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अरबाज ने 12 साल के बच्चे को 26 बार चाकुओं से गोदा: खून का निशान छिपाने के लिए डाला कपड़ा, एक्शन में MP पुलिस

मध्य प्रदेश के छतरपुर में 12 साल के मासूम को चाकुओं से 26 बार गोदा गया, क्योंकि वो पड़ोस के रहने वाले नशेड़ी अरबाज को चोरी करने से रोक रहा था। अरबाज ने चोरी के रास्ते में आने वाले 12 साल के मासूम को चाकुओं से गोद डाला और मृत समझ कर फरार हो गया। जिस समय उसने वारदात को अंजाम दिया, उस समय घर में बच्चे के अलावा कोई नहीं था। बच्चा अपनी बुआ सुमन सिकरवार के यहाँ रहता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये वारदात छतरपुर के सिविल लाइन थानाक्षेत्र के नारायण बाग पहाड़िया क्षेत्र के अनगढ़ टोरिया इलाके की है। जहाँ शुक्रवार (15 मार्च 2024) को अरबाज नाम का युवक चोरी की नीयत से पड़ोसी के घर में घुसा। उस समय घर पर 12 साल का बच्चा समर मौजूद था। समर ने अरबाज को चोरी करने से रोका, तो अरबाज ने समर पर हमला कर दिया। अरबाज ने समर को एक, दो बार नहीं, बल्कि 26 बार चाकू से मारा। यही नहीं, अरबाज जब घर से भागा, तो समर को मृत समझ कर उसके ऊपर कपड़ा डाल दिया, ताकि किसी को खून का निशान न दिखे और उसको फरार होने का समय मिल जाए।

इस हमले में बच्चे के गर्दन, पेट और सिर और सीने में गंभीर चोट आई है। परिजन बच्चे को अस्पताल ले गए, डॉक्टरों ने उसकी गंभीर हालत को देखते हुए ग्वालियर रेफर कर दिया है। इस हमले में समर के फेफड़े को भी नुकसान पहुँचा है। बताया जा रहा है कि अरबाज नशेड़ी है और वो चोरी की कई वारदातों को अंजाम दे चुका है। अरबाज की उम्र करीब 20 साल बताई जा रही है।

इस वारदात की जानकारी मिलते ही एसपी अमित सांघी भी मौके पर पहुँचे। उन्होंने आरोपित अरबाज के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कही है। वहीं, पुलिस ने आरोपी अरबाज खान के खिलाफ थाना सिविल लाइन में केस दर्ज कर लिया है। हालाँकि अरबाज अब तक फरार है और पुलिस उसकी तलाश में जुटी हुई है।

बामियान में बुद्ध प्रतिमा विखंडन, मंदिरों-गुरुद्वारों पर हमले…: पाकिस्तान ने UN में इस्लामोफोबिया पर पेश किया प्रस्ताव तो भारत ने दिखाया आईना, कहा- सबकी बात हो

संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में पाकिस्तान द्वारा पेश इस्लामोफोबिया से संबंधित एक मसौदे के दौरान भारत अनुपस्थित रहा। इस मसौदे को चीन का समर्थन हासिल था। मसौदे में कहा गया था कि हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, सिख धर्म और अन्य धर्मों द्वारा दूसरे मतों के खिलाफ फैलाए जा रहे ‘धार्मिक भय’ की व्यापकता को भी स्वीकार किया जाना चाहिए, ना कि सिर्फ एक धर्म की बात की जाए।

पाकिस्तान द्वारा शुक्रवार (15 मार्च 2024) को 193 सदस्यीय महासभा में पेश किए गए प्रस्ताव ‘इस्लामोफोबिया से निपटने के उपाय’ को स्वीकार कर लिया। इस प्रस्ताव के पक्ष में 115 देशों ने मतदान किया, जबकि इसका विरोध किसी ने नहीं किया। मतदान के दौरान भारत, ब्राजील, फ्रांस, जर्मनी, इटली, यूक्रेन और यूके सहित 44 देश अनुपस्थित रहे।

इस्लामोफोबिया पर संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के प्रतिनिधि मुनीर अकरम ने पेश किया था। इस दौरान उन्होंने कहा था कि दुनिया भर के मुस्लिमों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है और इस्लामोफोबिया का मुकाबला करने के लिए साहसिक और निर्णायक कार्रवाई की आवश्यकता है। इस दौरान अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह और नागरिकता संशोधन कानून (CAA) की भी बात की।

वहीं, संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थायी प्रतिनिधि रुचिरा कंबोज ने यहूदीफोबिया, ईसाईफोबिया और इस्लामोफोबिया से प्रेरित सभी कृत्यों की निंदा की। हालाँकि, इस दौरान उन्होंने जोर देकर कहा कि इसे स्वीकार करना चाहिए कि इस तरह का फोबिया ‘इब्राहिम धर्मों’ (यहूदी, ईसाई और इस्लाम) से परे भी फैला हुआ है।

उन्होंने कहा, “स्पष्ट साक्ष्यों से पता चलता है कि दशकों से गैर-इब्राहिम धर्मों के अनुयायी भी धार्मिक भय से प्रभावित हुए हैं। इससे धार्मिक भय के कई रूपों का उदय हुआ है, विशेष रूप से हिंदू विरोधी, बौद्ध विरोधी और सिख विरोधी भावनाएँ प्रमुख हैं। धार्मिक भय के ये समकालीन रूप गुरुद्वारों, मठों और मंदिरों जैसे धार्मिक स्थानों पर बढ़ते हमलों में स्पष्ट हैं।”

उन्होंने कहा, “बामियान में बुद्ध प्रतिमा का खंडन, गुरुद्वारा परिसरों में उल्लंघन, गुरुद्वारों में सिख तीर्थयात्रियों का नरसंहार, मंदिरों पर हमले और मंदिरों में मूर्तियों को तोड़ने का महिमामंडन, ये सभी गैर-अब्राहम धर्मों के खिलाफ धार्मिक भय हैं। बता दें कि मार्च 2001 में तालिबान ने अफगानिस्तान के बामियान में भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमाओं को नष्ट कर दिया था, जिसकी दुनिया भर में निंदा हुई थी।

कंबोज ने कहा कि ऐसी मिसाल कायम नहीं होनी चाहिए, जिसके परिणामस्वरूप अलग-अलग धर्मों से अलग-अलग प्रस्ताव आएँ। उन्होंने कहा कि इससे संयुक्त राष्ट्र को धार्मिक शिविरों में विभाजित करने का प्रयास किया जा सकता है। रुचिरा कंबोज ने कहा, “संयुक्त राष्ट्र अपना ऐसा रुख बनाए रखे, जो दुनिया को एक वैश्विक परिवार के रूप में गले लगाते हुए शांति और सद्भाव के तहत एकजुट करती हो।”

भारत की तरफ से बात रखते हुए रुचिरा ने आगे कहा, “इस्लामोफोबिया का मुद्दा निस्संदेह महत्वपूर्ण है, लेकिन हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि अन्य धर्म भी भेदभाव और हिंसा का सामना कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “अन्य धर्मों की चुनौतियों की उपेक्षा करते हुए सिर्फ इस्लामोफोबिया से निपटने के लिए संसाधनों का आवंटन करना, अनाजने में बहिष्कार और असमानता की भावना कायम कर सकता है।”

कंबोज ने कहा कि यह पहचानना महत्वपूर्ण है कि 1.2 अरब से अधिक अनुयायियों वाला हिंदू धर्म, 53.5 करोड़ से अधिक अनुयायियों वाला बौद्ध धर्म और दुनिया भर में 3 करोड़ से अधिक अनुयायियों वाला सिख धर्म के भी ‘धार्मिक भय’ से पीड़ित हैं। उन्होंने कहा, “अब समय आ गया है कि हम धार्मिक भय की व्यापकता को स्वीकार करें, न कि केवल एक को उजागर करें।”

उन्होंने कहा कि भारत सैद्धांतिक तौर पर एक ही धर्म के आधार पर विशेष दूत का पद सृजित करने का विरोध करता है। भारतीय समाज को समावेशी और सभी धर्मों का सम्मान करने वाला बताते हुए उन्होंने कहा, “पारसी, बौद्ध, यहूदी या किसी अन्य धर्म के अनुयायियों ने भारत में उत्पीड़न या भेदभाव से मुक्त आश्रय पाया है।”

इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से पहले महासभा ने यूरोपीय संघ की ओर से बेल्जियम द्वारा मसौदे में पेश किए गए दो संशोधनों को खारिज कर दिया। वहीं, भारत ने इन दोनों संशोधनों के पक्ष में मतदान किया। एक संशोधन में कुरान के अपमान के संदर्भों को हटाने के लिए प्रस्ताव की भाषा में बदलाव का प्रस्ताव रखा गया। दूसरे संशोधन में संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत के बजाय ‘मुस्लिम विरोधी भेदभाव से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र केंद्र बिंदु’ कहे जाने की माँग गई थी।

दरअसल, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने साल 2022 में एक प्रस्ताव अपनाया था, जिसमें 15 मार्च को इस्लामोफोबिया से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में घोषित किया गया था। यह प्रस्ताव न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च में स्थित दो मस्जिदों में साल 2019 में हुई गोलीबारी के मद्देनजर पेश किया गया था। इस हमले में 50 से अधिक लोग मारे गए थे।

US ने फिर किया भारत में हस्तक्षेप: शिकायत के बिना अडानी ग्रुप के खिलाफ जाँच शुरू, हिंडनबर्ग वाले मामले में हुई थी फजीहत

हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के जरिए अडानी ग्रुप को बदनाम करने की साजिशें नाकाम होने के बाद खबर है कि एक बार फिर अमेरिका में अडानी ग्रुप के खिलाफ जाँच शुरू हुई है। इस बार अमेरिकी अभियोजकों की पड़ताल इस बिंदु पर आधारित है कि कहीं गौतम अडानी की कंपनी रिश्वतखोरी में तो शामिल नहीं है। यह जाँच न्यूयॉर्क के पूर्वी जिले के अमेरिकी अटॉर्नी ऑफिस और वाशिंगटन स्थित जस्टिस डिपार्टमेंट की फ्रॉड यूनिट की निगरानी में की जा रही है।

बता दें कि पूरा मामला एनर्जी प्रोजेक्ट से जुड़ा है। न्यूज एजेंसी ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में अमेरिका एनर्जी प्रोजेक्ट पर फेवरेवल ट्रीटमेंट के लिए अधिकारियों को रिश्वत देने के आरोपों पर गौतम अडानी और उनकी कंपनी के खिलाफ जाँच हो रही है। पता लगाया जा रहा है कि गौतम अडानी या उनकी कंपनी ने एक एनर्जी प्रोजेक्ट पर फेवरेवल ट्रीटमेंट के लिए भारत में अधिकारियों को भुगतान किया या नहीं। इस जाँच के दायरे में एज्योर पावर ग्लोबल लिमिटेड भी शामिल है।

मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि इस संबंध में अडानी ग्रुप से जब पूछा गया तब उन्होंने आरोपों के संबंध में कहा कि उन्हें अपने चेयरमैन के खिलाफ चल रही किसी जाँच की कोई जानकारी नहीं है। अडानी समूह ने यह भी कहा, “एक बिजनेस ग्रुप के तौर पर हम कॉरपोरेट गवर्नेंस के उच्चतम मानकों के साथ काम करते हैं, हम भारत और अन्य देशों में भ्रष्टाचार विरोधी और रिश्वत विरोधी कानूनों के अधीन हैं और उनका पूरी तरह से अनुपालन करते हैं।”

उल्लेखनीय है कि अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा न तो गौतम अडानी और न ही उनकी कंपनी, न ही एज़्योर पावर पर औपचारिक रूप से किसी भी गलत काम का आरोप लगाया गया है। लेकिन फिर भी अगर यह जाँच हो रही है तो इसका कारण यही है कि अमेरिकी कानून संघीय अभियोजकों को विदेशी भ्रष्टाचार के आरोप में जाँच आगे बढ़ाने की अनुमति देता है। ऐसा भी तब होता है जब मामले में अमेरिकी निवेशकों या बाजारों से कुछ संबंध शामिल हों।

हिंडनबर्ग के आरोपों पर भी हुआ था हल्ला

गौरतलब है कि ये यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका ने अडानी का इस्तेमाल कर भारत में दखल दिया हो। जनवरी 2023 में हिंडनबर्ग ने भारतीय कारोबारी अडानी समूह पर आरोप लगाए थे कि वह अवैध तरीके से अपने शेयर के दाम बढ़ा रहा है और कई जगह पर पर्यावरण नियमों की अनदेखी कर रहा है। अडानी समूह पर इतिहास का सबसे बड़ा गड़बड़झाला करने का आरोप लगाया था। इसके पश्चात भारत में भी विपक्ष ने अडानी समूह पर काफी हल्ला मचाया था।

लेकिन, बाद में अमेरिकी सरकार के इंटरनेशनल डेवलपमेंट फाइनेंस कॉरपोरेशन ने अपनी जाँच में इन आरोपों को निराधार पाया था। साथ ही मीडिया रिपोर्ट में बताया गया था कि अमेरिकी अधिकारियों का इस मामले में यह भी कहना है कि हिंडनबर्ग के आरोपों का कोई असर अडानी पोर्ट्स में निवेश पर नहीं पड़ेगा।

जम्मू-कश्मीर में ST आरक्षण 10% और बढ़ा, OBC में जुड़ी 15 नई जातियाँ: अनुसूचित जाति के ग्रेजुएट को भी पहले यहाँ बनना पड़ता था सफाईकर्मी

जम्मू-कश्मीर की अनुसूचित जनजातियों को केंद्र की मोदी सरकार ने बड़ा तोहफा दिया है। केंद्र ने प्रदेश में अपना वो वादा पूरा कर दिया है जहाँ उन्होंने कहा था पहाड़ी समुदाय को आरक्षित जनजाति का कोटा मिलेगा और इसका असर पहले से शामिल समुदायों (गुज्जर) पर नहीं पड़ेगा। जानकारी के अनुसार, जम्मू कश्मीर में प्रशासन ने अनुसूचित जनजाति समुदायों के लिए अलग से 10% कोटा को मंजूरी दे दी है।

इसका प्रत्यक्ष फायदा वहाँ की पहाड़ी जनजातियों- पददारी जनजाति, कोली और गड्डा ब्राह्मण को मिलेगा। इन्हें हाल ही में अनुसूचित जनजाति की कैटेगिरी में शामिल किया गया था। इस फैसले के साथ ही प्रदेश में अनुसूचित जनजातियों के लिए कुल कोटा 20% हो जाएगा। पहाड़ी और गुज्जरों दोनों को 10-10% आरक्षण मिलेगा।

इसके अलावा प्रशासन ने ओबीसी में 15 नई जातियों को जोड़ने की भी मंजूरी दे दी है। जम्मू-कश्मीर में अब ओबीसी का कोटा बढ़ाकर 8% कर दिया गया है।

बता दें कि राज्य जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल की अध्यक्षता में शुक्रवार (15 जनवरी 2024) को हुई प्रशासनिक परिषद की बैठक में यह फैसले लिए गए। इस बैठक में उपराज्यपाल के सलाहकार राजीव राय भटनागर, मुख्य सचिव अटल डुल्लू और उपराज्यपाल के प्रधान सचिव मंदीप कुमार भंडारी शामिल थे।

अमित शाह ने किया वादा पूरा

गौरतलब है कि इस संबंध में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी राजौरी और बारामूला के लोगों से वादा किया था कि वह पहाड़ी समुदाय को एसटी का दर्जा दिया जाएगा और साथ ही गुज्जर-बकरवालों को आश्वस्त किया था कि उनके आरक्षण में किसी प्रकार की कटौती नहीं होगी।

इस वादे के बाद इसी साल संसद (6 फरवरी लोकसभा, 9 फरवरी राज्यसभा) में अनुसूचित जनजाति संवर्ग में दस फीसदी आरक्षण को लेकर एक बिल पारित किया गया था, जिसके अनुसार अनुसूचित जनजाति में पहले से शामिल गुज्जर-बकरवाल समुदाय के आरक्षण से छेड़छाड़ के बिना अन्य जनजाति के लोगों को कोटा दिया जाने की बात थी।

उपराज्यपाल ने इस संबंध में कहा था कि इस प्रयास से पहाड़ी समुदाय की 12 लाख की आबादी को नौकरी, शिक्षा के साथ ही अब राजनीतिक आरक्षण भी मिलने लगेगा। इन इलाकों का भी विकास ट्राइबल प्लान के तहत होगा। लेकिन इससे पहले से अनुसूचित जनजाति में शामिल गुज्जर-बकरवाल समुदाय के आरक्षण पर किसी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ेगा।

2019 से पहले क्या थे हालात

बता दें कि साल 2019 से पहले जम्मू-कश्मीर में दलितों की हालत बहुत दयनीय थी। यशार्क पांडे अपनी रिपोर्ट में बताए थे कि प्रदेश में हालात ये थे कि जम्मू-कश्मीर में रह रहे वाल्मीकि समुदाय के लड़के-लड़कियाँ स्कूली शिक्षा के आगे पढ़ाई ही नहीं करना चाहते थे। उनका कहना था कि जब पढ़-लिख कर सफ़ाई कर्मचारी ही बनना है तब पढ़ने से क्या फ़ायदा? इस समुदाय की लड़कियाँ जम्मू-कश्मीर राज्य के बाहर जाकर विवाह कर रही थीं क्योंकि वे अपनी जाति के कम पढ़े लिखे सफाई कर्मचारी की नौकरी करने वाले युवाओं से विवाह नहीं करना चाहतीं।

उस समय जब शेष भारत में जब ऐसा माहौल था कि एक जाति सूचक शब्द बोलने पर सजा का प्रावधान था, तब जम्मू-कश्मीर राज्य वाल्मीकि समुदाय को जाति प्रमाण पत्र तक जारी नहीं करता था जिससे इस समुदाय के लोगों को अनुसूचित जातियों के लिए बनाए गए विशेष प्रावधानों और सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित रहना पड़ता था। यही नहीं 2015 में एकलव्य नामक एक लड़के के प्रमाण पत्र पर जम्मू-कश्मीर राज्य के सरकारी कर्मचारी ने जाति सूचक शब्द लिखा और उस कर्मचारी पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। जाति प्रमाण पत्र न होने से एक प्रकार से अनुसूचित जातियों में जम्मू-कश्मीर के वाल्मीकि समुदाय की गिनती ही नहीं होती।

जिनको ‘पाकिस्तानी’ कह जेल में ठूँसना चाहते हैं केजरीवाल, मानवीय रूप से वो सब भारतीय… 1955-86-92-2003-05 का इतिहास पढ़ ले AAP

नागरिकता (संशोधन) अधिनियम-2019 संसद के दोनों सदनों में दिसंबर 2019 में पारित हुआ था। चार वर्ष की लंबी जद्दोजहद के बाद अंततः उसकी अर्हता और प्रक्रिया संबंधी 39 पृष्ठ की विस्तृत नियमावली 11 मार्च, 2024  को भारत के राजपत्र (गजट) में अधिसूचित कर दी गई है। इससे इस अधिनियम के क्रियान्वयन का मार्ग प्रशस्त होगा। यह संविधान-निर्माताओं के वायदे को पूरा करने के लिए किया गया एक निर्णायक पहल है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 तक में नागरिकता के नियम निर्धारित किए गए हैं। 26 जनवरी, 1950 को भारत का संविधान लागू होते ही ब्रिटिश भारत में जन्म लेने वालों को उसी दिन से भारत की नागरिकता मिल गई थी। लेकिन जो लोग पूर्व-रियासतों के निवासी थे, उनमें से बहुत-से लोगों ने भारत की नागरिकता नहीं ली थी। अंततः 1955 में नागरिकता कानून बनाकर उन सबको भारत की नागरिकता दी गई।

इस कानून में समय-समय पर जैसे 1986, 1992, 2003 और 2005 में गोवा, दमन-दीव, और दादरा व नगर हवेली, पॉन्डिचेरी, कराईकल, माहे, यनम के अलावा बांग्लादेश और पाकिस्तान से भूमि विवादों को सुलझा कर भारत में मिलाए गए क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को भारत की नागरिकता देने के लिए कानूनी संशोधन किए गए। इसी क्रम में मुस्लिम बहुल पड़ोसी देशों- पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के धार्मिक आधार पर प्रताड़ित अल्पसंख्यकों- हिन्दू, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी समुदायों को भारत की नागरिकता देने के लिए नागरिकता संशोधन अधिनियम-2019 पारित हुआ था।

गजट में अधिसूचित नियमावली सरल, सुगम और संवेदनशील है। इसमें नागरिकता प्राप्त करने की तमाम अड़चनों को दूर करने के लिए जटिल प्रक्रिया का सरलीकरण किया गया है। इसके अंतर्गत आवेदक को अपने या अपने पिता/पितामह/प्रपितामह के पाकिस्तान/बांग्लादेश/अफगानिस्तान सरकार द्वारा जारी वैध या समाप्त हो चुके पासपोर्ट या वहाँ की नागरिकता सम्बन्धी कोई भी दस्तावेज, भारत सरकार द्वारा जारी आवासीय परमिट या जन्म/विवाह प्रमाण-पत्र, आधार कार्ड, पैन कार्ड,  ड्राइविंग लाइसेंस, राशन कार्ड, बैंक पासबुक, डाकघर खाता, जीवन बीमा पॉलिसी आदि 20 दस्तावेज़ों में से कोई भी एक अपने आवेदन के साथ जमा करना होगा।

ऊपर दी गई सूचियों में से कोई प्रमाण-पत्र न होने पर शपथपत्र देकर अपनी अर्हता सम्बन्धी घोषणा करनी होगी। भारत में शरण लेने की तिथि के सम्बंध में ग्राम पंचायत, नगर पालिका अथवा नगर निगम आदि स्थानीय शासी निकायों द्वारा जारी प्रमाण-पत्र को भी मान्यता प्रदान की गई है। जिलाधिकारी कार्यालय की जगह अब यह आवेदन केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल पर किया जा सकेगा।

अधिनियम में अभ्यर्थी द्वारा जमा किए जाने वाले मान्य दस्तवेज़ों की सूची बहुत सीमित थी। अब उसे उसे काफी व्यापक बनाया गया है। इसके अलावा आठवीं अनुसूची में उल्लेखित 22 भाषाओं में से किसी एक के ज्ञान सम्बन्धी किसी शिक्षा संस्थान द्वारा जारी किया गया प्रमाण-पत्र भी अनिवार्य था। साथ ही, स्वयं के अलावा दो भारतीय नागरिकों से अर्हता सम्बन्धी शपथपत्र देना भी अनिवार्य था। अब इन तमाम सख्त नियमों और जटिल प्रक्रियाओं को सरलीकृत किया गया है, ताकि लक्षित समुदाय को इस अधिनियम का अपेक्षित और त्वरित लाभ मिल सके।

2019 से लेकर आज तक पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, दिल्ली और पंजाब आदि विपक्ष शासित राज्यों द्वारा इसका खुलकर विरोध किया जा रहा है। यह विरोध मुस्लिम तुष्टीकरण की परम्परागत राजनीति का परिणाम है।

इस प्रकार साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले इन दलों और इनके द्वारा शासित सरकारों के असहयोग के मद्देनजर आवेदन-प्रक्रिया को केंद्रीकृत करते हुए नागरिकता प्रदान करने के लिए अब एक ‘केंद्रीय सक्षम समिति’ का गठन किया जाएगा। उसमें संबंधित राज्य सरकारों का भी प्रतिनिधित्व रहेगा।

ऊपरोक्त समिति के सहयोग के लिए जिला स्तरीय समितियों का भी गठन किया जाएगा, जोकि प्रारंभिक कार्रवाई करेंगी। इस बदलाव से राज्य सरकारों के अनावश्यक विरोध और हस्तक्षेप को नियंत्रित किया जा सकेगा। उल्लेखनीय है कि संविधान में नागरिकता केन्द्रवर्ती सूची का विषय है।

यह चिंताजनक तथ्य है कि सीमावर्ती मुस्लिम देशों में आज तक भी गैर-मुस्लिमों अर्थात हिन्दू, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और पारसी आदि अल्पसंख्यक समुदायों के साथ अमानवीय व्यवहार और उत्पीड़न होता रहता है। 1947 से ही मुस्लिम बहुल पड़ोसी देशों में जारी इस धार्मिक प्रताड़ना के कारण भारत में विस्थापित लोगों की संख्या लगातार बढ़ी है।

अल्पसंख्यकों के संरक्षण के लिए हुए “नेहरू-लियाकत” समझौते के अनुपालन में पाकिस्तान के असफल हो जाने पर प्रताड़ित धार्मिक अल्पसंख्यकों को स्वीकारना हमारा संवैधानिक और मानवीय दायित्व है। जो लोग सालों से धार्मिक कारणों से प्रताड़ित हैं, जिनका घर-बार, संपत्ति, आश्रय सब छूट चुका है, क्या उनको सामान्य जीवन जीने के अधिकार से भी वंचित कर दिया जाए? और क्या एक ऐसे देश को उनकी उपेक्षा करनी चाहिए, वे जिसके विभाजन-पूर्व नागरिक थे। उनको उनकी सुरक्षा, सम्मान और अधिकारों के लिए आश्वस्त भी किया गया था।

जिस धार्मिक विश्वास के साथ वे पले-बढ़े हैं, जिस आस्था को वे अपने जीवन से अधिक मूल्यवान मानते हैं, उसी आस्था और विश्वास के कारण उनको अपमान, उपेक्षा और उत्पीड़न सहना पड़ता है। पचहत्तर साल पहले वे इसी देश के निवासी /नागरिक थे, तो स्वाभाविक है कि वे अपनी मातृभूमि भारत से ही शरण और सहायता की आशा करेंगे। एक सार्वभौम राष्ट्र के लिए इस समस्या का और अपने पूर्व-आश्वासन को पूरा करने का संवैधानिक समाधान आवश्यक था।

इसलिए पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों (जोकि दशकों से अवैध प्रवासियों के रूप में रह रहे हैं) के मानवाधिकारों की रक्षा-हेतु नागरिकता प्रदान करने वाला यह विधेयक आवश्यक था। ये देश अपने अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने में सर्वथा असमर्थ रहे हैं। अत: भारत ने मानवता के आधार पर अविभाजित भारत के अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए अपना कर्तव्य समझ कर यह संशोधन किया है।

इस संशोधन का उद्देश्य धर्म के कारण प्रताड़ित उन अल्पसंख्यकों को सम्मान का जीवन देना है, जो इन देशों में अपने धर्म का अनुसरण नहीं कर पा रहे हैं। नागरिकता अधिनियम 1955, के अनुसार अवैध प्रवासी भारत के नागरिक नहीं हो सकते थे। वे नागरिकता अधिनियम 1955, की धारा 5 के अधीन नागरिकता के लिए आवेदन करते थे, किंतु यदि वे अपने भारतीय मूल का सबूत देने में असमर्थ थे, तो उन्हें उक्त अधिनियम की धारा 6 के तहत ”प्राकृतिकरण” (Naturalization) द्वारा नागरिकता के लिए आवेदन करने को कहा जाता था। यह उनको बहुत से अवसरों एवं लाभों से वंचित करता था।

नागरिकता संशोधन अधिनियम में यह प्रावधान था कि प्राकृतिक रूप से नागरिकता प्राप्त करने के लिए इन व्यक्तियों (अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैनियों, पारसियों और ईसाइयों को) को कम से कम 11 वर्ष भारत में रहना चाहिए लेकिन इस नवीन अधिनियम में इस अवधि को घटाकर 5 वर्ष कर दिया गया, अर्थात वे भारत में रहने के 5 सालों के बाद ही भारत के नागरिक बन जाएँगे।

धर्म के आधार पर हुए विभाजन से ही इन इस्लामिक देशों का गठन हो हुआ था। इसीलिए वहाँ के मुस्लिम समुदाय के लिए यह संशोधन कोई प्रावधान नहीं करता है क्योंकि इन देशों में मुस्लिम न तो अल्पसंख्यक हैं और न ही धार्मिक आधार पर उन्हें वहाँ किसी उत्पीड़न/प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है। इससे किसी भी भारतीय अल्पसंख्यक विशेष कर मुस्लिम समुदाय की नागरिकता भी किसी प्रकार से प्रभावित नहीं हो रही है। यह संशोधन किसी की नागरिकता का हनन नहीं कर रहा, बल्कि वंचितों को कानूनन अधिकार दे रहा है।

यह अधिनियम किसी को बुलाकर भी नागरिकता नहीं दे रहा, बल्कि जिन्होंने 31 दिसंबर, 2014 की निर्णायक तारीख तक भारत में प्रवेश कर लिया है, वे ही भारतीय नागरिकता के लिए केंद्र सरकार के पास आवेदन कर सकेंगे।

इन इस्लामिक देशों (अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान) के इस्लाम मतावलंबी (मुसलमान) नागरिक भी भारतीय नागरिकता के लिए “आवेदन द्वारा नागरिकता” प्रावधान के अंतर्गत आवेदन कर सकते हैं। यह नियम सभी विदेशी व्यक्तियों के लिए लागू है। भारत सरकार ऐसे आवेदनों के ऊपर विचार करने के बाद उन्हें नागरिकता प्रदान करती है। उदाहरणस्वरूप, पाकिस्तानी गायक/कलाकार अदनान सामी को 1 जनवरी, 2016 को भारतीय नागरिकता प्रदान की गई है।

यह संशोधन केवल तीन देशों से घोर धार्मिक प्रताड़ना के कारण विस्थापित छह अल्पसंख्यक समुदायों को निर्धारित मानदंडों को पूर्ण करने पर ही प्राथमिकता प्रदान करता है। इसलिए राजनीतिक कारणों से इसका विरोध करना अतार्किक, अमानवीय और असंवैधानिक है। आम चुनाव की दहलीज पर खड़े विपक्ष को संवेदनशीलता, समझदारी और संयम का परिचय देते हुए शाहीन बाग के धरने और दिल्ली दंगों की पुनरावृति से बचना चाहिए।

POK के लिए जान दे देंगे जान… वाले मोड में लौटे गृहमंत्री अमित शाह, बोले- वहाँ का हिंदू-मुस्लिम सब हमारे, चुनावी बॉन्ड पर कॉन्ग्रेस को रगड़ा

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने हाल में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर, चुनावी बॉन्ड, वन नेशन वन इलेक्शन को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने इंडिया कॉन्क्लेव में राहुल कंवल से बात करते हुए साफ कहा कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर हमारा है। वह अखंड भारत का हिस्सा है।

अमित शाह ने यह जवाब राहुल कंवल के सवाल पर दिया। कंवल ने उनसे कहा था कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को हम भारत का हिस्सा मानते हैं। वहाँ पर अगर किसी का उत्पीड़न हो रहा हो, या कोई बलोच हो जो वहीं की परिस्थिति से परेशान हो। उसका उत्पीड़न हो रहा है…? इस पर अमित शाह ने कहा, “पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भारत का हिस्सा है और इसमें हिंदू-मुस्लिम का सवाल पैदा ही नहीं होता। वहाँ जो मुसलमान हैं वो भी हमारे हैं वहाँ जो हिंदू हैं वो भी हमारे हैं।”

इस पर राहुल कंवल ने सबको बताना चाहा- ये गृहमंत्री बड़ी बात बोल रहे हैं। इस पर अमित शाह ने उन्हें कहा, “इसमें क्या बड़ी बात है। मैंने ये सब संसद में भी बोला हुआ है तुम बातों को बड़ा मत बनाओ। तुम शो को बड़ा मत बनाओ। POK भारत का हिस्सा है। वहाँ का मुसलमान भी हमारा है और हिंदू भी हमारा है।” इसके बाद तालियों से सभा गूँज गई।

याद दिला दें इससे पहले 2019 में आर्टिकल 370 खत्म करते वक्त अमित शाह ने कहा था कि पीओके भारत का हिस्सा है और इसके लिए हम जान दे देंगे।

चुनावी बॉन्ड पर बोले अमित शाह

इसी कॉन्क्लेव में चुनावी बॉन्ड पर भी केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने अपनी बात रखी। साथ ही वन नेशन वन इलेक्शन की महत्वता को भी समझाया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए उन्होंने कहा, “भारतीय राजनीति में काले धन के प्रभाव को खत्म करने के लिए चुनावी बॉण्ड लाए गए। उच्चतम न्यायालय का फैसला सभी को मानना होगा। मैं उच्चतम न्यायालय के फैसले पर कोई टिप्पणी नहीं करता। उसका पूरा सम्मान करता हूँ, लेकिन मुझे लगता है कि चुनावी बॉण्ड को पूरी तरह खत्म करने की बजाय इसमें सुधार किया जाना चाहिए था।”

उन्होंने कहा, “मैं अपनी बात कहना चाहता हूँ। ये फैलाया गया है कि चुनावी बॉन्ड से बीजेपी को फायदा हुआ है…राहुल गाँधी ने तो इसे सबड़े बड़ी उगाही का जरिया बताया है। पता नहीं, इन्हें कौन ये सब लिखकर देता है। कुल 20,000 करोड़ रुपए के चुनावी बॉण्ड में से भाजपा को लगभग 6,000 करोड़ रुपए मिले। बाकी बॉण्ड कहाँ गए? 14000 के बॉन्ड कहाँ गए? टीएमसी को 1,600 करोड़ रुपए मिले, कॉन्ग्रेस को 1,400 करोड़ रुपए मिले। बीआरएस को 1,200 करोड़ रुपए, बीजद को 775 करोड़ रुपए और द्रमुक को 639 करोड़ रुपए मिले।”

शाह ने कहा, “303 सांसद होने के बावजूद हमें 6,000 करोड़ रुपए मिले हैं और बाकियों को 242 सांसदों के बावजूद 14,000 करोड़ रुपए मिले हैं। किस बात को लेकर इतना हंगामा है? मैं कह सकता हूँ कि एक बार हिसाब-किताब हो जाने के बाद वे आप सभी का सामना नहीं कर पाएँगे।”

अपनी बात रखते हुए उन्होंने एक राष्ट्र एक चुनाव की भी बात की। उन्होंने कहा कि देश भर में कई बार चुनाव होने के कारण इसमें बड़ी मात्रा में धन खर्च होता है। उन्होंने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आदर्श आचार संहिता लागू होने के कारण सरकार की निर्णय लेने की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और विकास कार्य रुक जाते हैं।

गृह मंत्रालय ने लॉन्च किया CAA का मोबाइल एप: जानिए पाकिस्तान-अफगानिस्तान-बांग्लादेश के गैर मुस्लिम शरणार्थी कैसे कर सकते हैं आवेदन

भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने सीएए 2029 के तहत नागरिकता प्राप्त करने के लिए एक ऐप जारी किया है। इस ऐप को लॉन्च करने की घोषणा गृह मंत्रालय ने की थी, जिसके बाद ‘CAA-2019’ नाम के ऐप को लॉन्च कर दिया गया है। इस ऐप के माध्यम से पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए गैर मुस्लिम शरणार्थी भारत की नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं।

सीएए के तहत योग्य आवेदकों को भारत की नारिकता अप्लाई करने के प्रेसेस को आसान बनाते हुए शुक्रवार (15 मार्च 2024) को मोबाइल ऐप लॉन्च कर दिया गया। इसके माध्यम से आवेदक नागरिक नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 के तहत भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं। इस ऐप को Google Play Store से या वेबसाइट Indiancitizenshiponline.nic.in से एप्लिकेशन को डाउनलोड कर सकते हैं।

गृह मंत्रालय ने कहा, “नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 के तहत आवेदन करने के लिए CAA-2019′ मोबाइल ऐप चालू हो गया है।” इससे पहले, गृह मंत्रालय ने सीएए के तहत भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करने के लिए पात्र लोगों के लिए पोर्टल लॉन्च किया था। इस वेबसाइट का लिंक है- https://indiancitizenshiponline.nic.in/ । वहीं, प्ले स्टोर पर इस लिंक – https://play.google.com/store/apps/details?id=ca.caa.coremobileapp&hl=en&gl=US के माध्यम से ऐप को डाउनलोड किया जा सकता है।

गौरतलब है कि सीएए को सोमवार (11 मार्च 2024) को अधिसूचित किया गया, जिससे पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से बिना दस्तावेज वाले गैर-मुस्लिम प्रवासियों को नागरिकता देने का मार्ग प्रशस्त हो गया। सीएए नियम जारी होने के बाद, नरेंद्र मोदी सरकार अब 31 दिसंबर 2014 तक भारत आए तीन देशों के प्रताड़ित गैर-मुस्लिम प्रवासियों को भारतीय राष्ट्रीयता प्रदान करना शुरू कर देगी। इनमें हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई शामिल हैं।

ऐसे करें आवेदन

आइए, सबसे पहले जानते हैं कि नागरिकता प्राप्त करने के लिए आपके पास कौन-कौन से दस्तावेज होने चाहिए:

  • पाकिस्तान, अफगानिस्तान या बांग्लादेश की सरकारों द्वारा जारी किए गए पासपोर्ट की प्रति
  • FRRO (फॉरेनर्स रीजनल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर) या FRO (फॉरेनर्स रजिस्ट्रेशन ऑफिसर) द्वारा जारी किया गया रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट या रेजिडेंशियल परमिट
  • पाकिस्तान, अफगानिस्तान या बांग्लादेश के प्रशासन द्वारा जारी किया गया जन्म प्रमाण-पत्र
  • इन तीनों देशों के स्कूल-कॉलेजों द्वारा जारी किया गया शैक्षिक सर्टिफिकेट
  • इन मुल्कों की सरकारों या सरकारी एजेंसियों द्वारा जारी किया गया किसी भी प्रकार का पहचान-पत्र
  • कोई भी सरकारी लाइसेंस या सर्टिफिकेट जो इन तीनों देशों में जारी किया गया हो
  • वहाँ जमीन, संपत्ति या किराए से संबंधित दस्तावेज
  • कोई भी ऐसा दस्तावेज जो दिखाता हो कि आवेदक के माता-पिता, दादा-दादी या परदादा-परदादी पाकिस्तान, अफगानिस्तान या बांग्लादेश के नागरिक थे
  • कोई भी ऐसा सरकारी दस्तावेज जो दिखाता हो कि आवेदन इन तीनों देशों का नागरिक है

आवेदन ने 31 दिसंबर, 2014 से पहले भारत में शरण ली है, ये दिखाने के लिए उसके पास निम्न दस्तावेज होने चाहिए:

  • भारत में आने पर जारी किए गए वीजा या इमीग्रेशन स्टाम्प की प्रति
  • FRRO या FRO द्वारा जारी किया गया रेजिडेंशियल परमिट या रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट
  • जनगणना विभाग द्वारा जारी की गई स्लिप
  • भारत में जारी किया गया राशन कार्ड
  • सरकार या अदालत द्वारा जारी किया गया कोई आधिकारिक पत्र
  • भारत में बनाया गया जन्म प्रमाण-पत्र
  • भारत में जमीन, संपत्ति या किराए से संबंधित दस्तावेज
  • PAN कार्ड, उसके जारी किए जाने की तारीख़ के साथ
  • स्थानीय अधिकारियों या जनप्रतिनिधियों द्वारा जारी किया गया कोई दस्तावेज
  • सरकारी-प्राइवेट बैंकों या डाकघर द्वारा जारी किया गया पासबुक
  • भारत में आवेदक के नाम पर इन्सुरेंस पॉलिसी के डिटेल्स
  • इलेक्ट्रिसिटी कनेक्शन या अन्य यूटिलिटी बिल का रसीद व अन्य दस्तावेज जो आवेदक के नाम और हो
  • कोर्ट या ट्रिब्यूनल की प्रक्रिया के दस्तावेज में आवेदक का नाम
  • भारत में EPF/पेंशन से संबंधित दस्तावेज, जिससे पता चले कि आवेदक भारत में काम कर रहा था
  • ESIC (स्टेट इन्सुरेंस कॉर्पोरेशन) से संबंधित दस्तावेज
  • भारत में जारी किया गया स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट
  • स्कूल-कॉलेज-यूनिवर्सिटी या अन्य शैक्षिक एजेंसियों द्वारा जारी किया गया प्रमाण-पत्र
  • आवेदक को जारी किया गया म्युनिसिपेलिटी का ट्रेड लाइसेंस
  • मैरिज सर्टिफिकेट

इस वेबसाइट का नाम ‘भारतीय नागरिकता ऑनलाइन पोर्टल’ रखा गया है। नागरिकता के आवेदन के लिए इसमें कई विकल्प दिए गए हैं। इसमें नीचे CAA का विकल्प दिया गया है। CAA, 2019 के जरिए आवेदन के लिए एक लिंक दिया गया है, जिस पर क्लिक करते ही आपसे ईमेल आईडी या फोन नंबर माँगा जाएगा, जिसके बाद फॉर्म भरने के लिए बाकी डिटेल्स आपके सामने खुल जाएँगे। इसमें आपसे जो-जो डिटेल्स माँगे जा रहे हैं उन्हें भरना होगा और साथ ही ज़रूरी दस्तावेज अपलोड करने होंगे।

अब CAA-2019 नामक मोबाइल अप्लीकेशन के जरिए भी ये काम किया जा सकता है। फॉर्म भरने के लिए जिला स्तर की कमिटी द्वारा उसका निरीक्षण किया जाएगा और आगे की प्रक्रिया के संबंध में ईमेल-SMS के जरिए सूचित किया जाएगा। फिर उसे निष्ठा की शपथ दिलाई जाएगी। ऑनलाइन पोर्टल पर नंबर-ईमेल डालने पर OTP आएगा, जिसे सबमिट करने के बाद फॉर्म के बाकी के डिटेल्स खुलेंगे। सिर्फ कुछ सीधे सवालों का जवाब देने के बाद अप्लीकेशन सबमिट किया जा सकता है।

हैदराबाद की सड़कों पर खुली जीप में निकले PM मोदी, उमड़ा जन सैलाब: मद्रास हाई कोर्ट ने कोयंबटूर में भी रोड शो की दी इजाजत, रोड़े अटका रही थी DMK सरकार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शु्क्रवार (15 मार्च 2024) को दक्षिण भारत की यात्रा पर हैं। तमिलनाडु के कन्याकुमारी में सभा को संबोधित करने के बाद पीएम मोदी तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद के मल्काजगिरी में रोड शो किया। वहीं, तमिलनाडु के कोयम्बटूर में उनके रोड शो को लेकर मद्रास हाई कोर्ट ने इजाजत दे दी है। दरअसल, तमिलनाडु सरकार ने रोड शो के लिए इजाजत देने से इनकार कर दिया था।

हैदराबाद के मल्काजगिरी लोकसभा क्षेत्र में रोड शो के दौरान पीएम मोदी केसरिया रंग की टोपी पहने हुए खुली छत वाले वाहन में सवार थे। इस दौरान उन्होंने सड़क के दोनों ओर खड़े लोगों की ओर हाथ हिलाकर उनका अभिवादन किया। इस रोड शो में सिकंदराबाद और मल्काजगिरी के भाजपा प्रत्याशी भी शामिल थे।

वहीं, पीएम मोदी की तमिलनाडु के कोयंबटूर में 18 मार्च 2024 को होने वाली रोड शो की इजाजत मद्रास हाई कोर्ट ने दे दी। इसके लिए हाई कोर्ट ने कोयंबटूर पुलिस को निर्देश दिया। न्यायाधीश एन आनंद वेंकटेश ने इसके लिए सशर्त इजाजत देने की बात कही। शर्त यह है कि यह यात्रा कोयंबटूर शहर में सिर्फ चार किलोमीटर लंबी होगी।

दरअसल, कोयंबटूर पुलिस ने पीएम मोदी को रोड शो की इजाजत नहीं दी थी। इसके लिए पुलिस ने चार कारण गिनवाए थे। पहला कारण यह बताया था कि यह सुरक्षा के लिहाज से सही नहीं होगा। पुलिस ने दूसरा कारण यह बताया था कि कोयंबटूर संवेदनशील इलाका है। तीसरा कारण बताया गया कि इससे आम लोगों को परेशानी होगी और चौथा कारण बताया कि 18-19 मार्च को छात्रों की परीक्षाएँ हैं। इससे उन्हें दिक्कत होगी।

बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 मार्च 2024 को दक्षिण भारत के तीन राज्यों के दौरे पर है। वे तमिलनाडु, केरल और तेलंगाना में अलग-अलग कार्यक्रम में हिस्सा लिया। ये सारे कार्यक्रम लोकसभा चुनाव प्रचार से जुड़े हुए हैं। वे पहले कन्याकुमारी गए, उसके बाद केरल और अंत में हैदराबाद में रोड शो किया।

BS येदियुरप्पा के खिलाफ जिसकी शिकायत पर POCSO का केस, वह ‘पीड़िता’ 53 लोगों पर दर्ज करवा चुकी है ऐसे ही मामले: पुलिस अधिकारी, नेता से लेकर बिजनेसमैन तक शामिल

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा के खिलाफ शुक्रवार (15 मार्च 2024) को POCSO (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) अधिनियम और आईपीसी की धारा 354 (ए) के तहत मामला दर्ज किया गया। यहाँ एक महिला ने बेंगलुरु के सदाशिवनगर पुलिस स्टेशन से संपर्क कर दावा किया था कि उसकी 17 साल की उम्र की बेटी का बीएस येदियुरप्पा ने यौन उत्पीड़न किया, जब वो दोनों धोखाधड़ी के एक मामले में मदद के लिए उनके पास पहुँची थी।

हालाँकि, टीवी9 कन्नड़ ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि शिकायतकर्ता (नाबालिग लड़की की माँ) इस तरह के मामले 53 मशहूर लोगों के खिलाफ दर्ज करा चुकी है। रिपोर्ट के मुताबिक, लड़की की माँ साल 2015 से अब तक जाने-माने राजनेताओं, पुलिस अधिकारियों और अपने बिजनेस पार्टनर के खिलाफ इस तरह की शिकायतें दर्ज करा चुकी है, जिसमें 2015 में उसने बेंगलुरु के इलेक्ट्रॉनिक सिटी पुलिस स्टेशन में अपने पति के एक रिश्तेदार के खिलाफ भी यही (अपनी बेटी के साथ यौन उत्पीड़न का) मामला दर्ज कराया था।

इस मामले में अब येदियुरप्पा के ऑफिस की तरह से एक लिस्ट जारी की गई है, जिसमें शिकायतकर्ता ने ऐसे मामले दर्ज कराए हैं, जो किसी खास पैटर्न की तरफ इशारा करता है।

कर्नाटक के पूर्व सीएम बीएस येदियुरप्पा के खिलाफ मामला

बता दें कि शुक्रवार (15 मार्च 2024) को एक 17 साल की नाबालिक लड़की की माँ ने पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है, जिसमें उनके खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए गए हैं। इस एफआईआर में बताया गया है कि ये घटना कथित तौर पर 2 फरवरी को हुई, जब वो अपनी बेटी के साथ एक मामले में मदद के लिए उनके पास पहुँची थी।

महिला ने दावा किया कि येदियुरप्पा उनकी बेटी को एक कमरे में ले गए और उसके साथ ‘गलत काम’ को अंजाम दिया। इसके बाद उन्होंने दोनों से माफी माँगी और अनुरोध किया कि दोनों इस मामले में सार्वजनिक तौर पर कुछ भी न बोलें। इस मामले में उनके खिलाफ सदाशिवनगर पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज कराया।

इस मामले में कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने बीएस येदियुरप्पा के खिलाफ जाँच का जिम्मा सीआईडी को सौंपा है।

येदियुरप्पा ने आरोपों से किया इनकार

इस मामले में येदियुरप्पा ने आरोपों से इनकार किया है और आरोपों को बकवास बताया है। उन्होंने कहा कि ये मामला पुलिस कमिश्नर के सामने रखा गया है।

न्यूज एजेंसी एएनआई से बातचीत में उन्होंने कहा, “कुछ दिन पहले एक महिला मेरे घर आई और उसने किसी मामले में मदद माँगी। मैंने इस मामले में पुलिस कमिश्नर को फोन करके उस महिला की मदद के लिए कहा। मैंने उससे कहा कि इस मामले को मैंने कमिश्नर को बता दिया है कि वो मामले को देख लेंगे। बाद में वो महिला मेरे खिलाफ बोलने लगी और अब मेरे खिलाफ उसने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। देखते हैं कि आगे क्या होता है। मुझे इस बारे में बिल्कुल भी नहीं पता कि इसके पीछे कोई राजनीतिक मकसद है।”

इस बीच, कर्नाटक के गृह मंत्री जी परमेश्वर ने कहा कि पुलिस मामले की जाँच कर रही है और जाँच पूरी होने पर सच्चाई सामने आ जाएगी। जब कॉन्ग्रेस नेता से किसी संभावित राजनीतिक साजिश के बारे में पूछा गया तो उन्होंने नकारात्मक जवाब दिया। उन्होंने शिकायतकर्ता के मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित दावों पर भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

कर्नाटक के गृह मंत्री जी परमेश्वर ने इसे संवेदनशील मामला बताया और कहा, “कल रात करीब 10 बजे एक महिला ने बीएस येदियुरप्पा के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है। जब तक हमें सच्चाई का पता नहीं चलता, हम कुछ भी बता नहीं सकते। मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई राजनीतिक एंगल है। अगर पीड़ित महिला को सुरक्षा की जरूरत है तो दी जाएगी।”

बंगलुरु के ‘यतीमखाने’ में मिली 20 अनाथ लड़कियाँ, खाड़ी देशों में निकाह के लिए होती है तस्करी: NCPCR अध्यक्ष ने खोली सलमा एंड गैंग की पोल

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने कर्नाटक के बंगलुरु में एक अवैध यतीमख़ाने को लेकर चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने कहा कि यहाँ रहने वाली बच्चियों से प्राथमिक बातचीत से प्रतीत होता है कि खाड़ी देशों में शादी के नाम पर तस्करी के लिए इन्हें ग्रूम करने का काम यहाँ किया जाता है।

उन्होंने सोशल मीडिया साइट X (पूर्व में ट्विटर) पर कहा कि दक्षिण भारत में पहले भी ऐसे मामले सामने आ चुके हैं। बच्चियों ने बातचीत में बताया कि चिल्ड्रन होम की देखभाल करने वाली सलमा नाम की महिला लड़कियों के रिश्ते कुवैत में तय करवाती है। उन्होंने कहा कि जाँच के दौरान जब लड़कियों को CWC के सामने पेश करने की बात आयी तो सलमा और उसके मालिक समीर ने गुंडों को बुला लिया।

प्रियंक कानूनगो ने X पर लिखा, “इन गुंडों ने झगड़ा करने की कोशिश की। जब पुलिस के हस्तक्षेप से गुंडों को क़ाबू किया तो वे एक गुंडे ने फ़ोन पर किसी को और भीड़ को बुलाने के लिए मस्जिद से एलान करने के लिए कहा। पुलिस की सलाह पर महिला अधिकारियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए हम लोग पुलिस स्टेशन आ गए हैं। कर्नाटक सरकार तुष्टिकरण के चलते अपराधियों के आगे नतमस्तक है।”

NCPCR के अध्यक्ष ने कहा कि इस यतीमखाने में 20 लड़कियाँ थीं, जिनमें अनाथ बच्चियाँ भी हैं। इन बच्चियों को स्कूल नहीं भेजा जाता है। पूरे बालगृह में खिड़की या रोशनदान नहीं है। उन्होंने कहा कि लड़कियों को एकदम क़ैद करके रखा गया है। कुछ बच्चियाँ यहाँ आने के पहले स्कूल जातीं थीं, लेकिन उनकी पढ़ाई छुड़वा दी गयी है।

कर्नाटक सरकार ने गुरुवार (23 नवंबर 2023) को प्रियंक कानूनगो के खिलाफ वारंट जारी किया था। बेंगलुरु में एक यतीमखाने की विजिट के दौरान प्रियंक कानूनगो ने वहाँ के बच्चों की हालत देख उसकी तुलना तालिबानी जिंदगी से कर दी थी। उसी से नाराज होकर कर्नाटक सरकार ने एक शिकायत पर यह कदम उठाया था।

सी यतीमखाने के एक सदस्य की शिकायत पर कर्नाटक पुलिस ने प्रियंक कानूनगो के खिलाफ केस को दर्ज किया था। एनसीपीसीआर ने इस एफआईआर के बाद बयान में बताया था कि 19 नवंबर को कानूनगो ने जिला बाल संरक्षण अधिकारी और अन्य अधिकारियों के साथ एक अवैध यतीमखाने में छापेमारी की थी, जिसका नाम दारुल उलूम सैय्यादिया यतीमखाना है। इसमें कई अनियमतताएँ पाई गई थीं।

इस यतीमखाने के निरीक्षण के बाद एनसीपीसीआर ने कर्नाटक सरकार की क्लास लगाई थी और कहा था कि यह राज्य सरकार की लापरवाही का सुबूत और देश के संविधान का उल्लंघन है। आयोग ने इस पर संज्ञान लेते हुए राज्य के चीफ़ सेक्रेटरी को नोटिस जारी किया था। उनसे 7 दिन के भीतर कार्रवाई करके मामले में रिपोर्ट देने को बोला गया था।