दा जला दिया जाता है; उनका बेटा घर आता है तो माँ-बाबा नहीं, जली लाशें मिलतीं हैं। तृणमूल की ही पंचायत समिति के पूर्व सदस्य और उसकी पत्नी का पार्टी वालों के साथ झगड़ा होता है, बहस हो जाती है तो खमियाजा पति को पिट कर और पत्नी को जूतों की माला पहनकर भुगतना पड़ता है। निर्वाचन अधिकारी ‘उठा’ लिया जाता है और वीभत्स लाश रेलवे ट्रैक के किनारे मिलती है। महुआ मोइत्रा के लिए इतना ‘मानवाधिकार के लिए तिरस्कार’ काफी है, या और चाहिए?

मीडिया को दबाना और झुकाना

हालाँकि यह सच है कि अभी तक किसी मुख्यधारा मीडिया के बड़े पत्रकार को ममता के कोप का भाजन नहीं बनना पड़ा है, लेकिन यह केवल वक्त की बात है- अभी तक मुख्यधारा के मीडिया ने उन्हें इतना नाराज़ नहीं किया है। जिसने किया है, जैसे प्रोफेसर अम्बिकेश महापात्र जिन्होंने ममता पर बना एक कार्टून महज़ फॉरवर्ड भर कर दिया, वह जानते हैं कि क्या हो सकता है। उस समय महुआ मोइत्रा कहाँ थीं? या उस समय तक उनकी फासीवाद की परिभाषा ही अलग थी?

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ‘सनक’

एक बार फिर, पहले तो महुआ मोइत्रा का यह दावा ही गलत है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चिंतित होना फासीवाद है- और शर्म की बात यह है कि वह उस राज्य से आतीं हैं जिसकी पड़ोसी देशों के साथ सबसे लम्बी खुली सीमाओं में से एक है; उन्हें तो राष्ट्रीय सुरक्षा पर सबसे ज्यादा मुखर आवाज़ होना चाहिए था संसद में। लेकिन उनकी सुप्रीम लीडर की राजनीति ही बांग्लादेशियों को बंगाली हिंदुस्तानी बनाने के मॉडल पर कायम है।

खैर, एक बार फिर अगर उनकी इस गलत बात को सही मान भी लिया जाए तो भी इस डिपार्टमेंट में भी ममता बनर्जी का फासीवाद मोदी के किसी भी तथाकथित फ़ासीवाद को मात देता है। ममता बनर्जी ने देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की देखा-देखी ‘राज्य सुरक्षा सलाहकार’ का न नया केवल नया पद निर्मित कर डाला, जो कि अपने आप में देश में पहली बार हुआ, बल्कि उसे इतनी ताकतें दे दीं कि राज्य सुरक्षा सलाहकार राज्य का प्रॉक्सी गृह मंत्री हो गया। महुआ मोइत्रा ‘राज्य की सुरक्षा’ के नाम पर चल रही इस सनक के बारे में क्या कहेंगी?

मज़हब और शासन का घालमेल

इसमें तो मैं हाइपरलिंक भी नहीं दूँगा, यह इतना जाना-माना चेहरा है महुआ मोइत्रा की सुप्रीम लीडर का। समुदाय विशेष को खुश करने के लिए कभी राम नवमी को कभी देवी-विसर्जन में बाधा उत्पन्न करना, पुजारियों को नहीं, पर मदरसों के इमामों को खास भत्ते का प्रावधान, प्राचीन तारकेश्वर मंदिर के ट्रस्ट में एक मजहब विशेष वाले को (जिसका मज़हब उसे सीधे-सीधे इससे दुश्मनी पालने का हुक्म देता है) घुसाना- वह भी मुखिया के तौर पर, इंद्रधनुष का बांग्ला नाम ‘रामधोनु’ बदल कर न्य शब्द ‘रॉन्गधोनु’ गढ़ना… ममता बनर्जी को यूँ ही सुब्रमण्यम स्वामी ने ‘जिहादी दीदी’ नहीं कह दिया था!

बौद्धिकों और कला के लिए घृणा

ऊपर अम्बिकेश महापात्र का उदाहरण आप को विस्मृत नहीं ही हुआ होगा। इसके अलावा प्रियंका शर्मा, भाजयुमो नेत्री का बनाया मीम तो ममता बनर्जी से बर्दाश्त हुआ नहीं। अपनी सरकार की आलोचना करने वाली फिल्म को भी उन्होंने प्रतिबंधित कर दिया। महुआ मोइत्रा बौद्धिकों की बात करना चाहतीं हैं? तस्लीमा नसरीन को माकपा से ज्यादा दुर्व्यवहार तृणमूल के समय में बंगाल में झेलना पड़ा, क्योंकि वह इस्लाम के खिलाफ किताबें लिखतीं हैं। तृणमूल की आलोचना करने वाली टीना बिस्वास ने अपनी किताब के कोलकाता लॉन्च में उत्पीड़न का आरोप लगाया था। अपनी मुस्लिम नीति की आलोचना करने वाली किताब को भी प्रतिबंधित कर दिया, जबकि उसके लेखक नज़रुल इस्लाम एक मुस्लिम और आईपीएस हैं। महुआ मोइत्रा को इसमें कला के प्रति सम्मान दिख गया या बौद्धिकता के प्रति?

राजनीतिक तंत्र में स्वतंत्रता का क्षरण

इससे ज्यादा दोहरापन क्या हो सकता है कि जिसके राज्य में, जिसकी पार्टी के शासन में एक-तिहाई पंचायतों में (सत्ताधारी दल के डर से) निर्विरोध निर्वाचन होते हों, विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं की लाशें किसी काले, मध्ययुगीन समय की तरह पेड़ों से लटकी मिलें, यहाँ तक कि निर्वाचन अधिकारी भी दिनदहाड़े गायब हो जाते हों, वह दूसरों के राजनीतिक स्वतंत्रता के प्रति आचरण पर बात करने की जुर्रत करे? महुआ मोइत्रा अगर अपनी पार्टी के गिरेबान में झाँक लें तो शायद राजनीतिक स्वतंत्रता पर दूसरों को उपदेश देने के बाद वह संसद आना तो दूर, घर से निकलने में शर्माएँ!

दिल तो कर रहा है कि महुआ मोइत्रा से पूछ लूँ कि कौन सा महुआ पीकर उन्होंने मोदी के तथाकथित ‘आते हुए फ़ासीवाद’ पर सवाल उठाए थे, जब उनका खुद का राज्य, उनकी खुद की पार्टी की सुप्रीम लीडर की जूतियों तले असली फासिस्ट स्टेट न केवल आ चुका है, बल्कि उसके हाहाकार से पूरा बंगाल त्रस्त भी है। लेकिन फिर याद आता है कि ठीक यही तंज कसे जाने पर महुआ ने बाबुल सुप्रियो को अपनी शीलता के अपमान की पुलिस कंप्लेंट कर दी थी। अतः मैं यह नहीं पूछूँगा। बल्कि आरोप लगाऊँगा कि पुलिसिया हथकण्डे अपनाने वाली महुआ मोइत्रा मिज़ाज से अपनी सुप्रीम लीडर से कोई कम फासीवादी नहीं हैं।

मूसा का बदला: 290 आतंकी बैठे हैं अमरनाथ यात्रा समेत सुरक्षा बलों को निशाना बनाने के लिए, अलर्ट जारी

एक जुलाई से शुरू हो रही अमरनाथ यात्रा पर आतंकी साया मंडरा रहा है। इस बारे में सुरक्षा एजेंसियों ने खुफिया इनपुट मिलने के बाद सुरक्षा व्यवस्था दुरुस्त कर दी है। दक्षिण कश्मीर में अमरनाथ की तीर्थयात्रा शांतिपूर्ण रहे, यह सुनिश्चित करने के लिए इस साल जम्मू-कश्मीर को अतिरिक्त केंद्रीय अर्द्धसैनिक बल उपलब्ध कराया गया है। 

प्राप्त खुफिया इनपुट के अनुसार, भारतीय सुरक्षा बलों पर हमला करने के लिए पाकिस्तानी सेना द्वारा खासतौर पर प्रशिक्षित 34 पाकिस्तानी आतंकियों समेत 290 आतंकी तैयार बैठे हैं। यह भी आगाह किया गया है कि अमरनाथ यात्रा शुरू होते ही आतंकी सुरक्षा बलों को निशाना बना सकते हैं।

जाकिर मूसा का बदला लेने की कर रहे हैं तैयारी

रिपोर्ट्स के अनुसार, खुफिया इनपुट में बताया गया है कि इन आतंकियों में 130 लश्कर-ए-तैयबा, 103 हिजबुल मुजाहिदीन और 34 जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादी हैं। इनके अलावा ISIS (जम्मू-कश्मीर) के 2 और अल बदर के 5 आतंकी शामिल हैं। बताया गया है कि अल कायदा की भारतीय ईकाई अंसार गजवातुल हिंद के 3 आतंकी भी जाकिर मूसा के मारे जाने का बदला लेने की फिराक में हैं। ये वही जाकिर मूसा है जिसे सुरक्षा बलों ने एक मुठभेड़ में ढेर कर दिया था, उसके बाद से ही अंसार गजवातुल हिंद बदला लेने पर उतारू है। सुरक्षा बलों ने इन खुफिया इनपुट्स के बाद अमरनाथ यात्रा को लेकर चौकसी कड़ी कर दी है।

सुरक्षा कारणों से जम्मू-कश्मीर पुलिस द्वारा लंगर सामग्री लेकर जा रहे ट्रकों को रोका जा रहा है। उन्हें सड़क किनारे लगवाकर खड़ा कर दिया गया है। वहीं, ट्रकों को रोके जाने की वजह भी नहीं बताई जा रही। बालटाल और पहलगाम में लगाए जाने वाले लंगर की सामग्री से भरे ट्रकों को जम्मू-कश्मीर पुलिस 20 से 22 घंटे के लिए जगह-जगह पर रोक रही है।

इस साल अब तक 115 आतंकी भेजे जा चुके हैं जहन्नुम

आतंकवादियों में डर का माहौल देखने को साफ़ मिल रहा है और वो घबराए हुए भी हैं। इस साल अब तक 115 आतंकी विभिन्न मुठभेड़ों में ढेर किए जा चुके हैं। मुठभेड़ में मारे गए ज्यादातर आतंकी जैश-ए-मोहम्मद के हैं। पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत ने कूटनीतिक प्रयासों के तहत जैश चीफ मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र में प्रतिबंधित कराने में सफलता हासिल की है। यही नहीं, इस साल सुरक्षा बलों ने जैश के 36 आतंकियों को ढेर करने में भी सफलता हासिल की है।

वहीं, अमरनाथ यात्रा के मद्देनजर जम्मू रेलवे स्टेशन पर सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि श्रद्धालु बिना किसी डर के धार्मिक यात्रा पर आएँ क्योंकि राज्य में सुरक्षा स्थिति देश के बाकी क्षेत्रों जितनी ही अच्छी है।

तबरेज़ के अब्बू मस्कूर को भी चोरी करते पकड़े जाने पर भीड़ ने मार डाला था: रिपोर्ट

झारखण्ड में बाइक चोरी के आरोप में भीड़ द्वारा पीट-पीट कर मार डाले गए तबरेज़ अन्सारी के बारे में नई-नई खबरें निकल कर सामने आ रहीं हैं। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक तबरेज़ के अब्बू मस्कूर अंसारी को भी लगभग 15 साल पहले ऐसे ही मार डाला गया था। मस्कूर अंसारी को कथित तौर पर भीड़ ने जमशेदपुर के बागबेड़ा में चोरी करते हुए पकड़ लिया था और पीट-पीटकर हत्या कर दी थी।

‘मैं गया था मस्कूर की लाश लाने’: कॉन्ग्रेस नेता

कॉन्ग्रेस नेता और पार्टी की जिला यूनिट के महासचिव मोहम्मद मुसाहिद खान बताते हैं कि मस्कूर की लाश गाँव में वापस लाने वह खुद जमशेदपुर गए थे। उनके अनुसार उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि मस्कूर का गाँव से ही संबंध था। बागबेड़ा पुलिस स्टेशन में एक केस भी उस समय दायर किया गया था। पुलिस अब उस केस की भी विस्तारपूर्वक जानकारी निकलवाने में जुटी है।

रिपोर्ट के मुताबिक गाँव के दो 70+ वर्षीय वृद्धों ने भी खान के बयान का समर्थन किया है। उन्होंने जाँच एजेंसियों की पूछताछ से बचने के लिए अपने नाम बताने से मना कर दिया। इसके अलावा तबरेज़ के घर से महज़ 100 मीटर दूर जामा मस्जिद की सड़क के दूसरी ओर रहने वाली उनमें से एक वृद्धा ने यह भी बताया कि भीड़ ने पकड़ने के बाद मस्कूर की बेरहमी से पिटाई की थी और गला रेत कर हत्या कर दी थी। उन्होंने यह भी दावा किया कि जब मस्कूर की लाश लाई गई थी तो वह वहीं मौजूद थीं।

‘अभी भी याद है’

TOI के अनुसार बागबेड़ा में अभी भी कुछ लोगों के ज़ेहन में यह घटना ताज़ा है। नवंबर 2004 में हुई इस नृशंस हत्या के बारे में TOI से स्थानीय नेता सुबोध कुमार झा ने बात की। “एक दिन रामनगर के निवासियों ने एक आदमी को पकड़ लिया और गुस्साई भीड़ ने पीट-पीट कर उसे मार डाला।”

VIDEO: पाक के LIVE न्यूज शो में घमासान मल्लयुद्ध, नेता ने कर दी जर्नलिस्ट की कुटाई

जिस तरह से न्यूज़ चैनल्स पर ‘डिबेट कल्चर’ चल रहा है, ऐसे में न्यूज़ चैनल्स पर कौन कब अपना धैर्य खो दे, यह कहा नहीं जा सकता है। लेकिन यह किस्सा अपने देश की मीडिया का नहीं बल्कि रुपयों और ‘टिमाटर’ की किल्लत से जूझते हुए पाकिस्तान के एक न्यूज़ चैनल का है।

पाकिस्तान में एक न्यूज चैनल का स्टूडियो तब अखाड़े में तब्दील हो गया, जब सत्ताधारी पार्टी PTI के एक नेता ने पैनल में शामिल एक वरिष्ठ पत्रकार को पीट दिया। दुखद बात यह है कि यह सब कुछ लाइव न्यूज शो के दौरान हुआ और अब इस निंदनीय घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

पत्रकार कर रहे थे इमरान खान सरकार की खिंचाई, फिर छिड़ा मल्ल्युद्ध

यह निंदनीय मामला गत 20 जून का है, जब कराची के एक चैनल ‘के 21 न्यूज‘ पर ‘न्यूज लाइन विद आफताब मुघेरी‘ शो चल रहा था। वीडियो में हम देख सकते हैं कि इसमें जर्नलिस्ट इमरान खान सरकार की जमकर खिंचाई कर रहा था, वहाँ बैठे सत्ताधारी PTI के सीनियर नेता मसरूर अली सियाल से ये देखा नहीं गया और वरिष्ठ पत्रकार इम्तियाज़ खान की तुरंत धुनाई शुरू कर दी। इम्तियाज़ खान कराची प्रेस क्लब के प्रेजीडेंट भी हैं। और यह सब लाइव चलता रहा। पाकिस्तानी पत्रकार नायला इनायत ने इसका वीडियो शेयर किया।

वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि पीटीआई नेता बार-बार अपनी सीट से उठ कर धमकी भरे लहजे में कराची प्रेस क्लब के अध्यक्ष (पत्रकार) से बात कर रहे हैं। लेकिन, इसके बाद हद तब पार हो गई जब सियाल ने पत्रकार की धुनाई शुरू कर दी। पत्रकार को धक्का देकर फर्श पर गिरा दिया और पहले लात और फिर बाद में हाथ से पिटाई करने लगे। बाद में चैनल के बाकी लोगों ने बीच-बचाव का काम किया। इस घटना के बाद पीटीआई की काफी आलोचना हो रही है। 

पाकिस्तानी पत्रकार नायला इनायत ने डिबेट शो में मल्लयुद्ध के वीडियो को ट्विटर पर शेयर करते हुए इमरान खान के ‘नया पाकिस्तान’ दावे पर पर तंज कसा है। उन्होंने लिखा, “क्या यही नया पाकिस्तान है? पीटीआई के मसरूर अली सियाल ने कराची प्रेस क्लब के अध्यक्ष इम्तियाज खान पर लाइव न्यूज शो के दौरान हमला कर दिया।”

देखिए यह पूरा निंदनीय तमाशा इस वीडियो में-

 

5 दिन में ₹105 करोड़: ‘कबीर सिंह’ ने फ़िल्म को नकारने वाले गिरोह को लगाया ज़ोरदार तमाचा

एक ऐसी फ़िल्म जो ईद, दिवाली या क्रिसमस जैसी किसी छुट्टी पर रिलीज नहीं की गई। एक ऐसी फ़िल्म, जिसे सेंसर बोर्ड से एडल्ट सर्टिफिकेट मिला। एक ऐसी फ़िल्म, जिसके टिकट का मूल्य नॉर्मल रखा गया, यानी बड़ी फ़िल्मों की तरह बढ़ाया नहीं गया। एक ऐसी फ़िल्म, जो क्रिकेट वर्ल्ड कप के दौरान रिलीज हुई। एक ऐसी फ़िल्म, जिसे तथाकथित समीक्षकों ने नकार दिया और इसके बारे में न जाने क्या-क्या ग़लतफहमियाँ फैलाईं। लेकिन, इन सारी अड़चनों के बावजूद सभी पूर्वानुमानों की धता बताते हुए शहीद कपूर अभिनीत ‘कबीर सिंह’ ने डोमेस्टिक बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ रुपए का कारोबार कर लिया है।

अगर ‘कबीर सिंह’ की पाँचों दिनों की कमाई पर नज़र डालें तो लगता है कि 200 करोड़ का कलेक्शन इसकी पहुँच से दूर नहीं है। फ़िल्म को कथित इलीट वर्ग द्वारा नकारे जाने पर भी इसे दर्शकों का भरपूर प्यार मिल रहा है और फ़िल्म कमाल कर रही है। यह शहीद कपूर के लिए भी बड़ा क्षण है क्योंकि पहली बार उनकी अकेले लीड रोल वाली किसी फ़िल्म ने 100 करोड़ रुपए कलेक्शन का आँकड़ा पार किया है। शुक्रवार (जून 21, 2019) को रीलिज हुई फ़िल्म ने कल मंगलवार तक 105 करोड़ रुपए की कमाई कर ली है, वो भी तब जब फ़िल्म इस साल की बड़ी फिल्मों, जैसे भारत, केसरी, गल्ली बॉय और टोटल धमाल से कम सिनेमा हॉल में रिलीज हुई है।

युवाओं ने ‘कबीर सिंह’ को काफ़ी पसंद किया है और फ़िल्म इस वर्ग के बीच ख़ासी लोकप्रिय हो रही है। साथ ही शहीद कपूर का किरदार और लुक्स भी लोगों को पसंद आ रहे हैं। अगर 2019 की बात करें तो इस वर्ष ‘उरी- द सर्जिकल स्ट्राइक’ सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फ़िल्म है और फिल्म के 245 करोड़ रुपए नेट कलेक्शन को ‘कबीर सिंह’ आने वाले दिनों में चुनौती दे सकती है, ऐसा वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षण तरन आदर्श ने दावा किया है। तेलुगु फ़िल्म ‘अर्जुन रेड्डी’ के निर्देशक संदीप रेड्डी वंगा ने ही इसकी हिंदी रीमेक ‘कबीर सिंह’ का निर्देशन किया है और हिंदी में यह उनकी पहली प्रोजेक्ट थी।

एक और गौर करने वाली बात यह है कि ‘उरी- द सर्जिकल स्ट्राइक’ भी निर्देशक आदित्य धार की पहली फ़िल्म थी। लोग यह भी मान कर चल रहे हैं कि कई दिनों से एक अदद हिट को तरस रहे शहीद के लिए यह फ़िल्म करियर की टर्निंग पॉइंट साबित हो सकती है। वहीं अमेरिका में भी ‘कबीर सिंह’ ने अच्छी कमाई की गई। बढ़ती माँग के कारण वहाँ दूसरे सप्ताह में 45 नई स्क्रीन में इसे रिलीज किया गया। आगामी शुक्रवार को आयुष्मान खुराना की ‘आर्टिकल 15’ भी रिलीज होने वाली है, इसके बाद देखने वाले बात रहेगी कि ‘कबीर सिंह’ कैसा पेस मेंटेन कर पाती है।

ओवरसीज अर्थात भारत से बाहर ‘कबीर सिंह’ ने 11 करोड़ रुपयों से अधिक की कमाई कर ली है। फ़िल्म की मुख्य अभिनेत्री कियारा आडवाणी हैं। वहीं अगर तेलुगु फ़िल्म ‘अर्जुन रेड्डी’ की बात करें तो फ़िल्म में विजय देवराकोण्डा के रूप में उस समय चर्चित चेहरा न होने के बावजूद 51 करोड़ रुपए से अधिक की कमाई की थी। फ़िल्म को तमिल में ‘आदित्य वर्मा’ नाम से रीमेक किया जा रहा है, जिसमें अभिनेता ध्रुव विक्रम मुख्य किरदार निभाएँगे।

Ariel के ऐड ने दिखाए ‘दाग’ तो भड़के पाकिस्तानी, बॉयकॉट की अपील

एरियल वॉशिंग पाउडर का पाकिस्तान में चल रहा एक विज्ञापन फ़िलहाल कट्टरपंथियों के निशाने पर है। इस विज्ञापन में महिलाओं को दिए जा रहे ‘चारदीवारी से बाहर निकलो’ के संदेश को कुरान और सूरा की आयतों का हवाला देकर गैर-इस्लामिक बताया जा रहा है। लोगों से अपील की जा रही है कि वह एरियल न खरीद कर इसका विरोध करें।

‘घर में रहो और अपनी खूबसूरती दूसरों को मत दिखाओ’

एरियल के विज्ञापन में पाकिस्तानी महिला क्रिकेटर बिस्माह मारूफ़ क्रिकेट की पोशाक में और चेहरे पर चुनौती का भाव लिए कड़ी हैं। उनकी पृष्ठभूमि में ‘चारदीवारी में रहो’ की हिदायत लिख कर उसे दाग के ज़रिए ‘दागदार’ दिखाया गया है। इसी पर कट्टरपंथी आगबबूला हो रहे हैं।

इसके विरोध में एक पाकिस्तानी ने अपने यूट्यब वीडियो में कुरान की आयतों में यह लिखे होने का दावा किया है “और अपने घर में करार से रहो, और कदीम जाहिलीयत के ज़माने की तरह अपने बनाव का इज़हार न करो”। उसके मुताबिक एरियल का यह विज्ञापन इस क़ुरान की मुखालफत है अतः गैर-इस्लामिक है। उसने इसे बायकाट किए जाने की अपील की है।

केवल पुरुषों की यह कट्टरपंथी सोच होती तो एक बार शायद समझ में आता। लेकिन पाकिस्तान में महिलाएँ भी बड़ी संख्या में इस विज्ञापन का विरोध करतीं दिख रहीं हैं, और एरियल ही नहीं, उदारवाद के पूरे सिद्धांत का ही विरोध कर रहीं हैं।

Video: गलत साइड से आ रही युवती ने की सरेराह दबंगई, युवक को लोहे की रॉड से पीटा

दो गाड़ियों में टक्कर होने के बाद एक युवती इतना गुस्सा गई कि उसने एक युवक को लोहे के रॉड से पीटना शुरू कर दिया। लोहे के रॉड से उक्त युवती ने उस युवक के शरीर और सिर पर वार किए। ताबड़तोड़ वार करती जा रही युवती को देख कर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह गुस्से में यह सब कुछ भूल गई हो कि वो कहाँ है और क्या कर रही है। युवती एसेक्स-4 गाड़ी से थी जबकि युवक सेंट्रो कार पर सवार था। नीचे संलग्न की गई वीडियो में आप युवती द्वारा की गई ज्यादती को देख सकते हैं।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, इस मामले में युवक की कोई ग़लती नहीं थी लेकिन फिर भी युवती उसकी सरेराह पिटाई करती रही। कई लोग मौक़े पर तमाशबीन बने रहे। चश्मदीदों ने कहा कि युवक सही साइड पर गाड़ी चला रहा था। युवती ग़लत साइड से उसके सामने आ गई और दोनों ही गाड़ियों में भिड़ंत हो गई। गौर करने वाली बात यह है कि पीड़ित युवक उस समय अपने परिवार एवं रिश्तेदारों के साथ था।

इस पिटाई से पीड़ित युवक को शरीर के कई जगहों पर चोटें आई हैं और उसकी गाड़ी को भी नुक़सान पहुँचा है। पुलिस ने मामले की छानबीन शुरू कर दी है और युवती के ख़िलाफ़ मारपीट का मामला दर्ज कर लिया गया है। पीड़ित युवक ने भी आरोप लगाया कि रॉन्ग साइड लड़की आ रही थी लेकिन फिर भी उसने ही उल्टा पिटाई कर दी। युवती का नाम शीतल वर्मा है, वहीं युवक का नाम नीतीश है।

किसान सम्मान निधि: 5 लाख किसानों के खाते में पहुँचे ₹2-2 हज़ार

खेलगाँव में आयोजित प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना समारोह में झारखण्ड सरकार ने डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के माध्यम से पाँच लाख किसानों को ₹2-2 हज़ार दिए। मुख्यमंत्री रघुबर दास ने घोषणा की कि राज्य और केंद्र सरकारें मिलकर आगामी 2-3 माह में ₹5000 करोड़ किसानों के खातों में पहुँचाएँगे।

‘ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगी यह राशि’

मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि यह राशि राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य और केंद्र सरकारें किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य को लेकर काम कर रही है। उन्होंने झारखण्ड सरकार द्वारा मुख्यमंत्री कृषि आशीर्वाद योजना का उल्लेख करते हुए कहा कि जुलाई माह से राज्य के किसानों को इस योजना का भी लाभ मिलने लगेगा।

योजना के अंतर्गत 1-5 एकड़ भूमि वाले किसानों को न्यूनतम ₹5000 से लेकर अधिकतम ₹25000 का लाभ प्राप्त होगा। यानि कि अगर प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के ₹6000 और मुख्यमंत्री कृषि आशीर्वाद योजना के ₹5000-₹25000 को मिला दें तो झारखण्ड के किसानों को कुल ₹11,000-₹31,000 की आय-सहायता (इनकम सपोर्ट) सरकारों से सीधे अपने बैंक खाते में प्राप्त होगी।

‘वंशावली के आधार पर भी मिले लाभ’

रघुबर दास ने यह भी कहा कि पहले भूमि रिकॉर्ड न होने से एक बड़ी संख्या में किसान इस योजना के लाभ से वंचित थे। मोदी सरकार ने शपथ ग्रहण के बाद हुई कैबिनेट की पहली ही बैठक में योजना की नियमावली में संशोधन करते हुए वंशावली को भी योजना की पात्रता में शामिल कर दिया। इसके अलावा पहले केवल 2 हेक्टेयर से कम की भूमि वाले किसानों को ही इस योजना का लाभ मिलना था, लेकिन अब हर किसान इस योजना की परिधि में है।