हाल ही में हवस के पादरी, बिशप फ्रेंको मुलक्कल के ऊपर बलात्कार और बरसों तक यौन शोषण करने के मामले जब सामने आए तो भारतीय लोगों का थोड़ा चौंकना लाज़मी था। अक्सर जॉन दयाल या इयान डीकोस्टा जैसे आत्मा की चोरी (सोल हार्वेस्टिंग) के क्रूसेडर अपने पास आने वाले चंदे के जोर पर सच को दबाए रखने में कामयाब हो जाते हैं। ऊपर से जब माता-रोम की सत्ता का वरदहस्त भी मिला हुआ हो तो क्या कहने! चुनावी दौर की छापेमारी में जब बिशप फ्रेंको मुलक्कल के एक करीबी पादरी के पास से अवैध रूप से इकट्ठा किए 9 करोड़ 66 लाख के लगभग रुपए भी निकल आए तो फिर इनका चुनावों को धनबल से प्रभावित करने की मंशा और औरतों के प्रति इनके नजरिए के बारे में कोई सवाल नहीं रह जाता।
थोड़े समय पहले तक का दौर देखें तो चर्च के अपराधों के बारे में कुछ भी बोलना-लिखना लगभग नामुमकिन था। हिंदी फिल्मों की जानी-मानी हस्ती, हृतिक रौशन को भी एक ट्वीट के लिए माफ़ी मांगने पर मजबूर किया गया था। ‘स्पॉटलाइट’ जैसी पुरस्कार विजेता फ़िल्में विदेशों में भले बनकर इनाम भी ले जाएँ, लेकिन भारत में ‘सिन्स’ जैसी फ़िल्में गुमनाम कर दी जाती हैं। कैथोलिक चर्च और उससे जुड़े अपराधों पर अब जाकर कुछ बात होनी शुरू हुई है। केवल पोप जॉन पॉल द्वित्तीय का दौर देखें तो उन्होंने चर्च के सौ से अधिक घृणित अपराधों के लिए माफ़ी मांगी है। इसमें गैलेलियो जैसे वैज्ञानिकों की प्रताड़ना की माफ़ी से लेकर उपनिवेशवाद के काल में चीन में किए गए अमानवीय अपराधों तक के लिए माफ़ी माँगना शामिल है।
इस सब के बावजूद अगर कहा जाए कि कैथोलिक चर्च कैसे घृणित, जघन्य, अमानवीय कुकृत्यों में लिप्त रहा है, तो इसे हजम करना मुश्किल होता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण अल्बेनिया की टेरेसा, उन्हें मिला नॉबेल पुरस्कार और उनके कृत्यों की समीक्षा में दिख जाएगा। भारत संविधान और वैज्ञानिक विचारधारा में विश्वास करने वाला देश है और यहाँ जादू-टोने जैसी चीज़ों की कोई जगह नहीं। अंधविश्वासों के खिलाफ लड़ते हुए हाल में कई लोगों ने जान गँवाई है मगर अफ़सोस कि इसके बावजूद ‘चमत्कार’ करने वालों को जबरन ‘संत’ की उपाधि से नवाज़ा जाना जारी है।
टेरेसा पर आम जनता का ध्यान शायद 1969 में आई बीबीसी की एक डाक्यूमेंट्री फिल्म (समथिंग वंडरफुल फॉर गॉड) से शुरू हुआ था। उनका कोलकाता स्थित संस्थान पीड़ितों का इलाज नहीं करता था बल्कि उन्हें बताता था कि उन्हें पापों के लिए ईश्वरीय दंड मिला है, जिसे उन्हें बिना शिकायत झेलना चाहिए। ऐसा नहीं है कि उनकी संस्था के पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे। हाँ ये ज़रूर है कि अल्पसंख्यक संस्थान होने के कारण उन्हें हिसाब किताब भारतीय सरकार को देने की ज़रूरत नहीं थी, और अब वो दान में मिले पैसे कहाँ हैं, इसकी कोई ख़ास खबर नहीं मिलती।
नॉबेल पुरस्कार लेते वक्त टेरेसा ने 1979 में कहा था कि आज के दौर में शांति के लिए सबसे बड़ा ख़तरा गर्भपात है। उन्होंने 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के बाद यूनियन कार्बाइड का समर्थन किया था। वो मार्गरेट थेचर और रोनाल्ड रीगन जैसों की सरकार का समर्थन करती थीं। उन्होंने निकारगुआ जाकर वहाँ के कॉण्ट्राज का समर्थन किया था। चार्ल्स कीटिंग ने उन्हें 1.25 मिलियन डॉलर का चंदा दिया था। इसके थोड़े ही दिन बाद वो बचत और कर्ज के घोटाले के लिए पकड़ा गया और उसे सजा हुई थी। इन सब के बारे में आमतौर पर बात नहीं होती।
इस विषय पर एक वामी किस्म के लेखक (जिसने बाद में विचारधारा को त्याग दिया) क्रिस्टोफर हित्चेंस ने ‘मिशनरी पोजीशन’ नाम से 128 पन्ने की एक किताब लिखी है। वो टेरेसा को ‘घोउल ऑफ़ कोलकाता’ बुलाया करता था। हाल के दौर में एक भारतीय (जो अब विदेशों में रहते हैं) ने भी इस विषय पर लिखा है। उनकी किताब थोड़ी मोटी (400 पन्ने की) है। औरूप चटर्जी ने इस विषय पर करीब पच्चीस साल शोध किया है। वो अक्सर टीवी चैनल पर भी इस विषय पर बोलते दिख जाते हैं। टेरेसा की सच्चाई पढ़नी या जाननी हो, तो इस विषय पर किसी भारतीय की लिखी ये शायद सबसे अच्छी किताब है। किताब का नाम है Mother Teresa: The Untold Story.
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजद सुप्रीमो लालू यादव पर बड़ा आरोप लगते हुए कहा कि वह जेल से ही चुनाव को प्रभावित कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने लालू यादव पर जेल से ही फोन का प्रयोग करने का भी आरोप लगाया। बता दें कि चारा घोटाला मामले में राँची स्थित बिरसा मुंडा जेल में अपनी सज़ा भुगत रहे लालू अभी स्वास्थ्य कारणों से रिम्स में भर्ती हैं। वहाँ उनका इलाज चल रहा है। महागठबंधन के कई नेताओं का वहाँ आना-जाना लगा रहता है और टिकट के दावेदारों की लाइन भी लालू से मिलने के लिए लगती है। पहले ही ऐसी ख़बर आई थी कि लालू यादव जेल से ही राजद के सारे निर्णय ले रहे हैं। उपेंद्र कुशवाहा, प्रकाश करात, जीतन राम माँझी सहित कई बड़े नेताओं ने राँची जाकर लालू से मुलाक़ात भी की थी।
अब नीतीश की शिकायत पर राँची पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव के वार्ड में छापा मारा है। नीतीश कुमार ने कहा था, “यह तो लोगों को पता ही है कि लालू जी जेल में रहने पर भी जेल से बात करते रहते हैं। नियम है कि जेल में रहते हुए आप (फोन पर) बात नहीं कर सकते, लेकिन तथ्य सबको मालूम नहीं है।” सूचना मिलते ही सिटी एसपी व सदर डीएसपी के नेतृत्व में पुलिस ने लालू यादव के पेइंग वार्ड की गहन तलाशी ली। निरीक्षण के लिए झारखंड पुलिस के एसपी सुजाता वीणापाणि, सदर डीएसपी दीपक कुमार पांडेय, बरियातू थानेदार संजीव कुमार सहित अन्य पुलिसकर्मी पहुँचे थे। जाँच के दौरान पूरे वार्ड को खंगाला गया। कोने-कोने की गहनता से तलाशी ली गई।
उधर लालू यादव के दोनों बेटों ने नीतीश कुमार के इस आरोप पर प्रतिक्रिया देते हुए अपने पिता को फँसाने का आरोप लगाया। तेजप्रताप यादव ने कहा, “रिम्स में जहाँ मेरे पिता जी रहते हैं, वहाँ चेकिंग भी होती है। जेल के सारे नियमों का हमारे पिता पालन करते हैं।” वहीं पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने नीतीश के आरोपों को निराधार बताया। तेजस्वी ने एक जनसभा को सम्बोधित करते हुए आगे कहा:
“हमारे पूरे परिवार को एक साजिश के तहत फँसाया गया है। झूठे मुकदमे लाद कर परिवार को राजनीति में आगे बढ़ने से रोका जा रहा है। पीएम ने बेरोज़गार युवकों को ठगने का काम किया है। उन्होंने वादा पूरा नहीं किया। झूठ बोलकर काम चलाते रहे और फिर से जनता के बीच आए हैं और मुद्दों को भटका रहे हैं। इस बार जनता इस चौकीदार को जरूर सबक सिखायेगी।”
झारखंड के जेल आईजी विरेंद्र भूषण ने तत्काल अपनी सफाई दी है कि लालू प्रसाद के द्वारा अस्पताल में मोबाइल फोन के इस्तेमाल की बात निराधार है।#LaluPrasadhttps://t.co/G4yG8r90kx
बता दें कि लालू यादव के वार्ड की पहले भी तलाशी ली जा चुकी है। झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भी कहा था कि लालू से मिलने आने वाले लोगों के लिए जेल के नियम ताक पर नहीं रखे जा सकते। इससे पहले भी शनिवार को सदर डीएसपी दीपक पांडेय के नेतृत्व में पुलिस टीम ने लालू यादव के पेइंग वार्ड के कमरे ए 11 की गहन जाँच की थी। कुछ दिनों पहले जदयू के पूर्व अध्यक्ष और राज्यसभा से अयोग्य करार दिए गए शरद यादव भी लालू से मिले थे। फरवरी में राजद के गठबंधन साथी मुकेश साहनी ने लालू के साथ बैठक की थी।
मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस पार्टी ने राफेल से जुड़े विज्ञापन को चुनाव आयोग के पास अनुमति के लिए भेजा था, जिसे आयोग ने अस्वीकार कर दिया। चुनाव आयोग ने कॉन्ग्रेस को साफ़-साफ़ कहा कि चूँकि यह मामला कोर्ट में है, राफेल के विज्ञापन का प्रयोग करना उचित नहीं होगा। लोकसभा चुनावों के ऐलान के बाद आदर्श आचार संहिता लागू हो चुकी है और चुनाव आयोग इस बार किसी भी गड़बड़ी को लेकर सख़्त नज़र आ रहा है। कई राज्यों में छापों के कारण बड़ी मात्रा में नकदी और प्रलोभन सामग्रियाँ भी ज़ब्त की गई हैं। इनका इस्तेमाल वोटरों को लुभाने के लिए किया जाने वाला था। मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस ने चुनाव आयोग के पास कुल 9 विज्ञापनों को अनुमति के लिए भेजा था, जिनमें से 6 पर आपत्ति जताई गई है।
मध्य प्रदेश चुनाव आयोग के अध्यक्ष वीएलके राव ने कहा कि अगर आयोग के आदेश से किसी को आपत्ति है, तो वो आगे अपील कर सकता है। बता दें कि कॉन्ग्रेस राफेल को लेकर काफ़ी सख़्त नज़र आ रही है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा राफेल मामले में केंद्र सरकार को क्लीन चिट के बावजूद कॉन्ग्रेस पार्टी इस मामले को उठाती रही है। कैग ने भी मामले में केंद्र सरकार को क्लिन चिट दिया था। कैग के अनुसार, वर्तमान डील यूपीए सरकार द्वारा नेगोशिएट की जा रही डील से सस्ती है। राफेल को लेकर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने भी पीएम मोदी के बारे में ‘चौकीदार चोर है’ का नारा दिया है, जिसे उनके हर भाषण में सुना जा सकता है।
चुनाव आयोग पूरी निष्पक्षता से कार्य कर रहा है। भाजपा द्वारा ट्रेनों में ‘मैं भी चौकीदार’ कार्यक्रम चलाए जाने पर भी चुनाव आयोग ने आपत्ति जताई थी। इस मामले में आयोग ने रेलवे के अधिकारियों तक पर कार्रवाई करने की बात कही थी। उधर अप्रैल में चुनाव से पहले रिलीज के लिए तैयार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक को लेकर चुनाव आयोग ने हरी झंडी दिखा दी है। विवेक ओबेरॉय अभिनीत इस फ़िल्म में प्रधानमंत्री की ज़िंदगी को उकेरा गया है। चुनाव आयोग ने कहा कि चूँकि सेंसर बोर्ड फ़िल्म को हरी झंडी दे चुका है, आयोग ये नहीं तय कर सकता कि फ़िल्म कब रिलीज होगी।
#BREAKING | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक को हरी झंडी, मोदी विरोधियों को करारा जवाब
फ़िल्म पर रोक लगाने के लिए दिल्ली और बॉम्बे हाईकोर्ट में भी याचिकाएँ दाखिल की गई थीं लेकिन चुनाव आयोग ने साफ़ कर दिया है कि ये आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है। मध्य प्रदेश में ही कॉन्ग्रेस द्वारा आचार संहिता के उल्लंघन का एक और मामला सामने आया है। भारतीय जनता पार्टी ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह द्वारा सीहोर में एक मंदिर के बाहर पैसे बाँटे जाने को लेकर चुनाव आयोग से उनकी शिकायत कर दी है। आयोग ने इस मामले में सिंह को नोटिस भी जारी कर दिया है। दिग्विजय सिंह को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से कॉन्ग्रेस ने मैदान में उतारा है। भाजपा ने अभी इस क्षेत्र से अपने उम्मीदवार का ऐलान नहीं किया है।
कॉन्ग्रेस ने नमो टीवी के प्रसारण को लेकर भी चुनाव आयोग से शिकायत की है। बता दें कि यूट्यूब से शुरू किया गया नमो टीवी अब डायरेक्ट टू होम पर भी दस्तक दे चुका है और उस पर पीएम मोदी से जुड़े कार्यक्रमों को प्रसारित किया जाता है। कॉन्ग्रेस की मध्य प्रदेश इकाई ने इस पर आपत्ति जताई है। इंदौर जिला प्रशासन ने चुनाव आयोग से इस मामले में मार्गदर्शन भी माँगा है। कॉन्ग्रेस ने चैनल पर पार्टी विशेष के पक्ष में राजनीतिक कंटेंट प्रसारित करने का आरोप मढ़ा है।
जौन एलिया का एक शेर है (ये बस इसलिए लिख रहा हूँ कि शेर लिख कर शुरु करने वालों को गम्भीरता से लिया जाता है):
ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता/ एक ही शख़्स था जहान में क्या
हमारे देश के नौटंकीबाज़ जमात के लिए ये शेर, अपने अकेलेपन में, सटीक बैठता है। इनके भीतर खलबली मची हुई है। इनके साँसों की आवाजाही और धड़कनों की लब-डब तक मोदी ही मोदी है। इन्हें चैन नहीं है। ये अवार्ड वापसी दोहराना चाहते हैं, लेकिन सामाजिक अपराध का शिकार अखलाख है कि मर ही नहीं रहा इस बार। ये लम्पट मंडली इतनी बेईमान है कि ईमानदारी से नाम तक नहीं लिख रही।
अरे चिरकुटो! अगर कहना चाहते हो कि मोदी को वोट नहीं देना है, तो कौन रोक रहा है? संविधान या मोदी की पर्सनल पुलिस? खुलकर लिखो कि मोदी को वोट मत दो, भाजपा को वोट मत दो। इसमें किस बात का डर है जबकि तुम्हारी लेजिटिमेसी तो वैसे भी है नहीं। उन्हीं चार चिरकुटों के साथ उठना-बैठना, वही घिसी हुई बातें हर सेमिनार में कहना, वही कुतर्क हर रोज करना… तुम्हें सीरियसली लेता कौन है?
मैं लेता हूँ, क्योंकि तुम्हारे जैसे लम्पटों की हर एक बात पर दस आर्टिकल लिखना ज़रूरी है। तुम्हें तुम्हारे ही खेल में, तुम्हारे ही नियमों के साथ, उन्हीं संसाधनों के प्रयोग से हराना है। इसलिए कीचड़ में भी उतरूँगा, सूअरों से भी लड़ूँगा, और उनकी गर्दन उन्हीं की विष्ठा में तब तक दबाए रखूँगा जब तक कि वो ठंढे न पड़ जाएँ। मैंने भी जान से मारने की बात नहीं की, बस ठंढा करने की बात की है क्योंकि ऐसे लोगों का ज़िंदा रहना बहुत ज़रूरी है। ये हमारे समाज के वो उदाहरण है जिन्हें आने वाली पीढ़ियाँ यह कह कर याद करेंगी कि किसी भी स्थिति में इतना नहीं गिरना है कि ऐसे बन जाएँ। साथ ही, भीतर से ही कुढ़ते रहने वाले माओवंशी कामपंथी वामभक्तों की दयनीय स्थिति किस दक्षिणपंथी को पसंद नहीं!
ये दो सौ लोग जब सिग्नेचर कैम्पेन चलाते हैं, पाकिस्तान जाकर इनके मित्र नेता मोदी को हराने के लिए मदद माँगते हैं, जब सौ फ़िल्ममेकर लिखते हैं कि मोदी को वोट मत दो, तब इन्हें समाज से कुछ खास लेना-देना नहीं है। ये चुनावों से पहले एक वेबसाइट बनाते हैं, उस पर कहीं से फ़िल्मकारों की डायरेक्टरी निकाल लेते हैं, लेखकों के नाम इकट्ठा कर लेते हैं, और फिर एक स्टेटमेंट ड्राफ़्ट करके, इन्हें बिना बताए ही जारी कर देते हैं।
ये केयर फ़ॉर सोसायटी नहीं, रेलेवेंट रहने की जद्दोजहद है। इसी को शास्त्रों में फड़फड़ाना कहा गया है। ये तड़प आपसे वो सारे काम करवा लेती है जो आप शांत दिमाग से बैठकर सोचने पर तब तक नहीं करते जब तक आपके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न नहीं लगता। असफल लोगों की एक भीड़, उस पार्टी और उस प्रधानमंत्री को नीचे लाने की कोशिश में है जिसने उनका निजी हित नहीं साधा, बल्कि जिन ग़रीबों, वंचितों, दलितों, अल्पसंख्यकों की बात ये कर रहे हैं, उनके जीवन में आमूलचूल परिवर्तन लाया है।
पता कीजिए आँकड़े कि कितने करोड़ लोगों के सर पर छत आई, कितने घरों में सिलिंडर पहुँचाया, कितने घरों को किरासन तेल के दिये से मुक्ति मिली, कितने लोगों तक सब्सिडी का पैसा सीधा खाता में पहुँचा, कितनी गलियों को सड़क, और सड़कों को हाइवे बनाया गया, कितनी औरतों को आज अँधेरे में शौच के लिए बाहर नहीं जाना पड़ता, कितने करोड़ लोग व्यवस्थित और अव्यवस्थित क्षेत्रों में रोजगार से जुड़े, कितने किसानों को क़र्ज़माफ़ी की जगह उन्हें इनेबल करने की कोशिश की गई, कितनी निर्मल गंगा हुई और कैसे यमुना को ज़िंदा करने की कोशिश जारी है, कितने आतंकी मारे गए, कितने जिले नक्सल प्रभाव से बाहर आए, उत्तरपूर्व में कितना ढाँचागत विकास हुआ…
इसलिए, पहले महीने से ही ‘विकास कहाँ है’ की बात करने वाले, अब विकास की बात कर ही नहीं रहे। आप गौर कीजिएगा कि किस तरह से वैसी बातें की जा रही हैं जिसको आप चाहकर भी क्वांटिफाय नहीं कर सकते या गिन नहीं सकते। बात इस पर अब नहीं होती कि प्रतिदिन कितने किलोमीटर सड़कें बनीं, प्रति व्यक्ति सरकार कितने लाख रूपए प्रतिवर्ष ख़र्च कर रही है, हर क्वार्टर में अर्थव्यवस्था कैसे बेहतर हो रही है, सारी रेटिंग एजेंसियाँ, वर्ल्ड बैंक और इंटरनेशनल मोनेटरी फ़ंड क्यों इस सरकार के द्वारा किए गए सुधारों को सकारात्मक बताकर सराह रहे हैं…
तब मूडीज एंजेंसी को डीलेजिटिमाइज कर दिया जाएगा। और ये काम होता कैसे हैं? ये काम हर बार एक ही कुतर्क के बहाने होता है: भारत की अर्थ व्यवस्था अगर इतनी ही अच्छी है तो लोग गरीब क्यों हैं, भूखे क्यों हैं? ये वही कुतर्क है कि आप मंगलयान भेज कर क्या करेंगे, लोग तो भूखे मर रहे हैं। ये बातें पहली बार सुनने पर ठीक-ठाक आदमी सोचने लगता है कि बात तो सही है, लेकिन यह बात बिलकुल वैसी ही है कि कोई कहे ‘कौआ तुम्हारा कान लेकर भीग गया’ और आप कौए के पीछे दौड़ रहे हैं।
भारत में गरीबी भी है, भुखमरी भी है। आप खूब चमचमाती सड़क बना लीजिए, एक पत्रकार कहीं से उसके किनारे, फोटोशॉप करके ही सही, एक गरीब परिवार को ज़मीन पर खाता दिखा देगा। उसके नीचे एक कैची कैप्शन लगा देगा: क्या हमें ऐसा विकास चाहिए? जबकि, ये दोनों दो बातें हैं। गरीबी उन्मूलन पर कार्य हो रहे हैं, लेकिन ये जो लॉबी है, वो ऐसे कुतर्क करती है जिसका सीधा अर्थ यही समझ में आता है कि हर गरीब के सामान्य होने तक, विकास के सारे कार्य बंद कर दिए जाएँ। ऐसा तो है नहीं कि सरकार ने वंचितों की बेहतरी के लिए तय पैसे को मंगलयान में लगा दिया! लोककल्याणकारी कार्यों में सरकार प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष एक लाख रुपए से ज़्यादा ख़र्च करती है। लेकिन लॉबी को उससे मतलब नहीं है, आप खूब बड़ा पुल बना देंगे ताकि आने-जाने वालों को आसानी हो, एनडीटीवी वाले इस बात पर स्टोरी कर लेंगे कि अब उन नाव चलाने वालों का क्या होगा?
भारत में समस्याएँ दशकों से हैं, लेकिन समाधान अभी ही चाहिए। और कमाल की बात यह है कि इस सरकार ने यह तो दिखा ही दिया कि पिछली सरकारों से ज्यादा तेज़ी से, पारदर्शिता से, बेहतरी से कार्य हो सकते हैं। यही कारण है कि अब विकास को कोई नहीं ढूँढता, सबको साढ़े चार साल तक गंगा की बड़ी चिंता होती थी, और ‘फ़ंड कहाँ जा रहा है’ के मनचले सवाल किए जाते थे। टीवी के एंकर एक अश्लील हँसी हँसा करते थे। लेकिन सरकारी एजेंसियाँ नाले बंद करने में लगी थी, सीवेज़ ट्रीटमेंट प्लांट बनाने में लगी थी, बीस करोड़ लीटर कचरे को गंगा में उतरने से रोकने में लगी हुई थी।
इसलिए अब नैरेटिव से विकास गायब हो चुका है, क्योंकि विकास हर जगह खड़ा है, मुस्कुरा रहा है। जिन्होंने अवसाद और फ़्रस्ट्रेशन में कैक्टस रगड़ लिया है, उन्हें नहीं दिखेगा। अब नैरेटिव में कॉन्ग्रेस पार्टी के डिम्पल वाले अध्यक्ष के ‘प्यार की राजनीति’ वाली लाइन आ गई है और उसे हमारे छद्म-बुद्धिजीवियों ने ले अपना बना लिया है।
आप बस यह सोचकर मुस्कुराइए कि हमारे बुद्धिजीवी कितने समझदार और क्रिएटिव हैं कि उन्हें राहुल गाँधी की लाइन चुरानी पड़ रही है। किस तरह की मजबूरी रही होगी इन लोगों की कि हर मुद्दा सिरे से नकार दिया गया है, क्योंकि हर बात पर आँकड़ों की भाषा विलग है, और अपील किस बात पर हो रही है: नफ़रत की राजनीति को नकारिए।
अरे लम्पटो! नफ़रत की राजनीति तो तुम लोगों ने की है। मरने वाले की जाति तुम ढूँढते हो, भले ही वो निजी रंजिश की वजह से मरा हो; वेमुला लिखकर मरता है कि उसके नाम पर राजनीति न हो, लेकिन उसकी माँ को पैसे देने का वादा करके हर मंच पर घसीटते हो; नजीब अहमद की अहमियत जब तक थी, तुमने उसे खूब मुद्दा बनाया; जुनैद को तुमने बीफ का शिकार बता दिया, जबकि वो सीट की लड़ाई थी; दंगे भड़कें इसके लिए तुमने बीफ ईंटिंग फेस्टिवल कराए, लेकिन दंगे नहीं भड़के; तुमने कठुआ कांड पर आख्यान लिखे, कैम्पेनिंग की, और गीता को भूल गए; तुमने लिंचिंग की खूब बातें की और तुम्हारे लिस्ट से पुजारी, नारंग, राजीव, अंकित जैसे हिन्दू नाम गायब रहे…
फिर तुम्हारी ज़मीन है कहाँ? तुम तो सड़े हुए लोग हो जिनकी चमड़ी से बदबू आती है क्योंकि उसके अंग-अंग से व्यक्ति विशेष से घृणा का पीब रिस रहा है। तुम्हारी कमाई क्या है? सत्ता की दलाली के बाद पाए अवार्ड जिनके मेमेंटो तुम लौटा देते हो, लेकिन पैसे और रॉयल्टी नहीं लौटाते। तुम क्या विरोध करोगे, तुम उस लायक नहीं हो, तुम्हारे विरोध में बेईमानी सनी हुई है। तुम्हारी औक़ात नहीं है विरोध करने की क्योंकि तुम भीतर से चोर हो।
ये तथाकथित लेखक और फ़िल्मकार घटनाओं को चुनकर प्रतिक्रिया देते हैं इसलिए इनके हर ट्वीट के नीचे सकारात्मक और नकारात्मक कमेंट का अनुपात दूसरी तरफ झुका हुआ होता है। नहीं, कोई आईटी सेल ऐसा नहीं करता, बस लोग उब चुके हैं। लोगों को इनकी नग्नता का एहसास हो चुका है। लोगों को पता चल चुका है कि इनके लिए किसी की मृत्यु एक मानव मात्र की मृत्यु नहीं है, बल्कि उसकी आइडेंटिटी का, उस समय की राजनैतिक परिस्थिति के साथ मैच करना ज़रूरी है, क्रांति तभी शुरु होगी। रोहित वेमुला की मौत के बाद चुनाव हो चुके थे, और एक डेंटल हॉस्पिटल में तीन दलित छात्राओं ने ख़ुदकुशी कर ली थी, ये ख़बर कभी एक ख़बर से ऊपर कुछ बन ही नहीं पाई।
ये बौद्धिक डकैत और पॉकेटमार हैं। ये बसों में रामपुरी दिखाकर पर्स झिटकने वालों के समकक्ष रखे जाने वाले लोग हैं। इन्हें मतलब अपने फ़ायदे से है, वो फ़ायदे जो भी पार्टी इन्हें देगी, या देती रही है, ये उसके लिए अपील कर देंगे। ये वो लोग हैं जिन्हें पुलवामा पर पीएम की चुप्पी पर छप्पन इंच पर सवाल करने की आज़ादी होती है, लेकिन एक्शन लेते ही शांति की याद आती है। ये बहुत ही उच्च कोटि के निम्नस्तरीय लोग हैं।
इसलिए, तरकश के तीर सँभालिए, उनकी नोक पर तर्क का लेप लगाइए, और हमेशा प्रत्यंचा तान कर रखिए कि छद्मबुद्धिजीवी के मुँह खोलने की कोशिश से पहले ही उसकी जीभ वेध दीजिए। याद है न, एकलव्य ने कुत्ते की आवाज सुन कर, एक के बाद एक सात बाण छोड़ कुत्ते का मुँह बंद कर दिया था?
सुरक्षा बलों को अतिरिक्त शक्तियाँ देने वाला सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) कानून अरुणाचल प्रदेश के 9 में से 3 जिलों से आंशिक रूप से हटा लिया गया है। हालाँकि, यह कानून म्यामांर से सटे इलाकों में अभी लागू रहेगा। यह कदम राज्य में कानून लागू होने के 32 साल बाद उठाया गया है। अधिकारियों ने मंगलवार (मार्च 02, 2019) को यह जानकारी देते हुए बताया कि अरुणाचल प्रदेश के 3 जिलों से AFSPA हटा लिया गया है, इन जिलों में रविवार 31 मार्च को स्थिती का जायजा लिया गया था।
MHA sources: AFSPA has been withdrawn from 3 districts (of 9) of Arunachal Pradesh. Law & order situation in six districts of Arunachal Pradesh was reviewed before March 31 for validity of the ‘disturbed area’ designation under AFSPA.
अरुणाचल प्रदेश में फरवरी 20, 1987 को बनने के समय से AFSPA कानून लागू था। यह कानून असम और केंद्र शासित प्रदेश मणिपुर में पहले से लागू था। अरुणाचल प्रदेश के बाद मेघालय, मिजोरम और नागालैंड अस्तित्व में आए और इन राज्यों में भी यह कानून लागू किया गया था। न्यायमूर्ति बी पी जीवन रेड्डी समिति ने राज्य से AFSPA हटाने की सिफारिश की थी।
AFSPA :Armed Forces (Special Powers) Acts
AFSPA कानून के तहत, सुरक्षा बल किसी को भी गिरफ्तार कर सकते हैं और किसी भी परिसर में छापा मार सकते हैं। गृह मंत्रालय ने एक अधिसूचना में कहा कि ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित अरुणाचल प्रदेश के 4 थाना क्षेत्र रविवार से इस विशेष कानून के अंतर्गत नहीं हैं। जिन थाना क्षेत्रों से अफस्पा हटाया गया है, उसमें पश्चिम कामेंग जिले के बालेमू तथा भालुकपोंग थाने, पूर्वी कामेंग जिले का सेइजोसा थाना और पापुमपारे जिले का बालीजान थाना शामिल है।
इन जिलों में अभी लागू रहेगा अफस्पा कानून
अधिसूचना के अनुसार, हालाँकि, तिराप, चांगलांग और लोंगडिंग जिलों, नामसाई जिले के नामसाई तथा महादेवपुर थानों के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों, लोअर दिबांग घाटी जिले के रोइंग तथा लोहित जिले के सुनपुरा में अफस्पा 6 और महीनों के लिए 30 सितंबर तक लागू रहेगा।
गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि कानून व्यवस्था की स्थिति में सुधार के कारण चार थाना क्षेत्रों से ‘अशांत क्षेत्र’ का टैग वापस ले लिया गया है और पूर्वोत्तर के प्रतिबंधित उग्रवादी समूहों के निरंतर क्रियाकलापों को देखते हुए यह कानून अन्य क्षेत्रों में लागू रहेगा। अधिसूचना में कहा गया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस कानून की धारा तीन के तहत उसे मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए यह फैसला किया।
पिछले साल मार्च में मेघालय में सुरक्षा स्थिति में सुधार आने पर अफस्पा पूरी तरह से हटा लिया गया था। एक अधिकारी ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश के कुछ भागों में प्रतिबंधित एनएससीएन, उल्फा और एनडीएफबी जैसे उग्रवादी समूह उपस्थित हैं।
चुनावों का दिन जैसे-जैसे समीप आ रहा है, कॉन्ग्रेस नेताओं और गठबंधन सहयोगियों के बयानों का स्तर उतना ही नीचा होता जा रहा है। महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस के महागठबंधन के साथी दल पीपल रिपब्लिकन पार्टी (पीआरपी) के सुप्रीमो जोगेंद्र कडावड़े के बेटे जयदीप कडावड़े ने भाजपा नेत्री और केन्द्रीय कपड़ा उद्योग मंत्री स्मृति ईरानी पर चारित्रिक हनन करता हुआ बयान दिया है।
“स्मृति ईरानी गडकरी के बगल में बैठती है और संविधान बदलने की बात करती है। मैं बताता हूँ स्मृति ईरानी के बारे में। वो सर पर बड़ी सी बिंदी लगाती है और किसी ने मुझे बताया है कि जो औरत पति बहुत बार बदलती है, उसकी बिंदी का आकार उसी (पति बदलने के) हिसाब से बढ़ता जाता है।” कडावड़े के यह शब्द थे। उन्होंने इसके आगे स्मृति ईरानी को सीधे-सीधे संबोधित करते हुए यह ‘जानकारी’ दी कि संविधान बदलना पति बदलने जितना आसान नहीं है।
जयदीप कडावड़े की पीआरपी महागठबंधन के महाराष्ट्र संस्करण का हिस्सा है और कॉन्ग्रेस, शरद पवार की राकांपा और ‘भारत की किसान मजदूर पार्टी’ नामक मार्क्सवादी पार्टी इस संस्करण के अन्य भाग हैं।
स्मृति ने ठोंक रखी है अमेठी से ताल
स्मृति ईरानी को भाजपा ने लगातार दूसरी बार अमेठी से लोकसभा का टिकट दिया है। पिछली बार भाजपा ने स्मृति को हालाँकि बहुत देर से अपना प्रत्याशी बनाया था और स्मृति चुनाव प्रचार करने भी आखिरी दस ही दिनों में ही पहुँचीं थीं, पर तब भी उन्होंने राहुल गाँधी के जीत के अंतर को एक-चौथाई से भी कम में समेट दिया था। 2009 में जहाँ राहुल गाँधी अपना चुनाव 4 लाख मतों से ज्यादा में जीते थे, वहीं 2014 में स्मृति ने दस दिन के भीतर इस अंतर को 1 लाख से कुछ ऊपर ही छोड़ा था।
इसके बाद स्मृति ने 5 साल तक अमेठी से लगातार संपर्क बनाए रखा और सांसद न होते हुए भी कई विकास कार्यों का प्रबंध किया था। माना जा रहा है कि स्मृति के इस तरह अमेठी में जनसंपर्क और जनाधार बनाने और बढ़ाने के चलते ही राहुल गाँधी अमेठी के अलावा एक और ‘सुरक्षित’ सीट तलाशने को मजबूर हुए।
राहुल गाँधी अमेठी के अलावा केरल के वायनाड जिले से लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं।
पहले भी हो चुके हैं स्मृति पर अभद्र राजनीतिक हमले
पिछले साल राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह ने स्मृति ईरानी को ‘हट्टी-कट्टी गाय’ कहा था। इसके अलावा कॉन्ग्रेस के तत्कालीन प्रवक्ता संजय निरुपम भी ईरानी को एक बार ‘टीवी पर ठुमके लगाने वाली’ कह चुके हैं।
स्मृति ईरानी ने जनवरी में बयान दिया था कि अमेठी का विकास राहुल गाँधी के पुरुषार्थ को चुनौती है। उसे भी वामपंथी झुकाव वाले टेलीग्राफ ने तोड़-मरोड़कर स्मृति ईरानी के राहुल गाँधी की मर्दानगी को ललकारना बताने का प्रयास किया था।
मौसम चुनावी हो रखा है लेकिन आज बात इतिहास की करेंगे। राजनीति उसमें आप स्वयं ढूँढ लीजिएगा। इतिहास की बात इसलिए क्योंकि भारत के कुछ नेता जनता से पढ़ाई-लिखाई-सड़क-सुरक्षा-स्वास्थ्य-नौकरी आदि की बात न करके इतिहास की बात कर रहे हैं। हमेशा ऐशो-आराम की जिंदगी जीने वाले ऐसे नेता यह भूल जाते हैं कि उनके बाप-दादाओं की क्या हैसियत थी! और यह भी भूल जाते हैं कि उनके पूर्वज ने लालच में आकर कुर्सी की खातिर कब थूका और कब चाटा। इसलिए आज इतिहास की बात।
कहानी की शुरुआत होती है जनक सिंह से, जो आर्मी अफसर थे। 15 अगस्त 1947 – देश तब आजाद हुआ था। कहानी के दूसरे पात्र हैं – मेहर चंद महाजन। यह वकील थे, फिर जज बने। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस भी रहे। कहानी के तीसरे पात्र वो हैं, जिन पर शीर्षक लिखा गया है। ये वो हैं, जिनके वंशज अभी भी राजनीति कर रहे हैं – मतलब इनका नाम जिंदा रखे हुए हैं। बाकी दोनों पात्र भुला दिए गए हैं। तभी कहानी के जरिए आप तक पहुँच रहे हैं।
15 अगस्त 1947 से 14 अक्टूबर 1947
इस कालखण्ड में जनक सिंह प्रधानमंत्री थे – जम्मू और कश्मीर के। इसके पहले वो आर्मी मिनिस्टर और रेवेन्यू मिनिस्टर भी रहे थे। आजादी के आस-पास उथल-पुथल वाले माहौल में जनक सिंह केवल 65 दिनों तक जम्मू और कश्मीर के प्रधानमंत्री रहे।
15 अक्टूबर 1947 से 5 मार्च 1948
जनक सिंह के बाद जम्मू और कश्मीर के प्रधानमंत्री पद पर मेहर चंद महाजन की एंट्री होती है। इन्हीं के समय आजाद भारत और पाकिस्तान के बीच जम्मू और कश्मीर को लेकर पहला युद्ध (22 अक्टूबर 1947 से 5 जनवरी 1949) लड़ा गया। युद्ध की शुरुआत के 4 दिनों के बाद 26 अक्टूबर को जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बन जाता है। मतलब प्रधानमंत्री के तौर पर मेहर चंद महाजन ने अपना रोल बखूबी निभाया होगा, इसमें कोई शक नहीं।
5 मार्च 1948 – 9 अगस्त 1953
शेख अब्दुल्ला इस कहानी के तीसरे पात्र हैं। आजाद भारत में जम्मू और कश्मीर के तीसरे प्रधानमंत्री भी। लगभग साढ़े पाँच साल यह जम्मू और कश्मीर के प्रधानमंत्री रहे। तब राज्य के चीफ करण सिंह (राजा हरि सिंह के बेटे) ने शेख अब्दुल्ला को प्रधानमंत्री पद से हटा दिया। इतना ही नहीं, कश्मीर कॉन्सपिरेसी केस मामले में अब्दुल्ला को लगभग 11 साल तक जेल में भी रहना पड़ा।
PM से CM पद तक का सफर
नाटकीय घटनाक्रम के तहत 8 अप्रैल 1964 को शेख अब्दुल्ला पर लगे सारे आरोप हटा लिए जाते हैं। ये फिर से राजनीति में आते हैं। दुखद यह कि जो शख्स कभी जिस रियासत का प्रधानमंत्री था, उसने अपने आत्मसम्मान का गला घोंटकर मुख्यमंत्री बनना स्वीकार कर लिया। एक बार नहीं, बल्कि 2-2 बार। 25 फरवरी 1975 से 26 मार्च 1977 और फिर 9 जुलाई 1977 से 8 सितंबर 1982 तक शेख अब्दुल्ला जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे।
शेख अब्दुल्ला के पोते हैं उमर अब्दुल्ला। वो भी जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उनके पापा हैं फारुक अब्दुल्ला – मतलब शेख अब्दुल्ला के बेटे। ये भी जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। बाप का, दादा का, पोता का… मतलब जम्मू और कश्मीर की राजनीति खानदानी पेशा है इनका।
उमर अब्दुल्ला शायद अपने दादाजी का नाम और इतिहास भूल गए हैं। यह कहानी उमर के लिए भी। उनको याद दिलाने के लिए कि कैसे उनके दादाजी ने ‘वज़ीर-ए-आज़म’ का सपना थूक कर मुख्यमंत्री की कुर्सी थामी थी। और चुनावी माहौल में पोता चले हैं अपने दादा के थूके हुए को चाटने… ताकि फिर से ‘वज़ीर-ए-आज़म’ का सपना बेच कर सत्ता की कुर्सी पर तशरीफ़ रखी जा सके। मतलब साफ है – थूकना हो या थूक कर चाटना हो – कुर्सी पाना खानदानी पेशा है इस परिवार का।
इस साल 19 जनवरी को, AAP समर्थक प्रोपेगेंडा वीडियो ब्लॉगर ध्रुव राठी ने अपने Youtube चैनल पर एक वीडियो अपलोड किया था जिसमें बताया गया था कि कैसे राजनेता टीवी बहस में पूछे गए कठिन सवालों को दरकिनार करते हैं। राजनेताओं के इस व्यवहार को समझाने के लिए, राठी के साथ एक और बहरूपिया व्यक्ति राजनेता की भूमिका में था। नेता के नाम पर इस अभिनेता के माथे पर एक बड़ा भगवा तिलक था और गले में एक मोतियों की माला थी जो रुद्राक्ष की तरह दिखती है।
हालाँकि, अभिनेता की कल्पना ने उस राजनेता का रूप ले लिया था जिसे आमतौर पर राठी द्वारा टारगेट किया जाता है। राजनेताओं की ‘लॉजिकल फ़ैलेसी’ को समझाते हुए राजनेता का परिचय अंध भक्त बनर्जी नामक एक बड़े मोदी समर्थक के रूप में कराया गया। एजेण्डाधारी ध्रुव राठी द्वारा लिए गए संघी राजनेता के साक्षात्कार की कई क्लिपें, एक मोनोलॉग के फॉर्म में डाली गई थीं, जो राजनेताओं के विभिन्न तार्किक फ़ैलेसी की व्याख्या करने के लिए इस्तेमाल किया गया था।
वैसे तो लगभग सभी विचारधाराओं और दलों के राजनेता लॉजिकल फ़ैलेसी अर्थात विभिन्न विरोधाभाष या कुतर्क का उपयोग करते हैं जैसे कि स्ट्रोमैन तर्क (strawman argument), स्लिपरी स्लोप (slippery slope), सर्कुलर तर्क (circular argument), लाल हेरिंग (red herring) आदि, लेकिन वीडियो में यह समझाने की कोशिश की गई कि जैसे केवल भाजपा के राजनेता ही ऐसी रणनीति में लिप्त हैं।
अन्य पार्टियों के राजनेताओं द्वारा भी इस तरह की रणनीति का उपयोग किया जाता है, यही दिखाने के लिए एक अन्य यूट्यूब चैनल ने उस वीडियो को एडिट किया और Youtube पर अपलोड किया। इस वीडियो में, ध्रुव राठी के मोनोलॉग को बरकरार रखा गया था, लेकिन वीडियो में इस्तेमाल किए गए नकली साक्षात्कार के उदाहरण को हटाकर, उन्हें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के वास्तविक साक्षात्कार और भाषणों के साथ बदल दिया गया था।
Coward @dhruv_rathee can’t tolerate when answered in his own language & got my video with 50k+ views deleted by reporting it.His fans are threatening me now but I’m not scared,I know u people are w/ me. I request everyone to download & share this video maxhttps://t.co/m2iXtG6OZy
कमाल की बात ये है कि क्लिप को इस तरह बदल दिया गया था कि वीडियो का कथानक बिलकुल वैसा ही रहे। केजरीवाल की क्लिप ध्रुव राठी द्वारा अपने वीडियो में किए गए तर्कों से बिल्कुल मेल खाती थी। संपादित वीडियो में उपयोग किए गए क्लिप केजरीवाल को उसी रणनीति का उपयोग करते हुए दिखाते हैं, जो वीडियो में इस तरह से दिखाया गया था कि जैसे केवल भाजपा नेताओं द्वारा उपयोग किया जाता हो।
संपादित वीडियो से ऐसा लग रहा है कि ध्रुव राठी लॉजिकल फ़ैलेसी को समझाते हुए AAP सुप्रीमो का पर्दाफाश कर रहे हैं और आप समर्थक ध्रुव राठी के लिए यह एक बड़ी शर्मिंदगी वाली बात है। इसलिए उसने कॉपीराइट उल्लंघन का हवाला देते हुए YouTube से वीडियो को हटा दिया है। जिसे हटाने से पहले 50 हजार से अधिक बार देखा गया था।
चैनल के मालिक ने यह भी बताया कि कॉपीराइट उल्लंघन के लिए चैनल को YouTube द्वारा निलंबित कर दिया गया था। इसलिए उन्होंने अन्य वेबसाइटों पर वीडियो अपलोड किया है। वीडियो नीचे देखा जा सकता है।
यह साफ देखा जा सकता है कि वीडियो को राठी के प्रोपेगेंडा को आईना दिखाने के लिए, एक व्यंग्य के रूप में संपादित किया गया था, यह साबित करने के लिए कि अरविंद केरीवाल भी मूल वीडियो में बताए गए रणनीति का ही उपयोग करते हैं। संपादित वीडियो वास्तव में यह साबित करता है कि ध्रुव राठी सही है, क्योंकि अब इस वीडियो में उनके स्पष्टीकरण के सन्दर्भ में वास्तविक जीवन के उदाहरण थे। चलते-चलते एक और बात, विश्लेषण, समीक्षा या व्यंग्यात्मक उद्देश्यों के लिए मूल कार्य का उपयोग अवैध नहीं है, लेकिन फिर भी प्रोपेगेंडा चलाने वालों की वजह से वह वीडियो हटा दिया गया।
आयुष्मान योजना ने किस कदर लोगों की मदद की है, इसे जानने के लिए गाँवों की तरफ रुख करना होगा। ग्रामीण, गरीब, किसानों से मिलने पर पता चलता है कि किस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजना ‘आयुष्मान भारत’ न सिर्फ ज़िंदगियाँ बचा रही बल्कि उन्हें जीने का सम्बल भी दे रही है। लोकसभा चुनाव की रिपोर्टिंग के दौरान जब पत्रकार विभिन्न लोकसभा क्षेत्रों में कवरेज के लिए गए हैं तो वहाँ किस तरह से विभिन्न सरकारी योजनाओं ने कितना लाभ पहुँचाया, कहाँ-कहाँ अभी भी सुधार की जरुरत है, ये सब बाहर आ रहा है।
दैनिक जागरण ने एक ग्रॉउंड रिपोर्ट पब्लिश की है पलामू का, बताता चलूँ कि पलामू लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र झारखंड के 14 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में से एक है। दो जिलों के कुछ हिस्सों को मिलाकर इस संसदीय क्षेत्र का गठन किया गया है।
पलामू की ही एक कहानी है विनोद की, कि किस तरह से एक बदहवास-सा मजदूर पिता अपनी सतमासी बेटी को लेकर दौड़ता हुआ अस्पताल पहुँचा। बिटिया के जन्म के साथ ही डॉक्टर ने जवाब दे दिया था। बड़े अस्पताल के लिए रेफर तो कर दिया गया पर पैसा न विनोद के पास और न ही उनके रिक्शा चलाने वाले पिताजी शिवनारायण चौधरी के पास, बेटी के जन्म के समय ही नीजि डॉक्टर के यहाँ नौ हजार रुपए खर्च करने के बाद, जमीन बेचने का मन बना चुके विनोद के अस्पताल पहुँचते ही उनका गोल्डन कार्ड बन गया। पता लगा आयुष्मान योजना के तहत बेटी का इलाज शुरू हो गया। बिना एक पैसा खर्च किए। यह उनके लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था। आज विनोद की बेटी अच्छी है। जमीन बेचने की नौबत नहीं आई। आयुष्मान योजना ने उसकी जमीन बचा दी और बच्ची भी।
जागरण की रिपोर्ट में ही एक और घटना जिक्र है कि पांकी के पगार खुर्द के सलोक का, सलोक एक बीघा जमीन के मालिक हैं, माँ-बेटी की जान बचाने के लिए डॉक्टर ने बड़े अस्पताल के लिए रेफर तो कर दिया। पिताजी छठू साव राँची में रिक्शा चलाते हैं। माली हालत ऐसी नहीं थी कि जमा पैसे से इलाज करा पाते। सलोक ने जमीन बेचकर भी इलाज कराने का फैसला किया और पहुँच गया पलामू। 42 दिनों से एनआइसीयू में भर्ती बेटी का, रोजाना तीन-चार हजार रुपए के हिसाब से कोई डेढ़ लाख रुपए का बिल बन गया लेकिन आयुष्मान भारत योजना से पूरा इलाज हुआ, उसकी भी जमीन बिकने से बच गई।
गाँव में एक कहावत है कि ‘जिसे अस्पताल और अदालत का चक्कर लगा वह बर्बाद हो गया।’ सोचिये फिर उन गरीबों पर क्या बीतती होगी जिन्हें खाने के लाले पड़े हैं या बस किसी तरह से गुज़ारा कर रहे हैं।
आयुष्मान भारत योजना ने किसी तरह मजदूरी का जीवन यापन करने वाले गरीबों के लिए, किसानों के लिए, यह योजना बहुत बड़ा सहारा है। पाँच साल के बीजेपी के शासन काल में जहाँ उनकी बाकी ज़रूरतें उज्ज्वला, अन्त्योदय सहित विभिन्न योजनाओं से पूरी हो रही थी। आयुष्मान योजना ने सबसे बड़ी समस्या स्वास्थ्य सुरक्षा को भी सुनिश्चित कर दिया।
जागरण के रिपोर्ट के अनुसार ही बता दें कि पलामू के अस्पतालों में विनोद और सलोक जैसे कोई 6200 मरीज थे जिनका एक साल के भीतर इलाज हुआ। इस मद में करीब साढ़े छह करोड़ रुपए खर्च हुए। अनेक गरीबों की जमीन बिकने से बची तो अनेक सूदखोरों के चंगुल में फँसने से बचे।
रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ पलामू में ही 65 हजार से अधिक लोगों के गोल्डन कार्ड बन चुके हैं। ये सभी सूचीबद्ध 37 सरकारी गैर सरकारी अस्पतालों में इलाज करा सकते हैं। पाँच लाख तक का मुफ्त इलाज सेवा का लाभ लेने वालों के दिल से योजना चलाने वाले के लिए आयुष्मान भव: का आशीर्वाद निकलना अस्वभाविक नहीं है।
ये आँकड़े तो सिर्फ एक लोकसभा क्षेत्र के हैं। आज देश में इस योजना ने गरीबों, वंचितों, किसानों को उस बेबसी और लाचारी से बाहर लाने में बड़ी मददगार सिद्ध हुई है। अब उन्हें पैसों की किल्लत की वजह से अपनों को नहीं खोना पड़ेगा। हालिया संशोधनों के बाद आयुष्मान भारत योजना के तहत देश के सभी बड़े विशेषज्ञ चिकित्सकों को इससे जोड़ा जा रहा है, ताकि देश का कोई भी गरीब, वंचित वर्ग बीमारी की लाचारी में अपने जमीन और जीवन भर की कमाई से वंचित न हो।
केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) के 57वें वार्षिक दिवस पर सीबीआई निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला ने कहा कि सीबीआई को लोगों, संसद, न्यायपालिका और सरकार के भरोसे का से खुशी मिल रही है। जब भी कोई बड़ा अपराध होता है या एक विश्वसनीय जाँच की आवश्यकता होती है, तो हमेशा सीबीआई जाँच की माँग होती है। इस दौरान सीबीआई ने भ्रष्टाचार से संबंधित आँकड़े जारी किए। इन आँकड़ों से पता चलता है कि पिछले साल सीबीआई के जाँच के अनुसार 1,468 लोगों को भ्रष्टाचार के मामलों में दोषी ठहराया गया। इन आँकड़ों के अनुसार एंटी-ग्राफ्ट एजेंसी ने 2018 से अब तक 8,999 केस और प्रारंभिक पूछताछ के मामले दर्ज किए गए थे, जिनमें से 544 मामलों में दोष साबित करने में सफलता हासिल हुई। जिसके बाद अदालतों के निर्देश पर इनमें से 209 मामले उठाए गए।
एजेंसी का दावा है कि उसने रिश्वत के आरोपों का पता लगाने के लिए 156 ट्रैप ऑपरेशन किए थे और बैंक धोखाधड़ी से संबंधित 211 मामले दर्ज किए थे। सीबीआई के एक प्रवक्ता ने पुष्टि करते हुए कहा कि कई संवेदनशील मामलों में भी सजाएँ दी गई हैं,। उन्होंने कहा कि सीबीआई ने शिमला में एक नाबालिग लड़की के बलात्कार और हत्या के मामले की जांच करते हुए भारत में पहली बार डीएनए और वंश मिलान के प्रतिशत मिलान की तकनीक का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया।
सीबीआई के निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला ने 14 जांच अधिकारियों, 6 कानून अधिकारियों, 46 कार्यकारी और 46 कार्यकारी और मंत्रालयिक कर्मचारियों और 2 तकनीकी अधिकारियों को निदेशक सीबीआई के प्रशस्ति पत्र और उनके अनुकरणीय कार्य के लिए नकद पुरस्कार से सम्मानित किया है। इस दौरान सीबीआई अधिकारियों को दिए अपने संबोधन में, शुक्ला ने शिकायत निवारण के महत्व पर भी जोर दिया और इस संबंध में संगठन के सभी अधिकारियों के लिए ‘ओपन डोर पॉलिसी ’का उल्लेख किया।
शुक्ला ने कहा कि सीबीआई एक भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसी से बहुआयामी, बहु-विषयक केंद्रीय पुलिस कानून प्रवर्तन निकाय के रूप में विकसित हुई है, जिसमें देश भर में अपराधों की जाँच और मुकदमा चलाने की क्षमता, विश्वसनीयता और कानूनी जनादेश है। हाल ही में, एक नियुक्ति समिति में आईपीएस ऋषि कुमार शुक्ला को नए सीबीआई निदेशक के रूप में नियुक्त किया। इसमें पीएम मोदी, सीजेआई राजन गोगोई और लोकसभा में कॉन्ग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे शामिल थे।
भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बाद सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा के पद से हटने के बाद सीबीआई प्रमुख का पद 10 जनवरी से खाली पड़ा हुआ था। सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा के इस्तीफा देने के बाद एम नागेश्वर राय ने कार्यभार संभाला था।
ऋषि कुमार शुक्ला को नव निर्वाचित कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा मध्य प्रदेश में डीआईजी के रूप में अपने पद से हटा दिया गया था, जिसकी वजह से सरकार और विपक्ष के बीच जुबानी जंग छिड़ गई थी। सीबीआई के पूर्व निदेशक आलोक वर्मा और एजेंसी के पूर्व उप प्रमुख राकेश स्थाना के बीच भी कुछ ठीक नहीं था। दोनों अधिकारियों ने एक-दूसरे के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए और एजेंसी की प्रतिष्ठा पर एक गंभीर प्रहार किया।