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इस्लाम के आने से शिंजियांग में बिगड़े हालात, 5 वर्षों में 30,000 आतंकियों को किया दण्डित: चीन

पड़ोसी देश चीन ने आतंकवाद से लड़ाई के मुद्दे पर वाइट पेपर जारी किया है। चीन पर शिंजियांग प्रान्त में मानवाधिकार हनन के आरोप लगते रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सत्ता संभालने के बाद मानवाधिकार हनन के मामले और ज्यादा हो गए हैं। अब चीन ने दावा किया है कि उसने पिछले पाँच वर्षों में शिंजियांग प्रान्त से 13,000 इस्लामिक आतंकियों को गिरफ़्तार किया है। चीन का शिंजियांग प्रान्त अलगाववाद और कट्टरवाद की चपेट में है। चीन के इस पश्चिमी प्रांत में रह रहे उईगर मुस्लिम ख़ुद को तुर्क के क़रीब मानते हैं लेकिन चीन ने “The Fight Against Terrorism and Extremism and Human Rights Protection in Xinjiang” नामक रिपोर्ट में कहा है कि 20वीं सदी की शुरुआत में ही यहाँ पैन-इस्लामिक और पैन-तुर्की सोच हावी हो गई थी।

चीन की आतंकियों पर बड़ी कार्रवाई

रिपोर्ट में चीन ने कहा है कि इस क्षेत्र में इस्लाम के आने के साथ ही यहाँ की धार्मिक संरचना में बदलाव आ गया और शासकों ने युद्ध और जबरदस्ती इस्लाम को फैलाया। चीन ने साथ ही यह भी दावा किया कि उसने क्षेत्र में मानवाधिकार की रक्षा की है। यह संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की ‘वर्ल्ड रिपोर्ट 2018‘ में कही गई बातों के एकदम विपरीत है। यूएन ने कहा था कि चीन उईगर मुस्लिमों के तौर-तरीकों और परम्परा को ख़तरनाक मानता है। संयुक्त राष्ट्र ने कहा था कि चीन ने क्षेत्र के कुछ हिस्सों में लोगों को जबरन एक सरकारी सर्विलेंस ऐप डाउनलोड करने को मजबूर किया।

संयुक्त राष्ट्र ने चीन की भर्त्सना की थी

जबकि, चीन ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि उसने 2014 से अब तक 12,995 आतंकियों को गिरफ़्तार किया, 2,052 विस्फोटक सामग्री को जब्त किया, 1,588 हिंसक एवं आतंकी गैंगों को नेस्तनाबूत किया, 30,645 लोगों को 4,858 अवैध धार्मिक गतिविधियों (illegal religious practices) के लिए दण्डित किया। चीन ने आँकड़े गिनाते हुए कहा कि कई तो ऐसे आतंकी थे जिन्होंने दंड पाने के बावजूद फिर से वही कार्य किया। ऐसे लोगों पर और भी अधिक कार्रवाई की गई। चीन ने कहा है कि शासन से लेकर स्कूलों तक, हर जगह धार्मिक बीज बोए जा रहे थे, जिसपर क़ाबू पाने के लिए हरसंभव प्रयास किए गए।

चीन ने कहा कि इस्लाम के आने के बाद यहाँ युद्ध जैसी स्थिति बन गई

चीन ने क्षेत्र में रोज़गार सहित कई विकास कार्यों को गिनाते हुए दावा किया कि उसने आतंक और अलगाववाद को समाप्त करने के लिए जनता के लिए विकास कार्यों का सहारा लिया है। चीन ने अपने प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि इन्ही सब उपायों के कारण पिछले 2 वर्षों से शिंजियांग में कोई हिंसक आतंकी गतिविधि नहीं हुई है। चीन ने दावा किया कि उसने इसके लिए किसी भी धर्म विशेष या उसकी रीति-रिवाजों को निशाना नहीं बनाया। चीन ने दावा किया कि कम्युनिस्ट पार्टी के शासनकाल में शिंजियांग के लिए यह आर्थिक व सामाजिक उत्थान का दौर है।

हालाँकि, चीन के इन आँकड़ों से पता चलता है कि चीन भले ही मसूद अज़हर को ग्लोबल आतंकी घोषित करने में लगातार अड़ंगा लगाता रहा हो लेकिन अपने देश में उसने आतंकवाद को लेकर मानवाधिकारों का हनन करने के साथ-साथ सभी हथकंडे अपनाए हैं। चीन के अनुसार, उसके देश में आतंकवाद वही है जो उसने अपनी परिभाषा के हिसाब से तय किया है। उस आतंकवाद को निरस्त करने के लिए चीन संयुक्त राष्ट्र से लेकर अपने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं तक की भी नहीं सुनता। ऐसे कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को ‘क्रैकडाउन 709’ का प्रयोग कर जेल में डाल दिया गया।

कॉन्ग्रेस नेता ने गुस्से में लगाई पार्टी के झंडे में ही आग, चुनाव प्रचार सामग्री को भी किया खाक

हैदराबाद में एक कॉन्ग्रेस नेता ने गुस्से में आकर पार्टी के झंडे के साथ अन्य चुनाव प्रचार सामग्री में आग लगा दी। साथ ही आरोप लगाया कि पार्टी में उनके कार्यों और प्रयासों को तवज्जों नहीं दी जाती है, इसलिए उन्होंने फैसला किया है कि वो अब टीआरएस में शामिल हो जाएँगे।

इस कॉन्ग्रेसी नेता का नाम कृष्णक मन्ने है। कृष्णक का कहना है कि उन्होंने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया है क्योंकि तेलंगाना प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी (टीपीसीसी) अध्यक्ष यूके रेड्डी उनके किए कार्यों को तवज्जो नहीं देते थे। जिसके कारण वो काफ़ी निराश हैं। उनका आरोप है कि पार्टी के नेताओं ने बहुत पैसा कमा लिया है लेकिन फिर भी पार्टी के लिए काम नहीं करते हैं।

कृष्णक ने बताया कि वह केटी रामा राव की मौजूदगी में टीआरएस में शामिल होंगे। कृष्णक के साथ कॉन्ग्रेस को लगने वाले झटके चुनाव के नज़दीक आते-आते बढ़ते ही जा रहे हैं। इसके पूर्व कॉन्ग्रेस के 2 विधायक आर के राव और अतराम सक्कू ने भी कॉन्ग्रेस को छोड़कर टीआरएस में शामिल होने का फैसला लिया था। इसके पीछे उन्होंने कारण दिया था कि अनुसूचित जनजातियों के कल्याण और हित के लिए यह कदम उठाया है।

कृष्णक मन्ने सिकंदराबाद के जाने-माने नेताओं में से एक हैं। उनका कहना है कि 2014 के चुनावों में उन्हें सिकंदराबाद से उम्मीदवार घोषित किया गया था लेकिन आखिरी समय में उनके नाम को वापस ले लिया गया। मन्ने ने 2012-13 में तेलंगाना को अलग राज्य का दर्जा दिलाने की माँग की थी, और बाद में वह कॉन्ग्रेस से जुड़ गए थे।

बता दें कि सिर्फ़ हैदराबाद ही नहीं, अन्य राज्यों में भी कॉन्ग्रेस पार्टी के कई नेता पहले ही पार्टी को छोड़ चुके हैं। ऐसे में देखना है कि कार्यकर्ताओं की पार्टी से शिकायत से लेकर मतदाताओं को मनाने तक कॉन्ग्रेस किस तरह खुद को लोक सभा चुनाव तक मजबूत रख पाती है।

बॉलीवुड के ‘पाक’ कलाकार: संवेदना मौत से नहीं, ‘मस्जिद में मौत’ पर जागती है

साल 2019 में न्यूजीलैंड के लिए 14 मार्च का दिन बिलकुल वैसा ही था जैसा भारत के लिए 14 फरवरी का दिन था। अंतर केवल यह था कि वहाँ इबादत करने आए आम लोगों ने अपनी जान गवाई और यहाँ भारत ने अपने सैनिकों को खोया। जाहिर है दुख दोनों ही घटनाओं पर सबको बराबर हुआ और होना भी चाहिए। पूरे विश्व में इन दोनों हमलों को लेकर लोगों में रोष देखने को मिला। बावजूद इसके कुछ लोगों ने मज़हब और मुल्क की आड़ में अपनी भावनाओं पर ऐसी महीन रेखा खींची कि न चाहते हुए भी इन दोनों वाकयों में ऐसे लोगों की ‘सोच का फेर’ दिखने लगा।

ये लोग कोई और नहीं बल्कि पाकिस्तान के ही कुछ वो कलाकार हैं, जिन्हें भारत में आकर नाम, पैसा, शोहरत, प्यार सब हासिल हुआ। लेकिन बात जब आतंक से जुड़ी तो वह कर्मभूमि के एहसानों को भूल गए, और अपने देश या मज़हब परस्त होने का सबूत दे डाला। न्यूजीलैंड हमले पर खुलकर बोलने पर वाले अली ज़फर, माहिरा खान जैसे कलाकार पुलवामा पर चुप्पी साधे हुए थे। हैरानी की बात है कोई शख्स इतना मज़हब या देश परस्त कैसे हो सकता है कि कर्मभूमि से ही एहसान फरामोशी पर उतर आए।

हम उनके न्यूजीलैंड हमले पर दुख जाहिर करने पर सवाल नहीं उठा रहे। उठाएँगे भी क्यों? हम केवल जानना चाहते हैं कि पुलवामा पर उनके चुप रहने के क्या कारण हैं? क्या कारण है कि उनकी ‘कर्मभूमि’ की रक्षा पर तैनात सैनिकों पर हुए इतने बड़े हमले से उनका दिल नहीं पसीज़ा लेकिन न्यूजीलैंड हमले पर वो एकदम से भावुक हो उठे?

यहाँ हम आपको कुछ उन पाकिस्तानी कलाकारों के ट्विटर अकॉउंट में फर्क़ दिखा रहे हैं, जिसके कारण यह सवाल पैदा हुआ।

अली ज़फर

न्यूजीलैंड हमले के बाद पाक कलाकार अली जफर ने ट्वीट किया, “नमाज के वक्त बेगुनाह मुस्लिमों को मौत के घाट उतारते हुए शख्स का वीडियो देखा, जिसने मुझे सबसे ज्यादा परेशान किया, यह बात दिमाग में आ रही है कि अब विश्व इसे हिंसक कार्रवाई कहेगा या आतंकी।” बॉलीवुड फिल्में देखने वाला शायद ही कोई ऐसा होगा जो अली ज़फर को नहीं पहचानता हो।

न्यूजीलैंड में विश्व के ज्ञान पर सवाल उठाने वाला अली 14 फरवरी को ट्विटर पर अपना फोटोशूट शेयर कर रहा था, सूखे मेवों के साथ अपने दोस्त को उर्दू की किताब भेजने के लिए शुक्रिया बोल रहा था, वीडियो अपलोड कर रहा था। लेकिन पुलवामा पर उसने कुछ नहीं बोला। 18 तक भी चुप रहा। 19 को उसने पुलवामा पर अपना मुँह खोला – ‘पाकिस्तान पीएम के पावरफुल स्पीच’ और ‘पाकिस्तान करेगा जवाबी कार्रवाई’ – वाले ट्वीट को रिट्वीट करके।


14 फरवरी वाले दिन अली जफर के ट्वीट का स्क्रीनशॉट और दाहिने सबसे नीचे 19 फरवरी को इमरान खान के ‘पावरफुल स्पीच’ रिट्वीट

मावरा होकेन

बॉलीवुड फिल्म ‘सनम तेरी कसम’ से पहचान हासिल करने वाली मावरा होकेन का भी हाल कुछ अली जैसा ही रहा। पुलवामा पर चुप्पी बांधे रखने वाली ने मावरा ने न्यूजीलैंड हमले पर लिखा, “जुम्मा मुबारक, प्यार, अमन, शांति, सम्मान और सहनशीलता होनी चाहिए, इस हमले से आहत हूँ, अगर कोई भी शख्स इबादत की जगह हमला करता है तो वह किसी भी धर्म का कैसे हो सकता है।”

इबादत की जगह आतंक पर सवाल उठाने वाली यही मावरा 15 फरवरी को भी जुम्मा मुबारक बोल रही थी, प्रेम के सौंदर्य का बखान कर रही थी, खूबसूरत तस्वीरें डाल रही थी। लेकिन पुलवामा पर…


15 फरवरी के दिन इस तरह मावरा ने किया जुम्मा मुबारक, 17 फरवरी को मौत पर वो ‘एक्सप्रेसिव’ नहीं थी लेकिन 15 मार्च को अचानक से शब्द मिल गए!

माहिरा खान

रईस की लीड हिरोईन और पाकिस्तानी कलाकारों में एक नाम माहिरा का भी है, जिसे भारत ने बड़ी पहचान दी। माहिरा को उरी हमले के बाद पाकिस्तान वापस भेज दिया गया था, जिसके कारण कुछ तथाकथित सेकुलरों ने विरोध में आवाज़ें भी उठाई थीं। उसी माहिरा ने न्यूजीलैंड पर गहरा दुख व्यक्त किया और मारे गए लोगों के परिजनों के लिए दुआएँ भी माँगीं।

ऐसे में कमाल की बात यह है कि माहिरा ने पुलवामा हमले वाले दिन ट्विटर से अपने फैंस को इंस्टाग्राम पर लाइव होने की सूचना दी थी। जबकि पुलवामा में वीरगति को प्राप्त हुए जवानों पर एक शब्द भी उससे नहीं लिखा गया।

माहिरा का ट्वीट 14 फरवरी से लेकर 15 मार्च तक : पुलवामा पर चुप रहने वाली अचानक से एक्टिव हो गई

हैरानी होती है ऐसे लोगों पर जिन्हें कमाने-खाने के लिए भारत का सहारा चाहिए, लेकिन संवेदनाएँ प्रकट करने के लिए दोहरा रवैया अपनाते हैं। ऐसे लोगों पर शक होता है कि अगर यह न्यूजीलैंड का हमला मस्जिद में न होकर किसी और जगह होता तो भी शायद इनके ट्विटर अकॉउंट पर केवल सेल्फी और इनके इवेंट्स की जानकारी ही होती। ‘पाक’ कलाकारों पर बरती जाने वाली सख्ती पर कुछ लोगों की आवाज़े हर मौक़े पर बुलंद होती हैं, लेकिन वो भूल जाते हैं कि जिस प्रेम के चलते वो इन कलाकारों के समर्थन में अपनों के विरोध पर आ खड़े हुए हैं, वही कलाकार ऐसे मौक़ों पर अपनी वास्तविक प्रवृति का सबूत दे देते हैं।

इससे पहले एक पोस्ट में हम आपको पाकिस्तान के गायक और भारतीय राजनयिक की हवाई यात्रा पर हुई बातचीत का किस्सा बता चुके हैं, जिसमें गायक ने भारतीय राजनयिक को पाकिस्तानी समझते हुए भारत में होने वाले उनके दौरों पर बात करते हुए भारत के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था। इसी माहौल में वो ‘काफ़िर’ भारतीय लोगों पर खूब बरस भी रहे थे, साथ ही उन्होंने कहा था कि एक ‘मोमिन’ होने के नाते वो भारत देश के काफ़िरों की सिर्फ शराब, शबाब और पैसा पसंद करते हैं और इसमें उन्हें कोई परेशानी नहीं होती।

हवाई सफ़र से उतरने के बाद जब राजनयिक ने उन्हें बताया कि वो पाकिस्तानी नहीं बल्कि भारतीय राजनयिक हैं तो गायक ने फ़ौरन उनसे माफ़ी माँगी और गिड़गिड़ाए भी। लेकिन राजनयिक की सिफ़ारिश पर उस गायक को तुरंत ही ब्लैक लिस्ट कर दिया गया था।

सोचिए! जिन पर आफत आने पर ‘हम कलाकारों की कोई जाति नहीं होती’ जैसे बातें बोलते हैं, वही समय आने पर कैसे अपनी हकीक़त से खुद ही पर्दा उठा देते हैं।

मनोहर पर्रिकर के इस बड़े फैसले ने देशवासियों के बचाए ₹49,300 करोड़

लंबे समय से कैंसर की बीमारी से जूझ रहे गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर का रविवार को निधन हो गया। जीवन और राजनीति में फाइटर रहे पर्रिकर अंतिम समय में भी एक फाइटर की तरह लड़े। उनकी सादगी और कर्मठता की हर कोई सराहना कर रहा है।

मनोहर पर्रिकर नवंबर 2014 से मार्च 2017 तक देश के रक्षा मंत्री रहे। 2017 में रक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देकर वो गोवा के सीएम बने। बतौर रक्षा मंत्री, पर्रिकर ने देश के हित में कई ऐसे अहम फैसले लिए हैं, जिसकी मिसाल दी जाती है। साल 2016 में जब भारतीय जवानों ने PoK में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक किया था, उस समय देश के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ही थे और इनकी अगुवाई में ही इतने बड़े पैमाने पर सर्जिकल स्ट्राइक की योजना को अंजाम दिया गया था। और इससे पहले भी जब साल 2015 में भारतीय फौज ने म्यांमार में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक किया था, तब भी देश के रक्षा मंत्री पर्रिकर ही थे।

इतना ही नहीं पर्रिकर ने रक्षा मंत्री रहते हुए कई ऐसे भी फैसले लिए हैं, जिसका फायदा देश को 2027 तक होता रहेगा। इन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान देश के एयर डिफेंस प्लांस में बदलाव किए, जिसकी वजह से अब अगले दशक तक एयर डिफेंस सिस्टम्स की खरीद पर देश के टैक्स देने वाले नागरिकों के ₹49,300 करोड़ बचने की संभावना हैं।

आपको बता दें कि मनोहर पर्रिकर ने रूस के एस-400 लॉन्ग रेंज मिसाइल शील्ड की ऊँची कीमत को देखते हुए 2027 तक नए एयर डिफेंस सिस्टम्स की खरीद के लिए 15 वर्ष के टर्म प्लान की समीक्षा का आदेश दिया। इस समीक्षा प्रक्रिया में कम दूरी के एयर डिफेंस सिस्टम्स की खरीद घटाने पर सर्वसहमति बनी। एस-400 एक ऐसी मिसाइल है, जो चोरी- छुपे हमला करने आ रहे विमानों और मिसाइलों को 380 किमी की दूरी से ही मार गिराने में सक्षम  है।

हालाँकि, एयर डिफेंस स्ट्रैटजी तीन स्तरों की होती है- 25 किमी तक की दूरी से अति गंभीर उपकरणों की सुरक्षा के लिए कम दूरी वाले सिस्टम, 40 किमी तक की मध्यम दूरी वाले सिस्टम और इससे ज्यादा दूरी के खतरों से रक्षा के लिए लंबी दूरी के सिस्टम। मगर मनोहर पर्रिकर ने वायु सेना को इस बात के लिए सहमत किया कि उनकी त्रिस्तरीय सुरक्षा योजना के मुताबिक लंबी दूरी के सिस्टम (एस-400) से मध्यम एवं कम दूरी के एसएएम की कोई जरूरत नहीं रहेगी और ये बेकार हो जाएँगे। जिसके बाद वायु सेना भी इसके लिए सहमत हो गए और ये डील भारत का अब तक का सबसे सस्ता डील बताया जा रहा है।

प्रियंका चली राहुल की ‘चाल’: प्रयाग से काशी तक बोट यात्रा, हनुमान मंदिर में पूजा

कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी ने आधिकारिक रूप से उत्तर प्रदेश के चुनावी महासमर में पार्टी के चुनाव प्रचार की शुरुआत कर दी। पूर्वी उत्तर प्रदेश में चुनावी जिम्मेदारी संभाल रही प्रियंका गाँधी ने हिन्दुओं को लुभाने और भाजपा के कोर वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए पूजा-पाठ से अपने चुनावी प्रचार अभियान की शुरुआत की। उन्होंने प्रयागराज से वाराणसी तक गंगा में बोट यात्रा भी शुरू कर दी है। रविवार (मार्च 17, 2019) रात को ही प्रयागराज पहुँची प्रियंका ने अपनी दादी के घर स्वराज भवन में रात गुजारी। गंगा यात्रा के लिए सुबह में निकली प्रियंका ने सबसे पहले संगम क्षेत्र स्थित बड़े हनुमान जी मंदिर में पूजा-अर्चना की। उन्होंने वहाँ आरती में भी हिस्सा लिया। इसके बाद उन्होंने किला स्थित अक्षयवट और सरस्वती कूप का भी दर्शन किया।

स्वराज भवन को पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू ने बनवाया था। बाद में उन्होंने इसे कॉन्ग्रेस कमेटी को। संगम पहुँच कर प्रियंका गाँधी ने गंगा आरती में हिस्सा लिया। इसके बाद वह नाव पर सवार होकर अरैल गईं। अरैल में कार से वह करछना के मनैया घाट पहुंची। वहाँ से वह मोटरबोट में सवार होकर उन्होंने गंगा यात्रा रैली शुरू कर दी। प्रदेश कॉन्ग्रेस प्रवक्ता किशोर ने उनके कार्यक्रम के बारे में बताते हुए कहा:

“प्रियंका गाँधी स्टीमर से दुमदुमा, सिरसा, लाक्षागृह, महेवा, कौंधियारा में स्थानीय लोगों से मिलेंगी। दौरे के पहले दिन प्रियंका पुलवामा के शहीद महेश यादव के परिजनों से मिलने मेजा स्थित बदल का पुरवा गाँव जाएँगी। प्रियंका सीतामढ़ी में रात्रि विश्राम करेंगी।”

इस यात्रा को सफल बनाने के लिए सोनिया गाँधी के लिए सोनिया गाँधी के सचिव द्वय केएल शर्मा और ज़ुबैर ख़ान लगे हुए हैं। प्रियंका की इस रैली को सफल बनाने के लिए कॉन्ग्रेस ने जी-जान झोंक दी है। प्रियंका द्वारा गंगा में बोत यात्रा निकाले जाने को नरेंद्र मोदी के ‘मुझे माँ गंगा ने बुलाया है’ वाले अभियान की काट के रूप में देखा जा रहा है। बता दें कि 2014 के चुनाव में मोदी ने वाराणसी में माँ गंगा का ज़िक्र किया था। उसके बाद वे समय-समय पर निर्मल गंगा की बात करते रहे हैं। प्रियंका द्वारा हनुमान मंदिर में पूजा करना भी कॉन्ग्रेस के सॉफ्ट-हिंदुत्व की तरह देखा जा रहा है।

प्रियंका गाँधी की इस रैली में उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर भी शामिल होंगे। क़रीब 150 किलोमीटर की इस यात्रा को पूरी करने के बाद प्रियंका वाराणसी में पार्टी कार्यकर्ताओं से मुलाक़ात करेंगी। इससे पहले प्रियंका लखनऊ में रोड शो कर चुकी हैं। उनकी यह यात्रा 38 गाँवों से होकर निकलेगी। ताज़ा रैली के दौरान वह विंध्यवासिनी व विश्वनाथ मंदिर में दर्शन भी करेंगी। इस दौरान प्रियंका गाँधी निम्नलिखित चीजों को कवर करेंगी:

  • मंदिर: बड़े हनुमान मंदिर, विंध्यवासिनी मंदिर, बाबा विश्वनाथ मंदिर
  • संसदीय क्षेत्र: इलाहाबाद, फूलपुर, भदोही, मीरजापुर, चंदौली और वाराणसी
  • रैली का स्टॉपेज: मनैया, दुमदुमा, सिरसा, लाक्षागृह व मांडा

लोकसभा चुनाव 2019: कॉन्ग्रेस को नहीं मिल रहा कोई साथी, ‘बुरे दिनों’ की शुरुआत

लोकसभा चुनाव के महासंग्राम में जोड़-तोड़ का का समीकरण हर ओर छाया है। आपसी गठबंधन पर बनते-बिगड़ते समीकरणों का ताना-बाना में लगभग हर पार्टी बुनने में व्यस्त है। ऐसे में कॉन्ग्रेस अपने बुरे दौर में साथियों की तलाश में है जिसके सहारे वो चुनावी मैदान में खुद को उतार सके। उत्तर प्रदेश में तो सपा-बसपा गठबंधन ने कॉन्ग्रेस को कोई तरजीह नहीं दी और शुरुआत से ही कॉन्ग्रेस को गठबंधन से बाहर का रास्ता दिखाया। वो बात अलग है कि कॉन्ग्रेस इस गठबंधन का हिस्सा बनने को पूरी तरह से लालायित थी।

बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने एक ट्वीट से यह स्पष्ट किया कि कॉन्ग्रेस पार्टी से उसका कोई तालमेल या गठबंधन नहीं है और लिखा कि लोग कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा फैलाए जा रहे तरह-तरह के भ्रमों में न आयें। मायावती के इस ट्वीट से कॉन्ग्रेस की स्थिति साफ हो जाती है कि यूपी में उसके साथ कोई नहीं है।

अपने एक अन्य ट्वीट में मायावती ने कॉन्ग्रेस को लगभग लताड़ लगाते हुए लिखा कि वो यूपी में पूरी तरह से स्वतंत्र हैं, चाहें तो सभी 80 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर दे लेकिन ज़बरदस्ती ये भ्रांति न फैलाए कि उसने यूपी में गठबंधन के लिए 7 सीटें छोड़ दी हैं।

ऐसा ही कुछ हुआ पश्चिम बंगाल में, जहाँ बीते रविवार को पश्चिम बंगाल कॉन्ग्रेस ने वाम मोर्चे के साथ गठबंधन की अपनी सभी संभावनाओं को समाप्त करने की घोषणा कर दी। बता दें कि पश्चिम बंगाल कॉन्ग्रेस की यह घोषणा तब की गई जब वाम मोर्चे ने 42 संसदीय सीटों में से 25 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा दो दिन पहले ही कर दी थी।

पश्चिम बंगाल के कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोमेन नाथ मित्रा ने कहा, “वाम मोर्चे ने 15 मार्च को पश्चिम बंगाल में 25 लोकसभा सीटों पर अपने कैंडिडेट की घोषणा की, जिसमें पश्चिम बंगाल की कॉन्ग्रेस के साथ कोई चर्चा नहीं की गई। वाम मोर्चे में CPI (M) और उसके सहयोगी दलों के एकजुट होने की वजह से, हम राज्य में प्रस्तावित सीट बँटवारे संबंधी संभावनाओं पर विराम लगा रहे हैं और बंगाल में स्वयं के बल पर बीजेपी और तृणमूल कॉन्गेस से लड़ने का फैसला किया है।”

यह कहना गलत नहीं होगा कि जिस तरह से कॉन्ग्रेस पार्टी का दामन कोई थामने को तैयार नहीं है उससे उसके बुरे दिनों की शुरुआत हो चुकी है। अब देखना होगा कि चुनावी दौर में कॉन्ग्रेस को अभी और कितने झटके लगने बाकी हैं।

सपा प्रत्याशी ‘मुन्नी’ के खिलाफ मुकदमा दर्ज, आचार संहिता उल्लंघन का आरोप

चुनाव की तारीख़ों की घोषणा के साथ ही आचार संहिता लागू हो गई है। साथ ही इसके उल्लंघन की खबरें भी आनी शुरू हो गईं। आपको बता दें कि आचार संहिता का उल्लंघन करने के आरोप में गाजियाबाद के साहिबाबाद व इंदिरापुरम में पुलिस ने 24 लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की है। जिसमें सपा-बसपा गठबंधन के प्रत्याशी सुरेंद्र कुमार उर्फ मुन्नी भी शामिल हैं। इनके ऊपर आरोप है कि ये वसुंधरा सेक्टर-11 में होली मिलन समारोह में चुनावी भाषण दे रहे थे।

इंदिरापुरम थाना प्रभारी निरीक्षक संदीप कुमार सिंह ने बताया कि वसुंधरा सेक्टर-11 में बिना अनुमति होली
मिलन समारोह मनाया जा रहा था। इसमें सुरेंद्र कुमार को बतौर मुख्य अतिथि बुलाया गया था। इस दौरान उन्होंने चुनावी भाषण तो दिए ही, साथ ही वोट भी माँग लिए। यह सीधे तौर पर आचार संहिता का उल्लंघन बताया जा रहा है। फ्लाइंग स्क्वायड की तहरीर पर पुलिस ने दोनों मामलों में आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने के आरोप में रिपोर्ट दर्ज की है। फ्लाइंग स्क्वॉड ने सुरेंद्र कुमार सहित जयचंद शर्मा, जे पी शर्मा, सी पी शर्मा और विजय भारद्वाज के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई है। मामले की जाँच की जा रही है। आरोप सिद्ध होने पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

खबरों की मानें तो इससे जुड़ा एक विडियो भी सामने आया है। इस वीडियो में सुरेंद्र कुमार उर्फ मुन्नी सार्वजनिक होली मिलन कार्यक्रम में वोट माँगते दिख रहे हैं। इस मामले पर सुरेंद्र कुमार का कहना है कि होली समारोह में जाना कोई गुनाह नहीं है और अगर उनके खिलाफ केस हुआ है तो इसका जवाब कानूनी प्रक्रिया के तहत देंगे। इसके साथ ही उन्होंने बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा कि ये सब भाजपा की साजिश है। बीजेपी के नेता तमाम जगह भाषण दे रहे हैं, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।

पैदा हुई जुड़वाँ बेटियाँ, माँ-बाप ने निकाली बारात: AC बग्घी, ढोल-नगाड़ों पर कर डाला 15 लाख रुपए खर्च

आज के बदलते दौर में कई बार ऐसे मौक़े आते हैं जब समाज में बेटी-बेटे के फ़र्क को मिटाने का भरपूर प्रयास किया जाता है। ऐसा करने के पीछे दुनिया को एक संदेश देना भी होता है कि बेटियाँ किसी भी मायने में बेटों से कम नहीं होतीं। अपनी इन्हीं कोशिशों को प्रेरणा का रूप देते हुए गुजरात के एक परिवार ने मिसाल क़ायम करने का अनूठा काम किया।

दरअसल, गुजरात के सूरत में रविवार को (मार्च 17, 2019) एक ऐसी बारात बड़ी धूमधाम से निकाली गई, जिसे देखकर लोगों को यही लगा कि कहीं किसी शादी का अवसर है और ये बारात वहीं जा रही है। बैंड-बाजे के साथ सजी बग्घी के आसपास लोग नाचते-गाते बड़ी खुशी के साथ एक घर पहुँचे। जहाँ इस बात का ख़ुलासा हुआ कि यह कोई शादी का समारोह नहीं था बल्कि दो बेटियों (जुड़वाँ) के जन्म पर उन्हें उनके ननिहाल से अपने घर लाया जा रहा था।

जुड़वाँ बेटियों को ननिहाल से घर तक लाने के लिए AC बग्घी का इस्तेमाल किया गया

ख़बर के अनुसार, आशीष जैन की पत्नी प्रतिमा ने जुड़वाँ बेटियों को जन्म दिया, जिसके बाद वो अस्पताल से अपने मायके गईं थीं। लेकिन बात जब बेटियों को घर लाने की हुई तो अपनी ख़ुशी को ज़ाहिर करने के लिए उनके पिता आशीष जैन ने कुछ ऐसे अनोखे अंदाज़ में स्वागत किया कि वो समाज में एक अमिट छाप छोड़ने के साथ-साथ पिता के भावुकता वाले पहलू को भी दर्शाता है। आशीष का कहना है कि बेटियों का इस तरह स्वागत करने का मक़सद यह था कि वो समाज को यह बता सकें कि बेटी और बेटे में कोई अंतर नहीं होता।

बता दें कि इस बारात पर बेटियों के पिता ने ₹15 लाख खर्च किए। घर को दुल्हन की तरह सजाया गया और एयर कंडीशन बग्घी का इस्तेमाल किया गया, जिससे बच्चियों को किसी तरह की असुविधा न हो। इसके अलावा नाते-रिश्तेदारों को आमंत्रित किया गया, जिन्होंने इस विशेष मौक़े पर जमकर नाच-गाना भी किया।

सच पूछें तो बेटियों को लेकर इस तरह की सोच और भव्य स्वागत तालियों की हक़दार है। इसकी जितनी प्रशंसा की जाए वो कम है। यदि आज इस तरह की सकारात्मक सोच हर किसी की हो जाए तो दुनिया के किसी कोने में कन्या-भ्रूण हत्या जैसी तमाम समस्याएँ खत्म हो जाएँगी।

26 साल बाद होगी OBC ‘क्रीमी लेयर’ के नियमों पर समीक्षा, समिति का हुआ गठन

सामाजिक न्याय मंत्रालय द्वारा 8 मार्च को एक समिति का गठन किया गया है। जिसका कार्य 26 साल पहले ओबीसी ‘क्रीमी लेयर’ के लिए बने नियमों की समीक्षा करना है। समिति को 15 दिनों के भीतर रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा गया है।

1993 में ओबीसी ‘क्रीमी लेयर’ के लिए कुछ नियम तय किए गए थे, जिनकी समीक्षा अब तक नहीं हुई थी। 2019 में 26 साल बाद सरकार ने इन नियमों की समीक्षा के लिए कुछ विशेषज्ञों की समिति का गठन किया है। जिसका नेतृत्व भारत सरकार के पूर्व सचिव बीपी शर्मा द्वारा किया जाएगा।

इस समिति का कार्य 1993 में प्रसाद समिति द्वारा तय नियमों की समीक्षा करना है, ताकि क्रीमी लेयर की अवधारणा को फिर से परिभाषित करने, सरल बनाने और सुधार करने के लिए सुझाव दिए जा सकें। यह समिति इंदिरा साहनी मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई व्यव्स्थाओं को ध्यान में रखते हुए नियमों की समीक्षा करेगी।

दरअसल, 26 साल बाद इन नियमों में समीक्षा करने की जरूरत इसलिए पड़ रही है क्योंकि कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग पीएसयू में कार्यरत लोगों को ‘क्रीमी लेयर’ वर्ग का तय करने के लिए पारिवारिक आय के अलग-अलग पैमानों को आधार बनाता है। जिसके कारण विवाद पैदा होता है। इस मुसीबत का असली कारण यह है कि पीएसयू में पदों को ग्रुप ए, बी, सी और डी में बाँटा नहीं गया है जबकि सरकारी नौकरियों में अलग-अलग ग्रुपों का प्रावधान है। इससे कारण बहुत कंफ्यूजन होता है।

बता दें कि यहाँ ‘क्रीमी लेयर’ का प्रयोग ओबीसी वर्ग में आर्थिक रूप से संपन्न लोगों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। इन लोगों को मंडल आयोग में किए गए आरक्षणों के प्रावधान का पात्र नहीं माना जाता है। इसलिए इन्हें आरक्षण के लाभ से बाहर रखने के लिए प्रसाद कमिटी की रिपोर्ट पर कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के 1993 के मेमोरंडम द्वारा नियम तय किए गए थे।

हालाँकि, नियमों पर समीक्षा के लिए समिति के गठन से ‘पिछड़ा वर्ग अधिकार’ के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता नाराज़ हैं और इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि भाजपा सदस्यों पर आधारित एनसीबीसी (राष्ट्रीय पिछड़ आयोग) के पास ओबीसी से जुड़े प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सुझाव देने की शक्ति है, इसलिए ऐसे में एक अलग समिति की कोई जरूरत नहीं है।

सस्ता सामान, आश्वासन टिकाऊ: चीन की दोमुँही विदेश नीति

चीन अपने सस्ते सामान के ज़रिए विश्वभर में अपनी एक अलग पैठ बना चुका है। चीन का सामान और उसकी क़ीमत आए दिन चर्चा का विषय बने होते हैं। वो बात अलग है कि क़ीमत के साथ-साथ उसके टिकाऊपन पर भी चर्चा होती है, जो अक्सर एक मज़ाक का भी रूप ले लेती है। सस्ता चाइनीज़ माल वैसे तो एक औसत आय के व्यक्ति की पॉकेट के लिए सुविधाजनक हो जाता है लेकिन उसका टिकाऊपन मन में कहीं घर कर ही जाता है।

यह तो रही बात चीन के व्यापार की। अब बात करते हैं भारत के संदर्भ में उसकी विदेश नीति की, जो खोखली होने के साथ-साथ दोमुँही भी है। खोखली इसलिए क्योंकि वो कहता कुछ है और करता कुछ है। दोमुँही इसलिए क्योंकि वो आश्वासन देने में कभी पीछे नहीं रहा, इसमें वो हमेशा अपना टिकाऊपन दिखाता है। इसमें वो ऊपरी तौर पर हमेशा कहता आया है कि हम भारत के साथ हैं और भारत के हितों की हमें परवाह है। लेकिन ये तमाम दावे फ़र्ज़ी ही होते हैं, जिनकी सीमा केवल ज़ुबान से कह देने भर की होती है, करने की कुछ नहीं।

पाकिस्तान, भारत को अब तक जिन आतंकी हमलों से लहू-लुहान करता आया है, उससे दुनिया परिचित है। पुलवामा आत्मघाती हमला भारत के सीने पर धोखे किया वो वार है, जिसकी विश्वभर में घोर निंदा हुई। इस हमले पर जहाँ सभी देश भारत के साथ खड़े थे वहीं चीन अपनी दोहरी चाल के साथ पाकिस्तान के साथ दोस्ती निभा रहा है। दोहरी चाल इसलिए क्योंकि जब-जब भारत ने उससे न्यायपूर्ण व्यवहार की अपेक्षा की, तब-तब चीन ने अपना असली रंग दिखाया।

अभी के परिदृश्य में देखा जाए तो चीन ने पाकिस्तान से अपना याराना निभाते हुए प्रतिबंधित आतंकी संगठन जैश-ए-मुहम्मद के सरगना मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित करने पर चौथी बार अड़ंगा लगाया। पिछले 10 सालों से वो अपनी इसी विदेश नाीति का अनुसरण कर रहा है जबकि मसूद को वैश्विक आतंकी की सूची में शामिल करने का प्रस्ताव अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने पेश किया था। फिर भी अपनी वीटो पावर का इस्तेमाल कर चीन ने पाकिस्तान के साथ अपने गहरे रिश्ते होने का प्रमाण दे ही दिया। हालाँकि भारत को झूठा दिलासा देने से भी नहीं चूकता चीन। समय-समय पर वो ऐसे समीकरण भी बुनता है, जिससे वो दुनिया को दिखा सके कि उसे भी भारत की चिंताओं का ज्ञान है।

चीनी राजदूत लुओ जाओहुई ने ऐसा ही कुछ कहा, जिसे ज़ुबानी खेल के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता। उन्होंने दिल्ली में चीनी दूतावास में होली समारोह के दौरान कहा कि मसूद अज़हर के बारे में हम सब समझते हैं और हम इस मामले पर पूरी तरह से विश्वास करते हैं। हम भारत की चिंताओं को समझते हैं और आशावादी हैं कि इस मामले को सुलझा लिया जाएगा।

चीन का यह दोहरा रवैया इसलिए भी है क्योंकि पाकिस्तान के साथ उसका रिश्ता उतना ही पुराना है जितना कि पाकिस्तान का इतिहास। इसलिए एक तरफ तो वो भारत पर हुए हमले की निंदा करता है और दूसरी तरफ पाकिस्तान को हमेशा अपनी छत्रछाया में सुरक्षित भी रखता है।

दरअसल, चीन की यह दोहरी नीति ही है, जिससे वो पाकिस्तान पर अपनी दयादृष्टि बनाए रखते हुए भारत पर अपना दबाव बनाए रखने का प्रयास करता है। साथ में भारत को पाकिस्तान से उलझाए रखने की अपनी चाल भी चलता है। ऐसा करने के पीछे चीन की मंशा भारत को विकसित होने से रोकना है और ख़ुद एक राष्ट्र के रूप में गतिमान बने रहना चाहता है। इसके अलावा वो नहीं चाहता कि एशियाई देशों में भारत का दबदबा क़ायम हो सके।

दूसरा कारण यह भी है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन अपने अधिकार और वैधता के वर्चस्व को बनाए रखना चाहता है, जिससे वो यह दिखा सके कि उसकी मर्ज़ी के बिना दक्षिण एशिया कुछ नहीं कर सकता। पाकिस्तान के प्रति चीन की वफ़ादारी का एक कारण यह भी है कि चाइना पाकिस्तान इकोनॉमी कॉरिडोर (CPEC) के बुनियादी ढांचे पर चीन ने बहुत बड़ा निवेश किया है। इस निवेश की आड़ में चीन, पाकिस्तानी ख़ुफिया एजेंसी (ISI) और जैश को अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा प्रदान करता है। इसके बदले में उसे अपने प्रोजेक्ट में किसी भी तरह के आतंकवादी हमला न होने की गारंटी मिलती है।

पाकिस्तान में किए गए निवेश के ज़रिए चीन दुनिया भर के बाज़ारों में अपना दबदबा बनाना चाहता है। इसलिए वो हमेशा पाकिस्तान के साथ उसकी मदद के लिए हाथ बाँधे खड़ा रहता है। चीन का सपना हमेशा से ही भारत को घेरने का रहा है – फिर चाहे वो डोकलाम के माध्यम से हो, अफगानिस्तान को अपने ड्रीम प्रोजेक्ट ‘वन बेल्ट वन रोड’ में शामिल करने के माध्यम से हो, श्रीलंका में अपने प्रोजेक्ट ‘हम्बनटोटा’ समुद्री परियोजना हो, म्यांमार में बंदरगाह बनाने की आड़ में भारत को घेरने की मंशा हो, या फिर नेपाल के साथ अपनी बढ़ती नज़दीकियों के माध्यम से हो। भारत को हर तरफ से घेरने की फ़िराक में रहने वाला चीन कभी भारत का हित नहीं सोचता। हाँ, यह सच है कि को ऊपरी तौर पर वो ख़ुद को भारत का हितैषी घोषित करने में तुला रहता है, लेकिन सिर्फ ऊपरी तौर पर।

आतंकवादी मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित करने के मामले में जो रुख़ चीन ने अब अपनाया है, वही रुख़ उसने तब भी अख़्तियार किया था, जब भारत में मुंबई हमले के मास्टरमाइंड और लश्कर-ए-तैयब्बा के कमांडर जकीउर रहमान लखवी की रिहाई पर भारत ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग की थी। उस समय प्रतिबंधों से संबंधित संयुक्त राष्ट्र की समिति ने भारत के आग्रह पर बैठक की थी। उस बैठक में मुंबई हमले के मामले में लखवी की रिहाई को लेकर पाकिस्तान से स्पष्टीकरण माँगा जाना था, लेकिन चीन के प्रतिनिधियों ने इस आधार पर इस क़दम को रोक दिया था कि भारत के पास इस संदर्भ में पर्याप्त सूचना नहीं है। जबकि पाकिस्तानी अदालत द्वारा लखवी की रिहाई 1267 संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव का उल्लंघन था। उस समय भी चीन को छोड़कर अमेरिका, रूस, फ्रांस और जर्मनी ने लखवी की रिहाई पर गहरी चिंता व्यक्त की थी और उसकी गिरफ़्तारी की माँग की गई थी।

चीन का पाकिस्तान के साथ इतना गहरा रिश्ता यह स्पष्ट करता है जैसे उसने पाकिस्तान को गोद ले रखा हो और उसके हर बुरे कामों को अपनी आड़ में छिपाना उसका परम कर्तव्य है। चीन अपनी कुटिल चालों से भारत को सिर्फ़ भरमाने का काम करता है। ताकि भारत-पाकिस्तान हमेशा उलझे रहें और वो दूसरे तरीकों से अपना उल्लू सीधा करता रहे।