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‘अहमियत नहीं मिलने से नाराज हैं कार्यकर्ता’: हिमाचल कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष प्रतिभा सिंह ने लोकसभा चुनाव लड़ने से किया इनकार, पेशोपेश में नेतृत्व

कॉन्ग्रेस अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। पार्टी में ना सिर्फ भगदड़ मची है, बल्कि जिन उम्मीदवारों को लोकसभा चुनाव 2024 का टिकट मिल रहा है, वो भी चुनाव लड़ने से मना कर रहे हैं। हिमाचल प्रदेश राजपरिवार की प्रमुख और कॉन्ग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह ने लोकसभा चुनाव लड़ने से मना कर दिया है। उन्होंने इसकी सूचना पार्टी अध्यक्ष को दे दी है।

दरअसल, कॉन्ग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह को मंडी संसदीय क्षेत्र से अपना उम्मीदवार बनाया था। उन्होंने इस क्षेत्र से चुनाव लड़ने से साफ मना कर दिया। हिमाचल प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि राज्य में सरकार रहते हुए कार्यकर्ताओं के लिए कुछ नहीं किया गया। ऐसे में कार्यकर्ता कॉन्ग्रेस को कैसे वोट देंगे। उन्हें प्रदेश में अहमियत नहीं मिल रही है।

उन्होंने कहा, “हमारे सामने छह विधायकों के रूप में एक नई चुनौती है, जिन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया गया है। उपचुनाव होने जा रहे हैं। इन छह सीटों पर चुनाव होना है और हमें सभी पर जीत हासिल करनी है। इन्हें जिताना मेरी जिम्मेदारी है। यही कारण है कि मैंने मंडी से अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली। पहले स्थिति बहुत अलग थी।” बता दें कि हिमाचल में अंतिम चरण में मतदान होना है।

मंडी से सांसद प्रतिभा सिंह ने बुधवार (20 मार्च 2024) को कहा कि उन्होंने लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया है, क्योंकि जमीनी स्थिति ठीक नहीं है। उन्होंने कहा, “मैंने राज्य के हर क्षेत्र का व्यापक दौरा किया और पाया कि कोई भी कार्यकर्ता सक्रिय नहीं है। ऐसी स्थिति में सफलता मुश्किल है। आप सिर्फ सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास (MPLAD) योजना निधि बाँटकर चुनाव नहीं जीत सकते।”

पूर्व बुशहर रियासत की महारानी प्रतिभा सिंह ने कहा, “मैंने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है, क्योंकि मैं इसे लड़ने की स्थिति में नहीं हूँ। पार्टी के कार्यकर्ता नाराज हैं, क्योंकि उनके लिए कुछ नहीं किया गया है। किसी भी चुनाव में पार्टी कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका होती है। मैंने कई बार कहा कि कार्यकर्ताओं को महत्व देना जरूरी है, तभी हम प्रतिद्वंद्वी का मुकाबला कर सकते हैं।”

प्रतिभा सिंह ने कहा कि उन्होंने अपने निर्णय के बारे में पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को बता दिया है। उन्होंने कहा कि वे प्रदेश अध्यक्ष हैं, इसलिए सिर्फ एक सीटों तक केंद्रित नहीं रह सकती हैं। उन्हें पूरे राज्य की स्थिति देखनी है। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्रीय नेतृत्व को उन्होंने मंडी के लिए कौल सिंह ठाकुर का नाम सुझाया है, क्योंकि वे इस क्षेत्र में जाने माने नेता हैं और उन्हें जमीनी हकीकत की अच्छी समझ है।

वर्ष 2021 में मंडी संसदीय क्षेत्र से उपचुनाव जीतने वाली प्रतिभा सिंह ने कहा, “जहाँ तक बाकी टिकटों का सवाल है, हमारे पास अभी समय है। हिमाचल प्रदेश में 1 जून 2024 को मतदान है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने भी बैठक में कहा कि हमारे पास अभी समय है। कुछ दिनों में हम लोकसभा और विधानसभा की सीटों के लिए उम्मीदवार तय कर लेंगे।”

अभी कुछ ही समय पहले पार्टी के 6 बागी विधायकों को विधानसभा से बर्खास्त कर दिया गया था। धर, प्रतिभा सिंह के बेटे एवं कैबिनेट मंत्री विक्रमादित्य सिंह भी बीते दिनों राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार से इस्तीफा दे दिया था। वे सरकार के खिलाफ काफी मुखर थे। हमीरपुर, कांगड़ा और शिमला में मजबूत प्रत्याशियों की तलाश कर रही कॉन्ग्रेस के लिए मंडी एक नई मुसीबत बन गई है। 

अरुणाचल भारत का हिस्सा, चीन की घुसपैठ का करते हैं कड़ा विरोध: अमेरिकी विदेश मंत्रालय

अमेरिका के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत में चीन की घुसपैठ का वह विरोध करता है। उसने कहा है कि LAC (लाइन ऑफ़ एक्चुअल कण्ट्रोल) के पार की जाने वाली गड़बड़ी के वह पूरी तरह से विरोध में है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि अरुणाचल प्रदेश को वह भारत का हिस्सा मानता है।

अमेरिकी विदेश मंत्रालय के उप प्रवक्ता वेदांत पटेल ने अरुणाचल प्रदेश में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दौरे पर चीन की टिप्पणी को लेकर एक प्रश्न के उत्तर में कहा, “अमेरिका अरुणाचल प्रदेश को भारत की जमीन मानता है और LAC के पार सैन्य घुसपैठ या अतिक्रमण से अपनी जमीन बढ़ाने के दावे के एकतरफ़ा प्रयास का पूरी तरीके से विरोध करता हैं।”

गौरतलब है कि हाल ही में पीएम मोदी ने अरुणाचल प्रदेश का दौरा किया था। इस दौरान उन्होंने रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण सेला सुरंग समेत तमाम परियोजनाओं का उद्घाटन और लोकार्पण किया था। सेला दुनिया की सबसे ऊँचाई पर बनी सुरंग है। पीएम मोदी ने इस दौरान पूर्वोत्तर में किए गए अन्य विकास कार्यों का भी ब्यौरा दिया था।

पीएम मोदी के इस दौरे के बाद चीन के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता कर्नल झांग ज़ियाओगांग ने कहा था कि जिजांग (तिब्बत का भाषा में नाम) का दक्षिण का क्षेत्र चीन का पारम्परिक रूप से हिस्सा है। उन्होंने कहा था कि भारत ने अरुणाचल प्रदेश को अवैध रूप से स्थापित किया है और बीजिंग इसे कभी नहीं मानेगा।

हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब चीन अरुणाचल प्रदेश में घुसपैठ या उस पर अपना दावा जताता आया हो। चीन लगातार अरुणाचल प्रदेश के इलाकों में घुसपैठ करता है और उसे तिब्बत का एक हिस्सा बताता है। वह अरुणाचल प्रदेश के नागरिकों को ‘नत्थी वीजा’ देता है। चीन ने 1950 के दशक में बौद्धों को भगा कर तिब्बत पर कब्जा कर लिया था और अब उसका दावा है कि अरुणाचल उसकी तिब्बत का एक हिस्सा है। भारत ने चीन को हमेशा इस मामले में कड़ा जवाब दिया है।

चीनी रक्षा मंत्रालय की इस टिप्पणी के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी स्पष्ट रूप से जवाब दिया था। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, ” हमारे ध्यान में चीनी प्रवक्ता द्वारा की गई टिप्पणियाँ आई हैं। चीनी रक्षा अरुणाचल प्रदेश को लेकर बेतुके दावे कर रहा है। इस बारे में बार-बार एक ही तरह के दावे दोहराने से इस दावे को कोई सच नहीं मान लेगा। अरुणाचल प्रदेश भारत का अविभाज्य हिस्सा था, है और हमेशा ही रहेगा। अरुणाचल प्रदेश के निवासियों को हमारे इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का लाभ लगातार मिलता रहेगा।”

गौरतलब है कि चीन लद्दाख और उत्तराखंड वाले क्षेत्र में भी लगातार सीमा पर गड़बड़ी करता रहता है। वह लगातार इन हिस्सों को अपना बताने का दावा करता है। हालाँकि, भारत ने उसके सभी दावे नकारते हुए इन सभी इलाकों में सेना की मजबूत तैनाती कर रखी है।

सेंसर बोर्ड में अटक गई वीर सावरकर पर रणदीप हुड्डा की फिल्म? – सोशल मीडिया में केंद्रीय मंत्री को क्यों टैग कर रहे यूजर्स, जानिए

अभिनेता रणदीप हुड्डा महान स्वतंत्रता सेनानी वीर विनायक दामोदर सावरकर के जीवन पर फिल्म लेकर आए हैं। ‘स्वातंत्र्य वीर सावरकर’ फिल्म का निर्देशन भी उन्होंने ही किया है। गहन शोध के बाद बनाई गई इस फिल्म के लिए उन्होंने खासी मेहनत की है। कालापानी के दौर को पर्दे पर जीवंत करने के लिए रणदीप हुड्डा को अपने शरीर को काफी कमजोर करना पड़ा। हालाँकि, अब खबर आ रही है कि सेंसर बोर्ड में ये फलम अटक गई है, इसकी रिलीज को लेकर अनिश्चितता है।

फिल्म कारोबार विश्लेषक सुमित काडेल ने एक ट्वीट के जरिए बताया, “कई सूत्रों से मुझे ये सुनने को मिल रहा है कि ‘स्वातंत्र्य वीर सावरकर’ का सेंसर सर्टिफिकेट जानबूझकर रोक दिया गया है। इस कारण इसके कई शो रद्द हो रहे हैं। इससे फिल्म की रिलीज में बाधा आ सकती है और इसके प्रदर्शन का जो अधिकार है उसे नकारा जा सकता है। इससे संबद्ध संस्थाओं को इसकी अच्छी तरह जाँच करनी चाहिए। उन्हें कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि न्याय हो।”

सुमित काडेल ने कहा कि कलात्मक स्वतंत्रता को बनाए रखने और फिल्म निर्माण प्रक्रिया की अखंडता की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए। उन्होंने ये आशंका भी जताई कि जब हिंदी सेंसर को इतने लंबे समय तक रोक कर रखा गया है तो मराठी के लिए अप्लाई करने का समय ही नहीं होगा। उन्होंने कहा कि अगर इस कारण फिल्म मराठी भाषा में रिलीज नहीं हो पाती है तो ये त्रासद होगा। बता दें कि वीर सावरकर मराठी ही थे।

इस खबर के सामने आने के बाद लोगों ने केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर को टैग कर के हस्तक्षेप करने की माँग की। ‘मिस्टर सिन्हा’ नामक ट्विटर हैंडल ने कहा कि ये परेशान करने वाला है। उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि वामपंथी इकोसिस्टम सेंसर बोर्ड का प्रबंधन कर रहा है। उन्होंने बताया कि पिछले कुछ हफ़्तों में ये दूसरी ऐसी घटना है। बता दें कि लेफ्ट लॉबी वीर सावरकर का विरोध करती है और उनके योगदानों को नकारती है, क्योंकि उन्होंने हिंदुत्व के लिए आवाज़ उठाई।

साँस नली कटी हुई, सर पर कट, गले पर वार, कंधा हड्डी तक कटा हुआ: पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट खौफनाक, हाथ-उँगलियों के निशान बता रहे हिंदू बच्चों के साहस-संघर्ष

बदायूँ में आयुष और आहान मर्डर केस की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई है। ये रिपोर्ट बताती है कि बच्चों को किस खौफनाक तरीके से मारा गया। हत्यारों ने आयुष और आहान का गला रेतने के साथ ही 23 वार और भी किए। आयुष के शरीर पर 14 जगहों पर काटने के निशान मिले हैं, जो ये बताता है कि आयुष ने खुद को बचाने के लिए कितना संघर्ष किया है। दोनों बच्चों का पोस्टमार्टम 20 तारीख की सुबह के समय किया गया। वहीं, हत्यारे साजिद का भी पोस्टमार्टम कर दिया गया, जिसके शरीर में गोलियों के तीन निशान मिले हैं।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक, हत्यारे साजिद ने तीनों बच्चों आयुष (13 वर्ष), युवराज (10 वर्ष) और आहान (8 वर्ष) को के गले पर वार किया। इस बीच युवराज घायल अवस्था में ही बचकर भाग निकला, लेकिन जबतक लोग मदद के लिए पहुँच पाते, उसने आयुष और आहान को मार डाला। आयुष के शरीर पर 14 जगहों पर काटने के निशान मिले हैं, तो हत्यारे साजिद ने 8 साल के आहान पर 9 जगहों पर काटा है। गला रेतने के साथ ही उसके गले को पीछे से भी काटा गया है, तो कान के ऊपर भी पीछे की तरफ चाकू घोंपा गया है। जो ये बताता है कि हत्यारे साजिद ने इनकी जान लेने के दौरान कोई बर्बरता नहीं छोड़ी।

इस हत्याकांड के समय सबसे बड़े बच्चे आयुष ने जमकर संघर्ष भी किया है। मीडिया रिपोर्ट्स ये बताती हैं कि हत्या की जगह दीवारों तक पर खून फैला मिला और बच्चों के उंगलियों के निशान भी मिले। क्योंकि आयुष ने गला कटने के बाद भी संघर्ष जारी रखा, जिसके बाद उसके हाथ पर, कंधे पर, सीने पर, गले पर पीछे से, उंगलियों पर, कलाई पर वार किया गया। उसके शरीर पर 2 सेमी से लेकर 7 सेमी गहरे घाव मिले हैं, जबकि गले को पाँच सेमी की गहराई तक 15 सेमी तक के कट लगे हैं। पोस्ट मार्टम रिपोर्ट बताती है कि आयुष के साथ किस तरह की जघन्यता बरती गई।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक, शरीर पर 14 जगहों पर घाव के निशान मिले हैं। कुछ निशान एक वार के हैं, तो कुछ की चौड़ाई इतनी ज्यादा है कि वो एक वार के दिखते नहीं। इस रिपोर्ट के मुताबिक…

पहला निशान: सामने से गले पर 15cmx5cm का सबसे बड़ा घाव, जिसकी वजह से गले से जुड़े कई अंग कट गए। स्वास नली भी छतिग्रस्त। ये घाव वैसे ही है, जैसे कसाई किसी जानवर को जिबह करता है।

दूसरा निशान : दाहिने कंधे पर पीछे की तरफ 6cm x 1cm का घाव। माँसपेशियों की गहराई तक।

तीसरा निशान: दाहिने कंधे के जोड़ पर 7cm गहरा और 4cm चौड़ा हड्डियों के अंदर तक घाव, मानों यहाँ कई वार हुए हों।

चौथा घाव : दाहिने हाथ पर ऊपर की तरफ की घाव, माँसपेशियों के अंदर तक।

पाँचवाँ घाव : दाहिनी कलाई से थोड़ा ऊपर बाहर की तरफ 4cm x 2cm का घाव

छठाँ निशान : दाहिनी कलाई में अंदर नीचे की तरफ से 5cm x 3cm का घाव, जो कलाई को हाथ से जोड़ता है, वहाँ पर माँसपेशियों के अंदर तक।

इसी तरह से सातवाँ घाव भी हाथ पर हुआ है, जिसमें निचली हथेली पर 4cm का घाव मिला है। आठवाँ वार दाहिने हाथ की अनामिका उंगली (रिंग फिंगर) पर, जो 2 सेमी गहरा है। नौंवाँ वार बाएँ हाथ के बीच की ऊंगली पर, लगभग ये उंगली भी कट चुकी है। दसवाँ वार बाएँ हाथ की हथेली पर हुआ है, अंदर हड्डियों की गहराई तक घाव हुआ।

11वाँ वार बाएँ कंधे पर अंदर की माँस पेशियों तक हुआ है, जो 6cm गहरा है।

12वाँ वार बाएँ कान के नीचे हड्डियों तक 3सेमी गहरा घाव मिला है।

13वाँ निशान 6cm गहरा और 1.5cm चौड़ा है, जो सिर में पीछे की तरफ है।

चौदहवाँ निशान दाहिने फेफड़े में पीछे की तरफ से 6cm x 4cm के बड़े घाव के रूप में मिला है, जिसमें चाकू अंदर की माँसपेशियों तक चला गया।

आयुष की पोस्टमार्टम रिपोर्ट

बरेली से गिरफ्तार हुआ जावेद

उत्तर प्रदेश के बदायूँ में दो हिन्दू बच्चों की हत्या के मामले में फरार जावेद को बरेली से गिरफ्तार कर लिया गया है। जावेद पर यूपी पुलिस ने ₹25,000 का इनाम रखा था। उसकी एक वीडियो भी सामने आई है, जो उसने एक ऑटो में बनाई है। उसने बताया है कि वह हत्या के बाद दिल्ली भाग गया था। हत्या करने वाला जावेद का भाई साजिद पहले ही पुलिस एनकाउंटर में मारा जा चुका है। पुलिस में इस विषय दर्ज करवाई गई FIR के अनुसार, जावेद साजिद के साथ बाइक पर आया था और उसने एक बच्चे पर हमला भी किया। हालाँकि, अभी पुलिस जावेद से पूछताछ कर रही है और अब इस मामले में आगे खुलासा होगा।

गौरतलब है कि 19 मार्च, 2024 की शाम को बदायूँ में नाई की दुकान चलाने वाले साजिद ने दो हिन्दू बच्चों आयुष और अहान की छुरी से रेत कर हत्या कर दी थी। साजिद यह हत्या करके फरार हो गया था। यूपी पुलिस ने साजिद को उसी दिन मुठभेड़ में मार गिराया था। घटना के दौरान मौजूद रहा साजिद का भाई जावेद फरार था। पुलिस की टीमें उसकी तलाश में दबिश दे रही थी। जावेद पर पुलिस ने ₹25,000 का इनाम भी घोषित किया था। हालाँकि वो बरेली से पकड़ा जा चुका है।

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार: सरकार का तर्क- 73 सालों से केंद्र ही देता आया है पद

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (21 मार्च 2024) को कहा कि चुनाव आयुक्तों (ECs) की हालिया नियुक्ति पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि लोकसभा चुनाव नजदीक है और इससे अराजकता फैल जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि संसद ने एक कानून बनाया है और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) वाली उस पैनल द्वारा ईसी के नए चयन का आदेश नहीं दे सकता।

शीर्ष न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना और दीपांकर दत्ता की खंडपीठ ने कहा कि वह CJI को छोड़कर चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री और विपक्ष के नेता वाले पैनल को निर्धारित करने वाले कानून की वैधता की जाँच करेगा, जैसा कि 2023 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में सुझाव दिया गया था। लेकिन, अभी नियुक्तियों पर रोक लगाने से संतुलन बिगड़ जाएगा।

यह टिप्पणी करते समय अदालत ने यह भी कहा कि नव-नियुक्त चुनाव आयुक्तों– ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू के खिलाफ कोई आरोप नहीं हैं। उन्हें नए कानून के तहत चयन समिति में बदलाव के बाद चुना गया है। हालाँकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में प्रक्रिया थोड़ी धीमी होनी चाहिए, क्योंकि पैनल के प्रत्येक सदस्य को उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि के बारे में पता होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि विपक्ष के नेता को शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों की योग्यता जाँचने के लिए चार या पाँच दिन का समय क्यों नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि वे चयनित चुनाव आयुक्त की साख पर सवाल नहीं उठा रहे हैं, बल्कि उस प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं जिसमें चयन किया गया था। हालाँकि, खंडपीठ ने यह भी कहा कि अदालत यह नहीं कह सकती कि सरकार किस तरह का कानून पास करे।

जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा कि ऐसा नहीं है कि इससे पहले चुनाव नहीं हुए। यह एक प्रक्रियात्मक प्रक्रिया प्रतीत होती है। अब उनकी नियुक्ति हो चुकी है और चुनाव नजदीक है। ऐसे में यह सुविधा के संतुलन का सवाल है। अदालत ने याचिकाकर्ता प्रशांत भूषण से यह भी कहा, “आप ये नहीं कह सकते कि चुनाव आयोग कार्यपालिका के कब्जे में है।”

दरअसल, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि) विधेयक 2023 को पिछले साल संसद में पारित किया गया था। इसके बाद राष्ट्रपति ने इसकी मंजूरी दे दी थी। नए कानून में चुनाव आयुक्तों को चुनने के लिए चयन समिति में CJI की जगह एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया है।

नए कानून को लागू होने के बाद चुनाव आयुक्तों की चयन समिति में अब प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और विपक्ष के नेता हैं। इस समिति में पहले प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश होते थे। इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने एक याचिका दाखिल करके नियुक्ति प्रक्रिया में खामियों की बात कही थी।

भूषण ने कहा कि 14 फरवरी को रिटायर हुए एक निर्वाचन आयुक्त की रिक्ति 9 मार्च को दिखाई गई। उसी दिन दूसरी रिक्ति भी दिखाई गई। उन्होंने दलील दी कि इसके अगले दिन अदालत द्वारा पारित किसी भी आदेश को रद्द करने के लिए 14 मार्च को दो चुनाव आयुक्तों को जल्दबाजी में नियुक्त किया गया। इसी दिन कोर्ट ने मामले को अंतरिम राहत पर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया था।

प्रशांत भूषण ने कहा कि चयन समिति ने शुरू में 200 से अधिक नाम दिए और फिर उसी दिन नामों को शॉर्टलिस्ट कर लिया गया। उन्होंने तर्क दिया कि यह ऐसे समय में हुआ जब कोर्ट ने 15 मार्च 2024 की तारीख को सुनवाई की तारीख तय की थी और उस दिन इस मामले की सुनवाई होने वाली थी।

कोर्ट ने पूछा कि आयुक्त को नियुक्ति करने वाली मौजूदा समिति (पीएम, कैबिनेट मंत्री और नेता विपक्ष) से क्या समस्या है। इस पर प्रशांत भूषण ने कहा कि नियुक्ति निष्पक्ष तरीके से नहीं हुई है। उन्होंने कहा, “सवाल प्रक्रिया पर है। हम ये नहीं माँग कर रहे हैं कि चुनाव टाल दिए जाएँ। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक, नई नियुक्ति होने तक उन्हें काम करने दिया जाए।”

इससे पहले बुधवार (20 मार्च 2024) को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा था कि पिछले 73 सालों से चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति केंद्र सरकार ही करती आ रही है। ऐसे में नई नियुक्ति पर विवाद क्यों किया जा रहा है? केंद्र ने तर्क दिया कि चयन समिति में न्यायिक सदस्य की मौजूदगी चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के लिए जरूरी नहीं है।

केंद्र सरकार की ओर से कानून एवं न्याय मंत्रालय द्वारा दायर हलफनामे में कहा गया कि चुनाव आयुक्त के रूप में सेवा देने के लिए सूची में नामित किसी भी व्यक्ति की योग्यता या क्षमता पर कोई आपत्ति नहीं उठाई गई थी। नव नियुक्त चुनाव आयुक्तों के खिलाफ कोई आरोप भी नहीं लगाए गए हैं। इसकी जगह राजनीतिक बयानबाजी करके विवाद पैदा करने की कोशिश की जा रही है।

‘हवा में उड़ गए जय श्री राम, ब्राह्मणवाद से आज़ादी’: JNU में PM मोदी के खिलाफ भी अपमानजनक नारे, वीडियो में लेफ्ट के साथ-साथ ‘लालटेन छाप’ भी दिखा

वामपंथ के गढ़ के रूप में कुख्यात JNU (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) एक बार फिर विवादों में है। यूनिवर्सिटी में हिन्दू विरोधी नारा लगाया गया है। इसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हो रहा है। वीडियो में ढपली बजाते हुए छात्र-छात्राएँ ‘मिले फुले-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम’ नारा लगाते हुए दिख रहे हैं। वीडियो रात के समय का है। साथ ही ‘ब्राह्मणवाद से आज़ादी’ और ‘फ्री फिलिस्तीन’ के नारे भी लगाए गए।

बता दें कि नब्बे के दशक (1993) में भाजपा के खिलाफ जब सपा-बसपा ने गठबंधन किया था तब दोनों दलों के समर्थक ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम’ नारा लगाया करते थे। कांशीराम बसपा के संस्थापक थे। JNU में इसके साथ ही ‘आज़ादी’ वाले नारे भी जम कर दोहराए गए। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर भी आपत्तिजनक नारे लगाए गए। उन्हें ‘चोर’ बताया गया। राजद समर्थक गर्व से इन वीडियोज को सोशल मीडिया में शेयर कर रहे हैं।

याद दिला दें कि ये वही JNU है जहाँ संसद भवन पर हमला करने वाले आतंकवादी के समर्थन में ‘अफजल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल ज़िंदा हैं’ के नारे लगे थे। साथ ही ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह-इंशाअल्लाह’ के नारे भी लगे थे। JNU में ही छात्र नेता रहे उमर खालिद ने फरवरी 2020 में दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगा भड़काया। JNU में 22 मार्च को छात्र संघ का चुनाव भी होने जा रहा है। यहाँ से लेफ्ट के छात्र नेता ही अब तक जीतते रहे हैं, लेकिन इस बार टक्कर कड़ी है।

ABVP ने वारंगल के उमेश चंद्र अजमीरा को मैदान में उतारा है, जो जनजातीय बंजारा समाज से आते हैं। जहाँ उनके पिता की नक्सलियों ने तभी हत्या कर दी थी जब उमेश 4 वर्ष के थे, वहीं जबरन धर्मांतरण की प्रताड़ना के कारण उनकी माँ भी चल बसी थीं। ताज़ा वीडियो तब का है, जब छात्र संघ के दावेदारों को सुनने के लिए भीड़ इकट्ठी हुई थी। इस पद के लिए इस बार 8 दावेदार हैं। दिसंबर 2022 में भी JNU में दीवारों पर ब्राह्मण विरोधी नारे लिख दिए गए थे।

रमजान में हिंदू बच्चों के हत्यारे को बचाने निकली RJ सायमा निभा रही मुस्लिम ब्रदरहुड, ‘काफिर’ अजीत अंजुम लेकिन क्यों कर रहा ऐसा?

उत्तर प्रदेश के बदायूँ में दो मासूम बच्चों की नृशंस हत्या कर दी गई, उनका कसाइयों की तरह गला रेत दिया गया, उनके परिजन रो-रोकर बेहाल हो गए… लेकिन आरजे सायमा और अजीत अंजुम जैसे मीडिया गिरोह के लोग अब भी अपना प्रोपगेंडा चलाने में व्यस्त हैं। वो ये दिखा रहे हैं कि समाज में सिर्फ साजिद ही बच्चों का खून नहीं कर रहा बल्कि पूजा नाम की महिला भी बच्चों को मार रही है। शर्मनाक बात ये है कि इन उदाहरणों को आरजे सायमा और अजीत अंजुम ने बड़ी घृणा के साथ अपने ट्वीट में पेश किया, लेकिन ये घृणा साजिद या पूजा के लिए नहीं दिखाई, बल्कि उन लोगों के लिए दिखाई जो बदायूँ केस में बच्चों के हत्यारे साजिद का नाम उजागर कर रहे हैं।

साजिद का नाम सुन रहीं चुप, पूजा का नाम सुनते एक्टिव

आर जे सायमा बदायूँ वाले केस पर पहले बिलकुल शांत रहीं, न उन्होंने कोई संवेदना प्रकट की, न घटना की निंदा की। लेकिन अगले दिन जैसे ही प्रयागराज वाली घटना आई वो फौरन उसका स्क्रीनशॉट लेकर आ गईं और कहने लगीं, “एक दरिंदे का नाम है साजिद, दूसरी का पूजा। दोनों ने बच्चों की हत्या की। सुबह से नफ़रत के पुजारी मुझे, साजिद की दरंदगी को लेकर ट्रोल कर रहे हैं। अब बेचारे कोशिश कर रहे होंगे कि पूजा को बचा लें। साजिद तो मारा गया। पूजा को भी जल्द पकड़ा जाएगा। क़ानूनी कार्यवाही होगी।मगर ये नफ़रत से भरे लोगों का क्या? ये अपने ही ज़हर से एक दिन घुट के रह जाएँगे। दया आती है इन पर।”

उनके इस ट्वीट को पढ़कर क्या कहीं भी लगता है कि उनको बदायूँ वाली घटना पर दुख है? नहीं, बिलकुल नहीं। इसे पढ़ ऐसा लगता है कि जो लोग उनसे सवाल पूछ रहे थे कि वो साजिद के कृत्य पर बोलें वो उनको जवाब देने के लिए वो प्रयागराज की घटना का सहारा ले रही हैं और हर हाल में साजिद के कृत्य को कमतर दिखाने पर उतारू हैं।

घटनाओं के बीच अंतर क्या है, उसका इनके कोई मतलब नहीं। उनकी आँखें बदायूँ वाली घटना में मौजूद किसी भी तरह के कम्युनल एंगल पर बंद है और प्रयागराज वाली घटना पर ही फोकस कर पा रही हैं। सायमा को न तो बदायूँ के बच्चों की हत्या और न ही प्रयागराज में हुई बच्चों की हत्या से फर्क पड़ रहा है। वह सिर्फ दो तुलनाएँ करके वो संतुष्टि वाला भाव दिखा रही हैं कि चलो हिंदू ने मार दिया है तो बैलेंस करने के लिए उन्हें उदाहरण मिल गया।

खैर, इन दोनों घटनाओं को लेकर लोगों में नाराजगी बराबर है और कोई हिंदू पूजा को बचाने आगे नहीं आने वाला… फिर चाहे मीडिया उसे मानसिक विक्षिप्त बताए, चाहे ये वजह दे कि पूजा को अपनी भाभी नहीं पसंद थीं इसलिए उसने उनके बच्चे मार डाले… कोई भी कारण बच्चों की हत्या को जस्टिफाई नहीं कर सकता।

मगर सायमा और उनके जैसे लोग क्या कर रहे हैं? साजिद के अपराध, उसकी नफरत को कम दिखाने का प्रयास। सोशल मीडिया पर बाकायदा कमेंट हैं ऐसे कि वो लोग नहीं मान सकते कि रमजान में मुसलमान ऐसा कर सकता है। क्या सायमा को ऐसे लोगों की आँख खोलने की जरूरत नहीं है कि वो अपराधी का बचाव करने की बजाय अपराधी मानना सीखें, उलटा वो उन लोगों को नफरती बता रही हैं जो साजिद के अपराध की निंदा कर रहे हैं। क्या इससे ये नहीं लगता कि आरजे सायमा मजहब देखकर दूसरे की पीड़ा महसूस करती हैं।

इसी तरह अजीत अंजुम जो समाज में होने वाले हर घटना पर अपनी निष्पक्ष पत्रकारिता की दुहाई देते हैं वो भी बदायूँ कि घटना की तुलना प्रयागराज की घटना से कर रहे हैं। उनके मुताबिक हत्यारे का नाम साजिद है इसलिए सांप्रदायिक एंगल दिया जा रहा है और एक मजहब को टारगेट किया जा रहा है। उनके हिसाब से ऐसा चुनावी मौसम है इसलिए ये सब हो रहा है।

अब यही अजीत अंजुम जिन्हें इस बात से समस्या है कि हत्यारे का नाम साजिद इतना क्यों उजागर किया जा रहा है वही अजीत अंजुम जब कोई हिंदू आरोपित होता है तो उसका नाम, उसका जाति, उसका कुल, उसका गौत्र, जय श्रीराम का नारा, भगवा कपड़ा सब अपने ट्वीट और वीडियो में डालना बोता हैं।

वहीं अगर कोई इसका विरोध करता है तो वो उसे अंधभक्त करार दे देते हैं या उसे ट्रोल आर्मी कह देते हैं। मगर बात साजिद जैसों की आते ही उन्हें बचाव करना होता है तो उन्हें अपनी ही कही बातें याद नहीं रहतीं। वो खुलकर साजिद की मजहबी पहचान उजागर करने वालों का विरोध करते हैं। उन्हें लगता है शायद यही निष्पक्ष पत्रकारिता है, यही देश के लोकतंत्र को बचाने का तरीका है और इससे ही सेकुलरिज्म खतरे में जाने से रोका जा सकता है। लेकिन ऐसे सेकुलरों को तब वो घटनाएँ याद नहीं आती जब खुद ऐसे लोग लिबरलों को ‘काफिर’ कहकर खारिज करते हैं। वक्त आने पर उन्हें उनके मुद्दों से दूर रहने की चेतावनी देते हैं।

दोनों घटनाओं का कैसे होगा असर

प्रयागराज और बदायूँ कि घटना किसी कीमत पर जस्टिफाई नहीं की जा सकती। बावजूद इसके ये लिबरल और इस्लामी गिरोह के लोग साजिद और जावेद के बचाव में ऐसा कर रहे हैं। उनके हिसाब से इस मामले को कम्युनल एंगल नहीं दिया जाना चाहिए। लेकिन वो ये भी नहीं बता रहे कि वो माँ-पिता क्या करें जिन्होंने बिन किसी गलती के अपने बच्चे खो दिए।

प्रयागराज वाली घटना के बाद और बदायूँ वाली घटना के बाद हर माता-पिता बच्चों को लेकर और अधिक सतर्क होंगे। लेकिन, इसका असर कैसे होगा इसे समझिए। प्रयागराज की घटना के जानकर माता-पिता अपने बच्चों को ऐसे लोगों से दूर रखेंगे जिनकी उनसे न बनती हो या उनका झगड़ा हो। या उन्हें पता चलेगा कि कोई मानसिक रूप से परेशान है तो वो उसके पास डर से अपने बच्चे नहीं छोड़ेंगे। माता-पिता की इस सर्तकता पर कोई बाहर का व्यक्ति सवाल नहीं उठाएगा क्योंकि पता होगा कि न जाने कब किसमें पूजा जैसा हैवान जग जाए।

लेकिन, यही सब बिंदु बदायूँ वाले मामले में लागू नहीं होते क्योंकि ये मामला विशुद्ध घृणा का है। एक परिवार जो अपने पड़ोस में रहने वाले शख्स के दुख को समझ कर उसकी मदद करने चला, उसे चाय पिलाने के लिए घर में बैठाया, उसी शख्स ने उस परिवार के बच्चों की निर्ममता से हत्या की, छोटे-छोटे बच्चों का गला रेता। इस मामले में परिवार की कोई गलती भी नहीं है जो कोई सीख ले सिर्फ इसके कि वो हिंदू हैं।

अब अगर कोई माता-पिता या परिवार इस घटना से सीखकर अपने घर में ऐसे लोगों की एंट्री बंग करदे। अपनों के बचाव की सोचे तो उसे फौरन ये वामपंथियों और इस्लामियों का गिरोह इस्लामोफोबिक घोषित कर देगा और भारत में डर का माहौल चिल्लाकर रोना शुरू हो जाएगा। ऐसे लोग न खुद इनके विरोध में आएँगे और जो खड़ा होगा उसको नफरती बताकर नीचा दिखाने का प्रयास करेंगे। इनका मकसद हमेशा यही रहेगा कि साजिद जैसी घटनाएँ जब जब प्रकाश में आएँ उन्हें कोई पूजा का मामला मिल जाए जिससे वो ऐसे अपराधों को डिफेंड कर पाएँ।

हिंदू मंदिरों की कमाई पर टैक्स लगा रही कर्नाटक की कॉन्ग्रेसी सरकार, राज्यपाल ने कर दिया नामंजूर: पूछा – दूसरे मजहबों पर क्यों नहीं?

कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने मंदिरों की कमाई पर टैक्स लगाने वाले कानून पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया है। राज्यपाल ने पूछा है कि सिर्फ मंदिरों पर ही टैक्स क्यों लगाया जा रहा है, अन्य मजहबी स्थलों को ऐसे कानूनों से बाहर क्यों रखा गया है। यह कानूनों कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार लाई है और इसे हाल ही में राज्य की विधायिका से पास किया गया था।

रिपब्लिक की एक रिपोर्ट के अनुसार, राज्यपाल थावरचंद गहलोत को यह बिल उनकी स्वीकृति के लिए भेजा गया था। उन्होंने इसे मंजूरी देने से मना कर दिया। उन्होंने इस कानून को एक धर्म के साथ पक्षपात करने वाला बताया है। राज्यपाल ने पूछा कि सिर्फ मंदिरों पर ही टैक्स क्यों लगाया जा रहा है। राज्यपाल ने कहा है कि नए कानून के अंतर्गत सभी धार्मिक स्थलों पर टैक्स लगाया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी पूछा है कि क्या इस कानून के अंतर्गत अन्य धार्मिक स्थल भी टैक्स के दायरे में लाए जाएँगे।

गौरतलब है कि राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार फरवरी माह में राज्य के हिन्दू मंदिरों की कमाई पर टैक्स लगाने वाला यह कानून लाई थी। इस कानून को ‘कर्नाटक हिंदू धार्मिक संस्थान और धर्मार्थ बंदोबस्ती विधेयक 2024’ नाम दिया गया था।

कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार इस विधेयक के जरिए वार्षिक ₹1 करोड़ से अधिक दान पाने वाले मंदिरों से उनकी कमाई का 10% जबकि ₹10 लाख से ₹1 करोड़ तक दान पाने वाले मंदिरों से 5% टैक्स वसूलना चाहती थी।

इस कानून को कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने फरवरी, 2024 में राज्य विधानसभा में पास करवा लिया था। हालाँकि, कर्नाटक की विधान परिषद में इस विधेयक को भाजपा और जेडीएस के गठबंधन ने गिरा दिया था और पास नहीं होने दिया था।

कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने 1 मार्च, 2024 को कर्नाटक विधान परिषद में यह विधेयक दुबारा पेश करके पास करवा लिया था। इस दिन भाजपा और जेडीएस के सदस्यों ने सदन से वाकआउट किया था। इस विधेयक के दोनों सदनों से पास होने के बाद इसे राज्यपाल के पास मंजूरी के लिए भेजा गया था।

अब इसे राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने मंजूर करने से मना कर दिया है और साथ ही सरकार से प्रश्न भी पूछे हैं। इससे पहले विधेयक के लाए जाने पर राज्य की विपक्षी पार्टी भाजपा और जेडीएस ने भी प्रश्न उठाए थे कि कॉन्ग्रेस सरकार मंदिरों से कमाई क्यों करना चाहती है।

बरेली से पकड़ा गया हिन्दू बच्चों के हत्यारे साजिद का भाई जावेद, ऑटो में बनाया वीडियो, बोला- मैं हत्या के बाद दिल्ली भाग गया था

उत्तर प्रदेश के बदायूँ में दो हिन्दू बच्चों की हत्या के मामले में फरार जावेद को बरेली से गिरफ्तार कर लिया गया है। जावेद पर यूपी पुलिस ने ₹25,000 का इनाम रखा था। उसकी एक वीडियो भी सामने आई है, जो उसने एक ऑटो में बनाई है। उसने बताया है कि वह हत्या के बाद दिल्ली भाग गया था।

साजिद को बदायूँ पुलिस अपने साथ बरेली से ले गई है। उससे पूछताछ की जा रही है। उसके द्वारा वीडियो में दिखता है कि उससे कुछ लोग पूछताछ कर रहे हैं। वीडियो में वह बताता दिख रहा है कि वह हत्या के बाद भीड़ के चलते बदायूँ से भाग का दिल्ली चला गया था। वीडियो में वह बताता है कि उसके पास लोगों के फ़ोन आ रहे थे कि उसके भाई साजिद ने बदायूँ में हत्या कर दी है। उसने दावा किया है कि वह आत्मसमर्पण करने दिल्ली से वापस बरेली आया है।

वह वीडियो में लोगों से दावा कर रहा है कि वह बेकसूर है। वह आसपास खड़े लोगों को अपना आधार कार्ड दिखाता है और साथ ही उसने अपना नाम पता भी बताया। ऑटो के पास खड़े लोग उसको एक थाने ले जाने की बात कर रहे हैं। जावेद इस वीडियो में खुद को पुलिस के पास ले जाने की अपील करता दिख रहा है और साथ ही खुद को निर्दोष बता रहा है।

उससे लोगों ने जब हत्या को लेकर पूछा तो उसने कहा कि उसे इस विषय में कोई जानकारी नहीं है, उसने कहा कि जिस घर के बच्चों की हत्या हुई है उससे इन लोगों के अच्छे सम्बन्ध थे। उसे आसपास खड़े लोग चौकी लेकर जाने की बात करते हैं।

हत्या करने वाला जावेद का भाई साजिद पहले ही पुलिस एनकाउंटर में मारा जा चुका है। पुलिस में इस विषय दर्ज करवाई गई FIR के अनुसार, जावेद साजिद के साथ बाइक पर आया था और उसने एक बच्चे पर हमला भी किया। हालाँकि, अभी पुलिस जावेद से पूछताछ कर रही है और अब इस मामले में आगे खुलासा होगा।

गौरतलब है कि 19 मार्च, 2024 की शाम को बदायूं में नाई की दुकान चलाने वाले साजिद ने दो हिन्दू बच्चों आयुष और अहान की छुरी से रेत कर हत्या कर दी थी। साजिद यह हत्या करके फरार हो गया था। यूपी पुलिस ने साजिद को उसी दिन मुठभेड़ में मार गिराया था। घटना के दौरान मौजूद रहा साजिद का भाई जावेद फरार था। पुलिस की टीमे उसकी तलाश में दबिश दे रही थी। जावेद पर पुलिस ने ₹25,000 का इनाम भी घोषित किया था। मामले में पुलिस ने मारे गए बच्चों के पिता के बयान के आधार पर FIR दर्ज कर ली है।

खिड़की खोल सेक्स करते हैं पड़ोसी, मना करने पर दी धमकियाँ, महिला ने दर्ज करवाई FIR: विदेश नहीं, अपने देश का है मामला

बेंगलुरु में एक महिला ने अपने पड़ोसियों पर खिड़की खोल कर सेक्स करने का आरोप लगाते हुए पुलिस में FIR दर्ज करवाई है। महिला ने आरोप लगाया है उसके नवविवाहित पड़ोसी अपने बेडरूम की खिड़की खोल कर सेक्स करते हैं जो कि सभ्य नहीं है। महिला के खिलाफ आरोपित दम्पति ने भी पुलिस में झगड़ा करने को लेकर FIR दर्ज करवाई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बेंगलुरु के गिरिनगर पुलिस थाना क्षेत्र के अवलहल्ली में यह मामला सामने आया है। एक 44 वर्षीय महिला ने पुलिस को 10 मार्च, 2024 को दी हुई शिकायत में कहा है कि उसके पड़ोस वाले फ्लैट में हाल ही में एक नवविवाहित जोड़ा आकर रहने लगा है।

महिला ने आरोप लगाया कि उसने जब 8 मार्च को रात 10:30 बजे अपने फ्लैट का दरवाजा खोला तो उनके पड़ोसी बेडरूम की खिड़की खोल कर सेक्स कर रहे थे और बातचीत कर रहे थे। यह सारा काम खुले में हो रहा था।

महिला ने आरोप लगाया कि जब उसने इस दम्पति को सेक्स करते देख यह कहा कि वह अपने बेडरूम की खिड़की बंद करके जो मन हो करें, तो उसे धमकाया गया। महिला ने आरोप लगाया कि इस पर उसे गालियाँ दी गईं। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि उसे बलात्कार की धमकी दी गई।

इसके बाद वह इस मामले को लेकर पुलिस के पास पहुँची। वहीं महिला के खिलाफ भी बेंगलुरु में एक FIR दर्ज हुई है। यह FIR नवविवाहित दम्पति के मकान मालिक की पत्नी ने दर्ज करवाई है। मकान मालिक की पत्नी ने कहा है कि FIR दर्ज करवाने वाली महिला लगातार उसके किराएदारों को परेशान करती है।

मकान मालिक की पत्नी ने आरोप लगाया कि महिला जानबूझकर लड़ाई करने के बहाने ढूंढती है, इसीलिए उसने उनके किराएदारों के विरुद्ध FIR करवाई है। मकान मालिक ने आरोप लगाया कि यह महिला उसके फ्लैट में आने वाले सभी किराएदारों से जानबूझ कर झगड़ा करती है और उन्हें भगाती है।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि दोनों पक्षों ने इस मामले को आगे ना बढ़ाने का निर्णय लिया है लेकिन पुलिस का कहना है कि दोनों पक्ष से FIR दर्ज हो गई है इसलिए अब इसका निर्णय अदालत में होगा।