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कॉन्ग्रेस प्रत्याशी का नया नारा ‘महिला को शिक्षित करना व्यर्थ है’

एक ओर जहाँ कॉन्ग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी और महासचिव प्रियंका गाँधी चुनाव प्रचार के दौरान महिला सशक्तिकरण के मुद्दे को आधार बनाकर पूरे देश से वोट माँग रहे हैं। वहीं दूसरी ओर केरल में यूडीएफ (कॉन्ग्रेस+अन्य) के प्रत्याशी के. सुधाकरण ने चुनाव प्रचार के मद्देनज़र एक प्रमोशनल वीडियो जारी किया। जिससे लोगों के बीच यह संदेश भेजने का प्रयास किया गया है कि महिलाओं को शिक्षित करना व्यर्थ है।

सुधाकरण द्वारा चुनाव प्रचार के लिए ऐसी वीडियो के इस्तेमाल ने उनकी नियत और महिलाओं को लेकर सोच पर प्रश्न चिन्ह खड़े कर दिए हैं। आज जहाँ महिलाएँ पुरूषों के साथ हर क्षेत्र में कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है, ऐसे समय में कॉन्ग्रेस नेता का यह वीडियो पार्टी की विचारधारा का शर्मनाक दृष्टिकोण प्रस्तुत कर रहा है।

इस वीडियो में लड़की की असमर्थता को दिखाते हुए दर्शाया गया है कि यदि कोई लड़का किसी कार्य को करना शुरू करता है तो उसमें कामयाबी हासिल करने के बाद ही वापस आता है। इस वीडियो में लड़की का पिता इस बात को कहते दिख रहा है कि लड़की को पढ़ाना भी बेकार हो गया, और उसे टीचर बनाना भी। इस वीडियो को के सुधाकरण ने अपने पक्ष में इस्तेमाल करने के साथ कुन्नुर(kunnur) की सांसद और लेफ्ट की प्रत्याशी पीके श्रीमथी पर व्यंग्य कसने के लिहाज़ से इस्तेमाल किया, जो कि एक टीचर भी हैं।

हालाँकि, उनका ये उद्देश्य कामयाब नहीं हो पाया और वह आलोचनाओं से घिर गए। जगह-जगह उनके इस ऐड कैम्पेन पर सवाल उठाए जा रहे हैं। ये पहली बार नहीं है कि के सुधाकरण की महिला विरोधी सोच का प्रमाण मिला हो। इससे पहले भी सुधाकरण केरल के मुख्यमंत्री के बारे में टिप्पणी करते हुए कह चुके हैं कि “वह महिला से भी बुरे हैं है”। बता दें कि सुधाकरण द्वारा पोस्ट यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। लोग सुधाकरण को बढ़ चढ़कर महिला विरोधी करार देने में जुटे हुए हैं। महिला आयोग ने भी मामले का संज्ञान लेते हुए सुधाकरण द्वारा इस्तेमाल की गई वीडियो पर मुकदमा दायर किया है।

प्रतिबंध किस पर है? कम्युनिस्टों के खिलाफ बोलने पर या देश के वीरों की गाथाएँ सुनाने पर

निर्वाचन आयोग इन दिनों ‘प्रतिबंध आयोग’ की भूमिका निभा रहा है। देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने का दायित्व जिस संस्थान के ऊपर है वह कभी सिनेमा पर प्रतिबंध लगा रहा है तो कभी भाषण देने पर। इसी क्रम में आयोग ने दो पुस्तकों के लोकार्पण पर प्रतिबंध लगा दिया। इनमें से एक है मानोशी सिन्हा रावल की ‘Saffron Swords’ और दूसरी आभास मालदाहियार की ‘#Modi Again’ नामक पुस्तक।

जिन रिटर्निंग ऑफिसर महोदया ने जेएनयू में होने वाले इन दोनों पुस्तकों के लॉन्च पर नोटिस जारी किया उनका कहना है कि भले ही यह पुस्तकें पहले से वितरण में हों, पर इस कार्यक्रम को देखकर इसके राजनीतिक होने का आभास होता है; ऐसा लगता है कि एक नेता विशेष का प्रचार हो रहा है इसलिए यह नोटिस जारी किया गया। आयोग की ओर से नियुक्त अधिकारी महोदया का यह कथन अपने आप में ही बड़ा विचित्र है।

पहली बात तो यह कि इन दोनों पुस्तकों के पिछले कई महीनों से बाज़ार में उपलब्ध होने का अर्थ यह है कि इनके पाठकों की संख्या उनसे कई गुना अधिक है जो निमंत्रण पाकर या गाहे बगाहे बुक लॉन्च में पहुँचते। आज के समय में बुक लॉन्च जैसे आयोजन लेखकों को अपनी वह बात कहने का मंच देते हैं जो वे पुस्तक में नहीं लिख पाते। पुस्तक की अपनी एक सीमा होती है। कथेतर (non-fiction) विधा के नए नवेले लेखक अपनी बात कहने के लिए पुस्तक की विषयवस्तु को ज्यादा से ज्यादा 200 पेज में ही समेटना चाहते हैं क्योंकि इससे पुस्तक की मार्केटिंग में सहायता मिलती है।

कोई भी पाठक किसी नए लेखक की भारी भरकम पुस्तक तब तक नहीं पढ़ना चाहता जब तक वह लेखक कोई विशेषज्ञ या प्रसिद्ध व्यक्ति न हो। बुक लॉन्च किसी भी लेखक के लिए पाठकों से संवाद करने का अवसर प्रदान करने वाला आयोजन होता है। मानोशी रावल और आभास मालदाहियार ने यही सोचकर जेएनयू जैसे संस्थान में अपना बुक लॉन्च रखा होगा कि उन्हें विद्यार्थियों से संवाद करने का अवसर मिलेगा। इस देश में लाखों पुस्तकें प्रतिदिन प्रकाशित होती हैं जिनमें से आधे से अधिक बाज़ार का मुँह तक नहीं देख पातीं। न जाने कितनी पुस्तकें गोदामों में रखी सड़ जाती हैं।

इस देश में छः दशकों तक सत्ता संस्थानों में एक पार्टी विशेष का सीधा दखल रहा है जिसके कारण प्रचार तंत्र पर उस पार्टी के पाले हुए बुद्धिजीवियों का कब्जा रहा है। वामपंथी विचारधारा से ग्रसित प्रकाशक, लेखक और कथित विद्वानों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अपनी रखैल बनाकर रखा। आज देश उस मानसिकता से उबरने का प्रयास कर रहा है। इसीलिए गरुड़ जैसे प्रकाशक उभर रहे हैं जो लेखन के स्थापित मानदंडों को तोड़ कर भारत केंद्रित विचारों को प्रोत्साहित कर रहे हैं। यह प्रोपगैंडा आधारित लेखन के अंकुशों से बाहर निकलने की जिजीविषा है।

इसी जिजीविषा को उद्घाटित करने वाली पुस्तक है #Modi Again जिसे आभास मालदाहियार ने लिखा है। आभास ने किसी पार्टी या संगठन विशेष के एजेंडे को प्रसारित करने वाली पुस्तक नहीं लिखी है। उन्होंने अपनी पुस्तक में यह लिखा है कि नरेंद्र मोदी के बारे में उनकी विचारधारा में कैसे परिवर्तन आया। पुस्तक के आरंभ में ही वे लिखते हैं कि बचपन में वे लाल झंडे और केसरिया झंडे दोनों को सलाम करते थे। यह ऐसे व्यक्ति के लिए संभव है जो दोनों ही विचारों के सिद्धांतों से अनभिज्ञ हो लेकिन उसके आसपास दोनों ही विचारधाराओं के प्रतीक दिखाई पड़ते हों।

आभास अपनी विचारधारा में परिवर्तन की कहानी केजरीवाल के एंटी करप्शन आंदोलन से प्रारंभ करते हैं और आर्यन इन्वेज़न थ्योरी, अंबेदकर, अयोध्या जैसे मुद्दों पर अपने अनुभव लिखते हुए नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा लिए गए निर्णयों और विकास योजनाओं तक पहुँचते हैं। यह लेखक की स्वतंत्रता है कि उसका राजनैतिक झुकाव किस तरफ है। यदि आभास की विचारधारा में आए परिवर्तन का झुकाव नरेंद्र मोदी की तरफ है तो इसमें कोई बुराई नहीं। शशि थरूर ने भी संयुक्त राष्ट्र के वेतनभोगी अधिकारी रहते हुए भारत के नेहरू पर रिसर्च किया था और पुस्तकें लिखी थीं।

उन पर कभी किसी ने सवाल नहीं उठाए और न ही कभी उनकी पुस्तकों को प्रतिबंधित किया गया। राजनीति में आने के बाद शशि थरूर ने 2018 में विधानसभा चुनावों से ठीक एक महीना पहले The Paradoxical Prime Minister नामक पुस्तक लिखी थी। यदि किसी पार्टी के नेता की तारीफ करना आचार संहिता का उल्लंघन है तो निर्वाचन आयोग को इसपर भी सोचना चाहिए कि किसी नेता के विरोध में पुस्तक लिखना भी आचार संहिता का उल्लंघन माना जाना चाहिए क्योंकि इससे विरोधी पार्टियों को बल मिलता है।

जहाँ तक मानोशी रावल की पुस्तक Saffron Swords की बात है, वह तो किसी भी दृष्टिकोण से राजनैतिक विचारधारा पर आधारित नहीं है। बल्कि यह पुस्तक तो भारत के उन 50 से अधिक ऐतिहासिक शूरवीरों की कहानी है जिनके बारे में शायद बहुत से सैन्य इतिहासकारों को भी नहीं पता होगा। उदाहरण के लिए राणा सांगा, प्रताप, लक्ष्मीबाई और सियाचिन पर परमवीर चक्र पाने वाले बाना सिंह का नाम तो सबने सुना है लेकिन 300 सैनिकों के साथ आदिलशाह की 12000 की फ़ौज से टकराने वाले बाजीप्रभु देशपांडे का नाम बहुत कम लोगों ने सुना होगा। असम के सेनापति तोनखाम बोरपात्र गोहेन के बारे में कम लोग जानते होंगे जिसने अफ़ग़ान तुरबक खान को 1533 में पराजित किया था।

मानोशी की पुस्तक में ऐसी ही दुर्लभ कहानियों का संग्रह है। इस पर निर्वाचन आयोग को क्या आपत्ति हो सकती थी यह समझ से बाहर है। एक तो वैसे ही देश में इतिहास लेखन हद दर्ज़े तक एकपक्षीय और तुष्टिकरण वाला रहा है। उस पर यदि कोई शोध करके कुछ नया लिख रहा है तो यूनिवर्सिटी में चार विद्यार्थियों के सामने उसका बुक लॉन्च आचार संहिता का उल्लंघन मान लिया जाता है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि चुनावों का मौसम शुरू होने से ऐन पहले ऑल्ट न्यूज़ के संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने भी एक पुस्तक लिखी है जिसमें वो सोशल मीडिया पर कथित तौर पर फैलाए जाने वाली फेक न्यूज़ का भंडाफोड़ करने की बात कहते हैं जबकि अधिकतर फेक न्यूज़ उनके द्वारा ही जनित होती है। क्या सिन्हा के विश्लेषण में राजनैतिक दुर्भावना का अंश होना पूरी तरह नकारा जा सकता है जबकि आज सोशल मीडिया को पार्टियों द्वारा फैलाए जा रहे दुष्प्रचार का एक हथकंडा बना दिया गया है। क्या निर्वाचन आयोग को इसका संज्ञान नहीं लेना चाहिए? क्या निष्पक्ष दिखने वाले वास्तव में निष्पक्ष हैं, यह भी चर्चा का विषय होना चाहिए।

बहरहाल, जेएनयू में भले ही दोनों पुस्तकों के लॉन्च पर प्रतिबंध लगा दिया गया हो लेकिन निर्वाचन आयोग के इस निर्णय से इन पुस्तकों की बिक्री अवश्य बढ़ गई है। मानोशी की पुस्तक अमेज़न पर नंबर 9 पर पहुँच गई है और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्रों ने आभास की पुस्तक पर अकादमिक विमर्श के लिए सहमति दी है।


ध्रुव ट्रोल राठी! ब्रो, मीम बनाने पर फोकस करो, कहाँ नागरिक शास्त्र पर ज्ञान दे रहे हो!

आप-समर्थक और मोदी-विरोधी इंटरनेट ट्रोल ध्रुव राठी ने एक बार फिर आधे सच, पूरे झूठ, और भ्रामक विश्लेषण से लोगों को भरमाने की कोशिश की है। उन्होंने दो ट्वीट किए जिनका लब्बोलुआब था कि सीबीएसई ने राजनीति शास्त्र से जुड़े तीन अध्याय ‘लोकतंत्र और विभिन्नता’, ‘चर्चित संघर्ष और आन्दोलन’ व ‘लोकतंत्र के लिए चुनौतियाँ’ को इम्तिहान में शामिल न कर बड़ा भारी अपराध कर दिया है। अब तो फ़ासीवाद बस फैलने ही जा रहा है; लोकतंत्र खतरे में है!

यह फर्जी चिंता और पीत-पत्रकारिता (येलो जर्नलिज्म) किस-किस स्तर पर, कितना-कितना और कैसे-कैसे गलत है, इसकी पूरी मीमांसा में तो शायद 2022 के योगी वाले चुनाव में ही आ जाए, पर अगर केवल मुख्य-मुख्य मुद्दों को भी पकडूँ तो भी यह साफ़ पता चलता है कि ध्रुव राठी को या तो खुद नहीं पता कि शिक्षा व्यवस्था कैसे चलती है, किताबों की बातें किस प्रकार जीवन में आत्मसात होतीं हैं, या फिर अगर पता है तो वह हमें-आपको बरगलाने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं।

सतत है पाठ्यक्रम बदलाव प्रक्रिया

सबसे पहले तो पाठ्यक्रम में बदलाव कोई नींद से उठकर नहीं किया जा रहा, यह सतत प्रक्रिया है जो कॉन्ग्रेस के समय से चली आ रही है। लम्बे समय से स्कूलों के पाठ्यक्रम के विषयवस्तु में बदलाव की माँग उठ रही है, परीक्षा का बोझ कम करने की माँग उठ रही है। यह कोई भाजपा-संघ की देन नहीं है, कपिल सिब्बल के शिक्षा मंत्री रहते इसकी शुरुआत हुई थी।

तोता-रटंत से बेहतर होता है व्यवहारिक-प्रायोगिक उपयोग

ध्रुव राठी यह तो बताते हैं कि इन चीज़ों को बोर्ड परीक्षा के पाठ्यक्रम से बाहर किया जा रहा है पर यह नहीं बताते कि इन पर आंतरिक परीक्षाओं और सतत मूल्यांकन के ज़रिए साल-भर जोर रहेगा। इससे पहले जब यह केवल इम्तिहान का हिस्सा थीं तो छात्र परीक्षा से तीन दिन पहले घोंट कर पी जाते थे और उत्तर-पुस्तिका में उलट आते थे। परीक्षा-केंद्र तो दूर की बात, कक्ष से निकलते ही सब डब्बा गोल हो जाता था।

और इन विषयों पर कुल जमा अधिक जोर दी जाने की बात उस रिपोर्ट में भी लिखी गई है, जिसे राठी अपने ट्वीट का आधार बनाते हैं- वह भी CBSE की नगर संयोजिका और डीपीएस जैसे प्रतिष्ठित विद्यालय की प्रिंसिपल के हवाले से। पर उसकी साँस-डकार तक लेना राठी आवश्यक नहीं समझते! वैसे भी ऐसे ट्रोल से इस तरह की उम्मीद करना बेकार ही है।

राजनीति व्यवहार की चीज़ है, पोथी बाँचने की नहीं  

अगर विषय को अपने आप में पकड़ें तो तीनों अध्याय राजनीति के हैं- और राजनीति व्यवहार में होने वाली चीज़ है, कोई वैचारिक प्रयोग नहीं। राजनीति के विषय जितना प्रैक्टिकल से सीखे जा सकते हैं उतना थ्योरी में नहीं।

भारत के इतिहास में पोलिटिकल थ्योरिस्ट शायद डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर से बड़ा कोई नहीं हुआ। संविधान सभा के अध्यक्ष थे, भारत के सबसे बड़े राजनीतिक विद्वानों में उनके सबसे कट्टर विरोधी भी गिनते हैं। पर चुनावों में दो-दो बार हारे। जमानत भी जब्त हो गई। राजनीति में व्यवहारिक ज्ञान का कोई थ्योरी पूरक नहीं बन सकती।

इसी सिविक्स/नागरिक शास्त्र में बचपन से पढ़ते हैं कि देश को साफ़ रखना और सड़क पर संभल कर चलना हर नागरिक का कर्त्तव्य है। पर होता यह है कि प्रधानमंत्री झाड़ू मारने लगे तो भी भारत स्वच्छ नहीं होता। रोहिंग्याओं और बांग्लादेशी घुसपैठियों के मताधिकार छिनने की चिंता में दुबले हो रहे देश में अगर 67% लोग अपने मताधिकार का प्रयोग कर लें तो चुनाव सफल माने जाते हैं, और अनिवार्य मतदान अधिकारों में कटौती बन जाता है। यह अत्यधिक किताबी ज्ञान और व्यवहारिकता के अभाव में ही होता है।

इसलिए बेहतर होगा, राठी जी, कि आप या तो पहले खुद का फंडा साफ कर लें, और जनता को मूर्ख न बनाएँ!

जिस साध्वी को ‘हिन्दू आतंकी’ कह कर टॉर्चर किया, वही बनीं कॉन्ग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती

साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर आज बुधवार (अप्रैल 17, 2019) को भाजपा के भोपाल दफ़्तर में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मौजूदगी में पार्टी में शामिल हो गईं। उनका भोपाल से लोकसभा चुनाव लड़ना तय माना जा रहा है। भोपाल में उनका मुक़ाबला दिग्विजय सिंह से होगा। मध्य प्रदेश की राजधानी इसके साथ ही भारत का एक ऐसा क्षेत्र बन जाएगा, जिसके चुनावी समीकरण पर पूरे देश की नज़र रहेगी। मध्य प्रदेश के राजघराने से आने वाले दिग्विजय 10 वर्षों तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और राष्ट्रीय स्तर पर भी कॉन्ग्रेस के लिए सक्रिय रह चुके हैं। पार्टी का पहले से ही मानना था कि उन्हें मध्य प्रदेश की सबसे कठिन सीट से चुनाव लड़ना चाहिए और अंत में भगवा गढ़ भोपाल पर सहमति बनी। भोपाल इसीलिए क्योंकि यहाँ 1989 से अब तक भाजपा का ही कब्ज़ा रहा है।

साध्वी प्रज्ञा का नाम सामने आते ही, कॉन्ग्रेस द्वारा जबरदस्ती इस्तेमाल किया गया टर्म ‘भगवा आतंकवाद’ याद आता है। ये एक ऐसा शब्द था, जिसे सिर्फ़ और सिर्फ़ कश्मीर में चल रहे इस्लामिक आतंकवाद और देश के कई हिस्सों में फ़ैल रहे माओवादी आतंकवाद को न्यूट्रलाइज करने के लिए गढ़ा गया था। भगवा आतंकवाद का बहाना बनाकर उन लोगों को फँसाने की कोशिश की गई, जो राष्ट्रवाद की बात करते थे। कुछ ऐसे चेहरे चुने गए, जो हिन्दू संगठनों का प्रतिनिधित्व करते थे या हिंदूवादी रुख के लिए जाने जाते थे। इसमें स्वामी असीमानंद, कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा जैसे नाम शामिल थे। इन पर आतंकवाद का चार्ज लगाया गया।

साध्वी प्रज्ञा को दी गई प्रताड़ना की दास्तान

महाराष्ट्र के मालेगाँव ब्लास्ट केस में साध्वी प्रज्ञा को अदालत से क्लीनचिट भी मिल चुका है। 9 वर्षों तक जेल के सलाखों के पीछे रह चुकीं साध्वी प्रज्ञा सिंह ने जब अपनी आपबीती सुनाई तो अच्छे-अच्छों के रोंगटे खड़े हो गए। जब उन्होंने मीडिया के सामने आकर बताया कि उन्हें अपना ‘अपराध’ मानने के लिए किस तरह से टॉर्चर किया गया, तो सुननेवाले भी काँप उठे। तत्कालीन गृहमंत्री के कुटिल प्रयासों का शिकार बनी प्रज्ञा ने बताया कि महाराष्ट्र एटीएस ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया। उनके साथ हुई क्रूरता की एक बानगी देखिए:

  • उन्हें चमड़े के बेल्ट से पीटा गया।
  • उन्हें 24 दिनों तक भूखा रखा गया, कुछ भी खाने को नहीं दिया गया।
  • उन्हें इलेक्ट्रिक शॉक्स दिए गए।
  • उनके साथ रोज़ गाली-गलौज किया गया।
  • उन्हें पुरुष क़ैदियों के साथ रखकर आपत्तिजनक पॉर्न वीडियो देखने को मज़बूर किया गया।
  • काला चौकी पुलिस थाने में जब एक क़ैदी ने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई तो उसे क्रूरतापूर्वक मारा-पीटा गया।
  • उन्हें पीटने के लिए 5-6 पुलिसकर्मी लगातार लगाए गए थे जो उन्हें सोने नहीं देते थे। जब वो थक जाते थे तो उनके बदले नए पुलिसकर्मी आ जाते।
  • उनका उनके गुरु के साथ संबंधों को अश्लील नज़र से देखते हुए ‘Prostitute’ कहा गया।
  • जब उन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाया जाता, तब डॉक्टरों को जबरदस्ती अच्छी रिपोर्ट देने को मज़बूर किया जाता।

और आपको बता दें कि ये सबकुछ 6 वर्षों तक लगातार चलता रहा। क्या साध्वी प्रज्ञा पर कोई आरोप साबित हुआ है? क्या वो कोई अपराध करते हुए रंगे हाथों पकड़ी गई थी? क्या उनके ख़िलाफ़ किसी गवाह के बयान की अदालत में पुष्टि हुई है? क्या उनके घर से बम बरामद हुआ? नहीं। असल में चिदंबरम के अलावा हिन्दू आतंकवाद वाले पाप में दिग्विजय सिंह भी बराबर के भागीदार हैं। दिग्विजय सिंह न तो उस समय केंद्रीय मंत्री थे और न ही सरकार में थे, तब भी उनके द्वारा समय-समय पर जाँच प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने की बातें सामने आती रही हैं।

इससे पहले हमने एक संपादकीय लेख में बताया था कि कैसे कर्नल पुरोहित और असीमानंद जैसों को फँसाना, उसे चर्चा का विषय बनाकर, भगवा आतंक, हिन्दू टेरर जैसे शब्दों को बोलचाल में लाना, सिर्फ एकेडमिक एक्सरसाइज़ नहीं था। इस पूरे प्रक्रिया में सेना की छवि ख़राब हुई कि एक अफ़सर ही देश में आतंकवादी गतिविधि कर रहा है। इस पूरे प्रक्रिया में पूरे धर्म को, जिसका इतिहास और वर्तमान सहिष्णुता का पैमाना रहा है, आतंकवादी बताने की कोशिश की। जबकि सबको पता है कि आतंक का ठप्पा कहाँ लगा है, और क्यों।

जिस साध्वी प्रज्ञा को प्रताड़ित करने के लिए क्रूरता की हदें पार की गई, आज वही कॉन्ग्रेस की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बनकर खड़ी है। दिग्विजय सिंह से जब इसके बारे में पूछा गया तो उन्होंने मौन धारण कर लिया। दिग्विजय की बोलती बंद होने का कारण सीधा और सपाट है, उन्हें डर है कि जिस सत्ता का दुरूपयोग कर उनके साथियों ने पाप का ये घृणित खेल खेला है, अब उसकी सज़ा तय होने का समय आ गया है। उन्हें पता है कि कथित हिन्दू आतंकवाद वाला जुमला फेल हो चुका है और अब वो अपने बनाए चक्रव्यूह में ख़ुद ही फँस गए हैं। साध्वी प्रज्ञा आज दुनिया की सबसे बड़ी लोकतान्त्रिक पार्टी की उम्मीदवार हैं।

‘EVM पर कॉन्ग्रेस के अलावा दूसरा बटन दबाया तो करंट लगेगा, हमने पहला बटन फिक्स कर दिया है’

छत्तीसगढ़ में चुनाव प्रचार के दौरान राज्य सरकार के आबकारी, वाणिज्य और उद्योग मंत्री कवासी लखमा ने कॉन्ग्रेस उम्मीदवार के लिए वोट की माँग करते हुए जनता को अजीबोगरीब धमकी दी।

चुनाव सभा में मतदाताओं से कवासी ने कहा कि यदि कॉन्ग्रेस को छोड़कर उन्होंने दूसरा या फिर तीसरा बटन दबाया तो उन्हें बिजली का झटका लगेगा।

कवासी के इस बयान के बाद चुनाव आयोग ने उन्हें नोटिस जारी कर दिया है। गौरतलब है कि लखमा बुधवार (अप्रैल 17, 2019) को प्रदेश के कांकेर जिले में एक रैली को संबोधित कर रहे थे, जब उन्होंने जनता से कहा, “आपको बीरेश ठाकुर को वोट देना है। दूसरा बटन दबाने पर आपको करंट लगेगा, तीसरा बटन दबाने पर भी यही होगा, लेकिन हमने पहला बटन फिक्स कर दिया है।”

इसके बाद उन्होंने बिजली का झटका लगने वाली चेतावनी को दोहराया। जिससे भीड़ के कुछ लोग कवासी की इस बात पर हँसने लगे।

बीजेपी के प्रदेश ईकाई के एक पदाधिकारी की शिकायत के बाद चुनाव आयोग ने इस मामले पर एक्शन लिया। मीडिया खबरों के मुताबिक लखमा से तीन दिन के भीतर इस पर स्पष्टीकरण माँगा गया है।

बताते चलें कि कांकेर में लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण में गुरुवार को मतदान होगा। इसके अलावा राज्य में तीसरे और अंतिन चरण का चुनाव के लिए मतदान 23 अप्रैल को होगा।

न्यूज़ चैनल के संपादक ने प्राइवेट कम्पनी के घाटे के लिए मोदी को ठहराया जिम्मेदार, लताड़े गए

पत्रकार विनोद कापड़ी ने एक प्राइवेट कम्पनी की कंगाली के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हाथ ढूँढ लिया है। बता दें कि जेट एयरवेज घाटे में चल रही है और कम्पनी के पास फंड नहीं है। रुपयों की कमी से जूझती जेट एयरवेज को अब क़र्ज़दाताओं का इंतज़ार है कि वो इमरजेंसी फंड्स देकर इसे किसी तरह चालू रखें। इसी ख़बर पर TV9 भारतवर्ष के सम्पादक विनोद कापड़ी ने चुटकी लेते हुए मोदी सरकार पर निशाना साधा। कापड़ी को लताड़ते हुए अशोक पंडित ने उन्हें थोड़ी पढ़ाई-लिखाई करने की नसीहत दी और पूछा कि एक प्राइवेट एयरलाइन्स की समस्या में मोदी और विकास कहाँ से आ गया?

इसके बाद ट्विटर यूजर्स ने उन्हें अपनी प्रतिक्रियाओं में प्राइवेट और सरकारी कम्पनी का अंतर समझाया। एक यूजर ने कापड़ी और उनकी जमात के बारे में कहा कि ये ऐसे लोग हैं जो अपने बाथरूम में पानी न आने पर भी मोदी को ही कोसते हैं। उसने आगे कहा कि ऐसे लोगों को पेन गिफ्ट किया जाए तो ये इस बात के लिए नाराज़ हो जाएँगे कि रिफिल ख़त्म होने के बाद बदलनी पड़ेगी।

अगर सरकारी रुपयों से किसी प्राइवेट कम्पनी को बचाया जाए तो यही पत्रकार कहेंगे कि जनता के रुपयों का ग़लत इस्तेमाल हो रहा है। कई लोगों ने पूछा कि क्या विजय माल्या की किंगफ़िशर एयरलाइन्स की कंगाली के लिए पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ज़िम्मेदार थे क्या? एक यूजर ने कापड़ी से पूछा कि अगर वो जेट एयरवेज की विफलता के लिए मोदी की ज़िम्मेदार ठहरा सकते हैं तो क्या TCS और HDFC की सफलता का श्रेय वो देंगे?

बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कापड़ी के टीवी चैनल के कार्यक्रम में कहा था कि उन्होंने अपने संस्थान में केवल ऐसे लोग भर रखे हैं, जिनके ख़ून में ही मोदी के प्रति घृणा है। अमित शाह ने भी विनोद कापड़ी के एक सवाल पर उन्हें डाँटा था। दरअसल, कापड़ी ने अमित शाह से झूठा सवाल पूछा था कि उन्होंने चुनाव से पहले वाड्रा को जेल भेजने की बात कही थी।

‘महिलाओं को घर के अंदर ही नमाज पढ़नी चाहिए’: सुन्नी मौलाना

मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश को लेकर अभी कोर्ट में याचिका दर्ज हुए कुछ समय ही हुआ है कि मज़हब के ठेकेदारों ने इस पर आपत्ति जतानी भी शुरू कर दी है। केरल के सुन्नी मौलानाओं और इस्लामिक विद्वानों के संगठन समस्त केरला जमीयतुल उलेमा ने महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश पर अपनी कट्टर प्रतिक्रिया को दोहराया है।

संगठन की मानें तो मुस्लिम महिलाओं को अपने घर के अंदर ही नमाज़ पढ़नी चाहिए। उनका कहना है कि वह मज़हब से जुड़े मामलों में कोर्ट का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं कर सकते हैं।

संगठन के महासचिव अलीक्कूटी मुसलियर ने इस मामले पर कहा, “हम धार्मिक मामलों में कोर्ट के हस्‍तक्षेप को स्‍वीकार नहीं कर सकते हैं। हमें अपने धार्मिक नेताओं के निर्देशों को मानना चाहिए।”

यहाँ मुसलियर ने सबरीमला मामले का हवाला देते हुए कहा कि उनके संघठन ने उस समय भी महिलाओं के प्रवेश पर इसी तरह का रुख अपनाया था। मुसलियर का कहना है कि मस्जिद में केवल पुरूषों को ही नमाज़ पढ़नी चाहिए। मस्जिद में महिला प्रवेश पर दायर याचिका पर मुसलियर ने कहा है कि यह नियम नया नहीं हैं, पिछले से 1400 साल से यह अस्तित्व में है।

याद दिला दें कि 28 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने महिला अधिकारों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए केरल के सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटा दिया था। अब देखना है कि सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर निष्पक्षता के साथ क्या फैसला सुनाती हैं।

सबरीमला विवाद के बाद धर्म की आड़ में महिलाओं के मौलिक अधिकारों पर उठा, यह दूसरा मामला है। याचिकाकर्ताओं की दलील है कि पाक कुरान में भी मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश का कभी विरोध नहीं किया गया है। साथ ही बताया गया है कि इस्लाम के सबसे पाक स्थल मक्का समेत कई देशों में महिलाओं को मस्जिद में जाने की इजाजत है।

बता दें कि याचिकाकर्ताओं द्वारा पेश की गई दलीलों पर उच्चतम न्यायालय वकील के जवाबों से असंतुष्ट दिखाई दिया और स्पष्ट स्वीकारा कि इस मामले को सुनने का एकमात्र कारण, केरल के सबरीमला मंदिर पर उनका फैसला है।

पार्टी के व्यवहार से दुखी प्रियंका चतुर्वेदी ने कॉन्ग्रेस को गुंडों का साथ देने वाला बताया

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव आगे बढ़ रहे हैं, कॉन्ग्रेस पार्टी में अंतर्विरोध और असंतोष की खाई गहराती जा रही है। कद्दावर नेता शकील अहमद की बगावत, फायरब्रांड मोदी-विरोधी अल्पेश ठाकोर के इस्तीफ़े और सहयोगी मुख्यमंत्री कुमारास्वामी के बेटे की उम्मीदवारी के खिलाफ होने पर 7 नेताओं के निष्कासन जैसे मामलों से पार्टी पहले से ही जूझ रही थी। अब पार्टी के सबसे चर्चित मीडिया चेहरों में से एक प्रियंका चतुर्वेदी ने पार्टी के खिलाफ एक और मोर्चा खोल दिया है।

चतुर्वेदी से दुर्व्यवहार पर बच निकले पार्टी सदस्य, सिंधिया की सिफारिश  

राजनीति कवर करने वालीं पत्रकार विजय लक्ष्मी शर्मा ने कल रात कॉन्ग्रेस के आन्तरिक संवाद के एक पत्र को ट्वीट किया। उस पत्र में उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी के सदस्य श्री फजले मसूद पार्टी के कुछ सदस्यों को यह सूचित करते हैं कि श्रीमती चतुर्वेदी से दुर्व्यवहार समेत अनुशासन के उल्लंघन के मामले में उनपर की गई कार्रवाई को निरस्त किया जा रहा है।

मामला राफेल विवाद को लेकर मथुरा में कॉन्ग्रेस की पत्रकार वार्ता के दौरान का है।

कार्रवाई की संस्तुति और मामले की शिकायत प्रियंका चतुर्वदी ने की थी, और कार्रवाई निरस्त कॉन्ग्रेस महासचिव और उत्तर प्रदेश के पार्टी प्रभारी ज्योतिरादित्य सिंधिया की सिफारिश पर की गई थी। आरोपियों में अधिकतर मथुरा के स्थानीय कॉन्ग्रेस नेता थे, पर दो बड़े नाम प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी के सदस्य श्री अब्दुल जब्बार और महासचिव श्री उमेश पंडित के थे।

पत्र के ‘प्रतिलिपि’ खण्ड में देखा जा सकता है कि उक्त पत्र को कॉन्ग्रेस के उच्च स्तरीय सदस्यों ज्योतिरादित्य सिंधिया और एके एंटनी (कॉन्ग्रेस की अनुशासन समिति के अध्यक्ष) को भी प्रेषित किया गया था- यानि माफ़ी के इस निर्णय में केवल सिंधिया ही नहीं, कॉन्ग्रेस के पूरे ढाँचे की सहमति मानी जा सकती है।

चतुर्वेदी का क्षोभ

विजय लक्ष्मी शर्मा के ट्वीट को रीट्वीट करते हुए प्रियंका चतुर्वेदी ने लिखा कि उनकी पार्टी मेहनती कार्यकर्ताओं की बजाय गुंडों को तरजीह दिए जाने से वह दुखी हैं। उन्होंने पार्टी के लिए हर तरफ से गालियाँ झेलीं पर यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पार्टी के भीतर ही उन्हें धमकाने वाले मामूली कार्रवाई के भी बिना बच निकलते हैं।

‘देशद्रोही मुर्दाबाद’ से बेगूसराय के लोगों ने कन्हैया का किया स्वागत, पूछा कौन-सी ‘आज़ादी’ चाहिए

JNU के खलिहर प्रदर्शनकारी से नेता बने कन्हैया कुमार की परेशानियाँ बेगूसराय में कम नहीं हो रहीं हैं। पहले महागठबंधन ने कन्हैया से विभिन्न मंचों पर ता-ता-थैया कराने के बाद टिकट के नाम पर उन्हें गोली दे दी। उनकी डूबती राजनीतिक नैया को सहारा दिया CPI ने। फिलहाल, बिहार के बेगूसराय से सीपीआई (कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया) के टिकट पर 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ रहे कन्हैया को चुनाव अभियान के दौरान लगातार विरोध का सामना करना पड़ रहा है। ताज़ा मामला यह है कि एक रोड-शो दौरान कन्हैया कुमार का बेगूसराय के स्थानीय लोगों द्वारा घेराव किया गया और समाज के आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण के विरोध में, उनके द्वारा उठाए गए कदम और ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ नारे के बारे में सवाल किया गया।

विभिन्न मौके-बेमौके दिए गए कन्हैया कुमार के नारों और बयानों से नाराज बेगूसराय के स्थानीय लोगों ने उनका काफिला रोक कर, उनसे पूछा कि वह किस तरह की आज़ादी चाहते हैं, जिसका जिक्र करते हुए उन्होंने कहा था कि ‘हम छीन के लेंगे आज़ादी’, और उनकी उपस्थिति में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाल्लाह-इंशाल्लाह’ के नारे लगे थे। बता दें कि 2016 में कन्हैया कुमार, उमर खालिद और उनके कई अन्य साथियों ने JNU में यह कारनामा किया था।

कन्हैया का घेराव करने वाले स्थानीय लोगों ने कहा कि ‘इस देश के गरीब लोग तुम्हारे टाइप की ‘अज़ादी’ नहीं चाहते हैं।’ उन्होंने यह भी कहा कि ‘यह अच्छा है कि तुम एक राजनेता बनना चाहते हो, लेकिन तुम्हें इस देश के लोगों के सवालों का जवाब देना चाहिए।’

बेगूसराय के लोगों ने कन्हैया से आगे पूछा कि ‘तुमने देश के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए आरक्षण का विरोध क्यों किया।’ बता दें कि प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में भारत के गरीब लोगों के लिए 10% आरक्षण की घोषणा की थी, जिसका कन्हैया कुमार ही नहीं बल्कि कॉन्ग्रेस ने भी विरोध किया था। भौंचक्के कन्हैया के पास बेगूसराय के लोगों के सवालों का कोई जवाब नहीं था।

कुछ नहीं सूझा तो….

कन्हैया की स्थानीय लोगों के सवालों पर एक ही प्रतिक्रिया थी कि क्या वे भाजपा समर्थक हैं। इसके जवाब में, स्थानीय लोगों ने कहा कि वे वास्तव में NOTA (उपरोक्त में से कोई नहीं) के लिए वोट करने जा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कन्हैया कुमार को सवालों का जवाब देना चाहिए और जो कोई भी सवाल पूछता है, वह भाजपा समर्थक नहीं होता है। लोगों ने कन्हैया से यह भी कहा कि वह वोट माँगने के लिए इतना बेचैन न हों, सबसे पहले लोगों का दिल जीतें और “भारत तेरे लिए इंशाल्लाह इंशाल्लाह” का नारा उनकी कोई मदद नहीं करेगा।

इस गहमा-गहमी के बाद स्थानीय लोगों ने ‘देशद्रोही मुर्दाबाद’ के नारे लगाए। चुनाव नज़दीक है और माहौल गरम अब देखना यह है कि कन्हैया की दाल बेगूसराय में गलती कि नहीं या उन्हें आए-दिन अपने पिछले कर्मों के वजह से यूँ ही ज़लील होना पड़ेगा।

गहलोत ने राष्ट्रपति की जाति पर की टिप्पणी, घटिया राजनीति करने में और नीचे गिरी कॉन्ग्रेस

कॉन्ग्रेस पार्टी ने रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति चुने जाने के पीछे की वजह उनकी जाति बताया है। देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठे श्री रामनाथ कोविंद पर टिप्पणी से आहत भाजपा ने चुनाव आयोग से शिकायत की है। दरअसल, राजस्थान के मुख्यमंत्री व वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता अशोक गहलोत ने कहा कि रामनाथ कोविंद इसीलिए राष्ट्रपति बने क्योंकि वो दलित हैं। गहलोत ने कहा:

“क्योंकि गुजरात के चुनाव आ रहे थे, वो इस बात से घबरा चुके थे कि उनकी सरकार गुजरात में नहीं बनने जा रही है। मेरा ऐसा मानना है कि रामनाथ कोविंद जी को जातीय समीकरण बैठाने और कोली समुदाय को लुभाने के लिए राष्ट्रपति बनाया गया और आडवाणी साहब छूट गए।”

अशोक गहलोत के इस बयान पर पलटवार करते हुए भाजपा ने कहा कि कॉन्ग्रेस ने राष्ट्रपति का अपमान किया है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद जीवीएल नरसिम्हा राव ने कहा:

“आज हम बहुत दुःख के साथ ये बात पूरे देश के सामने रखना चाहते हैं कि आज कॉन्ग्रेस पार्टी ने बहुत ही निचले स्तर पर जाकर चुनावी मर्यादा का उल्लंघन किया है। भारत के राष्ट्रपति, जो देश में सर्वोच्च पद पर है, उन पर भी कॉन्ग्रेस ने राजनीति करने की कोशिश की है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत देश के राष्ट्रपति जी को लेकर गलत बयानबाजी कर रहे हैं। कॉन्ग्रेस क्या ग़रीब तबके, दलित समाज से आने वाले राष्ट्रपति जी के ख़िलाफ़ है। एक काबिल व्यक्ति और ज्ञानी व्यक्ति होने के बावजूद केवल समाज का नाम लेकर कॉन्ग्रेस राष्ट्रपति जी के साथ पूरे समाज और देश को बदनाम कर कर रही है।”

भाजपा ने चुनाव आयोग से अपील करते हुए कहा कि देश के राष्ट्रपति पर इस तरह का बयान देने के मामले पर वह संज्ञान ले और अशोक गहलोत को नोटिस देकर उन्हें माफ़ी माँगने के लिए कहा जाए। पार्टी ने पूछा कि क्या कॉन्ग्रेस सभी दलित, पिछड़े और ग़रीब राजनेताओं को जलील करके केवल एक परिवार को ही राज करने लायक समझती है?

इससे पहले 2017 में जब रामनाथ कोविंद की राष्ट्रपति उम्मीदवारी की घोषणा की गई थी, तब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा था कि भाजपा के दलित मोर्चा का अध्यक्ष होने के कारण उन्हें राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया गया है। कोविंद इससे पहले बिहार के राज्यपाल भी रह चुके हैं।