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3 बड़े राज्यों में BJP को मात देने वाली कॉन्ग्रेस की हालत पतली: कारण ‘पुत्र-प्रेम’ और ‘प्रदेश निकाला’

हिंदी पट्टी के तीन बड़े राज्य- मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में 2018 के अंतिम महीनों में चुनाव हुए। तीनों ही राज्यों में भाजपा की सरकारें थी। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 15 वर्षों से भाजपा सत्ता में काबिज़ थी, राजस्थान में वसुंधरा राजे के नेतृत्व में पिछले 5 वर्षों से भाजपा की सरकार चल रही थी। जहाँ राजस्थान में पिछले कुछ चुनावों से भाजपा और कॉन्ग्रेस बारी-बारी से शासन करती आई हैं, मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री के रूप में अपने चौथे कार्यकाल से कुछ ही दूर रह गए। हाँ, छत्तीसगढ़ में ज़रूर कॉन्ग्रेस को एकतरफा जीत मिली लेकिन मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह की छवि पॉजिटिव है या नेगेटिव, इसे लेकर दोनों ही प्रमुख दलों में संशय है। भाजपा के सबसे लम्बे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें जनता के बीच ‘चावल वाले बाबा’ के नाम से जाना गया। तीनों राज्यों में कॉन्ग्रेस की सरकार तो बनी लेकिन सत्ता से बाहर हुई भाजपा ने शायद हार के बाद की भी तैयारियाँ पहले से ही कर रखी थी।

सिंधिया बाहर, कर्ज माफी पर आक्रोश और शिवराज की छवि

सबसे पहले बात करते हैं मध्य प्रदेश की क्योंकि तीनो राज्यों में सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें इसी राज्य में आती हैं। मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ के बारे में हाल ही में साध्वी प्रज्ञा ने तंज कसा कि वह सिर्फ़ छिंदवाड़ा के मुख्यमंत्री हो कर रह गए हैं। एक तरह से उनकी बात बहुत हद तक सही है क्योंकि छिंदवाड़ा से कमलनाथ के पुत्र नकुल नाथ चुनाव लड़ रहे हैं और आपको बता दें कि कमलनाथ ने चुनाव प्रचार ख़त्म होने के अंतिम 2 दिन छिंदवाड़ा में गुज़ारे ताकि अपने बेटे की जीत सुनिश्चित कर सकें। नकुल नाथ अपना पहला लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं और पिता कमलनाथ का सारा ध्यान अपने बेटे की जीत सुनिश्चित करने पर है। छिंदवाड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले 40 वर्षों से यहाँ कमलनाथ सांसद हैं। बीच में एक वर्ष के लिए भाजपा ने यहाँ जीत दर्ज की थी और एक वर्ष उनकी पत्नी अलका नाथ सांसद रही थीं।

मध्य प्रदेश में कमलनाथ के काफ़ी हद तक छिंदवाड़ा और अपने पुत्र में सीमित हो जाने के कारण कॉन्ग्रेस को घाटा होना तय है। प्रदेश के उप मुख्यमंत्री और विधानसभा चुनावों के दौरान काफ़ी मेहनत करने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को उत्तर प्रदेश की ज़िम्मेदारी दे दी गई है। इस क्रम में उनके पास न तो मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी के लिए समय है और न ही सरकार के लिए। उत्तर प्रदेश का रण पूरे भारत में सबसे कठिन है और कुछ हलकों में चर्चा यह भी है कि सिंधिया को वहाँ बलि का बकरा बनाने के लिए भेजा गया है। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच फँसे सिंधिया की स्थिति का अंदाज़ा इसी बात से लगा लीजिए कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता भी उनसे नाराज़ हैं। सिंधिया को कार्यकर्ताओं ने निष्क्रिय बताया।

सर्वविदित है, कमलनाथ और सिंधिया, दोनों ही एमपी में सीएम पद के दावेदार थे और राहुल गाँधी ने मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा से पहले दोनों के साथ फोटो डालकर यह जताने की कोशिश की थी कि पार्टी में सब ठीक है। राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि राज्य में सत्ता के 2 केंद्र न हो जाएँ, इसे देखते हुए सिंधिया को बाहर रखा जा रहा है। बीच में यह भी ख़बर आई थी कि कमलनाथ चाहते हैं कि दिग्विजय अगर चुनावी राजनीति में वापसी करते हैं तो वह राज्य की सबसे कठिन सीट चुनें और फलस्वरूप उन्हें भोपाल से लड़ाया गया जहाँ पिछले 8 चुनावों या यूँ कहें 30 सालों से भाजपा का कब्ज़ा है। साध्वी प्रज्ञा के आने से यहाँ मुक़ाबला और रोचक हो गया।

मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस को विधानसभा चुनावों जैसी सफलता न मिलने के पीछे एक और कारण यह भी हो सकता है कि जिस कर्ज़ माफ़ी के मुद्दे पर पूरा विधानसभा चुनाव केंद्रित था, उस पर कोई ख़ास प्रोग्रेस नहीं हुई है। किसानों में आक्रोश है और आचार संहिता से पहले ही इसका बहाना बना कर अधिकतर किसानों को चुनाव बाद कर्ज़ माफ़ करने की बात कही गई। ऊपर से इसमें बड़े स्तर पर अनियमितता की ख़बरें आईं। कई किसानों का एक रुपया और दस रुपया का कर्ज़ माफ़ हुआ। भाजपा को इस आक्रोश का फायदा मिल सकता है। शिवराज सिंह चौहान की छवि चुनाव हारने के बाद और बढ़ी है क्योंकि उन्होंने क़रीबी मामला होने के बावजूद जोड़-तोड़ की कोशिश नहीं की और कॉन्ग्रेस सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में सहर्ष गए।

राजस्थान के रण में मोदी फैक्टर महत्वपूर्ण

राजस्थान में विधानसभा चुनाव पूरी तरह वसुंधरा राजे पर केंद्रित था। कुछ विश्लेषक कहते हैं कि भाजपा ने जनता के रुख को भाँपते हुए चुनाव से ऐन पूर्व इसे वसुंधरा केंद्रित बना दिया ताकि केंद्र सरकार के विरुद्ध किसी भी तरह की नेगेटिव बातें न हो। राजस्थान में चले ‘वसुंधरा तेरी खैर नहीं, मोदी तुझसे बैर नहीं’ को इसी क्रम में देखा गया। इसीलिए राष्ट्रीय मीडिया में भी यहाँ के चुनाव परिणाम को राज्य सरकार के प्रति नाराज़गी और ‘Anti-Incumbency’ फैक्टर की वजह से कॉन्ग्रेस के पक्ष में जाना माना गया। राजस्थान में केंद्र सरकार के प्रति नाराज़गी का कोई मुद्दा ही नहीं रहा और इस बारे में बात ही नहीं हुई। इससे भाजपा को मोदी के नाम पर फिर से चुनाव में जाने का मौक़ा मिल गया।

अभी हाल ही में कॉन्ग्रेस नेता व उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने एक सभा में कहा कि राज्य में भाजपा सरकार के पाँच वर्षों में मोदी और वसुंधरा के बीच 36 का आँकड़ा चलता रहा। इस नैरेटिव के भाजपा के पक्ष में जाने की उम्मीद इसीलिए है क्योंकि अगर प्रदेश में वसुंधरा के प्रति लोगों में नाराज़गी होगी भी तो यह मोदी के प्रति सहानुभूति में बदल जाएगी। कॉन्ग्रेस ने अनजाने में ही सही, मोदी-वसुंधरा को अलग-अलग रखकर लोगों को यह अहसास दिला दिया है कि विधानसभा और लोकसभा चुनावों में अंतर है। पाकिस्तान से लगे राजस्थान में एयर स्ट्राइक के बाद यह माहौल बना है कि मोदी सरकार दुश्मनों को कड़ी भाषा में जवाब देने में सक्षम है और देश को लेकर सजग है।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत नकुल नाथ की तरह ही अपना पहला लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं और जोधपुर में उनका मुक़ाबला मौजूदा भाजपा सांसद गजेंद्र सिंह से है। कमलनाथ की तरह ही अशोक गहलोत का भी ध्यान अपने बेटे की जीत सुनिश्चित करने पर है और सामने पिछले चुनाव में 66% से भी अधिक वोट पाने वाले गजेंद्र सिंह शेखावत के होने के कारण पिता-पुत्र इस सीट को गम्भीरतापूर्वक ले रहे हैं। यहाँ से 5 बार सांसद रहे अशोक गहलोत की भी स्थिति ऐसी ही है जैसी छिंदवाड़ा में कमलनाथ की। बस अंतर इतना है कि जोधपुर में विपक्षी प्रत्याशी बहुत ज़्यादा मज़बूत है। जोधपुर से 300 किलोमीटर की दूरी पर पाकिस्तानी सीमा है और बालाकोट यहाँ भी मुद्दा है।

छत्तीसगढ़ में ‘महाराजा’ को बाहर भेजा

छत्तीसगढ़ में भाजपा की हार काफ़ी शॉकिंग थी क्योंकि अधिकतर एग्जिट पोल्स भी यहाँ भाजपा के पक्ष में खंडित जनादेश की भविष्यवाणी कर रहे थे। लेकिन, यहाँ मध्य प्रदेश और राजस्थान से अलग परिणाम आए। मुक़ाबला एकतरफा रहा और कॉन्ग्रेस को आसान जीत मिली। परिणाम यह हुआ कि मुख्यमंत्री रमन सिंह के बेटे जो कि अभी सांसद हैं, सहित राज्य के सभी 10 सांसदों का टिकट काट दिया गया। हार का खामियाज़ा उन सभी को भुगतना पड़ा और सीधा पार्टी हाईकमान द्वारा लिए गए निर्णय में पिछले चुनाव में जीती गई 10 की 10 सीटों पर नए प्रत्याशी उतारे गए। हाल में बढ़ी नक्सली घटनाओं को भी भाजपा ने मुद्दा बनाया है।

छत्तीसगढ़ को लेकर अभी अनुमान लगाना काफ़ी मुश्किल है लेकिन प्रदेश में कॉन्ग्रेस के सबसे बड़े नेता और सरजुगा के महाराजा त्रिभुनेश्वर शरण सिंह देव को ओडिशा का प्रभारी बना कर भेज दिया गया है। छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंह देव को छत्तीसगढ़ से बाहर भेजना कॉन्ग्रेस की उसी नई रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जहाँ प्रदेश के दूसरे सबसे बड़े नेता को मुख्यमंत्री के साथ टकराव रोकने के लिए किसी अन्य राज्य का प्रभार दे दिया जाता है। भाजपा ने अभी तक रमन सिंह का नाम उस आक्रामकता के साथ प्रयोग नहीं किया है, जैसा वह पिछले चुनावों में करती आई है। यहाँ भी पार्टी मोदी के नाम पर ही पूरी तरह मैदान में है और वो भी सारे नए चेहरों के साथ।

पाकिस्तान को यूरोपियन पार्लियामेंट की चेतावनी: बंद हो सकती हैं सभी सब्सिडियाँ

30 अप्रैल 2019 को यूरोपियन पार्लियामेंट के 51 सदस्यों ने सामूहिक रूप से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को एक पत्र लिखा और अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों और उनकी हत्याओं पर चिंता प्रकट की। उन्होंने इमरान खान से पाकिस्तान में रह रहे अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का आश्वासन माँगा।

पत्र में कहा गया कि आज का पाकिस्तान मुहम्मद अली जिन्नाह के पाकिस्तान के एकदम अलग है। पत्र के अनुसार जिन्नाह एक ऐसा पाकिस्तान चाहते थे जहाँ बहुसंख्यक समुदाय विशेष के साथ ईसाई, सिख, हिन्दू, अहमदिया सभी को समान अवसर मिलें लेकिन बीते सत्तर वर्षों में पाकिस्तान के हुक्मरानों ने विभाजनकारी नीतियाँ अपनाईं जिससे पाकिस्तान में रह रहे अल्पसंख्यकों पर चरमपंथी बहुसंख्यकों द्वारा हिंसक अत्याचार किए गए।

पत्र में पाकिस्तान की आलोचना की गई और आसिया बीबी नामक ईसाई महिला पर लगाए गए ईशनिंदा के झूठे आरोपों और अतंतः दिए गए मृत्युदंड की निंदा की गई।

यूरोपियन पार्लियामेंट के सदस्यों ने पाकिस्तान से गुज़ारिश की है कि वो उन संस्थागत और संवैधानिक ढाँचों को ध्वस्त करे जिनके कारण अल्पसंख्यकों को लक्षित कर अत्याचार किए जा रहे हैं। सदस्य देशों ने कहा है कि यदि पाकिस्तान अपने यहाँ अल्पसंख्यकों पर हो रही हिंसा को बंद नहीं करता तो यूरोपियन कमीशन पाकिस्तान को दी जाने वाली हर प्रकार की सब्सिडी और व्यापार में छूट बंद करने को बाध्य होगा।

केरल: अल्पसंख्यक कॉलेज में बुर्क़ा पहनने पर लगा प्रतिबंध, मुस्लिम संगठनों ने जताई आपत्ति

श्री लंका में बुर्क़े पर प्रतिबंध लगाने की बात चल ही रही थी कि इसी बीच केरल के एक अल्पसंख्यक कॉलेज ने बुर्क़ा पहनकर आने पर पाबंदी लगाने से संबंधित सर्कुलर जारी कर दिया गया है। ख़बर के अनुसार, केरल के मल्लपुरम में चलाए जा रहे इस अल्पसंख्यक कॉलेज में बुर्के पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। यह कॉलेज मुस्लिम एजुकेशन सोसायटी द्वारा संचालित है। इस सर्कुलर के ख़िलाफ़ कुछ स्थानीय संगठनों ने आपत्ति दर्ज की है।

ऐसा माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र यह फ़ैसला लिया गया है, इसलिए इसका विरोध किया जा रहा है। ज्ञात हो कि अभी कुछ रोज पहले श्री लंका में आतंकी हमला हुआ था जिसमें 300 से अधिक लोगों के मारे जाने की ख़बर थी और लगभर 500 लोग घायल हुए थे। वहाँ की सरकार ने मुँह ढकने वाले हर तरह के कपड़ों पर प्रतिबंध लगाने का फ़ैसला लिया था।

इसी के मद्देनज़र शिवसेना ने अपने अपने मुखपत्र ‘सामना’ में बाक़ायदा संपादकीय लेख के माध्यम से प्रधानमंत्री मोदी से भारत में बुर्क़े पर प्रतिबंध लगाने की माँग की थी। शिवसेना की इस माँग का समर्थन भोपाल से बीजेपी उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा ने भी किया था, लेकिन बीजेपी ने इस पर कोई गंभीरता न दिखाते हुए इस माँग को ख़ारिज करना उचित समझा। बीजेपी प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव ने ‘सामना’ के संपादकीय पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करते हुए कहा कि इस तरह के प्रतिबंध की आवश्यकता नहीं है। बीजेपी के अलावा एनडीए के ही एक अन्य सहयोगी रामदास आठवले ने शिवसेना की माँग को एक सिरे से ख़ारिज किया। उनका कहना था कि यह एक परंपरा का हिस्सा है, जिस पर प्रतिबंध लगाने की ज़रूरत नहीं है।

शिवसेना की माँग पर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहालुक मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कड़ा ऐतराज़ जताया। उन्होंने कहा कि यह हमारा मानवाधिकार है जोकि संविधान में निहित है। सभी पर हिन्दुत्व नहीं लागू किया जा सकता। हो सकता है कि कल को यह कह दिया जाए कि आपके चेहरे पर दाढ़ी ठीक नहीं है, टोपी मत पहनिए।

इशरत जहाँ एनकाउंटर: पूर्व पुलिस अधिकारी डीजी वंजारा को अदालत ने किया आरोप मुक्त

इशरत जहाँ एनकाउंटर मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने गुजरात के पूर्व पुलिस अधिकारी डीजी वंजारा को आरोप मुक्त कर दिया है। उनके अलावा पूर्व पुलिस अधिकारी एनके अमीन को भी आरोपों से मुक्त कर दिया गया। इससे पहले गुजरात हाई कोर्ट ने दोनों पर मुक़दमा चलाने से इनकार कर दिया था। हाई कोर्ट के इस निर्णय के बाद दोनों पूर्व पुलिस अधिकारियों ने अपने ऊपर लगे चार्जेज को हटाने की माँग की थी।

जस्टिस जेके पांड्या ने दोनों को आरोप मुक्त करते हुए कहा कि चूँकि गुजरात सरकार ने इन पर मुक़दमा चलाने की स्वीकृति नहीं दी, इसीलिए इन्हें आरोप मुक्त किया जाता है। ‘कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर (CRPC)’ के सेक्शन 197 के अनुसार, आधिकारिक ड्यूटी के दौरान किए गए कार्य के लिए किसी सरकारी कर्मचारी के ऊपर मुक़दमा चलाने हेतु सरकार की स्वीकृति चाहिए होती है।

इसके साथ ही इनके ख़िलाफ़ सारे मामले ख़त्म कर दिए जाएँगे। पुलिस बता चुकी है कि इशरत जहाँ एक आतंकी थी, जो गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को मारने की साज़िश रचने में शामिल थी। अहमदाबाद में चली सुनवाई के दौरान सीबीआई ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार ने दोनों के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने की स्वीकृति नहीं दी है। ज्ञात हो कि मुंबई के नजदीक स्थित मुंब्रा की रहने वाली 19 वर्षीय इशरत जहाँ, जावेद शेख उर्फ प्राणेश पिल्लै, अमजद अली अकबर अली राणा और जीशान जौहर की 15 जून, 2004 को अहमदाबाद के बाहर पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में मौत हो गई थी।

बाद में कई लोगों ने इस एनकाउंटर को फेक बताया था। कॉन्ग्रेस नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कई मौक़ों पर इस एनकाउंटर पर सवाल खड़े किए थे। डीजी वंजारा इस मामले में 2007 से लेकर 2015 तक जुडिशल कस्टडी में थे। उन्हें 2015 में ज़मानत मिली थी। उन्हें अगस्त 2017 में सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर मामले में भी बरी किया जा चुका है।

सर्टिफाइड ‘मौलाना’ है मसूद अजहर: आतंक का मजहब भले न हो, आतंकी का मजहब स्पष्ट है

अंततः मौलाना मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र में प्रतिबंध लग ही गया। वैश्विक इस्लामिक आतंक के विरुद्ध यह छोटा ही सही लेकिन प्रभावशाली निर्णय है। भारत लगभग 10 वर्षों तक संयुक्त राष्ट्र में जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मौलाना मसूद पर प्रतिबंध लगाने की लड़ाई लड़ता रहा जिसमें अब जाकर सफलता मिली है। दस वर्षों की इस मेहनत को केवल यह कहकर नकारा नहीं जा सकता कि ‘इससे कुछ नहीं होने वाला’। वैश्विक स्तर पर यह भारत की कूटनीतिक विजय है और इसके मायने केवल एक आतंकी सरगना पर प्रतिबंध लगाने तक सीमित नहीं।

मौलाना मसूद अज़हर पर प्रतिबंध के क्या मायने हैं?

पाकिस्तानी हुकूमत द्वारा पोषित आतंकी सरगना मौलाना मसूद अज़हर पर संयुक्त राष्ट्र की 1267 सैंक्शन कमेटी ने प्रतिबंध लगाया है। यह कमेटी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की उन 14 कमेटियों में से एक है जो आतंक, परमाणु प्रसार और देशों के बीच ‘कन्फ्लिक्ट’ की स्थिति में आवश्यकतानुसार किसी संगठन अथवा व्यक्ति पर प्रतिबंध लगा सकती है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 15 अक्टूबर 1999 को प्रस्ताव संख्या 1267 को सर्वसम्मति से पारित किया गया था और एक सैंक्शन कमेटी बनाई गई थी। सुरक्षा परिषद के पाँच स्थाई और 10 अस्थाई सदस्य, इस कमेटी के सदस्य हैं। कमेटी ने सन 1999 में मुख्यतः तालिबान और उससे जुड़े संगठनों को सूचीबद्ध किया था और उन पर प्रतिबंध लगाया था। सन 2011 में इस सूची में अल-क़ायदा को जोड़ा गया।

इसके बाद 2015 में इस कमेटी का दायरा बढ़ाकर इसमें इस्लामिक स्टेट को भी जोड़ा गया। दो साल बाद 2017 में कमेटी ने इस्लामिक स्टेट और अल कायदा की सारी संपत्तियों को सीज़ कर दिया, आतंकवादियों की यात्राओं पर प्रत्येक देश ने प्रतिबंध लगाया और उन्हें किसी भी तरह से हथियारों की सप्लाई बंद की।

इस प्रस्ताव के तहत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद किसी आतंकवादी या आतंकी संगठन को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी या आतंकवादी संगठन घोषित कर सकती है और उस पर व्यापक प्रतिबंध लगा सकती है। प्रतिबंध का अर्थ यह है कि इस सूची में नाम शामिल होते ही संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देश प्रतिबंधित व्यक्ति या संगठन को आतंकवादी या आतंकी संगठन के रूप में सत्यापित मानकर कठोर रवैया अपनाते हैं। भले ही ऐसे आतंकी या आतंकवादी संगठन दुनिया में कहीं भी स्थित क्यों न हों उनके सारे बैंक खाते फ्रीज़ कर दिए जाएँगे, विदेशी यात्रा करने पर प्रतिबंध होगा और हथियारों की आपूर्ति निषेध हो इसे भी सुनिश्चित किया जाएगा।

अभी तक 1267-सैंक्शन कमेटी 262 आतंकियों और 83 संगठनों पर प्रतिबंध लगा चुकी है। लश्कर-ए-तय्यबा का सरगना हाफिज सईद, इस्लामिक स्टेट का चीफ अबु बक़र अल बग़दादी, अल क़ायदा का आयमन अल ज़वाहिरी और ओसामा बिन लादेन का लड़का हमज़ा पहले से ही इस सूची में है। मौलाना मसूद अज़हर पर भी वही सारे प्रतिबंध लागू होंगे जो इन पर हैं। मसूद पर प्रतिबंध तो अभी लगा है लेकिन जैश-ए-मोहम्मद को संयुक्त राष्ट्र ने 17 अक्टूबर 2001 को प्रतिबंधित किया था।

ध्यान देने वाली बात यह है कि मौलाना मसूद अज़हर कोई एक अकेला आतंकवादी नहीं है। जैश-ए-मोहम्मद आतंकी संगठन पूरी तरह से उसके परिवारवालों और परिजनों द्वारा संचालित है। मौलाना मसूद को छुड़ाने के लिए इंडियन एयरलाइन्स के विमान IC-814 की हाईजैकिंग का मास्टरमाइंड मसूद का भाई इब्राहिम अज़हर था। आज की तारीख में मौलाना मसूद के 19 रिश्तेदार जैश-ए-मोहम्मद के सदस्य हैं। इनमें मसूद के भाई, ससुरालवाले और उनकी अगली पीढ़ी भी शामिल है।

चीन के अड़ंगे से मौलाना मसूद पर प्रतिबंध लगने में हुआ विलंब

सैंक्शन कमेटी 1267 के तहत संयुक्त राष्ट्र का कोई भी सदस्य देश किसी भी आंतकवादी को वैश्विक आतंकवादी की सूची में शामिल करने का निवेदन कर सकता है, जिस पर सुरक्षा परिषद की स्थाई समिति का अनुमोदन करना जरूरी है। अगर सुरक्षा परिषद का कोई एक भी स्थाई सदस्य देश इस प्रस्ताव का वीटो करता है तो वह निवेदन पारित नहीं होगा। भारत द्वारा मौलाना को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कराने के प्रयास पर चीन बार-बार वीटो कर अड़ंगा लगाता रहा है।  

दस सालों में चार बार चीन ऐसी हरकत कर चुका है जिससे मौलाना मसूद पर संयुक्त राष्ट्र में प्रतिबंध नहीं लग पाया था। भारत ने मुंबई पर 26/11 के हमले के बाद 2009 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से मौलाना मसूद को प्रतिबंधित आतंकियों की सूची में डालने का निवेदन किया था जिसे चीन ने यह कहकर लटका दिया कि मौलाना के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं है। इसके बाद 2016 में पठानकोट आतंकी हमले के बाद जब भारत ने मौलाना मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित करने के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत किया तब भी चीन ने कहा था कि संयुक्त राष्ट्र में उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं।

फिर 2017 में चीन ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र में मौलाना मसूद के खिलाफ सर्वसम्मति नहीं बन पाई है। पुलवामा हमले के बाद मार्च 2019 में अमेरिका, ब्रिटेन और फ़्रांस ने एकमत होकर मसूद पर प्रतिबंध लगाने के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत किया जिसे चीन कुछ तकनीकी कारणों का हवाला देकर रोकने में सफल रहा। इसके बाद अमेरिका ने स्वतंत्र रूप से 27 मार्च को प्रस्ताव प्रस्तुत किया जिसके बाद चीन पर दबाव बढ़ गया था।

अमेरिका ब्रिटेन और फ्रांस ने चीन पर दबाव डाला कि वह रेसोलुशन UNSC-1267 से तकनीकी रोक एक-दो सप्ताह में हटाए। यदि चीन ऐसा नहीं करता तो चीन को मौलाना मसूद अजहर पर प्रतिबंध लगाने के लिए काउंसिल में दूसरे प्रस्ताव का सामना करने के लिए तैयार रहने को कहा गया था।

इस पूरे मामले पर एक विदेशी डिप्लोमेट ने कहा था कि चीन को 23 अप्रैल तक का समय दिया गया था कि वह रोक हटा ले नहीं तो 1267 को दरकिनार करते हुए एक नया प्रस्ताव लाया जाएगा। ऐसा एक प्रस्ताव अनौपचारिक रूप से सभी 15 सदस्य देशों के बीच सर्कुलेट करने की चर्चा भी सामने आई थी, इस आशय के साथ कि चीन इसके दबाव में आकर आतंकी सरगना मसूद अज़हर पर अपने स्टैंड पर पुनर्विचार करे। तब चीन ने 6 मई तक का समय माँगा। अंततः अमेरिका अपने स्टैंड पर कायम रहा और चीन को झुकना पड़ा और 1 मई 2019 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा मौलाना मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित कर दिया गया।

सर्टिफाइड ‘मौलाना’ है मसूद अज़हर; पहचानने में कोई गलती न करें

मौलाना मसूद पर वैश्विक आतंकवादी होने का आधिकारिक ठप्पा लगने के साथ ही टीवी चैनल और प्रिंट मीडिया के वाले उसे ‘मसूद अज़हर’ कहने लग गए हैं। आश्चर्य की बात है कि अमेरिका की प्रतिष्ठित स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के Center for International Security and Cooperation की वेबसाइट पर मौलाना मसूद अज़हर को एक रैडिकल इस्लामिस्ट ‘स्कॉलर’ लिखा गया है। अब जब मसूद अज़हर वैश्विक आतंकी घोषित हो गया है तब पश्चिमी ‘विद्वान’ उसे क्या कहेंगे यह विचारणीय प्रश्न है।

ध्यान रहे कि प्रतिबंध ‘मौलाना’ मसूद अज़हर पर लगा है। यह नाम ही मज़हबी आतंकवाद को प्रमाणित करता है। मसूद अज़हर सर्टिफाइड ‘मौलाना’ है, और उसे उसके पूरे नाम से जाना जाता रहा है। कहने के लिए आतंक का मज़हब भले न हो लेकिन आतंकी का मज़हब स्पष्ट है और सारे मज़हब परस्त ‘मौलाना’ शब्द को छिपाने की भरपूर कोशिश करते दिखेंगे। हमारे आसपास के 90% पत्रकारों और कथित लेखकों आदि को परखिये तो इनकी प्रतिबद्धता ‘मौलाना’ के प्रति 100 टका स्पष्ट दिखेगी। आसपास नज़र भी बनाये रखिये कौन जाने कि आपके आसपास कोई मज़हबी किसी आम लड़के को पेट पर बम बाँधकर फूटने की जन्नती प्रेरणा देने में लिप्त है। सतर्क रहें, सत्यनिष्ठ रहें, मज़हबी प्रेरणाओं की सच्चाई से लोगों को अवगत कराते रहें।

‘मेरी बेटी हारी तो लोगों का लोकतंत्र से विश्वास उठ जाएगा’

लोकसभा चुनावों के बीच नतीजों को लेकर तरह-तरह की बयानबाजी देखने को मिल रही है। अभी तक EVM हैक होने जैसी चर्चा का ही बोलबाला था, लेकिन शारद पवार के बयान ने इस चर्चा को नई दिशा दे दी है। राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) के प्रमुख शरद पवार का कहना है कि यदि उनकी बेटी सुप्रिया सुले बारामती से लोकसभा का चुनाव हार जाती हैं, तो लोगों का लोकतंत्र से भरोसा उठ जाएगा। शरद पवार के इस बयान की सोशल मीडिया पर जमकर निंदा की जा रही है।

एक टेलीविजन चैनल को दिए इंटरव्यू में शरद पवार ने बुधवार (मई 02, 2019) को कहा कि EVM से छेड़छाड़ की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। इसका लोकसभा चुनाव के परिणाम पर भी असर पड़ सकता है। पवार ने कहा है कि जिन राजनेताओं ने कभी विधानसभा या लोकसभा का चुनाव भी नहीं लड़ा, वो कह रहे हैं कि बारामती से NCP की उम्मीदवार हार जाएगी। इस बात से आशंका पैदा हो रही है।

एक सप्ताह पहले ही पवार ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू के साथ मंच साझा करते हुए माँग की थी कि VVPAT की कम से कम 50 प्रतिशत पर्चियों की गिनती की जाए। लेकिन ‘बेटी की हार’ और ‘लोकतंत्र से विश्वास का उठना’ जैसे आरोप पर भाजपा के कैबिनेट मंत्री गिरीश महाजन, विनोद तावड़े और चंद्रकांत पाटिल ने कड़ी आपत्ति जताई।

महाजन ने कहा, “पवार जानते हैं कि उनकी बेटी लोकसभा चुनाव हार रही है, इसलिए वह काफी सधे रूप से कदम उठा रहे हैं। वह EVM पर हार की जिम्मेदारी थोपने की तैयारी कर रहे हैं। भारतीय चुनाव आयोग को सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में सभी शंकाओं का निवारण करना चाहिए। यदि हम EVM में छेड़छाड़ करने में सक्षम होते तो हम मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव नहीं हारते।”

राबड़ी देवी ने पूछा, लीची कैसे खाते हैं… ‘चारा कहीं भी कैसे भी खा लीजिए’ परेश रावल ने लिए मजे

लालू प्रसाद यादव की पत्नी और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गैर-राजनैतिक साक्षात्कार पर तंज कसा। जिसके बाद भाजपा सांसद और बॉलीवुड अभिनेता परेश रावल के साथ कई अन्य ट्विटर यूजर्स ने राबड़ी देवी और लालू यादव पर जमकर निशाना साधा।

राबड़ी देवी ने ट्वीट किया, “मोदी कल लीची के शहर मुज़फ़्फ़रपुर आए थे। लोगों ने उनके आम खाने के तरीक़े के बाद पूछा कि लीची कैसे खाते हैं? काटकर, चूसकर या वाश-बेसिन के पास खड़े होकर? पीएम ने जवाब ही नहीं दिया क्योंकि पूछने वाला कोई हीरो-हिरोइन नहीं था? जवाब नहीं सूझा क्योंकि सवाल पूर्व निर्धारित और नियोजित नहीं था।”

राबड़ी देवी के इस बयान के बाद परेश रावल ने उन्हें अपने ट्वीट में टैग करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से चारा घोटाले का जिक्र किया। परेश रावल ने राबड़ी देवी के इस ट्वीट पर लिखा, “पर चारा तो कहीं भी कैसे भी खा सकते हैं।

परेश रावल के इस ट्वीट पर और राबड़ी देवी के तंज पर कई ट्विटर यूजर्स ने बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री का जमकर मज़ाक उड़ाया। किसी ने उन्हें परेश रावल की तरह चारा घोटाले के मुद्दे पर घेरा तो किसी ने उनके मीडिया से बातचीत के ढंग को लेकर सवाल उठाए। कुछ लोगों ने पूछा कि उनका ट्विटर अकॉउंट कौन हैंडल करता है।

शशि थरूर जी, कृपया देशहित दाँव पर लगा कर वोट मत जुगाड़िए

कॉन्ग्रेस इस समय जनता के वोट के सूखे से किस कदर जूझ रही है, यह वैसे तो दिखाए जाने की जरूरत नहीं है लेकिन, कॉन्ग्रेस नेता गाहे-बगाहे खुद अपनी हताशा का प्रदर्शन कर रहे हैं। इसमें वह किसी हद तक गिरने से नहीं चूकते हैं। इसी क्रम में कॉन्ग्रेस का आज वह ‘आइकन’ भी गिर गया, जिससे ओछेपन की उम्मीद नहीं थी। इस आइकन का ‘फैन’ मैं खुद भी हूँ।

मामले का सच्चा ‘एंगल’

इकॉनोमिक टाइम्स ने एक खबर छापते हुए लिखा है कि हिंदुस्तान ने श्री लंका को गुप्त सूचना (इंटेलिजेंस ‘टिप’) दी थी – लंका के समुदाय विशेष में से कुछ जिहादी लोग श्री लंका में आतंकवादी घटना को अंजाम देने की साजिश कर रहे हैं। श्री लंका के अफसरों ने चेतावनी गंभीरता से नहीं ली और अंजाम भुगता, ईस्टर के दिन ही सिलसिलेवार धमाके उनकी नाक के नीचे हो गए।

इस पर शशि थरूर प्रतिक्रिया देते हुए लिखते हैं, “यह दुखद है। घरेलू मुस्लिमों को तंग करने और उनसे नफरत के चलते, मुस्लिमों से जुड़े किसी भी मुद्दे पर पड़ोसी देशों में भाजपा सरकार की विश्वसनीयता को आघात पहुँचा है। (इसमें) भारत की अगली सरकार को बड़े सुधार करने होंगे।”

यह शर्मनाक है। शशि थरूर का यह बयान इसलिए शर्मनाक है क्योंकि जिस रिपोर्ट का शशि थरूर हवाला दे रहे हैं, वह स्पष्ट कह रही है कि वास्तव में लिट्टे के गृहयुद्ध से बेजार और कंगाल श्री लंका पाकिस्तान की गोद में बैठा हुआ है और वह अपने मुस्लिम समुदाय में पल रहे जिहाद पर लगाम लगा कर पाकिस्तान की दुर्दांत इंटेलिजेंस एजेंसी आईएसआई को नाराज नहीं करना चाहता था। इसका हिंदुस्तान के हिन्दू-मुस्लिम मसले से कुछ लेना-देना नहीं था।

श्री लंका इसलिए हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा क्योंकि उसे लगा कि यह हिंदुस्तान की ‘चाल’ है, ताकि श्री लंका अपने घर के जिहादियों पर कार्रवाई करे और राष्ट्रों के परे इस्लामिक उम्माह (समुदाय) को सर्वोपरि मानने वाला पाकिस्तान बिलबिला जाए। श्री लंका पाकिस्तान को नाराज नहीं करना चाहता था, क्योंकि पाकिस्तान लिट्टे से निपटने में उसकी सहायता कर रहा था।

इसके अलावा इसमें चीन वाला दृष्टिकोण भी है। चीन, पाकिस्तान का इकलौता ‘अन्नदाता’ बचा है। हाफिज सईद के मामले में सुरक्षा परिषद को झेलाया, 10 साल मसूद अजहर को बचाता रहा (अभी भी पुलवामा का जिक्र चीन ने संयुक्त राष्ट्र के द्वारा जारी अजहर के पापों की फ़ेहरिस्त से हटवा दिया, केवल पुराने पाप ही चस्पा हैं) और पाकिस्तान से गिलगित-बाल्टिस्तान खरीद चुका है, यानी कश्मीरी का वो हिस्सा जो हमारा है। इस तरह से चीन श्री लंका के लिए भी अगर ‘बाप’ नहीं, तो कम से कम ‘चचा’ तो है ही। श्री लंका का हम्बनटोटा बंदरगाह चीन ने 99 साल के लिए लीज पर ले रखा है और उन्हीं रुपयों से श्री लंका की दाल-रोटी चल रही है।

सवाल यह है कि मेरे जैसा ‘कीबोर्ड वारियर’, ‘आर्मचेयर एक्सपर्ट’ अगर इतना सब कुछ जान और सोच सकता है, तो क्या संयुक्त राष्ट्र के सिरमौर बनने की दहलीज तक पहुँच चुके शशि थरूर को यह सब एंगल नहीं दिखे? या फिर सिर्फ इस वजह से देखकर नजरंदाज कर दिया कि इस रिपोर्ट के हौव्वे से कॉन्ग्रेस के लिए पड़े वोटों के अकाल में उन्हें कुछ ‘जिहादी बूँदों’ का योगदान मिल जाएगा?

यह राजनीतिक हमला नहीं, एक ‘प्रशंसक’ का दुःख है

शशि थरूर की जगह पर यह काम वोटों के लिए अगर राहुल गाँधी, कामरेड कन्हैया कुमार, तेजस्वी यादव या जिग्नेश मेवाणी जैसा कोई छुटभैय्या नेता करता, तो कोई आश्चर्य न होता और दुःख तो लेशमात्र नहीं। लेकिन, व्यक्तिगत तौर पर शशि थरूर मोदी के बाद मेरे दूसरे सबसे पसंदीदा नेता हैं, ट्विटर पर नरेंद्र मोदी से भी पहले उन्हें ही फॉलो किया था। साथ ही, मेरे लिए JKR (जेके रॉलिंग) के बाद दूसरे सबसे पसंदीदा लेखक और नॉन-फिक्शन में तो सबसे पहले स्थान पर शशि थरूर रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी पर लिखी आपकी किताब 300 पन्ने से ज्यादा पढ़ चुका हूँ। वर्ष 2017 के जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में आपको 1 मीटर की दूरी से देख पाना मेरे जीवन के सबसे यादगार पलों में था।

आप विदेश नीति को आंतरिक राजनीति से दूर रखने की बड़ी अच्छी बातें करते हैं। आप हिन्दू धर्म पर वास्तव में विश्वास या परिपालन ना करते हुए, केवल एक विचार के तौर पर जितना जाना जा सकते हैं, आप जान चुके हैं। आप निश्चित ही उदारवादी हैं, संभ्रांत हैं, आपकी ही पार्टी का एक बड़ा धड़ा राहुल गाँधी के बजाए आपको ‘पीएम मैटीरियल’ मानता है। मेरे जैसे कुछ ‘सेंटर-राईट’ लोग भी आपको तहेदिल से पसंद करते हैं। शशि थरूर जी, आपसे निवेदन है कि हमारा दिल मत तोड़िए।

मुश्किल में राहुल गाँधी: MHA के बाद विदेशी नागरिकता मामला अब सुप्रीम कोर्ट में, नामांकन रद्द की माँग

कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी की मुश्किलें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। कभी वो अपने झूठ बोलने की आदत से विवादों में बने रहते हैं, तो कभी अपनी बचकानी हरक़तों से। फ़िलहाल, उन्हें लेकर जो सवाल उठ रहे हैं, वो उनकी विदेशी नागरिकता को लेकर हैं। प्रियंका गाँधी के भाई राहुल गाँधी की नागरिकता का प्रश्न अब सुप्रीम कोर्ट की दहलीज़ तक जा पहुँचा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, हिन्दू महासभा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाख़िल कर के उनकी ब्रिटिश नागरिकता पर आपत्ति जताई है और उनके नामांकर को रद्द करने की माँग की है।

हिन्दू महासभा की तरफ से जय भगवान गोयल ने यह याचिका दाखिल की है, जिस पर जल्द सुनवाई करने की माँग पर ज़ोर दिया गया। याचिका में यह सवाल भी उठाया गया है कि यह जानते हुए कि राहुल गाँधी की नागरिकता ब्रिटेन की है, चुनाव आयोग द्वारा उनका नामांकन क्यों स्वीकार किया गया?

बता दें कि राहुल गाँधी की ब्रिटिश नागरिकता और उनके नाम (राउल विंची) को लेकर पहले भी विवाद उठ चुके हैं। भारतीय गृह मंत्रालय ने बड़ा क़दम उठाते हुए राहुल गाँधी को नोटिस थमाकर उनकी विदेशी नागरिकता पर 15 दिनों के भीतर स्पष्टीकरण देने को कहा है।

हाल ही में राज्यसभा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सनसनीखेज आरोप लगाते हुए ख़ुलासा किया था कि राहुल गाँधी ने एक प्राइवेट कम्पनी के रजिस्ट्रेशन काग़ज़ात में ख़ुद को ब्रिटिश नागरिक बताया था। ये कम्पनी लंदन में स्थित है। स्वामी ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर राहुल गाँधी की भारतीय नागरिकता व संसद की सदस्यता समाप्त करने की माँग की थी।

राहुल गाँधी को गृह मंत्रालय द्वारा भेजा गया नोटिस

इन डॉक्यूमेंट्स के अनुसार, राहुल गाँधी बैकॉप्स लिमिटेड नामक कम्पनी के डायरेक्टर और सेक्रटरी थे। स्वामी ने ये डॉक्यूमेंट्स ब्रिटेन के कम्पनी लॉ अथॉरिटी से निकलवाने की बात कही थी। अब गृह मंत्रालय ने बड़ा क़दम उठाते हुए राहुल को भेजे गए नोटिस में पूछा है :

“मंत्रालय ने सांसद डॉक्टर सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा एक शिकायत प्राप्त की है। इसमें 2003 में लंदन में सूचीबद्ध कम्पनी ‘बैकॉप्स लिमिटेड’ का जिक्र करते हुए कहा गया है कि आप इसके डायरेक्टर और सेक्रटरी थे। इस कम्पनी का दर्ज पता – 51 सॉउथगेट स्ट्रीट, विंस्टर, हैम्पशायर, SO23 9EH है। 2005 एवं 2006 में फाइल किए गए कम्पनी के वार्षिक रिटर्न्स में आपकी जन्मतिथि 19/06/1970 दर्ज है और आपने ख़ुद को एक ब्रिटिश नागरिक बताया है। आप 15 दिनों के भीतर इस मामले को लेकर मंत्रालय को अपनी स्थिति स्पष्ट करें।”

कम्पनी केडॉक्युमेंट्स, जिसमें राहुल ने ख़ुद को ब्रिटिश बताया था

गृह मंत्रालय ने सुब्रह्मण्यम स्वामी की शिकायत की एक कॉपी भी नोटिस के साथ राहुल गाँधी को भेजी है। इससे पहले सुब्रह्मण्यम स्वामी के आरोपों का खंडन करते हुए कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा था कि राहुल गाँधी तभी से भारतीय नागरिक हैं, जब से उनका जन्म हुआ है। 2015 में जब सुब्रह्मण्यम स्वामी ने ये गंभीर आरोप लगाए थे, तब कॉन्ग्रेस ने कहा था कि ब्रिटिश सरकार से ज़रूर कोई ग़लती हुई है और वो उन्हें सुधार करने की अपील करेंगे। सवाल यह है कि अगर राहुल गाँधी ने ख़ुद को ब्रिटिश नागरिक बताया था, तो वह अमेठी के लिए नामांकन दाख़िल करते समय ख़ुद को भारतीय क्यों बताते हैं?

मसूद अज़हर पर ‘दिग्गी राजा’ और ‘गोभक्त’ कमलनाथ ‘परेशान’, कॉन्ग्रेस से लेकर वोटर तक हैरान!

कॉन्ग्रेस और उनके नेता आए दिन अपने बयानों से विवादों में घिरे रहते हैं। दिग्विजय सिंह इन दिनों अपने बयानों से सुर्खियाँ बटोरते नज़र आ रहे हैं। वहीं, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री गोभक्त कमलनाथ भी पीछे नहीं हैं। कॉन्ग्रेस के इन दोनों नेताओं ने अब केंद्र सरकार को ऐसे मुद्दे पर घेरने का प्रयास किया है, जिससे उनकी दिमागी स्थिति और स्पष्ट होती है।

दरअसल, पुलवामा आतंकी हमले की जिम्मेदारी लेने वाले आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र का यह फैसला भारत के लिए किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है। यह बात सर्वविदित है कि आतंकी मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने में भारत सरकार ने कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी थी, बावजूद इसके कि चीन, भारत की तमाम कोशिशों पर पानी फेरते हुए उसे (मसूद अज़हर) अब तक बचाता आया था।

जैश प्रमुख को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करवाने के प्रयासों पर विपक्ष ने हमेशा ही हमलावर रुख़ अपनाए रखा था। अब जब संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा आतंकी मसूद को वैश्विक आतंकवादी घोषित किया जा चुका है, तब भी विपक्ष शांत नहीं है।

हमेशा कुछ न कुछ कह देने की अपनी आदत से मजबूर कॉन्ग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह ने पीएम मोदी पर निशाना साधते हुए कहा है कि मसूद को आतंकवादी घोषित करने से क्या होगा? जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान, मोदी जी के साथ दोस्ती निभा रहे हैं, तो उन्हें अब दाऊद इब्राहिम, मसूद अज़हर और हाफ़िज़ सईद को भी भारत को सौंप देना चाहिए।  

भोपाल लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने वाले दिग्विजय सिंह ने कहा है कि सरकार को आतंकी मसूद अज़हर पर इनाम की घोषणा करनी चाहिए, जैसा कि यूपीए के समय में लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख हाफ़िज़ सईद पर किया गया था।

बता दें कि पिछले महीने, पाक पीएम इमरान खान ने कहा था कि अगर पीएम मोदी लोकसभा चुनाव के बाद एक बार फिर से भारत के प्रधानमंत्री बनते हैं तो दोनों देशों के बीच बातचीत का रास्ता खुल सकता है। इसके साथ ही इमरान खान ने यह भी कहा था कि भारत में अगर कॉन्ग्रेस पार्टी की सरकार बनती है, तो वह राइट विंग वाली पार्टी, बीजेपी से डर कर कश्मीर मुद्दे को पाकिस्तान के साथ बातचीत के ज़रिए हल करने से पीछे हट सकती है।

अब बात करते हैं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ की, जिन्होंने मसूद अज़हर को वैश्विक आंतकी घोषित किए जाने की टाइमिंग को लेकर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि मसूद अज़हर को वैश्विक आंतकी घोषित करने की प्रक्रिया काफ़ी लंबे समय से अटकी हुई थी। अच्छा हुआ यह हो गया। लेकिन, यह चुनाव के समय हुआ, मुझे नहीं पता कि इसका चुनावों से कुछ लेना-देना है कि नहीं?

कॉन्ग्रेस नेता कमलनाथ ने, भले ही अपने इन लफ़्ज़ों में मात्र शक़ ज़ाहिर किया हो कि मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित करने के लिए चुनाव के समय का ही चयन क्यों किया गया? लेकिन क्या इन्हें सच में नहीं मालूम है कि एक आंतकवादी को वैश्विक आंतकी घोषित करने की प्रक्रिया किसी व्यक्ति विशेष की मनमर्ज़ी पर निर्भर करती है, या इसके लिए किसी ठोस कार्रवाई की आवश्यकता भी होती है?

यह भी उल्लेखनीय है कि आतंकी मसूद को वैश्विक आतंकियों की सूची में शामिल करने का प्रस्ताव अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने पेश किया था। लेकिन, चीन ने हमेशा की तरह ही अपनी दोहरी नीति का अनुसरण करते हुए, अपनी वीटो पावर का इस्तेमाल कर के मसूद को वैश्विक आंतकी घोषित करने से बचाने का काम किया था, वो भी एक बार नहीं बल्कि चार बार।

भारत में विपक्ष के नेता, जिनका कि एकमात्र लक्ष्य ही मोदी सरकार को घेरना भर है, वो इन हालातों को बख़ूबी जानते और समझते हैं। लेकिन, अपनी वोट की राजनीति के मंतव्य को साधने के लिए वो जनता को भरमाने का काम करते हैं और निरंतर यह प्रचारित करने में जुटे रहते हैं कि मोदी राज में आतंकी मसूद को वैश्विक आंतकी घोषित करने से क्या होगा? साथ ही, यह सन्देश देने का भरसक प्रयास करते हैं कि पाक पीएम इमरान खान से उनका दोस्ताना व्यवहार है।अब क्या बयानवीर ‘दिग्गी’ राजा ये बताएँगे कि मोदी सरकार करे तो क्या करे?

अच्छा होता कि इनकी पार्टी का ही कोई समझदार और पढ़ा-लिखा नेता इन्हें यह समझा पाता कि हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से देश नहीं चलता है, लेकिन कोई समझाए भी तो कैसे, क्योंकि हाल ही में ‘दिग्गी’ ने यह बयान देकर सबको चकित कर दिया था कि नेहरू जी के बाद कॉन्ग्रेस ने लिखने-पढ़ने पर बहुत ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। उनके इस बयान से इस बात  का अंदाज़ा बख़ूबी लगाया जा सकता है कि वो जिस पार्टी के हैं, उन्हें वो ही नहीं भाती, क्योंकि वो पार्टी पढ़ने-लिखने की आदत से दूर हो चुकी है और उसमें विचारों का आदान-प्रदान नहीं होता है। इन हालातों में अगर कॉन्ग्रेस नेता अपना मानसिक संतुलन खो रहे हैं, जैसा कि उनके बयानों से झलकता भी है, तो ये कोई नई बात नहीं है। इसे गंभीरता से लेने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है।

वहीं, मध्य प्रदेश के CM गोभक्त कमलनाथ की ‘टाइमिंग’ वाले बयान पर एक ही बात समझ में आती है कि उनका ख़ुद का समय ही अच्छा नहीं चल रहा है। उनके भतीजे पर 1350 करोड़ रुपए की टैक्स चोरी का आरोप लगने के साथ-साथ बेटे नकुल नाथ और पत्नी प्रिया नाथ की सम्पत्ति में बढ़ोत्तरी भी उनकी चिंता का विषय बना हुआ है। साथ ही, मध्य प्रदेश में 50 ठिकानों पर छापेमारी के दौरान 281 करोड़ रुपए की बेहिसाब नकदी के रैकेट का पता लगने से जो उनकी किरकिरी हुई वो अलग।

इन सभी बातों के निष्कर्ष से यह कहा जा सकता है कि कॉन्ग्रेसी खेमे के इन वरिष्ठ बयानवीर नेताओं की चिंता का विषय कुछ और ही है, जो खुलकर तो सामने नहीं आता है, लेकिन उनके बेतुके बयान उनकी मन:स्थिति को अक्सर उजागर कर ही देते हैं।