Tuesday, September 29, 2020
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हिन्दूफोबिया टपकता है हसन मिन्हाज के शो से

हसन मिन्हाज की माइनॉरिटी की परिभाषा में न तो बौद्ध, जैन, सिख आते हैं, और न ही भारत में बाहर से आए और शांति से रह रहे पारसी और यहूदी। क्योंकि...

सोशल मीडिया पर कहीं पढ़ा था कि इस्लाम ने नरसंहार-पर-नरसंहार करते जाने और खुद को नफ़रत और असहिष्णुता का पीड़ित दिखाने की जुड़वाँ कला (twin arts) सदियों में परिष्कृत की है।

‘भारतीय’-अमेरिकी “मजहबी” (यह वह खुद लगाते हैं, हम नहीं) कॉमेडियन हसन मिन्हाज के नेटफ्लिक्स कॉमेडी शो ‘पैट्रियट एक्ट’ का भारतीय चुनावों पर एपिसोड इसी की तस्दीक करता है।

झूठ, प्रोपेगैंडा, अर्ध-सत्य, एकतरफा नैरेटिव बुनने की कोशिश- हसन मिन्हाज समुदाय विशेष

chutzpah यह कि हाँ, हाँ, हम तो समुदाय वाले हैं, इसलिए हमें तो बोलना ही नहीं चाहिए इन मुद्दों पर, वर्ना हम पाकिस्तान के एजेंट घोषित हो जाएँगे। गोया आपके घर कोई चोरी करे और उसके बाद बोले हाँ, हाँ, अब तो हमें चोर बोलोगे ही!

ओपनिंग ही विक्टिम-कार्ड से

शो शुरू करने से पहले ही हसन मिन्हाज वीडियो क्लिप्स चलाते हैं जिनमें उनके शुभचिंतक उन्हें भारतीय राजनीति पर न बोलने की सलाह देते हैं। एक मित्र तो उनसे कहते हैं कि ‘बाहर बहुत गंदगी है वहाँ, तुम अगर उन पर बोलोगे तो वही गन्दगी तुम पर आ जाएगी।’ उनके शो को देखकर यह साफ़ पता चलता है कि वह गंदगी हिदुत्व या हिन्दू धर्म को ही कह रहे हैं। ठीक भी है- जब इस्लाम काफ़िरों को इन्सान ही ‘काबिल-ए-क़त्ल’ मानता है तो आत्माभिमानी काफ़िर हिन्दू जाहिर तौर पर इन्सान नहीं, गंदगी ही बचेगा।

एयरस्ट्राइक पर पाकिस्तान का पक्ष, भारत का मखौल

हसन मिन्हाज शुरू से भारत सरकार को विलेन के तौर पर पेश करते हैं। वह बताते हैं कि ‘भारत सरकार मुकदमा कर देगी’ के डर से वह कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं दिखा सकते- यानि अगर डर न होता तो दिखा देते कि कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा है, है न?

उसके बाद वह बताते हैं कि कैसे दूसरों के कश्मीर के नक़्शे धुंधले कराते-कराते भारत के खुद के नक़्शे धुंधले हो गए और इसीलिए भारतीय वायुसेना आतंकवादियों को मारने की जगह पेड़ों पर बम गिरा आई। Chutzpah इसी को कहते हैं- आप पाकिस्तान की बोली भी बोलिए, और पाकिस्तान-समर्थक, जिहाद-समर्थक कहे जाने से बचने के लिए खुद ही यह ‘भविष्यवाणी’ कर दीजिए कि अब आपको पाकिस्तान का एजेंट करार दिया जाएगा।

असहिष्णुता का प्रोपेगैंडा, माइनॉरिटी होने पर भी इस्लामी एकाधिकार

हसन बताते हैं कि मोदी के आने के बाद से भारत अल्पसंख्यकों के प्रति ज़्यादा आक्रामक हो गया है। न केवल यह साफ झूठ है बल्कि इस्लाम की एकाधिकारवादी प्रवृत्ति को भी वो एक बार फिर उजागर करते हैं।

उनके लिए ‘माइनॉरिटी’ केवल प्यारे, शांतिप्रिय समुदाय वाले ही हैं- जो न मंदिर तोड़कर मस्जिदें बनाते हैं, न मज़हब के आधार पर 4 शादियों के विशेषाधिकार से लेकर कमलेश तिवारी का सर कलम करने तक की माँग रखते हैं, और न ही नाम बदल-बदल कर हिन्दू लड़कियों से धोखे से शादी करने और उनका मज़हब बलात् बदलने का प्रयास करते हैं।

हसन मिन्हाज की माइनॉरिटी की परिभाषा में न तो बौद्ध, जैन, सिख आते हैं, और न ही भारत में बाहर से आए और शांति से रह रहे पारसी और यहूदी। क्योंकि माइनॉरिटी की परिभाषा और उसका समूचा फायदा ऐंठने पर भी हिन्दुओं/मूर्तिपूजकों को नीचा देखने वाले ईसाईयों व समुदाय विशेष का ही तो एकछत्र अधिकार है न?

केवल अल्पसंख्यक मंत्रालय के अंतर्गत अल्पसंख्यकों के लिए खास तौर उन्हें सिविल सर्वेंट बनाने के लिए ‘नई उड़ान’ योजना लाई गई, उनके हुनर को सलामत रखने के लिए ‘हमारी धरोहर’ योजना शुरू की गई, स्कूल ड्रापआउट्स के लिए ‘नई मंजिल’ योजना लाई गई।

इसी कालखण्ड में हिन्दुओं ने सबरीमाला और शनि शिगनापुर मंदिर खो दिए, केवल और केवल हिन्दुओं द्वारा संचालित स्कूलों पर लागू आरटीई आज भी बदस्तूर जारी है, संविधान की धारा 25-30 हमें मज़हबी प्रताड़ना और सरकारी हस्तक्षेप से नहीं बचाती- अगर मोदी सरकार से किसी को मज़हबी तौर पर नाराज़ होना चाहिए तो हिन्दुओं को, न कि आपके जैसे उन कट्टरपंथियों को जिनका हिंदुस्तान से कोई लेना-देना ही नहीं है।

पंथनिरपेक्षता का झूठ, हिन्दुओं में हज़ारों वर्णों का झूठ

“सेक्युलरिज्म भारत के संविधान में प्रतिष्ठापित है”। साफ झूठ।

भारत के संविधान की प्रस्तावना में सेक्युलर शब्द पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने जबरन उस समय ठूंसा था जब हिंदुस्तान में लोकतंत्र नहीं था, आपातकाल था।

इसके विपरीत जिस हिन्दू-धर्म/हिंदुत्व को आप गंदगी, ‘आक्रामक’, व ‘अल्पसंख्यक-विरोधी’ कहते हैं, उसी हिंदुत्व ने भारत में समुदाय विशेष वालों सहित सभी मज़हबों और आस्थाओं के लोगों को हज़ारों साल पनाह दी। उस समय न संविधान था न संविधान में लिखा हुआ ‘सेक्युलरिज्म’। इसके बावजूद लाखों लोगों की हत्या और बलात्कार के बाद भी, हज़ारों मंदिरों के तोड़े और जलाए जाने के बाद भी हिन्दू और हिंदुस्तान ने समुदाय विशेष को अपने बीच बनाए रखा।

हसन मिन्हाज का अगला झूठ था कि हिन्दू समाज “हज़ारों वर्णों” में बँटा हुआ है। और उनके झूठ की तस्दीक खुद उनकी स्क्रीन पर ‘ब्राह्मण’, ‘क्षत्रिय’, ‘वैश्य’, ‘शूद्र’ (और साथ में ‘दलित’) को हाईलाईट करना करता है। साफ पता चलता है कि मकसद खाली हिन्दू समाज को बँटा हुआ दिखाकर और बाँटने की ज़मीन तैयार करना है।

हसन भारत को ‘दुनिया की सबसे विभिन्नता भरी जगहों में से एक’ तो बताते हैं, पर यह गोल कर जाते हैं कि यह विभिन्नता ‘गंदे’, काफ़िर हिंदुत्व/हिन्दू धर्म के चलते है। उनके प्यारे इस्लाम में तो एक अल्लाह की सरपरस्ती न मानने वाले को जहन्नुम में भेजने का वादा भी है और उसे जल्दी-से-जल्दी जहन्नुम के लिए रवाना कर देने के लिए जिहाद का हुक्म भी। यह काफिर हिन्दुओं का “एकं सद् विप्रैः बहुधा वदन्ति” ही है, जिसने हिंदुस्तान में आपकी प्यारी ‘डाइवर्सिटी’ को जिंदा रखा है।

कश्मीर, गुजरात दंगों पर फिर से प्रोपेगैंडा

कश्मीर की ‘त्रासदी’ का ज़िक्र करते हुए हसन मिन्हाज भूल कर भी उन कश्मीरी पण्डितों का ज़िक्र नहीं करते जिन्हें तीस साल पहले अपनी औरतों का बलात्कार और मासूम बच्चों का बेरहमी से कत्ल दिखाने के बाद अपने घरों से दरबदर कर दिया गया था।

हसन वामपंथियों के उस पसंदीदा विषय को भी उठाते हैं जिसे हिंदुस्तान के वामपंथियों ने उठाना बंद कर दिया है क्योंकि पता है कि उस झूठ से मोदी को फायदा ही हो रहा है- 2002। वह ‘मोदी ने 2002 में कुछ नहीं किया’ का रोना तो रोते हैं पर यहाँ इसकी साँस-डकार भी नहीं लेते कि 2002 के दंगों के पीछे कारक 60 बेकसूर, निहत्थे, अहिंसक कारसेवकों को इस्लामी भीड़ द्वारा जिन्दा जला दिया जाना था।

नोटबंदी पर वह ‘गरीबों को बड़ी तकलीफ हुई’ का रोना रोते हैं पर यह भूल जाते हैं कि उन्हीं गरीबों ने कुछ ही हफ़्तों बाद भाजपा को उत्तर प्रदेश में प्रचण्ड बहुमत दिया।

असम में वह भाजपा पर ‘प्रवासियों’ से नागरिकता छीनने का आरोप लगाते हैं। शायद अमेरिका में अवैध प्रवास की राजनीति करते-करते वो भूल गए हैं कि हिंदुस्तान के काफ़िर गैरकानूनी तरीके से आने वालों को ‘प्रवासी’ नहीं घुसपैठिया कहते हैं।

आदित्यनाथ, दलितों, लिंचिंग पर फिर झूठ

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ तो उनका झूठ ऐसा है कि लगता है उनका खुद बोलने का मन नहीं, ज़बरदस्ती बुलवाया जा रहा है। रजत शर्मा से आदित्यनाथ के इंटरव्यू का वीडियो चलता है। रजत शर्मा पूछते हैं कि योगी को, सन्यासी को असलहों का क्या काम? आदित्यनाथ जवाब देते हैं कि उनकी शिक्षा शस्त्र और शास्त्र दोनों में हुई है।

हसन मिन्हाज इस वार्तालाप का साफ़ तौर पर झूठा अनुवाद करते हैं। वे कभी इसे हथियारों का साम्य ध्यान लगाने से जोड़ना बताते हैं तो कभी हथियारों और अनुशासन की एकता का दावा करने का आरोप आदित्यनाथ पर लगाते हैं।

काफ़िरों के बारे में यहाँ पर हसन मिन्हाज को एक बात बता देना ज़रूरी है। हम काफ़िरों के ‘गंदे’ धर्म हिंदुत्व में आदित्यनाथ जिस नाथ संप्रदाय से आते हैं, उसकी परंपरा ही शस्त्र और शास्त्र में साम्य बिठाकर चलने की रही है। और नाथपंथी योगियों का हथियार उठाना भी सामान्यतः हसन मिन्हाज के ‘पाक’ इस्लाम के हमलों और कत्ले-आम के खिलाफ रहे हैं।

और हम ही क्यों, शस्त्रधारी योगियों की परंपरा जापानी और चीनी काफ़िरों की भी रही है।

आदित्यनाथ पर वह मुगलकालीन नामों वाली जगहों का नाम हिन्दू कर देने का आरोप लगाते हैं। पर यह नहीं बताते कि उन जगहों के पहले हिन्दू ही नाम थे, जिन्हें तलवार की नोक पर इस्लामी शासकों ने बदला था।

दलितों और लिंचिंग पर वह दो झूठ बोलते हैं:

  1. दलित समुदाय विशेष की तरह एक ‘अल्पसंख्यक’ समुदाय हैं
  2. लिंचिंग की घटनाएँ मोदी के आने के बाद से हो रहीं हैं

दलित हिन्दू हैं या नहीं यह तो उन्हें जाकर दलितों से ही पूछना चाहिए कि वे हिन्दू हैं या समुदाय विशेष की ही तरह अल्लाह के बन्दे। काफ़िर दलित वह जवाब देंगे कि हसन मिन्हाज याद ही रखेंगे। लिंचिंग की घटनाएँ मोदी के आने के बाद से हो रहीं हैं वाली झूठ के खिलाफ़ दो ही सबूत काफ़ी हैं- एक किसी अज्ञात स्रोत द्वारा इकट्ठा किया गया नमूना, और दूसरा अनीश्वरवादी, नोटावादी (यानि इन पर हिन्दू राष्ट्रवाद या राजनीतिक हित का आरोप नहीं लग सकता) वैज्ञानिक-लेखक आनंद रंगनाथन का यह ट्वीट, जो केवल 2013 की लिंचिंग की प्रमुख घटनाएँ इंगित करता है।

इस्लाम को सुधारने पर दीजिए ध्यान

हसन मिन्हाज जी, बेहतर होगा कि आप अपना समय हिन्दूफोबिया फैलाने की बजाय इस्लाम की एकाधिकारवादी, वर्चस्ववादी, मध्ययुगीन बर्बरता को मिटाने पर खर्च करें। कॉमेडी मैटर की वहाँ भी कमी नहीं है।

बाकी हर मज़हब समय के अनुसार बदल चुका है पर आपका दीन आज भी 1400 साल पुरानी मानसिकता की जंजीरों में जकड़ा है।

रही बात हिंदुस्तान के समुदाय विशेष वालों की, तो जो आधुनिक समय और मुख्यधारा के साथ बदल रहे हैं, कट्टरता छोड़ कॉमन सेन्स और सिविक सेन्स को अपना रहे हैं, वह हिंदुस्तान से बेहतर किसी मुल्क को नहीं मानते। अहमद शरीफ का यह लेख आपकी आँखें खोल देने के लिए काफी होना चाहिए।

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