Wednesday, November 25, 2020
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गाँधी-नेहरू के बजाए The Hindu के मुहम्मद इक़बाल ने तलाश ली नए लोकसभा अध्यक्ष की जाति

सुई से लेकर सब्बल तक में नेहरू की छवि देखने वाले मीडिया ने दिल पर पत्थर रखकर अब नेहरू से ब्रेकअप कर लिया है। अब यह मीडिया गिरोह नेहरू की बातें कम करते नजर आते हैं। अब जाति में इनका खास इंट्रेस्ट जागा है।

जब नरेंद्र मोदी ने 2014 लोकसभा चुनाव में ‘अच्छे दिन आएँगे’ का नारा दिया था तो यह तो सभी जानते थे कि अच्छे दिन किसके आएँगे, लेकिन किस के ‘नहीं आएँगे’ यह 2019 के आम चुनाव के आते-आते स्पष्ट होने लगा। फिर एक दिन वो आया जब भाजपा ने अकेले 300 का आँकड़ा पार कर लिया और कुछ लोगों के अच्छे दिन की उम्मीदों पर पूर्णविराम लग गया।

अच्छे दिनों पर लगे इसी पूर्णविराम का नतीजा पिछले एक माह में हमें सबसे ज्यादा मीडिया और जर्नल्ज़िम के समुदाय विशेष में देखने को मिला है। हर प्रकार के झूठे और गुमराह करने वाले तथ्यों से मोदी सरकार की लोकप्रियता को हानि पहुँचाने के अथक प्रयास में जुटे मीडिया गिरोहों की ही एक सबसे बड़ी शाखा है The Hindu समाचार पत्र।

ऐसा लगता है जैसे सरकार विरोधी षड्यंत्रों में दिन-रात एक कर देने वाले ‘द हिन्दू’ अखबार ने अब अपना मुद्दा चुन लिया है। द हिन्दू जैसे समाचार पत्र एक ओर जहाँ देश में जातिवाद और साम्प्रदायिक मुद्दों पर चिंतित दिखाई पड़ते हैं वहीं उनकी असलियत यह है कि जातिवाद और साम्प्रदायिक मुद्दे भड़काकर वो अपनी दुकान और रोजी-रोटी का जुगाड़ कर रहे हैं।

आज ही लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए ओम बिड़ला के नाम की चर्चा शुरू होते ही द हिन्दू ने अपना मुद्दा चुन लिया। द हिन्दू के पत्रकार मुहम्मद इक़बाल ने अपने आर्टिकल में भाजपा नेता ओम बिड़ला की जाति को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण साबित कर दिया है। द हिन्दू के अनुसार लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला नहीं बल्कि ‘वैश्य’ ओम बिड़ला बनाए जाने तय हुए हैं।

प्रश्न यह भी है कि द हिन्दू अपने मजहबी और सवर्ण-दलित के दृष्टिकोण से बाहर क्यों नहीं निकल पा रहा है? क्या द हिंदू अखबार इस बात का सबूत देना चाहता है कि इस देश में अभी भी एक ऐसा वर्ग मौजूद है, जो शिक्षित होने के बावजूद उपनिवेशवाद के दौर में जीना पसंद करता है? क्या द हिन्दू को नेताओं और सैनिकों में जाति तलाशना कॉन्ग्रेस ने सिखाया है और उसे इस माहौल से उबरने में समय लगने वाला है?

हमने विगत कुछ समय में देखा है कि मीडिया ने स्वयं की धूरी में कुछ परिवर्तन किया है। नेहरूवियन सभ्यता में जन्मे मीडिया और उनके बुद्धिपीड़ितों ने शायद यह तो जान लिया है कि उनके अन्नदाता अब संसद के भीतर सिमट गए हैं और अब बहुत ज्यादा स्कोप बाकी है नहीं, इसलिए इन मीडिया गिरोहों ने अपने प्रिय चाचा नेहरू को बिसरा देने का निर्णय ले लिया है।

देश में सुई से लेकर सब्बल तक में नेहरू की छवि देखने वाले मीडिया ने दिल पर पत्थर रखकर अब नेहरू से ब्रेकअप कर लिया है। अब यह मीडिया गिरोह नेहरू की बातें कम करते नजर आते हैं। नेहरू और इंदिरा ने साथ मिलकर भी जोर लगाया लेकिन इन मीडिया गिरोहों के अच्छे दिन नहीं आ पाए।

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पत्रकारिता के नाम पर बरसों से प्रोपेगैंडा बेच रहे द हिन्दू जैसे ही दूसरे अन्य मीडिया संस्थानों ने ऐसे समय में सैनिकों की जाति पर चर्चा की जब पुलवामा हमले के बाद उनके शवों को ठीक से इकठ्ठा तक नहीं किया गया था। द हिन्दू जैसे सूचना के साधनों ने नेहरू के जाने के वर्षों बाद तक भी नेहरूभक्ति दिखाई, उन्हें भूलने नहीं दिया। यह अच्छा प्रयास भी था और इसकी सराहना भी की जानी चाहिए।

लेकिन 2019 के चुनावों के बाद से इन नमक-हराम मीडिया गिरोहों ने नेहरू को ऐसे निकाल फेंका है जैसे लोग चाय में से मक्खी को निकाल फेंकते हैं। मीडिया अब समझ गया है कि वो नेहरू को गन्ने की तरह गन्ने की मशीन में ठूँसकर जितना निचोड़ सकते थे, निचोड़ चुके हैं।

इसलिए अब द हिन्दू ने पाला बदला है। जैसे ही राहुल गाँधी हिंदुत्व की तरफ बढ़े, द हिन्दू अखबार ने अपनी रिसर्च का टॉपिक हिंदुत्व में मौजूद जाति और वर्ण व्यवस्था की ओर धकेल दिया है। अब द हिन्दू की ख़बरों का समस्त रिसर्च एंड डेवलपमेंट मुहम्मद इकबाल नाम के पत्रकार द्वारा हिन्दुओं की आस्था, वर्ण और जाति तलाशने में लगाया जाएगा। इससे जो हासिल होगा वह अभी गुप्त है और 2024 के चुनाव से पहले राहुल गाँधी किसी जनसभा को सम्बोधित करते हुए बता ही देंगे।

The Hindu को कॉन्ग्रेस द्वारा दी गई ‘ट्रेनिंग’ का असर छूटने में वक़्त लगेगा

समाज का ध्रुवीकरण, चाहे जातिवाद से या फिर सम्प्रदाय की आग से, कब और किस दिशा में करना है इसका अभ्यास कॉन्ग्रेस को पूरी तरह से है। कॉन्ग्रेस इस मामले में इतनी भाग्यशाली रही कि उसने वर्षों तक बिना किसी रोकटोक के इस काम को अंजाम दिया और इसके बीज लगभग सभी बड़े-छोटे संस्थानों में गहराई तक बो दिए।

द हिन्दू ने मोदी 2.0 के नए चेहरे ओम बिड़ला की जाति पर तो मुहम्मद इकबाल से पीएचडी करवा ली लेकिन उसे कभी नेहरू और गाँधी की जाति पर समय देने का वक़्त नहीं मिल सका। जर्नलिज़्म के नाम पर अन्नदाताओं की स्वामिभक्ति का अन्न द हिन्दू जैसे मीडिया गिरोहों की नसों में रक्त बनकर बह रहा है। अभी समाज को इसके व्यापक नुकसान उठाने होंगे। मुहम्मद इकबाल ने इस पूरे लेख में बेहद सावधानी से यह दिखाने का प्रयास किया है कि ओम बिड़ला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी हैं और उन्होंने जनता से उनके नाम पर वोट माँगे। क्या द हिन्दू यह भूल गया है कि उनके लाडले राजकुमार को अमेठी से दक्षिण खदेड़ने के लिए जनता को नरेंद्र मोदी के नाम की जरूरत नहीं पड़ी?

आज सुबह से ही लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए ओम बिड़ला के नाम पर चर्चा शुरू होते ही कुछ लोग उनका योगदान तलाशते भी नजर आए। ये वही लोग थे जिन्होंने कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार के योगदान पर कभी कान खड़े नहीं किए। या शायद ये लोग स्वयं अपने चुने गए नेताओं से इतनी उम्मीद नहीं करते और उन्हें इस लायक नहीं समझते कि उनके योगदान पर चर्चा की जाए।

खैर, मीडिया एकबार फिर वही जल्दबाजी कर रहा है। जातिगत समीकरणों के द्वारा भाजपा के विस्तार को तौलने में द हिन्दू के मुहम्मद इकबाल फिसड्डी साबित होंगे क्योंकि देश की प्राथमिकताएँ बदल चुकी हैं। देश का नारा ‘भारत’ है। मीडिया गिरोहों को अभी और दीर्घकालिक आत्मचिंतन की आवश्यकता है।

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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