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जिस जमीन पर कब्जा कर बनाई दुकानें, अब वहाँ मुस्लिम करते हैं हिंदू लड़कियों से अश्लीलता: पहले भी 9 लोग कर चुके हैं नाबालिग से गैंगरेप, गुजरात के खेड़ा का मामला

गुजरात के खेड़ा जिले के चांदणा गाँव में अवैध कब्जा और हिंदू महिलाओं के साथ अभद्रता किए जाने का मामला सामने आया है। गाँव के बीचों-बीच खाली पड़ी जमीन पर मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों द्वारा कब्जा कर लिया गया है और वहाँ अवैध रूप से दुकानें बना दी गई हैं। हिंदू समाज के लोगों का आरोप है कि इन दुकानों पर मुस्लिम युवकों के समूह इकट्ठा होते हैं और वहाँ से गुजरने वाली हिंदू महिलाओं और युवतियों को देखकर अश्लील इशारे और अभद्र टिप्पणियाँ करते हैं। स्थानीय हिंदुओं ने इस मामले में कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर अवैध कब्जा हटाने की माँग की है।

ग्रामीणों ने माँग की है कि इन अवैध कब्जों को तुरंत हटाया जाए और गाँव में सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। आवेदन पत्र की एक कॉपी ऑपइंडिया के पास भी मौजूद है। आवेदन में कहा गया है कि गाँव के मध्य स्थित खाली जमीन पर मुस्लिम समाज द्वारा पिछले कई वर्षों से अवैध कब्जा कर निर्माण कर दिया गया है। वहीं, व्यापार-व्यवसाय के नाम पर कई दुकानें भी खड़ी कर दी गई हैं।

ग्रामीणों का आरोप है कि इन दुकानों के पास से गुजरने वाले सार्वजनिक रास्ते से सुबह-शाम हिंदू समाज की महिलाएँ और लड़कियाँ आती-जाती हैं। इसी दौरान वहाँ कुछ मुस्लिम युवक इकट्ठा होते हैं और अश्लील भाषा का प्रयोग करते हुए अभद्र टिप्पणियाँ और इशारे करते हैं। दुकानों के पास हिंदू समाज के कई मंदिर और चबूतरा चौक भी स्थित हैं। यहाँ नवरात्रि गरबा, भाठीजी महाराज के गरबा, रामधून और रामदेवजी के भजन जैसे धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

आरोप है कि इन धार्मिक आयोजनों के दौरान भी मुस्लिम युवक देर रात तक दुकानें खुली रखते हैं और वहाँ आने-जाने वाले लोगों पर कटाक्ष करते हुए अभद्र टिप्पणियाँ करते हैं। हिंदू समाज के लोगों ने पहले हुई घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि नवरात्रि के दौरान गरबा खेलने आने वाली महिलाओं, बहनों और लड़कियों के छिपकर वीडियो और फोटो भी बनाए जाते हैं जिसके चलते पहले भी तनाव और विवाद की स्थिति पैदा हो चुकी है।

ग्रामीणों का कहना है कि अब यह जगह एक तरह का ‘हब’ बन चुकी है, जहाँ गाँव में आने-जाने वाली हिंदू महिलाओं और लड़कियों को गलत नजर से देखा जाता है, उन पर अभद्र टिप्पणियाँ की जाती हैं। जब वे आसपास की दुकानों पर सामान लेने जाती हैं तो उनका पीछा करने जैसी घटनाएँ भी आए दिन सामने आ रही हैं।

प्रशासन ने नोटिस लगाकर माँगे दस्तावेज: स्थानीय हिंदू

ऑपइंडिया से बातचीत में स्थानीय हिंदू संगठन के पदाधिकारी धवलसिंह झाला ने बताया कि पिछले 3 वर्षों से आरोपित हिंदू लड़कियों और महिलाओं को परेशान कर रहे थे। उनका कहना था कि गाँव के बीचों-बीच जमीन पर कब्जा कर वहाँ अवैध निर्माण कर दिए गए थे। उन्होंने बताया कि तीन साल पहले नवरात्रि के दौरान भी इस मुद्दे को लेकर तनाव की स्थिति बनी थी। वहीं इस बार नवरात्रि में मुस्लिम युवक बाइक लेकर कार्यक्रम स्थल के बीच से गुजरते थे, तेज आवाज में बाइक चलाते थे और अश्लील हरकतें करते थे।

उन्होंने आगे कहा कि हाल ही में गाँव में एक हिंदू नाबालिग लड़की के साथ कई मुस्लिम युवकों द्वारा सामूहिक दुष्कर्म किए जाने की घटना भी सामने आई थी। इस घटना के बाद गाँव के हिंदू समाज ने पूरे मामले की गहराई से जाँच की और दस्तावेजों की पड़ताल की। जाँच के दौरान आधिकारिक रूप से यह सामने आया कि मुस्लिम समुदाय के लोगों ने गाँव की खाली पड़ी जमीन पर कब्जा कर अवैध निर्माण कर लिए हैं।

उन्होंने आगे जानकारी देते हुए बताया कि फिलहाल प्रशासन ने सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया है। इसके अलावा जिला प्रशासन ने अवैध दुकानों पर नोटिस चस्पा कर संबंधित लोगों को तुरंत दस्तावेज और सबूत पेश करने का आदेश दिया है। कहा गया है कि यदि वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए तो जिला प्रशासन की ओर से कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

नाबालिग हिंदू के साथ हाल ही में हुआ गैंगरेप

गौरतलब है कि हाल ही में इसी गाँव में एक 17 वर्षीय हिंदू नाबालिग के साथ तीन साल तक गैंगरेप और ब्लैकमेलिंग का एक मामला सामने आया। पीड़िता की माँ की शिकायत के आधार पर खेड़ा टाउन पुलिस स्टेशन में 9 मुस्लिम पुरुषों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। पुलिस के अनुसार, मुख्य आरोपित परवेज पठान ने पहले नाबालिग को अपने जाल में फँसाया, उसकी अश्लील तस्वीरें और वीडियो बनाए और फिर उसे धमकाकर बार-बार उसके साथ रेप किया। शिकायत के अनुसार, परवेज ने नाबालिग को अपने अन्य मुस्लिम दोस्तों के हवाले भी कर दिया था और 2023 से 2025 के बीच अलग-अलग लोगों ने उसके साथ रेप किया।

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि आरोपितों ने नाबालिग को बार-बार धमकी दी कि अगर उसने उनकी बात नहीं मानी, तो वे उसकी तस्वीरें और वीडियो वायरल कर देंगे और उसे बदनाम कर देंगे। आखिरकार पीड़िता परेशान हो गई और उसने आत्महत्या करने की बात कही जिसके बाद यह पूरा मामला परिवार के सामने आया। इसके बाद, 17 अप्रैल 2026 को एक शिकायत दर्ज की गई थी।

(यह खबर मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

ट्रंप ने कचरे में फेंके चीनी गिफ्ट, फोन भी तोड़कर किए नष्ट: लैपटॉप तक बीजिंग नहीं ले गए अधिकारी, पढ़ें- जासूसी के डर और ‘डिजिटल लॉकडाउन’ की पूरी कहानी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील दौरे पर चीन की राजधानी बीजिंग पहुँचे थे। यह दौरा 2 दिन का था। इस ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन में ट्रंप के साथ अमेरिका के सबसे बड़े बिजनेस लीडर्स और शीर्ष अधिकारी मौजूद थे। लेकिन कैमरे के सामने दिखने वाली दोस्ती के पर्दे के पीछे एक डिजिटल जंग चल रही थी।

चीन दौरे पर जासूसी और हैकिंग का बहुत बड़ा डर देखने को मिला। इसी डर की वजह से अमेरिकी टीम के लिए एक सख्त ‘डिजिटल लॉकडाउन’ लागू कर दिया था। चीन से वापस लौटते समय अमेरिकी अधिकारियों और पत्रकारों को मिले सभी तोहफे, बैज और पिन विमान पर चढ़ने से पहले ही एयरपोर्ट पर एक कचरे के डिब्बे में फेंकने पड़े।

इसके अलावा, अमेरिकी टीम का कोई भी सदस्य अपना पर्सनल मोबाइल या लैपटॉप चीन लेकर ही नहीं गया था। वहाँ बातचीत के लिए सिर्फ कुछ समय वाले अस्थाई ‘बर्नर फोन’ इस्तेमाल किए गए थे, जिन्हें बाद में पूरी तरह नष्ट करने का आदेश दिया गया। साफ-साफ कहें तो अमेरिका को डर था कि चीन इन गिफ्ट्स और फोन के जरिए उनकी खुफिया बातें सुन सकता है या उनका डेटा चोरी कर सकता है।

एयरपोर्ट पर सीढ़ियों के पास रखा गया डस्टबिन, ‘नो चाइना आइटम’ रूल

विमान पर चढ़ने से पहले सभी अमेरिकी अधिकारियों और पत्रकारों को साफ कह दिया गया था कि वे चीन से मिला कोई भी सामान प्लेन के अंदर नहीं ले जा सकते। सुरक्षा नियमों के कारण पूरी टीम को चीन की तरफ से मिले तोहफे, पास और कोट पर लगाने वाले सरकारी पिन वहीं रखे एक डिब्बे में फेंकने पड़े।

चीन में कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, एप्पल के मालिक टिम कुक और एनवीडिया के प्रमुख जेन्सेन हुआंग जैसे बड़े दिग्गज ये पिन लगाए हुए दिखे थे, लेकिन जासूसी के डर से बाद में इन सभी चीजों को कूड़ेदान में डाल दिया गया।

पर्सनल फोन-लैपटॉप घर छोड़े, सिर्फ ‘बर्नर फोन’ का हुआ इस्तेमाल

साइबर एक्सपर्ट्स का कहना है कि चीन में मोबाइल और लैपटॉप से डेटा चोरी करना या उनमें वायरस डालना बहुत आसान है। वहाँ फोन बंद होने पर भी हैक किया जा सकता है। इसी बड़ी खतरे से बचने के लिए अमेरिकी टीम अपने असली फोन और लैपटॉप घर पर ही छोड़ गई थी।

चीन में काम चलाने के लिए उन्होंने सिर्फ कुछ दिनों के लिए अस्थाई ‘बर्नर फोन’ का इस्तेमाल किया था। बाद में इन फोन्स को भी पूरी तरह नष्ट करने का आदेश दिया गया ताकि चीन भविष्य में भी उनकी बातें न सुन सके और जासूसी का कोई खतरा न रहे।

चीन में हर चीज पर नजर, होटल के Wi-Fi और चार्जर से भी दूरी

अमेरिका के सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन एक ‘मास सर्विलांस स्टेट’ है यानी वहाँ हर एक गतिविधि पर सरकार की नजर रहती है। सुरक्षा अधिकारियों ने डेलिगेशन को साफ चेतावनी दी थी कि चीन में कोई भी इलेक्ट्रॉनिक बातचीत सुरक्षित नहीं है। अधिकारियों को होटल के वाई-फाई नेटवर्क से कनेक्ट करने या किसी भी सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन का इस्तेमाल करने से मना किया गया था।

ऐसा ‘जूस जैकिंग’ के खतरे को देखते हुए किया गया, जिसमें चार्जिंग पोर्ट के जरिए फोन का डेटा चोरी कर लिया जाता है। अमेरिकी दल केवल अमेरिका से साथ लाए गए सरकारी प्रमाणित चार्जर और पावर बैंक का ही इस्तेमाल कर रहा था। इस डिजिटल लॉकडाउन के कारण अधिकारियों के रोजमर्रा के काम भी प्रभावित हुए क्योंकि वे क्लाउड स्टोरेज या अपने निजी अकाउंट्स का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे। कई बेहद संवेदनशील संदेशों को डिजिटल रूप से भेजने के बजाय अधिकारियों ने आपस में आमने-सामने (इन-पर्सन) बात करके साझा किया।

बंद दरवाजों के पीछे तीखी बहस और सुरक्षा पर टकराव

बाहर से देखने पर भले ही ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकात बहुत अच्छी लग रही थी, लेकिन दोनों देशों के सुरक्षा अधिकारियों के बीच अंदर ही अंदर भारी तनाव चल रहा था। जब वे बीजिंग के मशहूर ‘टेंपल ऑफ हीवन’ देखने गए, तो चीनी अधिकारियों ने अमेरिका के एक सुरक्षा एजेंट को अंदर जाने से रोक दिया क्योंकि उसके पास नियम के मुताबिक हथियार था।

इस बात पर दोनों पक्षों में करीब डेढ़ घंटे तक तीखी बहस हुई, जिससे वहाँ मौजूद मीडिया का काम भी देर से शुरू हुआ। यही नहीं, जब ट्रंप वापस लौटने लगे तब भी चीनी सुरक्षाकर्मियों ने अमेरिकी पत्रकारों की गाड़ियों को राष्ट्रपति के काफिले में शामिल होने से रोक दिया था, जिसके बाद अमेरिकी अफसरों को बीच-बचाव करके रास्ता साफ कराना पड़ा।

‘हम भी उन पर जमकर जासूसी करते हैं’- ट्रंप का बयान

चीन से वापसी के दौरान जब एयर फोर्स वन विमान हवा में था, तब पत्रकारों ने डोनाल्ड ट्रंप से पूछा कि क्या उन्होंने शी जिनपिंग के सामने साइबर हमलों का मुद्दा उठाया था? इस पर ट्रंप ने स्वीकार किया कि दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ जासूसी अभियानों में लगे हुए हैं। ट्रंप ने संवाददाताओं से कहा, “शी जिनपिंग ने उन साइबर हमलों के बारे में बात की जो हमने चीन में किए थे। जो वे करते हैं, वही हम भी करते हैं। हम भी उन पर जमकर जासूसी करते हैं।”

ट्रंप ने आगे दावा किया कि उन्होंने शी जिनपिंग से आमने-सामने कहा, “हम आपके खिलाफ ऐसी बहुत सी चीजें करते हैं जिनके बारे में आपको भनक तक नहीं है।” हालाँकि, अमेरिकी खुफिया एजेंसियाँ चीन के ‘वोल्ट टाइफून’ और ‘साल्ट टाइफून’ जैसे हैकिंग समूहों पर अमेरिकी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाने का आरोप लगाती रही हैं, जबकि चीन ने हमेशा इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि वह कानूनन डेटा प्राइवेसी का सम्मान करता है।

पेट्रोल पर मोदी सरकार को कोस रही कॉन्ग्रेस, लेकिन UPA सरकार की नीतियाँ मौजूदा वैश्विक हालात में लाती बर्बादी: जानें तेल बांड से घाटा छिपाना कैसे पड़ता देश पर भारी

पश्चिम एशिया संकट और हॉर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी की वजह से ईंधन की कीमतों पर भारी दबाव पड़ रहा है। ऐसे में मोदी सरकार ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों में सिर्फ ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है। हालाँकि दुनिया के अन्य देशों की तुलना में ये बढ़ोतरी नाममात्र की है, लेकिन इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस पार्टी और उसके नेता लगातार मोदी सरकार को निशाना बना रही है।

कॉन्ग्रेस पार्टी का आरोप है कि पीएम मोदी ने जनता पर कोड़ा बरसा दिया है। कॉन्ग्रेस ने यह भी आरोप लगाया कि यह फैसला जानबूझकर विधानसभा चुनाव खत्म होने तक टाल दिया गया था।

राहुल गाँधी ने कहा, “जनता मोदी सरकार की गलती की कीमत चुकाएगी। तीन रुपए का झटका तो आ गया, बाकी रिकवरी किस्तों में होगी।” इससे पहले 28 अप्रैल को उन्होंने कहा था, “चुनावी राहत खत्म, महंगाई की आग आने वाली है! 29 अप्रैल के बाद सावधान- पेट्रोल, डीजल, सब महँगा हो जाएगा।” उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि जब तेल सस्ता था तब मुनाफा कमाया और अब बोझ जनता पर डाल दिया।

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी इसे ‘मोदी सरकार द्वारा निर्मित संकट’ बताते हुए नेतृत्व की कमी और अक्षमता को जिम्मेदार ठहराया। कॉन्ग्रेस के अन्य नेता भी इसी सुर में सुर मिला रहे हैं।

विपक्षी पार्टी के ऐसे हमले इतिहास को सुविधानुसार भुला देते हैं। इस संदर्भ में यूपीए काल की वित्तीय चालाकी को दोबारा याद करना जरूरी है, जिसने देश पर लाखों करोड़ की टाली गई जिम्मेदारी (Deferred Liability) को थोपकर घाटे को छिपाया गया।

UPA के दौर में तेल बांड से छिपाया जाता था वित्तीय घाटा

विपक्ष के ये हमले इतिहास को बड़ी सफाई से नजरअंदाज कर रहे हैं। इस संदर्भ में यूपीए (UPA) काल की उस “वित्तीय जालसाजी” को याद करना जरूरी है, जिसने देश पर लाखों करोड़ रुपये का बोझ लाद दिया था।

ऑयल बॉन्ड को बनाया था राजकोषीय घाटा छिपाने का हथियार

यूपीए सरकार ने पेट्रोल, डीजल, केरोसिन और एलपीजी पर सब्सिडी देने के लिए तेल कंपनियों को विशेष ‘ऑयल बॉन्ड’ जारी किए थे। बजट से सब्सिडी देने के बजाय, डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को ये बॉन्ड थमा दिए, जो बाद में देश के लिए एक महँगा कर्ज बन गए।

उपभोक्ताओं को राहत देने के बजाय, यूपीए के इन ऑयल बॉन्ड ने अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुँचाया और कर्ज चुकाने का सारा बोझ आने वाली सरकार पर डाल दिया। इसके विपरीत, मोदी सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर फिर से अंधाधुंध सब्सिडी देने से इनकार कर दिया, जो वित्तीय अनुशासन का एक मॉडल है, खासकर तब जब पूरी दुनिया वैश्विक संकट से जूझ रही है।

भविष्य की पीढ़ी पर लादा ₹3 लाख करोड़ का बोझ

साल 2005 से 2010 के बीच, यूपीए सरकार ने तेल कंपनियों को लगभग ₹1.48 लाख करोड़ के ऑयल बॉन्ड जारी किए। ये साधारण कर्ज नहीं थे। बजट से नकद सब्सिडी देने के बजाय, सरकार ने लंबी अवधि की प्रतिभूतियां (Sovereign Securities) जारी कीं।

इन बॉन्डों की अवधि 15 से 20 वर्ष थी और ब्याज दर 7 से 8.4 प्रतिशत तक थी। कागजों पर तो राजकोषीय घाटा कम दिखा, क्योंकि सब्सिडी बजट का हिस्सा नहीं थी, लेकिन हकीकत में यह भविष्य के करदाताओं के साथ धोखा था।

यूपीए सरकार के इस रवैये ने अर्थव्यवस्था को कई मोर्चों पर चोट पहुँचाई, जिसमें-

  • वित्तीय भ्रम: यूपीए ने घाटे को छिपाकर लक्ष्यों को पूरा करने का दिखावा किया, जबकि कच्चा तेल 147 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गया था। केवल ब्याज भुगतान ने ही दो दशकों में ₹1.70 लाख करोड़ जोड़ दिए, जिससे कुल भुगतान (मूलधन + ब्याज) ₹3 लाख करोड़ से ऊपर निकल गया।
  • विकास कार्यों में कटौती: सरकार को हर साल सिर्फ ब्याज चुकाने के लिए ₹10,000 करोड़ अलग रखने पड़े। यह पैसा बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य या शिक्षा पर खर्च हो सकता था।
  • तेल कंपनियों की बदहाली: तेल कंपनियों के पास नकदी के बजाय ऐसे बॉन्ड रह गए जिन्हें वे भुना नहीं सकती थीं। इससे रिफाइनिंग क्षमता और विस्तार में उनकी निवेश क्षमता घट गई।

सब्सिडी के बावजूद आसमान छूती थीं कीमतें

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन बॉन्डों से आम जनता को कोई खास राहत नहीं मिली। यूपीए के 10 सालों में कीमतें लगातार बढ़ती रहीं। 2004 में दिल्ली में पेट्रोल ₹34 प्रति लीटर था, जो 2014 तक ₹72 पार कर गया (118% की वृद्धि)। डीजल ₹22 से बढ़कर ₹55 हो गया (155% से अधिक की वृद्धि)। 2012 में तो एक ही झटके में पेट्रोल के दाम 8 रुपए बढ़ा दिए गए थे।

मोदी सरकार ने चुकाया यूपीए का ‘क्रेडिट कार्ड’ बिल

यूपीए द्वारा जारी किए गए ज्यादातर ऑयल बॉन्ड 2014 के बाद परिपक्व (Mature) हुए। असली भुगतान का भारी बोझ (सालाना हजारों करोड़ रुपये) मोदी सरकार के कंधों पर आया। इस साल मार्च तक, मोदी सरकार ने इन बॉन्डों की आखिरी किश्तें चुकाकर लगभग ₹3.20 लाख करोड़ का कुल दायित्व खत्म कर दिया है।

जहाँ यूपीए ने ₹1.48 लाख करोड़ के बॉन्ड जारी किए और मूलधन के रूप में केवल ₹13,764 करोड़ चुकाए, वहीं डॉ. मनमोहन सिंह सरकार ने 2014 तक ब्याज के तौर पर ₹68,750 करोड़ का भारी भुगतान किया।

कुल मिलाकर, ₹1.48 लाख करोड़ के बॉन्ड के लिए सरकारी खजाने से ₹1.71 लाख करोड़ का केवल ब्याज चुकाया गया है। 2014 से 2026 के बीच मोदी सरकार ने कुल ₹2.36 लाख करोड़ (मूलधन + ब्याज) का भुगतान किया है।

यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं थी। जब वैश्विक तेल कीमतें कम थीं, तब भी सरकार ने एक्साइज ड्यूटी कम नहीं की और उस राजस्व का उपयोग यूपीए के इन पुराने घावों (ऑयल बॉन्ड) को भरने के लिए किया।

मौजूदा समय की चुनौतियाँ और जमीनी वैश्विक हकीकत

दिल्ली में पेट्रोल ₹97.77 और डीजल ₹90.67 प्रति लीटर है। ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर पार कर 126 डॉलर तक पहुँच चुका है। पश्चिम एशिया के तनाव ने दुनिया के समुद्री तेल व्यापार के एक चौथाई हिस्से को बाधित कर दिया है। यूरोप से लेकर चीन और जापान तक, हर देश इसकी मार झेल रहा है। भारत, जो अपनी जरूरत का 85% कच्चा तेल आयात करता है, इस वैश्विक हकीकत से अछूता नहीं रह सकता।

मोदी सरकार का फैसला कि वह फिर से सब्सिडी के जाल में नहीं फंसेगी, आर्थिक रूप से सही कदम है। 2014 और 2016 में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को बाजार से जोड़ने के कारण अब स्वचालित समायोजन (Automatic Adjustment) होता है, जिससे तेल कंपनियों को घाटा नहीं होता।

कॉन्ग्रेस की रणनीति न दोहराने से देश को फायदा है। यूपीए का अनुभव बताता है कि वित्तीय देनदारियों को टालना कोई राहत नहीं है, बल्कि यह ब्याज के साथ आने वाला ‘विलंबित दर्द’ है। कॉन्ग्रेस अपनी याददाश्त खोकर राजनीतिक लाभ खोज सकती है, लेकिन रिकॉर्ड साफ है कि यूपीए ने जो बिल उधार छोड़ा था, उसे मोदी सरकार ने चुकाया। देश को आज के संकट का सामना आज ही करना होगा, इसे भविष्य के लिए टाला नहीं जा सकता।

(ये रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

NEET 2026 पेपर लीक में बड़ा खुलासा, परिवारों ने लाखों रुपए देकर खरीदे क्वेश्चन पेपर: 700 छात्रों तक पहुँचा नेटवर्क, पढ़ें- CBI जाँच तक हुए कौन से खुलासे

देश की सबसे मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET-UG 2026 का पेपर लीक मामला अब सिर्फ एक परीक्षा घोटाला नहीं, बल्कि एक बड़े संगठित नेटवर्क का चेहरा बनकर सामने आया है।

राजस्थान, हरियाणा, महाराष्ट्र, केरल और उत्तराखंड तक फैले इस रैकेट ने लाखों छात्रों के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जाँच एजेंसियों के मुताबिक पेपर परीक्षा से पहले व्हाट्सएप, टेलीग्राम और प्रिंट कॉपी के जरिए छात्रों तक पहुँचाया गया। आरोप है कि लाखों रुपए लेकर प्रश्नपत्र बेचे गए और कई छात्रों ने पैसे देकर परीक्षा में फायदा उठाने की कोशिश की।

सबसे ज्यादा चर्चा राजस्थान के बिवाल परिवार को लेकर हो रही है, जहाँ एक ही परिवार के कई सदस्यों के मेडिकल कॉलेज में चयन के बाद अब जाँच एजेंसियाँ पुराने रिजल्ट तक खंगाल रही हैं।

इस पूरे मामले में कई गिरफ्तारियाँ हो चुकी हैं, जिसमें RJD के नेशनल सेक्रेटरी संतोष कुमार जायसवाल को गिरफ्तार किया गया है, जिसे जाँच एजेंसियाँ पूरे नेटवर्क का मास्टरमाइंड मान रही हैं। CBI अब यह पता लगाने में जुटी है कि आखिर पेपर सबसे पहले लीक कहाँ से हुआ और इसमें कौन-कौन शामिल था।

30 लाख में हुआ सौदा, परिवार से शुरू हुआ पूरा खेल

जाँच में सामने आया है कि जयपुर के जमवारामगढ़ निवासी दो भाइयों मांगीलाल बिवाल और दिनेश बिवाल ने गुरुग्राम के एक डॉक्टर से करीब 30 लाख में NEET-UG 2026 का पेपर खरीदा था।

आरोप है कि यह पेपर सबसे पहले परिवार के बच्चों को दिया गया और फिर आगे बेचकर करोड़ों का खेल शुरू हुआ। CBI और राजस्थान SOG की जाँच के मुताबिक दिनेश बिवाल ने अपने बेटे ऋषि बिवाल और रिश्तेदारों के लिए पेपर मंगवाया था।

इसके बाद यह पेपर सीकर के कोचिंग नेटवर्क और छात्रों तक पहुँचाया गया। जाँच एजेंसियों का दावा है कि पेपर व्हाट्सएप, PDF, टेलीग्राम चैट और प्रिंट कॉपी के जरिए बड़े स्तर पर फैलाया गया।

सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ जब जाँच में पता चला कि यह पेपर करीब 700 छात्रों तक पहुँच चुका था। देहरादून से गिरफ्तार आरोपित राकेश मंडवारिया पर आरोप है कि उसने इस पेपर को बड़े पैमाने पर छात्रों में बाँटा।

ऋषि बिवाल की मार्कशीट ने खड़े किए बड़े सवाल

इस मामले में सबसे ज्यादा चर्चा ऋषि बिवाल की मार्कशीट को लेकर हो रही है। जाँच एजेंसियों के हाथ लगी राजस्थान बोर्ड की मार्कशीट के अनुसार ऋषि मुश्किल से 12वीं पास कर पाया था।

मार्कशीट के मुताबिक उसे फिजिक्स थ्योरी में सिर्फ 9 नंबर, केमिस्ट्री में 15 नंबर और बायोलॉजी में 20 नंबर मिले थे। कुल 500 में 254 नंबर लेकर वह ‘ग्रेस मार्क्स द्वारा सेकंड डिवीजन’ से पास हुआ था। जाँच में यह भी सामने आया कि पेपर मिलने के बावजूद ऋषि NEET में सिर्फ 107 नंबर ही ला सका।

क्या 2025 में भी हुआ था यही खेल?

CBI अब सिर्फ 2026 ही नहीं, बल्कि 2025 के NEET रिजल्ट की भी जाँच कर रही है। आरोप है कि बिवाल परिवार ने पिछले साल भी पेपर खरीदकर अपने पाँच बच्चों का मेडिकल कॉलेज में चयन करवाया था।

जाँच के दायरे में विकास बिवाल, प्रगति बिवाल, सानिया बिवाल, पलक बिवाल और गुंजन बिवाल के नाम शामिल हैं। बताया जा रहा है कि इन सभी ने सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन लिया है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इन छात्रों की तस्वीरें सीकर के ‘दीप कैरियर इंस्टीट्यूट’ के बड़े पोस्टरों में लगाई गई थीं, जिन पर लिखा था सिलेक्शन नहीं तो पैसे वापस। हालाँकि रिजल्ट आने के कुछ समय बाद ही यह कोचिंग संस्थान अचानक बंद हो गया।

सीकर की चर्चित CLC कोचिंग का नाम भी जाँच में सामने आया। लेकिन संस्थान के मैनेजिंग डायरेक्टर श्रवण चौधरी ने दावा किया कि बिवाल परिवार का कोई सदस्य रेगुलर क्लासरूम कोर्स में नहीं पढ़ता था।

उनका कहना है कि सभी छात्रों ने सिर्फ टेस्ट सीरीज जॉइन की थी। उन्होंने साफ कहा कि अगर किसी छात्र के अभिभावक बाहर से पेपर खरीदकर लाते हैं, तो उसमें कोचिंग संस्थान की भूमिका नहीं हो सकती। फिर भी जाँच एजेंसियाँ सीकर के कई कोचिंग संस्थानों और उनके नेटवर्क की जाँच कर रही हैं।

कैसे फैला पेपर? नासिक से गुरुग्राम और फिर पूरे देश तक

जाँच एजेंसियों के मुताबिक पेपर का असली सोर्स महाराष्ट्र के नासिक की एक प्रिंटिंग प्रेस हो सकता है। वहाँ से यह गुरुग्राम के एक डॉक्टर तक पहुँचा और फिर राजस्थान के नेटवर्क में शामिल लोगों के जरिए फैलाया गया। इसके बाद पेपर सीकर, जयपुर, देहरादून, केरल, बिहार, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड तक पहुँचा।

जाँच में सामने आया कि परीक्षा से पहले गेस पेपर के नाम पर 140 से ज्यादा सवाल छात्रों तक पहुँचाए गए थे, जिनमें से बड़ी संख्या असली पेपर से मैच कर गई। बताया जा रहा है कि परीक्षा से दो दिन पहले यह पेपर 5-5 लाख रुपए में बेचा गया, जबकि परीक्षा से एक रात पहले इसे 50-50 हजार रुपए तक में बाँटा गया ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों से पैसा कमाया जा सके।

व्हाट्सएप और टेलीग्राम बना पेपर लीक का सबसे बड़ा जरिया

CBI के मुताबिक पेपर सबसे पहले PDF फॉर्म में व्हाट्सएप और टेलीग्राम के जरिए भेजा गया। बाद में इसके प्रिंट निकालकर ऑफलाइन भी बेचे गए। जाँच एजेंसियों को आरोपितों के मोबाइल फोन से कई चैट, PDF और डिजिटल सबूत मिले हैं।

डिलीट किए गए डेटा की भी फोरेंसिक जाँच की जा रही है। CBI अब पैसों के लेन-देन, बैंक अकाउंट, मोबाइल डेटा और सोशल मीडिया चैट खंगाल रही है।

आत्महत्या के मामलों ने बढ़ाई चिंता

NEET परीक्षा रद्द होने के बाद छात्रों पर मानसिक दबाव भी साफ दिखाई दे रहा है। गोवा और उत्तर प्रदेश से दो छात्रों की आत्महत्या की खबरों ने पूरे देश को झकझोर दिया।

गोवा के कर्टोरिम में 17 साल के छात्र ने आत्महत्या कर ली। बताया गया कि वह परीक्षा रद्द होने के बाद बेहद तनाव में था। उसने एक नोट भी छोड़ा जिसमें लिखा था कि वह अब प्रतियोगी परीक्षाएँ नहीं देना चाहता।

वहीं उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में 20 साल के छात्र ने भी आत्महत्या कर ली। परिवार का कहना है कि परीक्षा रद्द होने के बाद वह लगातार मानसिक तनाव में था। यह उसका तीसरा प्रयास था और उसे इस बार चयन की उम्मीद थी।

अब सरकार क्या करने जा रही है?

केंद्र सरकार ने इस पूरे मामले को गंभीर बताते हुए सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने घोषणा की है कि NEET-UG 2026 की री एग्जाम 21 जून 2026 को कराई जाएगी।

उन्होंने कहा कि छात्रों को एडमिट कार्ड 14 जून 2026 तक जारी कर दिए जाएँगे। इस बार छात्रों को अपनी सुविधा के अनुसार परीक्षा शहर चुनने का मौका भी दिया जाएगा। सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि अगले साल से NEET परीक्षा पूरी तरह कंप्यूटर आधारित यानी CBT मोड में कराई जाएगी ताकि पेपर लीक जैसी घटनाओं को रोका जा सके।

CBI फिलहाल इस पूरे नेटवर्क की तह तक पहुँचने की कोशिश कर रही है। जाँच एजेंसियाँ यह पता लगा रही हैं कि इस रैकेट का असली मास्टरमाइंड कौन है और इसमें कितने लोग शामिल थे।

जिस मुस्लिम शौहर के चक्कर में छोड़ना पड़ा करियर-धर्म, वो पूजा बेदी को अब भी लगता है सेकुलर: लव जिहाद को बता रही ओवररेटेड, समझें इनकी ब्रेनवॉशिंग

बॉलीवुड और उसकी कई अभिनेत्रियाँ अक्सर जमीन की हकीकत से कटी हुई नजर आती हैं और कई बार उनके बयान ऐसे होते हैं जो आम लोगों को वास्तविकता से बिल्कुल अलग लगते हैं।

ऐसा ही एक उदाहरण अभिनेत्री पूजा बेदी के उस इंटरव्यू में देखने को मिला, जो उन्होंने सुहासिनी मणिरत्नम के साथ जोस अलुक्कास के यूट्यूब चैनल पर दिया। इस इंटरव्यू में पूजा बेदी ने बताया कि उन्होंने एक्टिंग इसलिए छोड़ दी थी क्योंकि उनके रूढ़िवादी मुस्लिम ससुराल वालों को उनका फिल्मी करियर पसंद नहीं था।

लेकिन इसी दौरान उन्होंने यह भी कहा कि जब उन्होंने अपने मुस्लिम शौहर से निकाह की थी तब देश में सच्चा सेक्युलरिज्म और डेमोक्रेसी थी, जो अब दिखाई नहीं देती।

पूजा बेदी ने कहा कि आज जिस तरह लव जिहाद, हिंदू-मुस्लिम जैसी बातें होती हैं, वह उन्हें बेहद दुखद लगती हैं। उनके मुताबिक जब वह बड़ी हो रही थीं तब समाज ज्यादा सेक्युलर और लोकतांत्रिक था।

हालाँकि उनके अपने ही बयान में एक बड़ा विरोधाभास नजर आता है। एक तरफ वह कहती हैं कि उनके मुस्लिम ससुराल वाले इतने रूढ़िवादी थे कि उन्होंने उनके करियर को स्वीकार नहीं किया, दूसरी तरफ वह उसी दौर को सच्चा सेक्युलर बताती हैं।

इंटरव्यू में पूजा बेदी ने यह भी कहा कि अगर वह अपने ससुराल वालों की इच्छा के खिलाफ जाकर फिल्मों में काम जारी रखतीं तो यह उनके साथ गलत होता। उन्होंने खुद को 100 प्रतिशत अच्छी बहू और बेगम बताते हुए कहा कि उनके ससुराल वालों को उनके काम करने से असहजता होती, इसलिए उन्होंने अपना करियर छोड़ना सही समझा।

यहाँ सवाल यह उठता है कि अगर किसी महिला को अपने पति और ससुराल वालों की धार्मिक सोच के कारण अपना करियर छोड़ना पड़े, तो क्या उसे ही सेक्युलरिज्म और डेमोक्रेसी का उदाहरण माना जाए?

इंडियन एक्सप्रेस ने अपने लेख से हटाया लव जिहाद वाला हिस्सा

दिलचस्प बात यह रही कि इंडियन एक्सप्रेस ने पूजा बेदी के इसी इंटरव्यू पर जो लेख प्रकाशित किया, उसमें उनके लव जिहाद वाले बयान का कोई जिक्र नहीं किया गया।

लेख में यह बताया गया कि पूजा बेदी ने निकाह के बाद अपने ससुराल वालों को खुश रखने के लिए अपना करियर छोड़ दिया, यहाँ तक कि उन्होंने फिल्मों के लिए मिली साइनिंग अमाउंट भी वापस कर दी थी। लेकिन उसी इंटरव्यू में उन्होंने जो आज लव जिहाद की बातें होती हैं वाला बयान दिया था, उसे लेख से गायब रखा गया।

इंडियन एक्सप्रेस ने पूजा बेदी के बयान से लव जिहाद का ज़िक्र हटाया

यह पहली बार नहीं है जब तथाकथित सेक्युलर और लिबरल नैरेटिव को बनाए रखने के लिए लव जिहाद जैसे मुद्दों को नजरअंदाज किया गया हो। आलोचकों का मानना है कि प्रभावशाली लोग, मीडिया संस्थान और राजनीतिक वर्ग लंबे समय से ऐसे मामलों को या तो कम करके दिखाते रहे हैं या पूरी तरह नकारते रहे हैं।

यही वजह है कि यह मुद्दा लगातार विवाद और बहस का विषय बना हुआ है। पूजा बेदी जैसी सफल और प्रसिद्ध अभिनेत्री के लिए लव जिहाद जैसी घटनाओं को केवल राजनीतिक प्रचार बताना कई लोगों को वास्तविक घटनाओं की अनदेखी लगता है।

भारत में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ महिलाओं के साथ झूठी पहचान, शादी, धर्म परिवर्तन या शोषण के आरोप लगे। आलोचकों का कहना है कि जब प्रभावशाली लोग इन मामलों को पूरी तरह खारिज कर देते हैं, तो इससे पीड़ितों की आवाज कमजोर पड़ती है।

सिर्फ भारत ही नहीं दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि राजनीतिक और मीडिया वर्ग ने संवेदनशील मामलों को दबाने की कोशिश की। उदाहरण के तौर पर ब्रिटेन में पाकिस्तानी मूल के कुछ गैंग्स पर नाबालिग लड़कियों के शोषण के आरोप वर्षों तक चर्चा से दूर रहे।

इसी तरह केरल में भी चर्च संगठनों ने ईसाई लड़कियों को निशाना बनाकर धर्म परिवर्तन कराने के आरोप उठाए थे, जिन पर लंबे समय तक राजनीतिक बहस चलती रही। भारत में लव जिहाद शब्द तब ज्यादा चर्चा में आया जब केरल से जुड़े कुछ मामलों में लड़कियों के धर्म परिवर्तन और कट्टरपंथी संगठनों से जुड़ने के आरोप सामने आए।

इसके बाद देशभर में ऐसे कई मामले सामने आए जिनमें महिलाओं ने मुस्लिम युवकों पर झूठी पहचान, शादी और धर्म परिवर्तन के आरोप लगाए। हाल के वर्षों में सामने आए कई चर्चित मामलों को भी इसी बहस से जोड़कर देखा गया। TCS नासिक स्कैंडल ऐसे ही अपराधों की लंबी लिस्ट में नया नाम है, जिसका पूजा बेदी मजाक उड़ाने की कोशिश कर रही हैं।

धार की भोजशाला है वाग्देवी का मंदिर, MP HC ने लगाई मुहर: नहीं होगी नमाज, जानिए इतिहास से लेकर ASI सर्वे और अदालती फैसले के बारे में सब कुछ

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला एक बार फिर देश की सबसे बड़ी कानूनी और सांस्कृतिक बहस के केंद्र में आ गई है। अब शुक्रवार (15 मई 2026) को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने इस मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए धार भोजशाला को वाग्देवी का मंदिर माना है। इस फैसले के पीछे ASI की रिपोर्ट काफी अहम साबित हुई, जिसमें मंदिर से जुड़े अहम सबूत सामने आए थे।

रिपोर्ट के मुताबिक, एमपी हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने अपने फैसले में माना है कि MP की भोजशाला वाग्देवी का प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर है। हाई कोर्ट ने 5 याचिकाओं और 3 इंटरवेंशन पर सुनवाई के बाद ये फैसला सुनाया।

बता दें कि हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ने साल 2022 में याचिका दायर कर धार्मिक स्वरूप तय करने और हिंदू समाज को पूरा अधिकार देने की माँग की थी। इसके बाद कोर्ट ने ASI को वैज्ञानिक सर्वे का निर्देश दिया था। ASI ने 98 दिनों तक वैज्ञानिक सर्वे कर अपनी रिपोर्ट हाई कोर्ट को सौंप दी थी। अब हाई कोर्ट ने सभी पक्षों की जिरह को सुनने के बाद फैसला सुनाया है।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में हिंदुओं को पूजा का अधिकार दिया है। हालाँकि हाई कोर्ट ने धार की भोजशाला यानी वाग्देवी के मंदिर के रखरखाव का दायित्व ASI को ही दिया है, जो अब तक ये काम करती आ रही है।

हाई कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष से कहा है कि वो मस्जिद बनाने के लिए दूसरी जगह की माँग कर सकते हैं, लेकिन धार की भोजशाला कमाल मौला मस्जिद (जैसा दावा करते हैं) नहीं बल्कि मूल रूप से वाग्देवी का मंदिर है। अब इस जगह पर नमाज नहीं होगी। अभी तक शुक्रवार को ASI के पुराने आदेश के हिसाब से नमाज पढ़ी जाती थी, लेकिन अब सभी पुराने आदेश रद्द हो गए हैं।

बता दें कि पूरे देश की निगाहें इस फैसले पर टिकी हुई थी, क्योंकि यह विवाद केवल मंदिर और मस्जिद तक सीमित नहीं रहा था, बल्कि यह भारतीय इतिहास, पुरातत्व, आस्था, सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा बन चुका था। हालाँकि अब हाई कोर्ट के फैसले के बाद हिंदुओं को बड़ी राहत मिली है।

गौरतलब है कि भोजशाला माँ सरस्वती का प्राचीन मंदिर और शिक्षा का महान केंद्र था, मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है। इस पूरे विवाद को नई दिशा तब मिली थी, जब भारतीय पुरात्तव विभाग (ASI) ने वैज्ञानिक सर्वेक्षण के बाद अपनी विस्तृत रिपोर्ट हाई कोर्ट में पेश की और दावा किया कि मौजूदा ढाँचे से पहले यहाँ परमारकालीन विशाल मंदिरनुमा संरचना मौजूद थी।

लगभग दो वर्षों तक चले कानूनी संघर्ष, वैज्ञानिक जाँच, ऐतिहासिक बहस और हजारों दस्तावेजों की पड़ताल के बाद अब अदालत के फैसले ने विवाद का पटाक्षेप कर दिया है।

आखिर क्या है भोजशाला और क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

धार की भोजशाला को हिंदू समाज माता सरस्वती के मंदिर और प्राचीन विश्वविद्यालय के रूप में देखता है। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, इसकी स्थापना 11वीं शताब्दी में परमार वंश के महान शासक राजा भोज ने की थी। राजा भोज केवल एक शक्तिशाली शासक ही नहीं, बल्कि शिक्षा, साहित्य, दर्शन, आयुर्वेद, खगोल विज्ञान और संस्कृत के बड़े संरक्षक माने जाते हैं।

उस समय धार उनकी राजधानी थी और भोजशाला ज्ञान तथा शिक्षा का प्रमुख केंद्र हुआ करती थी। यहाँ दूर-दूर से विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने आते थे और संगीत, संस्कृत, योग, दर्शन, व्याकरण, ज्योतिष तथा आयुर्वेद जैसे विषय पढ़ाए जाते थे। हिंदू पक्ष का दावा है कि यह स्थान केवल पूजा का स्थल नहीं था, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का जीवंत प्रतीक था।

भोजशाला परिसर में आज भी ऐसे कई शिलालेख, नक्काशीदार स्तंभ और स्थापत्य अवशेष मौजूद हैं, जिनमें संस्कृत, प्राकृत और प्राचीन नागरी लिपि के चिन्ह दिखाई देते हैं। कई अभिलेखों में ‘ॐ नमः शिवाय’, ‘ॐ सरस्वत्यै नमः’ और परमार राजाओं की प्रशंसा का उल्लेख मिलने का दावा किया गया है।

हिंदू पक्ष यह भी कहता है कि यहाँ स्थापित माँ सरस्वती की मूल प्रतिमा को अंग्रेजों के शासनकाल में लंदन ले जाया गया था और वह आज भी वहाँ संग्रहालय में रखी हुई है। इसी कारण भोजशाला को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर के रूप में भी देखा जाता है।

कैसे शुरू हुआ भोजशाला विवाद और क्यों बढ़ती गई टकराव की स्थिति?

मुस्लिम पक्ष इस परिसर को कमाल मौला मस्जिद बताता है और दावा करता है कि यहाँ लंबे समय से नमाज अदा की जाती रही है। जबकि सच्चाई ये है कि यह मूल रूप से माता सरस्वती का मंदिर था, जिसे मुस्लिम आक्रमणकारियों ने तोड़कर मस्जिदनुमा ढाँचे में बदल दिया। साल 2003 में इस विवाद को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने एक व्यवस्था लागू की।

इसके तहत हिंदुओं को हर मंगलवार पूजा की अनुमति दी गई, जबकि मुस्लिम पक्ष को हर शुक्रवार नमाज पढ़ने की इजाजत मिली। बाकी दिनों में परिसर को स्मारक और पर्यटन स्थल के रूप में रखा गया। हालाँकि यह व्यवस्था अस्थायी समाधान साबित हुई, क्योंकि दोनों पक्ष लगातार अपने पूर्ण अधिकार की माँग करते रहे।

हिंदू संगठनों का कहना था कि यदि ASI संरक्षित परिसर के भीतर मंदिर के प्रमाण मौजूद हैं, तो हिंदुओं को वहाँ नियमित पूजा का अधिकार मिलना चाहिए। वहीं मुस्लिम पक्ष ने इसे मस्जिद और दरगाह के रूप में संरक्षित रखने की माँग जारी रखी।

2022 से शुरू हुई नई कानूनी लड़ाई और हाई कोर्ट की सुनवाई

भोजशाला विवाद का नया और सबसे महत्वपूर्ण कानूनी अध्याय वर्ष 2022 में शुरू हुआ। हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से रंजना अग्निहोत्री, आशीष गोयल और अन्य याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर माँग की कि भोजशाला का वास्तविक धार्मिक स्वरूप तय किया जाए और पूरे परिसर का वैज्ञानिक सर्वे कराया जाए।

याचिका में यह भी कहा गया कि हिंदू समाज को वहाँ पूर्ण पूजा-अर्चना का अधिकार दिया जाए। हिंदू पक्ष की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन, विनय जोशी और अन्य वकीलों ने अदालत में पक्ष रखा। उन्होंने दावा किया कि परिसर में मौजूद स्थापत्य, शिलालेख और मूर्तिकला मंदिर स्वरूप की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं।

सुनवाई के बाद 11 मार्च 2024 को हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने ASI को आदेश दिया कि वह ज्ञानवापी की तर्ज पर भोजशाला परिसर का वैज्ञानिक सर्वे करे। इसके बाद 22 मार्च 2024 से ASI ने विस्तृत सर्वेक्षण शुरू किया, जो करीब 98 दिनों तक चला। इस दौरान खुदाई, कार्बन डेटिंग, स्थापत्य विश्लेषण, शिलालेखों की जाँच और संरचनात्मक अध्ययन किया गया।

15 जुलाई 2024 को ASI ने 2000 से अधिक पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट अदालत में पेश की। बाद में फरवरी 2026 में अतिरिक्त वैज्ञानिक रिपोर्ट भी दाखिल की गई।

6 अप्रैल 2026 से इंदौर हाई कोर्ट की डबल बेंच ने इस मामले में नियमित सुनवाई शुरू की, जो 12 मई 2026 तक चली। इस दौरान हिंदू, मुस्लिम और जैन पक्षों ने हजारों दस्तावेज, ऐतिहासिक रिकॉर्ड, पुरातात्विक साक्ष्य और धार्मिक दावे अदालत के सामने रखे। सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था और अब अपना फैसला हिंदुओं के पक्ष में सुना दिया है।

ASI रिपोर्ट में क्या-क्या बड़े खुलासे हुए?

ASI की रिपोर्ट इस पूरे विवाद का सबसे अहम हिस्सा बनकर सामने आई। ASI ने दावा किया कि मौजूदा ढाँचे से पहले यहाँ परमारकालीन विशाल संरचना मौजूद थी और वर्तमान निर्माण मंदिर के अवशेषों का उपयोग करके किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, परिसर में मिले स्तंभ, नक्काशीदार पत्थर, शिलालेख और स्थापत्य तत्व मंदिर शैली की ओर संकेत करते हैं।

ASI को परिसर से भगवान गणेश, नरसिंह, भैरव, ब्रह्मा और पशु आकृतियों से जुड़ी कुल 94 मूर्तियाँ और मूर्तिकला के हिस्से मिले। रिपोर्ट में कहा गया कि 106 स्तंभों और 82 पिलास्टर्स पर देवी-देवताओं, मनुष्यों और पशु आकृतियों को जानबूझकर छेनी से विकृत किया गया।

ASI ने यह भी कहा कि मौजूदा मस्जिदनुमा ढाँचे में स्थापत्य संतुलन और समरूपता का अभाव दिखाई देता है, जबकि मूल संरचना में उच्च स्तर की वास्तुकला और कलात्मकता मौजूद थी। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि वर्तमान निर्माण कई सदियों बाद जल्दबाजी में तैयार किया गया और उसमें मंदिर के मूल पत्थरों और स्तंभों का उपयोग हुआ।

ASI को परिसर में संस्कृत और प्राकृत भाषा के शिलालेख मिले, जिनमें राजा नरवर्मन, उदयादित्य और परमार वंश का उल्लेख पाया गया। कुछ अभिलेखों में संस्कृत व्याकरण, वर्णमाला और ‘कर्पूरमंजरी’ नाटक के अंश भी मिले। ASI ने भोजशाला के विकास को तीन चरणों में विभाजित किया। पहले में 10वीं शताब्दी से पहले की प्रारंभिक ईंट संरचना का उल्लेख किया।

दूसरे चरण में 11वीं से 13वीं शताब्दी के बीच राजा भोज और परमार काल के भव्य मंदिर तथा शिक्षा केंद्र का वर्णन किया गया। तीसरे चरण में 14वीं शताब्दी के बाद मस्जिद और दरगाह निर्माण की बात कही गई। ASI ने यह भी कहा कि मूल मंदिर संरचना के कई हिस्सों को तोड़कर इस्लामी स्थापत्य तत्व जोड़े गए।

हिंदू पक्ष ने अदालत में किन दावों और सबूतों के आधार पर लड़ाई लड़ी?

हिंदू पक्ष ने कोर्ट में दावा किया कि भोजशाला मूल रूप से माँ सरस्वती का मंदिर और भारत की प्राचीन शिक्षा परंपरा का केंद्र था। अधिवक्ता विष्णू शंकर जैन और अन्य वकीलों ने कहा कि परिसर में मौजूद मूर्तियाँ, देवी-देवताओं की आकृतियाँ, संस्कृत शिलालेख और मंदिर शैली के स्तंभ किसी मस्जिद का हिस्सा नहीं हो सकते।

उन्होंने अदालत में ब्रिटिशकालीन गजेटियर, इतिहासकारों के दस्तावेज और पुरातात्विक रिकॉर्ड भी पेश किए, जिनमें भोजशाला को सरस्वती मंदिर और शिक्षा केंद्र बताया गया था। हिंदू पक्ष ने यह भी कहा कि यहाँ सदियों से वसंत पंचमी पर पूजा-अर्चना होती रही है और यह परंपरा आज भी जारी है।

याचिकाकर्ताओं का दावा था कि मुस्लिम आक्रमणकारियों ने मंदिर को ध्वस्त कर उसके अवशेषों से मस्जिदनुमा ढाँचा तैयार किया। हिंदू संगठनों ने अदालत से माँग की कि हिंदुओं को पूरे परिसर में पूजा का अधिकार दिया जाए और भोजशाला को आधिकारिक रूप से मंदिर घोषित किया जाए।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि ASI की रिपोर्ट मंदिर पक्ष को मजबूत करती है, क्योंकि उसमें मिले शिलालेख, मूर्तिकला, स्तंभ और स्थापत्य प्रमाण स्पष्ट रूप से हिंदू धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप की ओर संकेत करते हैं। अदालत में यह भी कहा गया कि जिस संरचना को मस्जिद बताया जा रहा है, उसमें इस्तेमाल किए गए अधिकांश खंभे और पत्थर मूल मंदिर के थे।

भोजशाला पर इस्लामी आक्रमण, विनाश और सत्ता संघर्ष की पूरी कहानी

भोजशाला पर कई बार इस्लामी आक्रमण हुए। दावा किया जाता है कि 1269 में कमाल मौलाना नाम का एक मुस्लिम फकीर मालवा पहुँचा और बाद में यहाँ इस्लामी प्रभाव बढ़ने लगा। इसके बाद 1305 में अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा पर हमला किया और भोजशाला को भारी नुकसान पहुँचाया।

हिंदू पक्ष का दावा है कि उस समय यहाँ अध्ययन कर रहे 1200 से अधिक छात्रों और शिक्षकों को बंदी बनाया गया और इस्लाम स्वीकार करने से इनकार करने पर उनकी हत्या कर दी गई। इसके बाद 1401 में दिलावर खान ने परिसर के एक हिस्से को दरगाह में बदलने का प्रयास किया।

फिर 1514 में महमूद शाह ने भोजशाला परिसर पर कब्जा मजबूत करने की कोशिश की और कमाल मौला मकबरे का विस्तार किया। हिंदू पक्ष का कहना है कि इन्हीं घटनाओं के आधार पर बाद में इसे मस्जिद और दरगाह बताया जाने लगा। बाद में मेदनी राय ने मुस्लिम शासकों के खिलाफ युद्ध कर क्षेत्र पर दोबारा नियंत्रण स्थापित किया।

1703 में मालवा पर मराठों का अधिकार हो गया और मुस्लिम शासन समाप्त हुआ। इसके बाद अंग्रेजों का शासन आया। हिंदू संगठनों का दावा है कि 1902 में लॉर्ड कर्जन भोजशाला से माता सरस्वती की प्रतिमा इंग्लैंड ले गया। आजादी के बाद 1952 में भोजशाला को ASI के अधीन कर दिया गया।

बाद में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, आर्य समाज और हिंदू महासभा जैसे संगठनों ने भोजशाला आंदोलन को आगे बढ़ाया। 1961 में प्रसिद्ध पुरातत्वविद् विष्णु श्रीधर वाकणकर ने लंदन जाकर दावा किया कि वहाँ रखी वाग्देवी की प्रतिमा वास्तव में भोजशाला की है।

बहरहाल, अब इंदौर हाई कोर्ट के फैसले के बाद इस पूरे विवाद का पटाक्षेप हो गया है। धार की भोजशाला मूल रूप से वाग्देवी का मंदिर है और इसमें हिंदुओं को पूजा का अधिकार है। हाई कोर्ट का ये फैसला हिंदुओं के लिए बड़ी जीत की तरह है।

भारत के खिलाफ ‘हाइब्रिड वॉर’, विकास, संप्रभुता और वैश्विक नैरेटिव का खेल: समझें कैसे ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को बनाया जा रहा नया बैटलग्राउंड

आज के दौर में युद्ध केवल सीमाओं पर टैंकों और मिसाइलों से नहीं लड़े जाते। अब युद्ध लड़े जाते हैं आपके मोबाइल स्क्रीन पर, अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं के कवर पेज पर और मानवाधिकारों की आड़ में चलने वाले एनजीओ (NGOs) के दफ्तरों में। इसे ही ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ या ‘एसिमेट्रिक वॉरफेयर’ कहा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य किसी उभरती हुई शक्ति को अंदरूनी तौर पर इतना उलझा देना है कि वह अपनी पूरी क्षमता से विकास न कर सके।

इसी तरह से जब भी भारत कोई बड़ा प्रोजेक्ट शुरू करता है, चाहे वो कोई न्यूक्लियर प्लांट हो, कोई बड़ा पोर्ट हो या माइनिंग प्रोजेक्ट, अचानक से पूरी दुनिया के ‘मानवाधिकार संगठन’ और ‘पर्यावरण कार्यकर्ता’ जाग क्यों जाते हैं?

आपको लगेगा कि ये लोग तो प्रकृति की रक्षा कर रहे हैं, ये तो सराहनीय काम है। लेकिन क्या ये सिर्फ़ पर्यावरण प्रेम है या फिर इसके पीछे एक बहुत बड़ा जियो-पॉलिटिकल और वैचारिक खेल चल रहा है, जिसका मकसद भारत की उभरती हुई ताकत को कमजोर करना है?

आज हम आपको इसी हाइब्रिड वॉरफेयर के बारे में विस्तार से बताएँगे। यहाँ मिसाइलों या बंदूकों की जगह नैरेटिव, सूचना युद्ध, मिसइनफॉर्मेशन और फेक-न्यूज का इस्तेमाल किया जाता है।

हम बात करेंगे ग्रेट निकोबार इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट (GNI) की, जिसे रोकने के लिए 13 देशों के 39 ‘जनसंहार विशेषज्ञों’ (Genocide Experts) ने 2024 में खुला पत्र लिखकर पूरा जोर लगा दिया।

हम कल्चरल मार्क्सिज्म की उस थ्योरी का भी गहरा विश्लेषण करेंगे, जो शिक्षा, मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म्स के जरिए युवा पीढ़ी के दिमाग में ये बिठा रही है कि विकास का मतलब हमेशा विनाश ही है।

और सबसे महत्वपूर्ण कि हम आपको उन विदेशी एनजीओ और ग्लोबल लॉबीज के बारे में बताएँगे, जो भारत की जीडीपी को सालाना 2-3% की चोट पहुँचा रहे हैं यानी हजारों-लाखों करोड़ रुपए का नुकसान… जो अस्पतालों, स्कूलों, सड़कों और ऊर्जा सुरक्षा पर खर्च हो सकता था।

अमेरिका का ‘Trail of Tears’ vs भारत को लेक्चर

एक देश जिसने अपनी नींव ही मूल निवासियों की ज़मीन छीनकर रखी, आज दुनिया का सबसे बड़ा क्लाइमेट एक्टिविज्म का हब बन गया है। Indian Removal Act 1830 के तहत अमेरिका ने दसियों हज़ार नेटिव अमेरिकंस / रेड इंडियंस को उनकी पैतृक भूमि से जबरन बेदखल कर दिया। Trail of Tears के दौरान अकेले Cherokee और बाक़ी Tribes के करीब 60,000 से 1 लाख लोगों को हटाया गया, जिसमें हजारों की मौत हो गई, भूख, बीमारी और मार्च की भयानक हालत में।  

पूरी तस्वीर तो और भी भयानक है, 15वीं सदी से 19वीं सदी के बीच नेटिव अमेरिकन आबादी में भारी गिरावट आई, युद्धों, बीमारियों और ट्राइब्स की इस किस्म की बेदख़ली से। फिर वही अमेरिका NGO संस्कृति का जनक बना, खुद को सुपरपावर नाम दिया और आज क्लाइमेट चेंज का सबसे बड़ा चैंपियन बनकर दुनिया को लेक्चर देता है।  जो देश कभी ज़मीनें छीन रहे थे, वो आज NGOs के जरिए हमारी ज़मीन के इस्तेमाल पर लेक्चर दे रहे हैं।

इसी अमेरिका ने जो टर्मिनोलॉजी उछाली हैं, उन्हें ही भाड़े के एक्टिविस्ट अलग अलग देशों में अपनी पहचान बनाकर बेच रहे हैं और इन टर्मिनोलॉजी में सबसे लेटेस्ट एडिशन हैं – हीटवेव, क्लाइमेट एक्टिविज्म एंड ट्राइब्स। 

लेकिन सवाल ये है कि ये हिपोक्रेसी कहाँ से शुरू हुई? और क्यों आज भारत में भी यही स्क्रिप्ट दोहराई जा रही है?

अमेरिका और यूरोप से सीखकर भारत में आज ट्राइब्स और क्लाइमेट के नाम पर एक नया एक्टिविज्म तैयार किया जा रहा है। Forest rights, tribal land, climate justice, ये सब एक्टिविज्म के नाम हैं। लेकिन असल खेल civil society और NGOs के जरिए Cultural Marxism की घुसपैठ का है। जहाँ एक तरफ विकास और राष्ट्र-निर्माण को दमन/शोषण बताया जाता है, वहीं विदेशी फंडिंग से चलने वाले नेटवर्क ट्राइबल कम्युनिटीज को मेनस्ट्रीम से अलग रखने और राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ इस्तेमाल करते हैं। डिवाइड एंड रूल का नया वर्जन यही है लेकिन अब सस्टेनेबिलिटी और ‘इनक्लूजन’ के पैकेजिंग में।

ये वही ताकतें हैं जो कल्चर, ट्रेडिशन और sovereignty को तोड़ने में लगी हैं; ठीक वैसे जैसे पश्चिम ने अपनी गलतियों को मॉरल सुपीरियॉरिटी में बदल लिया।

हाइब्रिड वारफेयर और 2014 की सीक्रेट रिपोर्ट

पहले युद्ध सीमाओं पर लड़े जाते थे। लेकिन अब Asymmetric Warfare का दौर है। यहाँ हथियार हैं सोशल मीडिया, NGO और इंटेलेक्चुअल एक्टिविज्म

साल 2014 में IB ने प्रधानमंत्री कार्यालय को एक ऐसी रिपोर्ट सौंपी जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। इस रिपोर्ट में साफ लिखा था कि कुछ विदेशी ताकतें भारत की $5 ट्रिलियन इकोनॉमी बनने की राह में रुकावट डालने के लिए कई टेक्निक अपना रही हैं  – जैसे कि एक तरफ से स्थानीय लोगों की शिकायतों को भड़काना और दूसरी तरफ से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को मानव-विरोधी या पर्यावरण-विरोधी बताकर निवेश को रोकना।

IB ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि इन आंदोलनों की वजह से भारत की ऊर्जा सुरक्षा और माइनिंग सेक्टर को कितनी भारी कीमत चुकानी पड़ी है:

  1. परमाणु ऊर्जा (Kudankulam): ‘PMANE’ और ‘ग्रीनपीस’ जैसे संगठनों ने विरोध किया, जिससे भारत की एनर्जी सिक्योरिटी में सालों की देरी हुई 
  2. कोयला और माइनिंग (Mahan Coal Block): एक्शनएड और ग्रीनपीस ने वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन का नैरेटिव खड़ा करके निवेश रुकवा दिया।
  3. औद्योगिक केंद्र (POSCO और वेदांता): स्थानीय सक्रियता के नाम पर अरबों डॉलर के  FDI का नुकसान हुआ।
  4. कृषि तकनीक (GMO विरोध): ‘ASHA’ और ‘ग्रीनपीस’ ने नई बीजों की तकनीक को रोककर कृषि उत्पादकता को बाधित किया।

और जानते हैं इसका सबसे भयानक नतीजा क्या निकला? IB के अनुसार, इन गतिविधियों की वजह से भारत की वार्षिक जीडीपी ग्रोथ रेट में 2% से 3% की गिरावट आई। ये हज़ारों-लाखों करोड़ रुपये हैं जो आपके और हमारे अस्पताल, स्कूल और सड़कों पर खर्च हो सकते थे।

अब समझने वाली बात ये है कि ये विरोध सिर्फ पेड़ों या पक्षियों तक सीमित नहीं है। असल में Climate Activism आज के दौर का एक Multipolar Ideological War बन चुका है। जिसे हम पर्यावरण की चिंता समझ रहे हैं, वो दरअसल Watermelon Politics है… यानी ऊपर से हरा, लेकिन अंदर से वही पुराना लाल (मार्क्सवादी) एजेंडा।

कोल्ड वार रणनीति + इको-मार्क्सिज्म + मेटाबॉलिक रिफ्ट

जब औद्योगिक विकास ने मजदूरों का जीवन सुधारा, तो वामपंथी विचारधारा को नया मोहरा चाहिए था। अब उन्होंने शिक्षित मध्यम वर्ग और छात्रों को निशाना बनाया और डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स के खिलाफ मॉरल वॉर छेड़ दी। मकसद साफ है- क्लाइमेट लिटिगेशन के जरिए चुनी हुई सरकार के हाथ बाँधना और देश की संप्रभुता को विदेशी एनजीओ के इशारों पर नचाना।

दिलचस्प बात ये है कि इस नैरेटिव की जड़ें Cold War में छिपी हैं। 1960 के दशक से ही पश्चिमी ताकतों ने आपातकाल और संकट पैदा करने की रणनीति अपनाई है ताकि जनता पर नियंत्रण रखा जा सके। आज जलवायु परिवर्तन को उसी युद्ध जैसी इमरजेंसी के रूप में फ्रेम किया जा रहा है ताकि विकासशील देशों की ऊर्जा और अर्थव्यवस्था को कमज़ोर किया जा सके।

इसीलिए ये पश्चिमी देश, खासकर जर्मनी जैसे यूरोपीय देश, अब Regulatory Imperialism (नियामक साम्राज्यवाद ) का सहारा ले रहे हैं। CBAM जैसे टैक्स लगाकर ये हमारे स्टील और एल्युमीनियम एक्सपोर्ट को महंगा कर रहे हैं ताकि भारत ग्लोबल मार्केट में पिछड़ जाए। ये वही शीतयुद्ध वाली रणनीति है कि संकट पैदा करो, डर फैलाओ और फिर EXPERT बनकर दुनिया को कंट्रोल करो।

हीटवेव: डर का नया नैरेटिव

हमारे देश में गर्मी का क्या लेना-देना इन सबसे? असली कहानी यही है- जब भी भारत में हीटवेव आती है, अंतरराष्ट्रीय मीडिया इसे विनाशकारी संकट बताता है। ‘95% भारतीय शहर खतरे में’, ‘वेट बुल्ब टेम्परेचर’ जैसे शब्द उछाले जाते हैं।

ये डेटा अक्सर साइंटिफिक एक्सागरेशन होता है और ठीक उसी वक्त सामने आता है जब भारत कोई नया माइनिंग प्रोजेक्ट या पावर प्लांट शुरू करता है। मकसद भारत को ‘विक्टिम’ या ‘विलेन’ बनाना है ताकि अंतरराष्ट्रीय दबाव बने कि “देखो, तुम्हारा देश जल रहा है, इसलिए निकोबार या कोई XYZ प्रोजेक्ट रोक दो और हमारे महँगे ग्रीन-टेक खरीद लो।”

ये भारत की आर्थिक स्थिरता पर सवाल उठाने और हमें एक कमज़ोर देश साबित करने की वेल प्लानेंड कोशिश है। 

मैं गर्मी से इनकार नहीं कर रहा, लेकिन उस फियर मॉन्गरिंग का विरोध कर रहा हूं, जिससे भारत की एनर्जी सिक्योरिटी (कोयला-गैस) को निशाना बनाया जा रहा है, जबकि पश्चिम खुद फॉसिल फ्यूल पर टिका है।

लेकिन ये भारत को इस किस्म के मोरल डिलेमा में डालने का प्रयास करने वाली पश्चिमी संस्थाएँ जो आज के दौर में पैदा हुई हैं, शायद नहीं जानती कि भारत को आज किसी पश्चिमी ज्ञान और रेटिंग की ज़रूरत नहीं है। हमारे लिए प्रकृति कोई Product नहीं है, वो हमारे लाइफस्टाइल का जरूरी हिस्सा रहा है…

अथर्ववेद का मंत्र है “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः”। यानी धरती हमारी माँ है और हम उसकी संतान। जहाँ पश्चिम प्रकृति पर विजय पाने की सोचता है, वहीं हमारी संस्कृति प्रकृति के साथ जुड़कर रहने की बात करती है। हमें पश्चिमी “वॉटरमेलन” एक्टिविज्म की नहीं, अपनी प्राचीन Dharmic Ecology की ज़रूरत है जो विकास और प्रकृति, दोनों का सम्मान करती है।) 

क्या है सिविल सोसायटी और कल्चरल मार्क्सिज्म?

अब सवाल ये उठता है कि ये लोग इतने संगठित कैसे हैं? इनका दिमाग कैसे काम करता है? यहाँ एंट्री होती है Cultural Marxism की।

इतिहास में  देखें तो 20वीं सदी की शुरुआत में ‘फ्रैंकफर्ट स्कूल’ के विचारक जैसे मैक्स होर्खाइमर और थियोडोर अडोर्नो ने देखा कि मजदूर क्रांति नहीं कर रहे। तो उन्होंने अपनी रणनीति बदली। उन्होंने कहा कि हथियारों से नहीं, संस्कृति से हमला करो।

इसे कहते हैं क्रिटिकल थ्योरी जिसका मकसद है परिवार, धर्म और राष्ट्रवाद जैसी संस्थाओं को ‘उत्पीड़क’ / Oppressor साबित करना।

और आज यही विचारधारा Eco-Marxism बन चुकी है। कार्ल मार्क्स ने एक सिद्धांत दिया था – ‘मेटाबॉलिक रिफ्ट’ / Metabolic Rift। ये कहता है कि पूंजीवाद मनुष्य और प्रकृति का रिश्ता तोड़ देता है। इसी का फायदा उठाकर आज हर  डेवलपमेंट प्रोजेक्ट को ‘जनसंहार’ यानी Genocide या ‘पारिस्थितिकी-संहार’ / Ecocide का नाम दे दिया जाता है।

 Cultural Marxism – इसके तीन फ्रंट हैं-

  • आर्थिक मार्क्सवाद: ये कहता है कि  दुश्मन ‘पूंजीपति’ है, एजेंट ‘मजदूर’ है।
  • सांस्कृतिक मार्क्सवाद: हमारे दुश्मन ‘पारंपरिक मूल्य’ हैं, या जिसमें ‘संस्कार’ कहकर तंज करने का चलन आता है, और यहाँ एजेंट है ‘हाशिए पर रहने वाले समूह’ हैं / मार्जिनलाइज्ड ग्रुप्स 
  • इको-मार्क्सवाद: इसमें दुश्मन ‘औद्योगिक विकास’ है, और इसके एजेंट पर्यावरण और आदिवासी कार्यकर्ता हैं।

यही वजह है कि आज एक आम नागरिक के मन में ये डाल दिया गया है कि अगर फैक्ट्री लगेगी, तो जंगल खत्म हो जाएंगे, जबकि सच्चाई कुछ और ही होती है।

लेकिन सोचने की बात ये है कि भारत के सांस्कृतिक नॉलेज और हमारे ट्रेडिशन को तोड़ने के लिए सबसे आगे हमेशा कौन रहा है? मार्स्किस्ट और कम्युनिस्ट और बदलते दौर के साथ यही मार्क्सिज्म आज कल्चरल मार्क्सिज्म की शक्ल में हमारे और आपके बीच है -इसी  Eco-Marxism के चश्मे से ये लोग भारत के हर बड़े प्रोजेक्ट को देखते हैं। इनके लिए निकोबार प्रोजेक्ट या कोई भी नया इंफ्रास्ट्रक्चर सिर्फ एक निर्माण कार्य नहीं है, बल्कि इनके हिसाब से ये “पूँजीवादी लालच” का वह हिस्सा है जो धरती को तबाह कर रहा है। और यही वो वैचारिक जाल है जिसमें हमारे यूथ  को फंसाया जा रहा है

भारत के लिए कितना अहम है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट 

अब बात करते हैं उस प्रोजेक्ट की, जो भारत को एक ‘ग्लोबल सुपरपावर’ बना सकता है, और जो इस वक्त इसी कल्चरल मार्क्सिज्म का पीड़ित है – ग्रेट निकोबार द्वीप जिसे लोग GNI प्रोजेक्ट भी नाम दे रहे हैं।

नीति आयोग का विजन है कि 81,000 करोड़ रुपए का निवेश होगा, जिसमें चार बड़ी चीजें होंगी

  1. गैलाथिया खाड़ी में एक मेगा पोर्ट: जो सिंगापुर और कोलंबो को टक्कर देगा।
  2. एक ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट: जो नागरिक और सैन्य दोनों कामों में आएगा।
  3. एक नया पावर प्लांट और पोर्ट सिटी।

लेकिन इस से चीन और उसके सिपाहियों को क्यों डर लग रहा है? दरअसल, निकोबार द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य / Strait of Malacca के मुहाने पर बैठा है। दुनिया का अधिकांश तेल और व्यापार यहीं से गुजरता है। इसे ही Malacca Dilemma भी नाम दिया जाता है क्योंकि भारत यहाँ से चीन की एनर्जी सप्लाई लाइन को कभी भी ब्लॉक कर सकता है।

यही वजह है कि INS Baaz हवाई पट्टी का विस्तार भारत के लिए रणनीतिक रूप से अनिवार्य है। लेकिन जैसे ही भारत ने यहाँ काम शुरू किया, विदेशी एनजीओ का ‘इको-मार्क्सवाद’ सक्रिय हो गया।

द एंटी-इंडिया कैबाल / Anti-India Cabal -NGO  

हम आपको उन एनजीओ के बारे में बता रहे हैं, जो इस पूरे खेल के पीछे हैं। ये कोई मामूली संस्थाएं नहीं हैं, इनके नेक्सस पश्चिमी देशों की सरकारों और बड़े कॉर्पोरेट फंड्स से जुड़े हैं।

1. सर्वाइवल इंटरनेशनल (Survival International – UK)

इसका हेडक्वार्टर लंदन / UK में है। इसने ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को ‘शौम्पेन’ (Shompen) जनजाति के लिए Death Sentence घोषित कर दिया है। साल 2024 में इन्होंने 13 देशों के 39 ‘जनसंहार विशेषज्ञों’ से एक चिट्ठी लिखवाई ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को एक ‘क्रूर राष्ट्र’ दिखाया जा सके। इनका मकसद आदिवासियों को आधुनिक स्वास्थ्य और शिक्षा से दूर रखकर ‘जैविक संग्रहालय’ / Biological Museums की तरह रखना है।

2. ग्रीनपीस इंडिया (Greenpeace – Netherlands)

यह नीदरलैंड्स बेस्ड संगठन का भारतीय हत्था है। आईबी की रिपोर्ट बताती हैं कि ग्रीनपीस ने परमाणु ऊर्जा संयंत्रों – जैसे कुडनकुलम और कोयला खदानों के खिलाफ आंदोलन प्रायोजित करने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए। इनका Main एजेंडा भारत की एनर्जी के फील्ड में इंडिपेंडेंट होने से रोकना है।

3. एमनेस्टी इंटरनेशनल और एक्शनएड (Amnesty and ActionAid – UK/International)

लंदन बेस्ड इन संस्थाओं को IB ने पश्चिमी सरकारों के Instruments नाम दिया था। ये मानवाधिकारों की आड़ में भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों और सेंसिटिव क्षेत्रों में माइनिंग जैसे प्रोजेक्ट्स के ख़िलाफ़ जनाक्रोश भड़काते हैं ताकि भारत की निर्भरता नेचुरल रिसोर्सेज के लिए विदेशों पर बनी रहे।

4. सतत संपदा (Satat Sampada) और हरजीत सिंह (India/International)

जनवरी 2026 में ED ने क्लाइमेट एक्टिविस्ट हरजीत सिंह और संजय वशिष्ठ के ठिकानों पर छापेमारी की। यहाँ मामला बहुत गंभीर नजर आता है। ‘सतत संपदा’ नाम की संस्था को ‘क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क’ (CAN) से 6 करोड़ रुपए का संदिग्ध विदेशी धन मिला। ED इस नतीजे पर पहुँचा था कि इस पैसे का इस्तेमाल भारत में ‘फॉसिल फ्यूल नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी’ (FF-NPT) को प्रमोट करने के लिए किया जा रहा था।

लेकिन ये ट्रीटी / संधि क्या है? ये संधि चाहती है कि भारत कोयला, तेल और गैस का इस्तेमाल बंद कर दे। जबकि भारत अपनी 70% बिजली आज भी कोयले से बनाता है। अगर ये सफल हो गए, तो भारत के घरों की बिजली गुल हो जाएगी और फैक्ट्रियाँ बंद हो जाएंगी।

5. स्थानीय नेटवर्क: PUCL, NAPM और नर्मदा बचाओ आंदोलन

विदेशी फंड्स सीधे जमीन पर नहीं आते। ये PUCL और ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ जैसे स्थानीय संगठनों के जरिए काम करते हैं। ये संगठन कानूनी अड़चनें पैदा करते हैं और स्थानीय लोगों को भड़काते हैं ताकि प्रोजेक्ट की लागत बढ़ जाए और देरी हो।

ESG का शस्त्रीकरण यानी हरित उपनिवेशवाद

ESG यानी – ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर हाइब्रिड वॉर: विदेशी एनजीओ और कल्चरल मार्क्सिज्म का भारत के विकास को रोकने की साजिश | Environment, Social and Governance को अब एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। यही हरित उपनिवेशवाद (Green Colonialism) है।

विकसित देश, जिन्होंने खुद कोयला जलाकर और जंगलों को काटकर अपनी तरक्की की, अब भारत जैसी उभरती शक्तियों को ‘नैतिक मानदंडों’ के नाम पर रोक रहे हैं।

  • ग्रेट निकोबार पोर्ट: यहाँ एक्टिविज्म का आधार रेन फारेस्ट / वर्षावन है, लेकिन असली मकसद ‘मलक्का जलडमरूमध्य’ पर भारतीय नियंत्रण रोकना है।
  • ओडिशा माइनिंग: यहाँ आधार ‘आदिवासी पहचान’ बनाया है, मकसद भारत को खनिज आयात पर निर्भर रखना है।
  • केन-बेतवा लिंक: यहाँ आधार ‘पन्ना टाइगर रिजर्व’ है, जबकि असली मकसद कृषि उत्पादकता को रोकना है।

ये एक तरह की ‘ग्रीन कोर्डन’ / Green Cordon स्ट्रेटेजी है ताकि भारत कभी भी ग्लोबल सप्लाई चेन का केंद्र न बन पाए।

राजनीतिक नेक्सस – राहुल गाँधी और चीनी MOU

लेकिन ये सब केवल बाहर से नहीं हो रहा। भारत के भीतर भी इसे राजनीतिक समर्थन मिलता है। और ऐसे में ही ये पूरा इकोसिस्टम एक लूप पूरी करता है – 

राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी ने पिछले कुछ वर्षों में संपत्ति के पुनर्वितरण यानी Wealth Redistribution जैसी बातें शुरू की हैं, जो सीधे तौर पर मार्क्सवादी विचारधारा से प्रेरित हैं। राहुल गाँधी और उनके साथियों का एक साझा इतिहास रहा है- चाहे वो वेदांता हो, पॉस्को हो या टाटा नैनो, उन्होंने हर बड़े प्रोजेक्ट का विरोध किया है।

यहाँ एक और फैक्ट है। साल 2008 में कॉन्ग्रेस पार्टी और ‘चीनी कम्युनिस्ट पार्टी’ (CPC) के बीच एक MoU हुआ था। लोग सवाल उठाते हैं कि क्या इस समझौते की वजह से ही विपक्ष उन रणनीतिक परियोजनाओं का विरोध करता है जो चीन के लिए खतरा हैं? जैसे कि ग्रेट निकोबार।

ये सिर्फ़ राजनीतिक आरोप नहीं है, ये तो एक Pattern है। जब भी कोई ऐसा प्रोजेक्ट आता है जो भारत को चीन के मुकाबले रणनीतिक बढ़त (Strategic Edge) देता है, तभी इंटरनल प्रोटेस्ट की आवाज सबसे तेज़ क्यों हो जाति है? क्या ये सिर्फ़ कोइंसीडेंस होता है या उस MoU का असर होता है, ये हमें सूचना चाहिए

वेनेजुएला vs वियतनाम – दो रास्तों की कहानी

अब आप सोच रहे होंगे कि विकास नहीं हुआ तो क्या हुआ? हम गरीब ही अच्छे हैं। तो इन दो देशों की कहानी देखते हैं। वेनेजुएला और क्यूबा – 

  1. वेनेजुएला और क्यूबा: यहाँ कट्टरपंथी समाजवादी नीतियाँ अपनाई गईं। उद्योगों का राष्ट्रीयकरण हुआ और विकास प्रोजेक्ट्स को रोका गया। नतीजा क्या हुआ? वेनेजुएला की GDP  88% गिर गई और वहाँ 548%  Inflation रेट है। इसे कहते हैं ‘दरिद्रता का वितरण’ (Equality of Misery)।
  2. वियतनाम: 1986 में वियतनाम ने ‘दोई मोई’ (Doi Moi) सुधार किए और बाजार आधारित अर्थव्यवस्था अपनाई। आज वियतनाम 7.1% की दर से बढ़ रहा है और मैन्युफैक्चरिंग का ग्लोबल हब बन गया है।

इन दो उदाहरणों से भारत के लिए सबक साफ है, अगर हम इन विकास-विरोधी नैरेटिव्स के चक्कर में पड़े, तो हमारा हाल भी वेनेजुएला जैसा हो सकता है, जिनकी वामपंथी नीतियों ने वहाँ की जनता को गरीब बनाकर रखा … इतिहास गवाह है कि जिन देशों ने विकास रोका, वे आज दरिद्रता बाँट रहे हैं.. 

असली भारतीय पर्यावरणवाद vs ‘एसी रूम’ एक्टिविज्म

एक बहुत ज़रूरी बात। भारत को पर्यावरण बचाना किसी पश्चिमी NGO से सीखने की ज़रूरत नहीं है। हमारी परंपरा में ‘बिश्नोई आंदोलन’ और ‘चिपको आंदोलन’ जैसे उदाहरण हैं, जहाँ लोगों ने अपनी संस्कृति के लिए पेड़ों को गले लगाया। स्वामी ज्ञान स्वरूप संनंद (प्रो. जीडी. अग्रवाल) जैसे असली योद्धाओं ने गंगा के लिए अपने प्राण त्यागे, किसी विदेशी फंडिंग के लिए नहीं।

असली पर्यावरणवाद और पेशेवर एक्टिविस्ट में फर्क है। ये ‘प्रोफेशनल एक्टिविस्ट’ AC कमरों में बैठकर हैशटैग चलाते हैं और उन्हीं सड़कों और बिजली का इस्तेमाल करते हैं जिनका वे विरोध करते हैं। इसका उदाहरण चार धाम यात्रा रूट पर आल वेदर रोड प्रोजेक्ट के ख़िलाफ़ PIL डालने वाली गैंग भी है… इस गैंग में वो लोग शामिल थे जिनकी पत्नी अमेरिका में बराक ओबामा की वोटर है… और ये क्लाइमेट के कैंपेन चलते हैं देहरादून में बैठकर।

वैसे भी भारत को पर्यावरण संरक्षण के लिए पश्चिम के ‘सर्टिफिकेट’ की जरूरत नहीं है। हमारी संस्कृति में भूमि को माता माना गया है।

माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्या

हमारा मॉडल ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का है, जहाँ विकास और प्रकृति साथ चलते हैं। सरकार द्वारा 21,000 से अधिक एनजीओ के लाइसेंस रद्द करना इस दिशा में एक कड़ा कदम है, लेकिन यह वैचारिक लड़ाई हमें अपने शिक्षण संस्थानों और सोशल मीडिया पर भी लड़नी होगी। ग्रेट निकोबार और ऐसे ही अन्य प्रोजेक्ट्स का सफल होना इस बात का प्रमाण होगा कि भारत अब बाहरी दबावों के आगे झुकने वाला ‘सॉफ्ट स्टेट’ नहीं रहा।

इसीलिए ग्रेट को निकोबार केवल एक पोर्ट या एयरपोर्ट के रूप में नहीं देखना चाहिए। ये भारत जैसे देश की बढ़ती ताक़त के प्रमाण हैं और जब कोई ताक़तवर होता है तो उसके अड़ोसी पड़ोसी परेशान होते ही हैं – भविष्य में उन्हीं पड़ोसियों को टाइट रखने के लिए निकोबार जैसी जगह पर स्ट्रेटजिक डोमिनेंस का होना बेहद जरूरी भी होता है 

यही करण है कि भारत सरकार ने भी अब कड़ा रुख अपनाया है। 2014 से 2026 के बीच 21,000 से अधिक NGO  के FCRA लाइसेंस रद्द किए गए हैं। लेकिन ये लड़ाई अभी लंबी है।

हमें यह समझना होगा कि संप्रभुता की रक्षा के लिए- 

  1. विदेशी फंडिंग की लगातार निगरानी ज़रूरी है।
  2. हमें विकास की अपनी परिभाषा खुद गढ़नी होगी, जो प्रकृति और प्रगति दोनों को संतुलित करे।
  3. और सबसे ज़रूरी- हमें उस सांस्कृतिक मार्क्सिज्म को पहचानना होगा जो राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा को ‘उत्पीड़न’ बताता है।

बहरहाल, क्या भारत एक वैश्विक समुद्री शक्ति बनेगा या विदेशी ताकतों के दबाव में झुक जाएगा? ये फैसला हमारे आज के फैसलों पर निर्भर करेगा।

QR, डिलीवरी, रीचार्ज और राइड ऐप्स से हिंदू महिलाओं के नंबर पा रहे ‘लव जिहादी’, ऑर्डर-राइड खत्म और कॉल-मैसेज शुरू?: जानें डिजिटल प्राइवेसी का कैसे रखें ध्यान

रात काफी हो चुकी थी। ऑफिस से थकी हुई एक लड़की जल्दी घर पहुँचने के लिए बाइक टैक्सी बुक करती है। रास्ते भर ड्राइवर उससे निजी सवाल पूछता रहता है, ‘घर में कौन है?’, ‘इतनी रात में अकेले क्यों निकली हो?’ लड़की किसी तरह सफर खत्म कर घर पहुँच जाती है।

उसे लगता है कि बात यहीं खत्म हो गई। लेकिन कुछ देर बाद उसी ड्राइवर के कॉल आने शुरू हो जाते हैं। फिर व्हाट्सएप मैसेज, फिर अलग-अलग नंबरों से वीडियो कॉल।

लड़की डर जाती है। नंबर ब्लॉक करती है, लेकिन कॉल बंद नहीं होते। जिस ऐप पर भरोसा करके उसने सफर किया, वही उसके डर की वजह बन जाता है। अक्सर ऐसी हरकतों का फायदा लव जिहादी उठाते दिख रहे हैं, जो हिंदू लड़कियों को निशाना बना रहे हैं। हालाँकि ऐसी हरकतें असामाजिक तत्व भी खूब कर रहे हैं।

बहरहाल, यह सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि तेजी से सामने आ रही हकीकत है। कभी डिलीवरी एजेंटों पर महिलाओं को परेशान करने के आरोप लगते हैं, तो कभी बाइक टैक्सी राइडर्स पर।

हाल ही में अभिनेत्री  रीवा अरोड़ा ने ब्लिंकिट के डिलीवरी एजेंट पर अभद्र व्यवहार का आरोप लगाया। वहीं दिल्ली की शैव्या वशिष्ठा ने रैपिडो राइडर पर लगातार कॉल और वीडियो कॉल कर परेशान करने का दावा किया।

इन घटनाओं ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि डिजिटल सुविधा के इस दौर में क्या हमारा मोबाइल नंबर और निजी जानकारी सच में सुरक्षित है?

मोबाइल रिपेयरिंग शॉप, रिचार्ज काउंटर, कैब सर्विस और डिलीवरी जैसी लोकल और डिजिटल सेवाओं से जुड़े कुछ मामलों में इस्लामी कट्टरपंथी के होने बात अक्सर सामने आई है। जिन पर उत्पीड़न और अनुचित व्यवहार के आरोप लगे हैं।

कई घटनाओं में यह भी शिकायत सामने आई है कि सेवा लेने के बाद महिलाओं के मोबाइल नंबर का गलत इस्तेमाल हुआ और उन्हें अनजान नंबरों से कॉल या मैसेज आने लगे और उन्हे परेशान किया गया। जैसा हमने पुणे केस में देखा।

QR मेनू और UPI से नंबर लीक होने का खतरा?

आजकल ज्यादातर रेस्टोरेंट में मेन्यू देखने और ऑर्डर करने के लिए QR कोड स्कैन कराया जाता है। लोग आसानी से मोबाइल नंबर डालकर खाना ऑर्डर कर देते हैं। लेकिन अब यही सुविधा लोगों की चिंता की वजह बनती दिख रही है।

पुणे में रहने वाली एक महिला ने बताया है कि वह अपने दोस्तों के साथ एक रेस्टोरेंट में खाना खाने गई थीं। वहाँ टेबल पर रखे QR कोड को स्कैन करके उन्होंने मेन्यू देखा और ऑर्डर किया। उस समय उन्हें लगा कि यह एक सामान्य डिजिटल प्रक्रिया है। लेकिन रात में अचानक उनके फोन पर एक अनजान नंबर से मैसेज आने लगे।

महिला के मुताबिक, मैसेज भेजने वाला कोई और नहीं बल्कि उसी रेस्टोरेंट का एक कर्मचारी था। जिसका नाम शेख सैफ है, आरोप है कि कर्मचारी ने QR मेनू सिस्टम से उनका मोबाइल नंबर हासिल किया और फिर देर रात बातचीत करने की कोशिश करने लगा। पहले सामान्य तरीके से बात शुरू की गई, लेकिन बाद में लगातार मैसेज आने लगे, जिससे महिला असहज हो गईं।

महिला ने इस पूरी घटना के स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर शेयर किए। इसके बाद मामला तेजी से वायरल हो गया। लोगों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया कि आखिर ग्राहक का निजी नंबर रेस्टोरेंट स्टाफ तक पहुँचा कैसे? क्या QR मेनू और डिजिटल ऑर्डर सिस्टम में ग्राहकों का डेटा पूरी तरह सुरक्षित नहीं है?

मामला बढ़ने के बाद रेस्टोरेंट प्रबंधन ने कथित तौर पर आरोपित कर्मचारी पर कार्रवाई की बात कही। लेकिन इस घटना ने एक बड़ी बहस छेड़ दी कि आज के डिजिटल दौर में लोग सुविधा के लिए अपना नंबर और निजी जानकारी तो दे रहे हैं, लेकिन उसकी सुरक्षा कितनी मजबूत है, इसका भरोसा शायद अभी भी नहीं है।

डिलीवरी ऐप्स और बाइक टैक्सी में महिलाओं की प्राइवेसी पर सवाल

दिल्ली की रहने वाली शैव्या वशिष्ठा ने सोशल मीडिया पर अपना दर्द साझा करते हुए बताया कि वह देर रात रैपिडो से दिल्ली से ग्रेटर नोएडा जा रही थीं। उनके मुताबिक, सफर के दौरान ड्राइवर निजी सवाल पूछता रहा और अश्लील गाने बजाता रहा।

शैव्या का आरोप है कि राइड खत्म होने के बाद ड्राइवर ने उन्हें लगातार कॉल करना शुरू कर दिया। उन्होंने नंबर ब्लॉक किया, लेकिन फिर अलग-अलग नंबरों से कॉल और वीडियो कॉल आने लगे। उन्होंने दावा किया कि एक बार ड्राइवर ने बाथरूम से वीडियो कॉल तक कर दिया, जिससे वह बुरी तरह डर गईं।

यह मामला सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो लोगों ने महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई। बाद में रैपिडो ने बयान जारी कर कहा कि कंपनी ऐसे व्यवहार को बर्दाश्त नहीं करती और ग्राहक के नंबर छिपा के रखते है। लेकिन सवाल फिर वही उठा कि अगर नंबर सुरक्षित थे तो ड्राइवर तक पहुँच कैसे हुई?

इसी तरह अभिनेत्री रीवा अरोड़ा ने आरोप लगाया कि ब्लिंकिट का एक डिलीवरी एजेंट उनके घर ऑर्डर लेकर पहुँचा, लेकिन शुरुआत से ही उसका व्यवहार ठीक नहीं था। रिवा के मुताबिक, एजेंट ने उनके परिवार के साथ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया और काफी देर तक बहस करता रहा।

रिवा ने कहा कि मामला इतना बढ़ गया कि परिवार को पुलिस बुलानी पड़ी। उन्होंने यह भी कहा कि कंपनियों को सिर्फ डिलीवरी नहीं, बल्कि कर्मचारियों के व्यवहार और ट्रेनिंग पर भी ध्यान देना चाहिए।

क्या ग्राहक डेटा का हो रहा गलत इस्तेमाल?

इन घटनाओं के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ग्राहक का डेटा कितना सुरक्षित है? जब कोई व्यक्ति खाना ऑर्डर करता है या बाइक टैक्सी बुक करता है, तो उसका मोबाइल नंबर, घर का पता और लोकेशन जैसी निजी जानकारी ऐप के जरिए साझा होती है।

लोग पूछ रहे हैं कि क्या डिलीवरी एजेंट और राइडर को जरूरत से ज्यादा जानकारी दिखती है? क्या राइड खत्म होने के बाद भी ग्राहक का नंबर उनके पास रहता है? अगर कंपनियाँ दावा करती हैं कि नंबर मास्क्ड  होते हैं, तो फिर कई मामलों में दोबारा कॉल और मैसेज कैसे पहुँच रहे हैं?

साइबर सुरक्षा के लिहाज से देखें तो कंपनियों को अपने सिस्टम को मजबूत करने की जरूरत है। सिर्फ ऐप बनाना काफी नहीं, बल्कि यह भी जरूरी है कि ग्राहक का डेटा सीमित समय के लिए ही दिखे और उसका गलत इस्तेमाल करने वालों पर सख्त कार्रवाई हो।

ऐसे मामलों से कैसे सुरक्षित रहें?

डिजिटल दौर में ऑनलाइन खाना ऑर्डर करना, बाइक टैक्सी बुक करना और UPI पेमेंट करना हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। लेकिन सुविधा के साथ सावधानी बरतना भी उतना ही जरूरी हो गया है।

जरूरत है कि लोग ऑनलाइन ऑर्डर, डिलीवरी और UPI पेमेंट के लिए अलग मोबाइल नंबर इस्तेमाल करें, ताकि निजी नंबर हर जगह शेयर न हो। या तो फिर आप अपने सेटिंग्स में जाकर नंबर को हाइड कर सकते हैं।

इसके अलावा हर जगह बिना जरूरत मोबाइल नंबर देने से बचना चाहिए। व्हाट्सप्प की प्राइवेसी सेटिंग्स भी मजबूत रखना जरूरी है, ताकि अनजान लोग आपकी प्रोफाइल फोटो, लास्ट सीन और दूसरी निजी जानकारी न देख सकें।

अगर किसी डिलीवरी एजेंट, राइडर या अनजान व्यक्ति की तरफ से लगातार कॉल या मैसेज आने लगें, तो तुरंत नंबर ब्लॉक करना चाहिए और संबंधित ऐप पर शिकायत दर्ज करनी चाहिए। मामला ज्यादा गंभीर लगे तो पुलिस और साइबर सेल से संपर्क करने में देर नहीं करनी चाहिए।

साइबर एक्सपर्ट यह भी कहते हैं कि किसी भी अनजान QR कोड को स्कैन करने से पहले सावधानी बरतना जरूरी है। वहीं देर रात सफर के दौरान अपनी राइड डिटेल और लाइव लोकेशन परिवार या करीबी लोगों के साथ शेयर करना भी सुरक्षित माना जाता है।

हर बार हिंदू लड़की ही क्यों? पकड़े जाने पर इस्लामी कट्टरपंथी करते हैं सड़कों पर बवाल-हिंसा: भोपाल ही नहीं देश में ऐसे मामलों की भरमार, समझें इनकी मानसिकता

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल इस्लामी कट्टरपंथियों की हिंसा के चलते चर्चा में है। यहाँ मस्जिद के पास एकत्रित हुई इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने विरोध प्रदर्शन के नाम पर सड़क पर खूब उत्पात मचाया। उन्होंने न केवल पुलिस वाहनों को निशाना बनाया बल्कि सुरक्षाकर्मियों पर पथराव किया और ‘सर तन से जुदा’ जैसे कट्टरपंथी और उत्तेजक नारे भी लगाए।
 
ऐसी हिंसा के पीछे इस्लामी कट्टरपंथियों का तर्क था कि आखिर हिंदुओं ने क्यों उस मुस्लिम युवक को पीटा जो हिंदू युवती के साथ होटल में मिला था। इसी बात को आधार बताकर इतना बड़े स्तर पर उपद्रव हुआ। खैर, ये कुछ नया नहीं है। ये वही पैटर्न है जो हर बार हर हिंसा को अंजाम देने से पहले ये लोग इस्तेमाल करते हैं।

किसी एक बात को लेकर मुद्दा बनाना और फिर सड़कों पर उतरकर कानून अपने हाथ में लेना। इस बार भी यही हुआ। रही हिंदू संगठनों के मुस्लिम व्यक्ति को पीटने की बात तो वास्तव में, भोपाल में हिंदू संगठनों का आक्रोश अकारण नहीं है, इसके पीछे ‘लव जिहाद’ जैसे वे तमाम मामले हैं, जिनमें पहचान छिपाकर हिंदू युवतियों को प्रेम जाल में फँसाया जाता है।

इसके बाद अश्लील वीडियो या ब्लैकमेलिंग के जरिए उनका मानसिक व शारीरिक शोषण किया जाता है। सिर्फ भोपाल की बात करें तो पिछले कुछ ही महीनों में वहाँ से तमाम ऐसे केस सामने आए हैं। आइए आज इस रिपोर्ट में उन घटनाओं के बारे में जानें और समझें कि अगर हिंदू संगठनों ने किसी कट्टरपंथी को रंगे हाथों पकड़ कर अपना आक्रोश दिखाया भी तो उनके ऐसा करने के पीछे कौन सी घटनाएँ रही हैं।

हिंदू लड़कियों को नशा देकर दरिंदगी करता था भोपाल का ‘मुस्लिम गैंग’, फिर Video बनाकर करता था ब्लैकमेल

अप्रैल 2025 महीने में भोपाल के कोकता थाना क्षेत्र में स्थित एक निजी कॉलेज की हिंदू छात्राओं के साथ हुए एक भयानक अपराध का खुलासा हुआ था। यह गिरोह खासकर कॉलेज की हिंदू छात्राओं को निशाना बनाता था। मुस्लिम गैंग के आरोपित पहले हिंदू लड़कियों से दोस्ती करते और उन्हें अपने प्रेमजाल में फँसाते थे।

फिर लड़कियों को नशीले पदार्थ पिलाकर उनके साथ गैंगरेप किया जाता था। मुस्लिम गैंग के सदस्य पीड़िताओं का रेप करने के लिए उन्हें न केवल गांजा पिलाते थे, बल्कि गले पर छुरी रखकर, पोर्न दिखाकर उनका बलात्कार करते थे। मामले में पुलिस ने केस के मुख्य आरोपित फरहान खान सहित मोहम्मद साद, अरबाज, अयान, शाहरुख, जावेद उर्फ भय्यू, जोया, फैजान, मोहम्मद अली, अबरार खान, हामिद, अरशद और सिराज समेत कई अन्य को गिरफ्तार किया था।

पीड़िताओं पर जबरन धर्मांतरण और उसके बाद निकाह का भी दबाव डाला जाता था। इसके अलावा उन्हें बीफ खाने, रोजा रखने और बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया जाता था। यह पूरा केस महीनों तक चर्चा में था और पीड़िताओं ने बेहद गंभीर खुलासे किए थे कि कैसे उनके साथ दरिंदगी और मारपीट कर इस्लामी कट्टरपंथी उन्हें हवस का शिकार बनाते थे।

शादी का झाँसा देकर भोपाल से ले गया केरल, धर्मांतरण का डाला दबाव: बैग में मिला- ‘मुसलमान कैसे बनें’ किताब

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की एक हिंदू युवती को शादी का झाँसा देकर बादशाह खान केरल ले गया। वहाँ उस पर इस्लामी धर्मांतरण और कलमा पढ़ने का दबाव बनाने लगा। पुलिस का दबाव बढ़ने पर बादशाह ने जब युवती को भोपाल भेजा तो उसके बैग से ‘मुसलमान कैसे बनें’ जैसी किताबें मिली। बाद में बादशाह खान को गिरफ्तार कर लिया गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पीड़िता भोपाल के अवधपुरी थाना क्षेत्र के अन्ना नगर इलाके में रहती थी। यहीं बादशाह उसका पड़ोसी था। बादशाह और पीड़िता में जान-पहचान हुई जो बाद में प्यार में बदल गई। कुछ दिनों के बाद लड़की का परिवार अवधपुरी क्षेत्र में शिफ्ट हो गया। यहाँ भी बादशाह लड़की से मिलने आया करता था।

यही से वो लड़की को केरल के कोझिकोड ले गया। वापस आकर पुलिस बयान में पीड़िता ने बताया कि केरल में बादशाह उस पर इस्लाम कबूलने का दबाव बनाने लगा था। वह उसे जबरन कलमा पढ़ने के लिए भी मजबूर किया करता था।

अल्तमश-आहत-आहान ने 3 नाबालिग हिंदू लड़कियों का ब्रेनवॉश कर किया निकाह, कई दिनों तक किया रेप

मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले से नाबालिग हिंदू लड़कियों के जबरन धर्मांतरण, निकाह और रेप का गंभीर मामला सामने आया था। पुलिस ने अल्तमश खान, आहान खान और आहत शेख के खिलाफ FIR दर्ज की। हिंदू पीड़िताओं के अनुसार, उन्हें प्रेम जाल में फँसाकर धर्म परिवर्तन कराया गया और उनके साथ 10 से 15 बार जबरन शारीरिक संबंध बनाए गए।

इन कट्टरपंथियों के चंगुल से किसी तरह निकलकर जब पीड़िताएँ अपने घर पहुँची तो परिजन उन्हें बुर्के में देख कर दंग रह गए। पूछने पर पूरे मामले का खुलासा हुआ। इस मामले में पुलिस ने ‘जस्सी किन्नर’ को भोपाल से गिरफ्तार किया था। जस्सी किन्नर ने ही नाबालिग लड़कियों को अल्तमश खान, आहान खान और आहत शेख से मिलवाया था।

हिन्दू लड़की, होटल का कमरा, 2 मुस्लिम लड़के… बजरंग दल ने दोनों की धुनाई कर पुलिस को सौंपा

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने दो मुस्लिम युवकों को हिन्दू लड़की के साथ पकड़ा। जिसके बाद होटल में जमकर हंगामा खड़ा हो गया। इतना ही नहीं बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने दोनों मुस्लिम लड़कों को होटल से नीचे लाकर बीच सड़क पर जमकर पीटा और पुलिस को सौंप दिया।

मामला भोपाल के एमपी नगर का था। पूछताछ करने पर दोनों मुस्लिम लड़कों ने कार्यकर्ताओं के साथ बहस करना शुरू कर दिया जिसके बाद गुस्साए बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने दोनों को बीच सड़क पर जमकर पीटा।

अयान खान ने दलित लड़की को फँसाया, अपहरण करके 10 दिनों तक किया रेप: पुलिस ने भोपाल से दबोचा

MP के दमोह में दलित लड़की को मुस्लिम लड़के ने 3 साल तक धोखे में रखा। जब राज खुला कि वह अयान खान है, तो लड़की ने रिश्ता तोड़ लिया। शातिर अयान खान ने पीड़िता का अपहरण कर लिया और उसे भोपाल ले जा कर कई दिनों तक यौन शोषण करता रहा।

दलित युवती दमोह से गायब हुई थी और उसे 10 दिनों बाद पुलिस ने भोपाल से बरामद किया। लड़की ने पुलिस को बताया कि अयान खान ने राज नाम रख कर उससे दोस्ती की और 3 साल तक अँधेरे में रखा। जब उसे असली नाम पता चला तो लड़की ने उससे बात बंद कर दी।

इसके बाद अयान उसके घर पहुँचा, बहाने से उसे बाहर बुलाया और जबरदस्ती कार में बिठाया और भोपाल ले गया। शिकायत के बाद पुलिस ने भोपाल जाकर अयान को गिरफ्तार किया।

हिन्दू लड़की से निकाह करने की साजिश में रफीक खान गिरफ्तार

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लव जिहाद का एक मामला सामने आया था, जिसमें रफीक खान नाम का युवक अपनी पहचान छुपा कर एक हिन्दू युवती से शादी करने जा रहा था। इस बात की जानकारी मिलते ही हिन्दूवादी संगठनों ने युवक से पूछताछ कर जब उसका आधार कार्ड देखा, तो पता चला कि उसका आधार कार्ड भी नकली है। 

पुलिस ने इस घटना की जानकारी मिलते ही आरोपित रफीक को गिरफ्तार कर लिया। रफीक ने लड़की को अपना नाम रवि यादव बताया था। रफीक खान ने रवि नाम से ही एक फर्जी पहचान पत्र (आधार कार्ड) भी बनवा रखा था। उसने पीड़िता को बहला-फुसलाकर प्रेम जाल में फँसा लिया था। 

वह लड़की के घर आकर पूजा पाठ में भी शामिल होता था और मदद भी करता था जिसकी वजह से उन्हें कभी किसी तरह का संदेह नहीं हुआ। रफीक हिन्दू युवती के साथ भोपाल के कोलार स्थित मंदिर में शादी कर ही रहा था कि तभी रायसेन जिला स्थित मंडीदीप के हिन्दू संगठन को इस बात की सूचना मिली। इसके बाद पूरे मामले का खुलासा हुआ।

विरोध प्रदर्शन के नाम पर हर बार हिंसा करने उतरते हैं इस्लामी कट्टरपंथी

ये कुछ मामले आपके और हमारे सामने हैं, लेकिन कुल इतने ही मामले हो ये मानना गलत होगा। कई मामलों में तो परिवार ने लोक-लाज के डर से शायद शिकायत भी ना की हो और कुछ मामले ऐसे भी होंगे, जहाँ इस्लामी कट्टरपंथियों के चंगुल में अब भी कुछ हिंदू लड़कियाँ प्रताड़ित हो रही होंगी।

इतने सब के बावजूद अगर इन्हें रंगे हाथों पकड़ लिया जाता है तो अपने घटिया उद्देश्य में असफल हो जाने की कुढ़न ये ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाकर, तोड़ फोड़ कर और हिंसा फैलाकर निकालने उतर जाते हैं। कभी ये किसी सोशल मीडिया पोस्ट का हवाला देकर हिंसा करने लगते हैं तो कभी किसी और मुद्दे को अपना आधार बना लेते हैं।

11 अगस्त 2020 की रात पूर्वी बेंगलुरु में दंगे और आगजनी का भीषण नजारा देखने को मिला था। केजी हल्ली, डीजे हल्ली और पुल्केशी नगर इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे। 1000 से भी अधिक की इस्लामी कट्टरपंथी भीड़ ने स्थानीय विधायक अखंड श्रीनिवास मूर्ति के घर को घेर लिया था और तोड़फोड़ शुरू कर दी थी।

इस्लामी भीड़ का कहना था कि विधायक के रिश्तेदार ने पैगम्बर मुहम्मद को लेकर आपत्तिजनक पोस्ट किया है। उन्होंने आसपास कड़ी हिन्दुओं की कई गाड़ियाँ जला दी थीं। घटों तक यह दंगा फसाद चलता रहा था। उन्होंने विधायक की बहन के घर भी हमला किया था। इसके अलावा DJ हल्ली और HJ हल्ली पुलिस थानों को भी आग लगा दी थी।

इस मामले में बाद में हुई जाँच में सामने आया था कि इस्लामी भीड़ का यह दंगा पूर्व प्रायोजित था। इसी तरह पश्चिम बंगाल के कालियाचक में 3 जनवरी 2016 को हजारों लोग इकट्ठा हुए थे। यह भीड़ एक राजनीतिक व्यक्ति कमलेश तिवारी द्वारा की गई विवादित टिप्पणी के विरोध में जुटी थी।

शुरुआत में यह एक सामान्य विरोध प्रदर्शन था, लेकिन जल्द ही स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई। भीड़ का एक हिस्सा आक्रामक हो गया, बैरिकेड तोड़ दिए गए और पुलिस व सुरक्षा बलों के साथ झड़प शुरू हो गई। कुछ ही समय में यह विरोध प्रदर्शन पूरी तरह दंगे में बदल गया था।

ऐसे ही मध्य प्रदेश के रतलाम में इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने एक सोशल मीडिया पोस्ट के विरोध में जमकर हंगामा किया था। भीड़ ने चौकी को घेरने की कोशिश की। बाद में पूरी सड़क को जाम कर खूब नारेबाजी की गई। इस दौरान ‘सर तन से जुदा’ जैसे आपत्तिजनक नारे भी लगाए गए और जमकर बवाल काटा गया।








क्या ‘बहुत खराब’ हाल में है भारत के मुस्लिम? दिल्ली के पूर्व LG नजीब जंग बोले- 12 साल में दोयम दर्ज के नागरिक बन गए हैं मुसलमान: जानें उनके दावे की हकीकत

दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग ने हाल ही में पत्रकार करण थापर को दिए इंटरव्यू में भारत में मुसलमानों की स्थिति को लेकर गंभीर टिप्पणी की है। द वायर को दिए इंटरव्यू में नजीब जंग ने कहा कि देश में मुसलमानों की हालत बहुत गंभीर हो गई है और वे दूसरे दर्जे के नागरिक बनने के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं।

उनके इस बयान के बाद एक बार फिर वही पुरानी बहस शुरू हो गई है, जो 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से लगातार चलती रही है। थोड़े-थोड़े इंटरवल पर कोई न कोई बड़ा नेता, अभिनेता, प्रोफेसर या रिटायर्ड अधिकारी यह कहता फिरता है कि भारत में मुसलमानों असुरक्षित होते जा रहे हैं।

शब्द बदल जाते हैं, उदाहरण बदल जाते हैं, लेकिन मूल संदेश वही रहता है कि मुसलमान धीरे-धीरे भारत में अपनी जगह खो रहे हैं। लेकिन, अब जब मोदी सरकार का तीसरा कार्यकाल चल रहा है, तो एक बड़ा सवाल यह है कि क्या ये भविष्यवाणी सच में जमीन पर दिखाई देती है?

मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लेकर नजीब जंग की चिंता

इंटरव्यू में नजीब जंग ने कहा कि आज मुसलमान खुद को मुख्यधारा से दूर महसूस कर रहे हैं। उनके मुताबिक समुदाय के भीतर यह भावना बढ़ रही है कि उनके साथ निष्पक्ष व्यवहार नहीं हो रहा और उन्हें देश की प्रगति से अलग किया जा रहा है। जंग ने कहा कि यह सिर्फ आम लोगों की भावना नहीं है, बल्कि राजनीति और संस्थानों में भी दिखाई देती है।

उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में, जहाँ मुस्लिम आबादी काफी बड़ी है, वहाँ हालिया चुनावों में बीजेपी ने मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारे। उन्होंने यह भी कहा कि आजादी के बाद पहली बार केंद्र सरकार में कोई मुस्लिम कैबिनेट मंत्री नहीं है और संसद में बीजेपी का कोई मुस्लिम सांसद भी नहीं है।

जंग के मुताबिक, उच्च नौकरशाही, न्यायपालिका और बड़े संस्थानों में भी मुसलमानों की मौजूदगी पहले के मुकाबले कम हुई है। उनका कहना था कि जब लगभग 20 करोड़ की आबादी वाला समुदाय खुद को राजनीतिक रूप से महत्वहीन महसूस करने लगे, तो यह देश के सामाजिक संतुलन के लिए खतरनाक हो सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि सिर्फ समाज का उदारवादी वर्ग ही इस मुद्दे को लेकर खुलकर चिंता जाहिर करता दिखता है और इसे उन्होंने भारत के लिए विनाशकारी बताया। हालाँकि इस तर्क के आलोचक कहते हैं कि इस तरह की आशंकाएँ वर्षों से जताई जाती रही हैं।

लेकिन इसके बावजूद भारत के मुसलमान चुनाव लड़ रहे हैं, व्यापार कर रहे हैं, विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं, सरकारी नौकरियों में हैं और खुले तौर पर अपने मजहब का पालन कर रहे हैं। उनका कहना है कि किसी एक पार्टी में राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम होना अपने आप में दूसरे दर्जे की नागरिकता साबित नहीं करता।

असहिष्णुता की बहस काफी पहले शुरू हो चुकी थी

नजीब जंग पहले व्यक्ति नहीं हैं, जिन्होंने मोदी सरकार के दौर में देश की दिशा को लेकर चिंता जताई हो। दरअसल यह बहस मोदी के प्रधानमंत्री बनने के एक साल के भीतर ही राष्ट्रीय मुद्दा बन गई थी। 2015 और फिर 2017 में कई बड़े नामों ने भारत में असहिष्णुता और मुसलमानों में असुरक्षा की भावना की बात कही थी।

इनमें सबसे बड़ा नाम पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का था। अगस्त 2017 में अपना कार्यकाल खत्म होने के करीब उन्होंने कहा था कि देश के कई मुसलमान बेचैन और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि उन्होंने यह मुद्दा प्रधानमंत्री मोदी और सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों के सामने उठाया था।

बॉलीवुड में भी मुस्लिमों पर बहस

हामिद अंसारी के बयान से पहले बॉलीवुड के कई बड़े चेहरे भी इस बहस का हिस्सा बन चुके थे। नवंबर 2015 में शाहरुख खान ने भारत में बढ़ती असहिष्णुता की बात कही थी। अपने 50वें जन्मदिन के आसपास दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि समाज में धार्मिक असहिष्णुता बढ़ रही है। उनका बयान तुरंत राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गया।

इसके कुछ समय बाद अभिनेता आमिर खान ने रामनाथ गोयनका पत्रकारिता पुरस्कार समारोह में इससे भी ज्यादा बड़ा बयान दिया था। आमिर खान ने कहा था कि उनकी पत्नी और फिल्ममेकर किरण राव ने एक समय देश छोड़ने तक की बात कही थी, क्योंकि उन्हें माहौल को लेकर डर महसूस हो रहा था और बच्चों की सुरक्षा की चिंता थी।

आमिर ने कहा था कि उनकी पत्नी रोज अखबार पढ़कर तनाव महसूस करती थीं और समाज में बढ़ते तनाव से परेशान थीं। इस बयान पर जमकर चर्चा हुई। टीवी डिबेट और अखबारों में कई दिनों तक यही मुद्दा छाया रहा।

महत्वपूर्ण बात यह है कि ये चेतावनियाँ नई नहीं हैं। लगभग एक दशक पहले भी यही बातें कही गई थीं कि मुसलमान असुरक्षित हैं, लोकतंत्र खत्म हो रहा है और देश असहिष्णु बनता जा रहा है, लेकिन भारत की सामाजिक और राजनीतिक तस्वीर उन भविष्यवाणियों से काफी अलग रही।

बारह साल बाद क्या मुसलमान दूसरे दर्जे के नागरिक बन गए?

यहीं से बहस गंभीर हो जाती है। अगर सिर्फ राजनीतिक भाषणों और टीवी बहसों को देखा जाए, तो ऐसा लग सकता है कि भारत में मुसलमानों ने अपने सारे अधिकार खो दिए हैं, जबकि जमीन की सच्चाई कुछ और कहानी बताती है।

मुसलमान आज भी खुलकर चुनाव में वोट डालते हैं। मुस्लिम नेता और पार्टियाँ अलग-अलग राज्यों में चुनाव लड़ती और जीतती हैं। मुसलमान व्यापार कर रहे हैं, संपत्ति खरीद रहे हैं, बड़े विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं और फिल्मों से लेकर खेल, नौकरशाही और कानून तक हर क्षेत्र में काम कर रहे हैं।

शाहरुख खान आज भी सुपरहिट फिल्में दे रहे हैं। आमिर खान भी अपने बच्चों के साथ भारत में ही रह रहे हैं, भले ही उनका अपनी पत्नी से तलाक हो चुका हो।

कुल मिलाकर भारत में आज भी मुस्लिम अभिनेता बॉलीवुड पर प्रभाव रखते हैं, मुस्लिम उद्योगपति हैं, मुस्लिम जज हैं, मुस्लिम पत्रकार हैं, मुस्लिम खिलाड़ी हैं और मुस्लिम सिविल सेवक भी हैं। देशभर में मस्जिदें सुरक्षित हैं, ईद-बकरीद राष्ट्रीय स्तर पर मनाई जाती है और इस्लामिक संस्थाएँ कानूनी रूप से काम कर रही हैं।

भारत के मुसलमान उसी तरह जीवन जी रहे हैं जैसे हिंदू, बौद्ध, जैन और ईसाई समुदाय के लोग जीते हैं। लेकिन जब प्रभावशाली लोग बार-बार यह कहते हैं कि मुसलमान जल्द ही दूसरे दर्जे के नागरिक बन जाएँगे, तो इससे समुदाय के भीतर डर और असुरक्षा की भावना बढ़ती है।

2014 के बाद से यह बात इतनी बार दोहराई गई कि कई लोगों के लिए यह एक राजनीतिक नारा बन गया। यह जमीन पर दिखने वाली वास्तविकता नहीं है। कई लोग यह भी तर्क देते हैं कि अगर सरकार सच में मुसलमानों को पूरी तरह हाशिए पर धकेलना चाहती हैं, तो वह मुस्लिम समुदाय के लिए योजनाएँ और कल्याणकारी कदम नहीं उठाती।

मुसलमानों को लेकर मोदी सरकार की पहल

दिलचस्प बात यह है कि जहाँ आलोचक मोदी सरकार पर मुसलमानों की अनदेखी का आरोप लगाते हैं, वहीं बीजेपी सरकार ने मुस्लिम समुदाय खासकर महिलाओं और गरीब वर्ग के लिए कई कदम भी उठाए हैं।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण तीन तलाक के खिलाफ कानून था। मोदी सरकार ने इंस्टेंट ट्रिपल तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत पर रोक लगाने के लिए कानून बनाया। इस प्रथा में शौहर सिर्फ तीन बार तलाक बोलकर तुरंत अपनी बीवी को तलाक दे सकता था।

1 अगस्त 2019 को लागू हुए मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम के तहत इंस्टेंट ट्रिपल तलाक को अवैध और अमान्य घोषित किया गया। साथ ही इसे आपराधिक अपराध बनाया गया, जिसमें शौहर को तीन साल तक की जेल की सजा का प्रावधान रखा गया।

सरकार के समर्थकों ने इसे मुस्लिम महिलाओं के लिए बड़ा सामाजिक सुधार और लैंगिक न्याय बताया, हालाँकि कई कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों ने इसका विरोध भी किया था, फिर भी बीजेपी सरकार ने यह कानून लागू किया।

इसके अलावा 2025 में ईद से पहले बीजेपी ने सौगात-ए-मोदी अभियान भी शुरू किया था। इस कार्यक्रम के तहत देशभर में करीब 32 लाख गरीब मुस्लिम परिवारों को खाने-पीने और रोजमर्रा की जरूरतों का सामान देने का दावा किया गया।

इन किट्स में सेवइयाँ, खजूर, चीनी, ड्राई फ्रूट्स, कपड़े और ईद से जुड़ी दूसरी चीजें शामिल थीं। महिलाओं को सूट का कपड़ा और पुरुषों को कुर्ता-पायजामा दिया गया। बीजेपी ने इसे गरीब मुस्लिम परिवारों तक सीधे पहुँचने और ईद से पहले सहायता देने की कोशिश बताया।

सरकार समर्थक इसी आधार पर सवाल उठाते हैं कि अगर मुसलमानों को सच में दूसरे दर्जे का नागरिक बनाया जा रहा होता, तो क्या सरकार मुस्लिम महिलाओं और गरीब मुस्लिम परिवारों के लिए अलग योजनाओं पर इतना राजनीतिक और आर्थिक ध्यान देती?

बारह साल की चेतावनियाँ, लेकिन भारत अब भी वही लोकतंत्र

2014 से अब तक भारत में बार-बार यह कहा गया है कि मुसलमान समाज में अपनी जगह खोने वाले हैं। वामपंथी बुद्धिजीवियों पर आरोप लगता रहा है कि वे मुसलमानों के भीतर खतरे की भावना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं, ताकि बीजेपी को सांप्रदायिक पार्टी बताकर मुस्लिम वोट बैंक को अपने साथ बनाए रखा जा सके।

लेकिन पीएम मोदी के करीब 12 साल के शासन के बाद भी भारत के मुसलमानों के पास संवैधानिक अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, वोट देने का अधिकार और सार्वजनिक जीवन में मौजूदगी बनी हुई है।

इससे कई लोग यह सवाल उठाते हैं कि जब एक दशक से ज्यादा समय तक बार-बार डर की वही भविष्यवाणियाँ दोहराई जाएँ और फिर भी वैसी स्थिति जमीन पर दिखाई न दे, तो क्या डर को एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया?

कई विश्लेषकों का मानना है कि शायद इसी वजह से कई वामपंथी दल और खुद को मुसलमानों का रक्षक बताने वाले राजनीतिक समूह हाल के वर्षों में चुनावों में कमजोर होते गए हैं। मुस्लिम मतदाता भी अब डर आधारित राजनीति से बाहर निकलकर अपने हितों को अलग नजरिए से देखने लगे हैं।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)