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पीरियड पर फिल्म को ऑस्कर लेकिन एक्ट्रेस को नौकरी से निकाला: सैनिटरी नैपकिन और 1 लाख का मामला

12 फरवरी को रिलीज हुई ‘पीरियड: द एंड ऑफ सेंटेंस’ फिल्म ने ऑस्कर जीतकर पूरे विश्व में ख्याति प्राप्त की। हर ओर इस फिल्म के चर्चे हुए। ये फिल्म हापुड़ के गाँव काठीखेड़ा में सैनिटरी नेपकिन बनाने वाली महिलाओं पर बनी डॉक्युमेंट्री है। इसमें ऐक्शन इंडिया नामक एनजीओ (जो सैनेटरी पैड बनाने का काम भी करती है) में काम करने वाली सुमन और स्नेहा नाम की लड़कियों ने एक्टिंग की थी। जिसके बाद उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सुमन- स्नेहा और उनकी टीम को लखनऊ बुलाकर 1-1 लाख रुपए दिए थे।

सुमन-स्नेहा को नहीं मालूम था कि अखिलेश द्वारा दी गई ये राशि उनकी नौकरी ले बैठेगी। जी हाँ, इस 1 लाख की राशि के कारण स्नेहा और सुमन को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। स्नेहा बताती हैं कि 1 लाख की राशि उन्हें एनजीओ को देने को कही गई, लेकिन जब उन्होंने इससे इंकार कर दिया तो उन पर नौकरी छोड़ने का दबाव बनाया जाने लगा।

एएनआई से हुई बातचीत में सुमन ने बताया कि उनकी डॉक्यूमेंट्री को ऑस्कर मिलने के बाद 8 मार्च को अखिलेश यादव ने अंतराष्ट्रीय महिला दिवस पर उन्हें 1-1 लाख रुपए दिए थे और 17 मार्च को उन्हें ऑफिस में बुलाया गया कि वह उस चेक को एनजीओ के नाम जमा करा दें। उनसे कहा गया कि ये पैसा एनजीओ का है क्योंकि उन्हें (सुमन) ये राशि उसी काम के लिए मिली है जो उन्होंने फर्म में रहते हुए किया।

सुमन ने उनसे इसके लिए कुछ समय माँगा और एनजीओ में अपने काम को शुरू रखा। इसके बाद उन्हें महीने के आखिरी में उनकी सैलरी नहीं मिली। जब इसके बारे में पता किया तो उन्हें कहा गया या तो वो 1 लाख रुपए जमा करो या फिर जॉब छोड़ दो। उन्होंने उस राशि को न देने का फैसला लिया। वहीं स्नेहा का कहना है कि उन्हें भी एनजीओ ने दो महीने की सैलरी नहीं दी है।

स्नेहा बताती हैं कि जब उन्होंने इस बारे में एनजीओ से पूछा तो जवाब मिला कि उन्हें पैसों की जरूरत नहीं है क्योंकि अखिलेश यादव पहले ही उन्हें एक लाख रुपए दे चुके हैं। स्नेहा को सैलरी न देने के लिए एनजीओ ने ये भी कहा कि दो महीने स्नेहा ने काम नहीं किया है जबकि स्नेहा के पास इसका सबूत है कि इस अवधि में वो कार्यस्थल पर मौजूद थीं।

सुमन और स्नेहा अपनी नौकरियाँ वापस चाहती हैं। स्नेहा कहती हैं कि फिल्म के ऑस्कर जीत लेने के बाद वो ताउम्र घर में नहीं गुजार सकतीं। नौकरी चले जाने से उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है जैसे उनके बच्चे को किसी और को दे दिया गया हो।

दोनों महिलाओं ने एनजीओ के शुरुआती समय में उसे आगे बढ़ाने में किए गए अपने प्रयासों और संघर्षों के बारे में बात की। उन्होंने बताया किस प्रकार बिना सैलरी के भी उन्होंने इस एनजीओ के लिए काम किया। कभी-कभी उन्हें 6,000 रुपए मिले, जो पर्याप्त नहीं होते थे लेकिन फिर भी उन्होंने एनजीओ के लिए काम करना नहीं छोड़ा।

नवभारत टाइम्स में छपी खबर के मुताबिक साल 2010 में सुमन की शादी काठीखेड़ा गाँव में सुरक्षा गार्ड बलराज से हुई थी। शादी के कुछ समय बाद सुमन इस एनजीओ ‘ऐक्शन इंडिया’ से जुड़ीं, जो महिलाओं के लिए काम करती थी। सुमन को गाँव में सैनिटरी पैड बनाने की प्रेरणा मिली। जिसके बाद उन्होंने इस काम में अपनी ननद स्नेहा और उनकी सहेलियों को भी जोड़ा।

स्नेहा बताती हैं कि कई पाबंदियों और शर्म के कारण शुरू में उन्होंने परिवार वालों को नहीं बताया था कि वे पैड बनाती हैं। धीरे-धीरे जब पता चला तो उन्होंने किसी तरह अपने घर-परिवार को समझाया। ऑस्कर विनिंग फिल्म
पीरियड: द एंड ऑफ सेंटेंस फिल्म उन्हीं का संघर्षों को बयाँ करती है।

पत्नी को भी नहीं जिता पाए ‘टोंटी-चोर’, UP में बुआ-बबुआ का गठबंधन टूटा, अकेले लड़ेगी BSP

लोकसभा चुनाव 2019 में सपा के साथ गठबंधन के बावजूद उम्‍मीद के अनुसार नतीजे न आने से नाखुश बसपा सुप्रीमो मायावती ने पार्टी की समीक्षा बैठक में कहा है कि यूपी के 11 सीटों पर होने वाले उपचुनाव में उनकी पार्टी अकेले लड़ेगी। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में हुई समीक्षा बैठक में मायावती गठबंधन से दुखी नज़र आईं। मायावती का कहना है कि गठबंधन से पार्टी को फायदा नहीं हुआ है। क्योंकि यादवों का वोट हमारी पार्टी को ट्रांसफर नहीं हुआ जिससे हार का सामना करना पड़ा।

जातिगत समीकरण साधने के लिए बनाया गया गठबंधन यहाँ आकर फँस गया चूँकि यादव वोट बसपा को ट्रांसफर नहीं हो पाया। इसलिए मायावती ने अब गठबंधन की समीक्षा का संकेत दिया है। जबकि उनके अकेले चुनाव लड़ने के फैसले ने पहले ही तस्वीरें साफ कर दी हैं। फिर भी अभी गठबंधन की समाप्ति की बस औपचारिक घोषणा ही बाकि रह गई है। वैसे आजतक की रिपोर्ट के अनुसार, मायावती ने यहाँ तक कह दिया कि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव अपनी पत्नी और भाई को भी चुनाव नहीं जिता पाए हैं। उनका यह तंज गठबंधन की गाँठ पहले ही खोल चुका है।

बीएसपी प्रमुख मायावती ने 2019 लोकसभा चुनाव में पार्टी को संतोषजनक सीटें न मिलने और कुछ प्रदेशों में करारी हार को लेकर चिंता ज़ाहिर की। यूपी के सभी बसपा सांसदों और जिलाध्यक्षों के साथ बैठक में मायावती ने कहा कि पार्टी सभी विधानसभा उपचुनाव में लड़ेगी और अब 50% वोट का लक्ष्य लेकर चुनाव में अपने दम पर उतरेगी। वैसे शायद यह पहली बार है जब मायावती उपचुनाव में अपने उम्मीदवार उतारने जा रही हैं।

जातिगत समीकरण के नकारे जाने के बाद भी मायावती सीख लेतीं नज़र नहीं आ रहीं। यहाँ तक की समीक्षा बैठक में भी उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती से नवनिर्वाचित बसपा सांसद राम शिरोमणि वर्मा ने ईवीएम घोटाले का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “हम लोग पहले से कह रहे हैं कि बैलेट पेपर से चुनाव होना चाहिए, जिसे ना तो चुनाव आयोग मान रहा है, ना सरकार मान रही है। हम चाहते हैं कि बैलेट पेपर से चुनाव कराया जाए, जो निष्पक्ष हो।” जबकि चुनाव आयोग ऐसे आरोपों को पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया है। लेकिन अभी भी कुछ पार्टियाँ देश की जनता द्वारा नकारे जाने को अनर्गल आरोपों की आड़ में छिपाना चाहती हैं।

बता दें कि लोकसभा चुनाव में बीएसपी के 11 प्रत्‍याशी सांसद बन चुके हैं, जिसके बाद उनकी खाली हुई सीटों पर छह महीने के भीतर दोबारा चुनाव होने हैं।

शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि इतनी जल्दी बुआ-बबुआ का गठबंधन दम तोड़ देगी। हालाँकि, विश्लेषक पहले ही इस गठबंधन के लम्बा न चलने का कयास लगा रहे थे। वैसे चुनाव से पहले तो दावा था कि सपा-बसपा ने जो जातीय समीकरण फिट किया है वह भाजपा के लिए नुकसानदायक होगा लेकिन चुनाव नतीजों में साफ हो गया कि बसपा का वोट प्रतिशत तो किसी तरह बना रहा लेकिन समाजवादी पार्टी का वोट प्रतिशत भी गिर गया।

नतीजों से साफ हुआ कि जो जाति गणित का फॉर्मूला लगाया गया वो फिट नहीं हुआ और भारतीय जनता पार्टी को जातिवादी समीकरण से अलग हटकर पर्याप्त वोट मिला। यही कारण रहा है कि बीजेपी अपने दम पर पूरे यूपी में 50% के करीब वोट और 64 सीटों पर जीत हासिल की तो वहीं सपा-बसपा मिलकर 15 सीटें और 40 फीसदी के आसपास वोट शेयर हासिल कर पाई। देखा जाए तो कुल मिलाकर पूरी तरह फेल हो गया उनका जातीय समीकरण। यही कारण है कि अब गठबंधन में टूट बन कर उभरा है।

मेट्रो, बसों में मुफ़्त सफर पर BJP का पटलवार, 52 महीनों में तो कुछ कर नहीं सके, अब क्या करेंगे…

विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दो बड़े फ़ैसलों की घोषणा की। इनमें से एक घोषणा थी कि पूरी दिल्ली में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएँगे और दूसरी घोषणा थी कि डीटीसी बसों और मेट्रो में महिलाओं को मुफ़्त में यात्रा करने की अनुमति दी जाएगी, जिससे वे ख़ुद को सुरक्षित महसूस कर सकें। केजरीवाल की इन घोषणाओं का बीजेपी दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी ने पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि वो इस विचार का विरोध नहीं कर रहे हैं, लेकिन आम आदमी पार्टी को दिल्ली की सत्ता में आए 52 महीनें हो गए हैं तब उन्होंने ऐसा कोई काम शुरू नहीं किया, तो अब 5-6 महीनों में वो क्या कर लेंगे? अरविंद केजरीवाल केवल लोगों को धोखा देने की कोशिश कर रहे हैं।

इसके अलावा, मनोज तिवारी ने केजरीवाल के उस वादे को भी याद दिलाया जिसमें उन्होंने कहा था कि बसों में महिलाओं की सुरक्षा और पैनिक बटन के लिए मार्शल तैनात किए जाएँगे। कहाँ हैं वो मार्शल? उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है जैसे वो (केजरीवाल) ख़ुद घबरा रहे हों और वो यह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि दिल्ली के लोगों को गुमराह करने के लिए किस रणनीति का इस्तेमाल करना चाहिए।

प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी का कहना है कि लोकसभा चुनाव 2019 में केजरीवाल ने यह दावा किया था कि आम आदमी पार्टी दिल्ली की 7 में से 4 सीटें जीतेगी। उन्होंने यहाँ तक कहा कि विधानसभा चुनाव होने से पहले आप पार्टी द्वारा और भी घोषणाएँ की जाएँगी जिसका मक़सद केवल जनता को भ्रमित करना होगा। ख़बर के अनुसार, मनोज तिवारी ने आम आदमी पार्टी पर तंज करते हुए कहा कि उन्होंने जनता से 70 वादे किए उनमें से 74 झूठे साबित हुए हैं।

The Kashmir Files: राजनेताओं व मीडिया द्वारा 30 सालों की उपेक्षा के बाद विवेक की अगली फ़िल्म

निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने अपनी अगली फ़िल्म की घोषणा कर दी है। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के पीछे से जुड़ा सच सामने लाने के लिए ‘द ताशकंद फाइल्स’ नामक फ़िल्म का निर्देशन करने के बाद उनका अगला प्रोजेक्ट कश्मीरी पंडितों के विस्थापन पर आधारित होगा। कम स्क्रीन्स में रिलीज होने और रिलीज के बाद कलंक और अवेंजर्स जैसी फ़िल्मों से टक्कर मिलने के बावजूद ‘द ताशकंद फाइल्स’ कई सिनेमाघरों में 50 दिन पूरा कर चुकी है। उत्साहित अग्निहोत्री इससे पहले अकादमी में नक्सलवाद का अतिक्रमण जैसे गंभीर विषय पर ‘बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम’ फ़िल्म बना चुके हैं। विवेक अग्निहित्री ने अपनी ताज़ा फ़िल्म के बारे में ऑपइंडिया से बात करते हुए कुछ नई जानकारियाँ साझा कीं।

विवेक अग्निहोत्री ने कहा कि अब वह अपने हाथ में वो काम लेने जा रहे हैं, जो राजनेताओं व मीडिया को करना चाहिए था। उन्होंने कहा कि वह एक आयोग का गठन करेंगे, जो पूरे कश्मीर में पंडितों के साथ हुए अत्याचार के पीड़ित लोगों के साथ मुलाक़ात कर उनकी आपबीती सुनेगी और उसे रिकॉर्ड करेगी। ऑपइंडिया से ख़ास बातचीत में निर्देशक विवेक ने कहा कि ऐसा दुनिया में पहली बार हो रहा है, जब 30 वर्षों के लम्बे इंतज़ार के बाद मीडिया और राजनेताओं का काम एक फ़िल्म निर्देशक कर रहा है। कश्मीरी पंडितों के दुःख-दर्द को दिखाती उनकी अगली फ़िल्म ‘इन्वेस्टीगेशन’ जॉनर की होगी।

विवेक अग्निहोत्री ने कहा कि वह लम्बे समय से कश्मीरी पंडितों पर फ़िल्म बनाना चाह रहे थे और अब वह इस मामले को काफ़ी करीब से जानने के बाद इस संवेदनशील मुद्दे को हैंडल करने में सक्षम हैं। उन्होंने कहा कि निर्दोष बच्चों को मार डाला गया, महिलाओं के साथ बलात्कार हुए, कत्लेआम मचाया गया और पंडितों को उनके घर से बेघर कर अपने ही देश में शरणार्थियों की तरह जीने को मजबूर कर दिया गया। हालाँकि, कई राजनेताओं व कार्यकर्ताओं से बातचीत करने के बाद विवेक अग्निहोत्री इस विषय पर पुस्तक लिखना चाहते थे लेकिन अंततः उन्होंने फ़िल्म बनाने का निर्णय लिया।

सिर्फ़ कश्मीर ही नहीं, विवेक ने मुंबई और दिल्ली से लेकर विदेशों तक बसे कश्मीरी पंडितों के अनुभव जानने के लिए उन सबसे मुलाक़ात की योजना बनाई है ताकि फ़िल्म को वास्तविक बनाया जा सके। कश्मीर पर आधारित फ़िल्मों में भारतीय सेना को ग़लत तरीके से पेश किए जाने को लेकर नाराज़ विवेक ने कहा कि वो इस कल्पित नैरेटिव को तोड़ देंगे और वास्तविकता दिखाएँगे। विवेक अग्निहोत्री की इस फ़िल्म का नाम ‘द कश्मीर फाइल्स’ होगा। ‘द ताशकंद फाइल्स’ के रूप में काफ़ी दिनों बाद विवेक को आलोचकों और दर्शकों, दोनों का भरपूर प्यार मिला है।

हालाँकि, कुछ गिरोह विशेष के आलोचकों ने उनकी फ़िल्म को नेगेटिव समीक्षा देकर दर्शकों को प्रभावित करना चाहा लेकिन रिलीज के 50 दिनों बाद फ़िल्म की IMDB रेटिंग 8.4 है, जो तमाम नेगेटिव समीक्षाओं को तमाचा लगाने के लिए काफ़ी है। विवेक अग्निहोत्री ने फ़िल्म की प्रीमियर के दौरान ऑपइंडिया से बातचीत करते हुए ‘अर्बन नक्सल्स’ को ये फ़िल्म देखने की सलाह दी थी। हाल ही में विवेक अग्निहोत्री अनुपम खेर, अशोक पंडित और मधुर भंडारकर के साथ एक फोटोशूट में दिखे थे।

‘मेरा एनकाउंटर किया जा सकता है, सांसदी छोड़कर लड़ूँगा विधानसभा चुनाव’

अपने विवादित बयानों से पहचाने जाने वाले समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान ने रविवार (मई 3, 2019) को अपनी सांसदी छोड़ने के संकेत दिए। उन्होंने संभावना जताई कि वो संसद से इस्तीफ़ा देने के बाद अगला विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं।

आजम खान ने राज्य सरकार पर कई आरोप भी लगाए। उनके अनुसार प्रदेश में उनको रास्ते से हटाने के लिए हर तरह की कोशिशें की गई हैं, उन पर आपराधिक इल्जाम मढ़े गए हैं और उनकी हत्या का प्रयास भी हुआ है। उनका कहना है कि अधिकारियों ने उनसे (आजम से) अपनी जान को खतरा इसलिए बताया है ताकि बाद में उन्हें हिस्ट्रीशीटर घोषित करके उनका एनकाउंटर किया जा सके। इसके साथ उन्होंने मीडिया पर भी आरोप लगाए कि मीडिया ने जनता के सामने उनकी छवि को ऐसे दिखाया है कि वह उत्तर प्रदेश के ऐसे सांसद हैं जिन पर सबसे अधिक आपराधिक मुकदमे हैं। 

सपा जिलाध्यक्ष के घर रोजा-इफ्तार पार्टी में मीडिया से हुई बातचीत में आजम खान ने रामपुर की हालत पर अपनी नाराज़गी जाहिर की है। उनका कहना है कि रामपुर में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति बहुत बेकार है और अस्पतालों में डॉक्टर भी नहीं है। आजम खान के मुताबिक वह एक अस्पताल चला रहे हैं, लेकिन अब उसे बंद करने की कोशिश की जा रही है। उनकी शिकायत है कि रामपुर में एक बैराज के कंस्ट्रक्शन का काम भी लंबे समय से लंबित पड़ा हुआ है। जिसे पूरा होना चाहिए, लेकिन हो नहीं पा रहा है।

विरोध के बाद हटाई गई हिंदी की अनिवार्यता, सरकार ने समझाया ‘यह नीति नहीं, सिर्फ़ ड्राफ्ट है’

हिंदी भाषा को लेकर चल रहे विवाद के बीच केंद्र सरकार ने ‘ड्राफ्ट नेशनल एजुकेशन पॉलिसी’ में हल्का बदलाव किया है। सोमवार (जून 3,2019) को हुए इस बदलाव के बाद हिंदी भाषा को वैकल्पिक बना दिया गया है। ड्राफ्ट के बदले गए हिस्से में लिखा है, “लचीलेपन के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए, जो भी विद्यार्थी पढ़ी जा रही भाषाओं में से एक या दो में बदलाव करना चाहते हैं (एक भाषा का ज्ञान साहित्य स्तर पर होना चाहिए), ऐसा वे छठी या सातवीं कक्षा में कर सकते हैं, जब तक कि वे बोर्ड परीक्षाओं में सभी तीन भाषाओं में अच्छा प्रदर्शन करने में सक्षम हैं।” यह पहले लिखी गई चीजों से अलग है।

जिस हिस्से में बदलाव किया गया है, उसमें पहले व्यवस्था दी गई थी कि हिंदी भाषी राज्यों में विद्यार्थी हिंदी व अंग्रेजी के सिवा एक अन्य भारतीय भाषा का अध्ययन करेंगे जबकि जिन राज्यों में हिंदी नहीं बोली जाती, वहाँ के छात्र हिंदी और अंग्रेजी के सिवा अपनी मातृभाषा में पढेंगे। इसे ‘Three Language Formula’ कहा जा रहा था। ड्राफ्ट पॉलिसी में साफ़-साफ़ कहा गया है कि बहुभाषा की जानकारी आज के भारत की ज़रूरत है और इसे एक भार की जगह मौक़ा के रूप में देखना चाहिए, ताकि अपने ज्ञान और सीखने की सीमा बढ़ाई जा सके।

इस बारे में अधिक जानकारी देते हुए केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल ने कहा:

“सरकार अपनी नीति के तहत सभी भारतीय भाषाओं के विकास को प्रतिबद्ध है और किसी प्रदेश पर कोई भाषा नहीं थोपी जाएगी। हमें नई शिक्षा नीति का मसौदा प्राप्त हुआ है, यह रिपोर्ट है। इस पर लोगों एवं विभिन्न पक्षकारों की राय ली जायेगी, उसके बाद ही कुछ होगा। कहीं न कहीं लोगों को ग़लतफ़हमी हुई है। हमारी सरकार सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान करती है और हम सभी भाषाओं के विकास को प्रतिबद्ध है। किसी प्रदेश पर कोई भाषा नहीं थोपी जाएगी। यही हमारी नीति है, इसलिए इस पर विवाद का कोई प्रश्न ही नहीं है।”

बता दें कि जब से ड्राफ्ट पॉलिसी पर चर्चा शुरू हुई थी, तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से विरोध के स्वर उठने लगे थे। कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी, तमिलनाडु में डीएमके के मुखिया स्टालिन और अभिनेता कमल हासन और महाराष्ट्र में एनसीपी ने इस पॉलिसी का विरोध किया है। हालाँकि, सरकार बार-बार यह स्पष्ट कर चुकी है कि यह कोई नीति नहीं है बल्कि ड्राफ्ट है, सिफारिश है, और इसमें चर्चाओं के बाद बदलाव किए जाएँगे। लेकिन, गैर-हिंदी भाषी राज्यों के नेता लगातार केंद्र सरकार पर हिंदी भाषा थोपने का आरोप मढ़ रहे हैं।

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी सरकार का पक्ष रखते हुए आश्वस्त किया कि यह सिर्फ़ एक रिपोर्ट है, और इस पर जनता से राय लेने के बाद ही आगे काम किया जाएगा। तीन भाषाओं का फॉर्मूला 1968 में पहली शिक्षा नीति लागू होने के बाद ही चालू कर दिया गया था। चूँकि, कम उम्र के बच्चे भाषाओं को ज़ल्दी सीखते हैं, इसीलिए उन्हें तीन भाषाओं का ज्ञान देने की बात कहीं गई थी। उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने कहा कि उत्तर भारतवासियों को दक्षिण भारत की और दक्षिण भारतवासियों को उत्तर भारत की भाषाएँ सीखनी चाहिए।

13 लोगों सहित सेना का AN-32 विमान लापता, चीनी सीमा के पास करना था लैंड

भारतीय वायु सेना का मालवाहक विमान एंटोनोव (एएन)-32 लापता हो गया है। तीन घंटे से इसका कोई पता नहीं चल रहा है। यह विमान असम के जोरहाट सैन्य हवाई अड्डे से अरुणाचल प्रदेश के चीनी सीमा के पास स्थित मेचुका घाटी के एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड के लिए निकला था। विमान में चालक दल के 8 सैनिकों समेत 13 लोग सवार थे। वायुसेना ने इस विमान की खोज में अपने सी-130 और सुखोई-30 विमानों समेत सभी उपलब्ध संसाधनों को लगा दिया है

एयरक्राफ्ट एन-32 ने जोरहाट एयरबेस से दोपहर 12.25 पर टेकऑफ किया था। आखिरी बार एयरबेस से उसका 1 बजे कॉन्टैक्ट हुआ था।

पहले भी लापता हो चुके हैं विमान

सैन्य विमान लापता होने की यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले 2016 में भी एक एएन-32 मॉडल का ही विमान 29 यात्रियों समेत गायब हो गया था। उस समय भी वायुसेना ने खोज में बहुत जद्दोजहद की थी मगर कोई सफलता हाथ नहीं लगी थी। अंततः विमान को दुर्घटनाग्रस्त, और उसमें सवार सभी 29 लोगों को मृत मान लिया गया था। चेन्नै के तंबरम एयरबेस से अंदमान निकोबार द्वीप समूह के लिए चला विमान बंगाल की खाड़ी में लापता हो गया था

श्री लंका: आत्मघाती हमले के बाद बौद्ध भिक्षु के आमरण अनशन पर हिज़्बुल्लाह और आज़ात सैली, 2 गवर्नरों का इस्तीफा

श्री लंका में दो प्रांतों के मुस्लिम समुदाय के गवर्नरों ने इस्तीफा दे दिया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार उनका यह इस्तीफा एक बौद्ध भिक्षु के आमरण अनशन करने के बाद आया। दरअसल श्री लंका में 21 अप्रैल को ईस्टर के दिन हुए जिहादी आत्मघाती हमलों के बाद से ही भारी रोष व्याप्त है। श्री लंका की संसद में जन प्रतिनिधि अतुरलिए रतना तेरो- जो कि एक बौद्ध भिक्षु भी हैं- ने शुक्रवार (31 मई 2019) को आमरण अनशन शुरू कर दिया। रतना तेरो अपनी पाँच माँगों पर अड़े थे। उनका आरोप था कि आतंकी हमलों में मुस्लिम नेताओं की मिलीभगत है और इसकी जाँच की जानी चाहिए।

रतना तेरो की माँग थी कि मंत्री रिशाद बतीउद्दीन, और दो गवर्नर- ए एल ए एम हिज़्बुल्लाह और आज़ात सैली को इस्तीफा देना चाहिए। श्री लंका में सिंहली बौद्ध तबके और भिक्षुओं की माँग है कि मुस्लिम नेताओं की आतंकवादियों से संबंध की जाँच होनी चाहिए। हालाँकि मुस्लिम नेताओं ने इससे इंकार किया है। श्री लंका की जनता और अत्यधिक राजनैतिक दबाव के कारण मुस्लिम गवर्नरों को इस्तीफा देना पड़ा।

सांसद रतना तेरो के आमरण अनशन और माँग के आगे आखिरकार मुस्लिम गवर्नरों को झुकना पड़ा और और हिज़्बुल्लाह और सैली को इस्तीफा देना पड़ा। राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने दोनों का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। गौरतलब है कि रतना तेरो सत्ताधारी दल यूनाइटेड नेशनल पार्टी के सांसद हैं। श्री लंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे भी इसी पार्टी के सदस्य हैं।

रतना तेरो कैंडी स्थित दालदा मालिगावा मंदिर के सामने शुक्रवार से अनशन पर थे। यह मंदिर कैंडी में स्थित है। सोमवार को रतना तेरो के समर्थन में भारी भीड़ वहाँ तक पहुँची। इस बीच सभी दूकाने बंद रहीं और अनशन के समर्थन में क्षेत्र में हड़ताल रही। मुस्लिम गवर्नरों के इस्तीफा देने के बाद आज करीब 3 बजे रतना तेरो ने अनशन समाप्त कर दिया।

इससे पहले पूर्व राष्ट्रपति और वर्तमान नेता प्रतिपक्ष महिंदा राजपक्षे के समर्थकों ने मंत्री बतीउद्दीन के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव रखा था जिसपर इस महीने के अंत में चर्चा होनी है।

ख्वाजा दरगाह परिसर से मुहम्मद सागर ने भीख मँगवाने को किया 3 साल की बच्ची का अपहरण

अजमेर के ख्वाजा गरीब नवाज दरगाह परिसर से गत 29 मई को शाम 7 बजे तीन साल की बच्ची का अपहरण करने वाले आरोपित को पुलिस ने महज 36 घंटे के भीतर गुजरात के गाँधी नगर से गिरफ्तार कर अपहृत बच्ची को सकुशल बरामद कर लिया। आरोपित मुहम्मद सागर व उसके चंगुल से छुड़ाई गई बच्ची को लेकर पुलिस टीम रविवार मई 02, 2019 को अजमेर पहुँची। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपित ने भीख मँगवाने के लिए बच्ची का अपहरण कर भागने की जानकारी दी है। यह कार्रवाई अजमेर एसपी कुंवर राष्ट्रदीप सिंह के निर्देशन में की गई।

सीसीटीवी फुटेज से आया पहचान में

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एसपी कुंवर राष्ट्रदीप ने बताया कि गिरफ्तार आरोपित मोहम्मद सागर चिश्ती है। वह गाँव राई खादीगी पुलिस थाना गाजल जिला मालदा, पश्चिम बंगाल हाल PSL कारगो सेक्टर-2 गाँधीधाम गुजरात में रहता है। इस संबंध में खुरजा, बुलन्दशहर (यूपी) निवासी एक महिला ने दरगाह थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई थी कि वह 29 मई को अपनी 14 वर्ष व 3 वर्ष की दो बेटियों तथा 8 वर्षीय एक बेटे के साथ शाम 4 बजे अजमेर स्थित ख्वाजा की दरगाह में हाजरी लगाने पहुँची थी।

बच्ची अपने भाई-बहनों के साथ जन्नति दरवाजे के सामने बैठी थी जहाँ पर तीनों बच्चे खेल रहे थे। तभी शाम करीब 7 बजे रोजा इफ्तारी के समय लौटे तो 3 साल की छोटी बेटी नहीं मिली। तब बच्ची की माँ ने दरगाह में मौजूद लोगों की सहायता से दरगाह में गुम हुई बेटी की तलाश शुरू की। मामला अजमेर एसपी कुंवर राष्ट्रदीप तक पहुँचा और एसपी के निर्देशन में एएसपी सरिता सिंह, दरगाह थानाप्रभारी हेमराज चौधरी व वृत्ताधिकारी सुरेंद्र सिंह बच्ची की तलाश में जुटे।

दरगाह से गुम हुई बच्ची की तलाश में दरगाह थाना स्टॉफ के अलावा गंज थाना व क्लाक टॉवर थाना पुलिस सहित सात टीमें गठित कर दी। पुलिस ने रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, प्रमुख बाजार और दरगाह परिसर और आसपास लगे सीसीटीवी फुटेज खंगालने शुरु किए। जिसमें सफेद शर्ट, नीली जीन्स व सफेद मुस्लिम टोपी सिर पर लगाए एक लड़का नजर आया। जिसकी गोद में तीन वर्षीया लाल रंग का टॉप पहने बच्ची नजर आई। वह दरगाह से शाम 7.05 बजे शाहजानी मस्जिद से महफिल खाना गेट पहुँचा।

इसके बाद मोहम्मद सागर बच्ची को गोद में लिए हुए मुख्य बाजार से होकर शाम 7:22 बजे क्लॉक टावर के पास से रेलवे स्टेशन के अंदर जाते हुए नजर आया। वहाँ वह प्लेटफॉर्म नंबर 2 पर नजर खड़ा नजर आया। इसके बाद ओझल हो गया। अगले दिन 30 मई को आरपीएफ की स्पेशल टीम को मोहम्मद सागर रात 9:05 बजे भुज जाने वाली ट्रेन नं 14321 से बरेली में 2 नम्बर प्लेटफॉर्म से इंजन के पीछे प्रथम कोच में बैठता दिखाई दिया।

तब अजमेर पुलिस ने मारवाड़ जंक्शन, आबू रोड, पालनपुर, डिसा, भीलडी, रगनपुर, संतलपुर, बांजू, गांधीधाम, आदिपुर, अजार व भुज में जीआरपी, आरपीएफ को फुटेज भेजे। वहीं, एक और पुलिस टीम को भुज के लिए रवाना किया गया। अजमेर पुलिस ने रेलवे प्रशासन, आरपीएफ व जीआरपी की टीम की मदद तथा गुजरात पुलिस के सहयोग से अपहरणकर्ता मोहम्मद सागर गाँधीधाम, गुजरात पहुँचने पर पकड़ा गया। उसके चंगुल से बच्ची को मुक्त करवाया गया।

राजीव गाँधी मरते समय PM थे, सीताराम केसरी अध्यक्ष नहीं: कॉन्ग्रेस अपनी वेबसाइट से फैला रही फेक न्यूज़

परिवारवाद में कॉन्ग्रेस किस कदर डूबी है, इसकी बानगी तो राहुल गाँधी के पैरों में गिरकर उनसे अध्यक्ष पद न छोड़ने की पार्टी की चिरौरी से ही दिख गई थी। लेकिन अब पार्टी परिवार की मुराद में इतना डूब गई है कि इतिहास को भी बदलने पर आमादा है। राजीव गाँधी को पार्टी की वेबसाइट पर मरते समय भारत का तत्कालीन प्रधानमंत्री बताया गया है जबकि सच्चाई यह है कि उस समय भारत के प्रधानमंत्री चंद्रशेखर हुआ करते थे। इसके अलावा पार्टी की वेबसाइट पर पूर्व अध्यक्ष सीताराम केसरी को पार्टी के अध्यक्षों की सूची से भी हटा दिया गया है।

राहुल गाँधी की जीवनी में बताया राजीव को तत्कालीन प्रधानमंत्री

अपने (नि?)वर्तमान अध्यक्ष और राजीव गाँधी के बेटे राहुल गाँधी की पार्टी वेबसाइट पर प्रकाशित जीवनी में कॉन्ग्रेस ने लिखा है कि अपनी मृत्यु के समय (21 मई, 1991 को) राहुल के पिता राजीव गाँधी भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री थे। यह पूरी तरह गलत है। राजीव की हत्या के समय उनकी सरकार न केवल जा चुकी थी बल्कि उसके बाद प्रधानमंत्री बनने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह की भी सरकार गिर कर चंद्रशेखर की सरकार आ गई थी, जिसे पहले तो राजीव गाँधी का ही समर्थन जिलाए हुए था, और बाद में राजीव गाँधी ने समर्थन वापस ले लिया था, जिसके बाद देश में नई लोकसभा के निर्वाचन की प्रक्रिया चल रही थी। उसी दौरान प्रचार करते हुए राजीव गाँधी की लिट्टे के दहशतगर्दों ने हत्या कर दी थी

राफेल-राफेल का झूठा राग गाने वाले राहुल गाँधी की कॉन्ग्रेस भी उतनी ही झूठी निकली

और ऐसा भी नहीं है कि यह कोई टाइपिंग की गलती, क्लेरिकल मिस्टेक या तथ्यों की ग़लतफ़हमी हो- क्योंकि ऐसा कुछ तो केवल एक बार हो सकता है, बार-बार नहीं। जबकि कॉन्ग्रेस की वेबसाइट पर एक बार नहीं बल्कि दो बार राजीव गाँधी को उनकी हत्या के समय भारत का तत्कालीन प्रधानमंत्री बताया गया है।

न खाता न बही, कॉन्ग्रेस से केसरी की याद मिटी

कॉन्ग्रेस में सीताराम केसरी का 1996 से 1998 तक कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष होना आज गाँधी परिवार की आँखों में चाहे जितना खटके मगर यह एक ऐतिहासिक तथ्य है- उतना ही जितना कि यह कि सोनिया गाँधी को पार्टी अध्यक्षा बनाने के लिए 14 मार्च 1998 को केसरी को एक कमरे में बंद कर एक तरह से जबरदस्ती, गुंडागर्दी का सहारा लिया गया था। और अब कॉन्ग्रेस इस आँखों के काँटे को मिटा कर तारीख बदलने की कोशिश कर रही है।

पार्टी के 1990 के बाद के अध्यक्षों की सूची में से सीताराम केसरी का नाम गायब है।

दोनों घटनाएँ संयोग, या कुछ और?

इन दोनों घटनाओं का इतने आस-पास होना, वह भी उस समय जब कॉन्ग्रेस और देश में ‘गाँधी’ उपनाम की महत्ता पर गंभीर प्रश्नचिह्न हैं, महज संयोग है? या फिर कॉन्ग्रेस के इतिहास से (और भारत के भी इतिहास से) गाँधी के इतर चरित्रों को आधिकारिक तौर पर हटाने की कोशिश? यह तो तय है कि कॉन्ग्रेस की वेबसाइट पर राजीव गाँधी के कार्यकाल का ‘विस्तार’ कर दिए जाने से न इस देश का इतिहास पुनर्लिखित कर वीपी सिंह और चंद्रशेखर को भुला दिया जाएगा, न ही सीताराम केसरी को बाकी पार्टियाँ और देश मिटा देगा। लेकिन क्या इससे यह संदेश दिए जाने की कोशिश हो रही है कि “गाँधी इज़ कॉन्ग्रेस, कॉन्ग्रेस इज़ गाँधी”? क्या कॉन्ग्रेस अपने कैडर में राहुल गाँधी के हटने की उम्मीद में महत्वाकांक्षा पाले क्षत्रपों (शशि थरूर लोकसभा में कॉन्ग्रेस के मुखिया बनने की इच्छा जाहिर कर चुके हैं करण थापर को इंटरव्यू में) को यह संदेश दे रही है कि कॉन्ग्रेस के लिए नेहरू-गाँधी-वाड्रा परिवार इतना जरूरी है कि उसे बनाए रखने के लिए पार्टी इतिहास पुनर्लिखित भी करेगी, अगर जरूरी हुआ- इसलिए क्षत्रप सब्जबाग न पालें…