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अरविन्द केजरीवाल को फिर पड़ा रोड शो में जोर का लप्पड़, AAP कार्यकर्ताओं ने की युवक की पिटाई

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को रोड शो के दौरान शनिवार (मई 4, 2019) को थप्पड़ मारने की घटना सामने आई है। यह घटना मोतीनगर की है। राहत की बात ये है कि थप्पड़ मारने वाले व्यक्ति को हिरासत में ले लिया गया है।

चुनाव प्रचार के लिए रोडशो के दौरान लाल शर्ट पहने एक शख्स ने उनकी गाड़ी के ऊपर चढ़कर थप्पड़ मार दिया। हालाँकि, अभी तक इस शख्स की पहचान नहीं हो पाई है। नई दिल्ली लोकसभा क्षेत्र के मोतीनगर एरिया में इस रोड शो के दौरान एक शख्स अचानक केजरीवाल की गाड़ी पर चढ़ता है और एक झन्नाटेदार थप्पड़ जड़ देता है। इसके तुरंत बाद आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने आरोपित को पकड़ लिया और उसकी पिटाई शुरू कर दी।

गौरतलब है कि इससे कुछ महीने पहले उनके ऊपर दिल्ली सचिवालय में लाल मिर्च पावडर फेंके जाने की खबर भी सामने आई थी। इस तरह की घटनाएँ निंदनीय है। फिर भी आए दिन जनता अपना आक्रोश इस रूप में क्यों निकाल रही है। सोचने वाली बात ये भी है कि अक्सर आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा और दिल्ली के मुख्यमंत्री सुरक्षा व्यवस्था होने के बावजूद भी इस तरह की शारीरिक हिंसा के शिकार क्यों हो जाते हैं।

पार्टी कार्यकर्ताओं का कानून अपने हाथ में लेकर आक्रोशित युवक की पिटाई करना भी उतना ही निंदनीय है। ये घटना केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के नेताओं के सामने हुई इसलिए और भी निंदनीय है।

Exclusive: डिम्पल बाबा का अप्रकाशित गैर राजनीतिक इंटरव्यू

पत्रकार दीप देसाई हाँफते-काँपते हमारे घर में प्रविष्ट हुए, और उन्होंने धप्प से दरवाजा बंद किया। हमने सम्मान से उनके समक्ष पानी का गिलास और ओल्ड मोंक का क्वार्टर प्रस्तुत किया। जिस कुशलता से राजनैतिक विश्लेषक गठबंधन कराते हैं, उसी निपुणता से उन्होंने पैग बनाया। साँस और शराब पर नियंत्रण पाते हुए बोलें- लाल सलाम!

भाई समाजवाद को समर्पित थे, और समाजवाद के हवन को उन्होंने अपने नाम का ‘राज’ और उपनाम का ‘सर’ समर्पित कर दिया था और पूर्णतया सर्वहारा पत्रकार हो गए थे। समाजवाद की सीढ़ी चढ़ कर मसाजवाद की दुनिया में प्रवेश करने को प्रयासरत थे।

दो घूँट मार कर उन्होंने अपने बैग को दो थपकी दी “काम की चीज़ है।” “क्या है?” एक घूँट और लेकर दीप भाई बोलें:
“इंटरव्यू, युवा नेता का।”
“पर हाँफ काहें रहे हैं?”
“हम दफ़्तर से चुरा के भागे हैं।”
“तुम तो वहीं काम करते हो, ऐसे घबराए हुए क्यों लग रहे हो?”

दीप भाई ने उठ कर खिड़की बंद की और कुर्सी पर उकड़ूँ बैठ गए। फुसफुसा कर बोले:
“इसको दबाने का निर्देश हुआ था, राष्ट्रहित में। हम ट्रांसक्रिप्ट चुरा लाए।”
“पर घबरा क्यों रहे हैं? आप तो पत्रकार हैं।”

“अरे हम सर्वहारा पत्रकार हैं। हमारे वर्ग पर कभी बिहार में गोली चल जाती है, कभी हम को उत्तर प्रदेश में जानकी बना कर अग्निपरीक्षा मे उतार दिया जाता है। हम वह नहीं हैं बाबू जिनके टूटे एप्पल फ़ोन को देख कर महिला पत्रकारों के मन मे मरोड़ नहीं उठती है।

“ख़ैर, ऊ सब आप नहीं बूझेंगे। आप ये मूल साक्षात्कार पढ़ें और बताएँ कि इसका ठीक दाम क्या लग पाएगा?” यह कह कर दीप भाई ने पढ़ना प्रारम्भ किया जो आम जनता के आनंद हेतु शब्दश: प्रस्तुत है:

प्रश्न: डिम्पल बाबा, आप को ऐसा क्यों भान होता है कि इस चुनाव मे आप विजयी होने वाले हैं।
उत्तर: यह आपने कैसा प्रश्न कर दिया?
पत्रकार: सर, क्रोधित ना हों। प्रकाशन के सेठ जी द्वारा तय किए प्रश्नों में पहला प्रश्न यही था। यह पत्रकारिता की मर्यादा और ग़ल्ले मे गए धन के अनुसार ही है।

नेता: देखिए, सर मत बोलिए। कॉल मी राउल। आप चाहें तो हमारी माता जी को सर कह सकते हैं। हमें सर बोल कर हमारी चिरयुवा वाली भूमिका को चोट पहुँचाएँगे तो हम आपके मालिक बेदमी पुड़ी जी से शिकायत कर के आपको बीट पत्रकार बनवा कर जहानाबाद भिजवा देंगे। फिर आपसे शहाबुद्दीन जी फरिया लेंगे।

पत्रकार: ओके, राउल आप चुनाव में क्यों जीतेंगे?
डि.बा. (डिम्पल बाबा): कल रात को जब हम सुबह उठ गए थे तो हमने इस पर विचार किया। इट ईज़ अ डम्ब क्वेश्चन। हमारे गाल पर डिम्पल है, मोदी जी के फ़ेस पर दाढ़ी; हमारा क्लीनशेव डिम्पल युक्त गाल राजनैतिक पारदर्शिता बताता है।

हमारे हिंदी के ट्यूटर थरूर जी के अनुसार चोर कि दाढ़ी में तिनका होता है। चूँकि, मोदी जी की दाढ़ी है, वहाँ तिनका होने की सम्भावना हमारे डिम्पलयुक्त मुख से अधिक है। तालियाँ।
(पत्रकार, सम्पादक एवम् कैमरामैन का डिम्पल बाबा के उत्तर को तालियों द्वारा अनुमोदन)

प्रश्न: क्या आपको सच मे लगता है कि राफ़ेल मे घोटाला हुआ है?
डि. बा. : देखिए, इतिहास की ओर देखिए। भारत के इतिहास मे हमारे परनाना जी से महान व्यक्तित्व नहीं हैं इस पर तमाम बुद्धिजीवी एक मत हैं। श्रीराम ने भी इस संदर्भ मे कहा है कि वे मर्यादा पुरूषोत्तम नेहरू जी की प्रेरणा से बने।

पत्रकार: सर, वो भगवान राम ने नहीं, रामचंद्र गुहा ने कहा है।
डिबा: श्री गुहा भी कम मर्यादापुरूषोत्तम नहीं हैं। मुद्दा यह है कि परनाना नेहरू ने जीप स्कैम के समय से सैनिक सौदों मे अहिंसक परिवारों को श्रद्धा सुमन अर्पित करने की परंपरा रखी।
अंकलों द्वारा “बेटा, आगे क्या सोचा है” आंटियों द्वारा शादी के मंडप पर “गुड न्यूज़ कब दे रही हो” की भाँति ही रक्षा सौदों में घोटाले की अमर परंपरा रही है। आज यदि कोई यह कहता है कि रक्षा सौदे में घोटाला नहीं हुआ है, अपने आप मे घोटाला है। आरोप हमनें लगा दिया है, आप साक्ष्य बनाएँ।

सीनियर पत्रकार ने डिबा जी के हमनाम राउल विफल को आग्नेय दृष्टि से देखा, और डिबा जी से कहा-
“सर, हम आपके जटायु बन कर साक्ष्य जुटाएँगे। कितने का घोटाला बनाना है?”
“दाम कितना लगाओगे? प्रतिलाख करोड़ के हिसाब से बेदमी जी को बोलो रेट कार्ड युवा कार्यकर्ता मोतीलाल वोरा जी को दें।”

पत्रकार : राउल जी, क्या आप विदेशी नागरिक हैं।
(डिबा आँखें बंद कर के विचारों मे खो गए। कल का माल बहुत पोटेंट था।)
डिबा: जात ना पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। देखिए भाईयों, क्या आपको वाक़ई लगता है महापुरूष आप जैसे टुच्चे मनुष्यों की भाँति पैदा होते हैं। महामानव अवतरित होते हैं। महामानव मनुष्य जाति को प्रकृति का वरदान हैं और इन्हें राष्ट्रीयता की सीमाओं मे नहीं बाँधा जा सकता है। ऐसे बेवक़ूफ़ाना प्रश्न उठाने वाले प्रतिद्वंद्वियों के लिए मेरा एक ही उत्तर है कि यदि डिबा भारतीय होकर भी ब्रिटिश हैं और इतालियन होकर भी भारतीय हैं तो इसका कारण है महिला सशक्तिकरण। जो लोग हमारी नागरिकता पर प्रश्न उठा रहे हैं वे महिला विरोधी हैं। हमारी सरकार आते ही हम ऐसे लोगों को देख लेंगे।

पत्रकार: परंतु इसका महिलाओं से क्या संबंध है?
(डिबा ने नेत्र बंद कर के विचार किया और बोले।)
डिबा: देखिए भाईयों, हमारी दाढ़ी नहीं है। रवि किशन जैसी कॉम्यूनिस्ट महिलाओं को छोड़ दें तो महिलाओं की भी दाढ़ी नहीं होती। हमारे जैसे व्यक्ति पर प्रश्न उठाना हर उस व्यक्ति पर प्रश्न उठाना है जिसका अस्तित्व दाढ़ी मूँछ से वंचित है। चुनाव को मोदी जी ने दाढ़ी और क्लीन शेव में बाँटा है।

पत्रकार: सर वो रविकिशन नहीं है।
डिबा: यार, वो जो भी हैं, किशन या कृष्णन, आप समझ गए ना। मुद्दा दाढ़ी प्रमुख है इस चुनाव में। राष्ट्रीयता, भ्रष्टाचार इत्यादि तो मोदी ने बना रखा है। प्रश्न यह है कि राजनेताओं को जनता को मूर्ख बनाने का और जनता का शेव बनाने का अधिकार है या नहीं?

वरिष्ठ पत्रकार ताड़ गए कि बाबा उखड़ रहे हैं। बोलें-
“बाबा ठीक कह रहे हैं। ऐसे डिम्पल युक्त गाल वाला व्यक्ति झूठ बोल ही नही सकता है। विफल जी का अनुभव कम है सो भटक जाते हैं। आगे पूछो विफल।”

पत्रकार: बाबा, आपने कहा था कि दलित कानून मोदी जी ने हटा दिया। क्या वह झूठ था?
डिबा: आपने बहुत अच्छा प्रश्न पूछा। इसका उत्तर यह है कि मैं आपको पूछता हूँ कि क्या यह झूठ है।

बाबा के बग़ल में बैठा तोता बोला – झूठ है, झूठ है।
उत्साहित हो कर विफल जी बोलें- बाबा, वो तो झूठ था।
बाबा के सुंदर मुख पर वेदना की रेखाएँ खिंच आईं, पर वे कुछ ना बोले।
वरिष्ठ पत्रकार ने कनिष्ठ को अगला प्रश्न पूछने को कहा।
पत्रकार : आपने कहा कि मोदी जी ने कानून बनाया कि आदिवासियों को गोली मारी जा सकती है। क्या वह झूठ था?
तोता फिर बोला- झूठ था, झूठ था।
(बाबा तोते को देख मुस्कुराए, बोलें,

“आपके प्रश्न का उत्तर है कि क्या वह झूठ था?”
तोते से उत्साहित होकर विफल जी फिर बोले- झूठ था।

डिम्पल बाबा तमतमा कर खड़े हो गए। एसपीजी से बोलें, इस धृष्ट पत्रकार को जहाज से बाहर फेंक दो।
विफल जी घबरा गए, बोले, ”क्षमा प्रभु, यही तो तोते ने कहा पर आपने उसे कुछ न कहा।”

वरिष्ठ पत्रकार ने समझाया, “देखो, कनिष्ठ आज मेरे पास पंचशील मे बँगला है, बैंक बैलेंस है, सोनिया जी जैसी माता हैं और मैं सफल हूँ क्योंकि मैं तोते को देख उत्साहित नही होता हूँ। जब पंख ना हों तो सत्य बोल कर हवा में नही उड़ना चाहिए, और जब फंडिंग ना हो तो पत्रकार को अर्नब गोस्वामी या बरखा दत्त नहीं बनना चाहिए।”

इसी ज्ञान के साथ साक्षात्कार समाप्त हो गया। कह कर दीप भाई थमे। अब तुम मेरी कहीं डील करा दो ताकी मैं राष्ट्रहित में इस साक्षात्कार को दबा कर किसी पॉश इलाक़े मे कोठी प्राप्त करूँ और महान पत्रकार के नाम से जाना जाऊँ। जब गर्मियों में उत्तर प्रदेश में चुनाव हों तो कश्मीर से रिपोर्ट करूँ।

येचुरी को ‘सीता-राम’ से इतनी आपत्ति है तो अपना नाम रावण, कंस या औरंगजेब रख लें: स्वामी रामदेव

योगगुरु बाबा रामदेव ने कुछ संतों के साथ मिलकर माकपा महासचिव सीताराम येचुरी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। उन्होंने यह शिकायत येचुरी के द्वारा हिंदुओं को हिंसक बताने और रामायण, महाभारत को लेकर की गई टिप्पणी के लिए की है। स्वामी रामदेव ने शनिवार (मई 4, 2019) को हरिद्वार में की गई एक बैठक के दौरान माकपा महासचिव सीताराम येचुरी को आड़े हाथों लिया।

स्वामी रामदेव ने कहा कि भारत की संस्कृति और उसकी सभ्यता हजारों हजार साल पुरानी है, लेकिन उस पर जो अभद्र और अपमानजनक टिप्पणी सीताराम येचुरी ने की है उससे पूरे देश में आक्रोश है। हरिद्वार में बाबा रामदेव के नेतृत्व में संत समाज ने येचुरी के बयान की निंदा करते हुए कहा कि अगर येचुरी को राम और सीता के नाम से इतनी आपत्ति है तो अपने नाम से सीता और राम हटाकर रावण, कंस या औरंगजेब रख लें।

इसके साथ ही स्वामी रामदेव ने कम्युनिस्टों, ईसाइयों व मुगलों पर अपने राज्य के विस्तार के लिए न्याय व कानून के नाम पर 50 करोड़ निर्दोष लोगों का कत्ल करने की बात कही। उन्होंने पूछा कि क्या येचुरी इस अत्याचार को हिंसा कहने का साहस कर पाएँगे?

गौरतलब है कि येचुरी ने शुक्रवार (मई 3, 2019) को कहा था रामायण और महाभारत भी लड़ाई और हिंसा से भरी हुई है, लेकिन एक प्रचारक के तौर आप सिर्फ महाकाव्य के तौर पर उसे बताते हैं, उसके बाद भी दावा करते हैं कि हिंदू हिंसक नहीं है। उन्होंने कहा था कि रामायण और महाभारत हिंसा के उदाहरणों से भरे पड़े हैं। ऐसे में ये दावा करना गलत है कि हिंदू हिंसक नहीं हो सकते।

सऊदी गया था क़ुरान पढ़ाने, बना दिया गया सफाईकर्मी, भारत लौटकर सुषमा को कहा शुक्रिया

हैदराबाद के रहने वाले एक क़ुरान टीचर ने सऊदी से लौटने के बाद भारतीय दूतावास के साथ विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को धन्यवाद दिया है। हाफिज मोहम्मद बहाउद्दीन नाम के इस शख्स ने बताया कि उन्हें एक एजेंट ने सऊदी के किसी दूरदराज क्षेत्र में भेज दिया था जहाँ उनसे सफाई का काम कराया जाता था।

मीडिया खबरों के मुताबिक हाफ़िज ने बताया कि वे वहाँ काम के दौरान बीमार हो गए थे, लेकिन उनके मालिक ने उन्हें अस्पताल ले जाने से इंकार कर दिया। हाफिज़ का कहना है कि सऊदी से उन्हें भारतीय दूतावास के अधिकारियों ने बचाया है। अधिकारियों ने उनका हैदराबाद का टिकट जारी किया, इसलिए वह अधिकारियों के साथ विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को शुक्रिया अदा करना चाहते हैं।

अपने बारे में बताते हुए हाफ़िज ने कहा कि वो हैदराबाद में एक कुरान टीचर के रूप में काम करते थे। इस बीच एक एजेंट ने उनके सामने सऊदी अरब की अल बहाह मस्जिद में काम करने का प्रस्ताव रखा। एजेंट ने उन्हें बताया कि उन्हें इस काम के लिए 95 हजार रुपए मिलेंगे।

हाफिज द्वारा प्रस्ताव स्वीकारने के बाद उन्हें 21 मार्च को सऊदी के अल बहाह शहर भेज दिया गया। वहाँ पहुँचने के बाद उन्हें काफी दूर भेजा गया, जहाँ उनसे क्लीनर का काम कराया जाने लगा। हाफिज बताते हैं कि वहाँ उनका मालिक उनसे दिन-रात काम करवाता था। वहाँ कुछ दिन काम करने के बाद उनकी तबियत खराब होने लगी लेकिन उनके मालिक ने उन्हें अस्पताल ले जाने से इंकार कर दिया।

इसके बाद हाफ़िज ने अपनी हालत के बारे में अपनी पत्नी को बताया और पत्नी ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को पत्र लिखकर शिकायत की। हाफ़िज बताते हैं कि उनकी पत्नी ने भारतीय दूतावास से उन्हें वहाँ से छुड़ाने की अपील की थी, जिसके बाद उन्हे भारत लाने का इंतजाम किया गया। हाफिज अब भारत में हैं और अपने परिवार से मिलकर काफ़ी खुश हैं।

अल्पसंख्यक कॉलेज में बुर्क़े पर प्रतिबंध लगाने पर मिली जान से मारने की धमकी

सुरक्षा कारणों के मद्देनज़र केरल के एक अल्पसंख्यक कॉलेज द्वारा कॉलेज में बुर्क़ा पहनकर आने पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया गया था। इस प्रतिबंध पर कई मुस्लिम संगठनों ने विरोध जताया था। इस संदर्भ में एक और खबर सामने आई है कि मुस्लिम एजुकेशन सोसायटी (MES) के अध्यक्ष पी ए फ़ज़ल गफ़ूर को मारने की धमकी मिली है। इस बाबत उन्होंने केरल के कोझिकोड में पुलिस स्टेशन में शिक़ायत दर्ज की है।

श्री लंका में बुर्क़े पर प्रतिबंध लगाने की बात चल ही रही थी कि इसी बीच केरल के एक अल्पसंख्यक कॉलेज ने बुर्क़ा पहनकर आने पर पाबंदी लगाने से संबंधित सर्कुलर जारी किया गया था। ख़बर के अनुसार, केरल के मलप्पुरम में चल रहे इस अल्पसंख्यक कॉलेज में बुर्के पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। यह कॉलेज मुस्लिम एजुकेशन सोसायटी द्वारा संचालित है। इस सर्कुलर के ख़िलाफ़ कुछ स्थानीय संगठनों ने आपत्ति दर्ज की।

ऐसा माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र यह फ़ैसला लिया गया है, इसलिए इसका विरोध किया जा रहा है। ज्ञात हो कि अभी कुछ रोज पहले श्री लंका में आतंकी हमला हुआ था जिसमें 300 से अधिक लोगों के मारे जाने की ख़बर थी और लगभर 500 लोग घायल हुए थे। वहाँ की सरकार ने पहचान छिपाने वाले हर तरह के कपड़ों पर प्रतिबंध लगाने का फ़ैसला लिया था।

इसी के मद्देनज़र शिवसेना ने अपने अपने मुखपत्र ‘सामना’ में बाक़ायदा संपादकीय लेख के माध्यम से प्रधानमंत्री मोदी से भारत में बुर्क़े पर प्रतिबंध लगाने की माँग की थी। शिवसेना की इस माँग का समर्थन भोपाल से बीजेपी उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा ने भी किया था, लेकिन सरकार ने इस पर कोई गंभीरता न दिखाते हुए इस माँग को ख़ारिज करना उचित समझा। बीजेपी प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव ने ‘सामना’ के संपादकीय पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करते हुए कहा कि इस तरह के प्रतिबंध की आवश्यकता नहीं है। बीजेपी के अलावा एनडीए के ही एक अन्य सहयोगी रामदास आठवले ने शिवसेना की माँग को एक सिरे से ख़ारिज किया। उनका कहना था कि यह एक परंपरा का हिस्सा है, जिस पर प्रतिबंध लगाने की ज़रूरत नहीं है।

शिवसेना की माँग पर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कड़ा ऐतराज़ जताया। उन्होंने कहा कि यह हमारा मानवाधिकार है जोकि संविधान में निहित है। सभी पर हिन्दुत्व नहीं लागू किया जा सकता। हो सकता है कि कल को यह कह दिया जाए कि आपके चेहरे पर दाढ़ी ठीक नहीं है, टोपी मत पहनिए।

‘BJP ने कम से कम हिम्मत तो दिखाई’: ट्रिपल तलाक पर मुस्लिम महिलाओं ने कहा

आम चुनावों में एक ओर जहाँ कॉन्ग्रेस अल्पसंख्यक वोट बैंक को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानकर चल रही है और कथित अल्पसंख्यक तुष्टिकरण को अपना सबसे बड़ा हथियार मानते हुए इस आबादी के मतों पर अपना अधिकार मानती आई है वहीं, मोदी सरकार के इन 4 सालों में जमीनी हकीकत कुछ और ही कहती नजर आ रही हैं।

लखनऊ की रहने वाली एक 33 साल की एक समुदाय विशेष की ही महिला ने तीन तलाक देने की वजह से अपने पति के खिलाफ कोर्ट केस किया था। यह पहला मौका था, जब उसने अपने परिवार की इच्छा के खिलाफ कोई फैसला लिया था। ब्यूटीशियन का काम करने वाली इस महिला का कहना है कि वह एक बार फिर परिवार की इच्छा के खिलाफ कदम उठाने वाली है और वह 6 मई को भारतीय जनता पार्टी को वोट देगी।

गत वर्ष कॉन्ग्रेस के लिए प्रचार करने वाली इस महिला ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा, “मोदी सरकार ने तीन तलाक की प्रथा के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत दिखाई है। कोई दूसरी पार्टी तो इस बारे में बात भी नहीं कर रही।”

2014 के चुनाव में कॉन्ग्रेस के लिए किया था प्रचार

2014 में इस महिला को उसके पति ने बिना कोई कारण बताए शादी के महज 22 दिन बाद तलाक दे दिया था। महिला के मुताबिक, उसने पिछले चुनाव में कॉन्ग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी के लिए प्रचार किया था। महिला ने कॉन्ग्रेस पर सवाल उठाते हुए कहा, “उन्होंने हमारे लिए क्या किया? बीजेपी ने कम से कम हमारी खराब स्थिति को लोगों के सामने रखा। मोदी सरकार ने पेंशन स्कीम से लेकर LPG कनेक्शन तक, हमारे लिए बहुत कुछ किया है।” महिला ने अपने इंटरव्यू में कहा, “मैंने पढ़ा है कि मोदी सरकार ने क्या किया है। मैं जरूर उनको ही वोट दूँगी।”

ट्रिपल तलाक को लेकर CM योगी आदित्यनाथ से टि्वटर पर मदद माँगी थी मदद

इस महिला की तरह ही 26 साल की निशात फातिमा ने भी ट्रिपल तलाक बिल की वजह से इस बार बीजेपी को वोट देने का मन बनाया है। दो बच्चों की मां निशात को शादी के 5 बरस बाद उनके पति से फोन पर तीन तलाक दे दिया था। निशात ने यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ से टि्वटर पर मदद माँगी थी। वह बीजेपी की ओर से तीन तलाक पर कराए गए सेमिनार में भी मौजूद रही हैं। इस कार्यक्रम में गवर्नर राम नाइक भी मौजूद थे। बता दें कि यूपी में कम से कम 20% आबादी मुस्लिमों की है।

हालाँकि, इन दो महिलाओं के उलट इस समुदाय की कई अन्य महिलाएँ ऐसी भी हैं, जिन्हें ट्रिपल तलाक या तलाक-ए-बिद्दत की प्रथा तक की भी जानकारी नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, जब उन्होंने इन महिलाओं से इससे जुड़े सवालों पर जब बात की तो वो नजरें फेर लेती हैं या फिर बहस का टॉपिक बदल देती हैं। जो बात करने के लिए तैयार भी हैं, उनके मुताबिक, उन्हें पता ही नहीं कि सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2018 में इस प्रथा पर रोक लगा दी थी। इनमें से कुछ ने बीजेपी पर धार्मिक मामलों में दखलंदाजी का आरोप भी लगाया। 23 साल की फरजाना अहमद का कहना है कि मोदी सरकार अपने फायदे के लिए इस मुद्दे का राजनीतिकरण कर रही है।

अखिलेश यादव ने दिया था लैपटॉप, सपा को देंगे वोट

हालाँकि, कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने वोट देने के लिए मोदी सरकार द्वारा किए गए काम को ही अकेला आधार बनाने से इंकार करते हुए कहा, “ट्रिपल तलाक को अपराध के दायरे में लाने का क्या फायदा, जब पति मेरे साथ रहना ही नहीं चाहता। क्या कानून के डर से उसे मेरे साथ रहने के लिए मजबूर करने से मकसद हल होगा?” फरजाना शिक्षा और स्कॉलरशिप को चुनावी मुद्दा मानते हुए आरोप लगाती हैं कि वर्तमान सरकार सिर्फ हिंदू और ‘मजहब’ वालों की लड़ाई पर बातें करती है। पूर्व की अखिलेश यादव सरकार द्वारा लैपटॉप दिए जाने का जिक्र करते हुए वह कहती हैं कि वह सपा को वोट देंगी।

वहीं, डालीगंज की रहने वालीं 60 साल की सूफिया रहमान कहती हैं, “हम कौन होते हैं मियाँ-बीवी के बीच में दखल दे कर, किसी को सजा देने वाले।” लखनऊ की सामाजिक कार्यकर्ता ताहिरा हुसैन का मानना है कि बीजेपी इस संवेदनशील मुद्दे का गलत इस्तेमाल कर रही है और इस पर बिल लाने से पहले समुदाय की राय नहीं ली गई। ताहिरा ही नहीं, रिटायर्ड आईआरएस अफसर परवीन तल्हा और ऑल इंडिया मुस्लिम वुमन पर्सनल लॉ बोर्ड की डायरेक्टर शाइस्ता अंबर भी मानती हैं कि बीजेपी को समुदाय विशेष की कोई परवाह नहीं है।

‘काशी’ पर लिखा गया साहित्य: काशीनाथ सिंह के अलावा भी है बहुत कुछ

अभी चुनावों के कुछ चरण बाकी हैं, और रह-रह के वाराणसी का ज़िक्र आ जाता है। जब भी ऐसा ज़िक्र होता है तो मुझे लगता है कि बनारस बड़ी अजीब जगह होगी। अजीब इसलिए कि जब यहाँ से चुनाव लड़ने की बात चली तो मैदान में एक तो भगोड़ा सिपाही उतरा। दाल के मनमोहनी दौर के बाद से ही हम कहते हैं कि दाल फ्राई के लिए रोने वाली कौमें जंग नहीं लड़ा करती मियाँ! और ये भगोड़ा दाल के लिए ही भागा था! दूसरी जो घोषित सूरमा थी वो पहले भगोड़ी नहीं थी, लेकिन वाराणसी जैसे पुराने शहर और विपक्षी जैसे पुराने राजनीतिज्ञ के लिए शायद उन्हें अपनी नई नाक दाँव पर लगाना उचित नहीं लगा। वो बाद में भगोड़ी हो गईं।

किताबों में रुचि होने की वजह से हमें वाराणसी के साथ-साथ ‘काशी का अस्सी’ भी याद आ जाती है। एक वामी मजहब के लेखक की इस किताब को पढ़ने के बाद शायद ही कोई उर्दू भाषा से प्रेरित गाली होगी, जिसे सीखना बाकी रह जाता होगा। जी हाँ उर्दू गालियों की ज़बान है, उसके इस्तेमाल के बिना गालियाँ देना मुश्किल होगा। यकीन ना हो तो सोचकर देख लीजिये कि ‘मादर’ लफ़्ज कौन सी जबान का लगता है। वैसे तो बिहार-यूपी के इलाकों में ये अनकहा सा नियम चलता है कि स्त्रियाँ या बच्चे-बुजुर्ग अगर आसपास से गुजरते दिख जाएँ तो भाषा तुरंत संयमित हो जाती है। पता नहीं क्यों, वामी मजहब के लेखक ने ‘काशी का अस्सी’ में इस सांस्कृतिक पक्ष पर ध्यान नहीं दिया और सबको भाषाई तौर पर उच्छृंखल ही दर्शाया है।

वाराणसी के ज़िक्र पर और कौन सी किताबें याद आती हैं? हिन्दी में भी वाराणसी को पृष्ठभूमि बनाकर लिखी गई किताबों की कमी नहीं है। समस्या है हिन्दी साहित्य की गिरोहबाजी। साहित्यिक गिरोहों ने कभी अपने विरोधी विचारों को पनपने नहीं दिया। उन्हें अच्छा या बुरा कहना तो दूर, उनके जिक्र तक से परहेज रखा। अछूत घोषित कर दिए गए ऐसे साहित्यकारों की कृतियाँ हैं तो, मगर आमतौर पर उनके बारे में कुछ भी कहा-सुना नहीं जाता। उदाहरण के तौर पर अगर आप शिवप्रसाद शर्मा की ‘वैश्वानर’ को इन्टरनेट पर ढूंढें तो शायद ही आपको कोई समीक्षा मिल पाएगी। कुछ लोग सोच सकते हैं कि 1928 में जन्मे और 1998 में दिवंगत हो गए लेखक की कृतियों पर समीक्षा का इन्टरनेट पर न होना आश्चर्य का विषय क्यों होगा?

अब आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के बारे में सोचिये। ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ जैसी कृतियों के रचनाकार आचार्य खासे प्रसिद्ध भी थे और काफी पुराने दौर के भी थे। वो शिक्षक भी थे और उनके दो शिष्य काफी प्रसिद्ध रहे हैं। उनके एक शिष्य थे वामी नामवर सिंह। उनकी समीक्षाओं ने कई लेखक बनाए और बिगाड़े। निर्मल वर्मा को कथाकार और गजानन माधव मुक्तिबोध को कवि के तौर पर स्थापित करने वाले भी नामवर सिंह ही थे। उसी आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के दूसरे प्रसिद्ध शिष्य थे शिवप्रसाद सिंह। संभवतः ‘गली आगे मुड़ती है’ और ‘नीला चाँद’ जैसी रचनाओं के लिए आपने इनका नाम सुना होगा। ये दोनों उपन्यास भी वाराणसी की पृष्ठभूमि पर ही लिखे हुए उपन्यास हैं।

कभी-कभी उनकी ‘अलग अलग वैतरणी’ की तुलना आंचलिक उपन्यासों के कीर्तिमान ‘रागदरबारी’ से भी होती है। हरिवंश राय बच्चन मानते थे कि ‘रागदरबारी’ का शिवपालगंज और ‘अलग-अलग वैतरणी’ का करैता दोनों एक ही हैं। शिवप्रसाद सिंह ने काशी या वाराणसी पर दो नहीं बल्कि तीन किताबें लिखी थीं, जिन्हें वो काशी-त्रयी भी कहते थे। इस त्रयी का पहला उपन्यास है ‘वैश्वानर’, जिसका शाब्दिक अर्थ अग्नि या आग होता है। वो आग जिसे वैदिक मान्यताओं में स्वयं भी पवित्र माना जाता है, और ये भी माना जाता है कि ये जिसे छुएगी उसे भी पवित्र कर देती है। ये मुख्यतः धन्वन्तरि नाम के एक वैद्य की कहानी के साथ-साथ चलता उपन्यास है।

उपन्यास की कथा के मुताबिक सरस्वती नदी के सूखने के काल में कुछ आर्यजन गंगा और वरुणा नदी के संगम के क्षेत्र में आकर बस जाते हैं। इस शाखा के लोगों के प्रमुख धन्वन्तरि हैं और अग्नि यानी वैश्वानर इस शाखा के कुलदेवता हैं। यहीं वाराणसी में एक महामारी फैल जाती है और वैद्य धन्वन्तरि इस रोग का निदान ढूँढने में जुटे होते हैं। जब तक वो बीमारी से निदान पाते, तब तक हैहयवंशी सहस्त्रार्जुन काशी पर कब्जा जमाने की सोचने लगता है। यहाँ से बूढ़े धन्वन्तरि के परपोते की भूमिका शुरू हो जाती है। अपनी छोटी सी सेना के बल पर वो कैसे
सहस्त्रार्जुन से मुकाबला करेगा, ये इस पौराणिक उपन्यास का आधार बन जाता है। कह सकते हैं कि इसमें दो कथाएँ मिली हुई हैं। एक करुणा दर्शाती है तो दूसरी शौर्य।

वैश्वानर काफी मोटी सी किताब है, इसलिए इसे पढ़ने में समय लगेगा। मेरे खयाल से ये किताब रोचक है, इसके मोटे होने से डरने की जरुरत नहीं है। इसमें वेदों के कई संस्कृत वाक्य हैं, लेकिन उनके साथ ही उनका अर्थ मिल जाएगा, इसलिए कोई हिस्सा समझ नहीं आया, ऐसी शिकायत भी नहीं रहती। अगर कहीं मदालसा का नाम सुना हो, तो वो इस किताब की नायिका है, यानि धन्वन्तरि के परपोते प्रतर्दन की प्रेयसी। उसके होने से उपन्यास में नायिका की कमी या प्रेम का ना होना जैसी शिकायत भी जाती रहती है। 1996 में प्रकाशित ये उपन्यास कम चर्चा में क्यों है, हमें मालूम नहीं। बाकी काशी के बारे में कथेतर के बदले कथा ढूँढने निकलें तो इसे भी देखिएगा। ऐतिहासिक उपन्यासों में रुचि के लिए तो देखा ही जा सकता है।

सीरियल ब्लास्ट के आत्मघाती हमलावरों ने कश्मीर में ली थी ट्रेनिंग: श्री लंका सेना प्रमुख

श्री लंका में ईस्टर संडे के मौके पर चर्च और होटलों में हुए सिलसिलेवार धमाकों को लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है। श्रीलंका सेना के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल महेश सेनानायक ने कहा है कि 21 अप्रैल को हुए बम धमाकों को अंजाम देने वाले कुछ हमलावरों ने कश्मीर और केरल की यात्रा की थी। उन्होंने आशंका जताई है कि हो सकता है कि वो लोग वहाँ पर आतंकी ट्रेनिंग लेने के लिए गए होंगे। बता दें कि, श्री लंका में हुए बम धमाकों की जिम्मेदारी आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ने ली थी।

श्रीलंका के सेना प्रमुख ऐसे पहले वरिष्ठ अधिकारी हैं जिन्होंने इस बात की पुष्टि की है कि ईस्टर के मौके पर धमाकों को अंजाम देने वाले आतंकियों ने भारत की यात्रा की थी। सेना प्रमुख ने कहा कि उनके पास मौजूद जानकारी के अनुसार, हमालवरों ने भारत के बेंगलुरु, कश्मीर और केरल की यात्रा की थी। वहीं जब उनसे इस यात्रा के पीछे के उद्देश्य के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यह किसी तरह के प्रशिक्षण के लिए या देश के बाहर मौजूद संगठनों के साथ लिंक स्थापित करने के लिए की गई यात्रा हो सकती थी। इस मामले को लेकर केरल और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी एनआईए ने छापे मारे। इस दौरान कुछ लोगों को इस्लामिक स्टेट के साथ लिंक होने के संदेह में हिरासत में लिया गया।

भारतीय गृह मंत्रालय की तरफ से श्री लंका के सेना प्रमुख के बयान पर अभी तक किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। मगर सुरक्षा प्रतिष्ठान के एक अधिकारी का कहना है, “श्री लंका ने हमारे साथ इस तरह की कोई जानकारी साझा नहीं की है। अहम बात यह है कि श्रीलंका सुरक्षा एजेंसियों ने खुद जाँच के बाद इससे इनकार कर दिया था।”

भारतीय अधिकारियों का मानना है कि इस्लामिक उपदेशक मौलवी बिन हाशिम ने भारत की यात्रा की थी। हाशिम को श्री लंका धमाकों का मुख्य साजिशकर्ता माना जा रहा है। वो श्री लंका में नैशनल तौहीद जमात (एनटीजे) का नेता था। हालाँकि भारतीय अधिकारियों ने हाशिम की भारत यात्रा के बारे में जानकारी देने से इनकार कर दिया, लेकिन एक अधिकारी का कहना है कि हाशिम शुरुआत में तमिलनाडु तौहीद जमात (टीएनटीजे) के साथ जुड़ा था और इस संस्था का आतंकी गतिविधियों में कोई हाथ नहीं था। लेकिन फिर बाद में हाशिम ने टीएनटीजे को छोड़कर नैशनल तौहीद जमात की स्थापना की थी। जहाँ उसने इस्लाम के हिंसक रूप का प्रचार करना शुरू कर दिया।

‘रेपिस्ट’ है पाकिस्तानी फ़ौज: बलात्कार करने घुसे फौजी को लड़की ने मारी गोली

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा इलाके में पड़ने वाले मोहमंद जिले में एक लड़की ने पाकिस्तानी फौजी को गोली मार दी। खबरों के मुताबिक वो फौजी और उसका एक साथी महिलाओं का यौन उत्पीड़न करने के इरादे से जबरन घर में घुस आए थे।

पत्रकार ताहा सिद्दीकी के मुताबिक, पाकिस्तानी फौजियों ने देर रात उस घर में घुसने की कोशिश की जिसमें औरतों के अलावा कोई नहीं था। घर के सभी पुरुष रोजगार के लिए दूसरे शहर गए हुए थे।

घर में रहने वाली महिला ने आरोप लगाया कि फौजी घर में घुसने के बाद उनका यौन शोषण करने का प्रयास करने लगे। इस बीच एक लड़की ने बंदूक निकाली और उनमें से एक को मार दिया। ये ‘मोहमंद राइफल्स’ के फौजी थे जो पाकिस्तानी फ़ौज का एक हिस्सा है।

ऐसा भी नहीं था कि वहाँ पर किसी तरह के सर्च ऑपरेशन तहत ये फौजी घर में घुसे हों, क्योंकि वहाँ के स्थानीय प्रशासन ने यह साफ़ कर दिया हैं कि उस क्षेत्र में ऐसी कोई गतिविधि ही नहीं हुई है।

इस मामले को देखते हुए वहाँ के स्थानीय लोगों ने पीड़ितों के लिए न्याय की माँग की है। बता दें कि इस तरह के आरोप पाकिस्तानी फौज पर पहले भी लग चुके हैं लेकिन उन पर आवाज नहीं उठी, लेकिन अब वहाँ के लोगों ने तय किया कि वो पाकिस्तान फौजियों के इस रवैये पर चुप नहीं रहेंगे। इससे पहले वजीरिस्तान प्रांत में भी एक ऐसा मामला सामने आ चुका है।

मोहम्मद फैज को लेकर NIA ने अमरोहा में की छापेमारी, देर रात तक जुटाए साक्ष्य

दिल्ली से गिरफ़्तार हुए संदिग्ध आतंकी मोहम्मद फ़ैज़ को लेकर NIA की टीम गुरुवार (मई 2, 2019) को अमरोहा में सैदपुर इम्मा गाँव पहुँची। यहाँ NIA की टीम आधी रात तक सबूत जुटाने में लगी रही। इस दौरान टीम फैज को लेकर पूर्व में पकड़े गए दो संदिग्ध आतंकी सईद और रईस की दुकान पर भी पहुँची। यहाँ पूछताछ के दौरान फैज की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी की गई।

अमरोहा पहुँचकर सबसे पहले टीम ने मदरसा जामा मस्जिद में फैज़ की निशानदेही पर सबूत जुटाए, क्योंकि जाँच में फैज़ ने बताया था कि कुछ दिन पहले आतंकी संगठन हरकत-उल-हर्ब-ए-इस्लाम के मुखिया के बुलावे पर वह अपने दो साथियों के साथ अमरोहा आया था और इस दौरान वो जामा मस्जिद में ठहरा था।

जाँच के दौरान टीम ने प्रबंधन समिति से बात करने के साथ वहाँ के रिकॉर्ड को भी चेक किया। इसके बाद उसे मुफ़्ती सुहैल के घर ले जाया गया और बाद में टीम ने मुहल्ला दरबार स्थित उसके ससुराल पर भी छापा मारा। टीम ने इन सब जगह साक्ष्य जुटाए। देर रात होने के कारण टीम नगर कोतवाली में ही ठहरी।

बता दें कि 20 अप्रैल को बांसखेड़ी गाँव के निवासी मौलाना गुफरान की गिरफ्तारी के बाद 9 दिन के भीतर NIA ने अमरोहा में दूसरी बार छापेमारी की है। गुफरान को पाँच दिन की रिमांड पर लिया गया। शुक्रवार (मई 4, 2019) शाम उसकी रिमांड खत्म हो गई परंतु मोहम्मद फैज अभी भी एनआइए की गिरफ्त में है।

इससे पहले पिछले साल 26 दिसंबर को NIA ने अमरोहा में छापा मारकर आतंकी संगठन हरकत-उल-हर्ब-ए-इस्लाम के कथित सरगना मुफ्ती सुहैल के साथ दो सहे भाईयों सईद व रईस तथा मुहल्ला पचदरा के निवासी और आटो चालक इरशाद को भी गिरफ्तार किया था।