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शत्रुघ्न के सामने एक और ‘शत्रु’: बिहार महागठबंधन में फिर से आई दरार, VIP ने खड़ा किया उम्मीदवार

भाजपा से कॉन्ग्रेस में शामिल हुए पटना साहिब के मौजूदा सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने सोमवार (अप्रैल 29, 2019) को बिहार की पटना साहिब लोकसभा सीट से नामांकन दाखिल किया। इस बीच बिहार के महागठबंधन में एक बार फिर से दरार पड़ती दिख रही है। ऐसा लग रहा है कि महागठबंधन के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। तभी तो महागठबंधन में शामिल पार्टियाँ एक दूसरे के खिलाफ ही प्रत्याशी को मैदान में उतार रहे हैं।

बता दें कि, विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) ने कॉन्ग्रेस उम्मीदवार शत्रुघ्न सिन्हा के खिलाफ अपनी पार्टी की तरफ से रीता देवी को चुनावी मैदान में उतार दिया है। दरअसल, चुनाव के पाँचवें चरण के लिए कॉन्ग्रेस पार्टी ने मधुबनी सीट पर वीआईपी के उम्मीदवार बद्री पूर्वे के खिलाफ अपनी पार्टी के बागी शकील अहमद को प्रत्याशी बनाया है। हालाँकि कहा जा रहा है कि कॉन्ग्रेस ने शकील अहमद से नामांकन वापस लेने के लिए काफी मान-मनौव्वल किया, लेकिन शकील अहमद ने अपना नामांकन वापस नहीं लिया। और अब इसी का बदला लेने के लिए वीआईपी ने पटना साहिब से कॉन्ग्रेस प्रत्याशी शत्रुघन सिन्हा के खिलाफ अपने प्रत्याशी को उतारने का फैसला कर लिया है।

शत्रुघ्न सिन्हा ने सोमवार (अप्रैल 29, 2019) को नामांकन का पर्चा दाखिल करने के बाद इसकी तस्वीर साझा करते हुए ट्विटर पर एक कविता शेयर की। उन्होंने ट्वीट किया, “बिगुल बज गया है रण का, शांत नहीं बैठूँगा अब। प्रतिद्वंद्वी खड़ा है सामने, लेके कई हथियार, नि:शस्त्र नहीं मैं भी हूँ, संग मेरे है जनता का प्यार।” बिहार की इस सीट पर लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण 19 मई को वोट डाले जाएँगे। मुख्य तौर पर यहाँ शत्रुघ्न सिन्हा का मुकाबला बीजेपी उम्मीदवार और केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद से है।

सेक्स रैकेट का भंडाफोड़: मोहम्मद उमर और मोहम्मद अजीम गिरफ्तार, अफगानिस्तान से है कनेक्शन

गोवा के तटीय गाँव कैलंगुट में सेक्स रैकेट का भंडाफोड़ हुआ है। मामले में जाँच के बाद दो अफगान अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया है।

सोमवार (अप्रैल 29, 2019) को एक अधिकारी की सूचना पर की गई छापेमारी के बाद अफगानिस्तान सरकार के संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय में निदेशक समेत दो अफगान अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया।

नवभारत टाइम्स की खबर के अनुसार इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान के संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय में बतौर आंतरिक लेखा निदेशक काम करने वाले आरोपी मोहम्मद उमर एरियन और अफगानिस्तान में वकील मोहम्मद अजीम होदमन को कैलंगुट पुलिस स्टेशन के अधिकारियों द्वारा की गई छापेमारी में गिरफ्तार किया गया। इस छापेमारी के दौरान उज्बेकिस्तान की दो युवतियों को छुड़ाया भी गया।

बता दें कि पुलिस ने आईपीसी की अलग-अलग धाराओं के तहत इस केस को दर्ज किया है। इंस्पेक्टर रोपोसो ने जानकारी देते हुए बताया है कि अफगानिस्तान के इन दो अधिकारियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 370 (वेश्यवृत्ति), 370(3) और अनैतिक यातायात रोकथाम अधिनियम की धारा 4, 5 और 7 के तहत गिरफ्तारी की गई है।

बनिहाल CRPF हमला: पुलवामा दोहराने की नाकाम साज़िश में PhD स्कॉलर समेत 6 गिरफ़्तार

30 मार्च को जम्मू कश्मीर स्थित बनिहाल में सीआरपीएफ के काफ़िले पर हुए हमले का मामला सुलझा लिया गया है। इस हमले को जमात-ए-इस्लामी के छात्र गुट ने अंजाम दिया था और इसकी साज़िश पाकिस्तान पोषित आतंकी संगठन हिज़्बुल मुजाहिदीन और जैश-ए-इस्लामी ने रची थी। राज्य पुलिस ने इस मामले में एक रिसर्च स्कॉलर समेत 6 आतंकियों को गिरफ़्तार किया है। सभी आतंकियों को एनआईए को सौंपने की तैयारी की जा रही है। पीएचडी स्कॉलर हिलाल अहमद मंटू बठिंडा की सेंट्रल यूनिवर्सिटी में पढ़ता है। वह जमात के स्टूडेंट विंग का सदस्य है। जम्मू के आईजी एमके सिन्हा ने मामले को सुलझाने का दावा करते हुए बताया कि 30 मार्च को बनिहाल में पुलवामा जैसा कार ब्लास्ट करके सीआरपीएफ कॉनवाय पर हमला करने की कोशिश की गई। अगले ही दिन पुलिस ने इस कार को ब्लास्ट करने वाले ओवेस अमीन नाम के आत्मघाती हमलावर को पकड़ लिया था।

बनिहाल में भी पुलवामा हमले की तरफ ही बड़ी क्षति पहुँचाए जाने की योजना थी लेकिन आतंकी कामयाब नहीं हो पाए। इस साज़िश के पीछे पाकिस्तानी आतंकी मुन्ना बिहारी का नाम सामने आया है। मामले की तेज़ जाँच के लिए सतर्क पुलिस ने एसआईटी का गठन कर दक्षिण कश्मीर के उमर शफी, शोपियाँ निवासी आकिब शाह, शाहिद वानी उर्फ वाटसन और पुलवामा स्थित चकोरा का रहने वाला वसीम अहमद डार उर्फ डॉक्टर को दबोचा। पुलिस के अनुसार, मुन्ना बिहारी और हिज़्बुल आतंकी रियाज़ नायकु के कहने पर रईस और उमर ने ओवेस को आत्मघाती हमले के लिए तैयार किया था। इन्होंने मिलकर पुलवामा स्टाइल में ही कार को तैयार किया और फिर कार में विस्फोटक भी कर डाला। कार कहाँ से ली गई और आतंकियों ने विस्फोटक कहाँ से ख़रीदा, इस बारे में अभी तक कुछ ख़ुलासा नहीं हुआ है।

इस बार आतंकी संगठनों ने काफ़ी चालाकी से काम लिया था। हमले को अंजाम देने के लिए ऐसे लोगों के चयन किया गया, जिनके ख़िलाफ़ कोई एफआईआर दर्ज नहीं थी। पुलिस के शक से बचने के लिए ऐसे आतंकियों को इस साज़िश में शामिल नहीं किया गया, जो पहले से सुरक्षा एजेंसियों के राडार पर थे। बनिहाल में हमला करने से पहले 26 मार्च को भी आतंकियों ने इसी तरह का प्रयास किया था लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी थी क्योंकि ब्लास्ट हुआ ही नहीं। जमात-ए-इस्लामी कश्मीर में मज़बूत प्रभाव रखता है और इसने 1971 के बाद से कुछ चुनावों में भी हिस्सा लिया था। राज्य में अलगाववादी विचारधारा के प्रचार-प्रसार में लगे जमात पर गृह मंत्रालय ने 2019 में 5 वर्षों का प्रतिबन्ध लगा दिया था।

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गृह मंत्रालय को पुख़्ता सूचना और सबूत मिले थे कि ये संगठन जम्मू कश्मीर में आतंकियों को कई सारी सुविधाएँ मुहैया करा रहा है। गिरफ़्तार आतंकियों ने कश्मीर में युवाओं को बरगलाने और मज़हब के नाम पर भड़काने की बात स्वीकार की है। बता दें कि 30 मार्च को बनिहाल में हुए हमले में सीआरपीएफ की गाड़ी क्षतिग्रस्त हो गई थी और जवानों को भी मामूली चोटें आई थीं। आतंकियों द्वारा विस्फोटकों से लदी सैंट्रो कार को जम्मू से श्रीनगर ले जाते वक़्त उड़ा दिया गया था। जिस कार में ब्लास्ट हुआ, उसके ड्राइवर को भी गिरफ़्तार कर लिया गया था। उसके आकाओं ने उसे सीआरपीएफ काफ़िले को उड़ाने के लिए बोला था लेकिन वह वहाँ से भाग निकला था। बाद में सुरक्षा बलों ने उसे धर दबोचा।

कर्मठ कन्हैया, अपरिपक्व तेजस्वी और 30 साल के ‘दोस्त’ को धोखा: लालू की राजनीति पर KC त्यागी का प्रहार

जदयू के कद्दावर नेता केसी त्यागी ने कहा है कि राजद सुप्रीमो लालू यादव को कन्हैया कुमार की लोकप्रियता चुभती है। त्यागी ने कहा कि लालू यादव ने कन्हैया कुमार को इसीलिए टिकट नहीं दिया क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि कन्हैया के उभार से उनके बेटों की राह में कोई रुकावट आए। बेगूसराय का चुनावी गणित समझाते हुए अनुभवी नेता ने कहा कि मुख्य मुक़ाबला तो राजद और भाजपा के बीच है लेकिन अगर कन्हैया महागठबंधन प्रत्याशी होते तो ये मुक़ाबला काँटे का होता। राज्यसभा सांसद त्यागी ने आगे कहा कि चूँकि परिवारवाद से ग्रसित लालू अपने बेटों को राजनीति में स्थापित करने में कोई जोखिम नहीं लेना चाहते थे, इसीलिए कन्हैया को टिकट देना उन्हें गँवारा न था। त्यागी ने तेजस्वी यादव और कन्हैया कुमार की तुलना करते हुए कहा कि कन्हैया की कृति और ख्याति तेजस्वी से कहीं ज्यादा है।

केसी त्यागी ने कन्हैया कुमार के तारीफ़ों के पुल बाँधते हुए कहा;

कन्हैया ने जो भी हासिल किया है वह अपने बलबूते पर हासिल किया है। वह अपनी कर्मठता से दुनिया की प्रख्यात यूनिवर्सिटी जेएनयू के छात्र अध्यक्ष बने जबकि तेजस्वी यादव अपने पिता की बदौलत नेता प्रतिपक्ष बने। तेजस्वी को डर था कि आने वाली राजनीति में कन्हैया उनको पछाड़ न दे, इसी डर की वजह से वामदल से गठबन्धन नहीं हो पाया। ऐसे तो 25-30 साल से सीपीआई और राजद में गठबन्धन रहा था, लेकिन अब ऐसा हुआ तो इसके पीछे यही कारण है। तेजस्वी यादव अपरिपक्व राजनीतिज्ञ हैं और वह अपने पिता लालू प्रसाद की कृति और ख्याति के बलबूते राजनीति कर रहे हैं। जबकि, कन्हैया अपने करिश्मे से चुनाव को रोचक बना दिया है। इस समय बेगूसराय में त्रिकोणीय मुकाबला हो रहा है।

केसी त्यागी ने पूर्व उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव द्वारा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर की गई टिप्प्णियों के सदर्भ में कहा कि नीतीश जी किसी पर भी अभद्र टिप्पणी नहीं किया करते हैं। केसी त्यागी फिलहाल जदयू के महासचिव हैं और राज्यसभा सांसद हैं। जदयू के वरिष्ठ नेताओं में से एक त्यागी को 2013 में पार्टी द्वारा राज्यसभा सांसद बनाया गया था। वे न्यूज़ चैनलों पर भी पार्टी की बात रखते नज़र आते हैं। बेगूसराय की बात करते हुए त्यागी ने उसे एक परिपक्व क्षेत्र बताया और कहा कि यह एक ऐसा क्षेत्र है जो साम्यवाद और समाजवाद के आन्दोलनों के लिए जाना जाता है। उन्होंने ‘विचारधारा में अंतर’ के बावजूद कन्हैया कुमार से सहानुभूति जताई।

इसके अलावा केसी त्यागी ने लालू यादव पर वामदलों के साथ धोखा करने का आरोप भी मढ़ा। उन्होंने कहा कि वामदल हमेशा लालू के लिए खड़े रहे लेकिन कन्हैया को टिकट न देकर लालू ने वामदलों को धोखा दिया। बता दें कि राजद सुप्रीमो अभी राँची कारावास में चारा घोटाला के मामले में अपनी सज़ा काट रहे हैं लेकिन टिकट वितरण सम्बन्धी सभी चुनावी निर्णय उन्होंने जेल से ही लिया है। लालू यादव पर नीतीश कुमार ने जेल में फोन का उपयोग कर बिहार चुनाव प्रभावित करने का आरोप लगाया था, जिसके बाद उनके सेल में गहन तलाशी ली गई थी। विपक्ष के कई नेताओं ने पिछले कुछ महीनों में लालू से जेल में ही जाकर मुलाक़ात की है।

आदिवासी प्रेमी राहुल गाँधी, 1966 में मिज़ोरम पर बम किसने बरसाए थे याद है?

राहुल गाँधी कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष हैं, सोनिया गाँधी के पुत्र हैं, राजीव गाँधी के भी पुत्र हैं। किसी के भाई, किसी के साले, किसी के पोते और किसी के परनाती भी हैं। बचपन, किशोरावस्था और जवानी के बारे में देश को बहुत ज़्यादा जानकारी नहीं है। हालाँकि, उनके पिछले पाँच सालों का, और उनमें से भी पिछले तीन सालों का लेखा-जोखा इंटरनेट के पास है।

इन तीन सालों में राहुल गाँधी ने रैलियों में बोलना सीखा, और बोलने की आदत डाली, और फिर बड़बड़ाने लगे। बोलना सही बात है। बोलने से पता चल जाता है कि कौन गुजरात की महिलाओं को कहाँ का मजा देने की बात कर सकता है। बोलने से पता चल जाता है कि आप हर प्रश्न का जवाब वूमन इम्पावरमेंट कह कर दे सकते हैं। बोलने से पता चल जाता है कि आपके मस्तिष्क में जो सत्तर प्रतिशत ऑक्सीजन जा रहा है, वो किस कार्य के लिए इस्तेमाल हो रहा है।

हाल ही में पत्रकारिता के स्वघोषित मानदंड ने सवाल उठाया था कि आखिर मोदी ही क्यों इंटरव्यू दे रहे हैं, बाक़ियों का इंटरव्यू क्यों नहीं दिखाती मीडिया। राहुल ने 2014 में इंटरव्यू दिए थे, फिर पता चला कि ऐसे धुरंधर और प्रखर नेता को सवाल चाहे पहले दे दीजिए, या बाद में, ये दाढ़ी बना कर आएँ या सॉल्ट एंड पेपर लुक में, इन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता।

राहुल गाँधी व्यक्तित्व नहीं, एक मानसिक अवस्था है। कभी-कभी व्यक्ति व्यक्तिवाचक संज्ञा से ऊपर उठ कर जातिवाचक संज्ञा हो जाता है, और उनमें से राहुल गाँधी जैसे महज़ चंद लोग ऐसे होते हैं जो व्यक्ति होते हुए भी विशेषण बन जाते हैं। राहुल गाँधी हमारे युग में एक केस स्टडी हैं जिसे भारत के आम चुनावों की ही तरह, विदेशी शिष्टमंडलों को आकर देखना चाहिए कि दुनिया को लोकतंत्र देने वाले देश के आधुनिक डेमोक्रेसी की सबसे पुरानी पार्टी का अध्यक्ष कौन है, और उससे भी बड़ी बात कि वो क्या है!

हाल ही में एक रैली में राहुल गाँधी ने बताया कि सरकार ने एक कानून बनाया है जिसमें ये लिखा हुआ है कि आदिवासी को सरकार मार सकती है। यूँ तो राहुल गाँधी का मानसिक स्तर इतना ग़ज़ब का है कि वो आदिवासियों की यह बात गैरआदिवासी क्षेत्र में भी कह सकते हैं, लेकिन बेनेफिट ऑफ डाउट देते हुए मैं यह मान लेता हूँ कि यह डर उन्होंने किसी आदिवासी बहुल क्षेत्र की रैली में ही दिखाया होगा।

ज़ाहिर तौर पर यह बात इतनी ज़्यादा गलत है कि आप इसे सिरे से नकार देंगे। लेकिन हम उस भारत के नागरिक हैं जहाँ पिछले साल की अप्रैल में व्हाट्सएप्प पर फैलाए गए अफ़वाह को ‘टाइप किया हुआ है, तो सच ही होगा’ मान कर ऐसा हिंसक आंदोलन हुआ कि सामाजिक न्याय की बलि 12 लोग चढ़ गए। इसलिए, ऐसी बातों को नकारना नहीं चाहिए। ऐसी बातों पर प्राइम टाइम टीवी पर डिबेट होना चाहिए कि ये व्यक्ति आखिर रैलियों में क्या बोलता है, क्यों बोलता है!

लेकिन प्राइम टाइम नहीं होगा क्योंकि सारे प्राइम टाइम पर मोदी की रैली आती है, और जिस एक जगह पर नहीं आती उस पर यह विलाप होता है कि बाकी सब पर मोदी ही क्यों आ रहा है। कुल मिला कर मीडिया में कॉन्ग्रेस तंत्र को अपनी रक्त-मज्जा और ढाँचे से पूजने वाले लोग अपने प्रियतम नेता की करतूतों को ऐसे ही जाने देते हैं।

1966 का एक क़िस्सा याद आता है। इंदिरा गाँधी नई-नई प्रधानमंत्री बनी थी, और भारत के उत्तरपूर्व में विद्रोह हो गया। मिज़ोरम में मिजो नेशनल फ़्रंट ने असम रायफ़ल्स के सैन्य ठिकानों पर हमला बोल दिया और मार्च 1, 1966 को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया। इंदिरा गाँधी ने देश के इतिहास में पहली बार, और अब तक आख़िरी बार, अपने ही नागरिकों पर, अपनी सीमा के भीतर एयरफ़ोर्स से बॉम्बिंग कराई।

मिज़ोरम में आदिवासी रहते हैं कि नहीं, ये आप लोग पता कर लीजिएगा। हम इस पर चर्चा कर सकते हैं कि उग्रवादियों ने सैन्य ठिकानों पर हमला किया था, और उनको दबाना ज़रूरी था। लेकिन, क्या वही एक रास्ता था मिसेज़ गाँधी के पास? क्या उसमें सिविलियन्स नहीं मरे? क्या आर्मी की मदद से एक छोटे इलाके की स्थिति नियंत्रण में नहीं लाई जा सकती थी? क्या अपने ही नागरिकों पर देश की एयरफ़ोर्स को हमला करने को मजबूर करना वैसा ही एकमात्र उपाय तो नहीं था जैसा कि इमरजेंसी?

राहुल गाँधी को ये बात याद नहीं होगी क्योंकि उनका दिमाग फेफड़ों द्वारा लिए गए 70 प्रतिशत ऑक्सिजन को अपने बालों द्वारा उत्सर्जित कर देता है, न कि न्यूरॉन्स की द्रुत हलचल के लिए इस्तेमाल में लाता है। अगर याद हो तो आदिवासियों के इलाकों में नक्सलियों की खूब पैठ थी। राजनाथ सिंह ने बिना सिविलियन्स को अपने ही सुरक्षा बलों की गोलियों का शिकार बनाए लगभग 30 जिलों में समेट दिया।

इसके लिए नक्सल आतंकियों को मुख्यधारा में लाने के द्वार खुले रखने के साथ, उन्हें उन्हीं की भाषा में जवाब देने और उन इलाकों में विकास का रास्ता अख़्तियार करने की नीति अपनाई गई। परिणाम सामने थे कि नक्सली हिंसा में लगभग 60% की गिरावट आई। ये समझना मुश्किल नहीं है कि सरकार के पास सारे तरीके होते हैं लेकिन आपका चुनाव आपको समय की नजर में सही या गलत ठहराता है।

तो, राहुल गाँधी जी जिस केयरफ़्री एटीट्यूड के साथ यह बोल गए कि कानून में लिखा है कि आदिवासियों को मारा जा सकता है, वो अक्षरशः सही हैं क्योंकि उनके पास उनकी दादी की कानून की किताब होगी जिसे उन्होंने कई बार अपने हिसाब से लिखा था। उन्होंने अपने कार्यकाल में कई ऐसी बातें की थीं, जो नैतिकता की परिभाषा से बाहर थी, और जिन बातों के होने की फर्जी आशंका पर राहुल और उनका गिरोह हर तीसरे दिन आपातकाल लाता रहा है।

राहुल गाँधी आखिर इतना सहज कैसे होते हैं?

इतनी सहजता से झूठ बोलना और मुस्कुरा देना दो तरह के ही लोग कर सकते हैं: मूर्ख या धूर्त। राहुल गाँधी बहुत कुछ हैं लेकिन मैं उन्हें धूर्त तो नहीं ही मानूँगा, क्योंकि धूर्त होने के लिए पढ़ा-लिखा और समझदार होना आवश्यक है। उदाहरण के तौर पर आप राजदीप सरदेसाई को धूर्त कह सकते हैं, रवीश कुमार को धूर्त कह सकते हैं, अरविन्द केजरीवाल को धूर्त कह सकते हैं, शेखर गुप्ता को धूर्त कह सकते हैं। उस लिहाज से राहुल गाँधी बहुत कुछ हैं, लेकिन मैं उन्हें मूर्ख ही मानूँगा।

मूर्खता के साथ सहजता बिना किसी प्रयास के ही आ जाती है। आप अगर मूर्ख नहीं होंगे तो आप राफेल का दाम, दस अलग-अलग रैलियों में 526 रुपए से 700 करोड़ रुपए तक नहीं बोलेंगे! मूर्ख को अपनी मूर्खता पर सबसे ज़्यादा विश्वास होता है, बजाय दूसरों की समझदारी पर। मैं जानता हूँ कि उन्हें जो स्क्रिप्ट लिख कर दिया जाता होगा, उस पर दाम सही लिखा रहता होगा। लेकिन रिलक्टेंट पोलिटिशियन राहुल गाँधी फ्लो में बोल जाते हैं और उनके इसी बोलने पर पत्रकारिता के समुदाय विशेष के कई माननीय सदस्य कहते हैं, “अगर वो बोल ही रहे हैं, तो जाँच करवाने में क्या समस्या है?”

राहुल के लगातार बोले जाने वाले झूठ

मैं बस दो पैराग्राफ़ में राहुल गाँधी द्वारा बोले गए कुछ झूठों की याद दिलाना चाहूँगा। कुछ प्रमुख झूठ हैं: मोदी अर्धसैनिक बलों को शहीद का दर्जा नहीं दे रहा, जबकि शहीद का दर्जा जैसी कोई बात होती ही नहीं। मोदी मनरेगा को बर्बाद कर रहा है, जबकि मनरेगा में सबसे ज़्यादा पैसा इसी सरकार ने दिया। मोदी सरकार घृणा फैलाती है, जबकि उनके अपने विधायक माइक लेकर गुजरात में बिहारियों को मारने की बातें करते पाए जा चुके हैं, और भारत के तमाम सबसे बड़े दंगों का ख़ून कॉन्ग्रेस के ही पूरे देह पर है। उन्होंने संसद में कहा कि मिराज 2000 HAL ने बनाया, जबकि ये कोरी बकवास है। राफेल पर उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने एयरफ़ोर्स से सलाह नहीं ली और रिलायंस को 30000 करोड़ दे दिए गए, ऐसी कोई बात नहीं है। पेरियार की मूर्ति टूटी तो भाजपा और संघ के नाम आरोप लगाया, जबकि नशे में धुत्त एक सीआरपीएफ़ जवान ने यह कार्य किया था। सरदार पटेल की मूर्ति को उन्होंने मेड इन चायना बताया था जबकि यह झूठ 2015 में ही नकारा जा चुका था।

उसके बाद, हाल ही में सिर्फ एक रैली में उन्होंने दस झूठ बोले जिनमें राफेल, मिग 21 HAL ने बनाया था, मनरेगा मोदी ने बर्बाद किया, उद्योगपतियों का 3.5 लाख करोड़ लोन माफ किया, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में दो दिन में किसानों का ऋण माफ किया गया, जेटली ने माल्या से मिल कर भागने में मदद की, सीबीआई के चीफ़ को मोदी ने हटवा दिया, जय शाह भाजपा सरकार की मदद से 80 करोड़ हर महीने का व्यवसाय कर रहे हैं! ऐसी ही उत्तरपूर्व के दौरे पर कहा कि मोदी ने उनके लिए कुछ नहीं किया, जबकि वहाँ के राज्य और केन्द्र की कॉन्ग्रेस सरकारों में जितना पिछले सत्तर साल में नहीं किया, उतना मोदी ने अपने कार्यकाल में कर दिया। वहीं, अपनी मूर्खता में बहते हुए उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि उत्तरपूर्व के राज्यों के युवाओं को मोदी सरकार मार रही है। इस पर मैं कोई सफ़ाई नहीं देना चाहता।

मुझे ये सब याद करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि यह हर रैली में रिपीट मोड पर चलता रहता है। इस बार कॉन्ग्रेस की योजना पूरी तरह झूठ बोल कर चुनाव जीतने पर ही आधारित है क्योंकि इन्होंने सब्ज़बाग़ दिखाकर राजस्थान और मध्यप्रदेश तो अपने नाम कर ही लिया। ये बात और है कि दोनों जगह की जनता अब तेरह रुपए की ऋणमाफी पाकर, और उन लोगों का नाम लिस्ट में देख कर आश्चर्य में है जो किसान हैं ही नहीं।

जब मूर्खता से भी धूर्तता वाले परिणाम आ जाते हैं

मूर्खतापूर्ण वचन भी कई बार अपेक्षित परिणाम ले आते हैं। राहुल गाँधी के भाषणों के मध्य में वो लोग हैं जिन्हें राहुल गाँधी के परनाना, दादी, पिता और माता ने पीढ़ी दर पीढ़ी पिछड़ा, वंचित और गरीब बनाए रखा। उनकी दुर्बलता या सुभेद्यता का लाभ उठाना कॉन्ग्रेस पार्टी का राजकीय और राष्ट्रीय उद्योग बन गया। चूँकि यही ग़रीब, पिछड़े, वंचित और दुर्बल इल उद्योग के लिए कच्चा माल थे, तो उनकी स्थिति में छेड़छाड़ करना अपने फ़ैक्ट्री पर ताला मार कर लाभ कमाने की उम्मीद रखने जैसा होता।

यहाँ नई सरकार इन्हें घर, सिलिंडर, बल्ब, बिजली, शौचालय, और सड़क के साथ रोजगार के अवसर देकर सबल बना रही है, तो कॉन्ग्रेस के घरेलू उद्योग के रॉ मटीरियल पर कुठाराघात हो रहा है। फ़ंड सूख रहे हैं, पार्टी घाटे में चल रही है। इसलिए, नया पैंतरा है कि जो गरीबी से उबर रहे हैं, या अभी भी गरीब हैं, उन्हें गरीबी में ही रखने की कोशिश करो।

ऐसे लोगों को जब आप यह कह देंगे कि मोदी ने मनरेगा को बर्बाद कर दिया जिससे तुम्हें रोजगार मिलता था, तो वो परेशान हो जाएगा। ऐसे लोगों को आप कह देंगे कि सरकार ने तुम्हारा आरक्षण छीन लिया है, सुप्रीम कोर्ट से कहा कि खत्म हो जाएगा सब, तो वो सड़कों पर आ जाएगा (भले ही उसके हाथ में मशाल और पेट्रोल आप देंगे)। ऐसे लोगों को आप कह देंगे कि सरकार ने कानून बनाया है कि आदिवासी को मार दिया जाएगा, तो वो सोचने लगेगा कि अगर ऐसा कानून नहीं है तो ये आदमी माइक पर बोल कैसे रहा है!

आप रैलियों में ग़रीबों के रोजगार छिनने से झूठ बोलना शुरु करते हो और इस बात पर पहुँच जाते हो कि मोदी तो तुम्हें मारने के लिए कानून लिख चुका है, तो यह मूर्खता ज़रूर है, लेकिन जो वल्नरेबल लोग हैं, दुर्बल हैं, असहाय हैं, पहले से ही सर्वाइवल को लेकर परेशान हैं, वो तो डर ही जाएँगे। और जब वो डर जाएँगे तो किसे वोट देंगे? उसी पार्टी को जिसने उन तक यह सूचना पहुँचाई और ऐसे कानून को मिटा देने का वादा कर रहा है जो है ही नहीं!

क्योंकि महानता थोपी भी जा सकती है

इस बार राहुल गाँधी ने घरवालों की वह सलाह कुछ ज़्यादा ही गम्भीरता से ले ली जिसमें वो स्टेज पर बोलने से डर रहे होंगे, और किसी ने कह दिया होगा, “टेक इट ईज़ी, ब्रुह!” क्योंकि इतनी संजीदगी से अपनी मूर्खता का प्रदर्शन बहुत ही कम लोग करते हैं। रैलियों में तो मुझे याद नहीं है कि कोई ऐसे गम्भीर चेहरे के साथ खेतों में दवाई की फ़ैक्टरी लगाने से लेकर अालू-सोना वाली बात कर सकता हो।

राहुल गाँधी बड़े नेता बना दिए गए हैं। शेक्सपीयर द्वारा लिखे नाटक ‘ट्वैल्फ्थ नाइट’ का एक संवाद याद आता है जब मैलवेलियो महानता के बारे में कहता है, “…be not afraid of greatness: some are born great, some achieve greatness, and some have greatness thrust upon them.”

राहुल गाँधी पैदा तो ग्रेट हुए ही थे, लेकिन उनके बचपन, किशोरावस्था और जवानी के गायब हिस्सों के बाद, लग रहा था कि महानता उनकी पहुँच से बाहर ज रही है, तभी प्रौढ़ावस्था में ग्रेटनेस उन पर थ्रस्ट कर दिया गया कि ‘लो बे, महान बन जाओ। इस महान पार्टी की कमान संभालो जिसने अपने देश के लोगों पर बम बरसाए, सुप्रीम कोर्ट के जजों को अपने हिसाब से बदला, सत्ता के लिए आपातकाल लाई, पार्टी फ़ंड के लिए जीप से लेकर बोफ़ोर्स और ज़मीन के भीतर के कोयले से लेकर आकाश में उड़ते हेलिकॉप्टर और आयनोस्फेयर के तरंगों तक में अपने महान घोटालों की छाप छोड़ दी है।”

राहुल गाँधी ने कहा, “बट, मम्मी!”

मम्मी ने कहा, “सत्तर साल से जिनको पाला है, वो हमारी फेंकी हड्डियों को चाटेंगे और तुम्हारे गुणगान में लगे रहेंगे। तुम बस महान बनने की औपचारिकताएँ पूरी कर लो। तुम मुस्कुराओ, फटी जेब दिखाओ, जनेऊ पहनो, रामभक्त बनो, शिवभक्त बनो, गोत्र बताओ, आँख मारो, बग़लें झाँकों, हमउम्र नेताओं से पूछो कि क्या बोलना है, रैलियों में हाथ हिलाओ, माइक पर बोलो, जो मन में आए बोलो, कुछ बातें रट लो, हर बार वही बोलते रहो… इतना ही करना है क्योंकि तुम इतने ही करने के लिए बने हो। बाकी काम मीडिया देख लेगी क्योंकि उन्हें हमने सालों देखा हैं।”

हाँ, हैं हमारे यहाँ जिहादी, इस्लामी चरमपंथी आतंकी: पाकिस्तानी सेना

सालों तक अपनी जमीन पर जिहादी आतंकी होने के खुले रहस्य को नकारने के बाद आख़िरकार पाकिस्तान को उसे स्वीकारना पड़ रहा है। पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज़ पब्लिक रिलेशंस के महानिदेशक मेजर जनरल आसिफ गफूर ने सोमवार को प्रेस वार्ता कर यह स्वीकारोक्ति कर ली है कि उनके देश में हिंसक चरमपंथी इस्लामी संगठन और जिहादी मौजूद हैं। साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि अब तक की पाकिस्तानी सरकारें इससे लड़ने में नाकाम रहीं हैं।

करता रहा भारत के दावे का विरोध

अब तक हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान भारत के इस दावे का विरोध करता रहा है कि उसकी ज़मीन पर इस्लामी दहशतगर्दों को खाद-पानी मिलता है। यह पहली बार है कि उसने अपने समाज और देश में मौजूद चरमपंथियों को स्वीकार किया है।

‘गँवाए हैं लाखों डॉलर’, पहले की सरकारें नाकाम

मेजर जनरल आसिफ गफूर ने कहा, “हमने हिंसक चरमपंथी संगठनों और जिहादी संगठनों को प्रतिबंधित कर दिया है और हम उनके खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि दहशतगर्दी का समूल नाश करने के लिए बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है, और उनके देश ने इस दहशत के साम्राज्य के कारण बहुत नुकसान उठाया है। उन्होंने कहा, “हमने आतंकवाद के कारण लाखों डॉलर गँवाए हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि उनके देश की पूर्ववर्ती सरकारें इस सबसे निपटने में नाकाम रहीं हैं। उन्होंने स्वीकारा, “सरकारें मेहरबानी करने में व्यस्त रही हैं और हर सुरक्षा एजेंसी इसी में व्यस्त रही है। इस वजह से हम प्रतिबंधित संगठनों के खिलाफ उस रणनीति को बनाने में नाकाम रहे हैं, जो हम आज बना रहे हैं।”

बालाकोट पर झूठ बरकरार

पाकिस्तान ने सच की इस एक स्वीकारोक्ति को भी बिना झूठ के नहीं रहने दिया। बालाकोट में कोई नुकसान नहीं होने के अपने झूठ पर कायम मेजर गफूर ने कहा, “बालाकोट में हमें कोई नुकसान नहीं हुआ, हमने स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया को ले जाकर दिखा दिया। हम हिन्दुस्तानी मीडिया को भी ले जाने को तैयार हैं।”

क्या चुनावी ख़र्च उठाने के लिए BJP नेताओं की पत्नियाँ गहने बेच रही हैं: CM कमलनाथ के बिगड़े बोल

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने विवादित बयान देते हुए भाजपा नेताओं की पत्नियों पर टिप्पणी की है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने पूछा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास रोज़ विमान यात्राएँ करने के लिए रुपए कहाँ से आ रहे हैं? साथ ही उन्होंने यह भी पूछा कि क्या भाजपा नेताओं की बीवियाँ चुनावी ख़र्च वहन करने के लिए अपने गहने बेच रही हैं? उनके इस बयान पर सोशल मीडिया पर लोगों ने पूछा कि क्या उनकी पार्टी के अध्यक्ष राहुल गाँधी साइकिल और बाइक से देश भर में घूम कर रैलियाँ कर रहे हैं? इससे पहले कमलनाथ ने भाजपा दफ़्तर बनाने के लिए प्रयोग किए गए रुपयों का भी हिसाब-किताब माँगा था। मध्य प्रदेश की 6 लोकसभा सीटों के लिए आज सोमवार (अप्रैल 29, 2019) को मतदान संपन्न हुआ।

इस चुनाव में छिंदवाड़ा से कमलनाथ के पुत्र नकुल नाथ कॉन्ग्रेस प्रत्याशी हैं। आज जब कमलनाथ शिकारपुर में अपने परिवार सहित वोट देने पहुँचे तो अजीब घटना हुई। कमलनाथ के वहाँ पहुँचते ही बिजली कट गई। काफ़ी देर तक बिजली कटी रहने के कारण कमलनाथ को मोबाइल कैमरे की फ़्लैश लाइट में वोट देना पड़ा। आधे घंटे से भी अधिक समय तक बिजली कटी रही। सोशल मीडिया पर कई दिनों से ऐसी बातें चल रही हैं कि कमलनाथ के सत्ता सँभालने के बाद से ही प्रदेश में इन्वर्टर की बिक्री बढ़ गई है। ऐसा इसीलिए, क्योंकि राज्य में पावर कट आम बात हो गई है।

कमलनाथ छिदंवाड़ा से 9 बार सांसद रह चुके हैं और 1 बार उनकी पत्नी अलका नाथ भी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। इस बार कमलनाथ के बेटे मैदान में हैं और उनका मुक़ाबला भाजपा नेता नत्थन शाह से हो रहा है। नत्थन शाह जुन्नारदेव सीट से भाजपा के विधायक रह चुके हैं। 2013 के चुनाव में नत्थन शाह ने कॉन्ग्रेस के सुनील उईके को 20 हजार मतों से मात दी थी। छिड़वाड़ा को कमलनथ का पारम्परिक सीट और गढ़ माना जाता है। चूँकि कमलनथ अब मुख्यमंत्री बन गए हैं, इसीलिए वो छिंदवाड़ा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं और लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपने पुत्र को उतारा है।

ऐतिहासिक: कश्मीरी पंडितों ने बनाई पार्टी, पहली बार विधानसभा उम्मीदवार होंगे प्रवासी कश्मीरी पंडित

तकरीबन 3 दशकों तक प्रवासी रहने के बाद अब प्रवासी कश्मीरी पंडित समुदाय जम्मू कश्मीर में आगामी विधानसभा चुनावों में न्याय और सम्मान की लड़ाई लड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। अगली विधानसभा में चुनावी आगाज करने के लिए इस समुदाय ने एक राजनीतिक पार्टी बनाई है। प्रवासी कश्मीरी पंडितों ने न्याय के लिए लड़ने और निर्वासित कश्मीरी पंडित समुदाय के पुनर्वास के लिए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील अशोक भान की अध्यक्षता में ‘कश्मीरी पंडित राजनीतिक कार्रवाई समिति’ (KPPAC) नामक एक राजनीतिक पार्टी बनाई है। संगठन ने अपनी पार्टी के लिए समर्थन जुटाने के लिए देश भर में सदस्यता अभियान भी शुरू किया है।

खबर के अनुसार, KPPAC जम्मू और कश्मीर में आगामी विधानसभा चुनावों में कई निर्वाचन क्षेत्रों में उम्मीदवारों को मैदान में उतारने के लिए तैयार है। हालँकि, यह पहली बार होगा जब जम्मू कश्मीर के विधानसभा चुनाव में प्रवासी कश्मीरी पंडित समुदाय को उम्मीदवार के रूप में चुनावी मैदान में उतारा जाएगा।

KPPAC के उपाध्यक्ष सतीश महालदार ने कहा कि वो चुनाव में उम्मीदवारों को मैदान में उतारने की योजना बना रहे हैं और साथ ही अन्य राजनीतिक दलों से भी गठबंधन की माँग कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर के अधिकांश राजनीतिक पार्टियाँ लोगों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर रहे हैं। सतीश महालदार का कहना है कि चुनाव में जीत हासिल करने के लिए पार्टियों के द्वारा प्रलोभन देना उन्हें अस्वीकार्य है। वो कहते हैं कि हम इंसान हैं और हमारे साथ इज्जत से पेश आना चाहिए।

पार्टी के द्वारा चलाए जा रहे सदस्यता अभियान के बारे में महालदार ने कहा कि इसके लिए नामांकन प्रक्रिया पहले से ही चालू है और वो कश्मीर के अंदर गठबंधन करने वाले साझेदारों की तलाश में हैं। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी में सिर्फ कश्मीरी पंडितों को ही नहीं बल्कि लद्दाख, कश्मीरी कट्टरपंथियों, सिखों और अन्य लोगों को भी शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जाता है। वो कहते हैं कि वो न्याय के लिए लड़ रहे हैं और यह राजनीतिक विचारधारा है। वो कश्मीर में सभी समुदायों के लिए लड़ेंगे।

गौरतलब है कि जम्मू कश्मीर राज्य राष्ट्रपति शासन के अधीन है। जम्मू कश्मीर में भाजपा और पीडीपी के गठबंधन की सरकार थी, मगर पिछले साल जून में पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती के साथ हुए मतभेद के बाद भाजपा सरकार ने अपना समर्थन वापस ले लिया था, जिसकी वजह से जम्मू कश्मीर में सरकार गिर गई और फिर 6 महीने के राज्यपाल शासन के बाद पिछले साल दिसंबर में यह राज्य राष्ट्रपति शासन के अधीन हो गया।

मुग़ल, ब्रिटिश और इटली का ग़ुलाम रहा है भारत, अब मिली असली आज़ादी: कंगना

बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत देश से जुड़े मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखने के लिए जानी जाती हैं। मणिकर्णिका फ़िल्म से धमाल मचाने वाली कंगना राजनीतिक मुद्दों पर भी काफ़ी मुखर रही हैं। इसके लिए न जाने कितने ही फ़िल्मी सितारों के निशाने पर आ चुकी कंगना ने बॉलीवुड में वंशवाद के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाकर अपनी ही इंडस्ट्री के लोगों को नाराज़ कर दिया था। अब कंगना रनौत ने ताज़ा बयान दिया है, जिसके कारण सोशल मीडिया पर लोगों ने अलग-अलग रिएक्शन दिए। कंगना ने कहा कि भारत न सिर्फ़ मुग़लों और अंग्रेजों बल्कि इटली का भी ग़ुलाम रहा है। उन्होंने पिछली सरकारों पर देश को ग़रीब बनाए रखने का आरोप लगाते हुए ‘भारत के लिए’ मतदान करने का निवेदन किया।

कंगना ने साफ़-साफ़ कॉन्ग्रेस पार्टी पर आरोप लगाते हुए कहा कि जब तक वो लोग सत्ता में थे तब तक देश में ग़रीबी, भूखमरी और प्रदूषण का माहौल तो था ही, साथ-साथ बलात्कार की घटनाएँ भी बढ़ गई थीं। कंगना ने लोगों से बड़ी संख्या में देश के लिए वोट करने की अपील की। कंगना ने हाल ही में फ़िल्म इंडस्ट्री के लोगों पर राजनीतिक रूप से निष्क्रिय होने और सही चीज़ों के लिए आवाज़ न उठाने का आरोप लगाया था। कंगना इससे पहले भी कई बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थन कर चुकी हैं और भरोसा जता चुकी हैं कि उनके नेतृत्व में देश के प्रशासन में सुधार आया है, देश विकास के रास्ते पर जा रहा है।

कंगना के ताज़ा बयान पर विवादित फ़िल्म समीक्षक और अभिनेता कमाल आर खान (KRK) बिफ़र गए और पूछा कंगना नशे में थी क्या? केआरके ने गिनाते हुए कहा कि मनमोहन, मोदी और वाजपेयी में से कोई भी इटली के नागरिक नहीं थे। बता दें कि कंगना का इशारा यूपीए अध्यक्ष सोनिया गाँधी की तरफ था। अगर फ़िल्मों की बात करें तो कंगना रनौत की ‘मेन्टल है क्या’ इसी वर्ष रिलीज के लिए तैयार है और इसके बाद वो ‘पंगा’ में नज़र आने वाली हैं। इसके अलावा कंगना अपने करियर की सबसे बड़े फ़िल्मों में से एक में तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के किरदार में दिखेंगी। कंगना ने कहा था कि वो जयललिता की और अपनी ज़िदगी के बीच कई समानताएँ देखती हैं। जयललिता की बायोपिक तमिल और हिंदी में बनेगी।

वसीमुल हक़ के क्षेत्र में TMC गुंडों ने की BJP कार्यकर्ता की पिटाई, सांसद ने बताया हिटलरशाही

तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों द्वारा एक भाजपा कार्यकर्ता की बुरी तरह पिटाई कर उसे लहूलुहान कर देने की ख़बर आई है। ट्विटर अंकुर सिंह ने लहूलुहान भाजपा कार्यकर्ता का फोटो शेयर कर दावा किया कि तृणमूल के गुंडों ने उन्हें बुरी तरह पीटा है। पीड़ित भाजपा कार्यकर्ता के बेटे ने भी अपने पिता का फोटो शेयर कर अपने परिवार की सुरक्षा की गुहार लगाई। प्रतीक ने ट्विटर के माध्यम से पूरे देश का सहयोग माँगा और कहा कि अगर इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो उनके पूरे परिवार को इसका खामियाज़ा भुगतना पड़ेगा।

पश्चिमी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र से सांसद व भाजपा नेता प्रवेश साहिब सिंह ने घटना की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि जनता इस हिटलरशाही को बर्दाश्त नहीं करेगी और ममता बनर्जी को इस चुनाव में कड़ा सबक सिखाएगी। पीड़ित भाजपा कार्यकर्ता ऑटो और रिक्शा में भाजपा के लिए प्रचार किया करते हैं। अंकुर के अनुसार, उन्हें आसनसोल के बूथ संख्या 79 में तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों द्वारा पीटा गया।

ट्वीट में दी गई जानकारी के अनुसार तृणमूल कॉन्ग्रेस नेता वसीमुल हक़ उस क्षेत्र के पार्षद हैं। बंगाल से लगातार आ रही हिंसा की घटनाओं के कारण वहाँ माहौल दूषित हो चुका है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसके लिए सीधा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को ज़िम्मेदार ठहराया है। तृणमूल के गुंडों द्वारा कभी ईवीएम में टीएमसी के बटन पर इत्र छिड़क कर वोट देकर बाहर आते मतदाताओं की उँगलियाँ सूँघने की ख़बर आ रही है तो कभी वे पोलिंग बूथ पर ही बम फेंककर भाग जा रहे हैं।