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12-24-36 घंटे का निर्जला व्रत है छठ: नहाय-खाय के साथ आज शुरू हुआ धार्मिक आस्था का महापर्व

सूर्योपासना का महापर्व चैती छठ मंगलवार (अप्रैल 9, 2019) से नहाय-खाय के साथ शुरू हो गया। यह पर्व साल में दो बार मनाया जाता है। हिंदी पंचांग के अनुसार यह पर्व चैत्र माह और कार्तिक माह में मनाया जाता है। चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने की वजह से इस छठ को चैती छठ कहते हैं और कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले छठ पर्व को कार्तिक छठ कहा जाता है। यह त्योहार विशेष रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वांचल आदि क्षेत्रों में विशेष धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इसे बिहार, झारखंड के मुख्य पर्व के रूप में भी जाना जाता है।

छठ पूजा और व्रत पारिवारिक सुख-समृद्धि एवं मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए किया जाता है। स्त्री और पुरुष समान रूप से इसे कर सकते हैं। बता दें कि छठ पूजा का उत्सव चार दिनों तक चलता है। पहले दिन की शुरुआत नहाय-खाय के साथ चतुर्थी के दिन से होती है। नहाय-खाय के दिन छठ व्रती कच्चा चावल यानी अरवा चावल को पकाकर कद्दू (लौकी या घिया) की सब्जी और दाल के साथ खाते हैं। यह खाना नहाने के बाद खाया जाता है। व्रती इसी प्रसाद रूपी खाने को फिर लगभग 12 घंटे बाद रात में खाते हैं।

इस दिन इस खाने का विशेष महत्‍व होता है। परिवार के सभी सदस्य व्रत धारण करने वाले व्यक्ति के प्रसाद ग्रहण करने के बाद ही भोजन को प्रसाद के रूप में खाते हैं। नहाय-खाय के दिन से ही सूर्य देव के लिए प्रसाद बनाने के लिए गेहूँ, चावल आदि को धोकर धूप में सुखाया जाता है और फिर इसे हाथ से पीसकर प्रसाद बनाया जाता है।

दूसरे दिन पंचमी को खरना होता है। जिसे पूजा का दूसरा और कठिन चरण माना जाता है। इस दिन व्रती निर्जला उपवास रखते हैं। मतलब पिछले दिन की रात से लेकर खरना के रात तक व्रती को लगभग 24 घंटे निर्जला रहना होता है। पूरे दिन बिना जलग्रहण किए उपवास रखने के बाद सूर्यास्त होने पर व्रती पूजा करते हैं और उसके बाद एक ही बार दूध और गुड़ से बनी खीर खाते हैं। यह खीर मिट्टी के चूल्हे पर आम के पेड़ की लकड़ी जलाकर तैयार की जाती है। इसके बाद से व्रती का करीब 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है।

खरना के बाद तीसरे दिन षष्ठी को व्रती डूबते सूरज को अर्घ्य देते हैं। दिन भर घर में चहल-पहल का माहौल रहता है। इसी दिन व्रती ठेकुआ, खजूर, पूरी आदि बनाते हैं। फिर सभी व्रती सूप (डगरा) में नाना प्रकार के फल, ठेकुआ, खजूर, चावल के आटे के लड्डू और कई तरह की मिठाईयों के साथ तालाब या नदी पर जाकर पानी में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर आराधना करते हैं।

अंत में चौथे दिन यानि सप्तमी को सुबह सूर्योदय के समय भी सूर्यास्त वाली उपासना की प्रक्रिया को दोहराया जाता है। चौथे और अंतिम दिन छठ व्रती को सूर्य उगने के पहले ही फिर से उसी तालाब या नदी पर जाना होता है, जहाँ वे तीसरे दिन गए थे। इस दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर व्रती भगवान सूर्य से सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं और फिर परिवार के अन्य सदस्य भी सूर्यदेव को अर्घ्य देते हैं। इसके बाद विधिवत पूजा कर प्रसाद बाँट कर छठ पूजा संपन्न की जाती है। मतलब जो व्रती पंचमी की रात को दूध-गुड़ की खीर प्रसाद रूप में खाए थे और पानी पिए थे, वो फिर सप्तमी के दिन सुबह ही मुँह में पानी या प्रसाद जैसी कोई चीज ले सकते हैं – लगभग 36 घंटे नर्जला।

छठ पर्व में साफ-सफाई और पवित्रता का खासा ख्याल रखा जाता है। पूजा के चारों दिन उपवास के साथ नियम और संयम का पालन करना होता है। इस पूजा में कोरे और बिना सिले वस्त्र पहनने की परंपरा है।

चैती छठ में खासा धूम-धाम देखने को नहीं मिलता है। जबकि कार्तिक छठ में ज्यादा चहल-पहल होती है। ऐसा इसलिए क्योंकि कम ही व्रती चैती छठ करते हैं। गरमी के कारण कार्तिक छठ से ज्यादा मुश्किल होता है चैती छठ करना। 12 घंटे के बाद 24 घंटे और उसके बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत रखना गरमी के समय आसान नहीं होता। इस वजह से कार्तिक छठ की अपेक्षा चैती छठ करना थोड़ा सा मुश्किल हो जाता है।

केरल नन-रेप केस के आरोपित फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ SIT ने दाखिल की चार्जशीट

केरल नन रेप केस मामले में पुलिस की विशेष जाँच दल (एसआईटी) ने आरोपित फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दिया है। जाँच टीम के प्रमुख पुलिस महानिरीक्षक विजय साखरे ने कहा है कि बिशप फ्रैंको मुलक्कल पर 2014 से 2016 के बीच कई बार बलात्कार करने का आरोप है। ऐसे में अगर आरोप सिद्ध हुआ तो बिशप को उम्रकैद तक की सजा का सामना करना पड़ सकता है।

जाँच दल की ओर से दाखिल आरोप पत्र में 83 गवाहों के बयान शामिल हैं, जिसमें एक कार्डिनल, तीन बिशप, 11 प्रीस्ट और 25 नन शामिल हैं। बता दें कि बलात्कार और अप्राकृतिक यौन संबंध के आरोप में जालंधर के बिशप फ्रैंको मुलक्कल को गिरफ्तार भी किया गया था। कैथोलिक चर्च में यौन शोषण के खिलाफ आवाज उठाने के लिए ननों ने काफी कोशिश की है।

वहीं, विधायक पीसी जॉर्ज ने आरोपी बिशप का समर्थन करते हुए कहा कि जाँच अधिकारी फ्रैंको मुलक्कल को जबरदस्ती फँसाने की कोशिश कर रहे हैं। पीसी जॉर्ज ने कहा कि मेरे पास मुलक्कल के साथ नन के फोटो और वीडियो हैं, जो कि घटना वाले दिन ही क्लिक किए गए थे। उन्होंने कहा कि इन तस्वीरों में नन बिल्कुल खुश दिखाई दे रही है। पीसी जॉर्ज ने आगे कहा कि कानूनी बाध्यता होने के कारण वो ये तस्वीरें मीडिया के सामने नहीं दिखा सकते, लेकिन वो जाँच टीम के सामने ये सबूत प्रस्तुत करने के लिए तैयार हैं। इसके साथ ही विधायक ने जाँच अधिकारियों पर फोटोग्राफर को डराने का भी आरोप लगाया है।

गौरतलब है कि बीते दिनों पीड़ित नन के समर्थन में आईं 5 अन्य नन ने इंसाफ के लिए कई दिनों तक धरना-प्रदर्शन किया था। इनके समर्थन में आम लोग और कई अन्य संगठन भी प्रदर्शन में शामिल हुए थे। पूर्व बिशप फ्रैंको मुल्लकल के खिलाफ प्रदर्शन कर चुकीं 5 ननों ने कोट्टयम के पुलिस अधीक्षक (एसपी) से मुलाकात की थी। ननों ने उनसे कहा था कि ऐसी स्थिति पैदा न करें कि हमें दोबारा सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करना पड़े।

वैक्सिंग है मोदी की ‘चमक’ का राज़, हम तो मुँह धोकर चले आते हैं: कुमारस्वामी

कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारास्वामी ने प्रधानमंत्री मोदी के ‘चेहरे की शाइन’ का ‘राजफाश’ किया है। उनके अनुसार इसके पीछे मोदी के चेहरे की रोजाना वैक्सिंग और मेकअप है। इसीलिए मीडिया कुमारास्वामी सहित बाकी नेताओं को टीवी पर नहीं दिखाता, और इसी कारण से भाजपा प्रत्याशी मोदी के चेहरे पर वोट माँगते हैं।

चुनावी सभा में छलका ‘दर्द’

कर्नाटक के मुख्यमंत्री कुमारास्वामी उत्तर बंगलूरु लोकसभा क्षेत्र में कॉन्ग्रेसी प्रत्याशी कृष्ण बी गौड़ा के समर्थन में चुनावी जनसभा को संबोधित कर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने यह कहा कि मोदी का चेहरा इसलिए चमकता रहता है क्योंकि रोज सुबह या किसी से मिलने से पूर्व उनका मेकअप और चेहरे की वैक्सिंग होती है। वहीं वह (और अन्य ‘आम’ नेता) एक बार सुबह नहा कर निकलते हैं तो फिर अगले दिन सुबह ही नहाते हैं। इसीलिए उनका चेहरा टीवी पर अच्छा नहीं लगता और मीडिया उन्हें दिखाना पसंद नहीं करता

‘मोदी ₹80,000 का मशरूम खाते हैं, पहले काले थे’

यह पहली बार नहीं है जब मोदी के चेहरे के ‘ग्लो’ पर विपक्ष ने अपनी नाराजगी जाहिर की है। इससे पहले गुजरात के पिछले विधानसभा चुनावों (2017) के दौरान कॉन्ग्रेसी नेता अल्पेश ठाकोर ने भी मोदी के चेहरे की चमक पर हमला बोला था

उन्होंने यह आरोप लगाया था कि मोदी ऐसे महंगे मशरूम मंगा कर खाते हैं जो ₹80,000 प्रति नग के पड़ते हैं, और मोदी ऐसे 5 मशरूम रोज़ खाते हैं। यानि उनके आरोप के अनुसार मोदी ₹4,00,000 के 5 मशरूम रोजाना खाते हैं। उन्होंने यह आरोप भी लगाया था कि मोदी पहले काले थे, और इन्हीं मशरूमों से वह गोरे हुए हैं।

बाबा साहब आज अगर जिन्दा होते, तो ये देखकर खुद को ही चाबुक मार रहे होते

भारत जैसे देश में अक्सर मत, धर्म, सम्प्रदाय आदि पर चर्चा और बहस देखना बहुत स्वाभाविक बात है। इसी क्रम में सरकार पर विपक्ष द्वारा आरोप भी लगाए जाते रहते हैं कि सम्प्रदाय और जातियों और समाज को तोड़ने में उसका हाथ रहता है। जब-जब वर्तमान सरकार पर इस प्रकार के आरोप कॉन्ग्रेस द्वारा लगाए गए, तब ऐसा प्रतीत होता है, मानो क़तील शिफ़ाई की ग़ज़ल पढ़ते हुए कॉन्ग्रेस कह रही हो ‘ले मेरे तजरबों से सबक़ ऐ मिरे रक़ीब, दो-चार साल उम्र में तुझ से बड़ा हूँ मैं।”

चाहे दैनिक सस्ते इंटरनेट को श्रेय दीजिए, नेहरू के समाजवाद को श्रेय दीजिए या फिर कंधे पर ढोकर भारत देश में कंप्यूटर ले आने वाले राजीव गाँधी को श्रेय दीजिए, मोदी सरकार के दौरान डिजिटल इंडिया खूब फला-फूला है। इसी का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर सब लोगों ने अपने अपने तरीके से जमकर किया है।

इसी डिजिटल क्रान्ति का एक नमूना ट्विटर पर आज फिर से ट्रेंड करने लगा और इस विचारधारा के अनुयायियों द्वारा द्वारा बेहद तत्परता से इस तस्वीर को बड़े स्तर पर फैलाया जा रहा है।

इस तस्वीर में किसी कुत्सित मस्तिष्क के रचनाकार ने भारत देश के संविधान के वास्तुकार कहे जाने वाले बाबा साहब अम्बेदकर के हाथों में चाबुक थमाया है और यह दर्शाया गया है कि वो बंधक बनाए गए हिन्दू देवताओं, राम और श्री कृष्ण को कोड़े (चाबुक) मार रहे हैं। निश्चित रूप से यह चित्र घृणित, उन्मादी मानसिकता की उपज से ज्यादा और कुछ भी नहीं है।

अक्टूबर 20, 2018 को ट्विटर पर बाबा साहब के नाम पर चल रहे एक ट्विटर यूज़र ने इस तस्वीर को पोस्ट किया था और आजकल चुनाव से ठीक पहले यह दुबारा शेयर की जा रही है। समाज को तोड़ने के लिए इस तरह के प्रपंच गढ़ने वाले लोग कौन हैं और उन्हें किसने शरण प्रदान की है? सेक्युलर देश में हिन्दुओं की आस्थाओं को निशाना बनाने के लिए इतना उतावलापन क्यों है? इस धर्म निरपेक्ष देश में हर दूसरे मुद्दे पर अक्सर हिन्दू आस्थाओं का अपमान करना क्यों इतना आसान है? कभी हिन्दुओं के त्योहारों का मजाक बनाया जाता है तो कभी त्रिशूल जैसे प्रतीकों का उपहास बनाया जाता है। क्या बाबा साहब का इस तरह से चित्रण करने वाले को यह आभास भी है कि उसकी इस घटिया हरकत पर खुद बाबा साहब कितने दुखी होते? क्या धार्मिक प्रतीकों द्वारा अपनी कुंठा की अभिव्यक्ति करने वाले जानते हैं कि बाबा साहब ने कहा था कि भविष्य में समाज को धर्म से ही नैतिकता सीखनी होगी?

इस तस्वीर को चुनाव से ठीक पहले सोशल मीडिया पर फैलाया जा रहा है, जिसका मकसद सिर्फ प्रायोजित तरीके से सामाजिक टकराव पैदा करना है

नवीन समाज में धर्म की आवश्यकता प्राचीन समाज से कहीं अधिक होगी: अम्बेदकर

अम्बेदकर के नाम पर अपनी घृणित विचारधारा को बेचने वालों को यह जानना आवश्यक है कि हालाँकि अम्बेदकर ने धर्म में निहित सामाजिक भेदभाव की निंदा की लेकिन वो धर्म को समाज का आधार मानते थे। अम्बेदकर एक ओर जहाँ इस बात से असहमत थे कि सभी धर्म अच्छे हैं, वहीं दूसरी ओर उनका विचार था कि धर्म जीवन के लिए अपरिहार्य है और सार्वजनिक जीवन में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

हमारे समय के सबसे बड़े संविधानवादी और विधिक सुधारक यानी, बाबा साहब के ही यह विचार थे, जिन्हें बहुत कम प्रकाश में लाया गया है। हिन्दू देवताओं का अपमान कर सामाजिक सद्भाव बढ़ाने वाले ‘विचारकों’ को जानना चाहिए कि यह बात भी उन्ही बाबा साहब ने ही कही है कि धर्म की आलोचना की जा सकती है लेकिन, उन्होंने धर्म को कभी खारिज नहीं किया और ना ही नकारा।

मार्क्स की तर्ज पर ही ‘मेरा कोई देश नहीं है’ कहने वाले अम्बेदकर के नाम पर हिन्दुओं को अपमानित करने वाले, सड़कों पर उपद्रव मचाने वाले और मनु स्मृति की फोटोकॉपी जलाने वाले शायद अम्बेदकर को वास्तव में नहीं जानते हैं, और यह भी निश्चित है कि उन्होंने मनु स्मृति की तरह ही अपने विचारों के पुरोधा को भी कभी नहीं पढ़ा है। महात्मा गाँधी से जब बाबा साहब ने ‘मेरा कोई देश नहीं है’ कहा था तो उनका तात्पर्य हमेशा श्रमिक से से होता था, यानि श्रमिक वर्ग का कोई देश नहीं होता। ठीक इसी तरह से उन्होंने समाज के किसी देवता के प्रति आस्था नहीं जताई थी, भले ही उन्होंने कभी हिन्दू प्रतीकों को कोड़े मारने के विचार को भी तवज्जो नहीं दी थी।

लेकिन, यह श्रमिक आधुनिक है। इस प्रकार के चित्रण द्वारा अपने मन का द्वेष निकालने वाले ये श्रमिक मात्र अपनी घृणा को कागज पर रख रहे होते हैं। वास्तव में वे एक ऐसा वर्ग तैयार करना चाहते हैं, जो उनकी इसी विचारधारा को युगों तक सराहे, जो बाबा साहब जैसे किसी नाम से जन्म लेकर किसी दुराग्रही की रचनात्मकता के नाम से बाजार में बेची जा सके।  

आर्य-अनार्य सिध्दांत से लेकर आरक्षण तक के मूल में कॉमन क्या है?

भारत देश की आज़ादी के संघर्ष में सबसे देर से कूदने वालों में से एक नाम बाबा साहब अम्बेदकर का भी था। आरक्षण जैसी दलीलों के वक़्त कॉन्ग्रेस द्वारा अम्बेदकर से अक्सर यह प्रश्न भी किए गए कि वो भारतीय जनमानस को आखिर कितना समझते हैं? यह वो समय था जब आरक्षण जैसी कमजोर कड़ी को ब्रिटिश हुकूमत ने भाँप लिया था। इस समाज में वर्तमान में दलित और सवर्ण की लड़ाई में मेनस्ट्रीम मीडिया ने बड़े स्तर पर झोंके का प्रयास किया है। कॉन्ग्रेस अक्सर दावे करती है कि सामाजिक एकता को तोड़ने और वोट बैंक की खातिर होने वाले दंगे अक्सर सरकार द्वारा प्रायोजित होते हैं। लेकिन हिन्दू धर्म के भीतर ही इतने बड़े बँटवारे को हवा मात्र एक दिन में ही नहीं दी गई। इसके लिए मैक्समूलर के सिद्धांतों, आर्य-अनार्य सिद्धांत से लेकर बाबा साहब अम्बेदकर को इस विभाजन का पूरा श्रेय दिया जा सकता है। हालाँकि, भीमराव अम्बेदकर को इतने बड़े विभाजन के लिए मैक्समूलर जितना जिम्मेदार इसलिए भी नहीं ठहराया जाना चाहिए क्योंकि अक्सर बाबा साहब के विचारों का सही तरह से जनता और समाज तक प्रतिपादन ही नहीं किया गया।

अम्बेदकर की ‘फिलाॅसफी ऑफ़ हिन्दुइज़्म’ में भी धर्म मानव जीवन का मूल हिस्सा था

वर्तमान समय में दलितों के सबसे बड़े चिंतक माने जाने वाले अम्बेदकर ने 1950 में लिखे अपने लेख ‘फिलाॅसफी ऑफ़ हिन्दुज़्म’ (हिंदुत्व का दर्शन) में लिखा था कि धर्म, मानव समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा इसलिए है, क्योंकि वह मानव जीवन के आधारभूत प्रश्नों से जुड़ा हुआ है, जिनमें जन्म और मृत्यु, भोजन और रोग आदि शामिल हैं। इसमें बाबा साहब ने प्रकाश डालते हुए नवीन और प्राचीन समाज में धर्म की आवश्यकता के विवरण पर लिखा था, “आधुनिक समाज को पुरानी दुनिया की तुलना में धर्म की कहीं अधिक जरूरत है।’’ उनका तात्पर्य था कि नैतिकता के रूप में धर्म, आधुनिकता की जरूरत हमेशा है। शायद इसी वजह से उन्होंने बौद्ध धर्म भी स्वीकारा।

क़ानून समाज को बदलने के लिए काफी नहीं: अम्बेदकर

अम्बेदकर का कहना था कि आधुनिक समाज को धर्म की जरूरत इसलिए है, क्योंकि विधि यानी, कानून, जो कि व्यवस्थाओं का संकलन है और जिसमें हम आधुनिक लोग बहुत अधिक विश्वास करते हैं, समाज को बदलने के उपकरण के रूप में अप्रभावी और अविश्वसनीय है। अम्बेदकर ने लिखा था, ‘‘कानून का उद्धेश्य अल्पसंख्यकों को सामाजिक अनुशासन के दायरे में रखना है। बहुसंख्यकों को तो नैतिकता के सिद्धांतो के आधार पर अपने सामाजिक जीवन का संचालन करने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए और छोड़ देना पड़ता है। इसलिए नैतिकता के अर्थ में धर्म, हर समाज का शासी सिद्धांत होना चाहिए।‘‘

क्या मनुस्मृति जला देने से सामाजिक बराबरी हासिल की जा सकती है?

मनुस्मृति जलाकर और हिन्दू आस्थाओं को ठेस पहुँचाकर अल्पकालिक रोष व्यक्त करते हुए अक्सर दलित समाज भूल जाता है कि वह कोई बड़ा परिवर्तन नहीं ला रहे हैं बल्कि इस अंतराल को और बढ़ा रहे हैं। जिस भीमराव अम्बेदकर का हवाला देकर अक्सर हिन्दू देवी देवताओं का अपमान करने वाले आगे बढ़ रहे हैं, उन बाबा साहब के विचार पढ़े जाने चाहिए। अम्बेदकर के अनुसार, “जहाँ तक मेरा संबंध है, मेरे विचार से इस मत का अनुसरण करके आगे बढ़ना उचित होगा कि यदि किसी भी आंदोलन अथवा संस्था का दर्शन जानना है, तब उस संस्था और आंदोलन के अंतर्गत जो क्रांतियाँ आई हैं, उनका आवश्यक रूप से अध्ययन किया जाए। क्रांति दर्शन की जननी है, चाहे उसे दर्शन की जननी न भी माना जाए, फिर भी वह ऐसा दीप है, जो दर्शन को प्रकाशयुक्त बनाता है। धर्म भी इस नियम का अपवाद नहीं हो सकता। इसलिए मेरी दृष्टि से सबसे अच्छा तरीका यही है कि यदि हम किसी धर्म के दर्शन का मूल्यांकन करना चाहते हैं और इसके लिए कोई कसौटी निश्चित करना चाहते हैं, तब उस धर्म में जो क्रांतियाँ आई हैं, उनका अध्ययन करें। यही एक तरीका है, जिसे मैं अपनाना चाहता हूँ।”

सभ्य समाज में नैतिकता को धर्म के कारण पवित्रता प्राप्त होती है: अम्बेदकर

अम्बेदकर के शब्दों को मैं हूबहू रख रहा हूँ, ताकि उन्हें उन्हीं के शब्दों में पढ़कर समझा आ सके। धर्म और नैतिकता पर अम्बेदकर ने लिखा, “धर्म में ईश्वर की कल्पना का उदय कब और कैसे हुआ, यह कहना संभव नहीं है। यह तो हो सकता है कि ईश्वर की कल्पना का मूल समाज के महान व्यक्ति की पूजा में हो, जिससे मनुष्य की जीवित ईश्वर में श्रद्धा का, यानि किसी सर्वश्रेष्ठ को देखकर ईश्वर मानने के आस्तिकवाद का उदय हुआ होगा। यह हो सकता है कि ईश्वर की कल्पना, यह जीवन किसने बनाया है, जैसे दार्शनिक विचार के फलस्वरूप अस्तित्व में आई होगी, जिससे एक सृष्टि के निर्माणकर्ता के रूप में, उसे बिना देखे मानने से ईश्वरवाद का उदय हुआ होगा। धर्म और नैतिकता का संबंध कैसे स्थापित हुआ। यह संबंध धर्म और ईश्वर के बीच स्थापित संबंध से भी अधिक स्वाभाविक और दृढ़ है, परंतु फिर भी धर्म और नैतिकता, इन दोनों का मिलन नियमित रूप से कब हुआ, यह बताना कठिन है। चाहे कुछ भी हो, यह वस्तु स्थिति है कि सभ्य समाज का धर्म और आदिम समाज का धर्म दो महत्त्वपूर्ण कारणों से भिन्न-भिन्न हैं। सभ्य समाज में ईश्वर का धर्म की योजना में समावेश है। सभ्य समाज में नैतिकता को धर्म के कारण पवित्रता प्राप्त होती है।”

इस तरह के विवादित चित्र देखकर पता चलता है कि भीमराव अम्बेदकर को हम सबने कितने गलत तरीके से पढ़ा है। हमने उनके नाम पर समाज को सवर्ण और दलित के टकराव में झोंका है। हमने अम्बेदकर की गलत व्याख्या करने का मार्ग चुना है, उनके नाम पर भड़क कर सड़कों पर अराजकता फैलाई है। पवित्र मानकों को अपमानित कर एक बड़े हिस्से को ठेस लगाकर हम बाबा साहब अम्बेदकर के दोषी बन चुके हैं।

समाज में जाति के नाम पर होने वाले दंगों के बारे में देश की सबसे प्राचीन पार्टी कॉन्ग्रेस की मानें तो यह सब नेताओं द्वारा कराया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि दलित आंदोलन, साम्प्रदायिक हिंसाएँ, ये सब एक तरह से काँग्रेस ने फिरौती की तरह इस्तेमाल की हैं, जिसे वो अपने वोट बैंक से उन्हें सत्ता न सौंपने के जुर्म में वसूलती है। वर्ष 2018 में देखा गया कि अप्रैल के माह बड़े स्तर पर उत्पात और अराजकता फैलाई गई और दोष सरकार पर थोपने के प्रयास किए गए। कॉन्ग्रेस नेताओं ने मौका तलाशकर धरना और अनशन किया, शाम होते ही जमकर दावत उड़ाने की खबरें सोशल मीडिया पर पढ़ने को मिलीं। अनशन के नाम पर छोले-भटूरे उड़ाने वाले कॉन्ग्रेस के नेताओं की तस्वीरें वायरल हुई।

इस तरह से कॉन्ग्रेस के भीतर महात्मा गाँधी आज भी विद्यमान देखे गए, लेकिन कारण इस बार भिन्न थे! एक बापू थे, जिन्होंने जब अनशन किया था तो अंग्रेजों के हाथ-पाँव फूल गए थे, और एक ये कॉन्ग्रेस के नेता भी थे, जिनके अनशन से उनके अपने ही पेट फूल गए थे। देश काल वातावरण कुछ भी हो, कॉन्ग्रेस हमेशा गाँधी के नाम को प्रासंगिक कर ही देती है।

हिन्दुओं की आस्थाओं को ठेस लगाना नहीं है विकल्प 

दलित समाज के अग्रणी नेता अक्सर उस संविधान के खिलाफ शहर जला देते हैं, जिसे बाबा साहब अम्बेदकर ने लिखा था। खुद को दलित समर्थक बताकर अपनी आवश्यकतों के अनुरूप बाबा के विचारों को मानना और फिर उनका तिरस्कार करना भी समाज की आस्थाओं का अपमान है। दंगे करना, आग लगाना, शहर जलाना समाधान नहीं है, ना ही सोशल मीडिया पर हिन्दू देवताओं को कोड़े मारने जैसी विकृत मानसिकता से बदलाव आ सकेगा। बाबा को मानने वालों को जानना चाहिए कि ऐसा करना संविधान का अपमान है, वही संविधान जिसके वास्तुकार स्वयं बाबा साहब हैं।

शोषण के मूल को ही जड़ से मिटा दिया जाना एक अच्छा विकल्प हो सकता है, हमें वो जातियाँ सरेंडर कर देनी चाहिए जिनके नाम पर हम कभी आरक्षण लेते हैं, तो कभी विक्टिम कार्ड खेलकर शहर और कस्बों को जला देते हैं। सरकारी काम-काज में जाति वाले कॉलम को छोड़ देने पर परिवर्तन का पहला कदम कहा जा सकता है। वैसे भी संविधानवाद के बावजूद भी वर्ण और जाति व्यवस्थाएँ संविधान का खुला उपहास है और यह संविधान के अस्तित्व को आधारहीन बना देता है।

ऐसा किया जाना जरुरी है, ताकि देश का प्रथम नागरिक भी आजादी के वर्षों बाद भी अपनी जाति के बजाए अपनी योग्यता और पद से पहचाना जा सके, UPSC में नाम लाने वालों को उनकी उपलब्धि के लिए पहचान मिल सके, वरना हमेशा डिबेट का केंद्र संघर्ष से बदलकर जाति में ही तब्दील होता रहेगा। ये उसी तरह की क्रान्ति है, जिसके बारे में बाबा साहब अपनी पुस्तक में लिख चुके हैं। जो परिवर्तन इतने वर्ष नहीं आया, वो किसी घृणित चित्रण को वायरल कर के नहीं बल्कि इस प्रकार के समाधानों से ही आ सकेगा।

1 नंबर की झूठी और धूर्त है शबाना: नवरात्रि पर हिंदू देवी-देवताओं के नाम का सहारा लेकर उड़ाया था मजाक

छद्म धर्मनिरपेक्षता की झंडाबरदार, स्वघोषित ‘निष्पक्ष’ वामपंथी ‘बौद्धिक’ शबाना आज़मी, का आज फिर से एक नया पाखंड सामने आया है। ये पहली बार नहीं है जब शबाना या उनके पति जावेद अख्तर का हिन्दुओं की भावना आहत करने वाला कोई कारनामा बाहर आया हो, ऐसा पहले भी हो चुका है। हालाँकि, सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक इन्फोग्राफिक पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए, शबाना ने लिखा कि उन्होंने ऐसा कभी नहीं कहा।

वायरल उद्धरण में लिखा है कि इस नवरात्रि, मैं अल्लाह से दुआ करती हूँ कि लक्ष्मी को भीख न माँगना पड़े, कोई दुर्गा गर्भ में न मरे, न पार्वती को दहेज देना पड़े, न सरस्वती को शिक्षा से वंचित किया जाए और न ही किसी काली को ‘फेयर एंड लवली’ की ज़रूरत पड़े। इंशाल्लाह!

मजेदार बात यह कि शबाना आज़मी ने अपनी ‘लिबरल’ साख को ठेस पहुँचाकर साम्प्रदायिक रंग देने के लिए ‘ट्रोल्स’ को जिम्मेदार ठहराया है और कहा कि फर्जी उद्धरण के साथ चुनाव में ध्रुवीकरण करने की कोशिश की जा रही है।

हालाँकि, शबाना को जल्द ही पता चल गया कि सोशल मीडिया के दौर में झूठ बोलकर बच निकलना थोड़ा मुश्किल है। खास तौर पर तब जब यह एक पुराने ‘हिंदूफोबिक’ पोस्ट के बारे में हो।

सोशल मीडिया यूजर ने उन्हें जल्द ही यह बता दिया कि यद्यपि उद्धरण में ‘अल्लाह’ शब्द का गलत इस्तेमाल किया गया था, लेकिन शबाना ने वास्तव में 2017 में दुर्गा अष्टमी के अवसर पर बिलकुल ऐसा ही पोस्ट किया था।

शबाना ने ट्वीट किया था, ”इस दुर्गा अष्टमी, आइए हम प्रार्थना करें कि किसी दुर्गा का गर्भपात न हो, किसी भी सरस्वती को स्कूल जाने से न रोका जाए, किसी लक्ष्मी को पति से भीख नहीं माँगनी पड़े, किसी भी पार्वती को दहेज के लिए बलि नहीं दी जाए और न ही किसी काली को फेयरनेस क्रीम के ट्यूब की ज़रूरत पड़े।” बता दें कि 29 सितंबर, 2017 को यह ट्वीट किया गया था।

ट्विटर पर कई लोगों ने शबाना को कायदे से याद दिलाते हुए कहा कि याद करिए आपने कब ऐसा ही ट्वीट पोस्ट किया था, जो महिला सशक्तिकरण की आड़ में हिंदू विश्वास पर घृणित हमला करने की एक बेहूदी कोशिश थी। यह हमला शबाना ने हिंदू देवी-देवताओं के नामों का उपयोग करते हुए नवरात्रि के दुर्गा अष्टमी के अवसर पर बड़ी धूर्तता के साथ हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाया था।

जब शबाना ने ट्वीट किया था, तो कई लोगों ने उन्हें तब भी ध्यान दिलाया था कि आपने मुस्लिम महिलाओं के साथ होने वाले अन्याय और उत्पीड़न को तो इसमें शामिल नहीं किया और आम सामाजिक बुराइयों के लिए सिर्फ हिंदुओं को शर्मसार करने का प्रयास किया। आप इतना पाखण्ड कर कैसे लेती हैं?

हमने फैक्ट चेक में पाया कि यह बात सही है कि नवरात्रि पर शबाना के स्टेटमेंट में अल्लाह और इंशाल्लाह शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया गया था। शबाना के ट्वीट का अनुवाद करके इंफोग्राफिक बनाने वाले ने ‘lets pray’ से यह निहितार्थ निकाला था और प्रार्थना की जगह ‘अल्लाह से दुआ’ का इस्तेमाल किया था। बाकी सभी बातें (शब्दशः) शबाना ने अपने 2017 के ट्वीट में कही थी। इसलिए शबाना का यह सफाई देना कि ‘I have NEVER said this’ – एक झूठ नहीं बल्कि महाझूठ है।

₹767 करोड़ की हेराफेरी पर मीडिया की चुप्पी घातक, चुनावी मौसम में लोकतंत्र का चौथा खंभा धराशाई

भ्रष्टाचार पर बड़ी-बड़ी बातें होती हैं। मीडिया सत्ताधारी दल और मौजूदा केंद्र सरकार से सवाल पूछ-पूछ यह साबित करना चाहती है कि वो जागरूक है। ऐसा ही वाकया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एबीपी इंटरव्यू के दौरान हुआ। ऐसे फर्जी सवालों पर उन्होंने कहा, – राफेल पर मीडिया सुप्रीम कोर्ट, फ्रांस सरकार और कैग जैसी संस्थाओं की बातों को नज़रअंदाज़ करते हुए एक पार्टी विशेष द्वारा खड़े किए गए झूठ पर चिल्लाती रही। एक ऐसे मुद्दे पर सरकार से सवाल पूछे जाते रहे, जिस पर सरकार को सुप्रीम कोर्ट से क्लीन चिट मिल चुकी है, कैग द्वारा सरकार की बातों को सत्यापित किया जा चुका है और फ्रांस के राष्ट्रपति द्वारा मीडिया रिपोर्ट्स को नकारा जा चुका है। लेकिन, राफेल में भ्रष्टाचार की बात करनेवाले नेताओं से कभी नहीं पूछा गया कि वो किन सबूतों और गवाहों के आधार पर ये आरोप लगा रहे हैं?

इनकम टैक्स छापों में क्या-क्या मिला? पढ़िए एजेंसी का आधिकारिक स्टेटमेंट

अब ताज़ा मामले पर आते हैं। भ्रष्टाचार, हवाला, बेनामी संपत्ति, अवैध लेनदेन और चुनाव के दौरान धन का दुरुपयोग सहित अरबों की हेराफेरी के कई मामले उजागर हो रहे हैं और शक की सूई कई बड़े नेताओं पर है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के क़रीबी अधिकारी के ठिकानों पर छापा पड़ा और कई अहम ख़ुलासे हुए। गाँधी परिवार के ख़ासमख़ास अहमद पटेल के क़रीबी के यहाँ छापेमारी हुई और कई राज़ पता चले। सबसे पहले इस पूरे घटनाक्रम को समझते हैं कि कहाँ से क्या बरामद हुआ और कौन सा तार कहाँ जुड़ा हुआ है।

इनकम टैक्स की छापेमारी: अब तक क्या हुआ?

सोमवार (अप्रैल 8, 2019) देर शाम एसएम मोईन क़ुरैशी के घर पर आयकर विभाग की रेड पड़ी। मोईन क़ुरैशी कौन है? वह कॉन्ग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय कार्यालय में कर्मचारी है। वह कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता अहमद पटेल का क़रीबी है। उसके यहाँ छापेमारी की सूचना से बेचैन अहमद पटेल रात को 10 बजे क़ुरैशी के घर पहुँचे। क़ुरैशी के घर में सोफा पर बैठ कर मोबाइल फोन चला रहे अहमद पटेल की फोटो देखी जा सकती है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क़ुरैशी के यहाँ छापा क्यों पड़ा? ऐसा इसलिए, क्योंकि जाँच एजेंसियों को सूचना मिली थी कि उसके यहाँ किसी बड़े प्रमुख पार्टी के नेताओं के 20 से 30 करोड़ रुपए पड़े हो सकते हैं। चूँकि वो खुद कॉन्ग्रेस नेता है, तो ये रुपए किस पार्टी के हो सकते हैं?

20 घंटे से भी अधिक देरी तक चली छापेमारी में आयकर विभाग को कई अहम जानकारियाँ मिलीं। उसके घर से कई दस्तावेज भी मिले। और तो और, इस छापे को कवर करने पहुँचे मीडियाकर्मियों को पिटवाया गया। एक महिला तक को नहीं बख्शा गया। लोकतंत्र का चौथा खम्भा अपने ही लोगों की पिटाई पर चुप है, पता नहीं क्यों? एक कॉन्ग्रेस नेता के घर के बाहर पत्रकारों की पिटाई होती है, महिला के साथ बदतमीजी होती है, लेकिन चारों ओर सन्नाटा है। कैमरामेन के कैमरे तोड़ दिए जाते हैं। इस पर हम आगे कुछ और गंभीर सवाल करेंगे लेकिन पहले मामले को समझते हैं। अहमद पटेल से किसी ने कुछ भी सवाल नहीं किया। वो क़ुरैशी के घर किस हड़बड़ी में पहुँचे थे? क़ुरैशी के यहाँ उनका कौन सा हित दाँव पर था? आयकर विभाग से उन्हें क्या डर है?

आनन-फानन में रात को क़ुरैशी के घर पहुँचे अहमद पटेल

आयकर विभाग की बातों पर गौर करें तो क़ुरैशी ने हवाला के जरिए 20 करोड़ रुपए प्राप्त किए और उसे कॉन्ग्रेस मुख्यालय पहुँचाया। सब कुछ साफ़ है लेकिन मीडिया में सन्नाटा है। ऑपइंडिया के ख़ुलासे पर देश के वित्त मंत्री का प्रेस कॉन्फ्रेंस को ब्लैकआउट करने वाले मीडिया को जब पीएम द्वारा आइना दिखाया जाता है तो वो तिलमिला उठता है। 4 राज्यों के 52 ठिकानों पर पड़े रेड में 300 से भी अधिक इनकम टैक्स अधिकारियों ने हिस्सा लिया। आयकर विभाग भाजपा नहीं है। आयकर विभाग मोदी नहीं है। यह एक सरकारी एजेंसी है, एक संस्था है। यह कॉन्ग्रेस के समय भी थी – काम करती थी, काम करती रहेगी।

मध्य प्रदेश में सीएम कमलनाथ के विशेष कार्याधिकारी (OSD) प्रवीण कक्कड़ के घर पर छापा मारा गया। उसके दो अन्य क़रीबियों अश्विन शर्मा और प्रतीक जोशी के ठिकानों पर भी आयकर विभाग की रेड पड़ी। यह बहुत बड़ा नेक्सक्स है। इसके तार मीडिया से भी जुड़े होने से इनकार नहीं किए जा सकते। अगर ऐसा नहीं होता तो मीडिया सवाल पूछती। अगर बिना सबूत राफेल पर सवाल करना जायज है तो सबूत सामने पड़े होने के बावजूद आँख मूँद लेना प्रोपेगंडा है, ऐसे गिद्धों पर लानत है। भोपाल, गोवा, इंदौर से लेकर दिल्ली तक फैले इस नेक्सस के अवैध लेनदेन का कारोबार व्यापक है, विस्तृत है।

मुख्यमंत्री कमलनाथ के साले दीपक पुरी द्वारा फेक बिल का प्रयोग कर के 242 करोड़ रुपए को डॉलर में बदलने की बात पता चली है। एक डायरी भी मिली है, जिसमें ये जिक्र है कि रुपया कहाँ-कहाँ से आया और कहाँ-कहाँ गया। मध्य प्रदेश में छापों के दौरान 281 करोड़ रुपए के अवैध लेनदेन की बात पता चली है। इनकम टैक्स ने एक के बाद एक ट्वीट कर आधिकारिक रूप से स्थितियों को साफ़ किया है। तुग़लक़ रोड में एक सीनियर नेता के आवास से 20 करोड़ रुपया एक बड़े पार्टी के मुख्यालय भेजा गया। तुग़लक़ रोड में किस बड़े नेता का घर है? मीडिया पूछेगी? प्राइम टाइम होगा? मामला अरबों का है। ये देश का रुपया है। एजेंसियाँ पता करने में लगी हुई हैं लेकिन मीडिया अपना काम नहीं कर रही।

आईटी विभाग का ये कहना भी गंभीर है कि इस नेक्सस में बड़े नेता, व्यापारी और अधिकारी सहित कई प्रोफेशन के लोग शामिल हैं। इनके तार हर जगह हैं। किसका कितना रुपया कहाँ लगा है, ये पता लगने के बाद ही इस नेक्सस का पर्दाफाश हो पाएगा। इन छापों में कई शराब की बोतलें मिली हैं। 14.6 करोड़ रुपए नकद ज़ब्त किए गए हैं। मीडिया के वर्ग विशेष में शामिल कई लोगों का मानना है कि कॉन्ग्रेस सांसद अहमद पटेल के आरोपों से घबराए मोदी ने उनके क़रीबी के घर छापा मरवाया है। अगर ऐसा है तो क्या आयकर विभाग के अधिकारी वो सारे दस्तावेज अपने साथ लेकर गए थे, जो क़ुरैशी के घर से मिला? कल को ये गिरोह विशेष यह भी कह सकता है कि आईटी विभाग ने चुपके से रात में मोदी के कथित दुश्मनों के घर रुपया रख दिया और सुबह जाकर पकड़ लिया।

मध्य प्रदेश में पड़े छापों में कई हथियार मिले, जानवरों की खालें मिली। ये सारी क़ीमती चीजें होती हैं। कई हाथ से लिखे दस्तावेज, कंप्यूटर फाइल्स, एक्सेल शीट्स आयकर विभाग के हाथ लगे हैं, जिनसे और भी कई ख़ुलासे होने की उम्मीद है। दिल्ली में क़ुरैशी के घर से एक कैशबुक मिला है, जिसमें 230 करोड़ रुपए के अवैध लेनदेन का पता चला है। आइए एक लिस्ट बनाते हैं और देखते हैं कि अब तक के छापों में क्या मिला:

  • दिल्ली: एक कैशबुक, जसमें 242 करोड़ रुपयों के अवैध लेनदेन की रिकॉर्डिंग है।
  • दिल्ली: बोगस बिलिंग के द्वारा 230 करोड़ रुपए की वसूली के दस्तावेज मिले।
  • टैक्स हैवन कहे जाने वाले देशों में 80 कम्पनियाँ होने की बात पता चली।
  • दिल्ली में कई पॉश वीआईपी इलाक़ों में अवैध सम्पत्तियाँ होने के सबूत मिले।
  • आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन किया गया, मामला चुनाव आयोग के पास भेजा गया है।
  • मध्य प्रदेश: व्यापारियों, नेताओं, अधिकारियों के एक सुव्यवस्थित रैकेट के बीच अवैध 281 करोड़ रुपए का पता चला।
  • 20 करोड़ रुपया दिल्ली में एक बड़े नेता के घर से एक प्रमुख राजनीतिक पार्टी के मुख्यालय भेजा गया।
  • डायरी, कंप्यूटर फाइल्स, एक्सेल शीट्स मिले जो उपर्युक्त की पुष्टि करते हैं।
  • 14.6 करोड़ रुपए नक़द बरामद किए गए।
  • 252 शराब के बोतल मिले, जानवरों की खालें मिली, और कई हथियार बरामद किए गए।

गर अभी तक मिले कुल अवैध रुपयों के हिसाब-किताब को जोड़ दें तो ये 767 करोड़ रुपया आता है। ऊपर से ज़ब्त चीजों को भी जोड़ दें तो ये रक़म आसमान छूने लगेगी। 80 कंपनियों में किसका कितना अवैध रुपया लगा है, किसके कितने शेयर्स हैं, उनका प्रयोग कर के कितना कालाधन सफ़ेद किया गया होगा, इसका तो कोई हिसाब-किताब ही नहीं है। ‘द हिन्दू’ में आज एन राम का नया लेख आया है। कॉन्ग्रेस वाले भी उस पर अब प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं कर रहे। वो भी बोर हो चुके हैं। सत्यहिंदी कह रहा है कि मोदी पर अहमद पटेल ने आरोप लगाया, इसी लिए मोदी ने उन्हें लपेटे में ले लिया। स्क्रॉल का कहना है कि आयकर विभाग के ‘क्लेम’ के अनुसार, इतने रुपए ज़ब्त हुए हैं।


सत्यहिंदी असत्य की जननी है

ये सारे के सारे अजीब व्यवहार कर रहे हैं। गाँधी परिवार के सबसे ख़ास आदमी से इसके तार जुड़ रहे हैं, फिर भी मीडिया मौन है। बिजली के एक पोल पर पूरा का पूरा एक घंटे का प्राइम टाइम करने वाले रवीश कुमार अरबों रुपए की हेराफेरी पर चुप हैं। पीएम मोदी के भाषण को गलत अर्थ में दिखाने वाला आजतक चैनल भी इस पर बहस नहीं कर रहा। पीएम से बिना सबूत राफेल पर सवाल पूछने वाला एबीपी सामने सबूत पड़ा होने के बावजूद आँख मूँद कर खड़ा है। कुछ के तो हमने ऊपर उदाहरण भी दिए।

तीन दिन से रेड चल रही है। इस कारण मीडिया ये कहने का भी हक़ खो चुका है कि ये कोई छोटा-मोटा मामला है। अगर सत्ता से सवाल पूछना ही पत्रकारिता है तो सत्ता खोने वालों को देश लूटने का अधिकार है क्या? कॉन्ग्रेस कई बड़े राज्यों में सत्ताधारी पार्टी है। उसके कई विधायक और सांसद हैं। अगर भाजपा केंद्र और कई राज्यों में सत्ताधारी है तो कॉन्ग्रेस भी बेचारी नहीं है। जिस पार्टी से अरबों के हवाला लेनदेन के तार जुड़ रहे हों, उससे सवाल पूछने के लिए उसके सत्ता में लौटने का इन्तजार किया जाना चाहिए क्या? सवाल अपराधी और अपराध से जुड़े हर एक व्यक्ति से किया जाना चाहिए। हमने सारे घटनाक्रम को आपके सामने रख दिया है क्योंकि कोई और ऐसा नहीं करेगा।

सेक्स ही सेक्स… भाई साहब आप देखते किधर हैं, दि प्रिंट का सेक्सी आर्टिकल इधर है

2016 के उत्तरार्ध में महान दार्शनिक श्री दीपक कल्लाल जी महाराज ने अपने कॉलर बोन को सहलाते हुए कहा था, “सेक्स आधारित आर्टिकल नवांकुर न्यूज पोर्टलों की अंतिम शरणस्थली है।” ‘दि प्रिंट’ नामक पोर्टल ने पिछले दिनों ‘अलग एंगल’ तलाश करते हुए एक आर्टिकल शेयर किया जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में पूछने के लहजे में लिखा गया है कि ‘क्या ग्रामीण औरतों को लिए सेक्स सिंबल हैं नरेन्द्र मोदी?’

जब इस तरह के हेडलाइन में ही प्रश्नवाचक चिह्न हो तो पता चल जाता है कि लिखने वाले को या तो पता नहीं है कि वो कहना क्या चाहता है, या फिर यह कि इतना ज़्यादा पता है कि उस चिह्न का प्रयोग कैसे किया जाए। ऐसा नहीं है कि शीर्षक में प्रश्नवाचक चिह्नों का इस्तेमाल नहीं हो सकता, लेकिन आज कल विचारों को तथ्य की तरह दिखाने के लिए धूर्तता से इसका प्रयोग किया जाता है।

चुनावों के समय इस तरह के आर्टिकल लिखना एक अलग स्तर की पत्रकारिता है जहाँ लल्लनपॉट यूनिवर्सिटी से समाज शास्त्र में पीएचडी करने वाले लोग ही पहुँच पाते हैं। ख़बर यह भी आई है कि लल्लनपॉट के एडिटोरियल टीम के दर्ज़ी इंची-टेप लेकर हिटलर का लिंग नापने के बाद अब कुछ नया धमाका कर सकते हैं क्योंकि व्हाय एफिंग नॉट!

ये बात मैं कई बार कह चुका हूँ कि बढ़ते कम्पटीशन के दौर में सर्वाइवल और नाम का भार ढोते इन पोर्टलों के पास नग्नता और वैचारिक नकारात्मकता के अलावा फर्जीवाड़ा और सेक्स ही बचता है जिसे हर तरह की जनता पढ़ती है। कुछ लोग इसलिए पढ़ते हैं कि उन्हें आनंद मिलता है, कुछ लोग इसलिए पढ़ते हैं कि वो सवाल कर सकें कि ये क्या लिखा गया है, और क्यों लिखा गया है।

शेखर गुप्ता से इस तरह की आशाएँ हम और आप कर सकते हैं क्योंकि देश में मिलिट्री कू यानी सैन्य तख्तापलट की फर्जी स्टोरी को मुख्य पृष्ठ पर छापने के बात इन्होंने गुप्ता उपनाम के साथ जो खिलवाड़ किया है, उसे यह समाज कभी माफ नहीं करेगा।

खैर, सीरियस बातें एक तरफ लेकिन इस सेक्सी स्टोरी से गुप्ता जी का प्रिंट आखिर समाज का कौन सा हित करना चाह रहा है, यह एक चिंतनीय प्रश्न है। नारीवाद का झंडा लेकर चलने वालों के लिए सेक्स शब्द एक उन्माद की तरह प्रभाव छोड़ता है। सारे वाद सेक्स में जाकर घुस जाते हैं, और उससे बनने वाले मुहावरे, उपवाक्य और वाक्यांश आपको उभरती हुई, लवचेरी नारीवादी की तरह स्थापित कर सकते हैं। ‘लवचेरी’ ठेठी का एक शब्द है, जिसका न तो लव से कोई लेना-देना है, न चेरी से। इसका मतलब ‘नया’ होने से है।

इस तरह के आर्टिकल के पीछे की रिसर्च क्या है? चार-पाँच फोटो जहाँ मोदी अनुष्का, कंगना या इवांका के साथ सहजता से खड़े हैं? तो क्या मोदी हलचल के अमरीश पुरी की तरह सर पर यह चिपका कर घूमता फिरे कि ‘औरत नर्क का द्वार है’? या फिर औरतों को देखते ही कहे कि मैं साइड में फोटो खिंचा लेता हूँ, फोटोशॉप से डाल देना? या फिर यह कि मोदी दोनों कंधे ऊँचे करके, दोनों आँखों से असहजता का भाव दिखाते हुए, साँस खींचे विक्षिप्तों की तरह ऐसे खड़ा हो जैसे बग़ल में औरतें नहीं, करंट मारने वाली ईलें झूल रही हों?

ग्रामीण औरतों के पास किस तरह के संसाधनों की उपलब्धता है, अगर पत्रकार ने जानने में सर खपाया होता तो पता चलता कि बिहार, यूपी, बंगाल, राजस्थान, ओडीशा जैसे राज्यों में ऐसे सैकड़ों गाँव हैं जहाँ आज भी रेडियो या अख़बार एक लग्ज़री है। जिसने मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर जाना हो, जिसकी पहली चिंता पेट भरने की हो, जिसकी पहली चिंता यह हो जिस साड़ी को बीच से फाड़कर, उसने पूरा शरीर ढक रखा है, उसके घिसकर फटने के बाद वह क्या पहनेगी, उसे शायद नरेन्द्र मोदी सेक्स सिंबल की तरह नहीं दिखेंगे।

जो लोग इस तरह की बेहूदी बातें लिखकर हिट होना चाहते हैं, वो वैसे खोखले लोग हैं जिन्होंने न तो सेक्स को समझा, न सिंबल को, ग्रामीण और औरत को तो खैर रहने ही दीजिए। जीने की जद्दोजहद, और परिवार पालने से फ़ुरसत न पा सकने वाली महिलाओं का जीवन, देहरी से द्वार, और खेत से चूल्हे तक में सिमट जाता है, उसके जीवन में सेक्स सिंबल के होने या न होने से कोई प्रभाव नहीं डाल सकता।

छद्म नारीवादी मुझे इस बात पर घेर सकते हैं कि मैं क्या जानूँ ग्रामीण औरतों की यौन आकांक्षाओं, यानी सेक्सुअल डिज़ायर्स, के बारे में, तो मेरा जवाब भी वही है कि तुम क्या जानो कि छत, भोजन, पानी, कपड़ा, बच्चों की शिक्षा के लिए दशकों से बाट जोहती उन औरतों के लिए सेक्स की प्राथमिकता कहाँ है। तुम्हारी हर गीता, सुनीता, राधा और सलमा पर मैं दस माला, निदा, मीनाक्षी, वर्षा, बहार ला सकता हूँ। सिर्फ नाम जुटा लेने से लेख की व्यापकता और सार्थकता सिद्ध नहीं हो जाती, न ही अंत में ‘हमने मनोविश्लेषक से बात की’ कहना।

कल को कई यह लिख दे कि क्या फलाना गाँधी हैं टिकटॉक पर रोने वाले लौंडों के क्रश? क्या शेखर गुप्ता इस आर्टिकल को जगह देंगे? क्या शेखर गुप्ता इस बेहूदगी को छापेंगे जबकि लिखने वाला वैसे लड़कों के बाइट और वीडियो भी एम्बेड कर दे? मुझे नहीं लगता कि वॉक द टॉक वाले गुप्ता जी इस टॉक को वॉक कर पाएँगे।

अगर वो ऐसा करने को तैयार हैं, तो लानत है उन पर और उनकी पत्रकारिता पर कि ऐसी बेहूदगी को उनके नाक के नीचे बैठा एडिटर चार सेकेंड से ज्यादा डिस्कस भी कैसे कर सकता है। नरेन्द्र मोदी सेक्स सिंबल हैं कि नहीं, यही चर्चा करना बाकी रह गया है?

कौन सेक्स सिंबल है कौन नहीं, इसकी कोई तय परिभाषा नहीं है। शेखर गुप्ता भी सेक्स सिंबल हो सकते हैं, और मैं भी, लेकिन वो हमारा काम नहीं है। हम पत्रकार हैं, मोदी नेता हैं, रितिक रौशन ग्लैमर की दुनिया से हैं। जिनका करियर यह साबित करने में लगा हो कि उनका आकर्षक होना ही उनके व्यवस्था को चलाता है, तो उस व्यक्ति के बारे में यह लिखना उचित है कि क्या रितिक रौशन कॉलेज की लड़कियों के लिए सेक्स सिंबल हैं?

लेकिन, जिस व्यक्ति का पूरा जीवन राजनीति में बीता हो, जिस पर तमाम तरह के लांछन लगाने के बाद भी कुछ साबित न हुआ हो, उस व्यक्ति पर अब इसी तरह के नकारे विचार लिखे जाएँगे जिसे अंग्रेज़ी में ट्रिवियलाइज करना कहते हैं। शेखर गुप्ता ने दसियों चुनाव कवर किए होंगे, कुछ सौ नेताओं के इंटरव्यू लिए होंगे, कुछ सौ बड़े नेताओं से निजी बातचीत की होगी, लेकिन आज उनका वेंचर क्या इस स्तर का हो गया है कि उन्हें नरेन्द्र मोदी और सेक्स शब्द को एक लाइन में लिखवाने के बाद, अपने हैंडल से शेयर करना पड़ रहा है?

संदर्भ और समय देखकर पत्रकारिता में आर्टिकल बेचे जाते हैं। बेचे ही जाते हैं, क्योंकि इस तरह के हेडलाइन या आर्टिकल का और कोई औचित्य नहीं कि ये जहाँ हैं, वहाँ क्यों हैं। अगर चुनावों का समय है तो पत्रकारों को कहा जाता है कि वो चुनाव से जुड़ी बातें, इतिहास, आँकड़े, बयान, रैलियाँ, विचार, ग्राउंड रिपोर्ट आदि पर ध्यान दें। और गुप्ता जी के लौंडे का ध्यान कहाँ है? गुप्ता जी के लौंडे का ध्यान इस बात पर है कि उनकी सहकर्मी मोदी के सेक्स सिंबल होने की अवधारणा को जस्टिफाय करने की कोशिश कर रही है, और गुप्ता जी के लौंडे उनको शेयर कर रहे हैं ताकि दो-चार सौ लोग रीट्वीट करें और मज़े लें।

इस आर्टिकल का क्या मतलब है? इससे समाज को क्या सूचना मिल रही है? इससे क्या भला या बुरा हो रहा है समाज का जो कि इस आर्टिकल की ज़रूरत पड़ गई? खलिहर एडिटर के दिमाग की वाहियात उपज से पैदा होते हैं ऐसे आर्टिकल जिसे सिर्फ इसलिए छापा जाता है क्योंकि फ़्री इंटरनेट पर जगह की कमी नहीं है।

जिनको लग रहा हो कि मैं नैतिकता का झंडा उठा रहा हूँ तो वो यह जान लें कि बात नैतिकता की तो है ही, बात पत्रकारिता में सन्निहित ज़िम्मेदारी की भी है। इस लेख का न तो कोई मतलब है, न जरूरत है, न डिफ़ेंड किया जाना चाहिए। पत्रकार आज वैचारिक दरवाज़े पकड़ कर झूल रहे हैं। मैं कहता हूँ कि मेरी विचारधारा क्या है, अधिकतर लोगों को स्वीकारने में डर लगता है जबकि पूरी दुनिया को पता है कि वो किस राह पर हैं।

आर्टिकल पढ़ने पर पता चलता है कि ‘दि प्रिंट’ की पत्रकार ने मनोविश्लेषक की बाइट भी डाल दी है ताकि लगे कि कुछ सीरियस बात भी हुई है भीतर में। ये एक तरीक़ा होता है फर्जीवाड़े को ऑथेन्टिक बताने का, पूरे आर्टिकल में पितृसत्ता से लेकर शादी और सेक्स को लगभग एक बताते हुए, मोदी से शादी के बारे में क्या ख़्याल है यह पूछा गया।

जैसे कि बाकी सारे प्रश्न खत्म हो गए हों जिसने ग्रामीण महिलाओं के जीवन पर प्रत्यक्ष प्रभाव डाले हैं। ऐसी हर महिला के पास, जो एक गृहणी है, मोदी के लिए अच्छी और बुरी बातें हो सकती हैं कहने को जिनका सामाजिक सरोकार है, राजनीतिक औचित्य है। उन खबरों में कई खबरें हो सकती हैं कि क्या उन्हें उज्ज्वला योजना का लाभ मिला, क्या उनके घर में शौचालय है, क्या सौभाग्य योजना का एलईडी वहाँ तक पहुँचा, क्या उनकी बच्चियों को पढ़ाई में सरकारी मदद मिल रही है, क्या उनके बजट पर प्रभाव पड़ा है, क्या उनके सर पर छत आई है, क्या वो सड़क से बाज़ार जा सकती हैं…

अलग एंगल तलाशता पत्रकार यहाँ पर यह सवाल भी पूछ सकता है कि क्या आप मोदी जी द्वारा बनवाए शौचालय में सेक्स करना पसंद करेंगी? क्या आप सौभाग्य योजना के नीले रंग की एलईडी लाइट में सेक्स करना पसंद करेंगी? क्या आप उज्ज्वला वाले सिलिंडर पर चाय बनाने के बाद सेक्स करना पसंद करेंगे? क्या आप आवास योजना वाले छत पर सेक्स करना पसंद करेंगी?

इस पर भी एक आर्टिकल बन जाएगा कि ‘मोदी की योजनाओं में सेक्स अपील और ग्रामीण औरतें’। ये एक आइडिया दे रहा हूँ, बाकी गुप्ता जी के लौंडे के ऊपर है कि इस पर दिल्ली के बग़ल के गाँवों को ही ग्रामीण समझ कर रिपोर्टिंग करा लें। और अंत में, दि प्रिंट के मनोविश्लेषक तो हैं ही जो बताएँगे कि ‘देखिए मोदी ने सिलिंडर दिया, बिजली दी, शौचालय दिया, तो महिलाओं से वो भावनात्मक स्तर तक जुड़ गए हैं। यही भावनाएँ थोड़ी उग्र हो जाएँ तो… अब मैं आगे क्या बोलूँ… हें हें हें…’।

RSS नेता पर आतंकियों ने बुर्का पहनकर किया हमला, PSO की मौत

जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले के एक अस्पताल में मंगलवार (अप्रैल 9, 2019) को आतंकियों ने आरएसएस नेता और चिकित्सा सलाकार के रूप में कार्यरत चंद्रकांत शर्मा पर गोलियाँ चलाईं। इस हमले में चंद्रकांत जख्मी हुए हैं जबकि उनके पीएसओ (निजी सुरक्षा गार्ड) की मौत हो गई है।

मीडिया खबरों की मानें तो आतंकियों ने हमले के दौरान बुर्का पहना हुआ था। पहले उन्होंने पीएसओ से उसके हथियार छीने फिर वहाँ उस पर गोली चला दी। इस घटना के बाद वहाँ के हालात तनावपूर्ण बने हुए। कर्फ्यू लगा दिया गया है। भाजपा प्रवक्ता सुनिल सेठी ने जानकारी दी है कि चंद्रकांत को जल्दी ही दिल्ली में शिफ्ट किया जाएगा।

आजतक में छपी रिपोर्ट के मुताबिक यह हमला अस्पताल की ओपीडी में किया गया। जहाँ आरएसएस नेता/चिकित्सा सलाहकार चंद्रकांत अपने बॉडीगॉर्ड के साथ मौजूद थे। जैसे ही अस्पताल के भीतर यह हमला हुआ वहाँ अफरा-तफरी मच गई। इस हलचल में आतंकी मौक़े से फरार होने में कामयाब हो गए।

अभी तक इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई है कि बुर्के में मौजूद हमलावर कोई पुरुष था या कोई महिला। लेकिन पुलिस ने पूरे इलाके की घेराबंदी कर ली है। साथ ही खबरे हैं कि इस घटना के बाद अस्पताल के बाहर पाकिस्तान विरोधी नारेबाजी भी की जा रही है। पुलिस का तलाश अभियान शुरू हो चुका है। हमलावरों की तलाश में चश्मदीदों से भी पूछताछ की जा रही है।

स्वामी ने जीते IIT-Delhi से ₹40 लाख, 47 साल पुराना मामला

अपने क़ानूनी ‘कारनामों’ के लिए मशहूर भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने एक और क़ानूनी लड़ाई जीत ली है। इस बार उनके हक़ में साकेत की स्थानीय अदालत ने IIT दिल्ली को उनका बकाया वेतन सूद समेत चुकाने का आदेश दिया है। 8% के सूद समेत संस्थान पर बकाया उनकी वेतन राशि ₹40-45 लाख बैठने की उम्मीद है।

1972 में हुई अपनी बर्खास्तगी को वह पहले ही अदालत से 1991 में अनुचित घोषित करवा चुके थे, जिसके बाद उन्होंने पदभार ग्रहण कर उसी दिन इस्तीफा दे दिया था। अब वे इस कालखंड के वेतन का मुकदमा लड़ रहे थे जिसे उन्होंने जीत लिया है

उन्होंने ट्वीट कर इसकी जानकारी देने के साथ यह भी कहा कि यह मामला अकादमिक क्षेत्र के विकृत मानसिकता वाले व्यक्तियों के लिए सबक है।

तीन साल थे शिक्षक, बर्खास्तगी को बताया था राजनीति से प्रेरित

IIT दिल्ली में डॉ. स्वामी तीन साल (1969-1972) तक अर्थशास्त्र के प्राध्यापक थे। इस दौरान वह दक्षिणपंथी अर्थशास्त्र के पक्ष में लिखते रहे थे। उन्होंने हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था को कम समाजवादी और अधिक बाजार-आधारित बनाने की भी वकालत की थी।

इसी दौरान एक शाम उन्हें एक पत्र दे तत्काल प्रभाव से पदमुक्त कर दिया गया था। अपनी बर्खास्तगी को राजनीतिक बताते हुए उन्होंने लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ी जिसके बाद 1991 में जाकर अदालत ने उनके निष्कासन को अनुचित ठहराते हुए उनकी पद-बहाली का आदेश दिया। डॉ. स्वामी ने पदभार ग्रहण कर उसी दिन इस्तीफा दे दिया।

इसके बाद उन्होंने इस कालखंड (1972-1991) की बकाया वेतन राशि पाने के लिए मुकदमा दायर किया, और 18% की दर से ब्याज माँगा। हालिया फैसले में अदालत ने मात्र 8% ब्याज की दर से ब्याज चुकाने का निर्देश दिया है।

संस्थान ने कहा, लेंगे अपने बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स से निर्देश

IIT दिल्ली ने कहा है कि अब वह इस फैसले को अपने बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स के समक्ष लेकर जाएँगे जो आगे इस मामले पर क्या कदम उठाया जाना है यह तय करेगा।

अगर स्वामी का है यह हाल, तो आम आदमी का क्या होता होगा?  

डॉ. स्वामी की राजनीतिक ताकत किसी से छिपी नहीं है- वह न केवल वर्तमान सत्तारूढ़ दल के सदस्य हैं बल्कि अतीत में भी कई सरकारें बनवाने, चलवाने, और गिरवाने में अपनी भूमिका को वह खुल कर मानते हैं। इसके अलावा उनके पास कानूनी संसाधनों की कोई कमी नहीं है- उनकी पत्नी रॉक्सना स्वामी खुद देश की चोटी के वकीलों में हैं, और श्रीमती स्वामी के अलावा भी उनके पास वकीलों की छोटी-मोटी फौज होती है।

ऐसे हालात में भी यदि उनके जैसे शक्तिशाली व्यक्ति को न्याय पाने में लगभग 50 साल लग जाते हैं तो आम आदमी की क्या हालत होती होगी, यह सोचना भी मुश्किल है। डॉ. स्वामी के पास तो आजीविका के दूसरे संसाधन थे, पर यही अगर किसी आम आदमी की जीविका के एकलौते साधन पर कोई अवैध तरीके से रोक लगा दे तो उसके पास क्या विकल्प है सिवाय इसके कि वह मजदूरी करे, उसका बच्चा ट्रैफिक पर भीख माँगे, और उसकी पत्नी दूसरे के घरों में काम करे? या जैसे-तैसे किसी भी हालत में जीवन निर्वाह का जतन करे।

आगामी सरकार चाहे जिसकी हो, न्याय में देरी की आड़ में हो रहे अन्याय के बारे में सोचने के लिए “सुब्रमण्यम स्वामी बनाम IIT दिल्ली” महज एक केस नहीं, एक जरूरी नजीर है।

विपक्ष उड़ाता है ‘चौकीदार’ का मज़ाक लेकिन गुजरात के ये गाँव वाले करते हैं ‘चौकीदार’ की पूजा

गुजरात के नर्मदा जिले के डेडियापाड़ा तालुका के आदिवासी गाँव (देव मोगरा) में सदियों से चौकीदार की पूजा की जा रही है। इस गाँव के लोगों का मानना है कि माता पंडोरी और देवदरवनिया नाम का चौकीदार कई वर्षों से उनके गाँव की रक्षा कर रहा हैं। जिसके कारण वह इन दोनों की पूजा करते हैं।

यहाँ पर पंडोरी माता के मंदिर से कुछ दूरी पर ही चौकीदार का भी मंदिर है। यहाँ की मान्यता है कि जो भी भक्त पंडोरी माता के दर्शन के लिए आते हैं उन्हें देवदारवनिया चौकीदार के मंदिर भी जाना पड़ता है। यहाँ पूरे साल राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश से भक्त दर्शन के लिए आते हैं। माता के मंदिर की तरह ही चौकीदार के मंदिर की भी यहाँ काफ़ी मान्यता है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के अनुसार वहाँ के नागरिक मान सिंह चौकीदार मंदिर और देवी पंडोरी के मंदिर पर बात करते हुए बताते हैं कि एक बार देवी पंडोरी माता ने नाराज होकर घर छोड़ दिया था। राजा पंडादेव ने उनकी तलाश करनी शुरू की और अपना घोड़ा देव मोगरा गाँव में रोका। तबसे यह जगह स्थानीय लोगों के लिए पूजनीय हो गई और बाद में यहाँ पंडोरी माता का मंदिर बनवाया गया। इस मंदिर से कुछ दूरी पर देवदरवनिया चौकीदार के लिए भी एक प्रार्थना स्थल बनाया गया।

वहीं कालू नाम के दूसरे निवासी बताते हैं कि माता के मंदिर के साथ दिवाली और नवरात्रियों में चौकीदार मंदिर में भी बहुत भीड़ देखने को मिलती है। इस मंदिर में हैरान करने वाली बात यह है कि एक तरफ़ जहाँ पर गुजरात में शराब की बिक्री पर रोक है वहीं चौकीदार के भक्त उन्हें प्रसाद के रूप में देसी शराब ही चढ़ाते हैं।

ये देखना दिलचस्प है कि एक तरफ़ जहाँ गुजरात के इस मंदिर में चौकीदार की पूजा होती है वहीं पर चुनावों के मद्देनज़र विपक्ष द्वारा इस शब्द का जमकर मजाक उड़ाया जा रहा है। प्रधानमंत्री पर निशाना साधते हुए आज पूरा विपक्ष भूल चुका है कि चौकीदार एक शब्द नहीं है बल्कि पूरी परिभाषा है। जिसकी आए दिन विपक्ष द्वारा मिट्टी पलीद की जाती है।