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SC द्वारा प्रियंका को बरी करने के बाद ट्विटर पर ममता के मीम्स की बाढ़

ममता बनर्जी को अब एक मीम के लिए भाजयुमो नेत्री प्रियंका शर्मा को जेल भेजना भारी पड़ने लगा है। गेम ऑफ़ थ्रोन्स के खलनायक ‘नाइट किंग’ से लेकर हिटलर और ग्रीक राक्षसी मैड्यूसा तक मीमर्स हर वैराइटी और रंग-ढंग के मीम्स पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कॉन्ग्रेस की अध्यक्षा पर बनाने लगे हैं। यह ट्रेंड शुरू करने वाले भाजपा कार्यकर्ता और मशहूर TEDx स्पीकर विकास पांडे थे। उन्होंने लोगों से ममता बनर्जी के ऊपर अधिकाधिक मीम बनाकर उनके निम्न ट्वीट के जवाब में पोस्ट करने की अपील की:

जवाब में लोगों ने ममता बनर्जी पर मीम्स का सैलाब उँड़ेल दिया।

इन मीम्स में लोगों ने खुलकर अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग किया है।

‘जस्ट फ़क ऑफ़’ के साथ ‘स्टार प्रचारक’ मणिशंकर ब्रो की हुई वापसी, BJP में ख़ुशी की लहर

लोकसभा चुनाव का अब आखिरी चरण बाकी है। ऐसे में भाजपा से लेकर कॉन्ग्रेस और सभी विपक्षी दल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ये उम्मीद लगाकर चल रहे थे कि वो जरूर अभी कोई मास्टरस्ट्रोक खेलेंगे। कॉन्ग्रेस में सेम पित्रोदा और मणिशंकर अय्यर की जबरदस्त घरवापसी देखकर एक बार फिर यकीन हो गया है कि मास्टरस्ट्रोक खेला जा चुका है।

सोशल मीडिया पर मणिशंकर अय्यर का आज ही एक नया वीडियो ‘वायरल’ हुआ है, जिसको लेकर बुद्दिजीवी पत्रकारों में एकदम सन्नाटा देखने को मिला है। इस वीडियो में मणिशंक्कर अय्यर उनका इंटरव्यू लेने गए पत्रकारों को बस घूँसा ही नहीं मार पाए, बाकी अपनी ‘छुपी हुई’ प्रतिभा का जितना भी परिचय वो दे सकते थे, उन्होंने खुलकर दिया।

वायरल हो रहे इस वीडियो में मणिशंकर अय्यर की मानसिक स्थिति ठीक नजर नहीं आ रही है और वो पत्रकारों को धमकाते हुए कभी उन्हें घूँसा मारने का प्रयास करते नजर आ रहे हैं, तो कभी गाली उनकी जुबान पर आते-आते रुक रही है। लेकिन, आखिर मणिशंकर भी इंसान ही हैं और तमाम प्रयासों के बावजूद भी आखिर में उनके मुँह से वो चमत्कारी शब्द निकल गया जिसे अंग्रेजी में कहते हैं “फ़क ऑफ़!” हिंदी में यह बहुत ही गन्दी बात होती है और बेहद निंदनीय मानी जाती है। लेकिन, बहुमत की सरकार द्वारा चुने गए देश के प्रधानमन्त्री को ‘नीच’ कह देने वाले मणिशंक्कर अय्यर के लिए तो यह सब सामान्य बात नजर आती है।

मणिशंकर अय्यर लगातार जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग प्रधानमंत्री के लिए करते आ रहे हैं, वो स्पष्ट रूप से लोकतंत्र को गाली दे रहे हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि राजीव गाँधी के घोटाले का जिक्र कर देने भर से जिस मीडिया गिरोह को नींद नहीं आ रही है, उसे मणिशंकर अय्यर के ‘फ़क ऑफ़’ में भी गुलाब की महक आ रही है और वो लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ कहे जाने वाली पत्रकारिता को गाली देने वाले मणिशंकर को लेकर मौन है।

इस वीडियो में मणिशंकर अय्यर मीडिया से कह रहे हैं, “वो आपसे बात नहीं करते हैं क्योंकि वो डरपोक हैं। नरेंद्र मोदी के तीखे हमले आपने नहीं देखे हैं? उनसे जाकर सवाल कीजिए।” इसके बाद मणिशंकर अय्यर ने अपने दोनों हाथ हवा में उठाकर शानदार अभिनय प्रतिभा का भी परिचय दिया। हालाँकि, यह उनके अभिनय की सूक्ष्म झलक थी, फिर भी मनमोहक थी। इस अभिनय में यह प्रतीत हो रहा है मानो पत्रकारों ने उनसे सवाल करते-करते उनकी जोर से पूँगी बजा दी हो।

मीडिया द्वारा 23 मई के रिजल्ट के सवाल पर वो घूँसा बनाकर पत्रकार की तरफ आगे बढ़े और उनको चुप होने के लिए कहा। पत्रकारों ने उनसे जब निवेदन किया कि कृपया नाराज ना हों, इस पर मणिशंकर अय्यर ने खुलकर अपने मन की बात करते हुए बताया कि वो नाराज हो रहे हैं। इसके बाद मणिशंकर अय्यर ने घूँसा तानते हुए आपत्ति के स्वर में पत्रकार से बहुत ही मधुर स्वर में “जस्ट फ़क ऑफ़” कहकर इंटरव्यू को विराम दिया।

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले ही ऑपइंडिया तीखीमिर्ची सेल ने एक खुलासा करते हुए यह भी बताया था कि मणिशंकर अय्यर बालाकोट एयर स्ट्राइक में मसूद अजहर के साथ ‘निकल नहीं लिए’ हैं, बल्कि वो और मसूद अजहर दोनों ही एकदम सुरक्षित हैं। आज के उनके इस वायरल वीडियो ने इस तथ्य की पुष्टि भी कर डाली है।

नोट : राजनेताओं द्वारा इस प्रकार की भद्दी और अश्लील भाषा का प्रयोग करना आम बात होती जा रही है और ऐसा प्रतीत हो रहा है कि नरेंद्र मोदी की छवि की धज्जियाँ उड़ाने के चक्कर में राहुल गाँधी के सिपाही उन्हीं की पार्टी की धज्जियाँ उड़ाने पर उतारू हो गए हैं। इस प्रकार की भाषा एक वरिष्ठ नेता को शोभा नहीं देती है और कम से कम मीडिया के सामने तो अपनी भाषाशैली पर लगाम लगाकर रखनी चाहिए। मणिशंकर अय्यर द्वारा कहे गए ‘फ़क ऑफ़’ की कड़ी निंदा की जानी चाहिए और अन्य नेताओं को भी इस प्रकार स्तरहीन टिप्पणियाँ करने से बचना चाहिए।

श्री लंका: ‘हिंसा में समुदाय विशेष वाले अपने घरों से निकलकर खेतों में छुप गए, पुलिस तमाशा देखती रही’

अप्रैल के महीने श्री लंका में हुए आत्मघाती हमलों में 250 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। श्रीलंकाई लोगों को यह जानकर बहुत बड़ा झटका लगा था कि उन हमलों के पीछे समुदाय के ही स्थानीय लोगों का हाथ हो सकता है। श्रीलंका में ईस्टर संडे के आत्मघाती हमले के कारण देश में सांप्रदायिक हिंसा काफी ज्यादा भड़क चुकी है। इसको लेकर प्रशासन भी लगातार कदम उठा रहा है।

इस्लामिक आतंकियों द्वारा चर्च और होटलों में की गई खतरनाक बमबारी के बाद से श्री लंका में समुदाय विशेष के लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। मस्जिदों और समुदाय के व्यापार पर हमले के बाद श्रीलंका के कई इलाकों में भारी संख्या में सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया है। श्री लंका के सैनिकों ने बख्तरबंद वाहनों में इस हफ्ते हिंसा की चपेट में आए क्षेत्रों का दौरा किया। इस दौरान निवासियों का कहना है कि हिंसा के वक्त लोग अपने घरों और दुकानों से निकलकर धान के खेतों में छुप रहे थे और वहीं पुलिस खड़ी हिंसा देखती रही।

पुलिस और निवासियों के अनुसार, फेसबुक पर शुरू हुए विवाद के बाद कई दर्जन लोगों ने रविवार (मई 12, 2019) को क्रिश्चियन-बहुल वाले शहर चिलवा में मस्जिदों और समुदाय की दुकानों पर पत्थर फेंके और एक व्यक्ति को खूब पीटा। वहाँ के अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने एक विवादित फेसबुक पोस्ट को लिखने वाले व्यक्ति को गिरफ्तार किया है, जिसकी पहचान 38 वर्षीय अब्दुल हमीद मोहम्मद हसमार के रूप में हुई है।

उसने ऑनलाइन कमेंट में लिखा था, “एक दिन तुम लोगों को रोना है।” लोगों ने इस कमेंट को धमकी के रूप में ले लिया और शहर में हिंसा शुरू हो गया। इस पोस्ट पर मचे बवाल के बाद शहर में कई मस्जिदों और समुदाय की दुकानों पर पथराव किया गया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने इलाके में कर्फ्यू लगा दिया था। 

14 मई को श्री लंका के पास के कोट्टमपतिया में एक मस्जिद में भीड़ के हमले के बाद श्री लंका के सैनिकों ने बख्तरबंद वाहन के जरिए हेटिपोला की सड़कों पर गश्त लगाई। अधिकारियों ने कहा कि सबसे अधिक प्रभावित उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में स्थिति नियंत्रण में थी, जबकि मजहब विरोधी भीड़ रविवार से शहर से शहर जा रही थी। श्री लंका में तनाव का माहौल है और सांप्रदायिक हिंसा भड़की हुई है। इस हिंसा में मजहब विरोधी भीड़ ने मस्जिदों पर हमला किया। इसके अलावा हिंसा के दौरान मजहब के धार्मिक ग्रंथ कुरान को भी जला दिया गया।

कोट्टमपिटिया शहर में एक मस्जिद के बाहर इकट्ठा हुए लोगों के समूह में से एक ने बताया, “समुदाय के लोग पास के धान के खेतों में छुप गए। जिसके कारण किसी की जान नहीं गई।” उन्होंने बताया कि सोमवार की दोपहर के बाद लगभग एक दर्जन लोगों का एक समूह टैक्सियों में आया था और समुदाय के स्वामित्व वाले स्टोर पर पत्थरों से हमला किया। देखते ही देखते भीड़ ने काफी नुकसान किया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक भीड़ ने मुख्य मस्जिद, 17 समुदाय विशेष के स्वामित्व वाले कारोबार और 50 घरों पर हमला किया। 48 साल के अब्दुल बारी ने बताया कि दुकान को पेट्रोल बम से जला दिया गया, उन्होंने कहा कि हमलावर मोटरबाइकों पर थे, जो छड़ और तलवारों से लैस थे।

साथ ही वहाँ के लोगों ने भीड़ को तितर-बितर करने में विफल रहने के लिए पुलिस को दोषी ठहराया। 47 साल के मोहम्मद फलील के अनुसार, “पुलिस देखती रही, वे गली में थे। उन्होंने किसीको भी नहीं रोका। उन्होंने हमें अंदर जाने के लिए कहा। हमने पुलिस को कहा कि इसे रोको, लेकिन पुलिस ने गोली नहीं चलाई। पुलिस को ये रोकना था, लेकिन पुलिस ने ऐसा नहीं किया।”

वहीं, पुलिस के प्रवक्ता रूवान गुणसेकेरा ने उन आरोपों को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया है कि हिंसा के दौरान पुलिस खड़ी थी। उन्होंने कहा कि सुरक्षा की स्थिति नियंत्रण में थी और अपराधियों को दंडित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि सभी पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि हिंसा करने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाए। साथ ही ज्यादा से ज्यादा पुलिस बल का इस्तेमाल किए जाने की बात भी कही गई है। अपराधियों को 10 साल की जेल की सजा हो सकती है। वहीं इस मामले में श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने कहा कि सोमवार देर रात उन्होंने सुरक्षा बलों को मजहब विरोधी हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की जिम्मेदारी दी थीं।

कॉन्ग्रेस को मेरे पति की जरूरत नहीं, तभी नहीं करा रहे प्रचार: सिद्धू की पत्नी का टूटा सब्र का बाँध

नवजोत सिंह सिद्धू के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर भाजपा के अन्य सभी बड़े-छोटे नेताओं को गाली देकर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की नजरों में आने के सारे प्रयास विफल होते नजर आ रहे हैं। वर्तमान हालात ये हैं कि कॉन्ग्रेस में जाने के बाद उनकी स्थिति अब इधर कुआँ, उधर खाई वाली है। स्थिति यह आ गई है कि इस बार लोकसभा चुनाव में उन्हें न तो स्टार प्रचारक की श्रेणी में रखा गया और ना ही उनकी पत्नी नवजोत कौर को टिकट ही दिया गया।

सोमवार (मई 11, 2019) को ही खबर आई कि नवजोत सिंह, गले में समस्या की वजह से फिलहाल प्रचार नहीं करेंगे। हालाँकि इस पर नवजोत कौर के सब्र का बाँध टूट गया है। पंजाब में लोकसभा चुनाव के लिए मतदान से पहले राज्य सरकार में मंत्री और कॉन्ग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू की पत्नी नवजोत कौर ने सिद्धू के प्रचार को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने सीधे-सीधे पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह पर ही ठीकरा फोड़ दिया, जिससे नवजोत सिंह सिद्धू जैसे वाचाल के गले में समस्या आने पर संदेह हो जाता है।

‘अमरिंदर सिंह नहीं चाहते कि सिद्धू प्रचार करें’

नवजोत सिंह की पत्नी नवजोत कौर ने आज स्पष्ट कहा कि नवजोत सिंह सिद्धू से पंजाब में इसलिए प्रचार नहीं कराया जा रहा है क्योंकि कैप्टन अमरिंदर सिंह ऐसा नहीं चाहते हैं। बता दें कि मीडिया में खबर यह आई थी कि सिद्धू के गले में समस्या है, जिसका इलाज चल रहा है, इसलिए वह प्रचार से दूर हैं। खबरों पर गौर करें तो पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू के बीच कई मसलों पर मतभेद बना रहता है। अब नवजोत कौर ने कहा है कि कॉन्ग्रेस पार्टी को सिद्धू की जरूरत ही नहीं है, इसीलिए उनसे पंजाब में प्रचार नहीं कराया जा रहा है।

यह देखना दुखद है कि लगातार कॉन्ग्रेस परिवार के नेतृत्व यानी, राहुल गाँधी की नजरों में आने के लिए प्रयास कर रहे नवजोत सिंह सिद्धू की हालत वर्तमान में बेहद दयनीय हो चुकी है। उन्होंने सुर्ख़ियों में आकर कॉन्ग्रेस परिवार की वाहवाही लूटने के चक्कर में प्रधानमंत्री के लिए कई प्रकार के निम्न से भी निम्नस्तरीय विवादित टिप्पणियाँ दी हैं।

‘मेरा टिकट भी उन्होंने ही कटवाया’

सिद्धू की पत्नी नवजोत कौर ने पंजाब में 19 मई को होने जा रहे लोकसभा चुनाव के लिए मतदान से पहले यहाँ तक कह डाला कि कैप्टन अमरिंदर सिंह की वजह से ही उन्हें लोकसभा चुनाव का टिकट नहीं मिला है। कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ ही उन्होंने आशा कुमारी को भी अपना टिकट कटने के लिए जिम्मेदार बताया। नवजोत कौर ने कहा कि दशहरा पर जो ट्रेन हादसा हुआ था, उसे आधार बनाकर मेरा टिकट काटा गया।

बता दें कि अमृतसर में पिछले वर्ष दशहरे के अवसर पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था, जिसमें शामिल होने के लिए नवजोत कौर पहुँची थीं। इस कार्यक्रम को देखने बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा हुए थे, जिनमें से कुछ रेलवे ट्रैक पर भी खड़े थे और ट्रेन से कुचलकर उनमें से कई की मौत हो गई थी। इस हादसे को लेकर नवजोत कौर पर काफी सवाल उठे थे।

नवजोत कौर ने इस हादसे को ही अपना टिकट कटने के पीछे वजह बताया है। साथ ही इस बहाने अपने पति व पंजाब सरकार में मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू से पंजाब में प्रचार न कराने को लेकर भी नवजोत कौर ने कैप्टन अमरिंदर सिंह की आलोचना की है।

‘हिंदू आतंकवाद’ वाले बयान पर कमल हासन के खिलाफ FIR दर्ज

अभिनेता से राजनेता बने कमल हासन पर ‘हिंदू आतंकवादी’ वाले बयान के बाद दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में आपराधिक शिकायत दर्ज की गई है। कमल के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 153(ए) और 295(ए) के तहत शिकायत दर्ज कराई गई है। उन पर आतंकवाद को हिंदू धर्म के साथ जोड़कर हिंदुओं की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाने का आरोप है।

कमल हासन के खिलाफ यह शिकायत हिंदू सेना के विष्णु गुप्ता ने दर्ज कराया है। जिनका आरोप है कि इस बयान से हिंदुओं की भावनाएँ आहत हुई हैं। गुप्ता का आरोप है कि इस बयान के जरिए दो समुदायों के बीच द्वेष फैलाने की भी कोशिश की गई है। इस मामले की सुनवाई 16 मई को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में होगी। इसके अलावा कमल हासन के खिलाफ वरिष्ठ अधिवक्ता और बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय ने दिल्ली हाईकोर्ट में भी शिकायत दर्ज कराई गई है। जिसमें इस मामले में चुनाव आयोग से दखल देने की गुजारिश की गई है। इस मामले में कल (मई 15, 2019) सुनवाई हो सकती है।

गौरतलब है कि, कमल हासन ने रविवार (मई 12, 2019) को तमिलनाडु के अरावकुरिचि में अपनी पार्टी मक्कल निधि मय्यम के उम्मीदवार के लिए चुनाव प्रचार के दौरान कहा कि स्वतंत्र भारत का पहला आतंकवादी एक हिंदू था और उसका नाम नाथूराम गोडसे था। उन्होंने कहा कि वो इसलिए ये नहीं कह रहे हैं, क्योंकि ये मुस्लिम बहुल इलाका है, बल्कि वो ऐसा इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि महात्मा गाँधी की प्रतिमा सामने है। हासन के इस बयान पर जमकर हंगामा हुआ।

इस बयान के बाद कमल हासन के इस बयान की भाजपा, एआईएडीएमके, संघ और हिंदू महासभा ने कड़ी निंदा की। और अब हिंदू आतंकवादी के बयान पर घिरे कमल हसन की सभी चुनावी रैलियाँ रद्द हो गई हैं। वहींं, तमिलनाडु सरकार के मंत्री केटी राजेंद्र बालाजी ने कमल हासन के इस बयान पर कड़ा एतराज जताते हुए उनकी जीभ काटने की बात कही। उन्होंने कहा कि किसी एक के किए गलत काम के लिए पूरी कौम को इस तरह से सवालों के घेरे में नहीं लाया जा सकता है। उनका कहना है कि कमल ने अल्पसंख्यकों का वोट हासिल करने के लिए ये बयान दिया है।

अमित शाह के रोड शो से पहले तृणमूल कार्यकर्ताओं ने हटाए BJP के बैनर-झंडे, पुलिस देखती रही

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के कोलकाता के रोडशो के ठीक पहले भाजपा कार्यकर्ताओं ने पार्टी के झंडे, बैनर आदि हटाए जाने को लेकर नाराजगी जताई है। इसका आरोप उन्होंने सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं पर लगाया है। पुलिस पर भी मूकदर्शक बन तमाशा देखने का आरोप लग रहा है।

दोनों पक्ष दे रहे निर्वाचन आयोग का हवाला

अमित शाह के रोडशो के केवल दो घंटे पहले खुद उनके, उत्तरी कोलकाता लोकसभा क्षेत्र के भाजपा प्रत्याशी राहुल सिन्हा के, और यहाँ तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी कटआउट लेनिन सारणी रोड से हटा दिए गए। अमित शाह का रोडशो आज दोपहर में मध्य कोलकाता की शहीद मीनार से शुरू होकर उत्तर कोलकाता के माणिकतला स्थित स्वामी विवेकांनद के आवास तक होना था।

भाजपा का कहना है कि जब निर्वाचन आयोग ने रोडशो की इजाजत दे दी है तो झंडे-बैनर क्यों हटाए जा रहे हैं। भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने पश्चिम बंगाल सरकार पर गुंडागर्दी करने का आरोप लगाया है। साथ में यह भी कहा कि वे इसकी शिकायत निर्वाचन आयोग से करेंगे। वहीं दूसरी ओर पुलिस ने भी दावा किया है कि भाजपा की प्रचार सामग्री निर्वाचन आयोग के आदेश के पालन में ही हटाई गई है। उन्होंने दावा किया कि भाजपा के झंडे सरकारी संपत्ति पर बिना पूर्वानुमति के लगे थे।

इसपर भाजपा का कहना है कि यदि यह निर्वाचन आयोग के आदेश के पालन में हो रहा था तो यह सरकारी कर्मियों द्वारा किया जाना चाहिए था। भाजपा ने आरोप लगाया कि उनके झंडे आदि तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं ने हटाए जबकि पुलिस खड़ी देखती रही। एक भाजपा नेता के अनुसार हटाए जाने की प्रक्रिया में जानबूझकर कटआउट्स को क्षति पहुँचाई गई। प्रचार सामग्री को सड़क पर फेंक दिया गया।

निर्वाचन आयोग के पास नो कमेंट्स

न्यूज़ एजेंसी IANS द्वारा संपर्क किए जाने पर निर्वाचन आयोग के अधिकारियों ने फ़िलहाल टिप्पणी करने से मना कर दिया। उनके अनुसार उस समय तक उनके पास इस मामले पर कोई ‘स्पेसिफिक अपडेट’ नहीं था। बंगाल के डिप्टी मुख्य निर्वाचन अधिकारी (डिप्टी CEO) अमितज्योति भट्टाचार्य ने IANS से शाम को आने के लिए कहा

बलात्कारों को नॉर्मल मान चुका समाज और पत्थरों से मारने की बातें

कभी-कभी सोचती हूँ मैं उस शिक्षित समाज का हिस्सा हूँ जो बलात्कार जैसे शब्दों को लेकर बेहद सामान्य हो चुका है। मेरे आस-पास का समाज अब जानता है कि किसी भी रेप की घटना का विरोध दर्ज करने के लिए उसे सड़कों पर उतर आना है, प्रशासन को दोषी ठहराना है, पीड़िता के परिजनों में न्याय दिलाने की उम्मीद को जगाना है और फिर इस क्रम को दोहराने के लिए अगली लड़की के ‘रेप पीड़िता’ में बदलने तक का इंतजार करना है। मेरे समाज को मालूम है कि बलात्कार के दर्द को महसूस करने के लिए मोमबत्ती लेकर निकलना या फिर सोशल मीडिया पर अतिनारीवादी पोस्ट लिखना बहुत जरूरी है।

मेरे समाज के लिए ये मानदंड हैं जिनसे साबित होगा कि बांदीपोरा मे 3 साल की बच्ची का रेप, अलवर में नवविवाहिता का बलात्कार और दिल्ली में 75 वर्षीय बुजुर्ग महिला के साथ हुए दुष्कर्म का उन्हें दुख है और वे ‘भावी पीड़िताओं’ के लिए एक बेहतरीन समाज को बनाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसे ही कुछ बेहतर समाज को बनाने की एक आवाज़ जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी उठाई है। उन्होंने बेहतर समाज की कल्पना में ‘शरिया’ को आखिरी विकल्प समझा है और कहा कि शरिया कानून लागू करके रेप आरोपितों को पत्थर मार-मारकर खत्म कर दिया जाना चाहिए।

महबूबा मुफ्ती का ये गुस्सा, ये आक्रोश जाहिर है, क्योंकि वो भी एक महिला हैं और उन्हें पढ़ने-सुनने वाले लोग हर जगह मौजूद हैं। उनके सवाल भी ठीक हैं कि एक ओर जहाँ लड़की के हाव-भाव को उसके साथ हुए रेप के लिए दोषी ठहरा दिया जाता है, उन मानकों पर 3 साल की मासूम कैसे फिट बैठ रही है। उनका कहना है कि ऐसे वक़्त में शरिया क़ानून के अनुसार, ऐसे काम करने वालों को पत्थर से मारकर मौत की सज़ा देनी चाहिए। आखिर बिना किसी गलती के मासूम को इस अनचाही और अंजान प्रताड़ना से क्यों गुजरना पड़ा, विश्वास करके चॉकलेट के लिए साथ चले जाना कहाँ का जुर्म है…? लेकिन क्या वाकई लड़ाई इस बात की है कि जिसने मासूम के साथ ये घिनौना काम किया है उसे सख्त से सख्त सजा मिले ताकि ‘रेप’ अपराध की श्रेणी में बरकरार रह सके या इस बात की है कि कैसे ऐसी मानसिकता को जड़ से उखाड़ा जाए जो 3 साल की लड़की से लेकर 75 साल की बुजुर्ग महिला में एक आदमी को सिर्फ़ योनि देखने पर मज़बूर करती है।

ये विडंबना है हमारे विकल्पहीन समाज की कि हम प्रशासन पर सवाल उठाने के लिए अपनी एक्स्ट्रीम पिच का इस्तेमाल करते हैं लेकिन उपाय सुझाने के लिए हम शरिया पर जा अटकते हैं । हम सामाजिक रूप से इस समस्या को जड़ से खत्म करने के बजाए ऐसा डर बनाने की कोशिश करने में जुट जाते हैं कि जिससे सिर्फ़ उस लड़की की सुरक्षा सुनिश्चित हो जो बोलना और चिल्लाना जानती है। क्योंकि शरिया का डर सिर्फ़ उन्हीं के भीतर होगा जो जानेंगे कि लड़की उनके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएगी। जिन्हें मालूम होगा कि लड़की को भीतर ही भीतर कितना भी छीलें पीड़िता किसी से कुछ नहीं कहेगी उन्हें इसका कैसा डर? जिन्हें मालूम है उन्हें उनकी हवस मिटाने के लिए बाहर की कोई अंजान लड़की न भी मिले तो वो घर में बेटी, भतीजी, भाँजी, बहन पर अपना जोर आज़मा लेंगे और ये बात किसी को नहीं मालूम चलेगी उन्हें शरिया का कैसा डर…

स्वीडन, अमेरिका, साउथ अफ़्रीका समेत कई विकसित यूरोपीय देशों में रेप के सबसे ज्यादा मामले सामने आते हैं, लेकिन हम बुद्धि से इतने लाचार लोग हैं कि हम उसे उनकी संस्कृति का हिस्सा बताकर दरकिनार कर देते हैं और अपनी सभ्यता-संस्कृति की साख के लिए कड़े से कड़ा कानून बनाने की बात करते हैं। हम लड़कियों की सुरक्षा के लिए उन्हें घर में दबाना पसंद करते हैं, और बलात्कार की परिभाषा अपने तय मानकों पर निर्धारित करते हैं। कुछ हद तक, शहर की लड़की के साथ सड़क या बसों आदि में हुई छेड़खानी हमारी खबरों का हिस्सा होती हैं, लेकिन गाँवों में लगातार हो रहे शोषण और पंचायतों द्वारा “आपस में सुलझा लो” वाली खबरें हम तक पहुँचती भी नहीं हैं। हम निर्भया जैसे कांड पर आवाज़ उठाना जानते हैं लेकिन उस लड़की की मनोव्यथा जानने की भी कोशिश नहीं करते हैं जो भीतर ही भीतर खुद को तार-तार कर रही होती है।

दिल्ली में कुछ समय पहले 8 महीने की बच्ची का रेप हो जाता है और उस रेप को करने वाला उसका भाई होता है, क्या ऐसे मामलों में भी शरिया कानून का विकल्प उचित बैठता है। हम कठुआ जैसे मामलों में प्रशासन को दोषी ठहराते हैं लेकिन क्या कभी खुद से पूछते हैं कि इसमें प्रशासन का कितना दोष है। हम और हमारा मीडिया बलात्कार के मामलों में भी साम्प्रादायिकता खोज़ निकालता है लेकिन भूल जाता है कि उनके घरों में कोई न कोई ऐसी लड़की जरूर होती है जिस पर उनके ही किसी करीबी की गंदी निगाह रहती है। जो उनकी नजरों से हटते ही उनकी बेटी-बहनों पर प्यार से हाथ फेर लेता है, उनके गालों को खींच लेता है, मौका मिलने पर छाती भी दबा देता है और ये सब प्यार, लिहाज और रिश्तों की आड़ में हो रहा होता है।

साहित्य इन सामाजिक सच्चाइयों से भरा हुआ है कि हर बार लड़कियों के साथ होते ऐसे अपराधों के पीछे अपना ही कोई रक्षक ‘भक्षक’ की भूमिका निभा रहा होता है। कितने मामले होते हैं जिनमें लड़कियों को पता भी नहीं चलता कि आखिर उनके साथ क्या हुआ है, ऐसी स्थिति में मुझे समझ नहीं आता शरिया कानून या कोई भी अन्य कानून किस तरह काम करेगा। ये लड़ाई ओछी मानसिकता को सुधारने की है, लड़कियों को समाज में आम बनाने की है… शरिया के लागू होने का सुझाव सिर्फ़ आक्रोश में उचित लग सकता है, लेकिन एक सभ्य समाज में हर अपराध पर ऐसे कानून की बात करना अनुचित है।

सवाल प्रशासन से मत करिए, सवाल खुद से करिए। विरोध सड़कों पर मत दिखाइए अपने आस-पास उस ओछी मानसिकता के लिए दिखाइए जो आदमी को हैवान बनाती है और हवस को भावनाओं की श्रेणी में रखती है। प्रशासन द्वारा बनाए कानून और नियम आपके लिए सिर्फ़ तब तक हैं, जब तक उन्हें मानते हैं और स्वीकारते हैं। लेकिन मानसिकता पर जब हवस हावी हो जाए तो उसका इलाज आपको खुद ही करना पड़ता है। इस माहौल को बदलिए और अपने आस-पास लोगों में आवाज़ उठाना शुरू कीजिए।

साभार: सोशल मीडिया

मीडिया की खबरों के अनुसार एक महीने में सिर्फ़ राजस्थान में रेप के 52 मामले आए। जिनमें 12 में वक्त पर केस दर्ज नहीं हुआ। अगर आप ऐसी घटना पर आवाज़ उठाने का दम रखते हैं और फिर प्रशासन ऐसे खिलवाड़ करता है जैसे अलवर गैंगरेप मामले में किया तो उसे सवालों के घेरे में घेरिए, और तब सड़कों पर उतरिए और जवाब माँगिए, लेकिन बांदीपोरा में उस 3 वर्षीय मासूम पर आता आक्रोश मुझे निराधार और बेकार लगता है। क्योंकि सड़कों पर उतरा कौन सा व्यक्ति कल को इसी आरोप में लिप्त होगा ये न आप जानते हैं और न मैं…

साभार : सोशल मीडिया

बिहार: घटिया जातिवादी गणित को सोशल इंजीनियरिंग कहने से वो सही नहीं हो जाता

बिहार में इस बार चुनावों के दौरान कुछ ऐसा देखने को मिला, जो न सिर्फ़ जाति प्रथा को बढ़ावा देता है बल्कि एक देश के तौर पर, एक राष्ट्र के रूप में हमारी एकता पर भी सवाल खड़े करता है। मामला कुछ यूँ है कि जाति A हमेशा से अपनी जाति के उम्मीदवार को ही वोट देते हैं और जाति B ने भी अपने उम्मीदवार के पक्ष में माहौल बनानी शुरू कर दी, बिना यह देखे कि व्यक्ति अच्छा है या फिर बुरा। जब जाति B के समाज के कुछ अच्छे लोगों ने यह समझाने की कोशिश की कि जातिवाद ग़लत है तो जाति B के लोगों का तर्क था कि चूँकि जाति A के लोग जातिवाद कर रहे हैं, अपनी जाति के उम्मीद्वार को वोट कर रहे हैं, इसीलिए हम जाति B के लोग भी ऐसा ही करेंगे। अर्थात, इनका सीधा अर्थ यह था कि अगर कोई अन्य समाज ग़लत कर कर रहा है तो हम भी ग़लत करेंगे। इस जातिवादी राजनीति के विस्तार और पोषण में व्हाट्सप्प और फेसबुक ग्रुप्स का अहम योगदान रहा है।

जैसे यहाँ हम एक क्षेत्र के तौर पर मोतिहारी का उदाहरण लेते हैं, क्योंकि चुनाव संपन्न हो गया है और मैंने सभी दलों, नेताओं, प्रत्याशियों, स्वघोषित जाति के ठेकेदारों और टुटपुंजिया नेताओं से लेकर सजग युवाओं तक के अब तक के फेसबुक पोस्ट्स, गली-नुक्कड़ के क्रियाकलापों और शेखियों को करीब से देखा है। अतः, मैं अब एक अंतिम विश्लेषण रखने में ख़ुद को सक्षम मानता हूँ। इन सभी वर्णित महानुभावों के प्रचार अभियान, दुष्प्रचार प्रोपेगंडा और नारावीरता सहित सभी पक्षों के गहन अध्ययन के बाद प्रस्तुत है कुछ कड़वी सच्चाइयाँ। यहाँ एक तरफ़ पूर्व केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री अखिलेश सिंह के बेटे 27 वर्षीय आकाश सिंह उम्मीदवार थे तो दूसरी तरफ़ वर्तमान केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह।

चूँकि, यहाँ बात जातिवादी अभियानों की पोल खोलने के लिए हो रही है और हम किसी भी प्रकार से जातिवाद को बढ़ावा नहीं देते। लेकिन, फिर भी हमें यहाँ जाति की बात करनी पड़ेगी और उम्मीदवारों की जाति भी बतानी पड़ेगी। अखिलेश सिंह भूमिहार हैं और बिहार कॉन्ग्रेस चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष हैं। राधा मोहन सिंह राजपूत हैं और बिहार भाजपा के अध्यक्ष रह चुके हैं। चूँकि, मैं भूमिहार जाति से आता हूँ, मैं किसी अन्य जाति का उदाहरण नहीं लूँगा और न ही मैं किसी अन्य जाति पर कुछ भी टिप्पणी करूँगा। यहाँ मैं आपको वहीं बताऊँगा, जो मैंने सोशल मीडिया और लोकल स्तर पर देखा है। यहाँ मैं वहीं बताने जा रहा हूँ, जो समाज में मैंने पिछले कुछ दिनों में ऑब्ज़र्व किया है।

सबसे पहले बात जाति व समाज के स्वघोषित ठेकेदारों की। ये ऐसे लोग हैं, जो जाति के कारण या यूँ कहिए कि जाति की आड़ में भाजपा उम्मीदवार का विरोध कर रहे हैं। इससे इन्हें काफ़ी फायदे होते हैं। ख़ुद इनकी जाति के लोग इनके विरोध में नही बोल सकते क्योंकि कुलघाती का तमगा लगा दिया जाएगा। दूसरा फ़ायदा यह कि इन्हें भाजपा विरोधियों का भी अच्छा साथ मिल जाता है। जहाँ तक मैंने फेसबुक और व्हाट्सप्प पर भूमिहारों को लेकर बनें ग्रुप में देखा, इनकी पहचान निम्नलिखित है (बाकी जातियों के भी अलग-अलग ग्रुप हैं और शायद ही कोई इन सबसे अछूता है, लेकिन यहाँ मैंने अपनी जाति का उदाहरण लिया है क्योंकि मैं ख़ुद पर टिप्पणी करना चाहता हूँ, किसी को हर्ट करने का मेरा इरादा नहीं है):

  • ये व्हाट्सएप्प और फेसबुक के भूमिहारों वाले ग्रुप में आने वाले फेक मैसेज और पोस्ट शेयर करते हैं। उदाहरण: राधा मोहन सिंह ने भूमिहारों को गाली दी। मुझे अपनी जाति के कुछ लोगों ने यह सूचना दी कि राधा मोहन सिंह ने भूमिहारों को लेकर फलाँ अपशब्द कहे लेकिन मुझे विश्वास नहीं था कि एक केंद्रीय मंत्री किसी जाति विशेष को लेकर अभद्र टिप्पणी कर सकता है। मेरा अंदेशा सही निकला और ये ख़बर झूठी निकली।
  • इन्होंने भगवान परशुराम को नहीं पढ़ा होता, बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉक्टर श्रीकृष्ण सिंह की जीवनी इन्हें नही पता होती और रामधारी सिंह दिनकर की रचनाओं को धता बताते हैं। परशुराम जयंती पर ब्राह्मणों व भूमिहारों द्वारा उनके फोटोज व ग्राफ़िक्स शेयर किए जाते हैं पर उनके विचारों व सुकर्मों का अध्ययन करने में इनकी कोई रूचि नहीं होती।
  • अपनी जाति की बात करते-करते ये अंत में नेहरू-राजीव को सही ठहराने में लग जाते हैं, उनके हर कुकृत्यों का बचाव करते हैं। जैसे, अगर इनकी जाति का उम्मीदवार कॉन्ग्रेस की तरफ़ से खड़ा है तो कल के प्रखर भाजपाई भी आज नेहरू-राजीव के फैन हो सकते हैं। यही बिहार की जातिवादी राजनीति की सच्चाई है।
  • ये भाजपा से नाराज़गी की वजह “भाजपा द्वारा भूमिहारों को टिकट न देना” बताते हैं। जबकि, ये ख़ुद “भूरा बाल साफ़ करो” का समर्थन कर रहे होते हैं। लालू यादव ने एक बार ये नारा दिया था जिसमें ख़ास जातियों के सफाई की बात कही गई थी। इसकी चर्चा हम यहाँ नहीं करेंगे। आप किसी भी उस बिहारी से पूछ सकते हैं, जिसनें लालू राज को देखा है।
  • इनमें से अधिकतर कुछ दिनों पहले तक मोदी के गुणगान करते नहीं तक रहे थे और ख़ुद को हिंदूवादी बताते हुए चल रहे थे। ये अपनी जाति के आपराधिक छवि के नेताओं को भी देवता बना कर उनकी पूजा करते हैं। अपराधियों को मसीहा की तरह देखा जाता है और उनके साथ फोटो क्लिक करवाने में ये गर्व महसूस करते हैं।

अगर मोदी का विरोध करना ही है तो उसके लिए सामान्य वर्ग के ग़रीबों को मिलने वाले आरक्षण का विरोध करने वाले को समर्थन क्यों? कल तक भाजपा-एबीवीपी में हाथ-पाँव मारने वाले अपना स्वार्थ साधने और पहचान स्थापित करने के लिए “चौकीदार चोर है” का नारा लगा रहे हैं तो आप उनके झाँसे में मत आइए। देश सर्वोपरि है, सांसद अगर काम नहीं करेगा तो इतिहास उसे याद नहीं रखेगा। लालू यादव ने 15 वर्षो लगातार राज किया, आज इतिहास का न्याय देखिए, जरा सोचिए कि क्या किसी को हरा देने भर से बदला निकल जाता है? हमेशा कोई समाज इसीलिए क्यों एकजुट होता है कि फलाँ उम्मीदवार हमारे ‘दुश्मन’ जाति का है और इसे हरा देना है। अच्छे उम्मीदवारों को जिताने के लिए जाति के लोग एकजुट क्यों नहीं होते?

और समर्थन किसका करना है? एक ऐसे व्यक्ति का, जो अपने बेटे का कैरियर बनाने के लिए सारे दाँव-पेंच आज़माने में लगा हुआ है? जो पिछले 3 चुनावों से लगातार हार रहा है और ख़ुद कॉन्ग्रेस चुनाव प्रचार समीति का अध्यक्ष रहते हुए भी अपने रालोसपा उम्मीदवार बेटे को जिताने के लिए क्षेत्र विशेष में कैम्प किए हुआ है? जो अपनी पार्टी के प्रति ही गम्भीर नहीं, वो क्षेत्र का क्या विकास करेगा? महागठबंधन को वोट देकर देश में अस्थिरता लानी है तो कोई दिक्कत नहीं है। अखिलेश सिंह कॉन्ग्रेस के बड़े नेता हैं और पूरे राज्य में चुनाव की कमान उनके ज़िम्मे थी और अभी भी है लेकिन वह रालोसपा उम्मीदवार अपने बेटे को जिताने के लिए वह चम्पारण में बैठे रहें। राज्य में पार्टी का जो भी हो, बेटा जीतना चाहिए।

क्या कॉन्ग्रेस एक डूबती नैया है? अगर है भी तो उसके पदाधिकारियों का अपनी पार्टी के प्रति कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती? राजद से कॉन्ग्रेस में गए अखिलेश के बेटे रालोसपा से मैदान में उतरे और अखिलेश ने ख़ास जाति के बड़े नेताओं को बुलाकर प्रचार अभियान शुरू किया। अनंत सिंह, जिन्हें बिहार में छोटे सरकार के नाम से जाना जाता है और जो कई महीनों तक जेल में बंद रहे हैं, उन्हें बुलाकर रोड शो कराया गया ताकि जाति विशेष के मत प्राप्त किए जा सके। किसी भी लोकसभा में कैसे निर्णायक जाति समूहों को अलग-अलग बाँट कर अंकगणित बैठाया जाता है और समीकरण साधा जाता है, इसका ये अच्छा उदाहरण है। उस जाति के बाहुबलियों व दबंगों को बुलाकर सम्बोधन कराए जाते हैं।

और, कुछ ऐसे भाजपा फैन हैं, जिनका मानना है कि एक-दो सीटों से क्या होगा, मोदी तो आ ही रहा है। 2004 में वाजपेयी के समय यही हुआ था। लोगों से अपनी-अपनी सीटों पर भाजपा उम्मीदवारों को हरा दिया और कहते रहे कि वाजपेयी तो आ ही रहा है, उसे कौन हरा देगा। आपके सामने अब बस 2 विकल्प हैं। पहला, देश की सुरक्षा, देश का विकास, बिजली, पानी, सड़क देने वाले और घर-घर उज्ज्वला से गैस पहुँचाने वाली और ग़रीबों का बैंक एकाउंट खुलवाने वाली सरकार को मौका दें या फिर अपने समाज के झूठे ठेकेदारों के लिए देश के लिए कार्य करने वालों को धोखा दें। ख़ुद आडवाणी ने एक इंटरव्यू में कि वाजपेयी की हार इसीलिए हुई क्योंकि संसदीय क्षेत्रों में भाजपा उम्मीदवारों को यह कहते हुए हरा दिया गया कि ‘वाजपेयी तो जीत ही रहा है, इस उम्मीदवार को हरा दो’।

ज्यादा विरोध कीजिएगा तो चंद मुट्ठी भर नेताओं को कुछ अच्छी पदवियाँ मिलेंगी। सीपी ठाकुर हों या अखिलेश सिंह, अपने-अपने दलों में इनकी पूछ बढ़ेगी और इन्हें रुपए कमाने के नए रास्ते दिए जाएँगे, न आपका कुछ होगा और न राष्ट्र का। ये सब क्षणिक आवेश के क्षण हैं, इनसे प्रभावित न होते हुए जनता को उसी उम्मीदवार को वोट देना चाहिए, जो सही लगे। अगर आपको कॉन्ग्रेस पसंद है तो इसीलिए वोट कीजिए क्योंकि उसकी कुछ बातें आपको अच्छी लगती है, इसीलिए नहीं कि उसने आपकी जाति के उम्मीदवार को टिकट दिया है। यही भाजपा के बारे में भी कह सकते हैं। अगर आपको मोदी को जिताना है तो भाजपा को वोट करें। जिस भी पार्टी को वोट करें, जाति के आधार पर नहीं, उसकी नीतियों, इतिहास और प्रदर्शन के आधार पर।

इसमें मीडिया का भी दोष है। मीडिया ने हर जातिवादी नेता की करतूतों को ‘सोशल इंजीनियरिंग’ नाम दिया है और उसे बढ़ावा दिया है। लालू अगर माई (मुस्लिम-यादव) के भरोसे जीतने की बात करता है तो यह उसका ‘सोशल इंजीनियरिंग’ है, ऐसा मीडिया में बताया जाता है। नीतीश अगर महादलितों के भरोसे बैठे हैं तो यह उनकी ‘सोशल इंजीनियरिंग’ है। जब क्षेत्रीय नेता जाति की बात करते हैं, तो उन्हें इंजीनियर बोलकर उनका मान बढ़ा दिया जाता है, जिससे ऐसा प्रैक्टिस करने वालों को और बल मिलता है। जनता तो जनता है, बरगलाने वाले बरगला ले जाते हैं। ग़रीब, मासूम और आम जनता को क्या पता कि जाति के ये स्वघोषित ठेकेदार उनके काम नहीं आने वाले, काम आएगी एक अच्छी सरकार और एक अच्छी नीतियों वाला प्रधानमंत्री।

पीएम पद की गरिमा, भारत रत्न और मोदी को गालियाँ: JNU के कपटी कम्युनिस्टों की कहानी, भाग-4

मोदीजी के ऊपर सबसे बड़ा आरोप क्या है?
…यही न कि, उन्होंने पीएम पद की गरिमा को गिरा दिया है। आइए, इसके कुछ बिंदुओं पर बात करते हैं।

भारत के प्रधानमंत्री पद की गरिमा थी, है व रहेगी। होनी भी चाहिए। कम्बख्त, आज तक वही गरिमा तो थी, जिसका बोझ इतना अधिक था कि यह मरियल, अधनंगा, सड़ा-गला, भूखों का देश उठा रहा है।

पीएम पद की गरिमा ही तो थी, जो हमारे पहले प्रधानमंत्री ‘दुर्घटनावश हिंदू’ अपने अंग्रेज मित्रों को बुलवाकर संपेरों से मिलवाते थे।

उसी वक्त विक्रम साराभाई नाम के एक जीव भी थे, यह उनको याद नहीं आता था। यह पीएम पद की गरिमा ही तो थी, कि चचा ने खुद को ही भारत-रत्न दे दिया था। नौसेना के जहाजों या युद्धक विमानों का उस गरिमा के चलते ही (दुष्) प्रयोग चचा ने ही तो शुरू किया था एवं यह प्रधानमंत्री पद की ही गरिमा थी कि भरी संसद में उन्होंने चीन के कब्जे पर कहा था कि किसी बंजर ज़मीन पर ही तो कब्ज़ा हुआ है, जिस पर घास भी नहीं उगती। तब, हमारे एक सांसद महावीर जी ने कहा था कि मेरा तो सिर भी गंजा है, तो इसे भी दुश्मनों को दे दीजिए।

भाई, ये पीएम पद की गरिमा का गुरुगंभीर दायित्व ही तो था कि सेना के लिए जीप खरीदने में घोटाला करने वाले आरोपित को तुरंत ही कैबिनेट मंत्री बना लिया चचा ने। यह पीएम पद की गरिमा ही तो थी, कि अपनी बेटी को उत्तराधिकारी बनाकर चचा ने वंशवाद का विषवृक्ष इस देश में बो दिया, एक सनकी, तानाशाह, विनाशकारी सोच की महिला को इस देश पर थोप दिया।

यह पीएम पद की गरिमा ही तो थी, कि तथाकथित ‘लौह-महिला’ ने देश पर आपातकाल थोप दिया, हज़ारों को जेल में डाल दिया एवं अपने महा-अहंकारी, विक्षिप्त पुत्र के हाथ में सत्ता की वास्तविक कमान दे दी। यह पीएम पद की गरिमा ही तो थी कि इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने वालों को अकादमिक जगत में प्रतिष्ठित किया गया, ज्ञान की एकतरफा गंगा बहाई गई तथा दूसरे किसी भी किस्म के विचार को अछूत, सर्वथा विरुद्ध समझा गया।

यह पीएम पद की गरिमा ही तो थी कि एक राष्ट्रपति को रात के 12 बजे उठाकर आपातकाल के आदेश पर हस्ताक्षर करवाए गए, अपने ड्राइवर, निजी देखभाल करने वाले कर्मचारियों को देश के उच्च पदों पर बिठाया गया, देश के सभी संसाधनों को एक परिवार की जागीर बना दिया गया, निठल्ले बेटों को जन्मदिन में आकाश दिखाने भारत सरकार के जहाजों का उपयोग किया, भिंडरावाले को पैदा किया एवं बाप की राह पर चलकर खुद को ही भारत-रत्न भी दे डाला।

पीएम पद की गरिमा का भार बहुत होता है, रे बाबा। तभी तो धोखे के लिए भी सही, दिखावे के लिए ही सही, न तो कैबिनेट की बैठक बुलाई गई, न ही कहीं से कोई राय ली गई, रातोंरात अचानक से विदेश में बैठे एक युवक को इस देश की कमान सौंप दी गई, जिसके पास पीएम पद की ‘गरिमा’ व ‘पारिवारिक शहादत’ के अलावा था, तो कुलीनता का घमंड, भारत से भयानक अपरिचय तथा इंडिया से असंभव प्यार।

यह पीएम पद की गरिमा ही तो थी, जिसने एक पेड़ के गिरने पर धरती को हिलाया एवं ‘मात्र’ 5000 सिखों को हलाक कर दिया था। पीएम पद की ‘गरिमा’ तभी तो है। यह पीएम पद की गरिमा ही थी, जिसने 400 से अधिक सांसद होने पर भी समुदाय विशेष को पर्सनल लॉ में कैद रहने दिया, शाहबानो मामले में ऐसा फैसला लिया कि आज समुदाय विशेष वाले 14वीं सदी की ‘अरबी भेड़’ बन कर रह गए हैं, यह पीएम पद की गरिमा ही थी जिसने बोफोर्स में दलाली खाई, यह पीएम पद की गरिमा ही थी कि हजारों की मौत के जिम्मेदार भोपाल-गैस कांड के आरोपित को बाकायदा सरकारी कार एवं विमान से देश से भाहर भगाया गया।

…एंड, लास्ट बट नॉट द लीस्ट, वह पीएम पद की गरिमा ही तो है, जो 2002 से 2014 तक एक राज्य के मुख्यमंत्री को हत्यारा, नरसंहारक, मौत का सौदागर, खून बेचने वाला, आदि-अनादि कौन सी गाली नहीं दी गई।

2014 से वह व्यक्ति देश का पीएम है, लेकिन एक मंदबुद्धि, नशेड़ी, पागल उसे बिना किसी सबूत के चोर कह रहा है, उस पीएम को इतनी गालियाँ दी गईं कि गालियों का शब्दकोश भी शर्मिंदा हो जाए, लेकिन उस व्यक्ति ने जब एक तथ्य मात्र कह दिया, तो लुटियंस के पालतू शर्मिंदा हो गए।

सही बात है, आखिर प्रधानमंत्री पद की ‘गरिमा’ का सवाल है…

— व्यालोक पाठक

लेखक सीरीज में लिखते हैं। नीचे पढ़ें उनका हर एक पोस्ट:

एक झूठ को 100 बार बोलकर सच करने का छल : कपटी कम्युनिस्टों की कहानी, भाग-3
मूर्खों और मूढ़मतियों का ओजस्वी वक्ता है कन्हैया : कपटी कम्युनिस्टों की कहानी, भाग-2
कॉमरेड चंदू से लेकर कन्हैया कुमार तक : कपटी कम्युनिस्टों की कहानी, भाग-1

BJP और RSS नेता के घर पर CPI के गुंडों ने किया हमला, फेंका देशी बम

केरल में सोमवार (मई 13, 2019) की सुबह कासारगोड लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले पय्यानूर विधानसभा क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं के घरों पर हमला किया गया। बता दें कि, इनके घरों पर बम फेंक कर हमला किया गया।

जानकारी के मुताबिक, पय्यानूर मंडल के पूर्व भाजपा सचिव पणक्किल बालाकृष्णन के घर पर देशी बम फेंका गया, जो उनके सामने गिरा और वहीं पर फट गया। जिसकी वजह से कोई भी इसकी चपेट में नहीं आया और किसी को कोई चोट नहीं आई।

इसके कुछ समय के बाद ही कोरोम के आरएसएस कार्यकर्ता कारिल राजेश के घर पर भी दो बमों से हमला किया गया। उनके घर पर दो बम फेंके गए थे, लेकिन वो सड़क के किनारे के एक मामूली से पुल के पास गिर गया और कोई बड़ा हादसा होने से टल गया। इस बम धमाके से किसी के घायल होने की खबर नहीं है। बता दें कि, राजेश के ऊपर इस तरह के हमले पहले भी हो चुके हैं। उनके घर के ऊपर पहले भी बम फेंका जा चुका है।

गौरतलब है कि अभी हाल ही में सीपीएम और डीवाईएफआई के गुंडों ने चुनावी कैंपेनिंग पर आपत्ति जताते हुए कासरगोड के भाजपा प्रत्याशी रवीश तांत्री कुंतारु के साथ मारपीट की थी। रवीश तांत्री कुंतारु ने एनडीए के कार्यकर्ताओं के साथ कन्हानगढ़ में एक चुनावी कैंपेन में हिस्सा लिया था। इससे पहले कि एनडीए अपना प्रचार अभियान शुरू करता, सीपीएम ने दो प्रचार वाहन लेकर अपना प्रचार अभियान शुरू कर दिया और फिर बाद में रवीश तांत्री से जबरन माइक्रोफोन छीन लिया और उसके साथ मारपीट की।