कॉन्ग्रेस अध्यक्ष भाई राहुल गाँधी पर दोहरी नागरिकता के आरोपों पर कॉन्ग्रेस महासचिव बहन प्रियंका गाँधी ने अपने भाई का बचाव करते हुए इसे बकवास करार दिया है। चुनाव प्रचार के दौरान एक जनसभा को संबोधित करने के बाद प्रियंका गाँधी ने कहा, “पूरा देश जानता है कि राहुल हिंदुस्तानी हैं। वे सबके सामने पैदा हुए, बड़े हुए। बाकी सब बातें बकवास हैं।”
#WATCH Priyanka Gandhi Vadra on MHA notice to Rahul Gandhi over citizenship, says,” The whole of India knows that Rahul Gandhi is an Indian. People have seen him being born and grow up in India. Kya bakwaas hai yeh?” pic.twitter.com/Rgt457WMoi
राहुल गाँधी की बहन और रॉबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका गाँधी ने बीजेपी के आरोप को पूरी तरह बेबुनियाद, बकवास और ड्रामा बताया है। उन्होंने कहा, “आज ये पूछ रहे हैं राहुल जी यहाँ के नागरिक हैं? अब बताओ इस तरह का प्रचार चल रहा है। आप सब अच्छी तरह से मेरे परिवार को जानते हैं। हमें किसी को सबूत देने की जरूरत नहीं है। हमारा सबूत आप है। आप जानते हैं हमें।”
गृह मंत्रालय ने बीजेपी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी की शिकायत के आधार पर प्रियंका गाँधी के भाई राहुल गाँधी को नोटिस जारी किया है। मंत्रालय ने कहा है कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष 15 दिन के अंदर इस पर जवाब दाखिल करें। बीजेपी सांसद ने गृह मंत्रालय में शिकायती पत्र में कहा है कि राहुल एक ब्रिटिश नागरिक हैं। उन्होंने इसके साथ ही यह भी दावा किया कि ब्रिटेन की एक कंपनी बैकॉअप्स लिमिटेड में राहुल गाँधी निदेशक और सेक्रेटरी थे। साथ ही, यह दावा किया है कि कंपनी के दस्तावेजों में उन्होंने खुद को ब्रिटिश नागरिक बताया है।
मंत्रालय के मुताबिक, स्वामी का कहना है कि ब्रिटिश कंपनी के 10 अक्टूबर, 2005 और 31 अक्टूबर, 2006 को भरे गए सलाना टैक्स रिटर्न में राहुल गाँधी की जन्म तिथि 19 जून, 1970 बताई गई है। उसमें गाँधी को ब्रिटिश नागरिक बताया गया है। सोमवार को जारी नोटिस के अनुसार, “इसके अलावा 17 फरवरी, 2009 को इस कंपनी की परिसमापन अर्जी में भी राहुल गाँधी की नागरिकता ब्रिटिश बताई गई है। आपसे अनुरोध किया जाता है कि इस संबंध में आप एक सप्ताह के भीतर अपना तथ्यात्मक रुख मंत्रालय के समक्ष पेश करें।”
भाजपा ने कहा राहुल गाँधी की हर चीज संदिग्ध
इस पर बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा, “ये जो पदचिह्न नागरिकता के हम देख रहे हैं, राहुल गाँधी के ये जो पदचिन्ह हैं आखिर कहाँ जाकर रुकते हैं? कौन-सा वाला राहुल सच्चा है, राहुल लंदन वाले या राहुल लुटियंस वाले? आखिरकार कौन सा ‘राहुल’ ऑरिजनल है, देशी या विदेशी?”
संबित पात्रा ने आगे कहा, “राहुल गाँधी ने अपनी नागरिकता के संबंध में खुद ही भ्रम की स्थिति पैदा की है और अब उन्हें ही इस पर स्पष्टीकरण देना होगा। इसमें किसी तरह की राजनीति नहीं है। देश उनसे स्पष्टीकरण माँग रहा है।”
प्रेम और आकर्षण दो ऐसे शब्द हैं जिनके बीच फर्क़ की रेखा धागे जितनी महीन होती है। हर लड़की के जीवन में वो उम्र आती है जब वो इन दोनों को एक जैसा समझती है और अपनी दबी इच्छाओं को प्रेम का नाम देकर किसी की ओर आकर्षित होती है। मेरे ख्याल से ये उम्र लगभग 13-14 के बाद शुरू हो जाती है और 18-19 तक तो रहती ही है। इस दौरान शरीर के बहुत सारे हॉर्मोन्स में उठा-पटक हो रही होती है। कभी लड़की किसी लड़के को पसंद करती है तो कभी लड़का या कोई अधेड़ उम्र का आदमी उसे मजबूर कर देता है कि वो उसे पसंद करे। यहाँ प्रेम की परिभाषाएँ आकर्षण के धरातल पर तय हो रही होती हैं, वास्तविक प्रेम का इन सबसे कोई सरोकार नहीं होता।
कहते हैं किसी चीज को धीरे-धीरे ग्रहण करने में उसके हर गुण और तत्व महसूस होते हैं ताकि हम समझ पाएँ कि हमें क्या पसंद आया और क्या नहीं… अब फिर चाहे वो कोई खाद्य वस्तु है या फिर युवावस्था। 14-16 की उम्र वो पड़ाव होती है, जब एक लड़की बाल अवस्था को पीछे छोड़ कर युवावस्था में कदम रख रही होती है। ऐसे में ’16 बरस की बाली उमर को सलाम’ जैसे गाने उसे पहले ही बता देते हैं कि अब आकर्षण से भरे प्रेम करने की उम्र हो चुकी है। कोई नज़र भर देख ले तो लड़की को उसमें प्यार की लौ धधकती दिखाई देती है। नतीजतन अपनी शिक्षा, करियर सब कुछ वो लड़की उस इंसान को समर्पित कर देती है जिसके स्पर्श से पहली बार उन्हें अपनी युवा हो जाने की अनुभूति हुई हो। हॉर्मोन्स की लड़ाई को इस दौरान लड़कियाँ प्रेम का स्पर्श कहती हैं।
पाश्चात्य संस्कृति पर न बात करते हुए मैं अपने समाज पर बात करना ज्यादा पसंद करूँगी। अभी हाल ही में मद्रास हाई कोर्ट ने मानवाधिकारों के संरक्षण के मद्देनज़र एक सलाह दी कि 16 साल की आयु के बाद आपसी सहमति से बनाए गए यौन संबंधों को बाल यौन अपराध संरक्षण (पॉक्सो) कानून के दायरे से बाहर किया जाना चाहिए। मद्रास हाईकोर्ट ने ‘आज’ के संदर्भ में ऐसा सुझाव तो दे दिया… हो सकता है इस सुझाव पर अभी विचार-विमर्श हो, तर्क-कुतर्क हों और फिर एक फैसला आए। लेकिन क्या इसके दूरगामी परिणामों की कल्पना की गई?
हम उस समाज में रहते हैं जहाँ अंग्रेजी फिल्मों के प्रभाव ने फ्रेंच किस करने की झिझक को खत्म कर दिया है। और इस बात को विकल्प में लाकर खड़ा कर दिया है कि 16 की उम्र में लड़की का आपसी सहमति से सेक्स करना पॉक्सो कानून के दायर से बाहर हो जाना चाहिए। मैंने पहले ही कहा कि ‘आकर्षण’ की भावनाएँ मेरे मुताबिक 14 की उम्र में प्रबल होने लगती हैं। ये मैंने खुद अपने आस-पास महसूस किया है कि जिस उम्र में लड़की को बोर्ड की परिक्षाओं की तैयारी करनी होती है उस उम्र में लड़की अपने शरीर के अंगों के बारे में किसी ऐसे इंसान से डिस्कस कर रही होती है, जिसे उसमें सिर्फ़ छाती और योनि के सिवा कुछ नज़र नहीं आता।
सही और गलत में फर्क़ समझने की उम्र में लड़की अपना जीवन उस व्यक्ति को सौंप देने की सोच लेती है, जिसे कई बार खुद नहीं मालूम होता कि वो न केवल किसी के भविष्य से ख़िलवाड़ कर रहा है बल्कि उसकी मनःस्थिति को भी कमजोर कर रहा है। मद्रास हाईकोर्ट के सुझाव से मुझे कोई आपत्ति नहीं है। आधुनिक दौर है, सब आधुनिकता के हिसाब से होना चाहिए लेकिन ये भी न भूला जाए कि हमारी पृष्ठभूमि क्या है! क्या हम ऐसे आधुनिक फैसलों को स्वीकारने के लिए तैयार हैं? क्या हम समझते हैं कि 16 की उम्र में कानूनी संरक्षण पाने के बाद एक लड़की के भीतर की भावनाओं को समझा जाएगा या लड़की खुद सही और गलत समझने में सक्षम होगी? या ऐसी शिक्षा-व्यवस्था और माहौल है देश में, जहाँ 16 साल की लड़की इतनी परिपक्व हो जाए कि जिंदगी से जुड़े फैसले ले सके?
हमारे सामने आज अनेकों उदाहरण हैं जिन पर अफसोस करने से ज्यादा लड़कियों को सीखना चाहिए कि आकर्षण की उम्र में और प्रेम की उम्र में फर्क़ होता है। जो लड़कियाँ बहकावे में आकर शिक्षा-करियर को दरकिनार कर देती हैं, उन्हें देखकर क्या वाकई लगता है कि उन्होंने समझदारी में कदम उठाया है। जिन्हें 14-16 की उम्र में माँ-बाप बिना किसी कारण दुश्मन लगने लगें… क्या वाकई उनसे उम्मीद की जा सकती है कि वो प्रेम की परिभाषा को समझने लगी हैं? ‘नाबालिग प्रेम’ में किया चुनाव कितना सही कितना गलत होता है, यह उन खबरों से जानने की जरूरत है, जहाँ भागी हुई नाबालिग लड़कियाँ वापस घर लौटने या किसी ‘गंदी’ जगह पर रहने को मजबूर होती हैं।
मद्रास हाइकोर्ट का सुझाव एक ‘निश्चित’ पक्ष के लिए तो सही हो सकता है लेकिन यदि इसे व्यवहारिक तौर पर देखा जाए तो इसके क्या परिणाम हैं आप सिर्फ़ कल्पना करिए… उस समाज में जहाँ लड़की की शिक्षा को लेकर जद्दोजहद चल रही हो, जहाँ घर-घर जाकर लड़की और उसके माँ-बाप को समझाना पड़े कि उसे पढ़ाइए, सशक्त बनाइए, बाल विवाह मत करिए! वहाँ 16 की उम्र में आपसी सहमति से सेक्स को पोस्को एक्ट से हटाना क्या उन लोगों को बढ़ावा देना नहीं है, जो आज कानून के डर से ही सही लेकिन लड़की की शादी के लिए 18 साल तक का इंतजार करते हैं। ये विरोधाभास से भरी स्थिति है कि एक ओर हम बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं कि बच्चों का बचपन न खोए और दूसरी ओर हम इन बातों पर सुझाव पेश कर रहे हैं।
कानून में संशोधन का सुझाव देते हुए हाई कोर्ट के न्यायाधीश ने कहा, “16 साल की उम्र के बाद आपसी सहमति से बनाए गए यौन संबंधों या शारीरिक संपर्कों या इससे जुड़े कृत्यों को पॉक्सो कानून के कठोर प्रावधानों से बाहर किया जा सकता है। और इस तरह के यौन शोषण की सुनवाई ज्यादा उदार प्रावधान के तहत हो सकती है, जिन्हें कानून में शामिल किया जा सकता है।”
अपने देश में ऐसे ‘उदार प्रावधान’ के बारे में सोचिए। उस देश में जहाँ भटके नौजवानों को सही दिशा में लाने के लिए तरह-तरह के अभियान सरकार द्वारा चलाए जा रहे हैं। तंबाकू पर चेतावनी लिखे होने के बाद भी लोग धड़ल्ले से सेवन कर रहे हैं। ऐसे में इस तरह के संशोधन के बाद कुछ ओछी मानसिकता वाले लोगों पर क्या फर्क़ पड़ेगा! अभी तक कानूनी डर से ही सही, लड़की को 18 की उम्र के बाद ‘शादी मटेरियल’ समझने वाले लोग 16 की उम्र में बहलाना शुरू नहीं करेंगे? और क्या इसका प्रभाव ‘लड़की’ की मानसिकता और शिक्षा पर नहीं पड़ेगा?
मैं ये नहीं कहती कि सेक्स बहुत बुरी चीज है, इसके कारण लड़कियों का भविष्य बर्बाद हो रहा है, लेकिन ये जरूर कह रही हूँ कि जिस उम्र में सेक्स को लीगल करने की बात हो रही है, हमारा समाज उसके लिए तैयार नहीं है और न ही उसके लिए 16 के उम्र की लड़कियाँ तैयार हैं। कानून के तहत कहिए या समाज के तहत, मुझे लगता है कि लड़की को 16 की उम्र में सेक्स के लिए कानूनी छूट देने से ज्यादा उसे परिपक्व बनाने पर गौर करना चाहिए।
अपने आस-पास की लड़कियों को देखिएगा और गौर करिएगा कि उनको किस चीज़ से अधिक फायदा पहुँचेगा। 16 की उम्र में सेक्स करने के अधिकार से या शिक्षा-करियर-समाज के प्रति जागरूक करके। समाज की दबी आवाज़ें अगर शिक्षा के लिए उठें तो निःसंदेह ही बदलाव आता है। मैं मानती हूँ कि लड़की की उम्र 18 से कम होने के कारण कोर्ट में बहुत से ऐसे केस चल रहे हैं, जिसमें आपसी-सहमति से बने संबंधों को भी अपराध बताया जाता है, लेकिन इसका विकल्प ये नहीं है कि आप उम्र को घटाकर 16 कर दें… हाई कोर्ट ने इस मामले पर अपना सुझाव दिया है… आप भी सोच-समझकर इस पर अपना अपना पक्ष रखिए।
कुछ समय पहले जीवन गुजर-बसर के लिए चाय बेचने वाले भाजपा पार्षद अवतार सिंह को कल उत्तरी दिल्ली का नया मेयर चुन लिया गया है। इस पद पर पहुँचने वाले अवतार पहले दलित सिख हैं।
एनडीटीवी इंडिया में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक उन्हें दिल्ली भाजपा प्रमुख ने इस पद के लिए नामांकित किया था। जिसके बाद उत्तर दिल्ली नगर निगम की आमसभा में हुए मतदान में निर्विरोध चुन लिया गया।
दिल्ली भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने अवतार की जीत पर बात करते हुए कहा कि अवतार भाजपा के बहुत मेहनती कैडर है। अपनी कड़ी मेहनत की बदौलत वह चाय बेचने की शुरुआत करके मेयर के पद तक पहुँचे हैं।
बता दें कि अवतार सिंह रामलीला में कई किरदार भी निभाते थे। इतना ही नहीं मीडिया खबरों की मानें तो बताया जाता है कि जीवनयापन करने के लिए वह एक फाइव स्टार होटल में कुली का काम भी कर चुके हैं।
Had a great interaction with Smt. Sunita Kangra, Shri Avtar Singh and Smt. Anju Kamalkant. They will be serving as Mayors of South Delhi, North Delhi and East Delhi Municipal Corporations respectively.
— Chowkidar Narendra Modi (@narendramodi) April 28, 2019
अवतार सिंह से पहले शुक्रवार (मार्च 26, 2019) को भाजपा पार्षद सुनीता कांगड़ को सर्वसम्मत्ति से एक बैठक में दक्षिणी दिल्ली नगर निगम की मेयर चुना गया था। यह निर्णय निकाय की आम बैठक में लिया गया था।
पाकिस्तान स्थित जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को 1 मई को वैश्विक आतंकवादी घोषित किया जा सकता है। खबरों के मुताबिक, मसूद अजहर को ग्लोबल आतंकी घोषित करने की राह में रोड़े अटका रहा चीन संयुक्त राष्ट्र समिति में 1 मई को अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने में लगाई गई तकनीकी रोक हटा लेगा। अगर मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित कर दिया जाता है, तो ये मोदी सरकार की एक बड़ी कूटनीतिक जीत होगी, क्योंकि भारत काफी लंबे समय से खासकर, 14 फरवरी को पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद से इसके लिए जोर दे रहा है , मगर चीन लगातार अपनी वीटो का इस्तेमाल कर रोड़ा अटका रहा है।
China won’t block global terrorist tag for Masood Azhar: Sources ahead of UN meet
एक वरिष्ठ अधिकारी ने हिन्दुस्तान टाइम्स को बताया कि अगर मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित किया जाता है, तो यह उसके लिए मौत की चेतावनी होगी। पुलवामा हमले के बाद संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका, फ्रांस और यूके के नेतृत्व में मसूद को ग्लोबल टेररिस्ट घोषित करने की माँग की गई थी, लेकिन चीन ने उसका बचाव किया था। उन्होंने बताया कि अमेरिका, ब्रिटेन और फ्राँस द्वारा 13 मार्च को रखे गए प्रस्ताव पर चीन के तकनीकी पकड़ हटाने की उम्मीद है। वहीं सभी सुरक्षा परिषद के अन्य सदस्यों ने इस कदम को पहले ही मंजूरी दे दी है।
वहीं, पाकिस्तान भी मसूद अजहर को ब्लैक लिस्ट करने के लिए तैयार है, मगर इसके लिए उसने एक शर्त भी रख दी है कि इसका आधार पुलवामा हमला नहीं होना चाहिए। रविवार (अप्रैल 28, 2019) को एक पाकिस्तानी टीवी शो में पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मोहम्मद फैसल ने कहा, “हमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) द्वारा मसूद अजहर को वैश्विक आतंकियों की सूची में डालने से कोई दिक्कत नहीं है, बशर्ते इसका आधार पुलवामा हमला न हो।” फैसल ने कहा, “पहले भारत को इस बात का सुबूत देना होगा कि पुलवामा हमले से मसूद अजहर का कोई संबंध है। इसके बाद ही हम उसको प्रतिबंधित करने के बारे में बात कर सकते हैं। पुलवामा हमला एक अलग मुद्दा है। हम कई बार कह चुके हैं कि भारत कश्मीर में स्थानीय विरोध को कुचलने की कोशिश कर रहा है।”
हालाँकि, 50 वर्षीय अजहर जानलेवा बीमारी से ग्रसित है, लेकिन फिर भी वो अपने भाई अतहर इब्राहिम और रऊफ असगर की मदद से भारत के खिलाफ हमलों में सक्रिय भूमिका निभाता है। गौरतलब है कि 14 फरवरी को पुलवामा में हुए सीआरपीएफ के काफिले पर हुए आतंकी हमले की जिम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद ने ली थी। इससे पहले 2016 में पठानकोट एयरबेस पर हुए हमले का भी जिम्मेदार भी यही आतंकी संगठन है।
एनआईए ने केरल से एक आतंकी को गिरफ़्तार किया है जो श्री लंका बम धमाकों में शामिल आतंकवादी ज़हरान हाशिम का अन्यायी है और खूँखार आतंकी संगठन आईएसआईएस से सहानुभूति रखता है। केरल से दबोचे गए इस शख़्स का नाम रियास अबूबकर है और ये किसी बड़े आतंकी हमले को अंजाम देने की साज़िश रच रहा था। वह केरल में आत्मघाती हमला करने की फ़िराक़ में था, ऐसा उसने एनआईए के सामने स्वीकार किया है। श्री लंका में हुए सीरियल ब्लास्ट में 360 से भी अधिक लोगों की जानें जा चुकी है और उसका साज़िशकर्ता हाशिम एक इस्लामी कट्टरपंथी मौलवी था, जिसके भड़काऊ भाषण तमिल में हुआ करते थे। अबूबकर उन्हीं भाषणों को लगातार सुन रहा था और उसके शैतानी दिमाग में भी कोई आतंकी वारदात को अंजाम देने की बात पनप रही थी।
29 वर्षीय अबूबकर एक अन्य इस्लामी उपदेशक ज़ाकिर नाइक के वीडियो भी देख रहा था। बता दें कि ज़ाकिर नाइक एक इस्लामिक ‘प्रवचनकर्ता’ है जो अपने वीडियो के माध्यम से जिहाद फैलाता है और आतंक को बढ़ावा देता है। भारतीय सरकार ने उसके एनजीओ पर प्रतिबन्ध लगा रखा है। इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन का संस्थापक ज़ाकिर एक भगोड़ा है और भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को उसकी तलाश भी है। भारत में आईएस मॉड्यूल के ख़ुलासे के बाद से सुरक्षा एजेंसियाँ सतर्क हैं और श्री लंका में हुए हमलों के बाद ख़ास सतर्कता बरती जा रही है। इसी क्रम में गिरफ़्तार आतंकी से एनआईए द्वारा लगातार पूछताछ की गई। रियास अबूबकर का नाम अबू दुजाना भी है।
अबूबकर लम्बे समय से एक अन्य भगोड़ा आतंकी अब्दुल राशिद अब्दुल्ला से भी संपर्क में था। इसके लिए उनसे ऑनलाइन माध्यमों का उपयोग किया था। वह अब्दुल राशिद अब्दुल्ला के ऑडियो क्लिप्स सूना करता था और उसे वो वीडियो क्लिप ख़ास तौर पर पसंद था। जिसमें राशिद ने भारत में आतंकी हमले करने जैसी भड़काऊ बातें कही थीं। इस ऑडियो को उसने सोशल मीडिया पर भी वायरल किया था। इसके अलावा अबूबकर वालापट्टनम इस्लामिक स्टेट मामले में आरोपित अब्दुल खयूम से भी ऑनलाइन बातें कर रहा था। आतंकरोधी एजेंसियों का मानना है कि खयूम अभी सीरिया में है।
दरअसल, एनआईए को सूचना मिली थी कि 4 लोगों का एक समूह अब्दुल राशिद, अशफ़ाक़ मज़ीद, और अब्दुल खयूम से संपर्क में था। ये तीनों अभी अफ़ग़ानिस्तान या सीरिया में भाग खड़े हुए हैं और वहीं रह रहे हैं। इस ख़बर की पुष्टि के बाद एनआईए ने तलाशी अभियान शुरू किया। ये तलाशी अभियान रविवार (अप्रैल 28, 2019) कासरगोड और पलक्कड़ में चलाए गए। जुलाई 2016 में ख़बरें आई थीं कि कासरगोड के 15 युवा आतंकी संगठनों के झाँसे में आकर अफ़ग़ानिस्तान या सीरिया चले गए हैं। अबूबकर को गुरुवार को कोच्चि में एक एनआईए अदालत में पेश किया जाएगा।
आतंकवाद और आतंकियों की परवरिश करने वाला पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच एक बड़ा एक्शन लेने के लिए मजबूर हुआ है। मदरसों के जरिए फैल रही चरमपंथी सोच से निपटने के लिए पाकिस्तान सरकार एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। दरअसल, पाकिस्तान ने सोमवार (अप्रैल 29, 2019) को 30 हजार से अधिक मदरसों को मुख्यधारा की शिक्षा प्रणाली में लाने का ऐलान किया है। पाकिस्तानी सरकार इन मदरसों को नियंत्रण में लेकर एक नए और बेहतर सिलेबस लागू करने वाली है। जिसमें नफरत भरे भाषण को हटाकर छात्रों को सभी धर्मों का सम्मान करने की तालीम दी जाएगी।
“And now there are over 30,000 madrasas. Out of these, only 100 are involved in propagating terrorism.” https://t.co/mLGyEv0NOS
पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज़ पब्लिक रिलेशंस के महानिदेशक मेजर जनरल आसिफ गफूर ने रावलपिंडी में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए बताया कि 1947 में पाकिस्तान में 247 मदरसे थे, जो कि 1980 में बढ़कर 2861 हो गए। हालाँकि, उन्होंने इस दौरान ये भी माना कि मौजूदा वक्त में पाकिस्तान में 30 हजार से ज्यादा मदरसे चलाए जा रहे हैं, मगर साथ ही उन्होंने मदरसों का बचाव करते हुए कहा कि इन 30 हजार मदरसों में से करीब 100 मदरसे ही आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार हैं। गफूर ने कहा कि सभी मदरसों को शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लगाया जाएगा और इसके तहत मदरसों के छात्रों को एक डिग्री भी दी जाएगी, जो शिक्षा बोर्ड से संबद्ध होगी।
उन्होंने कहा कि इस पूरे प्रोग्राम पर शुरुआती तौर पर करीब ₹200 करोड़ का खर्च आएगा, तो वहीं हर साल तकरीबन ₹100 करोड़ के खर्च आने की संभावना है। इस प्रोग्राम के तीन चरण होंगे। पहले चरण के तहत एक बिल तैयार किया जाएगा, जो लगभग एक महीने में तैयार हो जाएगा। इसके बाद दूसरे चरण में शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया जाएगा और तीसरे एवं अंतिम चरण में बिल को लागू कराने का काम किया जाएगा।
— Intl. Business Times (Hindi) (@IBTimesHindi) April 29, 2019
इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान गफूर ने यह भी माना कि पाकिस्तान में हिंसक चरमपंथी इस्लामी संगठन और जिहादी मौजूद हैं और अब तक की पाकिस्तानी सरकारें इससे लड़ने में नाकाम रहीं हैं। आसिफ गफूर ने कहा, “हमने हिंसक चरमपंथी संगठनों और जिहादी संगठनों को प्रतिबंधित कर दिया है और हम उनके खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं।” साथ ही उन्होंने कहा कि उनके देश की पूर्ववर्ती सरकारें इस सबसे निपटने में नाकाम रहीं।
हिमालय की विशाल बर्फीली पहाड़ियों पर अक्सर हिममानव के रहने की ख़बरें आती रहती हैं लेकिन आजतक कभी उसको देखा नहीं गया। इस बारे में दुनियाभर के पर्यटकों व खोजविदों द्वारा तरह-तरह के दावे किए जाते हैं और हिमालय भ्रमण के दौरान हिममानव के ज़िंदा होने के सबूत मिलने या उसे देखे जाने के दावे किए जाते रहे हैं। अब भारतीय सेना ने भी हिममानव ‘येती’ की मौजूदगी का संकेत देते हुए कुछ तस्वीरें ज़ारी की है। इन तस्वीरों के बारे में सेना ने कहा है कि ये हिममानव येती के पाँवों के निशान हैं। सेना के अनुसार, रहस्यमयी येती के पाँवों के निशान 32 x 15 इंच के हैं। इन्हें 9 अप्रैल 2019 को मकालू बेस कैम्प के नज़दीक देखा गया। सेना के अनुसार, पूर्व में भी इस मायावी व रहस्यमयी हिममानव की मौजूदगी के सबूत मकालू-बरुन नेशनल पार्क में दर्ज किए गए थे।
For the first time, an #IndianArmy Moutaineering Expedition Team has sited Mysterious Footprints of mythical beast ‘Yeti’ measuring 32×15 inches close to Makalu Base Camp on 09 April 2019. This elusive snowman has only been sighted at Makalu-Barun National Park in the past. pic.twitter.com/AMD4MYIgV7
भारतीय सेना की पर्वतारोही टीम ने येती के पाँवों के निशान के फोटो क्लिक किए। येती की मौजूदगी के सबूत तिब्बत और नेपाल के हिमालयी क्षेत्रों में मिलते रहे हैं या उसे देखे जाने के दावे किए जाते रहे हैं। भारतीय सेना ने 4 तस्वीरें रिलीज की हैं, जिन्हें आप उपर्युक्त ट्वीट में देख सकते हैं। येती की कहानियाँ सैंकड़ों साल पुरानी हैं। लद्दाख के बौद्ध मठों व वहाँ रहनेवाले भिक्षुओं का दावा है कि उन्होंने येती को देखा है। शोधकर्ताओं का मानना है कि येती एक मनुष्य नहीं है बल्कि ध्रुवीय और भूरे भालू का क्रॉस ब्रीड है। फिर भी, वैज्ञानिकों में इसे लेकर अभी तक कोई एकमत नहीं बन पाया है। 2008 में इसे मेघालय के गारो पहाड़ी में देखा गया।
कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि यह बंदरों जैसी शक्लोसूरत वाला एक विशालकाय जीव है जो इंसानों की तरह चलने-फिरने की क्षमता रखता है। पर्वतारोही बीच होजशन ने 1832 में बताया था कि जब वह हिमालय में ट्रेकिंग कर रहे थे तब उनके गाइड ने एक ऐसे विशालकाय मनुष्य जैसे प्राणी को देखा जो इंसानों की तरह दो पैरों पर चल रहा था। होजशन के अनुसार, उसके शरीर पर घने लंबे बाल थे। 1889 में भी कुछ पर्वतारोहियों ने इस अजीब जानवर के पदचिह्नों के निशान देखने की बात कही। 1925 में एक फोटोग्राफर और रॉयल जियोग्राफिकल सोसाइटी के सदस्य एमी डोमबोजी ने एक ऐसे विशाल प्राणी को देखा जो पेड़-पौधों से पत्तियाँ खींच रहा था।
डोमबोजी ने इस रहस्यमयी प्राणी के 7 इंच लम्बे और 4 इंच चौड़े पदचिह्न देखे थे। विक्टोरिया मेमोरियल कलकत्ता के क्यूरेटर कैप्टेन ने 9 फ़ीट लम्बे एक ऐसे प्राणी को देखने की बात कही थी, जिसने उनकी जान बचाई। उनके अनुसार, येती एक मददगार प्राणी है। एवरेट गाँव में एक लड़की जब याक चरा रही थी, तब एक विशालकाय प्राणी ने उसे धर लिया। हालाँकि, वो तो उसके चंगुल से निकलने में सफ़ल रहीं लेकिन उसके दोनों याकों को उस प्राणी ने खा डाला। 1974 में मिली इस शिकायत के बाद पुलिस ने जब छानबीन की तो उन्हें इस प्राणी के पदचिह्न मिले जिसके बारे में कहा गया कि वह येती ही था। 2009 में एक फिल्म निर्माता पियोत्रगोवाल्सकी ने पोलैंड की पहाड़ियों में एक राक्षस जैसा प्राणी देखने का दावा किया।
सर कटी मुर्गी की तरह यहाँ-वहाँ भागकर रोजाना अपने लिए नया आशियाना तलाशते नवजोत सिंह सिद्धू के लिए बेहूदा बयानबाजी कर चर्चा में आना कोई नई बात नहीं है। नवजोत सिंह सिद्धू अपनी जनसभाओं में केन्द्र की मोदी सरकार और भाजपा पर खूब हमलावर रहे हैं। हालाँकि, कॉन्ग्रेस में जाने के बाद सिद्धू भले ही भाजपा की आलोचना कर रहे हों, लेकिन एक वक्त ऐसा भी था, जब भाजपा को अपनी ‘माँ’ बताने वाले सिद्धू का कई साल तक भारतीय जनता पार्टी के साथ ‘बेटे’ जैसा जुड़ाव रहा था। लेकिन, पार्टी बदलते ही सिद्धू ने ‘माँ’ को ‘गाली’ देनी शुरू कर दी है।
‘राजपरिवार’ और ‘राजमाता’ को खुश करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध में कल बाचाल नवजोत सिंह सिद्धू ने घटियापन का एक और कीर्तिमान अपनी फर्जी शायरी की किताब में जोड़ लिया है। ट्विटर पर ‘राजमाता’ सोनिया गाँधी और सबसे बुजुर्ग पार्टी के चिरयुवा अध्यक्ष राहुल गाँधी की तस्वीर लगाकर घूमने वाले सिद्धू ने अपने इस बयान से साबित कर दिया है कि चापलूसी और चमचागिरी में वो अब कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह को भी कड़ी टक्कर देने में सक्षम हैं।
सबसे ताजा और पिछले बयानों जितना ही वाहियात बयान नवजोत सिद्धू ने कल ही अपने ट्विटर एकाउंट के जरिए दिया है। खुद को अभिजात्य दिखाने के चक्कर में नरेंद्र मोदी को निशाना बनाते हुए अपनी निम्नस्तरीय मानसिकता का परिचय देते हुए ‘फिलहाल’ कॉन्ग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने ट्वीट करते हुए लिखा है, “एक गलत वोट आपके बच्चों को चायवाला, पकौड़ेवाला या चौकीदार बना सकता है।”
घृणित अभिजात्य मानसिकता ही चायवाले और चौकीदारों से नफरत करना सिखाती है
कॉन्ग्रेस राजपरिवार की छत्रछाया में आते ही अभिजात्य मानसिकता का परिचय देते हुए, किसी भी दूसरे व्यक्ति को अपने से नीचे रखना, उसके सामाजिक परिवेश के आधार पर उसे अपमानित करना और उसे लज्जित महसूस करवाना सिद्धू ने सीख लिया है। इस तरह से राजपरिवार का प्रिय बनने का पहला चरण उन्होंने अच्छी तरह से पास कर लिया है।
नवजोत सिंह सिद्धू का यह बयान उन्हें चर्चा का विषय तो बना देता है, लेकिन ऐसा करते ही वो एक बार फिर तमाम कॉन्ग्रेस नेताओं की तरह ही नरेंद्र मोदी की सजाई हुई ‘पिच’ पर बल्लेबाजी करते नजर आते हैं। कॉन्ग्रेस पिछले 5 सालों में लगातार यही गलती दोहराती नजर आई है। नरेंद्र मोदी ने आम जनता के बीच स्वाभाविक रहकर, उसे सहज महसूस करवाकर उसका हृदय जीता है। जबकि, इसके ठीक उलट, सत्तापरस्त कॉन्ग्रेस लगातार अपने मूर्खतापूर्ण बयान और गुलाम मानसिकता की वजह से आत्मघाती गोल करती रही।
मसलन, नरेंद्र मोदी ने जब रोजगार के लिए पकौड़े बेचने वाले का उदाहरण दिया, तब पूरा नेहरुवियन सभ्यता का इकोसिस्टम पकोड़े बनाकर अपने परिवार का पेट भरने वालों को तुच्छ और हास्य का विषय बनाने में मशगूल हो गया था। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद को चौकीदार बताया, तब कॉन्ग्रेस चौकीदारों के ही विरोध में खड़ी हो गई और नेपाल से लेकर अपने ही देश के भीतर नस्लीय भेदभाव जैसी टिप्पणियाँ कर अपनी ही बुजुर्ग पार्टी के ताबूत में आखिरी कीलें ठोकती देखी गई। हो सकता है कि कॉन्ग्रेस की नजरों में दलाली करना, भूमि घोटाला करना और बोफोर्स घोटाला करना ही सर्वश्रेष्ठ रोजगार हों, लेकिन क्या मात्र यह तर्क उन्हें अन्य गरीब और मध्यम वर्गीय लोगों के रोजगार का उपहास करने का अधिकार देने के लिए काफी है?
सामंतवादी कॉन्ग्रेस अभी औपनिवेशिक मानसिकता की गुलामी में जी रही है
निसंदेह नवजोत सिंह सिद्धू ने पकौड़ेवाला और चौकीदारों का बयान अपने पूरे होशोहवास में कॉन्ग्रेस राजपरिवार की नजरों में दुलारा बनने के लिए ही दिया है। सिद्धू अच्छे से जानते हैं कि कॉन्ग्रेस को किस स्तर की ‘जी हजूरी’ से खुश किया जा सकता है। पकौड़ेवाला, चायवाला और चौकीदार का उपहास बनाकर सिद्धू ने कॉन्ग्रेस की उसी प्राचीन प्रणाली में जान फूँक दी है, जो कॉन्ग्रेस की पहचान रही है। यह पहचान है, सामंतवादी मानसिकता और ब्रिटिश उपनिवेशवाद से सीखा गया सामाजिक और जातिगत नस्लभेद। ऐसा कर के कॉन्ग्रेस बहुत आसानी से हमेशा ही आम जनता से खुद को एक उचित दूरी पर स्थापित कर देती है और लोग महसूस करना भी शुरू कर देते हैं कि नेता ऐसा ही होता है।
BJP को अपनी माँ बताने वाले सिद्धू कॉन्ग्रेस में जाकर दे रहे माँ की गाली, दुखद!
एक समय ऐसा भी था जब घटिया बयान देकर स्वयं को राजनीति में स्थापित करने का सपना देखर रहे सिद्धू भाजपा को अपनी माँ बताते थे और उसके खिलाफ जाने वाले को ‘घृणित’ नजर से देखते थे। शायद तब भाजपा में रहते हुए पार्टी नेतृत्व की चापलूसी कर, उन्हें अपनी माँ बता देना सिद्धू की तत्कालीन रणनीति रही हो और आज भी वो उसी फॉर्मूले पर काम करना चाह रहे हैं।
उस समय नवजोत सिंह सिद्धू एक जनसभा में कह रहे थे, “भारतीय जनता पार्टी मेरी माँ है, भारतीय जनता पार्टी मेरी जननी है, मेरा स्वाभिमान है, मेरी पहचान है और जो मेरी माँ की पीठ में छुरा घोंपेगा, उसे वोट डालना गोमाँस खाने के बराबर है।”
सिद्दू, ये आपके लिए ?? जनता के विशेष आग्रह पर खोज के लाया हूँ.. @sherryontopp जरूर देखें !!
सिद्धू के रूप में कॉन्ग्रेस के पास एक खिसियाया हुआ फूफा और बढ़ गया है
सिद्धू राजनीति के उस खिसियाए हुए फूफा जैसे बनकर रह गए हैं, जिनका मकसद सिर्फ और सिर्फ अटेंशन की चॉइस होती है। बीते दिनों पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले नवजोत सिंह सिद्धू ने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देकर कॉन्ग्रेस का दामन थाम लिया था। उसके बाद से वो बदहवास स्थिति में अक्सर अपने बयानों में भाजपा पर हमलावर रहे हैं। लेकिन हमला कर कॉन्ग्रेस परिवार की नजरों में बने रहने की कोशिशों में सिद्धू पूरी तरह से नस्लीय टिप्पणी पर ही उतर आए हैं।
पुलवामा आतंकी हमले में पाकिस्तान जैसे आतंकवाद की फैक्ट्री को ‘मासूम’ बताने और आतंकवाद को मजहब से एकदम अलग बताकर सोशल मीडिया पर गाली खाने वाले सिद्धू को ये समझना होगा कि नरेंद्र मोदी वर्तमान में राजनीति का पर्याय बन चुके हैं और उन्हें ऐसा बनाने में सिद्धू जैसे ही टुटपुँजिया ट्रॉल्स का महत्वपूर्ण योगदान है। वास्तविकता तो यह भी है कि मोदी को अपमानित करने के लिए जिस स्तर तक विपक्ष के नेता प्रतिदिन गिर रहे हैं, वो उनकी मानसिक वेदना को ही स्पष्ट करता है। यह वेदना विपक्ष में समाज के प्रत्येक वर्ग द्वारा उन्हें नकार दिए जाने से दिन प्रति दिन बढ़ती ही जा रही है और अभी देखना बाकी है कि आम चुनाव के नतीजों के दिन यही विपक्ष बेहूदगी और घटियापने का कौन-सा नया कीर्तिमान पेश करता है। तब तक… “ठोको-ठोको ताली!”
हमारी राय (व्यंग्य)
नवजोत सिंह सिद्धू को इस तस्वीर से प्रेरणा लेते हुए समझना चाहिए कि जमीन घोटालों में सर से पाँव तक डूबे राजपरिवार की चमचागिरी कर के गुलामी की जिंदगी जीने से बेहतर यही है कि वो भी ‘चायवाला’ बनकर गरिमामय जीवन जीना सीख लें।
चीन की मीडिया में चर्चाओं का बाज़ार गरम है। भारत में हो रहे आम चुनाव पर शक्तिशाली चीन की पैनी नज़र है। वहाँ सरकार समर्थित मीडिया व विशेषज्ञ लगातार इस बात की चर्चा करने में लगे हुए हैं कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव बाद फिर से जीत कर वापस आ पाएँगे? अगर हम चीनी विशेषज्ञों की राय को खंगालें तो पता चलता है कि चीनियों के मन में भी मोदी की वापसी को लेकर कोई शक नहीं है। चीन की प्रमुख मीडिया एजेंसियों में से एक ‘द ग्लोबल टाइम्स’ में सिंहुआ यूनिवर्सिटी के रिसर्च फेलो लू यांग ने एक लेख लिखा है, जिसमें उन्होंने नरेंद्र मोदी के बारे में चर्चा की है। आइए उनके लेख की पड़ताल करते हैं ताकि आपको पता चले की चीनी विशेषज्ञों के मन में मोदी के प्रति क्या राय है? उन्होंने अपने लेख में कहा है कि 23 मई के बाद भाजपा सत्ता में वापस लौटे, इसमें बहुत कम ही शक है।
लू यांग मानते हैं कि नरेंद्र मोदी का राजनितिक व्यक्तित्व काफ़ी आसानी से उनके सारे प्रतिद्वंद्वियों को मात दे देता है। वह भाजपा की फंडिंग और संगठनात्मक संरचना का भी जिक्र करते हैं। लू यांग ने अपने इस लेख में स्वीकारा है कि नरेंद्र मोदी एक और कार्यकाल के लिए तैयार हैं। उन्होंने लिखा कि मोदी के 2014 में सत्ता संभालने के साथ ही भारत की कूटनीति में बड़ा बदलाव आया, निवेश में बढ़ोतरी हुई और पड़ोसी देशों को महत्व दिया गया। पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को सुधारने की दिशा में मोदी द्वारा किए गए प्रयासों को गिनाते हुए उन्होंने कहा कि मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में ही पड़ोसी राष्ट्राध्यक्षों को बुलाकर ये जता दिया था कि पड़ोस से सम्बन्ध सुधारना उनकी प्राथमिकता है। इस समारोह में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ भी शामिल हुए थे।
प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने अपना पहला दौरा भूटान का किया। बांग्लादेश के साथ दशकों से चली आ रही सीमा समस्या का समाधान किया गया। लू यांग के अनुसार, मोदी को क्षेत्रीय सहयोग और स्थिरता का महत्व पता है। मोदी ने भले ही 2014 के चुनावों में पाकिस्तान को निशाने पर रखा लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने पाक से सम्बन्ध सुधारने की भरपूर कोशिश की। लू यांग भारत में हुए आतंकी हमलों को भारत-पाक संबंधों में तनातनी का कारण मानते हैं। अपने लेख में वो याद दिलाते हैं कि सितम्बर 2014 में मोदी ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को अपने गृह राज्य बुलाया और अपना 64वाँ जन्मदिन उनके साथ ही मनाया। चीन के ‘बेल्ट एंड रोड’ को जवाब देने के लिए भारत ने ट्रम्प प्रशासन के ‘इंडो-पैसिफिक’ नीति को अपनाया।
लू यांग मानते हैं कि डोकलाम के बाद भारत-चीन रिश्तों में सुधार आया है और दोनों देश एक-दूसरे के प्रति अपने व्यवहार में बदलाव ला रहे हैं। चीनी राष्ट्रपति के गृहक्षेत्र वुहान में मोदी-जिनपिंग के बीच हुई बैठक ने भारत-चीन रिश्ता को सुधारने में अहम भूमिका निभाई। बता दें कि डोकलाम में ढाई महीने से भी अधिक समय तक चले तनाव के बाद हुई उस बैठक के बाद माहौल में नरमी आई थी और भारतीय कूटनीतिक प्रयासों के कारण चीन को पीछे हटने को मज़बूर होना पड़ा था। चीनी मीडिया में चल रही बातों से लगता है कि चीन भी अब भारत के प्रभाव को स्वीकार कर रहा है।
प्रमुख चीनी न्यूज़ एजेंसी सिन्हुआ ने गुजरात में जातिवादी आन्दोलनों के कारण राज्य में भाजपा द्वारा 2014 में जीती गई लोकसभा सीटों की संख्या में कमी आने की बात कही है। लेकिन, सिन्हुआ ने कहा है कि मोदी ने वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को विस्तार देने के लिए ‘स्वच्छ भारत’, ‘मेक इन इंडिया’ और ‘डिजिटल इंडिया’ जैसी योजनाओं की घोषणा की। वेबसाइट यह भी मानता है कि नरेंद्र मोदी को विपक्ष से कड़ी चुनौती मिल रही है। चीनी मीडिया द्वारा भारत में चल रहे विकास योजनाओं की चर्चा करना सुखद संकेत है क्योंकि देश और दुनिया को अब लग रहा है कि भारत विकास को लेकर सचमुच गंभीर है।
एक अन्य चीनी वेबसाइट ‘चाइना डेली’ ने भारत में चल रहे आम चुनावों के बारे में लिखा कि भले ही मोदी की कुछ योजनाएँ पूरी तरह से ज़मीन पर नहीं उतर पाईं लेकिन उन्होंने विदेशी कंपनियों को देश में व्यापार करने के लिए एक आसान माहौल दिया है। जीएसटी को चाइना डेली ने आज़ादी के बाद का अब तक का सबसे बड़ा टैक्स सुधार माना है। चाइना डेली ने एक अन्य लेख में विश्लेषकों के हवाले से कहा कि मोदी के ख़िलाफ़ अगर थोड़ा-मोड़ा रोष था भी तो पुलवामा हमले का करारा जवाब देने और पाकिस्तान स्थित आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई करने के कारण उनकी लोकप्रियता में बढ़ोतरी हुई है और देश में राष्ट्रवाद का उदय हुआ है।
चीन की प्रमुख वेबसाइट में से एक “साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट” में विशेषज्ञ रिचर्ड हेडेरियन लिखते हैं कि कुलीन नेहरू-गाँधी परिवार से आने वाले राहुल गाँधी एक वंशवादी राजनीति के प्रोडक्ट हैं न कि किसी बदलाव लाने वाले सामाजिक आंदोलन के। इसी वेबसाइट पर प्रकाशित एक अन्य लेख में कहा गया है कि पिछले वर्ष मोदी और जिनपिंग की 4 बार मुलाक़ात हुई, जिसकी वजह से भारत-चीन के रिश्तों में सुधार आया है। चीनी मीडिया में राहुल गाँधी की तुलना अन्य देशों के वंशवादी नेताओं के साथ की गई, वहीं लोकप्रियता में नरेंद्र मोदी को बड़े वैश्विक नेताओं के साथ रखा गया। राहुल गाँधी के उस बयान की भी चर्चा चीनी मीडिया में हुई, जिसमें उन्होंने कहा था कि मोदी जिनपिंग से डर गए हैं।
एक अन्य चीनी न्यूज़ मीडिया CGTN में विशेषज्ञ ये हेलिन ने भविष्यवाणी करते हुए कहा कि नरेंद्र मोदी आसानी से दूसरा कार्यकाल जीत लेंगे। हालाँकि, उन्होंने कहा कि भाजपा को थोड़ी परेशानियाँ भी होंगी क्योंकि जनता को उनसे बहुत सारी उम्मीदें हैं। चीन में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति जिनपिंग के बीच वुहान में हुई मुलाक़ात की एनिवर्सरी भी मनाई जा रही है। भारत-चीन रिश्तों में सुधार का संकेत देते हुए भारतीय एवं चीनी एम्बेसी द्वारा वहाँ आर्ट्स और फ़िल्म फेस्टिवल्स आयोजित किए जा रहे हैं। चीनी मीडिया जिस तरह से भारतीय चुनावों के बारे में चर्चा कर रही है, उससे साफ़ दिखता है कि उनके अनुसार नरेंद्र मोदी ने भारत को ग्लोबल स्टेज पर चमकाने का कार्य किया है।
भारतीय गृह मंत्रालय ने बड़ा क़दम उठाया है। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को नोटिस थमाते हुए गृह मंत्रालय ने उनकी विदेशी नागरिकता पर 15 दिनों के भीतर स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। राज्यसभा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सनसनीखेज आरोप लगाते हुए ख़ुलासा किया था कि राहुल गाँधी ने एक प्राइवेट कम्पनी के रजिस्ट्रेशन काग़ज़ात में ख़ुद को ब्रिटिश नागरिक बताया था। ये कम्पनी लंदन में स्थित है। स्वामी ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर राहुल गाँधी की भारतीय नागरिकता व संसद सदस्यता समाप्त करने की माँग की थी।
राहुल गाँधी को गृह मंत्रालय द्वारा भेजी गई नोटिस
काग़ज़ात के अनुसार, राहुल गाँधी बैकॉप्स लिमिटेड नामक कम्पनी के डायरेक्टर और सेक्रटरी थे। स्वामी ने ये काग़ज़ात ब्रिटेन के कम्पनी लॉ अथॉरिटी से निकलवाने की बात कही थी। अब गृह मंत्रालय ने बड़ा क़दम उठाते हुए राहुल को भेजी गई नोटिस में पूछा:
“मंत्रालय ने सांसद डॉक्टर सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा एक शिकायत प्राप्त किया है। इसमें 2003 में लंदन में सूचीबद्ध कम्पनी ‘बैकॉप्स लिमिटेड’ का जिक्र करते हुए कहा गया है कि आप इसके डायरेक्टर और सेक्रटरी थे। इस कम्पनी का दर्ज पता – 51 सॉउथगेट स्ट्रीट, विंस्टर, हैम्पशायर, SO23 9EH है। 2005 एवं 2006 में फाइल किए गए कम्पनी के एनुअल रिटर्न्स में आपकी जन्मतिथि 19/06/1970 दर्ज है और आपने ख़ुद को एक ब्रिटिश नागरिक बताया है। आप 15 दिनों के भीतर इस मामले को लेकर मंत्रालय को अपनी स्थिति स्पष्ट करें।”
कम्पनी के काग़ज़ात जिसमें राहुल ने ख़ुद को ब्रिटिश बताया था
गृह मंत्रालय ने सुब्रह्मण्यम स्वामी की शिकायत की एक कॉपी भी नोटिस के साथ राहुल गाँधी को भेजी है। इससे पहले सुब्रह्मण्यम स्वामी के आरोपों का खंडन करते हुए कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा था कि राहुल गाँधी तभी से भारतीय नागरिक हैं, जब से उनका जन्म हुआ है। 2015 में जब सुब्रह्मण्यम स्वामी ने ये गंभीर आरोप लगाए थे तब कॉन्ग्रेस ने कहा था कि ब्रिटिश सरकार से ज़रूर कोई ग़लती हुई है और वो उन्हें सुधार करने की अपील करेंगे। सवाल यह है कि अगर राहुल गाँधी ने ख़ुद को ब्रिटिश नागरिक बताया था तो वह अमेठी के लिए नामांकन दाख़िल करते समय ख़ुद को भारतीय क्यों बताते हैं?