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‘भाषा-कला-खाना-पहनावा… सब मुगलों की देन’: ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने यूँ किया इस्लामी आक्रांताओं का महिमामंडन, लोगों ने पूछा- बाबर से पहले देश में कुछ नहीं था क्या?

1992 की बॉलीवुड फिल्म ‘बेमिसाल’ के एक सीन में अमिताभ बच्चन ने कहा था, “कश्मीर को छोड़कर, भारत के सभी हिल स्टेशन अंग्रेजों ने खोजे थे, कश्मीर को मुगलों ने खोजा था।” यह बात उन्होंने राखी गुलजार यानी कविता से कही थी। उस वक्त कविता मुगल शासकों की ‘शानदार संगीत, चित्रकला और वास्तुकला’ के लिए तारीफ कर रही थीं और जोर दे रही थीं कि उनका कोई मुकाबला नहीं है। तब अमिताभ ने मजाकिया अंदाज में जवाब दिया कि उनकी सबसे बड़ी देन तो ‘मुगलाई खाना’ है।

यह क्लिप 2022 में फिर से सामने आई और वायरल हो गई। लोगों ने इस बात पर नाराजगी जताई कि फिल्म इंडस्ट्री किस तरह लगातार सच को तोड़-मरोड़कर पेश करती है, ताकि हमलावरों को महिमामंडित किया जा सके। वैसे भी यह हिंदू-विरोधी प्रोपेगेंडा के लिए बदनाम रही है।

अब 2026 की बात करें, तो ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने उस फिल्मी सीन को अपने तरीके से लिखा है। इसमें मुगल वंश को ‘भाषा, खान-पान, वास्तुकला, संगीत, कला और मिली-जुली संस्कृति’ का श्रेय दिया गया है। साथ ही, व्यंग्य करते हुए यह भी जोड़ा गया है कि इसी वंश की वजह से 2014 में भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई।

“What have the Mughals ever done for us?” शीर्षक वाला लेख 19 अप्रैल 2026 (रविवार) को प्रकाशित हुआ। इसके साथ यह टैगलाइन थी कि भारत के सबसे महान मुस्लिम साम्राज्य ने अपनी सबसे शक्तिशाली हिंदू पार्टी का निर्माण कैसे किया।

यह मुस्लिम शासकों का स्तुतिगान है, जो यह बताता है कि मुगलों ने भारत को समृद्ध बनाया। लेकिन, मुगलों के प्रभाव के बिना भी भारत की हजारों साल पुरानी ऐतिहासिक सभ्यता थी। यह दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है। इसकी अर्थव्यवस्था मजबूत थी। कला और विज्ञान के क्षेत्र में उपलब्धियाँ थीं। साहित्य में योगदान था और जिसकी एक समृद्ध सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत थी।

बाबर ने मुगल साम्राज्य की नींव रखी थी। वह परिवारिक झगड़ों और लड़ाइयों में बार-बार मिली हार के कारण अपने पैतृक घर फरगना (जो अब उज़्बेकिस्तान में है) से बेदखल हो गया। इसकी वजह से वह भारत की ओर रुख किया। उसे यहाँ की अपार धन-संपदा और संसाधनों ने आकर्षित किया था। वह इस्लामी आक्रमणकारी था।

इस्लामवादियों से लेकर श्वेत उपनिवेशवादियों तक— सभी भारत को लूटने आए थे। इसका शोषण करने आए थे। इसमें वे सफल भी रहे। आक्रमणकारी किसी भी तरह से यहाँ के मूल निवासियों का धर्म परिवर्तन करवाना चाहते थे। मुगलों का उद्देश्य भी कुछ ऐसा ही था।

मुगलों ने भारतीय सभ्यता को समृद्ध किया: एक हास्यास्पद तर्क

‘द इकोनॉमिस्ट’ पत्रिका के मुताबिक, “उन सभी में, मुगलों का शासन सबसे लंबे समय तक चला। 21 अप्रैल को पानीपत की पहली लड़ाई के ठीक 500 साल पूरे हो रहे हैं; यह वह समय था जब तैमूरलंग और चंगेज खान के मध्य एशियाई वंशज बाबर (इसीलिए ‘मुगल’, जो ‘मंगोल’ शब्द से बना है) ने दिल्ली के अंतिम सुल्तान को हराया था।

उसके द्वारा स्थापित साम्राज्य, अपने चरमोत्कर्ष पर, दुनिया के सबसे समृद्ध और शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक था। इसके शासकों ने भारतीय राजशाही की रीतियों को अपनाया, स्थानीय लोगों से विवाह किए, और वास्तव में वे भारतीय ही बन गए (अंग्रेजों के विपरीत)। उनकी उपलब्धियाँ भारतीय ही हैं,”

मुगल साम्राज्य की धन-संपदा और सत्ता का स्रोत वह भारतीय भूभाग ही था, जिसे उन्होंने सदियों तक लूटा-खसोटा। उन्होंने देश की फलती-फूलती प्राचीन रीतियों और परंपराओं का लाभ उठाकर नई संरचनाएँ खड़ी कीं। इन संरचनाओं का निर्माण स्थानीय कारीगरों द्वारा केवल स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके किया गया था। बाद में इन्हें ‘समन्वय के प्रतीक’ स्मारक के रूप में महिमामंडित किया गया।

वे अपनी लूटी हुई धन-संपत्ति को अपनी मूल मातृभूमि तक नहीं ले जा सके, क्योंकि उन्हें अपने ही सगे-संबंधियों द्वारा वहाँ से खदेड़ दिया गया था। बाबर ने वापस जाने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन सफल नहीं हो पाया।

दरअसल वे भारत में किसी प्रेम या लगाव के कारण नहीं, बल्कि केवल मजबूरी के कारण रुके रहे। भारत के प्रति उनके तथाकथित प्रेम का एक और प्रमाण इस बात से मिलता है कि बाबर के पार्थिव अवशेषों को, उसकी इच्छानुसार काबुल ले जाकर दफनाया गया। वह उसी स्थान को अपना ‘घर’ मानता था।

वामपंथी-उदारवादी खेमा (लेफ्ट-लिबरल ब्रिगेड) आमतौर पर आक्रमणकारियों की निंदा का तो स्वागत करते हैं, लेकिन तब नहीं, जब वे अत्याचार भारत या हिंदुओं के विरुद्ध किए गए हों। ऐसे कृत्यों को नजरअंदाज कर दिया जाता है या उन्हें सही ठहराने जाता है। जैसा कि इस लेख (कॉलम) में देखा जा सकता है, उनका गुणगान किया जाता है।

इसी क्रम में, ‘द इकोनॉमिस्ट’ पत्रिका ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी मजाक उड़ाया। ऐसा उन्होंने इसलिए किया, क्योंकि प्रधानमंत्री ने भारत के उस इतिहास का जिक्र किया था, जिसमें भारत को विदेशी शक्तियों के अधीन रहना पड़ा।

इतिहासकारों ने माना कि मुगलों ने मंदिरों तोड़ा, साथ ही दावा किया कि इसे उनका अपमान नहीं माना जा सकता। ‘जजिया’ लगाना, हिंदुओं का नरसंहार और जबरदस्ती धर्म परिवर्तन, जिनका जिक्र इस्लामी शासकों ने खुद अपनी लेखनी में किया था, उन्हें उसने आसानी से नजरअंदाज कर दिया।

हालाँकि वह गुट जो छोटी-मोटी घटनाओं को मुस्लिम समुदाय के खिलाफ ‘उकसावा’ करार देता है, वह हिंदू धर्म के सबसे पवित्र स्थानों पर हुए हमलों को अपमान नहीं मानता। वह यह कहना चाहता है कि इसे आस्था पर हमला नहीं समझा जाना चाहिए। ध्यान दें तो हिंदू-विरोधी आचरण को सामान्य सी बात मानता है।

इसके बाद लेखक ने कहा, “उन्होंने भारत के पास जो कुछ भी था, सब ले लिया। साथ ही, यह विचारधारा पूछती है कि बदले में उन्होंने हमें क्या दिया?” फिर मुगलों का गुणगान करना शुरू कर देता है।

मुगलों के जरिए भारत का परिचय फारस से हुआ, जिन्होंने भारतीय भाषा में योगदान दिया- द इकोनॉमिस्ट

लेख में जोर देकर कहा गया, “उनके ऊपर दिए गए उद्धरण के मूल 28 शब्दों में से, एक-चौथाई शब्द फारसी के जरिए भारत में आए। यह बात मुस्लिम भारत के इतिहासकार रिचर्ड ईटन बताते हैं। मुगल दरबार की भाषा ने उत्तरी भारत की ज्यादातर भाषाओं को प्रभावित किया है। सच तो यह है कि हिंदी और हिंदू—दोनों ही ‘हिंद’ शब्द से आए हैं। यह उस नदी का फारसी नाम है, जिसे अंग्रेजी में ‘इंडस’ (और इस तरह ‘इंडिया’) कहा जाता है। लेकिन हिंदू राष्ट्रवाद में ‘हिंदू’ शब्द जोड़ने के अलावा, मुगलों ने हमारे लिए और क्या किया है?”

भारत में भाषाओं का सबसे विविध संग्रह मौजूद है, जो समय के साथ लगातार विकसित होता रहा है। भाषाएँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं और समय के साथ आगे बढ़ती हैं। इसी तरह हिंदी का फारसी के साथ इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार के एक ही पूर्वज है। हालाँकि हिन्दी की जड़ें संस्कृत में हैं। भाषाओं का यह जुड़ाव मुगलों के प्रभाव से ज्यादा, इन भाषाओं के मूल से संबंधित था।

अगर इसी तर्क को माना जाए, तो अंग्रेजी भाषा का श्रेय अंग्रेजों को दिया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा करना गलत, भ्रामक और ऐतिहासिक रूप से गलत होगा। ठीक वैसे ही, जैसा कि मौजूदा तर्क है। इससे भी ज्यादा जरूरी बात यह है कि भाषा, कला और साहित्य के प्रसार के लिए दमन की जरूरत नहीं होती। कई देश बिना किसी की गुलामी किए भी विदेशी भाषाओं को अपना चुके हैं।

मुगलों ने भारतीय खान-पान और वास्तुकला में एक खास नजाकत जोड़ी- द इकोनॉमिस्ट

‘द इकोनॉमिस्ट’ ने मुगलों की तारीफ करते हुए उनके खान-पान पर जोर दिया। इन्हें अक्सर ‘मुगलाई’ कहा जाता है, इनमें तंदूरी व्यंजन और बिरयानी शामिल हैं।

“तंदूर—मिट्टी का एक ओवन जिससे परतदार नान और भुने हुए कबाब निकलते हैं— फारसी दुनिया से आया था। ठीक वैसे ही जैसे समोसे, शरबत, अलग-अलग तरह की मिठाइयाँ और बिरयानी आई थीं। बिरयानी पिछले दस सालों से लगातार डिलीवरी ऐप्स पर भारत में सबसे ज्यादा ऑर्डर की जाने वाली डिश रही है।

BJP का वह धड़ा, जो मौज-मस्ती का विरोधी है, वह मांस और अंडों को पसंद नहीं करता, लेकिन शाकाहारी लोग भी अच्छे तंदूरी पनीर का मजा लेते हैं। लेख में कहा गया है कि पनीर शब्द फारसी के ‘पनीर’ से आया है, जो एक तरह का चीज है और शायद अफगानों के जरिए भारत पहुँचा।

तंदूर का आविष्कार सिंधु घाटी और हड़प्पा सभ्यताओं में हुआ था। मध्य एशिया में बाबर के राज में चावल की खेती नहीं होती थी, जबकि बिरयानी का एक मुख्य हिस्सा चावल ही है। भारतीय उपमहाद्वीप मशहूर मसालों के लिए मशहूर रहा है। लेकिन यह विचार कि मसालों और मीट के साथ पकाया गया चावल एक बेहतरीन डिश बन सकता है, इसके लिए शायद मुगलों का ही शुक्रिया अदा करना होगा।

लेख के अनुसार, मुगलों के आने से पहले भारतीय लोग शायद संघर्ष कर रहे थे या बहुत ही साधारण भोजन पर निर्भर थे, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि उनके पास स्वादिष्ट व्यंजन बनाने का ज्ञान और महारत नहीं थी। इसके बाद भारतीय मजदूरों और संसाधनों से तैयार की गई भव्य परियोजनाओं के लिए मुगलों की तारीफ की गई।

लेख में बताया गया, “भारत के दस सबसे मशहूर ऐतिहासिक स्थलों में से चार (जिनके लिए टिकट लगता है), जिन्हें स्थानीय पर्यटक सबसे ज़्यादा पसंद करते हैं और विदेशियों की पसंद वाली सूची के छह स्थल मुगलों के ही बनवाए हुए हैं। इन दोनों सूचियों में ताजमहल सबसे ऊपर है। हर साल प्रधानमंत्री लाल किले से स्वतंत्रता दिवस का भाषण देते हैं। यह दिल्ली में स्थित एक मुगल स्मारक है और भारत की अपनी पहचान के लिए इतना अहम है कि यह हमारे सबसे आम नोट के पीछे भी छपा हुआ है।”

विडंबना यह है कि इन इमारतों का निर्माण उस समय हुआ था, जब आम भारतीय (ज्यादातर हिंदू) मुगलों की तानाशाही और बर्बरता को झेल रहे थे। ये इमारतें मुगलों की बेहद आलीशान जीवनशैली की प्रतीक हैं और इन्हें उनके समृद्ध साम्राज्य की शान दिखाने के लिए ही बनाया गया था।

इसके अलावा उनके पास इस धन-दौलत को मध्य एशिया ले जाने का कोई विकल्प नहीं था, इसलिए उन्होंने अपनी मर्जी के मुताबिक और अपने फायदे के लिए ही इस धन का इस्तेमाल किया।

बहरहाल, ये सभी ऐतिहासिक स्थल पूरी तरह से भारत की संपत्ति हैं। चुनी हुई सरकार का पूरा अधिकार है कि वह इनका इस्तेमाल मुद्रा (नोटों) पर छापने के लिए करे या किसी अन्य काम के लिए। फिर भी, इससे इन स्थलों से जुड़ा इतिहास या मुगलों की वह धूमिल विरासत मिट नहीं जाती। दिलचस्प बात यह है कि उर्दू की नींव संस्कृत और प्राकृत भाषाओं में है, फिर भी इस बात को खुलकर नहीं बताया जाता, क्योंकि ऐसा करने से मुस्लिम बादशाहों की बड़ाई करने वाले एजेंडे कमजोर पड़ जाएँगे।

शेरवानी, सितार और BJP की जबरदस्त बढ़त के लिए मुगल जिम्मेदार हैं- द इकोनॉमिस्ट

‘द इकोनॉमिस्ट’ ने शेरवानी और सितार को लेकर मुगलों की खूब तारीफ़ की। ये दोनों चीज़ें 16वीं और 18वीं सदी के बीच विकसित हुई थीं। इसने इतिहासकार जदुनाथ सरकार का हवाला देते हुए कहा, “मध्यकालीन भारत के लोकप्रिय धर्म सूफीवाद, उर्दू भाषा और कला—विजेताओं और पराजितों की साझा विरासत थे। इन्होंने इन दोनों को आपस में जोड़ने का काम किया।

लेख में अकबर के कथित ‘धर्मनिरपेक्षता’ के उस घिसे-पिटे और उबाऊ ढोंग का प्रचार किया, जिसने हिंदू महाकाव्यों का अनुवाद करवाया था। साथ ही, उस समुदाय के खिलाफ चलाए गए अपने हिंसक अभियानों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया। मानो यह महिमामंडन ही काफी न हो, इस लेख ने हिंदू मान्यताओं का उपहास उड़ाते हुए यह दावा भी कर दिया कि अगर राम जन्मभूमि पर ‘बाबरी मस्जिद’ न होती, तो ‘भगवा पार्टी’ (BJP) कभी सत्ता में नहीं आ पाती।

लेख में कहा गया, “1990 में, जब पार्टी के पास संसद में केवल 16% सीटें थीं, तब उसने एक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया। इसमें रामजन्मभूमि स्थल पर एक मंदिर बनाने की माँग की गई। इसे रामायण के नायक भगवान राम का जन्मस्थान माना जाता है। उस जगह पर एक मस्जिद खड़ी थी, जिसे पहले मुगल बादशाह बाबर के शासनकाल में बनवाया गया था।”

इसमें कहा गया, “1992 में, BJP के अधिकारियों की मौजूदगी में एक भीड़ ने उस मस्जिद को ढहा दिया। इस घटना से पूरे देश में हिंसा की आग भड़क उठी, जिसने पार्टी के जनाधार को मजबूत किया और अंततः उसे सत्ता के शिखर तक पहुँचा दिया। 2024 की शुरुआत में, जब मोदी ने उस बहुप्रतीक्षित मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की, तब तक उनकी पार्टी के पास 56% सीटें हो चुकी थीं। पिछले एक दशक में पार्टी ने मुगल-कालीन शहरों के नाम बदलने, मुगलई खान-पान को नकारने और इतिहास की किताबों से मुगलों का जिक्र मिटाने पर ही अपना सारा ध्यान केंद्रित कर रखा है।”

राम मंदिर हिंदू धर्म का मूल आधार है। इसे महज एक चुनावी हथकंडा बताकर उसकी गरिमा को कम करने की कोशिश की गई। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि BJP ने इस मुद्दे का समर्थन किया था। इस मीडिया संस्थान ने बाबर को नायक के तौर पर दिखाया, जबकि वह मंदिरों को ढहाने वाला था। वहीं दूसरी ओर BJP को हिंदुओं के अधिकारों की पैरवी करने के कारण, एक खलनायक के तौर पर पेश किया गया।

लेख के आखिर में कहा गया, “ईंटों से बनी किसी इमारत को ढहा देना एक बात है, लेकिन उस संस्कृति को मिटाना कहीं ज्यादा मुश्किल है। यह पाँच सदियों से भी ज्यादा समय से भारत के खून और मिट्टी में रच-बस गई है। तो फिर उनके इस सवाल का सबसे अच्छा जवाब यही है कि मुगलों ने उनके लिए आखिर किया क्या है। उन्होंने राजनीतिक हिंदुत्व को उसका एक ऐसा ‘खलनायक’ दिया, जो हमेशा रहेगा और जिसके बिना उसका काम नहीं चल सकता।”

इंटरनेट यूजर्स ने जताई हैरानी

एक यूज़र ने इस पर टिप्पणी करते हुए लेक को बेतुका करार दिया। उसने लिखा “यह कहना कि मुगलों की वजह से ही नरेंद्र मोदी की पार्टी सत्ता में आई, कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसे यह कहना कि हिटलर और नाजियों ने ही इजरायल देश बनाया था,”

वरुण ने मीडिया प्लेटफॉर्म से कहा कि वे अपने दायरे को केवल कला या संगीत तक ही सीमित न रखें, बल्कि सूर्य, चंद्रमा और हिमालय की रचना के लिए मुगलों का भी गुणगान करें।

‘द इकोनॉमिस्ट’ भी दूसरी मुख्यधारा के मीडिया संस्थानों की तरह ही ऐसी कहानियाँ गढ़ने में माहिर है, जो भारत की उपलब्धियों का श्रेय विदेशियों को देती हैं। चाहे वे अतीत से जुड़ी हों या वर्तमान से। दरअसल ये भारतीय हिन्दू समाज की उपलब्धियों को नकारने का तरीका है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

‘मैं मंदिर ले जाने के पैसे नहीं लेता’ कहकर रिक्शा चालक जुबैर ने फँसाया, घर में घुसकर किया रेप: पढ़िए राजकोट की हिंदू पीड़िता की आपबीती

गुजरात के राजकोट में एक हिंदू महिला के साथ रेप के आरोप में रिक्शा चालक जुबैर कुरैशी को गिरफ्तार किया गया है। 25 मार्च 2026 को दर्ज इस मामले की पीड़िता हाल ही में सामने आई और मीडिया के सामने अपनी आपबीती सुनाई। उसने बताया कि किस तरह जुबैर ने उसके साथ जबरदस्ती की और उस पर धर्मांतरण का दबाव भी बनाया।

पीड़िता और उनकी मदद करने वाले विश्व हिंदू परिषद के नेताओं का कहना है कि आरोपित खुद को आम आदमी पार्टी का कार्यकर्ता बताता था। महिला ने बताया कि चार साल पहले उन्होंने मंदिर जाने के लिए एक रिक्शा लिया था। उस समय जुबैर ने कहा था कि वह मंदिर जाने के पैसे नहीं लेता और इसी बहाने उसने महिला से संपर्क बढ़ाने की कोशिश की।

घर का पता जानने के बाद वह उसके घर आने लगा। महिला का आरोप है कि इसके बाद जुबैर कुरैशी बार-बार जबरदस्ती घर में घुसता और उसका शारीरिक शोषण करता था। वह किसी को नहीं बताने के लिए कहता और धमकी देता था कि फोटो-वीडियो वायरल कर देगा। पीड़िता ने आगे बताया कि जुबैर ने उसका बाहर निकलना और जीना मुश्किल कर दिया था।

एक बार महिला ने पुलिस में शिकायत भी की, लेकिन पुलिस ने मामला दर्ज करने के बजाय जुबैर को समझाकर छोड़ दिया। कोई सख्त कार्रवाई नहीं होने की वजह से उसने फिर से परेशान करना शुरू कर दिया। महिला का आरोप है कि जुबैर उसे एक दरगाह पर भी ले गया था, जहाँ ताबीज पहनाने की कोशिश की गई। उसने धर्मांतरण के लिए भी दबाव बनाया।

पीड़िता का कहना है कि जुबैर की वजह से वह कोई हिंदू त्योहार भी नहीं मना पाती थीं। उसने आरोपित के परिवार से संपर्क करने की कोशिश भी की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

मैं आम आदमी पार्टी से हूँ, मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता: पीड़िता को धमकाता था जुबैर

महिला ने आरोप लगाया कि जुबैर धमकी देते हुए कहता था, “मैं आम आदमी पार्टी का आदमी हूँ, मेरा कोई कुछ नहीं कर सकता।” इसी वजह से शिकायत करने के बावजूद पुलिस ने कार्रवाई नहीं की। उसने बताया कि आरोपित के डर से उन्हें 3-4 बार घर बदलना पड़ा और सिम कार्ड भी बदलने पड़े, लेकिन हालात में कोई खास बदलाव नहीं आया।

आखिरकार पीड़िता ने सूरत के बजरंग दल से संपर्क किया, जहाँ से उसे राजकोट विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं से जोड़ा गया। VHP के कार्यकर्ता उसे लेकर कमिश्नर ऑफिस पहुँचे और वहाँ शिकायत दर्ज कराई। कमिश्नर के आदेश के बाद ही जुबैर के खिलाफ मामला दर्ज हुआ।

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान विश्व हिंदू परिषद के धर्म प्रसार विभाग के केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र भावाणी ने बताया कि महिला के साथ न सिर्फ शारीरिक शोषण हुआ, बल्कि मारपीट भी की जाती थी। उन्होंने कहा कि आरोपित जुबैर खुद को आम आदमी पार्टी का बताकर महिला को डराता था और कहता था कि पुलिस भी उसकी जेब में है, इसलिए कोई उसकी शिकायत नहीं सुनेगा।

VHP के पदाधिकारियों का कहना है कि पीड़िता ने कई बार पुलिस में शिकायत की, लेकिन आरोपी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। बाद में महिला ने सोशल मीडिया के जरिए विश्व हिंदू परिषद से संपर्क किया, जिसके बाद उनकी टीम पुलिस के पास पहुँची और शिकायत दर्ज कराने में मदद की।

गौरतलब है कि VHP की मदद से FIR दर्ज होने के बाद आजीडेम पुलिस ने आरोपित जुबैर के खिलाफ BNS की धारा 64(2)(m), 115(2) और 351(2) के तहत मामला दर्ज कर उसे गिरफ्तार किया है। फिलहाल आरोपित जेल में है। उसने सेशंस कोर्ट में जमानत की अर्जी दी थी, लेकिन कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया।

मूल रुप से यह रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

पहले IRS अधिकारी के यहाँ था नौकर, काम छूटा तो बेटी का रेप-हत्या करके भागा: जानिए कैसे 4 श्रेणी की सुरक्षा को चकमा देकर ली थी एंट्री, कितनी मशक्कत के बाद पुलिस ने पकड़ा

दिल्ली की पॉश अमर कॉलोनी में इंडियन रेवन्यू सर्विस (IRS) अफसर की 22 साल की बेटी से रेप के बाद हत्या के सनसनीखेज मामले में बड़ा खुलासा हुआ है। इस गंभीर मामले में पुलिस ने राजस्थान के रहने वाले 23 साल के आरोपित राहुल मीणा को द्वारका के एक होटल से गिरफ्तार कर लिया है। जाँच में सामने आया है कि आरोपित पहले इस घर में नौकर के रूप में काम कर चुका था।

यही वजह है कि उसकों घर के हर कोने के बारे में जानकारी थी, इसीलिए वह उच्चाधिकारी के घर में चार श्रेणी की सुरक्षा को पार कर घर में घुसा और उनकी बेटी के साथ रेप किया। बाद में हत्या कर दी।

घर में 4 श्रेणी की सुरक्षा, फिर भी कैसे घुसा आरोपित नौकर?

जिस घर में घटना हुई, वह किसी आम इंसान का घर नहीं था बल्कि वह IRS अफसर का था। जहाँ कड़ी सुरक्षा व्यवस्था थी। हर फ्लोर और लिफ्ट पर लॉक लगे थे और पूरे परिसर में CCTV निगरानी थी। पीड़िता तक पहुँचने के लिए कम से कम चार लॉक खोलने पड़ते, जिनमें तीन में पासकोड लगा था। पुलिस को शक है कि राहुल को इन पासकोड की पहले से जानकारी थी। उसे यह भी पता था कि स्पेयर चाबियाँ कहाँ रखी जाती हैं।

इसी जानकारी के आधार पर वह घर में बड़ी आसानी से घुसा और किसी को शक भी नहीं हुआ। CCTV फुटेज के अनुसार आरोपित नौकर सुबह करीब 6 बजकर 28 मिनट पर पीले रंग की शर्ट और काले पैंट में सोसायटी के भीतर आता दिख रहा है, जबकि करीब एक घंटे बाद वह बदले हुए कपड़ों में बाहर निकलता नजर आ रहा है। पुलिस का मानना है कि उसने वारदात के बाद कपड़े बदलकर भागने की कोशिश की।

नौकर ने पहले रेप किया, फिर हत्या कर हुआ फरार

पुलिस के मुताबिक, घटना के वक्त पीड़िता घर में अकेली थी। सुबह के समय उसके माता-पिता जिम गए हुए थे, जब वह 2 घंटे बाद 8 बजे लौटे तो बेटी को खून से लथपथ हालत में देखा। शुरुआती जाँच में सामने आया कि आरोपित नौकर राहुल ने पहले पीड़िता के साथ रेप किया और फिर मोबाइल चार्जिंग केबल से गला घोंटकर हत्या कर दी। पुलिस ने बताया कि पीड़िता के कपड़े भी फटे हुए थे। हालाँकि, फिलहाल पीड़िता की मेडिकल जाँच सामने नहीं आई है।

घटनास्थल पर सामान बिखरा हुआ मिला, जिससे लूटपाट की भी आशंका जताई जा रही है। पुलिस ने कुछ सामान बरामद कर लिया है। बताया जा रहा है कि आरोपित ऑनलाइन गेमिंग की लत के कारण कर्ज में डूबा हुआ था, जिसके चलते उसने इश वारदात को अंजाम दिया।

IRS अफसर की बेटी से पहले अलवर में महिला से किया रेप

जाँच में यह भी सामने आया है कि आरोपित राहुल ने दिल्ली आने से कुछ घंटे पहले राजस्थान के अलवर में एक महिला के साथ दुष्कर्म किया था। जिसके बाद पुलिस ने आरोपित के चाचा को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया। उन्होंने बताया कि घटना से पहले राहुल ने उन्हें तीन मोबाइल फोन दिए थे, जिन्हें उसने एक स्थानीय दुकान पर बेच दिया था।

पुलिस ने उन तीनों फोन को दुकान से बरामद कर लिया। इनमें से एक फोन राहुल का था। अपने सभी फोन बेचने के बाद फरार राहुल ने एक मोबाइल भी चोरी किया था।
स्थानीय पुलिस ने दिल्ली पुलिस को बताया कि राहुल मंगलवार (21 अप्रैल 2026) को अपने एक दोस्त के साथ राजस्थान के अलवर में एक शादी में गया था।

शादी के दौरान उसने दोस्त से कहा कि उसे जरूरी पारिवारिक काम के लिए जाना है। इसके बाद वह दोस्त के घर वापस गया, जहाँ उसने दोस्त की पत्नी के साथ रेप किया और जाते समय चार्जिंग पर लगा एक डूअल सिम मोबाइल फोन भी चुरा लिया।

जाँच में सामने आया कि राहुल ने चोरी किए गए फोन के एक सिम की कॉलिंग सर्विस बंद कर दी थी, लेकिन दूसरे सिम के जरिए इंटरनेट चला रहा था। पुलिस ने दोनों सिम कार्ड्स के इंटरनेट प्रोटोकॉल डिटेल रिकॉर्ड निकाले, जिससे पता चला कि वह WiFi नेटवर्क के जरिए इंटरनेट इस्तेमाल कर रहा था।

आरोपित राहुल की कैसे हुई गिरफ्तारी?

रिकॉर्ड्स से यह भी पता चला कि वह गुरुग्राम में रहने वाले अपने किसी भाई से लगातार संपर्क में था, लेकिन कॉल की बजाय इंस्टाग्राम मैसेंजर के जरिए बात कर रहा था। यही सावधानी आखिरकार उसकी गिरफ्तारी की वजह बनी। इस सुराग के आधार पर पुलिस ने पहले उसके भाई को हिरासत में लिया और फिर तकनीकी सर्विलांस के जरिए राहुल की लोकेशन ट्रेस की।

वह द्वारका के एक होटल में सुबह 10 बजे से रुका हुआ था। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि घटना वाले दिन सुबह साउथ दिल्ली आने के लिए राहुल ने राजगढ़ के एक निजी अस्पताल में एंबुलेंस के रूप में इस्तेमाल होने वाली ईको वैन को किराए पर लिया था।

दिल्ली पहुँचने के बाद उसने ड्राइवर से घर ढूँढने के बहाने गाड़ी रुकवाई और बिना किराया दिए वहाँ से निकल गया। इसके बाद वह पैदल पीड़िता के घर तक पहुँचा था।

‘द वायर’ ने यूपी SIR में 2 करोड़ लोगों के नाम वोटर लिस्ट से कटने पर उठाए सवाल: जानिए कैसे ये प्रक्रिया कोई ‘पहेली’ नहीं, लोकतंत्र को मजबूत और क्लीन रखने का है प्रयास

‘द वायर’ ने उत्तर प्रदेश में हुए एसआईआर पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। 21 अप्रैल 2026 को प्रकाशित एक लेख में उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची से विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान लगभग 2.05 करोड़ नामों को हटाए जाने पर लेख में संदेह व्यक्त किया गया है।

इसमें सवाल पूछे गए हैं कि क्या 2024 के लोकसभा चुनावों में दो करोड़ से अधिक अपात्र मतदाताओं ने मतदान किया था, या बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं – खासकर महिलाओं को गलत तरीके से मतदाता सूची से हटा दिया गया था। इसमें जनसंख्या वृद्धि, मतदाता सूची में घटते लिंग अनुपात और कुछ आंतरिक प्रारूपों की सार्वजनिक उपलब्धता न होने को लेकर सवाल किए गए।

उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिनवा के मुताबिक, मतदाता सूची में बदलाव (SIR) न तो कोई रहस्य था और न ही कोई राजनीतिक साजिश। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत एक नियमित, लेकिन आवश्यक संवैधानिक प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य मतदाता सूचियों को शुद्ध, सटीक और त्रुटिरहित बनाना है, ताकि कोई भी पात्र भारतीय नागरिक सूची से बाहर नहीं रह जाए और कोई भी अपात्र, दोहरा नाम, मृत या स्थानांतरित व्यक्ति सूची में नहीं रह जाए।

यहाँ चुनाव आयोग के आधिकारिक रुख और तथ्यों के आधार पर लेख में किए गए सवालों का जवाब दिया गया है

  1. 2024 में उत्तर प्रदेश में 15.44 करोड़ मतदाता थे। एसआईआर के बाद यह संख्या घटकर 13.39 करोड़ रह गई (लगभग 2.05 करोड़ नाम हटा दिए गए)। क्या इसका मतलब यह है कि 2024 में दो करोड़ से अधिक अपात्र मतदाताओं ने मतदान किया था?

चुनाव आयोग का जवाब स्पष्ट है – नहीं। 2024 के चुनाव उस समय मौजूद मतदाता सूचियों के आधार पर कराए गए थे। 2025-26 में किए गए मतदाता सूची संशोधन (एसआईआर) में पुरानी सूचियों से लंबे समय से जमा अनियमितताओं को दूर करने के लिए घर-घर जाकर गहन सत्यापन किया गया। हटाए जाने के मुख्य कारण थे:

स्थायी रूप से विस्थापित या अनुपस्थित व्यक्ति – करीब 2.17 करोड़
मृतकों की संख्या – लगभग 46 लाख
लगभग 25.5 लाख डुप्लिकेट प्रविष्टियाँ
इनका सत्यापन नहीं हुआ था और वर्षों से ये नाम रजिस्टर में दर्ज थे। बूथ स्तर के अधिकारियों ने मृत्यु प्रमाण पत्रों, स्थानांतरण अभिलेखों और अन्य दस्तावेजों का उपयोग करके जमीनी स्तर पर जाँच की। यह एक तरह से सफाई अभियान था।

दावों और आपत्तियों की अवधि के दौरान, फॉर्म-6 के 70.69 लाख आवेदन (नाम शामिल करने के लिए) प्राप्त हुए, जिनमें पुरुषों की तुलना में महिलाओं के आवेदन अधिक थे।

  1. 18 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों की जनसंख्या बढ़ रही है (2024 में लगभग 15.58 करोड़ और 2026 में 16.12 करोड़), तो मतदाताओं की संख्या में कमी क्यों आई?

जनसंख्या की गणना अभी नहीं हुई है और यह अनुमान मात्र है। एसआईआर (SIR) वास्तविक जमीनी स्तर पर घर-घर जाकर किए गए सत्यापन पर आधारित था। पुरानी सूचियों में बड़ी संख्या में मृत, स्थानांतरित, डुप्लिकेट और अज्ञात प्रविष्टियाँ जमा हो गई थीं। उचित सत्यापन के बाद इन्हें हटाने पर सटीक आँकड़ा सामने आया।

इसके अलावा, अंतिम सूची में 84.28 लाख नए नाम जोड़े गए , जिससे मतदाताओं की कुल संख्या 13,39,84,792 हो गई। वास्तव में, मतदाता सूची से हटाए गए नामों की कुल संख्या 2.89 करोड़ थी, और 84.28 लाख नए नाम जोड़ने के बाद शुद्ध रूप से हटाए गए नामों की संख्या करीब 13.40 करोड़ हो गई। इसका मतलब यह है कि हाल ही में मतदाता बने युवाओं को भी मतदाता सूची में शामिल किया गया है।

चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक दलों को शामिल किया, विशेष मतदाता सूची पर्यवेक्षकों की नियुक्ति की और बूथ स्तरीय अधिकारियों के माध्यम से सत्यापन किया। अर्हता तिथि 1 जनवरी, 2026 निर्धारित की गई थी। पूरी प्रक्रिया लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) और संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार की गई।

  1. बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या यहाँ उतनी गंभीर नहीं थी, तो फिर इतने सारे नाम क्यों हटा दिए गए?

नाम हटाए जाने की वजह मृत्यु, दूसरे राज्यों या जिलों में स्थायी प्रवास, दोहरा पंजीकरण और सत्यापन के दौरान फॉर्म जमा न करना थे। चुनाव आयोग ने कभी किसी विशेष समुदाय को निशाना नहीं बनाया। 9 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों को कवर करने वाले एसआईआर के दूसरे चरण में, प्रत्येक राज्य की पुरानी मतदाता सूची में मौजूद अनियमितताओं के स्तर के आधार पर औसतन लगभग 10 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।

  1. मतदाता सूची में लिंग अनुपात बहुत कम ( 834) है, जबकि अनुमानित जनसंख्या लिंग अनुपात 943 है। क्या इसका मतलब महिलाओं के नामों को बड़े पैमाने पर हटाना है?

प्रारंभिक मतदाता सूची में लिंग अनुपात 824 था, जो अंतिम सूची में बढ़कर 834 हो गया। अब मतदाताओं की संख्या 6.09 करोड़ है, जो कुल मतदाताओं का लगभग 45.46 प्रतिशत है। आवेदन अवधि में पुरुषों की तुलना में महिलाओं ने अधिक नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन किया।

नोटिस जारी करने और उचित सत्यापन के बाद ही नाम हटाए गए। यदि कोई पात्र महिला मतदाता सूची से छूट गई है, तो वह अभी भी फॉर्म-6 के माध्यम से आवेदन कर सकती है। चुनाव आयोग का स्पष्ट निर्देश है कि किसी भी पात्र मतदाता को वोटर लिस्ट से बाहर नहीं किया जाना चाहिए। पिछली वोटर लिस्ट में भी यह कमी थी, एसआईआर ने इसे ठीक करने के लिए कदम उठाए हैं।

  1. उत्तर प्रदेश के लिए प्रारूप 1 से 8 (मतदाता-जनसंख्या अनुपात, लिंग अनुपात, विलोपन आदि) सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं – क्या कुछ छिपाया जा रहा है?

ये प्रारूप चुनाव आयोग के मतदाता सूची नियमावली 2023 के अनुसार आंतरिक विश्लेषण के लिए है। इन्हें सार्वजनिक करना जरूरी नहीं है। संपूर्ण मतदाता सूची सत्यापन प्रक्रिया आयोग की देखरेख में पूर्ण पारदर्शिता के साथ संचालित की गई। राजनीतिक दलों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की गई और आपत्तियों और दावों के लिए पूर्ण अवसर प्रदान किया गया।

चुनाव आयोग ने बार-बार कहा है कि एसआईआर एक संवैधानिक कर्तव्य है और “किसी भी पात्र मतदाता को बाहर नहीं किया जाना चाहिए और किसी भी अपात्र मतदाता को शामिल नहीं किया जाना चाहिए।”

उत्तर प्रदेश का विशेष गहन मतदाता सूची संशोधन कोई पहेली नहीं है। यह 166 दिनों का एक व्यापक घर-घर जाकर किया गया सत्यापन अभियान था, जिसमें जनगणना प्रपत्र, लाखों दावे और आपत्तियां (70 लाख से अधिक शामिल किए जाने के लिए) और उचित प्रक्रिया का पालन शामिल था। इस प्रक्रिया के बाद 13.39 करोड़ मतदाताओं वाली अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की गई है। 2024 की मतदाता सूची में जमा हुई अनियमितताओं को दूर करना चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व था।

यदि किसी पात्र नागरिक का नाम अभी भी सूची में नहीं है, तो वे तुरंत voters.eci.gov.in पर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं या स्थानीय चुनाव कार्यालय या उत्तर प्रदेश चुनाव आयोग के पोर्टल के माध्यम से फॉर्म-6 का उपयोग कर सकते हैं।

मतदाता सूचियों को स्वच्छ और सटीक रखना चुनाव आयोग का दायित्व है और इसका मकसद लोकतंत्र को मजबूत बनाना है। इससे किसी को कोई नुकसान नहीं होता। एसआईआर इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

क्यों बंगाल BJP के लिए बना हुआ है बड़ी राजनीतिक चुनौती, जानिए- क्या हैं बाधाएँ और कहाँ से निकलेगा जीत का रास्ता

पश्चिम बंगाल की राजनीति केवल चुनावी गणित का खेल नहीं है। यह पहचान, संस्कृति और नेतृत्व की विश्वसनीयता का भी प्रश्न है। हाल ही में प्रकाशित एक विश्लेषण में यह तर्क सामने आता है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सबसे बड़ी कमजोरी उसका ‘स्थानीय चेहरा’ न होना है। यह समस्या केवल संगठनात्मक नहीं बल्कि वैचारिक और सांस्कृतिक भी है।

दरअसल, बंगाल की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहाँ लंबे समय तक वही दल टिके हैं जिनके पास मजबूत क्षेत्रीय नेतृत्व और स्थानीय नैरेटिव रहा है। चाहे कॉन्ग्रेस का शुरुआती दौर हो, वामपंथ का 34 साल का शासन या फिर ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) हर दौर में एक ‘बंगाली चेहरा’ निर्णायक रहा है। इसके उलट, भाजपा अभी तक इस कसौटी पर पूरी तरह खरी नहीं उतर पाई है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और भाजपा की सीमाएँ

भाजपा की जड़ें बंगाल में नई नहीं हैं। इसके पूर्ववर्ती संगठन भारतीय जनसंघ की स्थापना स्वयं श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कोलकाता से की थी। इसके बावजूद, पार्टी को राज्य में प्रभावी शक्ति बनने में सात दशक लग गए। शुरुआती चुनावों में दक्षिणपंथी दलों का वोट प्रतिशत सीमित रहा जबकि कॉन्ग्रेस और वामपंथी दलों ने व्यापक सामाजिक आधार तैयार किया। 

इसका एक बड़ा कारण यह था कि दक्षिणपंथी राजनीति बंगाल में एक व्यापक सामाजिक-आर्थिक नैरेटिव विकसित नहीं कर पाई। जबकि वामपंथ ने मजदूर आंदोलनों और भूमि सुधार जैसे मुद्दों पर जनाधार बनाया और कॉन्ग्रेस ने स्वतंत्रता संग्राम की विरासत का लाभ उठाया। 

मोदी फैक्टर की सीमा

भाजपा का उभार 2019 के लोकसभा चुनावों में अचानक तेज हुआ जब पार्टी ने लगभग 40% वोट शेयर हासिल किया। लेकिन यह उभार मुख्यतः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों पर आधारित था न कि राज्य में मजबूत संगठन या स्थानीय नेतृत्व पर। 

यही कारण है कि 2021 के विधानसभा चुनावों में यह वोट शेयर सत्ता में नहीं बदल सका। भाजपा का पूरा अभियान ‘केंद्रीय नेतृत्व’ पर निर्भर रहा जबकि TMC ने ममता बनर्जी के नेतृत्व में जमीनी नेटवर्क और कल्याणकारी योजनाओं के जरिए मजबूत पकड़ बनाए रखी।

‘बाहरी बनाम बंगाली’ की राजनीति

बंगाल की राजनीति में पहचान का सवाल बेहद संवेदनशील है। टीएमसी ने भाजपा को ‘बाहरी’ (bohiragoto) पार्टी के रूप में प्रस्तुत करने में काफी सफलता हासिल की है। यह नैरेटिव केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक स्तर पर भी गहराई से असर डालता है।

भाजपा द्वारा बार-बार ‘घुसपैठ’ और ‘धार्मिक ध्रुवीकरण’ जैसे मुद्दों पर जोर देने से भी यह धारणा मजबूत हुई कि पार्टी स्थानीय सामाजिक-सांस्कृतिक वास्तविकताओं को पूरी तरह नहीं समझती।

इसके विपरीत, बंगाल में मतदाता अक्सर ऐसे नेतृत्व को प्राथमिकता देते हैं जो उनकी भाषा, संस्कृति और जीवनशैली से जुड़ा हो। यही कारण है कि ममता बनर्जी ने ‘बंगाली अस्मिता’ को एक शक्तिशाली राजनीतिक हथियार बना दिया।

संगठनात्मक कमजोरी

भाजपा की एक बड़ी समस्या उसका कमजोर संगठनात्मक ढाँचा भी है। 2019 के बाद पार्टी ने अपने वोट बैंक को स्थायी समर्थन में बदलने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए। शिक्षकों, युवाओं, महिलाओं और सरकारी कर्मचारियों जैसे वर्गों के बीच कोई मजबूत राजनीतिक नेटवर्क नहीं बन पाया। 

इसके अलावा, पार्टी के पास राज्य स्तर पर एकजुट और प्रभावशाली नेतृत्व की भी कमी है। न तो कोई सर्वमान्य चेहरा उभर पाया है, और न ही दूसरी पंक्ति के नेताओं का विकास हुआ है, जो युवा मतदाताओं से जुड़ सकें।

क्या समाधान है?

इस स्थिति से निकलने का एकमात्र रास्ता यही है कि भाजपा बंगाल में एक मजबूत ‘बंगाली चेहरा’ विकसित करे ऐसा नेता जो न केवल राजनीतिक रूप से सक्षम हो बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी राज्य के साथ जुड़ा हो।

यह केवल चुनावी रणनीति का सवाल नहीं है बल्कि पार्टी के दीर्घकालिक अस्तित्व का भी प्रश्न है। यदि भाजपा खुद को ‘राष्ट्रीय पार्टी का स्थानीय संस्करण’ नहीं बल्कि ‘बंगाल की अपनी पार्टी’ के रूप में प्रस्तुत नहीं कर पाती तो उसकी वृद्धि सीमित रह सकती है।

आगे की राह

भाजपा के पास अभी भी अवसर है। राज्य में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और प्रशासनिक समस्याओं जैसे मुद्दे मौजूद हैं, जिन पर वह राजनीतिक लाभ उठा सकती है। लेकिन इन मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने के लिए स्थानीय नेतृत्व और जमीनी संगठन अनिवार्य है।

यदि पार्टी केवल केंद्रीय नेताओं और राष्ट्रीय मुद्दों पर निर्भर रहती है, तो वह TMC के मजबूत क्षेत्रीय नैरेटिव को चुनौती नहीं दे पाएगी। लेकिन यदि वह एक विश्वसनीय बंगाली नेतृत्व तैयार कर लेती है तो बंगाल की राजनीति में वास्तविक परिवर्तन संभव है।

निष्कर्ष

बंगाल में भाजपा की चुनौती केवल सत्ता हासिल करने की नहीं बल्कि अपनी पहचान बनाने की है। जब तक पार्टी ‘बाहरी’ की छवि से बाहर निकलकर ‘बंगाली अस्मिता’ के साथ खुद को जोड़ने में सफल नहीं होती, तब तक उसकी चुनावी संभावनाएँ सीमित रहेंगी। एक मजबूत बंगाली चेहरा केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं बल्कि उस राजनीतिक विश्वास का प्रतीक होगा जिसकी बंगाल की जनता तलाश कर रही है।

जिन्ना के कदमों पर भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर रावण, दलितों के लिए माँगा ‘अलग निर्वाचक मंडल’: जानिए कैसे अंबेडकर ने खुद विरोध कर संविधान में लगाया था प्रतिबंध

भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर रावण ने लोकसभा में विवादित बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि अगर सरकार सचमुच में पिछड़ों, महिलाओं और दलितों को सशक्त बनाना चाहती है तो उनके लिए अलग निर्वाचक मंडल लागू करे।

उन्होंने कहा कि आरक्षण इनलोगों को सशक्त बनाने में सफल नहीं हो पाया है और यह महज एक नारा बनकर रह गया है। उन्होंने तर्क दिया कि सामाजिक न्याय प्राप्त करने के लिए, आधे-अधूरे नारों पर निर्भर रहने के बजाय, समस्याओं के पूर्ण, साहसिक और सीधे समाधान की ओर बढ़ना अनिवार्य है।

नगीना से लोकसभा सांसद ने बीएसपी संस्थापक कांशी राम और उनकी पुस्तक ‘चमचा युग’ का हवाला देते हुए दावा किया कि आरक्षित सीटों से चुने गए प्रतिनिधि व्यवस्था के भीतर काम करने के लिए मजबूर होते हैं। ये लोग अपने समुदाय की तुलना में अपनी पार्टी के प्रति ज्यादा वफादार होते हैं।

उन्होंने कहा, “इसलिए एक अलग निर्वाचक मंडल ही एकमात्र व्यवहार्य समाधान है।”

दरअसल संसद में दिए गए चंद्रशेखर रावण के बयान न केवल गैरकानूनी हैं, बल्कि भारतीय संविधान के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ भी है। इतना ही नहीं यह गणतंत्र के संस्थापकों की परिकल्पना ‘भारत के विचार’ के भी विपरीत है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अनुच्छेद 325 धर्म, जाति, लिंग या अन्य कारकों पर आधारित ऐसी सिफारिशों को सिरे से खारिज करता है।

संविधान के अनुच्छेद 325 में प्रावधान

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 325 में स्पष्ट रूप से कहा गया है, “संसद के किसी भी सदन या राज्य के विधानमंडल के किसी भी सदन के चुनाव के लिए प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के लिए एक सामान्य मतदाता सूची होगी और कोई भी व्यक्ति केवल धर्म, जाति, नस्ल, लिंग या इनमें से किसी भी आधार पर ऐसी किसी भी सूची में शामिल होने के लिए अयोग्य नहीं होगा या ऐसे किसी भी निर्वाचन क्षेत्र के लिए किसी विशेष मतदाता सूची में शामिल होने का दावा नहीं करेगा। ”

1948 के संविधान के मसौदे में अनुच्छेद 289ए शामिल नहीं था, जिसे बाद में अनुच्छेद 325 के रूप में अधिनियमित किया गया। 16 जून 1949 को, मसौदा समिति के अध्यक्ष ने यह प्रावधान पेश किया। इसमें निर्दिष्ट किया गया कि राज्य विधानसभाओं और संसद के चुनावों के लिए प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में एक ही मतदाता सूची होगी।

इसके अलावा, लिंग, जाति, नस्ल या धर्म के आधार पर किसी भी व्यक्ति को सूची से बाहर नहीं रखा जाएगा। इसका उद्देश्य अलग निर्वाचक मंडल की संभावना को पूरी तरह समाप्त करना था। इसे उसी दिन बिना किसी बहस के सर्वसम्मति से अनुमोदित कर दिया गया।

(साभार- constitutionofindia.net)

डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर ने संविधान को प्रतिपादित किया था। उस संविधान के मूलभूत सिद्धांतों में से एक के लिए दिया गया यह निर्णायक समर्थन दर्शाता है कि देश ने हमेशा प्रत्येक नागरिक के लिए निष्पक्ष और न्यायपूर्ण चुनावी समानता का समर्थन किया है। अंग्रेजों ने सांप्रदायिकता और अलग-अलग निर्वाचक मंडल का जो बीज भारत में बोया, उसे अस्वीकार किया गया। अखिल भारतीय मुस्लिम लीग द्वारा प्रस्तावित और उपनिवेशवादियों द्वारा समर्थित हिंसक भारत विभाजन की पृष्ठभूमि में इस निर्णय का महत्व और भी बढ़ गया।

अंबेडकर ने अलग निर्वाचक मंडल का किया था विरोध

संविधान सभा की बहस के दौरान संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर ने अलग- अलग निर्वाचक मंडल बनाए जाने को अस्वीकार कर दिया था।

आधुनिक भारत के निर्माताओं ने दिसंबर 1946 और जनवरी 1950 के बीच आयोजित संविधान सभा की बहसों के दौरान इस बात पर जोर दिया कि लोकतंत्र सांप्रदायिक विभाजन के बजाय सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ की अवधारणा पर केंद्रित होना चाहिए।

संविधान के सूत्रधार अंबेडकर ने अनुच्छेद 289ए पर चर्चा के दौरान कहा, “इसका उद्देश्य केवल सदन के उस निर्णय को लागू करना है कि अब से कोई अलग निर्वाचक मंडल नहीं होगा। वास्तव में, यह खंड अनावश्यक है क्योंकि बाद के संशोधनों द्वारा हम मसौदा संविधान में निहित उन प्रावधानों को हटा देंगे जिनमें मुसलमानों, सिखों, एंग्लो-इंडियन आदि के प्रतिनिधित्व का प्रावधान है।”

साभार- संविधान सभा की बहसें (खंड 8) (स्रोत: constitutionofindia.net)

अंबेडकर ने आगे कहा, “इसलिए इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन यह भावना है कि चूँकि हमने एक बहुत महत्वपूर्ण निर्णय लिया है, जो व्यावहारिक रूप से अतीत को निरस्त कर देता है, इसलिए बेहतर है कि संविधान में इसे स्पष्ट रूप से बताया जाए। यही कारण है कि मैंने यह संशोधन पेश किया है।”

जब उनसे पूछा गया कि क्या उद्देश्य संशोधन को पारित कराना था, तो अंबेडकर ने उत्तर दिया कि वह अपने प्रस्ताव के पीछे के तर्क को व्यक्त करना चाहते थे, और यह बताना चाहते थे कि पृथक निर्वाचक मंडलों को अस्वीकार करने को लेकर वे कितने दृढ़ हैं।

इसके बाद, धर्म, जाति या नस्ल के आधार पर अलग-अलग चुनावी अभिलेखों को रोकने, सभी नागरिकों के लिए समान राजनीतिक अधिकारों की गारंटी देने और एक समान चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से राष्ट्रीय एकता और सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए अनुच्छेद 325 को अपनाया गया।

पृथक निर्वाचक मंडल वाली बीज अंग्रेजों ने बोए

पृथक निर्वाचक मंडल की उत्पत्ति ब्रिटिश भारत में हुई। अंग्रेजों ने इस्लामी कट्टरपंथियों की सांप्रदायिक योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए उनकी मांगों को स्वीकार कर लिया। ब्रिटिश संसद के भारतीय परिषद अधिनियम 1909 में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल बनाने का प्रस्ताव था। इसे मार्ले-मिंटो सुधार अधिनियम भी कहा जाता है।

इस व्यवस्था ने धार्मिक आधार पर ही अपने प्रतिनिधियों को चुनने की स्वतंत्रता देकर राजनीतिक परिदृश्य में सांप्रदायिक विभाजन को औपचारिक रूप दे दिया। कई दशकों तक कायम रही इस प्रणाली ने राष्ट्रीय पहचान के बजाय धार्मिक पहचान को बढ़ावा दिया। इसके चलते मुस्लिम लीग ने एक अलग राज्य बनाने की वकालत की। अंततः 1947 में देश का विभाजन हुआ और 1956 में इस्लामी गणराज्य पाकिस्तान की स्थापना हुई।

भारतीय परिषद अधिनियम के तहत पहली बार विधायी निकायों में सीटों का वितरण पहचान के आधार पर किया गया। पिछड़े वर्गों (अनुसूचित जातियों) को भी 1919 में कुछ सीटें मिलीं। इन सीटों को 1925 में बढ़ाई गई। यह मुद्दा बाद में मोहनदास करमचंद गाँधी और अंबेडकर के बीच विवाद का विषय बन गया। उन्होंने दलितों के लिए विशेष निर्वाचक मंडल की माँग की थी, हालाँकि बाद में इसे छोड़ दिया।

गाँधी और अंबेडकर के बीच मतभेद

महात्मा गाँधी ने दलित वर्गों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की अवधारणा को अस्वीकार कर दिया, जबकि दूसरे ग्रुप को लेकर उनके विचार अलग थे। उनका मानना ​​था कि यह अंग्रेजों की हिंदू आबादी को विभाजित करने, सामाजिक विभाजन को कायम रखने और सत्ता पर अपनी कमजोर पकड़ को मजबूत करने की एक चाल थी। उनके विचार में, यह निर्णय दर्शाता था कि दलित हिंदू समुदाय का हिस्सा नहीं हैं। पुणे की येरवडा सेंट्रल जेल में बंद गाँधी जी ने आमरण अनशन शुरू कर दिया।

दूसरी ओर, अंबेडकर दलित वर्गों के लिए एक अलग निर्वाचक मंडल चाहते थे। उन्होंने 1930 में ‘प्रथम गोलमेज सम्मेलन’ के दौरान आवाज उठाई थी। हालाँकि गाँधी और भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस इसके खिलाफ थे। ये इसे भारतीय समाज को कमजोर और खंडित करने की एक योजना के रूप में देखते थे।

उन्होंने देखा कि ब्रिटिश सरकार अपने हितों की रक्षा करने और पुरस्कार के माध्यम से अपनी शक्ति का विस्तार करने के लिए अपनी कुख्यात ‘फूट डालो और राज करो’ नीति का प्रयोग कर रही थी। उनके आमरण अनशन ने अंबेडकर पर हस्तक्षेप करने के लिए जन दबाव डाला और अंततः दोनों पक्षों के बीच समझौता होने पर भूख हड़ताल समाप्त हुई।

पूना पैक्ट: संघर्ष का समाधान

24 सितंबर 1932 को उच्च जाति के हिंदुओं की ओर से डॉ. मदन मोहन मालवीय और दलित वर्गों की ओर से अंबेडकर के बीच ‘पुणे समझौता‘ हुआ। इसने साझा निर्वाचक मंडल के ढाँचे के भीतर आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाने पर सहमति बनी।

दिलचस्प बात यह है कि अंबेडकर ने 1918-1919 में मताधिकार (साउथबोरो) समिति के समक्ष अपनी उपस्थिति के बाद से ही सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के लिए अभियान चलाया था। हालांकि, द प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार , उन्होंने प्रतिनिधित्व प्राप्त करने के साधन के रूप में सांप्रदायिक मतदाताओं की उपयुक्तता पर गंभीर संदेह व्यक्त किया था।

अम्बेडकर ने ‘साइमन कमीशन’ के समक्ष अपनी उपस्थिति के दौरान वयस्क मताधिकार का समर्थन किया, जिसके तहत मतदान के अधिकार आय, प्रतिष्ठा या शिक्षा के बजाय आयु के आधार पर निर्धारित किए जाएँगे। जिरह के दौरान उन्होंने उल्लेख किया कि मिश्रित मतदाता प्रणाली होनी चाहिए जिसमें सीटें आवंटित हों, अन्यथा दलित वर्गों को मुसलमानों के समान प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।

मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों, रियासतों और अन्य लोगों ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का विरोध किया। ब्रिटिश सरकार भी देश को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार देने में हिचकिचा रही थी। इसका कारण उनके रुख में बदलाव और अलग निर्वाचक मंडल पर उनका जोर हो सकता है।

हालाँकि डॉ. अंबेडकर का पूरा ध्यान अनुसूचित जातियों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की अवधारणा के बजाय देश की राजनीतिक संरचना के भीतर उनके प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देने पर था।

भारत पहले ही विभाजन का खामियाजा भुगत चुका है, जिसकी शुरुआत मुस्लिम समुदाय के लिए अलग निर्वाचक मंडल की माँग से हुई थी। इसकी जड़ें न्याय और प्रतिनिधित्व के भेष में छिपे कट्टरवाद और अतिवाद में हैं।

हालाँकि यह राष्ट्र के सामाजिक ताने-बाने के लिए भी हानिकारक है। इसका फायदा निहित स्वार्थ वाले लोग उठाएँगे और सामाजिक दरारों को और गहरा करेंगे। इससे भारत की विकास यात्रा पटरी से उतर जाएगी और अब तक हुई प्रगति व्यर्थ चली जाएगी।

समकालीन भारत में पृथक निर्वाचक मंडल का कोई महत्व नहीं है, न ही भविष्य में होगा और न ही अतीत में था। आक्रमणकारियों द्वारा देश पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिए रची गई साजिश को ‘सशक्तिकरण’ के बहाने सुदृढ़ नहीं किया जा सकता, क्योंकि वास्तव में यह विभाजन का एक तंत्र मात्र है। यह राष्ट्रीय एकता को कमजोर करता है। भारत और भारत के लोगों की प्रगति में एक बड़ी बाधा भी है।

बेशक, जनता की समस्याओं का समाधान किया जाना चाहिए, लेकिन यह देश के संविधान को तोड़-मरोड़ कर देश को नुकसान पहुँचाए बिना नहीं किया जा सकता। चंद्रशेखर रावण को सामान्य सी बात समझनी होगी कि राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य को खतरे में डालकर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

(यह लेख मूलरूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

जिसने खिलाया अपनी थाली से खाना, उस RBI के पूर्व कर्मी का आजाद हुसैन ने रेता गला: बीवी ने धोए खून से सने कपड़े, पढ़ें- ऑपइंडिया पर पीड़ित परिवार ने क्या किए खुलासे

दिल्ली के सीआर पार्क में हुए डबल मर्डर का मामला अभी शांत नहीं हुआ था कि अब आरके आश्रम इलाके में RBI से रिटायर्ड कर्मचारी 63 वर्षीय माधव राम वाल्मीकि की चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी गई। हत्या करने के बाद आरोपित मृतक के गले से सोने की चेन और सोने की अँगूठी ले गया। आरोपित मोहम्मद आजाद हुसैन, माधव राम को पानी देने के बहाने छत पर गया था। हत्या करने के बाद घर पर पहुँचे आजाद के खून से सने कपड़ों को उसकी बीवी रूबीना ने सबूत मिटाने के इरादे से साफ किया था।

19 अप्रैल की शाम को हुई हत्या के बाद ऑपइंडिया की टीम उस जगह पहुँची जिस घर में मोहम्मद आजाद ने इस घटना को अंजाम दिया था। गुस्साए हिंदू समाज के लोग इकट्ठा होकर बीते मंगलवार (21 अप्रैल 2026) घटना के विरोध में मृतक माधव राम के घर पहुँचे। सूचना पर पहले से बड़ी संख्या में दिल्ली पुलिस और RAF के जवान तैनात थे। घर के बाहर कुछ मीडिया कर्मियों और रिश्तेदारों का जमावड़ा लगा था।

घर के बाहर घटना से गुसाईं महिला रिश्तेदार ने हमें देखते ही कहा कि कुछ नहीं होगा, उत्तम नगर में भी कुछ नहीं हुआ। वहाँ भी बहुत मीडिया वाले और हिंदूवादी आए थे लेकिन क्या हुआ? तरुण की माँ आज भी न्याय के लिए बिलख रही है। ऐसे ही अब हमारे जीजा जी को बेरहमी से मारा है। पुलिस से कुछ नहीं होता तो उसे हमारे हवाले कर दो हम अपना हिसाब कर लेंगे। महिला ने आगे गुस्से में कहा कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो हम उनके घरों में सूअर छोड़ेंगे। चाहे हम कुछ भी करना पड़े हमें इंसाफ चाहिए खून के बदले खून चाहिए।

इसके बाद हम छोटे से बने माधव राम के घर के अंदर दाखिल हुए। एक छोटे से कमरे में उनका पूरा परिवार और कुछ रिश्तेदार गमगीन बैठे हुए थे। इकलौते बेटे सिद्धांत ने बताया कि घर पर पड़ोस में रहने वाला मोहम्मद आजाद हमारे घर आया था। उसने मुझसे ₹3000 पेटीएम करने के लिए बोला मैंने मना कर दिया। सिद्धांत ने कहा, “मैं वहाँ से बाहर जूस पीने के लिए चला गया। इसके कुछ देर बाद ही मुझे बहन का कॉल आता है की भैया जल्दी आ जाओ घर वह रो रही थी। मैं कुछ समझ नहीं पाया।”

सिद्धांत बताते हैं, “मैं जल्दी घर पहुँचा तो घर के बाहर भीड़ लगी थी और छत पर जाकर देखा तो पापा खून से लथपथ पड़े हुए थे। मुझसे देखा नहीं गया। कभी सोचा नहीं था कि अपने घर में ही पापा का यह हाल होगा।” सिद्धांत आगे बताते हैं कि घटना के बाद अहसास हुआ कि आजाद उर्फ जाजू हमारे घर की लगातार रेकी कर रहा था क्योंकि दो दिन पहले ही बैंक से मम्मी-पापा बैंक में रखे जेवरात लेकर आए थे और उस समय वह घर पर ही था।

माधव राम की पत्नी ने बताया कि मैं एक कार्यक्रम में जाने की तैयारी कर रही थी। वो घटना को याद कर बताती हैं, “उसी टाइम उन्होंने (माधव राम) मुझसे पानी माँगा तो मैं पानी बोतल लेकर ऊपर देने जा ही रही थी कि तभी जाजू आया उसने मेरे हाथ से बोतल लेते हुए कहा कि ‘आपके परेशान क्यों होते हो मैं देता हूँ’ और इसी के बहाने जाजू छत पर चला गया और मैं बाहर अपने कार्यक्रम में चली गई।”

रोते बिलखते हुए वह बताती हैं, “इसके बाद मुझे बेटी का फोन आया तो घटना के बारे में पता चला। शायद मैं यहाँ से नहीं जाती है तो ये घटना नहीं होती। यहाँ रहते हुए 70-80 साल हो गए। अब मैं कहाँ जाऊँगी। हमें इंसाफ चाहिए हमें योगी मॉडल चाहिए हमें जान के बदले जान चाहिए।”

आरोपित ने 2 साल पहले किया था अपनी माँ का कत्ल

माधव राम के बेटे सिद्धांत ने बताया कि मोहम्मद आजाद ने करीब 2 वर्ष पहले ऐसे ही अपनी अम्मी का भी कत्ल किया था। पड़ोस में ही रहने वाले चंद्रपाल सिंह ने बताया कि करीब 2-3 साल पहले इसी युवक ने अपनी अम्मी को भी ऐसे ही मारा था लेकिन उस मामले में भी पुलिस ने कोई ठोक कार्रवाई नहीं की थी जिसके कारण वह आज तक खुलेआम घूमता रहा और फिर उसने इस घटना को अंजाम दे दिया।  

भाईचारे में गई माधव राम की जान

बेटे सिद्धांत ने बताया कि मोहम्मद आजाद का बहुत सालों से हमारे घर पर आना-जाना था। वह बताते हैं कि पिताजी के रिटायरमेंट के बाद पापा का उसके साथ और भी ज्यादा उठना बैठना हो गया था लेकिन हमें कभी शक नहीं हुआ। माधव राम की पत्नी कहती हैं कि जब भी जाजू घर आता था तो माधव राम कई बार अपने हिस्से का खाना तक उसे खिला देते थे।

परिवार कर रहा योगी मॉडल की माँग

बेटे सिद्धांत कहते हैं, “यह घटना अगर यूपी में हुई होती तो अब तक हमें इंसाफ मिल जाता। आज घटना को तीन दिन हो गए लेकिन हमसे कोई मिलने तक नहीं आया। हमें न्याय चाहिए। आरोपित का योगी मॉडल से एनकाउंटर होना चाहिए।” इसी बात को पत्नी और उनकी बड़ी बेटी यहाँ तक कि आसपास में बैठे उनके रिश्तेदार भी दोहराते हुए योगी मॉडल की माँग करते हैं। बड़ी बेटी कहती है कि मैं चाहती हूँ कि जैसे मेरे पापा को तड़पा-तड़पाकर मारा है ऐसे ही आरोपित को तड़पा-तड़पाकर मारा जाए।

घटना के विरोध में इकट्ठा हुई भीड़ में शामिल एक युवक ने कहा कि अब ऐसे अपराधियों से निपटने के लिए दिल्ली पुलिस को योगी मॉडल की तर्ज पर गाड़ी पलटकर उनका परमानेंट इलाज करना होगा। इस दौरान महंत मंगल दास कहते हैं, “हिंदू समाज का रक्त बर्फ के जैसे जम गया है उसी को पिघलने के लिए मैं यहाँ आया हूँ, मैं कहता हूँ कि किसी भी क्रिया की प्रतिक्रिया जरूर होनी चाहिए नहीं तो कभी उत्तम नगर तो कभी आरके आश्रम होता रहेगा।”

विजय नाम के युवक ने कहा कि जब तक हिंदू समाज सोता रहेगा तब तक इस तरह की घटना होती रहेंगे या रहने वाले लोग सुरक्षित नहीं है क्योंकि यहाँ 70% मुस्लिम आबादी रहती है। विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए विश्व हिंदू परिषद के प्रांत मंत्री सुरेंद्र गुप्ता ने कहा कि इस तरह की घटना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन लगातार हिंदू जागरुक हो रहा है और सामने आकर अब अपनी प्रतिक्रिया भी दे रहा है जो कि पहले नहीं होता था।

उन्होंने कहा, “रक्त बहाना मुसलमान के स्वभाव में है, जिसे उन्हें छोड़कर हमारे(हिंदू) जैसे शांत स्वभाव को अपनाना चाहिए जिससे कि वह सुरक्षित रह सकें। सोचिए कि अगर उनका स्वभाव हमारे बच्चों ने अपना लिया तो किसी(मुसलमानों) को भी भारत की भूमि पर सर छिपाने की जगह नहीं मिलेगी।” उन्होंने हिंदुओं को सजग करते हुए कहा कि हिंदुओं को सुरक्षित रहना है तो मुसलमान से दूर का व्यवहार रखना होगा। अगर अपने घर में घुसने की इजाजत देंगे तो कभी ना कभी हम इस तरह की घटनाओं का शिकार होंगे। आपको बता दें कि मामले में दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई करते हुए दोनों आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है।

घटना के बाद बोला मुस्लिम- परिवार का कोई दोष नहीं

पड़ोसन रहने वाले कमल हसन ने कहा कि यह घटना बहुत दु:खद है। वो कहते हैं कि हम मुस्लिम समाज के लोगों ने आरोपी के परिवार का बहिष्कार किया है लेकिन इसमें परिवार का कोई दोष नहीं है। उस एक गलत व्यक्ति के कारण माहौल खराब हुआ है। उसे कड़ी सजा मिलनी चाहिए। वहीं, रेडीमेड की दुकान करने वाले अजीब नाम के युवक ने कहा कि आरोपित को कठोर सजा होनी चाहिए। उसने बहुत गलत किया है। पड़ोस में रहने वाले हैदर अली कहते हैं कि एक हरामखोर ने हमारे पूरे इलाके की शांति को भंग कर दिया है और सरकार से कहूँगा कि उसे कड़ी से कड़ी सजा दी जाए।  

इलेक्ट्रीशियन प्रकाश को दो दिन बाद पुलिस ने छोड़ा

घटना के विरोध में इकट्ठा हुए हिंदू समाज के लोगों ने दिल्ली पुलिस के सामने सबसे पहले इलेक्ट्रीशियन प्रकाश कोतत्काल छोड़ने की माँग रखी। इसके बाद माहौल को देखते हुए पुलिस ने 10 मिनट के अंदर ही प्रकाश को परिजनों को हवाले कर दिया। प्रकाश को दो दिन से पुलिस ने पूछताछ के नाम पर थाने में बिठा रखा था। प्रकाश ने हमें बताया कि मैं रोज की तरह माधव राम जी को आवाज देते हुए छत पर गया लेकिन उन्होंने जवाब में कोई आवाज नहीं दी।

वह बताते हैं कि उन्होंने चादर ओढ़ी हुई थी तो मैं उनके पैर पड़कर हिलाए सोचा कि सो रहे होंगे। फिर भी उठ नहीं उठे तो मैंने चादर हटाई तो पूरा शरीर खून से लथपथ था, उन्हें देखकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्होंने कहा, “मैं तुरंत नहीं गया और उनकी बेटी को बताया। फिर पूरे मोहल्ले वालों को पता चला। मैं 12-13 साल से माधव राम को जानता था यह घटना बहुत दुखद है आरोपित को को फाँसी की सजा होनी चाहिए।”

गुड़गाँव से गायब होती मेड और बंगाल चुनाव का ‘सीक्रेट’ कनेक्शन: जानें- कैसे अपने पत्ते खेल रही है हताश TMC

पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर एक ही चर्चा छाई हुई है। गुड़गाँव की महिलाएँ परेशान हैं और अपनी आपबीती Video के जरिए बता रही हैं। हर तरफ थकी-हारी महिलाओं की रील नजर आ रही हैं। वे बस एक ही सवाल पूछ रही हैं- आखिर गुड़गाँव की मेड कहाँ चली गईं?

इंस्टाग्राम पर ‘गुड़गाँव की मेड कहाँ गायब हैं’ जैसे सवाल वायरल हो रहे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि अचानक घरों में काम करने वाली महिलाएँ कहाँ चली गईं? हालत यह है कि स्विगी और जोमैटो के ऑर्डर लेने वाले भी कम नजर आ रहे हैं। हर कोई हैरान है कि आखिर शहर में चल क्या रहा है?

इतना ही नहीं, घर बैठे काम करवाने वाली ऐप्स पर भी बुरा हाल है। अर्बन कंपनी और इंस्टा-मेड जैसी सेवाओं के स्लॉट ही नहीं मिल रहे हैं। लोग फोन और ऐप चेक कर-करके थक चुके हैं। इंस्टाग्राम पर क्या पुरुष और क्या महिलाएँ, सभी इस मुद्दे पर बहस कर रहे हैं। गुड़गाँव के घरों में काम ठप हो गया है और लोगों की हताशा अब इंटरनेट पर साफ दिख रही है।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे ये वीडियो तो बस एक झलक हैं। लोग अपनी सबसे भरोसेमंद मेड को खोने का दुख मना रहे हैं। आखिर गुड़गाँव की ये मेड कहाँ जा रही हैं? क्या इसका 2026 के पश्चिम बंगाल चुनाव से कोई ताल्लुक है?

हमने शहर छोड़कर जा रही कई मेड और परेशान मकान मालकिनों से बात की। इस बातचीत में जो बातें सामने आईं, वे वाकई चौंकाने वाली थीं। इसमें सबसे पहला पैटर्न यह दिखा कि जाने वाली ज्यादातर मेड पश्चिम बंगाल की रहने वाली हैं। वे शुद्ध बंगाली और टूटी-फूटी हिंदी बोलती हैं। उनकी बोली और लहजे से यह भी संकेत मिलता है कि इनमें से कुछ शायद पश्चिम बंगाल से नहीं, बल्कि बांग्लादेश से हो सकती हैं।

दूसरा बड़ा पैटर्न यह नजर आया कि शहर छोड़ने वाली मेड में से बड़ी संख्या बंगाली मुस्लिमों की है। ये दोनों ही बातें पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के ठीक पहले सामने आई हैं। चुनाव के पहले चरण का मतदान 23 अप्रैल 2026 को होना है। जा रही मेड ने बातचीत में खुलासा किया कि वे पश्चिम बंगाल के चुनावों में वोट डालने के लिए ही गुड़गाँव छोड़ रही हैं।

मर्जी या मजबूरी? क्यों भाग रही हैं मेड

क्या गुड़गाँव की मुस्लिम मेड अपनी मर्जी से बंगाल वोट डालने जा रही हैं? या फिर इसके पीछे TMC की कोई धमकी है? आम तौर पर लोग इसे नागरिक जिम्मेदारी मानते हैं। पर बंगाल के मामले में सच्चाई कुछ और ही नजर आती है।

शहर छोड़ रही महिलाओं ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। उन्होंने बताया कि उनके पास बंगाल से TMC कार्यकर्ताओं के फोन आ रहे हैं। उनसे कहा जा रहा है कि इस बार वोट डालना बहुत जरूरी है। कार्यकर्ताओं ने साफ कहा, “चाहे अगली बार वोट मत देना, पर इस बार आना ही पड़ेगा।”

धमकियाँ यहीं खत्म नहीं होतीं। महिलाओं का दावा है कि उन्हें डराया जा रहा है। उनसे कहा गया कि अगर वे वोट देने नहीं आईं, तो उनकी जमीन छीन ली जाएगी। उनके घर गिरा दिए जाएँगे। उन्हें डराया जा रहा है कि अगर बंगाल में BJP सत्ता में आई, तो उन्हें बांग्लादेश बॉर्डर पर ले जाकर मार दिया जाएगा।

एक महिला ने दुखी होकर बताया कि वे बंगाली हैं, बांग्लादेशी नहीं। फिर भी उन्हें मुस्लिम होने के नाते डराया जा रहा है। TMC कार्यकर्ता कह रहे हैं कि वे ही उन्हें NRC से बचा सकते हैं। अगर BJP आई तो NRC होगा और सबको मार दिया जाएगा। महिलाएँ पूछ रही हैं कि इस बार नेता इतने बेचैन क्यों हैं और उन्हें घर लौटने पर मजबूर क्यों कर रहे हैं।

हमने जिन महिलाओं से बात की, उनमें से कुछ की राय बिल्कुल अलग थी। वे डरने के बजाय अपनी बात खुलकर रख रही थीं। उनका कहना था कि TMC उन्हें डराकर वोट लेना चाहती है। लेकिन वे इस बार ‘मोदी अंकल’ को वोट देना चाहती हैं।

एक महिला ने गुस्से में पूछा कि TMC ने उनके लिए किया ही क्या है? उन्होंने कहा, “हम उन्हें ‘दीदी’ कहते थे, लेकिन गाँव में न पानी है न काम।” उनका कहना है कि अगर दीदी ने कुछ किया होता, तो उन्हें गुड़गाँव आकर काम नहीं करना पड़ता। वे अपने ही राज्य में खुश रहतीं।

ग्राउंड रिपोर्ट से पता चला है कि दिल्ली और गुड़गाँव से हजारों लोग बंगाल पहुँच रहे हैं। सियालदह और हावड़ा रेलवे स्टेशनों पर लोगों का तांता लगा हुआ है। ये गरीब लोग सिर्फ वोट डालने के लिए इतनी दूर से भागकर आ रहे हैं। उनके चेहरों पर डर साफ देखा जा सकता है।

हिंदू मेड क्यों छोड़ रही हैं गुड़गाँव?

मुस्लिम महिलाओं के साथ-साथ गुड़गाँव में काम करने वाली हिंदू मेड भी बंगाल लौट रही हैं। हालाँकि, उनकी संख्या उतनी ज्यादा नहीं है, फिर भी पलायन जारी है। हमने कई हिंदू घरेलू सहायिकाओं से बात की और उनसे वहाँ जाने का कारण पूछा।

हैरानी की बात यह है कि इन हिंदू महिलाओं को किसी नेता या पार्टी का फोन नहीं आया। न तो TMC ने उन्हें धमकाया और न ही BJP ने उन्हें बुलाया। जब हमने उनसे पूछा कि फिर वे क्यों जा रही हैं, तो उनका जवाब चौंकाने वाला था। उन्होंने कहा, “यह बंगाल को बचाने का हमारा आखिरी मौका है।”

महिलाओं के एक समूह ने कहा कि वे देख रही हैं कि कैसे हजारों मुस्लिम वोट डालने जा रहे हैं। उन्हें डर है कि अगर फिर से वही सरकार (TMC) आई, तो वे कभी अपने घर नहीं लौट पाएँगी। एक महिला ने पूछा, “क्या आप नहीं जानते संदेशखाली में हमारे साथ क्या हुआ? वे हमारे साथ कैसा सलूक करते हैं?”

इन महिलाओं का मानना है कि कुछ लोग बंगाल को बांग्लादेश बनाना चाहते हैं। उनका कहना है कि इसी मकसद से इतनी भारी भीड़ वोट डालने जा रही है। हिंदू महिलाओं के लिए यह चुनाव सिर्फ वोट देना नहीं, बल्कि अपनी जमीन और पहचान बचाने की एक कोशिश बन गया है। इसलिए वे अपना काम छोड़कर बंगाल रवाना हो रही हैं।

TMC की बढ़ती बेचैनी और डर

गुड़गाँव से भागती इन महिलाओं की आपबीती TMC की घबराहट बयाँ कर रही है। यह बेचैनी सबसे पहले चुनाव आयोग की ‘SIR’ प्रक्रिया के विरोध में दिखी। जब सुप्रीम कोर्ट ने TMC की कोशिशों को खारिज कर दिया, तो बंगाल में हालात बिगड़ गए। आरोप है कि इसके बाद न्यायिक अधिकारियों पर हमले किए गए और उन्हें घंटों बंधक बनाया गया।

मालदा में हुई हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट ने खुद संज्ञान लिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपिन पंचोली की बेंच ने इस पर सुनवाई की। कोर्ट ने बंगाल सरकार और मालदा प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने साफ कहा कि यह कोई मामूली घटना नहीं थी।

अदालत ने माना कि यह न्यायिक अधिकारियों को डराने की एक ‘सोची-समझी’ साजिश थी। इसका मकसद छूटे हुए केसों की जाँच को रोकना था। कोर्ट ने इसे अपनी अथॉरिटी को दी गई सीधी चुनौती बताया। जजों ने कहा कि यह हमला न्याय प्रक्रिया को बाधित करने के लिए किया गया एक जानबूझकर किया गया कृत्य है।

सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि न्यायिक अधिकारी कोर्ट का ही हिस्सा होते हैं। उन्हें निशाना बनाना कोर्ट को धमकाने जैसा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इसे सामान्य घटना नहीं माना जा सकता। यह पूरी तरह से वेल-प्लान्ड हमला था ताकि अफसरों का मनोबल तोड़ा जा सके।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने बहुत सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि जजों के मन में डर पैदा करने की कोशिश बर्दाश्त नहीं होगी। कानून-व्यवस्था बिगाड़कर काम रोकना गलत है। मालदा में न्यायिक अधिकारियों का घेराव करना ‘आपराधिक अवमानना’ माना गया है।

कोर्ट ने साफ कर दिया कि किसी को भी कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जाएगी। जजों को मानसिक रूप से डराना एक गंभीर अपराध है। अदालत के मुताबिक, ऐसा व्यवहार कोर्ट की गरिमा के खिलाफ है। यह सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन है।

अदालत ने मालदा की घटना को प्रशासन की विफलता बताया। कोर्ट ने कहा कि वहाँ की पुलिस और सिविल प्रशासन कानून संभालने में फेल रहा। जिले के हालात बहुत खराब नजर आए। जजों की सुरक्षा करने में प्रशासन पूरी तरह नाकाम रहा।

अदालत को जो जानकारी मिली, वह काफी चौंकाने वाली थी। बताया गया कि बंधक बनाए गए जजों को खाना और पानी तक नहीं दिया गया। सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि जब अफसरों को घेरा गया, तब न तो डीएम (DM) और न ही एसपी (SP) मौके पर पहुँचे। कोर्ट ने इस लापरवाही पर गहरा दुख जताया।

सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल के बड़े अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने मुख्य सचिव, गृह सचिव और डीजीपी (DGP) की नाकामी को उजागर किया। जजों को बंधक बनाए जाने की जानकारी होने के बावजूद उन्हें सुरक्षित निकालने के ठोस कदम नहीं उठाए गए। कोर्ट ने इस सुस्ती को बेहद शर्मनाक बताया है।

अदालत ने पूछा कि दोपहर 3:30 बजे जानकारी मिलने के बाद भी कोई एक्शन क्यों नहीं हुआ? प्रशासन को इस देरी के लिए कोर्ट को सफाई देनी होगी। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार की जिम्मेदारी थी कि वे तुरंत चुनाव आयोग को बताएँ। अगर जरूरत थी, तो जजों की सुरक्षा के लिए केंद्रीय बलों की मदद लेनी चाहिए थी।

सुनवाई के दौरान सीजेआई (CJI) सूर्यकांत ने मौखिक रूप से बड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल ‘सबसे ज्यादा ध्रुवीकृत राज्य’ बन गया है। वहाँ हर कोई सिर्फ राजनीति की भाषा बोल रहा है। कोर्ट इस बात से दुखी था कि निष्पक्ष अफसरों को भी नहीं बख्शा गया, जबकि उनका स्वागत होना चाहिए था।

हिंसा के अलावा खुद ममता बनर्जी के बयान भी उनकी घबराहट बयाँ कर रहे हैं। जानकारों का कहना है कि ममता वैसी ही छटपटाहट महसूस कर रही हैं, जैसी 2011 में वामपंथियों ने की थी। हाल ही में ममता ने एक बयान दिया, “अगर TMC रहेगी, तभी हम फिर मिलेंगे।” उनके इस बयान को उनकी सियासी असुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है।

क्या TMC सत्ता में बनी रहेगी? इसका जवाब तो सिर्फ आने वाला वक्त ही देगा। फिलहाल, दो बातें बिल्कुल साफ नजर आ रही हैं। पहली यह कि TMC इस समय जबरदस्त बेचैनी और दबाव में है।

दूसरी बड़ी बात यह है कि 2026 का पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव अब महज एक चुनाव नहीं रह गया है। यह बंगाल की आत्मा और उसकी पहचान बचाने की एक बड़ी लड़ाई बन चुका है। अब देखना होगा कि ऊँट किस करवट बैठता है।

(ये रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

दशकों तक असम में असमिया और बंगाली की रही लड़ाई, फिर हिमंता बिस्वा सरमा ने एकजुट किए हिंदू: पढ़ें- एक बंगाली हिंदू का नजरिया

31 अगस्त 2025 का दिन था। असम के सिलचर शहर के रंगीरखारी इलाके में हिमंता बिस्वा सरमा की एक झलक पाने के लिए लाखों बंगाली लोग जुटे थे। हर तरफ लोग ही लोग थे, चेहरे पर उत्साह और आंखों में इंतजार। एक असमिया भाषी मुख्यमंत्री के लिए बंगाली समाज का इतना बड़ा और गर्मजोशी भरा स्वागत, राज्य में पहले कभी नहीं देखा गया था।

यह कोई सामान्य राजनीतिक रोड शो नहीं था बल्कि रिश्तों के लिहाज से एक अहम पल था। उस दिन असमिया हिंदुओं और बंगाली हिंदुओं के बीच सालों से चली आ रही दूरी कम होती दिखी। ऐसा लगा कि दोनों समुदायों के रिश्तों में एक नया बदलाव शुरू हो रहा है।

हिमंता बिस्वा सरमा उस समय सच में ‘मामा’ बनकर उभरे थे। वो भी सिर्फ ब्रह्मपुत्र घाटी के असमिया बहुल इलाकों के युवाओं के लिए ही नहीं बल्कि बराक घाटी के बंगाली बहुल समाज के लिए भी। दोनों इलाकों में उन्हें एक अपने जैसा अपनापन मिल रहा था। कुछ दशक पहले तक ऐसा दृश्य सोचना भी मुश्किल था। उस समय की राजनीति में ऐसी एकजुटता ना तो संभव लगती थी और ना ही किसी ने इसकी कल्पना की थी।

इतिहास पर एक नजर

पिछली एक सदी में तीन बड़ी घटनाओं ने बंगालियों और असमियों के रिश्तों को गहराई से प्रभावित किया- 1905 में बंगाल का बँटवारा, 1947 में भारत का विभाजन और 1971 में बांग्लादेश मुक्ति युद्ध।

हालाँकि, खाने-पीने, भाषा (लिखने की लिपि) और संस्कृति में बंगाली और असमिया लोगों के बीच काफी समानताएँ हैं लेकिन बड़ी संख्या में लोगों का आना और आबादी का बदलना दोनों समुदायों के बीच झगड़े की वजह बन गया।

1947 और 1971 की घटनाओं के दौरान बड़ी संख्या में बंगाली हिंदू शरणार्थी असम आए। ये लोग मुस्लिम अलगाववादियों के धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए पहले ईस्ट पाकिस्तान से और बाद में बांग्लादेश से यहाँ पहुँचे थे।

बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के बाद भी बंगाली हिंदू शरणार्थियों का असम आना जारी रहा। इससे जमीन, संसाधनों के बँटवारे और राजनीति में हिस्सेदारी को लेकर स्थानीय असमिया समुदाय के साथ तनाव बढ़ गया। 1950 के दशक से लेकर 1980 के दशक के बीच यह जातीय टकराव काफी ज्यादा बढ़ गया जिसकी वजह से बड़े पैमाने पर हिंसा और भाषा को लेकर दंगे हुए।

स्थिति को और खराब करने का काम कुछ स्वार्थी राजनीतिक दलों ने किया, जिन्होंने साम्प्रदायिक तनाव को बढ़ावा दिया और हिंदू वोटों को असमिया और बंगाली जैसे अलग-अलग समूहों में बाँटने की कोशिश की।

हिमंता ने खत्म की असमिया और बंगाली हिंदुओं को बाँटने की राजनीति

दिलचस्प बात यह रही कि कुछ स्वार्थी समूहों ने ईस्ट पाकिस्तान/बांग्लादेश से आए बंगाली मुसलमानों को खुश करने की राजनीति की जो आर्थिक मौके की तलाश में अवैध रूप से असम में घुस आए थे और इससे डेमोग्राफी बदलने का संकट और बढ़ गया।

इसे एक चालाक चुनावी रणनीति की तरह इस्तेमाल किया गया। पहले हिंदुओं को असमिया और बंगाली में बाँटकर भाषा और पहचान के मुद्दे पर आपस में लड़ाया गया। फिर ‘मिया’ (बंगाली मुसलमानों द्वारा खुद के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द) वोट बैंक को एक साथ जोड़कर चुनाव जीतने का रास्ता बनाया गया।

इसके चलते बंगाली हिंदुओं और असमिया हिंदुओं के बीच का तनाव समय-समय पर भड़काया जाता रहा… कभी भड़काऊ भाषणों से, कभी बाँटने वाली नीतियों से और कभी नफरत भरी राजनीति से। यह सिलसिला 2016 में असम में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद बदलना शुरू हुआ पहले सर्बानंद सोनोवाल के मुख्यमंत्री बनने पर और फिर हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में यह बदलाव और तेज हुआ।

असम की राजनीति में पहले कभी न देखे गए तरीके से एक साफ और ठोस दृष्टिकोण अपनाया गया। इसमें बंगाली हिंदू शरणार्थियों (जो उत्पीड़न से बचने के लिए भारत आए) और बंगाली मुस्लिम घुसपैठियों (जो आर्थिक अवसरों के लिए असम में घुस आए) के बीच जरूरी फर्क बताया गया। खास तरीके से संदेश देकर लोगों को यह समझाया गया कि इन दोनों समूहों में कितना बड़ा अंतर है और इनका जनसंख्या बदलाव पर क्या असर पड़ा।

आखिर जो व्यक्ति अपनी धार्मिक पहचान बचाने के लिए असम आया हो, उसकी तुलना उस व्यक्ति से कैसे की जा सकती है जिसने पहले एक इस्लामिक देश बनाया और फिर मौके का फायदा उठाने के लिए भारत आ गया? न्याय के नजरिए से ऐसी तुलना बिल्कुल ठीक नहीं है। जिस असमिया हिंदू समाज को कुछ राजनीतिक समूहों ने यह विश्वास दिलाया था कि बंगाली हिंदू उनके दुश्मन हैं वो अब इस सच्चाई को समझ चुका है।

सालों तक लोगों को आपस में लड़ाने के लिए की गई ‘बाँटो और राज करो’ वाली राजनीति को हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में काफी हद तक खत्म कर दिया गया है। अब राज्य और वहाँ के लोग इस बात पर एकमत होते जा रहे हैं कि असली समस्या वो अवैध घुसपैठिए हैं जो 24 मार्च 1971 (असम समझौते की तय तारीख) के बाद असम आए ताकि यहाँ आर्थिक फायदे ले सके और इस खूबसूरत पूर्वोत्तर राज्य की संस्कृति को बदल सके।

बंगालियों को पसंद है ‘मामा’

हिमंता लगातार घुसपैठियों और शरणार्थियों के बीच फर्क को लेकर खुलकर बोलते रहे हैं। अपने धर्म की रक्षा के लिए अपनी पुश्तैनी जमीन-जायदाद और पीढ़ियों की संपत्ति तक खो देने वाले बंगाली हिंदुओं को अब वह पहचान मिल रही है जिसके वे हकदार थे।

असम के मुख्यमंत्री ने बार-बार यह भरोसा दिलाया है कि किसी भी बंगाली हिंदू को विदेशी नहीं कहा जाएगा और न ही उन्हें किसी तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। पिछले साल सितंबर में उन्होंने साफ कहा था, “हिंदू बंगालियों को विदेशी मानने की कोई वजह नहीं है, क्योंकि वे 1971 से पहले ही आ चुके हैं। असम में CAA का कोई खास महत्व नहीं है।”

जब 2019 में असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) का मसौदा जारी हुआ और उसमें करीब 12 लाख बंगाली हिंदू बाहर रह गए, तब हिमंता बिस्वा सरमा ने इस प्रक्रिया को ‘मूल रूप से खामियों से भरा’ बताया और नए सिरे से NRC कराने की माँग की।

हिमंता बिस्वा सरमा ने अपनी हिंदू पहचान को लेकर कभी झिझक नहीं दिखाई और असम में भाषा और जातीय सीमाओं से ऊपर उठकर समुदाय को एकजुट करने के लिए लगातार काम किया। उन्होंने असमिया हिंदुओं और बंगाली हिंदुओं के बीच की दूरियों को कम करने और उन्हें करीब लाने में अहम भूमिका निभाई है।

इसी का असर था कि ‘मामा’ को 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले वेस्ट बंगाल में जोरदार स्वागत मिला। उनके भाषणों को सुनने के लिए हजारों बंगाली मतदाता पहुँचे। बंगाली भाषी राज्य के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि किसी असमिया मुख्यमंत्री को स्थानीय लोगों से इतना बड़ा समर्थन मिला हो।

दिलचस्प बात यह रही कि हिमंता ने स्थानीय लोगों के लिए बंगाली में भाषण भी दिया। कुछ दशक पहले अगर ऐसा हुआ होता तो स्वार्थी समूह इसे लेकर असम की राजनीति में बड़ा बवाल खड़ा कर देते लेकिन इस बार ये कमजोर पड़ चुके लोग कोई असर नहीं डाल सके।

असम के मुख्यमंत्री के लगातार प्रयासों का ही असर है कि असमिया हिंदुओं और बंगाली हिंदुओं के बीच के पुराने मतभेद धीरे-धीरे खत्म होते दिख रहे हैं। अब राज्य एक स्थायी मेल-मिलाप की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

‘अवसरवाद’ को पहचानने का एक निजी अनुभव

मुझे साफ तौर पर याद है कि 2020 की शुरुआत में मेरे अपने ट्विटर अकाउंट पर एक मुस्लिम एक्टिविस्ट से बहस हुई थी, जो खुद को असमिया राष्ट्रवादी बता रहा था। यह बहस असम में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) लागू होने को लेकर थी।

ऑनलाइन बहस के दौरान उस एक्टिविस्ट ने अपने असमिया फॉलोअर्स के बीच शेखी बघारने के लिए यह जताने की कोशिश की कि मैं ‘सीमा के उस पार’ से आया हूँ और लोगों को मुझसे सावधान रहना चाहिए। जबकि सच्चाई यह है कि मेरा परिवार 1947 में पूर्वी पाकिस्तान से स्वतंत्र भारत में आया था।

पहली बार किसी स्थानीय असमिया मुस्लिम राष्ट्रवादी को देखकर मुझे हैरानी हुई। इसलिए मैंने उसके अकाउंट को और ध्यान से देखना शुरू किया। जब मैंने उसकी ट्विटर टाइमलाइन देखी तो पाया कि उसने असम में अवैध रोहिंग्या घुसपैठियों के खिलाफ सरकारी कार्रवाई की आलोचना करते हुए कई लेख पोस्ट किए थे।

इससे एक बात साफ हो गई कि वह एक्टिविस्ट एक तरफ अवैध रोहिंग्या घुसपैठियों को असम में बनाए रखने की वकालत कर रहा था और दूसरी तरफ खुद को ‘असमिया राष्ट्रवादी’ बताकर एक दूसरी पीढ़ी के बंगाली हिंदू प्रवासी पर सवाल उठा रहा था।

क्या यह अजीब नहीं है? भेड़ की खाल में भेड़िया जो अपनी धार्मिक सोच को आगे बढ़ाते हुए जातीय पहचान का इस्तेमाल कर रहा था। लेकिन यह बात आज से 6 साल पुरानी है।

इतिहास ने जैसे करवट ली है, वैसे ही आज ऐसे एक्टिविस्ट्स का प्रोपेगेंडा ज्यादा देर तक टिक नहीं पाता। क्योंकि हिमंता बिस्वा सरमा ने अब इस मामले में कोई भ्रम नहीं छोड़ा है। उन्होंने एक बात साफ कर दी है कि असम में कौन है जो यहाँ का है और कौन नहीं है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

हम ‘लव जिहाद’ कहें तो हो जाते हैं महिला विरोधी, तुम्हारे भाईजान गैर मुस्लिम लड़कियों को नोंच-खसोट लें तो भी न हो चर्चा… आरफा जी बढ़िया है आपकी ‘स्ट्रेटजी’

आरफा खानुम शेरवानी खुद को मुस्लिमों का ‘मुन्जी’ समझती हैं। जहाँ वो हर बार किसी मुस्लिम पहचान वाले अपराधी के मामले को उठाती हैं, और एकतरफा पक्ष लेकर सोशल मीडिया पर मुखर हो जाती हैं। लेकिन आरफा को जमीन पर क्या हो रहा है उससे कोई मतलब नहीं होता, उससे ज्यादा उन्हें अपने तय नैरेटिव को आगे बढ़ाने की जल्दी रहती है। यही वजह है कि विवादित मुद्दों पर बोलते हुए वह फैक्ट्स मिस कर देती हैं और नतीजतन उनके ‘विचार’ लड़खड़ा जाते हैं।

अब उनके इस नए बयान को ही देख लीजिए। आरफा ने ‘लव जिहाद‘ को सीधे-सीधे हिंदू महिलाओं का अपमान बता दिया। मतलब जो भी इस मुद्दे पर सवाल उठा रहा है, वो महिलाओं को नासमझ मान रहा है, यहाँ यही बताने की कोशिश की गई। लेकिन आरफा, बात इतनी सीधी नहीं है जितनी आप बना रही हैं। हर चीज को एक लाइन में समेट देना आसान होता है, लेकिन क्या इससे सच भी उतना ही आसान हो जाता है?

आरफा बार-बार ‘लव जिहाद‘ को महिलाओं की आजादी का मुद्दा बताकर पूरी बहस को वहीं खत्म करना चाहती हैं। लेकिन क्या जो लोग इस पर सवाल उठा रहे हैं, उनके पास कोई वजह नहीं है? आरफा, क्या आप ‘महिला की स्वतंत्रता’ की बात कहकर आगे बढ़ जाएँगी? असली बात ये है कि आप सवालों का जवाब देने के बजाए सवाल उठाने को ही कठघरे में खड़ा कर देती हैं और यही तरीका इस पूरे मुद्दे को और उलझा देता है।

कभी हिंदुओं को दोषी ठहरा देती हैं, कभी हिंदू संगठनों को निशाने पर लेती हैं। तो अब ‘महिला स्वतंत्रता’ के नाम पर ‘लव जिहाद’ जैसे बड़ी साजिश पर ही पर्दा डालने की कोशिश शुरू कर दी। लेकिन आरफा, अगर आप सच में थोड़ा पीछे जाकर देखें, तो आपको पता चलेगा कि यह शब्द अचानक से हवा में नहीं बना था।

इसकी शुरुआत ही केरल से हुई थी और वो भी तब, जब वहाँ के सबसे बड़े चर्च ‘साइरो मालाबार‘ ने खुद सामने आकर यह चिंता जताई थी कि किस तरह ईसाई लड़कियों को टारगेट किया जा रहा है। उस समय चर्च ने खुलकर कहा था कि सुनियोजित तरीके से लड़कियों को फँसाया जा रहा है, उन्हें ब्रेनवॉश किया जा रहा है और फिर इस्लामी कट्टरपंथी नेटवर्क के जरिए उन्हें सीरिया और अफगानिस्तान भेजा जा रहा है।

ये कोई सोशल मीडिया की अफवाह नहीं थी, बल्कि चर्च की अपनी रिपोर्ट्स और बयान थे, जिनमें साफ तौर पर बताया गया कि कैसे बड़ी संख्या में लड़कियाँ इस जाल में फँसी और बाद में उनका कोई अता-पता तक नहीं चला। अब सवाल ये है आरफा, क्या उस वक्त भी ये ‘महिला की स्वतंत्रता’ ही थी या फिर उस समय सच्चाई कुछ और थी, जिसे आप नजरअंदाज कर रही हैं?

और अगर आपको लगता है कि ये सिर्फ भारत तक सीमित कोई ‘कहानी’ है, तो जरा नजर बाहरी देशों पर भी डाल लीजिए। ब्रिटेन के रोदरहैम जैसे मामलों में क्या हुआ, ये पूरी दुनिया जानती है, जहाँ संगठित ग्रूमिंग गैंग्स ने नाबालिग लड़कियों को निशाना बनाया, उन्हें फँसाया और सालों तक उनका शोषण किया गया।

भारत में अजमेर का मामला भी कोई छुपा नहीं है, जहाँ नाबालिग लड़कियों को लव जिहाद के जाल में फँसाकर उनके साथ अपराध किए गए। अब क्या इन सब मामलों को भी आप सिर्फ ‘महिला की स्वतंत्रता’ कहकर टाल देंगी या फिर मानेंगी कि यहाँ कुछ ऐसा हो रहा था जिसे नजरअंदाज करना आपके लिए आसान तो है, लेकिन सही नहीं?

यही नहीं, आरफा, इस पूरे मुद्दे पर सिर्फ आप ही नहीं हैं जो इसे मात्र ‘विचार’ बताकर खारिज कर देती हैं। वामपंथी इकोसिस्टम और इस्लामी कट्टरपंथी भी सालों से यही लाइन दोहरा रहे हैं कि ‘लव जिहाद जैसा कुछ होता ही नहीं है।’

कई मामलों में अदालतों ने भी पहचान छुपाकर धर्मांतरण कराने के मामलो को ‘देश के लिए खतरा’ बताया है, लेकिन उस पर बात करने के बजाए पूरा ध्यान इस बात पर लगा दिया जाता है कि ‘नैरेटिव’ कैसे बचाया जाए। वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथी, दोनों ही इस मुद्दे पर एक ही सुर में बोलते दिखते हैं और यही सबसे बड़ा संकेत है कि यहाँ अपनी तय सोच बचाने की कोशिश हो रही है।

निष्कर्ष सीधा है। जब तकइस्लामी कट्टरपंथी लव जिहाद को नकारते रहेंगे और वामपंथी उसी हवा में बहते रहेंगे, तब तक सच्चाई को दबाने की कोशिश चलती रहेगी। लेकिन जमीन पर जो हो रहा है, उसे हमेशा के लिए छुपाया नहीं जा सकता। TCS नासिक धर्मांतरण कांड यूँ ही सामने नहीं आते, ये उसी सोच का नतीजा है जहाँ इस तरह के अपराधों को अपराध मानने से इनकार कर दिया जाता है और सच बाहर आता है तो बचाव में पूरा तंत्र खड़ा हो जाता है।

आपकी असली समस्या भी यही है, आरफा। आप हर अपराध को एक ही नजरिए से देखती हैं। इसलिए ‘महिलाओं की स्वतंत्रता और अपमान’ की बातें करने से पहले यह समझना जरूरी है कि हकीकत क्या है, क्योंकि रिकॉर्ड में जो दर्ज है, उसे सिर्फ इसलिए झुठलाया नहीं जा सकता क्योंकि वो आपके बनाए नैरेटिव में फिट नहीं बैठता।