पिछले कुछ सालों में यह देखा गया है कि पश्चिमी देशों में कुछ असफल या हाशिये पर जा चुके नेता अपनी राजनीतिक मौजूदगी बनाए रखने के लिए भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधने लगे हैं। ऐसा लगता है कि वे किसी खा वोट बैंक को खुश करने, अपनी कमजोर होती राजनीतिक जमीन को फिर से मजबूत करने या उन विचारधारा वाले समूहों का साथ देने के लिए ऐसा करते हैं, जो लंबे समय से भारत-विरोधी नैरेटिव पर टिके हुए हैं।
संतुलित वैश्विक चर्चा में भाग लेने के बजाए, ये नेता भारत से जुड़ी घटनाओं को उठाकर एकतरफा या बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं। कई बार उनके बयानों में जमीनी हकीकत की पूरी समझ दिखाई नहीं देती, लेकिन फिर भी वे गंभीर आरोप लगाने से पीछे नहीं हटते।
इस क्रम में ताजा उदाहरण ब्रिटेन के लेस्टर से पूर्व सांसद क्लॉडिया वेब्बे का है। उन्होंने हाल ही में सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘एक्स’ पर 12 फरवरी 2026 को भारत में कथित ‘ 30 करोड़’ कर्मचारियों की हड़ताल को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी। एक पोस्ट में उन्होंने मोदी सरकार पर तानाशाही रवैया अपनाने का आरोप लगाया। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर पश्चिमी मीडिया की चुप्पी दरअसल एक तरह की मिलीभगत है।
12 फरवरी को क्या हुआ था?
दरअसल, गुरुवार (12 फरवरी 2026) को देशभर में ट्रेड यूनियनों और किसान संगठनों ने राष्ट्रव्यापी हड़ताल यानी भारत बंद का आह्वान किया। इस बंद में कोयला खदानों, रिफाइनरी, फैक्टरियों, बैंकों और परिवहन क्षेत्र के कर्मचारियों ने हिस्सा लिया। यह हड़ताल केंद्रीय ट्रेड यूनियनों जैसे CITU , AITUC, AICCTU, और HMS के आह्वान पर की गई थी।
किसान संगठनों जैसे संयुक्त किसान सभा (SKM) और ऑल इंडिया एग्रीकल्चरल वर्कर्स यूनियन (AIAWA) ने भी इस हड़ताल का समर्थन किया और इसमें भाग लिया। देश के कई राज्यों में प्रदर्सन हुए, जहाँ प्रदर्शनकारी जिला मुख्यालयों और गाँवों में इकट्ठा हुए। उन्होंने अंतरिम भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते और नए श्रम कानूनों के खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर की।
कलॉडिया वेब्बे ने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘एक्स’ पर पीपल्स डिस्पैच से लिया गया एक प्रदर्शन का वीडियो साझा किया। इसके साथ उन्होंने लिखा, “30 करोड़ मजदूरों ने अभी भारत को बंद कर दिया है। यह मानव इतिहास की सबसे बड़ी हड़ताल है, लेकिन पश्चिमी मीडिया ने इस पर मुश्किल से कोई बात की है। यह चुप्पी दरअसल मजदूरों के अधिकारों के खिलाफ मोदी की लड़ाई में साथ देने जैसा है।” वेब्बे ने यह भी लिखा कि भारत की यह आम हड़ताल वही भविष्य है, जिससे अरबपति और सत्ताधारी वर्ग सबसे ज्यादा डरते हैं।”
300 million workers just shut down India.
— Claudia Webbe (@ClaudiaWebbe) February 13, 2026
The largest strike in human history, and most of the Western media barely whispered it. That silence is complicity in Modi’s war on workers’ rights.
India’s general strike is the future that the billionaires and ruling class fears most pic.twitter.com/5vh5eRrVfR
सीधे शब्दों में कहें तो वेब्बे यह कहना चाह रही थीं कि भारत में इतिहास की सबसे बड़ी हड़ताल हुई है। उनका इशारा था कि पश्चिमी मीडिया ने जानबूझकर इस खबर को नजरअंदाज किया, ताकि मोदी सरकार को बचाया जा सके। उन्होंने यह भी जताया कि यह विरोध प्रदर्शन आम लोगों का आंदोलन है, जो कॉरपोरेट हितों और तानाशाही शासन के खिलाफ खड़ा हुआ है।
’30 करोड़’ वाले दावे की सच्चाई क्या है?
हालाँकि, ’30 करोड़’ लोगों के शामिल होने का दावा बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया लगता है। इस तरह के बड़े आँकड़े अकसर अराजकतावादी सोच वाले समूह, विचारधारा प्रकाशन और कुछ राजनीतिक लोग दोहराते हैं, ताकि हालात को ज्यादा गंभीर दिखाया जा सके। भारत की आबादी 140 करोड़ से ज्यादा है।
इतने बड़े देश में बड़े स्तर पर प्रदर्शन हो सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पूरा देश ठप हो गया हो। हर विरोध प्रदर्शन को ‘अभूतपूर्व’ बताना या उसे व्यवस्था के पूरी तरह टूटने का सबूत कहना सही तस्वीर पेश नहीं करता। ऐसे दावे लोगों को गुमराह कर सकते हैं।
Apparently, 300 million (30 crore) workers in India went on strike and the country didn't come to a stand-still but a Brit sitting 1000's of kms away is telling the world she knows India more than the Indians. https://t.co/NDAaz5ERCz
— Stop Hindu Hate Advocacy Network (SHHAN) (@HinduHate) February 14, 2026
विरोध प्रदर्शन, चाहे वे बड़े ही क्यों न हों, लोकतंत्र की असफलता का संकेत नहीं होते। बल्कि वे लोकतंत्र का ही एक हिस्सा है। भारत में समय-समय पर ट्रेड यूनियन, किसान, छात्र और विभिन्न राजनीतिक दल अपने मुद्दों को लेकर प्रदर्शन करते रहते हैं। इसके बावजूद अधिकतर जगहों पर सरकारी दफ्तर चलते रहते हैं, बाजार खुले रहते हैं और आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी सामान्य रूप से चलती रहती है। किसी हड़ताल या प्रदर्शन को तानाशाही व्यवस्था के टूटने का सबूत बताना लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक कार्यप्रणाली को नजरअंदाज करना है।
पश्चिमी मीडिया की ‘चुप्पी’ का दावा
वेब्बे का यह आरोप भी सवालों के घेरे में है कि पश्चिमी मीडिया की चुप्पी का मतलब मोदी सरकार का साथ देना है। जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सत्ता में आए हैं, तब से कई पश्चिमी मीडिया संस्थानों ने उनकी सरकार पर कड़े और आलोचनात्मक लेख प्रकाशित किए हैं। नागरिकता कानून, आर्थिक सुधारों और यहाँ तक कि कोविड-19 से निपटने को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने नई दिल्ली से सवाल पूछने और आलोचना करने में हिचक नहीं दिखाई।
अकसर यह भी देखा गया है कि पश्चिमी मीडिया भारत की खबरों को खासतौर पर नकारात्मक तरीके से पेश करता है, भले ही भारत ने वही नीतियाँ अपनाई हों जो दूसरे देशों ने भी अपनाई थीं। यह बात खासतौर पर भारत के कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान साफ नजर आई। ब्रिटेन के अखबार द गार्जियन ने 04 अप्रैल 2020 को एक खबर में शीर्षक दिया था, ‘मैं बस घर जाना चाहता हूँ: मोदी के कड़े लॉकडाउन से प्रभावित लाखों लोगों की बेबसी।’ इस शीर्षक में इस्तेमाल किया गया ‘कड़ा’ शब्द खासतौर पर ध्यान खींचने वाला था।
वहीं दूसरी ओर, जब अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में लगाए गए लॉकडाउन की बात की गई, तो भाषा और लहजा साफतौर पर अलग नजर आया। एक लेख में उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से महामारी से लड़ने के लिए पूरा देश बंद करने की अपील की गई थी। ऑस्ट्रेलिया के मामले में अखबार ने लॉकडाउन को एक जरूरी कदम बताते हुए सीधे और सामान्य ढंग से खबर प्रकाशित की। वहीं अपने ही देश ब्रिटेन में लगाए गए लॉकडाउन को ‘जरूरी संकट’ बताया गया।
यहाँ अंतर साफ दिखाई देता था। ब्रिटेन में आए संकट को जहाँ ‘जरूरी’ बताया गया, वहीं भारत में वैसी ही मुश्किलों को ‘क्रूर’ कहा गया। इस तरह चुने हुए शब्दों के इस्तेमाल से एक खास सोच या झुकाव नजर आता है। जब पूरी दुनिया एक ही महामारी से जूझ रही थी, तब भी भारत को ज्यादा नकारात्मक तरीके से पेश किया गया।
ऐसे में यह कहना कि पश्चिमी मीडिया को मोदी सरकार की आलोचना करने का मौका नहीं मिला या उसने जानबूझकर चुप्पी साध ली, तर्कसंगत नहीं लगता। अगर सच में पूरे देश में ठप जैसी स्थिति होती, तो इसकी खबरें दुनिया भर में बड़े स्तर पर दिखाई जातीं।
क्या इस हड़ताल ने भारत ठप पड़ा?
देश के अलग-अलग राज्यों से आई कई खबरों में बताया गया कि सामान्य जीवन पर ज्यादा असर नहीं पड़ा। झारखंड में बाजार खुले रहे और गाड़ियाँ सामान्य रूप से चलती रहीं। छत्तीसगढ़ में बैंकों और कुछ खनन कार्यों पर असर जरूर पड़ा, लेकिन परिवहन और दुकानें सामान्य ढंग से चलती रहीं। तमिलनाडु में विरोध प्रदर्शन के बावजूद रेल और सड़क सेवाएँ जारी रहीं। यहाँ तक कि केरल में भी कुछ लोगों ने बंद को सीमित असर वाला बताया।
ओडिशा, केरल, गोवा, मध्य प्रदेश और पंजाब में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली। यूनियन से जुड़े लोगों ने प्रदर्शन किए, लेकिन पूरे देश में ठप जैसी स्थिति नहीं बनी। ज्यादातर शहरों और कस्बों में आम जिंदगी बिना किसी बड़े व्यवधान के चलती रही।
अगर हड़ताल ने सच में पूरे भारत को उसी तरह बंद कर दिया होता, जैसा दावा किया गया तो यह खबर दुनिया भर की बड़ी सु्र्खियाँ बनती। लेकिन ऐसा व्यापक और नाटकीय कवरेज देखने को नहीं मिली। इससे यह संकेत मिलता है कि सोशल मीडिया पर इस घटना के पैमाने को शायद वास्तविकता से ज्यादा बढ़ाकर पेश किया गया।
अरबपति वाली बयानबाजी
वेब्बे की आखिरी पंक्ति, जिसमें उन्होंने कहा कि ‘अरबपति और सत्ताधारी वर्ग’ इस हड़ताल से डरते हैं, एक जानी-पहचानी वैचारिक सोच को दिखाती है। अमीर उद्योगपतियों और कारोबारियों को खलनायक की तरह पेश करना वामपंथी राजनीति की पुरानी शैली रही है। आर्थिक असमानता पर बहस करना पूरी तरह जायज है, लेकिन हर आर्थिक सुधार को ‘पीड़ित जनता बनाम बुरे अरबपति’ की लड़ाई के रूप में दिखाना जटिल नीतिगत मुद्दों को सिर्फ भावनात्मक नारों में बदल देना है।
पिछले एक दशक में भारत की आर्थिक वृद्धि, बुनियादी ढाँचे का विस्तार और डिजिटल बदलाव सरकार और निजी क्षेत्र की साझेदारी से ही आगे बढ़े हैं। इसे किसी गुप्त या खतरनाक गठजोड़ की तरह दिखाना उन लाखों की अनदेखी करना है, जो गरीबी से बाहर आए हैं और जिन तक सामाजिक कल्याण योजनाओं का लाभ पहुँचा है।
सेलिब्रिटी का दखल और प्रोपेगेंडा
यह पहली बार नहीं है जब अंतरराष्ट्रीय हस्तियों ने भारत के अंदरूनी मुद्दों पर टिप्पणी की हो। साल 2021 में कृषि कानूनों के खिलाफ हुए किसान आंदोलनों के दौरान भी कई विदेशी हस्तियों ने अपनी राय दी थी। पॉप स्टार रिहाना और पूर्व एडल्ट फिल्म अभिनेत्री मिया खलीफा ने प्रदर्शनकारियों के समर्थन में ट्वीट किए थे।
why aren’t we talking about this?! #FarmersProtest https://t.co/obmIlXhK9S
— Rihanna (@rihanna) February 2, 2021
अचानक से उनकी जटिल कृषि सुधारों जैसे विषय पर दिलचस्पी ने कई लोगों को हैरान कर दिया था। आलोचना का कहना था कि यह दखल वास्तव में भारतीय किसानों की सच्ची चिंता से ज्यादा, एक खास नैरेटिव को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलाने की कोशिश लग रही थी।
What in the human rights violations is going on?! They cut the internet around New Delhi?! #FarmersProtest pic.twitter.com/a5ml1P2ikU
— Mia K. (@miakhalifa) February 3, 2021
आखिरकार कृषि कानूनों को वापस ले लिया गया, लेकिन कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि लंबे समय में कृषि क्षेत्र के आधुनिकीकरण के लिए सुधार जरूरी थे। इस पूरे घटनाक्रम ने यह दिखाया कि अंतरराष्ट्रीय आवाजें कभी-कभी ऐसे मुद्दों को भी बढ़ा देती हैं, जिन्हें पूरी तरह समझा नहीं गया होता।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का एंगल
ध्यान देने वाली बात यह भी बहै कि 12 फरवरी 2026 का यह तथाकथित विरोध प्रदर्शन काफी हद तक भारत-अमेरिका के अंतरिम व्यापार ढाँचे को लेकर उठी चिंताओं से जुड़ा था। कुछ समूहों ने दावा किया कि यह समझौता भारतीय किसानों के लिए नुकसानदेह होगा, क्योंकि इससे अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए भारतीय बाजार खुल जाएगा।
हालाँकि, यह कहना सही नहीं है कि भारत ने पहले ही ऐसा कोई समझौता कर लिया है, जिसमें कृषि उत्पादों पर शुल्क शून्य कर दिया गया हो। यह दावा गलत है। वास्तव में अभी सिर्फ एक व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में बातचीत का ढाँचा तैयार किया गया है। कोई अंतिम समझौता अभी तक साइन नहीं हुआ है।
संयुक्त बयान में कुछ चुने हुए औद्योगिक सामानों और कुछ कृषि उत्पादों पर शुल्क कम करने या खत्म करने की बात कही गई है। इन कृषि उत्पादों में ड्राइड डिस्टिलर्स ग्रेन्स, लाल ज्वार, पेड़ से मिलने वाले मेवे, प्रोसेस्ड फल, सोयाबीन तेल, वाइन और अन्य पेय पदार्थ शामिल हैं। ये ज्यादातर ऐसे उत्पाद हैं, जिन्हें भारत अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए पहले से ही आयात करता है। चावल और गेहूँ जैसे मुख्य खाद्यान्न इस समझौते का हिस्सा नहीं है।
भारत पहले से ही घरेलू कमी को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में कृषि उत्पादों का आयात करता है, खासकर खाद्य तेल और दालें। दरअसल, भारत दालों का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक और आयातक दोनों है। हर साल अरबों डॉलर के आयात से देश की खाद्य सुरक्षा बनाए रखने में मदद मिलती है।
निष्कर्ष
पूरी तस्वीर यह दिखाती है कि राजनीतिक मकसद से किस तरह कहानियाँ और नैरेटिव गढ़े जा सकते हैं। विदेशों में हाशिये पर चले गुए कुछ नेता और देश के भीतर कुछ वैचिारक समूह कई बार बढ़ा-चढ़ाकर दावे करते हैं, ताकि भारत को नकारात्मक रूप में पेश किया जा सके। विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का हिस्सा होते हैं, किसी व्यवस्था के टूटने का सबूत नहीं। इसी तरह व्यापार समझौते जटिल बातचीत का परिणाम होते हैं, न कि कोई गुप्त साजिश।
आर्थिक सुधारों का विरोध करने वाले कम्युनिस्ट दलों और उनसे जुड़े संगठनों का रुख भी अकसर एक जैसा रहा है। जैसे उन्होंने कृषि कानूनों का विरोध किया था, वैसे ही अब वे व्यापार समझौतों और श्रम सुधारों का भी विरोध कर रहे हैं। विकास, सुधार और वैश्विक साझेदारी की प्रक्रिया में वैचारिक विरोध होना स्वाभाविक है। लेकिन हर कदम को तानाशाही हमला बताना शायद भारत की हकीकत से ज्यादा राजनीतिक सोच को दर्शाता है।
(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)


