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बीजेपी में कैसे होता है राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव: जानें- प्रक्रिया, नियम, वोटर और अब तक के अध्यक्षों की पूरी सूची

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के केंद्रीय कार्यालय में इन दिनों खासी हलचल है। कल, 19 जनवरी को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल होंगे और परसों, 20 जनवरी को नए अध्यक्ष की औपचारिक घोषणा होगी।

सूत्रों के मुताबिक कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन निर्विरोध चुने जाने की दहलीज पर हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और निवर्तमान अध्यक्ष जेपी नड्डा जैसे दिग्गज उनके प्रस्तावक होंगे।

ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि बीजेपी में राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव होता कैसे है? क्या इसमें वोटिंग होती है? कौन वोट डालता है? क्या चुनाव आयोग की कोई भूमिका होती है? और क्या यह सिर्फ औपचारिक प्रक्रिया है या वास्तव में एक संगठित लोकतांत्रिक ढाँचा? और इस प्रक्रिया की जड़ें पार्टी के संविधान में कहाँ तक जाती हैं?

इस लेख में हम बीजेपी के संविधान, संगठनात्मक परंपराओं और पिछले अनुभवों के आधार पर पूरी प्रक्रिया को विस्तार से समझते हैं।

बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत है उसका संगठन

बीजेपी का संगठनात्मक ढाँचा दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दावा करने वाली इस पार्टी की असली ताकत है। पार्टी का दावा है कि उसके पास 18 करोड़ से ज्यादा प्राथमिक सदस्य हैं। लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव आम कार्यकर्ता सीधे नहीं लड़ता और न ही जनता वोट डालती है।

यह पूरी तरह एक आंतरिक, संगठनात्मक प्रक्रिया है, जिसमें चुनाव आयोग की कोई भूमिका नहीं होती। यह पार्टी का निजी मामला है, ठीक वैसे ही जैसे किसी क्लब या सोसाइटी का अध्यक्ष चुना जाता है।

सबसे नीचे से शुरू होती है चुनाव की प्रक्रिया

बीजेपी का संविधान में बहुत स्पष्ट है कि संगठनात्मक चुनाव बूथ या स्थानीय स्तर से शुरू होते हैं। धारा-7 में संगठनात्मक ढांचा दिया गया है- ग्राम केंद्र/शहरी केंद्र, स्थानीय समिति, मंडल, जिला, प्रदेश और फिर राष्ट्रीय स्तर।

सबसे पहले सदस्यता अभियान चलता है। कोई भी 18 साल से ऊपर का भारतीय नागरिक, जो पार्टी के उद्देश्य (धारा-2), मूल दर्शन (एकात्म मानववाद, धारा-3) और निष्ठाओं (धारा-4) को स्वीकार करता हो, प्राथमिक सदस्य बन सकता है (धारा-9)। सदस्यता सामान्यतः छह साल के लिए होती है और नवीनीकरण जरूरी है।

इसके बाद सक्रिय सदस्य बनने की प्रक्रिया है (धारा-12)। सक्रिय सदस्य वही होता है जिसने कम से कम तीन साल पार्टी में काम किया हो, पार्टी कोष में 100 रुपए जमा किए हों, आंदोलनों में हिस्सा लिया हो और पार्टी पत्रिका का ग्राहक हो। केवल सक्रिय सदस्य ही ऊपरी स्तर के चुनाव लड़ या वोट डाल सकते हैं।

चुनाव की शुरुआत स्थानीय समिति से होती है (धारा-13)। एक स्थानीय समिति में कम से कम 25 सदस्य जरूरी हैं। सदस्यों की संख्या के आधार पर समिति की श्रेणी तय होती है और उसी आधार पर अध्यक्ष व सदस्यों की संख्या। फिर मंडल समिति (धारा-14), जिला समिति (धारा-15), प्रदेश परिषद व कार्यकारिणी (धारा-16 व 17) और अंत में राष्ट्रीय परिषद (धारा-18) का गठन होता है।

यह पूरी प्रक्रिया ‘संगठन पर्व’ के नाम से जानी जाती है, जो हर छह साल में होती है। वर्तमान संगठन पर्व 2024-25 में शुरू हुआ और अब इसका अंतिम चरण चल रहा है।

राष्ट्रीय परिषद और निर्वाचक मंडल

राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव पार्टी संविधान की धारा-19 के तहत होता है। धारा-19(1) स्पष्ट कहती है कि चुनाव एक विशेष निर्वाचक मंडल (Electoral College) द्वारा होगा, जिसमें शामिल हैं-

  • राष्ट्रीय परिषद के धारा 18(1)(क) और (ख) में वर्णित सदस्य (यानी प्रदेशों से लोकसभा सीटों के बराबर चुने गए प्रतिनिधि और संसद सदस्यों द्वारा चुने गए 10%)।
  • प्रदेश परिषदों के धारा 16(1)(क), (ख) और (ग) में वर्णित सदस्य (जिला इकाइयों से विधानसभा सीटों के बराबर चुने गए, विधायक व सांसदों द्वारा चुने गए प्रतिनिधि)।

इस बार निर्वाचक मंडल में करीब 5700 मतदाता हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव तभी हो सकता है जब कम से कम आधे राज्यों (लगभग 19) में संगठनात्मक चुनाव पूरे हो चुके हों।

बीजेपी के संविधान की कॉपी का स्क्रीनशॉट

कौन लड़ सकता है अध्यक्ष पद का चुनाव?

बीजेपी के पार्टी संविधान की धारा-19(3) के अनुसार उम्मीदवार को कम से कम 15 साल प्राथमिक सदस्य और कम से कम चार कार्यकाल (यानी करीब 12 साल) सक्रिय सदस्य रहना जरूरी है। नामांकन के लिए निर्वाचक मंडल के कम से कम 20 सदस्यों का संयुक्त प्रस्ताव जरूरी है, और यह प्रस्ताव कम से कम पाँच अलग-अलग राज्यों (जहाँ राष्ट्रीय परिषद के चुनाव हो चुके हों) से आना चाहिए। उम्मीदवार की लिखित सहमति अनिवार्य है।

नामांकन, जाँच और मतदान की प्रक्रिया

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर चुनाव का इस बार शेड्यूल कुछ ऐसा है-

  • 16 जनवरी: निर्वाचक मंडल की सूची जारी।
  • 19 जनवरी (दोपहर 2 से 4 बजे): नामांकन दाखिल।
  • उसी दिन शाम 4 से 5 बजे: नामांकन पत्रों की जाँच।
  • शाम 5 से 6 बजे: नाम वापसी का समय।
  • अगर एक से ज्यादा वैध उम्मीदवार बचे तो 20 जनवरी को सुबह 11:30 से दोपहर 1:30 बजे तक गुप्त मतदान।
  • उसी दिन नतीजे।

अगर केवल एक वैध नामांकन रह जाए तो उसे निर्विरोध घोषित कर दिया जाता है।

सर्वसम्मति की परंपरा और RSS की छाया

बीजेपी के 45 साल के इतिहास में राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए कभी गुप्त मतदान नहीं हुआ। हमेशा सर्वसम्मति बनी। कारण? पार्टी में ऊपर से नीचे तक सहमति बनाने की मजबूत संस्कृति। और इस सहमति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की अनौपचारिक लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

पार्टी संविधान में RSS का कोई जिक्र नहीं है, लेकिन व्यवहार में संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी और बीजेपी के शीर्ष नेता (खासकर प्रधानमंत्री और गृह मंत्री) मिलकर नाम तय करते हैं। संगठन महामंत्री (जो परंपरागत रूप से संघ से आते हैं) इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण सेतु की भूमिका निभाते हैं।

यह सर्वसम्मति इसलिए भी जरूरी है क्योंकि अध्यक्ष का पद सिर्फ औपचारिक नहीं होता। वह संगठन की दिशा तय करता है, चुनावी रणनीति बनाता है और सरकार के साथ तालमेल रखता है। टकराव पार्टी को कमजोर कर सकता है।

कार्यकाल और एक्सटेंशन की प्रथा

बीजेपी के पार्टी संविधान की धारा-21 के अनुसार कोई व्यक्ति लगातार दो कार्यकाल (प्रत्येक तीन साल का) तक अध्यक्ष रह सकता है, यानी अधिकतम छह साल। उसके बाद ब्रेक जरूरी है। लेकिन हाल के वर्षों में एक्सटेंशन की परंपरा बनी है। जेपी नड्डा जनवरी 2020 में अध्यक्ष बने, उनका कार्यकाल जनवरी 2023 में खत्म हुआ, लेकिन लोकसभा चुनाव 2024 के बाद भी उन्हें एक्सटेंशन मिलता रहा। अब 2026 में नया अध्यक्ष आ रहा है।

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्षों की सूची (1980 से अब तक)

  1. अटल बिहारी वाजपेयी (1980-1986) – पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष, जिन्होंने जनसंघ से बीजेपी का सफर शुरू किया।
  2. लालकृष्ण आडवाणी (1986-1991) – पहली बार, रथ यात्रा और राम मंदिर आंदोलन के दौर में।
  3. मुरली मनोहर जोशी (1991-1993)
  4. लालकृष्ण आडवाणी (1993-1998) – दूसरी बार
  5. कुशाभाऊ ठाकरे (1998-2000)
  6. बंगारू लक्ष्मण (2000-2001)
  7. के. जना कृष्णमूर्ति (2001-2002)
  8. एम. वेंकैया नायडू (2002-2004)
  9. लालकृष्ण आडवाणी (2004-2005) – तीसरी बार
  10. राजनाथ सिंह (2006-2009) – पहली बार
  11. नितिन गडकरी (2009-2013)
  12. राजनाथ सिंह (2013-2014) – दूसरी बार
  13. अमित शाह (2014-2020) – सबसे लंबा और सबसे प्रभावी कार्यकाल, जिसमें पार्टी 300+ सीटों तक पहुँची।
  14. जगत प्रकाश नड्डा (2020-2026 तक) – वर्तमान, जिनके कार्यकाल में 2024 लोकसभा चुनाव लड़ा गया।

(नोट: 2026 में नया अध्यक्ष चुना जा रहा है, जिसके बारे में 20 जनवरी को आधिकारिक घोषणा होगी।)

यह प्रक्रिया दिखाती है कि बीजेपी कितनी अनुशासित और केंद्रीकृत पार्टी है। ऊपर से सहमति बनती है, नीचे तक लागू होती है। यही उसकी संगठनात्मक ताकत का राज है। लेकिन सवाल बना रहता है कि क्या इतनी बड़ी पार्टी में कभी अध्यक्ष पद के लिए खुला मुकाबला देखने को मिलेगा? फिलहाल तो सर्वसम्मति की परंपरा बरकरार है।

किताबों से कूटनीति तक: विश्व पुस्तक मेला 2026 में दिखा भारत-रूस संबंधों का बौद्धिक और सांस्कृतिक सेतु

नई दिल्ली के भारत मंडपम में 10 से 18 जनवरी तक आयोजित दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2026 केवल पुस्तकों की प्रदर्शनी नहीं बल्कि देशों के बीच सांस्कृतिक संवाद और वैचारिक साझेदारी का जीवंत मंच बनकर उभरा है। इस वर्ष मेले में भारत–रूस मित्रता की सशक्त उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि दोनों देशों का रिश्ता केवल कूटनीति या राजनीति तक सीमित नहीं बल्कि साहित्य, संस्कृति और साझा मूल्यों से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

अंतरराष्ट्रीय आयाम में रूस की मजबूत मौजूदगी

मेले में रूस की भागीदारी ने आयोजन को एक विशिष्ट अंतरराष्ट्रीय आयाम दिया। भारत मंडपम में स्थापित रूसी मंडप (पैवेलियन) आकर्षण का केंद्र रहा, जहाँ रूस से जुड़े प्रकाशक, साहित्यिक संस्थान और सांस्कृतिक प्रतिनिधि सक्रिय रूप से शामिल हुए। प्रसिद्ध रूसी लेखक रोमन सेंचिन, इल्या कोचेरगिन और चर्चित नाटककार यारोस्लावा पुलिनोविच की उपस्थिति ने भारतीय पाठकों और साहित्य प्रेमियों को रूसी साहित्य से सीधे संवाद का अवसर दिया।

राजनीति से आगे, विचारों का रिश्ता

विश्व पुस्तक मेले के मंच से यह संदेश उभरकर सामने आया कि भारत–रूस संबंध केवल रणनीतिक या राजनीतिक सहयोग नहीं हैं, बल्कि यह रिश्ता विचारों, इतिहास और सांस्कृतिक समझ पर आधारित है। रूसी लेखकों और भारतीय साहित्यकारों के बीच हुई चर्चाओं में समाज, युद्ध और शांति, मानवीय संवेदनाएं, बच्चों का साहित्य और वैश्विक प्रकाशन जैसे विषयों पर गहन विमर्श हुआ। इन संवादों ने दोनों देशों की साझा चिंताओं और समान दृष्टिकोण को रेखांकित किया।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस मंच ने मेले की अंतरराष्ट्रीय भूमिका को और अधिक सुदृढ़ किया और दर्शाया कि विश्व साहित्य में भारतीय मंच भी सक्रिय और प्रभावशाली भागीदार बन सकता है। रूसी लेखक और वन अधिकारी इल्या कोचेर्गिन ने लेखन को प्राकृतिक जगत के साथ संवाद के रूप में देखा। उनकी पुस्तक ‘इमरजेंसी एग्जिट’ के संदर्भ में, जो एक वृद्ध घोड़े के साथ उनके संबंधों का वृत्तांत है, ने साहित्य को ऐसे क्षेत्र के रूप में स्थापित किया जहाँ मानव और गैर-मानव जीवन एक-दूसरे से मिलते हैं। जहाँ समकालीन पाठकों तक पहुँच बनाए रखने के लिए भाषा का निरंतर विकसित होना आवश्यक है।

नई पीढ़ी तक पहुँचती मित्रता

मेले में छात्रों और Gen-Z युवाओं की उल्लेखनीय उपस्थिति यह संकेत देती है कि भारत–रूस मित्रता केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की साझेदारी भी है। युवा पाठकों की रूसी साहित्य, अनुवादित पुस्तकों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में रुचि यह दर्शाती है कि यह संबंध अगली पीढ़ी तक सहज रूप से स्थानांतरित हो रहा है। कई युवा पाठक रूसी बच्चों के साहित्य और समकालीन लेखन को लेकर विशेष उत्सुकता दिखाते नजर आए।

दशकों पुराने सांस्कृतिक संबंधों का पुनर्पाठ

भारत और रूस के बीच दशकों पुराने सांस्कृतिक संबंधों को इस पुस्तक मेले में किताबों, अनुवादों और विचार-विमर्श के माध्यम से नए संदर्भ में प्रस्तुत किया गया। 17 जनवरी को आयोजित एक विशेष सत्र में भारतीय प्रकाशन उद्योग में रूसी पुस्तकों की भूमिका और भविष्य की संभावनाओं पर चर्चा हुई। यह मंच दोनों देशों के प्रकाशकों के लिए सहयोग के नए द्वार खोलने वाला साबित हुआ।

साहित्य के माध्यम से मजबूत होती दोस्ती

इस वर्ष मेले की थीम भारतीय सैन्य इतिहास रही, जिसमें 35 से अधिक देशों ने भाग लिया। ऐसे में रूस की उपस्थिति ने यह भी रेखांकित किया कि ऐतिहासिक अनुभवों और संघर्षों को समझने में साहित्य की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। रूस और भारत दोनों ही देशों के इतिहास में संघर्ष, बलिदान और राष्ट्रीय चेतना की गहरी छाप रही है, जिसे साहित्य ने पीढ़ियों तक जीवित रखा है।

कुल मिलाकर, दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2026 में भारत-रूस मित्रता शब्दों और विचारों के माध्यम से और अधिक सशक्त होती दिखाई दी। यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि जब किताबें संवाद का माध्यम बनती हैं, तो देशों के बीच की दूरियाँ स्वतः ही कम हो जाती हैं और रिश्ते समय के साथ और गहरे होते जाते हैं।

जले नोटों पर चुप्पी, सवालों पर ‘मीडिया ट्रायल’ का लेबल: क्या न्यायपालिका खुद को कानून से ऊपर मानती है?

14 मार्च 2025। होली का दिन। दिल्ली की एक कोठी में आग बुझाने दमकलकर्मी पहुँचते हैं। अंदर से जले हुए नोटों के बंडल मिलते हैं। यह कोई आम निजी आवास नहीं था, बल्कि उस समय दिल्ली हाई कोर्ट में पदस्थ जस्टिस यशवंत वर्मा का सरकारी निवास था।

इसके बाद घटनाओं की एक श्रृंखला शुरू होती है। जस्टिस वर्मा का तबादला इलाहाबाद हाई कोर्ट के लिए कर दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट की ‘इन हाउस जाँच’ से लेकर संसद में महाभियोग प्रस्ताव तक की चर्चा सुनाई पड़ती है।

लेकिन 2026 में प्रवेश कर चुके भारत में एक तथ्य अडिग है- जस्टिस यशवंत वर्मा आज भी न्यायिक सेवा में हैं। इस बीच पूरे मामले को दूसरा रंग देने की कोशिशें भी शुरू हो गई है। इसी कड़ी में वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी, जो इससे जुड़े एक मामले में जस्टिस वर्मा की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी कर चुके हैं, ने एक किताब के विमोचन के अवसर पर टिप्पणी की है।

रोहतगी ने जस्टिस वर्मा का नाम लिए बिना कहा है,

जिस तरह से मीडिया ट्रायल हुआ है, उसमें अगर वह जज बरी भी हो जाएँ, तो कोई नहीं मानेगा कि वे ईमानदार थे। उनका करियर खत्म हो चुका है।

सुनने में यह बात संवेदनशील लगती है। लेकिन यही वह बिंदु है, जहाँ भावना और तथ्य अलग हो जाते हैं।

मीडिया ट्रायल न्यायिक करियर नष्ट कर देता है- यह तर्क नया नहीं है। यह वही घिसा-पिटा हथियार है, जिसका इस्तेमाल तब किया जाता है, जब सवाल असुविधाजनक हो।

असल समस्या मीडिया नहीं है। असल समस्या यह है कि न्यायपालिका आलोचना से असहज होती है। भारतीय अभिजात वर्ग को मीडिया ट्रायल की चिंता चुनिंदा मौकों पर ही सताती है। खासकर जब ऊँगली न्यायपालिका या उसके भीतर बैठे प्रभावशाली चेहरे पर उठती है।

यह केवल संयोग है या फिर संस्थागत आत्मरक्षा की प्रवृत्ति?

एक समय था जब मुख्यधारा मीडिया न्यायपालिका को लगभग पवित्र मानती थी। कोर्ट की अवमानना का डर न्यूजरूम को खामोश रखता था। न्यायिक आचरण पर सवाल उठाना ईशनिंदा के समान माना जाता था।

वह दौर अब खत्म हो चुका है। सोशल मीडिया के युग में न्यायिक व्यवहार जनता की निगरानी में आ गया है। अब सवाल पूछने की जिम्मेदारी सिर्फ संपादकों की नहीं, नागरिकों की भी है।

यह सत्य है कि न्यायपालिका लोकतंत्र का स्तंभ है। लेकिन वह लोकतांत्रिक निगरानी से ऊपर नहीं हो सकती। यदि किसी न्यायाधीश पर गंभीर आरोप लगते हैं, तो क्या जनता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि मामला क्या है? क्या ‘न्यायिक गरिमा’ का अर्थ पूर्ण मौन होता है?

मुकुल रोहतगी का यह कथन कि ‘बरी होने के बाद भी कोई नहीं मानेगा’ दरअसल मीडिया पर आरोप नहीं, बल्कि संस्थागत अविश्वास की स्वीकारोक्ति है। यदि अदालत का फैसला जनता को आश्वस्त नहीं कर पाता है तो दोष कैमरे का नहीं, प्रक्रिया की अपारदर्शिता का है।

यह स्थिति न्यायपालिका ने खुद बनाई है। भारतीय न्यायपालिका संभवतः दुनिया की इकलौती ऐसी संस्था है जो अपनी नियुक्ति खुद तय करती है। अपनी जाँच खुद करती है। अपनी जवाबदेही की सीमा खुद खींचती है।

कॉलेजियम सिस्टम संविधान में नहीं है। संसद ने इसे नहीं बनाया। यह 1993 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से उपजा एक आत्म-नियुक्त ढाँचा है। इस व्यवस्था में RTI लागू नहीं है। लोकपाल लागू नहीं है। संपत्ति की घोषणा अनिवार्य नहीं है।

यह स्थिति लोकतांत्रिक असंतुलन पैदा करती है। जब सरकार और संसद ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) के जरिए सुधार की कोशिश की तो सुप्रीम कोर्ट ने उसे ‘संविधान के मूल ढाँचे पर हमला’ बताकर खारिज कर दिया।

क्या जवाबदेही सुनिश्चित करना भी न्यायपालिका के मूल ढाँचे के खिलाफ है?

यह भी तथ्य है कि नोटों के बंडल मिलने से पहले भी जस्टिस वर्मा का न्यायिक व्यवहार विवादों से अछूता नहीं था। चाहे वह सिंभावली शुगर्स से जुड़ा मामला हो या प्रकाश इंडस्ट्रीज से। लेकिन इन पर गंभीर सार्वजनिक बहस कभी नहीं हुई, क्योंकि तब तक ‘गरिमा’ का कवच सलामत था।

यह भी सत्य है की मुख्यधारा की मीडिया में सनसनी है। टीआरपी की होड़ है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि कई संस्थागत सड़ाँध इसी मीडिया के कारण उजागर हुई है। यदि मीडिया पूरी तरह चुप रहती तो देश कभी उन सवालों से रूबरू ही नहीं हो पाता।

समस्या मीडिया ट्रायल नहीं है। समस्या यह है कि न्यायपालिका आलोचना के लिए तैयार नहीं है। ऐसे में मुकुल रोहतगी का बयान बहस छेड़ता है, लेकिन अधूरी।

असली प्रश्न यह नहीं है कि मीडिया न्यायिक करियर नष्ट करती है या नहीं। असली प्रश्न यह है कि क्या भारतीय न्यायपालिका सार्वजनिक जाँच और आलोचना का सामना करने को तैयार है?

यदि नहीं, तो ‘गरिमा’ के नाम पर जवाबदेही से बचना लोकतंत्र नहीं, संस्थागत आत्मरक्षा है।

सनद रहे लोकतंत्र में गरिमा बचाई नहीं जाती, कमाई जाती है।

मुस्लिम वोटबैंक की नई दिशा, कॉन्ग्रेस की छाया से निकलकर ‘अपनी’ पार्टियों की ओर बढ़ते कदम: महाराष्ट्र में दिखा ट्रेलर, असम-पश्चिम बंगाल में दिखने वाला है पूरा शो

महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों ने भारतीय राजनीति में एक नया संकेत दिया है। मुस्लिम बहुल इलाकों में अब कॉन्ग्रेस या अन्य सेकुलर दलों की छाया में रहकर वोट देने की पुरानी आदत टूट रही है। इसके बजाय मुस्लिम मतदाता खुलकर अपनी पहचान वाली पार्टियों के पीछे खड़े हो रहे हैं। असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने जहाँ राज्य भर में 114 से 125 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया, वहीं मालेगांव जैसे शहर में स्थानीय स्तर की ‘इस्लाम पार्टी’ ने सबसे बड़ी पार्टी बनकर इतिहास रच दिया।

यह सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल में भी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) से निष्कासित विधायक हुमायूँ कबीर अपनी नई पार्टी लेकर मैदान में उतर रहे हैं और ओवैसी से गठबंधन की बात कर रहे हैं। उनका दावा है कि 2026 के विधानसभा चुनाव में वह किंगमेकर बनेंगे। तो वहीं असम में AIUDF भी वही काम कर रही है। यह सब मिलाकर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि क्या मुस्लिम वोटबैंक अब पूरी तरह से अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने की ओर बढ़ रहा है?

महाराष्ट्र निकाय चुनाव में AIMIM का दमदार उभार

महाराष्ट्र के 29 नगर निकाय चुनावों में 15 जनवरी 2026 को हुए AIMIM ने अपेक्षा से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया। पार्टी ने कुल 114 से 125 वार्डों में जीत हासिल की, जो पिछले चुनावों की तुलना में दोगुनी से ज्यादा है। छत्रपति संभाजीनगर (पहले औरंगाबाद) में पार्टी ने 33 सीटें जीतकर खुद को दूसरी सबसे बड़ी ताकत बना लिया।

यहाँ भाजपा के बाद AIMIM ही सबसे मजबूत दिखी। मालेगांव में 21, नांदेड़ में 13-14, धुले में 10, सोलापुर में 8, मुंबई (BMC) में 8, अमरावती में 11-12, नागपुर में 7 और ठाणे-मुंब्रा में 5-5 सीटें जीतीं। कुल मिलाकर पार्टी ने समाजवादी पार्टी (SP), महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) और एनसीपी (शरद पवार गुट) को पीछे छोड़ दिया।

AIMIM के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने कहा, “वॉर्ड के चुनाव बुनियादी मुद्दों पर होते हैं। जनता को लग रहा था कि इतने सालों से वह जिन्हें वोट देकर जिता रहे थे, वह उनके लिए काम ही नहीं कर रहे। ऐसे में उन्होंने ओवैसी साहब पर यकीन जताया।” समाजवादी पार्टी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि SP का महाराष्ट्र में सूपड़ा साफ हो गया और जनता ने उनके घमंड को चकनाचूर कर दिया।

महाराष्ट्र अध्यक्ष इम्तियाज जलील ने भी इस जीत का श्रेय ओवैसी की रैलियों और पार्टी के काम को दिया। उन्होंने कहा कि अब AIMIM का समर्थन सिर्फ मुसलमानों तक सीमित नहीं है। अनुसूचित जाति, जनजाति और कुछ हिंदू मतदाता भी पार्टी के पक्ष में आ रहे हैं। संभाजीनगर के गुलमंडी वार्ड जैसे इलाके, जो पहले शिवसेना-भाजपा का गढ़ थे, वहां भी AIMIM के उम्मीदवार जीते। मुंबई में जीतीं खैरुन्निसा अकबर हुसैन ने कहा, “यह जीत जनता की है। हम उन मुद्दों पर काम करेंगे जो हमने उठाए थे।”

यह प्रदर्शन इसलिए भी खास है क्योंकि पार्टी में चुनाव से पहले आंतरिक कलह थी। मुंबई इकाई के अध्यक्ष ने इस्तीफा दे दिया था और जलील को धमकियां मिली थीं। फिर भी ओवैसी और उनके भाई अकबरुद्दीन की रैलियों ने माहौल बना दिया। कई जगहों पर AIMIM किंगमेकर की भूमिका में आ गई है, जहां महायुति या महाविकास अघाड़ी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला।

मालेगांव में इस्लाम पार्टी का तूफान

मालेगांव की कहानी इससे भी आगे की है। पावरलूम और बुनकरों के शहर मालेगांव में राष्ट्रीय दलों की लहर नहीं चली। यहाँ ‘इस्लाम पार्टी’ (फुल फॉर्म: Indian Secular Largest Assembly of Maharashtra) ने 84 सीटों वाली नगर निगम में 35 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बन गई। बहुमत के लिए 43 सीटें चाहिए, इसलिए अब समाजवादी पार्टी (5 सीटें) और कॉन्ग्रेस (3 सीटें) की ओर नजरें हैं। अगर ये साथ आए तो इस्लाम पार्टी का पहला मेयर बनना तय है।

इस्लाम पार्टी की स्थापना 2024 में पूर्व कॉन्ग्रेस विधायक आसिफ शेख ने की थी। पार्टी का मुख्य एजेंडा स्थानीय मुद्दे हैं – पावरलूम उद्योग बचाना, बिजली-पानी की सुविधाएं और बुनकरों की समस्याएं। नाम भले धार्मिक लगे, लेकिन फोकस सेकुलर और लोकल है। यहां भाजपा सिर्फ 2 सीटों पर सिमट गई, कॉन्ग्रेस 3 पर और एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने 18 सीटें जीतकर तीसरा स्थान पाया। AIMIM, जो पहले मजबूत थी, इस बार 21 सीटों पर रुक गई। मुफ्ती इस्माइल जैसे नेता का जादू नहीं चला।

स्थानीय लोग कहते हैं कि राष्ट्रीय दल बड़े वादे करते हैं लेकिन जमीन पर काम नहीं करते। इस्लाम पार्टी ने यही गैप भरा। यह जीत साबित करती है कि मुस्लिम बहुल इलाकों में अब ‘बाहरी’ पार्टियों से ज्यादा ‘अपनी’ और लोकल पहचान वाली पार्टियां पसंद की जा रही हैं।

कॉन्ग्रेस और सेकुलर दलों का नुकसान

इन नतीजों से सबसे बड़ा नुकसान कॉन्ग्रेस, समाजवादी पार्टी और एनसीपी जैसे दलों को हुआ। मुस्लिम वोटबैंक, जो दशकों से इन दलों का मजबूत आधार था, अब बंट रहा है। ओवैसी लगातार उन मुद्दों पर बोलते हैं जिन पर सेकुलर दल चुप रहते हैं- अल्पसंख्यक अधिकार, असुरक्षा की भावना और स्थानीय समस्याएँ। युवा मुस्लिम मतदाताओं में उनकी दमदार बोलने की शैली लोकप्रिय है।

राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि अल्पसंख्यकों में बढ़ती असुरक्षा और पारंपरिक दलों की नाकामी ने यह बदलाव लाया है। अब मुस्लिम मतदाता खुद तय कर रहे हैं कि उन्हें अपनी पहचान वाली पार्टी चाहिए।

पश्चिम बंगाल में अगला ट्रेलर तैयार

महाराष्ट्र का यह ट्रेलर पश्चिम बंगाल में पूरा शो बन सकता है। TMC से निष्कासित विधायक हुमायूँ कबीर ने नई पार्टी लॉन्च की। कबीर मुर्शिदाबाद में अयोध्या की बाबरी मस्जिद जैसी मस्जिद बना रहे हैं। उनका दावा है कि 2026 विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी 135 सीटों पर लड़ेगी और वह किंगमेकर बनेंगे।

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी करीब 30% है और 120-126 सीटों पर निर्णायक। 45 सीटें ऐसी हैं जहाँ 50% से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं। कबीर का कैलकुलेशन है कि अगर TMC का वोटबैंक बंटे तो वह फायदा उठा सकते हैं। 2021 में TMC को 215 सीटें मिली थीं, जो बहुमत से काफी ज्यादा थीं। अगर TMC को 100 सीटों का नुकसान हो और कबीर 40-50 जीत लें तो वह किंगमेकर बन सकते हैं। इससे भाजपा को भी फायदा हो सकता है, जो सबसे बड़ी पार्टी बन जाएगी।

कबीर ने ‘मस्जिद, मुसलमान और ओवैसी’ का कॉकटेल बनाया है। बिहार के बाद ओवैसी की स्वीकार्यता बढ़ी है। 2021 में बंगाल में AIMIM अकेले लड़ी थी लेकिन मुस्लिम वोट TMC के पास रहा था। अब लोकल लीडर कबीर के साथ गठबंधन और बाबरी मस्जिद का इमोशनल फैक्टर नया प्रयोग है। अगर मुस्लिम वोट ध्रुवीकृत हुआ तो TMC को बड़ा नुकसान हो सकता है।

असम में मुस्लिम राजनीति की बदलती तस्वीर, अपनी पहचान की ओर बढ़ते कदम

असम में मुस्लिम वोटबैंक की राजनीति लंबे समय से AIUDF (ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) के इर्द-गिर्द घूमती रही है। बदरुद्दीन अजमल की यह पार्टी मुस्लिम बहुल इलाकों में मजबूत आधार रखती है और कॉन्ग्रेस की छाया से बाहर अपनी अलग पहचान बना चुकी है। 2026 विधानसभा चुनाव से पहले यह ट्रेंड और मजबूत होता दिख रहा है।

हालिया खबरों में अजमल ने असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM के साथ गठबंधन का संकेत दिया है, जिससे कॉन्ग्रेस काफी बैचेन है। अजमल ने दावा किया कि उनकी पार्टी कॉन्ग्रेस को पीछे छोड़ सकती है, जबकि कॉन्ग्रेस ने AIUDF से किसी गठबंधन की संभावना को साफ खारिज कर दिया।

यह बदलाव ऊपर वाले मुद्दे से जुड़ता है- मुस्लिम मतदाता अब पारंपरिक सेकुलर दलों की बजाय अपनी पहचान वाली पार्टियों को तरजीह दे रहे हैं। असम में बांग्लादेशी घुसपैठ, NRC और CAA जैसे मुद्दों ने मुस्लिम राजनीति को और ध्रुवीकृत किया है। BJP इसे ‘लोकल vs माइग्रेंट मुस्लिम’ के रूप में पेश कर रही है, जबकि हिमंता बिस्वा सरमा की लोकप्रियता सर्वे में ऊंची है।

AIUDF-AIMIM का संभावित टाइ-अप कॉन्ग्रेस के मुस्लिम वोटबैंक में सेंध लगा सकता है। अगर यह हुआ तो असम में भी महाराष्ट्र जैसा ट्रेंड दिखेगा, जहाँ मुस्लिम वोट अपनी पार्टियों के पीछे एकजुट हो रहा है। हालाँकि, BJP की मजबूत पकड़ और इंडिजिनस मुद्दों के कारण विपक्ष के लिए चुनौती बड़ी है।

भविष्य के मायने: नई मुस्लिम राजनीति का उदय

ये सारे घटनाक्रम एक बड़ा बदलाव दिखाते हैं। मुस्लिम मतदाता अब कॉन्ग्रेस, सपा या TMC जैसे दलों की छाया में नहीं रहना चाहते। वे अपनी पार्टियों के साथ खुलकर खड़े हो रहे हैं- चाहे वह AIMIM हो, इस्लाम पार्टी हो, AIUDF हो या हुमायूँ कबीर की नई पार्टी। यह बदलाव कई कारणों से हुआ है। एक तो पारंपरिक सेकुलर दलों की नाकामी- वे मुद्दे उठाते तो हैं लेकिन जमीन पर काम नहीं करते। दूसरा, ओवैसी जैसे नेताओं की दमदार आवाज और युवाओं में लोकप्रियता। तीसरा, स्थानीय मुद्दों पर फोकस करने वाली नई पार्टियां।

यह बदलाव सेकुलर दलों के लिए खतरे की घंटी है। मुस्लिम वोट बंटने से विपक्ष कमजोर होगा और सत्तारूढ़ दलों को फायदा मिल सकता है। लेकिन लंबे समय में यह मुस्लिम राजनीति को मजबूत बनाएगा। मुस्लिम समुदाय अब खुद अपनी राजनीतिक पहचान गढ़ रहा है, न कि दूसरों की छाया में रहकर। महाराष्ट्र ने ट्रेलर दिखाया, पश्चिम बंगाल में पूरा शो आने वाला है। अन्य राज्य जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश, केरल और कर्नाटक में भी ऐसे संकेत मिल रहे हैं। भारतीय राजनीति का यह नया अध्याय दिलचस्प होगा।

जाँच में सही निकला ‘गुरुओं’ के अपमान का आतिशी का वीडियो, जानें- कैसे पंजाब और दिल्ली सरकार के बीच जंग का मैदान बनीं FSL लैब्स

दिल्ली विधानसभा से जुड़े एक विवादित वीडियो की फोरेंसिक जाँच के बाद अब दिल्ली की राजनीति में नया मोड़ ले लिया है। जिस वीडियो को आम आदमी पार्टी (AAP) लगातार ‘डॉक्टर्ड’ बताती रही और जिस आधार पर FIR तक दर्ज कराई गई, वही वीडियो फोरेंसिक साइंस लैब (FSL) की रिपोर्ट में पूरी तरह ठीक पाया गया है। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि ऑडियो और वीडियो दोनों में किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं हुई है।

FSL रिपोर्ट सार्वजनिक होते ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने AAP और नेता विपक्ष आतिशी पर सीधा हमला तेज कर दिया है। BJP का सवाल है कि जब वीडियो असली साबित हो चुका है, तो क्या आतिशी अपने विधानसभा बयान पर माफी माँगेंगी या अब भी इनकार की राजनीति जारी रहेगी।

दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष ने क्या बताया?

दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने शनिवार (17 जनवरी 2025) को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर FSL रिपोर्ट की जानकारी दी। उन्होंने कहा, “रिपोर्ट में कहा गया है कि जो ट्रांसक्रिप्शन दिया गया था और आॉडियो-वीडियो में जो था, उसमें कोई किसी प्रकार की छेड़खानी नहीं है।”

विधानसभा की कार्यवाही की ट्रांसक्रिप्ट (फोटो साभार: News18)

गुप्ता ने कहा, “विपक्ष ने जाँच की माँग की थी और सत्तारूढ़ दल ने भी माँग पर मुहर लगाई थी और जाँच का फैसला सर्वसम्मति से लिया गया था। जब यह वीडियो जाँच के लिए चली गई तो अचानक 9 जनवरी को खबर आई कि पंजाब सरकार ने उसकी जाँच भी करा ली, रिपोर्ट भी आ गई और FIR भी दर्ज करा ली। आज इन सबका दूध का दूध और पानी का पानी हो गया है। वीडियो और ऑडियो में कोई छेड़छाड़ नहीं हुई है।”

कैसे शुरु हुआ यह विवाद?

इस मामले की शुरुआत 6 जनवरी 2026 को हुई जब शाम 4 बजे के आस-पास दिल्ली विधानसभा की कार्यवाही के दौरान सदन के अंदर पक्ष-विपक्ष के बीच प्रदूषण के मुद्दे पर चर्चा के लिए बहस हो रही थी। इसी बीच में BJP के नेताओं ने आरोप लगाया कि नेता प्रतिपक्ष आतिशी ने सदन की कार्यवाही के दौरान गुरुओं का अपमान किया है।

इसके अगले यानी 7 जनवरी 2026 को दिल्ली के मंत्री कपिल मिश्रा ने आतिशी का सदन के भीतर बोलते हुए एक वीडियो शेयर किया। कपिल मिश्रा ने वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “कल जब दिल्ली विधानसभा में हो रहा था गुरुओं का सम्मान , तब नेता विपक्ष आतिशी ने बहुत भद्दी और शर्मनाक भाषा का इस्तेमाल किया। खुद सुनिए… क्या ऐसे व्यक्ति को पवित्र सदन में रहने का अधिकार है ?”

इस वीडियो में आतिशी कथित तौर पर कह रही हैं, “आप कराइए ना चर्चा, कुत्तों का सम्मान करो, गुरुओं का सम्मान करो।” यह वीडियो दिल्ली BJP के X हैंडल समेत कई नेताओं द्वारा शेयर किया गया था।

आतिशी ने क्या कहा?

आतिशी ने इस वीडियो पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए BJP पर राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने 7 जनवरी को रात में X पर एक लंबा पोस्ट लिख जवाब दिया। आतिशी ने लिखा, “बीजेपी ने गुरु तेग़ बहादुर जी के नाम को गलत तरीके से इस्तेमाल किया और गुरु साहब का अपमान किया।”

उन्होंने आगे कहा, “वीडियो में मैंने बीजेपी के प्रदूषण की चर्चा से बचने और उनके विधान सभा में आवारा कुत्तों के मुद्दे पर हुए प्रोटेस्ट के बारे में कहा है. ‘तो आप कराइये ना चर्चा, क्यों सुबह से भाग रहें हैं? कह रहें हैं, कुत्तों का सम्मान करो! कुत्तों का सम्मान करो! अध्यक्ष महोदय इस पर आप चर्चा कराइए।’ लेकिन बीजेपी ने झूठा सब-टाइटल लगा कर गुरु तेग बहादुर जी का नाम उसमें डाला।”

विवाद के बाद फॉरेंसिक साइंस लैब भेजा गया वीडियो

8 जनवरी को दिल्ली विधानसभा में इस पूरे विवाद ने निर्णायक मोड़ तब लिया, जब विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की माँग को स्वीकार करते हुए सदन की आधिकारिक ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को फॉरेंसिक साइंस लैब भेजने का आदेश दिया।

इसके बाद FSL ने मामले की गहन तकनीकी जाँच शुरू की। जाँच के दौरान वीडियो और ऑडियो दोनों की बारीकी से पड़ताल की गई, जिसमें सदन की कार्यवाही का शब्दशः ट्रांसक्रिप्शन, वर्बेटिम रिकॉर्ड और डिजिटल तकनीकी डेटा का आपस में मिलान किया गया ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि रिकॉर्डिंग में किसी तरह की छेड़छाड़ या एडिटिंग हुई है या नहीं।

पंजाब सरकार की फॉरेंसिक जाँच और कपिल मिश्रा पर FIR

9 जनवरी 2026 को पंजाब पुलिस ने एक प्रेस रिलीज जारी करते हुए बताया कि जालंधर पुलिस कमिश्नरेट में दिल्ली विधानसभा की नेता प्रतिपक्ष और विधायक आतिशी का एक ‘एडिटेड और छेड़छाड़ किया हुआ वीडियो’ सोशल मीडिया पर अपलोड और वायरल करने के मामले में FIR दर्ज की गई है। यह FIR इकबाल सिंह की शिकायत पर दर्ज की गई है।

पंजाब पुलिस ने बताया, “मामले की जाँच वैज्ञानिक तरीके से की गई है और आतिशी के ऑडियो वाली वीडियो क्लिप कपिल मिश्रा के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से डाउनलोड की गई थी और फॉरेंसिक जाँच के लिए फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी को भेजी गई थी।”

पंजाब पुलिस ने फॉरेंसिक रिपोर्ट को लेकर कहा, “फॉरेंसिक रिपोर्ट में यह सामने आया है कि सोशल मीडिया पर सर्कुलेट हो रही वीडियो क्लिप में आतिशी ने अपने ऑडियो में ‘गुरु’ शब्द नहीं बोला है। इसके अलावा वीडियो में जानबूझकर छेड़छाड़ की गई है ताकि कैप्शन में ऐसे शब्द डाले जा सकें जो आतिशी ने कभी नहीं बोले।” क्योंकि पंजाब में AAP की सरकार है तो शायद उन्हें पंजाब में केस करना मुफीद लगा होगा। हालाँकि, यह पूरा मामला दिल्ली की विधायक, दिल्ली के मंत्री और दिल्ली विधानसभा के भीतर का था।

कपिल मिश्रा का पलटवार

मंत्री कपिल मिश्रा ने इस FIR को लेकर पलटवार किया। मिश्रा ने X पर लिखा, “केजरीवाल जी , आपकी FIR और पुलिस का डर हमें डरा नहीं सकता दिल्ली विधानसभा के रिकॉर्ड में वीडियो है और सारी दुनिया ने वीडियो सुना है।”

मंत्री ने आगे लिखा, “उस दिन से आतिशी ने विधानसभा में आने की हिम्मत नहीं की जबकि विधानसभा अध्यक्ष ने उन्हें कई बार बुलाया पंजाब पुलिस पंजाब के अपराधों की जाँच छोड़कर आपके नेता विपक्ष द्वारा हुए अपराध पर पर्दा डालने का काम कर रहीं है आतिशी ने गुनाह किया लेकिन उन्हें बचाकर आप उससे भी बड़ा पाप कर रहें हैं।”

जालंधर की कोर्ट ने बिना कपिल मिश्रा को सुने दिया फैसला

15 जनवरी 2026 को जालंधर की एक अदालत ने कपिल मिश्रा से जुड़े फर्जी वीडियो मामले में कहा कि फॉरेंसिक जाँच में यह वीडियो एडिट और डॉक्टर्ड पाया गया है। अदालत ने इस मामले को गंभीर मानते हुए सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को आदेश दिया है कि वे इस वीडियो को तुरंत हटाएँ। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि जिन लिंक और अकाउंट्स से यह वीडियो पोस्ट किया गया था, उन्हें भी हटाया जाए।

PTI द्वारा साझा की गई आदेश की कॉपी के मुताबिक, कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “वीडियो फाइल का विश्लेषण सीनियर कॉन्स्टेबल राकेश कुमार नंबर (सोशल मीडिया विशेषज्ञ) जो 2024 से टेक्निकल सेल में तैनात हैं, ने AI टूल ‘Gemini.ai’ का उपयोग करके किया है। जिससे पता चलता है कि वीडियो नकली और डिजिटल रूप से बदला हुआ है। इसके अलावा, जालंधर पुलिस कमिश्नर द्वारा मोहाली की राज्य फॉरेंसिक लैब को 8 जनवरी को एक पत्र भेजा गया है ताकि वीडियो फाइल में इस्तेमाल किए गए ऑडियो की फॉरेंसिक जाँच की जा सके। फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की रिपोर्ट में बताया गया है कि जाँच और मेटाडेटा के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया है कि ‘गुरु’ शब्द स्पीकर द्वारा नहीं बोला गया था।”

कोर्ट ने कहा, “आवेदक/अभियोजन पक्ष का स्पष्ट कहना है कि यदि इस वीडियो का आगे भी प्रसार हुआ, तो इससे सामाजिक सौहार्द बिगड़ सकता है और सांप्रदायिक तनाव और ज्यादा बढ़ सकता है। मेटा प्लेटफॉर्म्स, इंस्टाग्राम, फेसबुक, एक्स (X) और टेलीग्राम को निर्देश दिया जाता है कि वे ऊपर बताए गए विशेष URL से जुड़े सभी कंटेंट को हटाएँ। कथित आपत्तिजनक सामग्री को तुरंत हटाया जाए और किसी भी स्थिति में अदालत का आदेश मिलने के 24 घंटे के भीतर इसे हटाना अनिवार्य होगा।”

IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, कपिल मिश्रा से जुड़े फर्जी वीडियो मामले में न तो कपिल मिश्रा को और न ही किसी अन्य व्यक्ति को इस केस में पक्षकार बनाया गया। पंजाब सरकार ने इस मामले में केवल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को ही पक्षकार बनाया। पंजाब सरकार ने अदालत को बताया कि संबंधित वीडियो फर्जी है। अपने आदेश में अदालत ने यह दर्ज किया कि ‘आवेदक (जो इस मामले में खुद पंजाब सरकार है) का मानना है कि यह वीडियो एडिट और डॉक्टर्ड है’।

सुनवाई के दौरान अदालत में केवल पंजाब सरकार के वकील मौजूद थे। वीडियो बनाने या पोस्ट करने वाले किसी व्यक्ति की ओर से कोई पक्ष अदालत के सामने नहीं रखा गया। पंजाब सरकार की दलीलों को स्वीकार करते हुए अदालत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को वीडियो हटाने का आदेश दिया।

जालंधर कोर्ट के आदेश पर शनिवार (17 जनवरी 2026) को विजेंद्र गुप्ता ने कहा, “यह कोई अंतिम आदेश नहीं है बल्कि अंतरिम आदेश है। यह आदेश पूरी तरह सिर्फ एक फॉरेंसिक रिपोर्ट पर आधारित है, जिसे कोर्ट में चुनौती देने का मौका नहीं दिया गया है। आतिशी के पास जब राजनीतिक जवाब नहीं बना तो पंजाब सरकार ने दबाव में एजेंसियों को आगे किया और उन्हीं के दबाव में यह आदेश हासिल किया है।”

पंजाब के DGP और FSL विभाग को नोटिस

विजेंद्र गुप्ता ने बताया है कि दिल्ली विधानसभा द्वारा पंजाब के FSL विभाग को नोटिस जारी किया जा रहा है। उन्होंने कहा, “रिपोर्ट किस आधार पर तैयार की गई, इस संबंध में विभाग से विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा गया है। FSL को अपना जवाब प्रस्तुत करने के लिए 22 जनवरी तक का समय दिया जा रहा है।”

दिल्ली विधानसभा सचिवालय ने इसे लेकर पंजाब के पुलिस महानिदेशक (DGP), जालंधर के पुलिस आयुक्त और पंजाब पुलिस के विशेष डीजीपी (साइबर सेल) को भी नोटिस भेजा है।

आतिशी के खिलाफ नोटिस जारी

दिल्ली विधानसभा में सिख गुरुओं को लेकर कथित अपमानजनक टिप्पणी के मामले में विशेषाधिकार समिति ने आतिशी से लिखित स्पष्टीकरण माँगा है। विधानसभा अध्यक्ष ने आतिशी को सदन में उपस्थित होकर अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर दिया था लेकिन वह 8 जनवरी को भी सदन में नहीं आईं।

आतिशी की अनुपस्थिति और किसी तरह की सफाई न दिए जाने को देखते हुए विधानसभा अध्यक्ष ने यह मामला विशेषाधिकार समिति को भेज दिया। इसके बाद विशेषाधिकार समिति के सभापति ने आतिशी को निर्देश दिया है कि वे इस पूरे मामले पर अपना-अपना लिखित बयान 19 जनवरी 2026 तक जमा करें।

आगे की राह

यह पूरा विवाद अब केवल एक वीडियो या फॉरेंसिक रिपोर्ट तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि यह सीधे तौर पर AAP और BJP की राजनीति लड़ाई में बदल गया है। दोनों दलों के अपने-अपने दावे और अपनी-अपनी रिपोर्ट में हैं, पंजाब सरकार की कार्रवाई पर कई सवाल हैं जिनका जवाब पंजाब के विभागों को देना है और आने वाले दिनों में ये जवाब भी इस मामले में आगे की राह तय करेंगे। फिलहाल, दोनों पार्टियों में से कोई भी अपनी बात से पीछे हटने को तैयार नहीं है।

BJP का आरोप है कि पंजाब सरकार की मशीनरी का इस्तेमाल दिल्ली की राजनीति को प्रभावित करने के लिए किया गया। यदि यह धारणा मजबूत होती है, तो इसका असर पंजाब में AAP की ‘ईमानदार और अलग राजनीति’ की छवि पर पड़ेगा। AAP के लिए चुनौती यह है कि वह एक तरफ अपने नेता दावे को सही साबित करे और दूसरी तरफ यह चुनौती भी है कि वह बताए कि सरकारी संस्थाओं का दुरुपयोग नहीं हुआ।

UGC का नया ‘इक्विटी’ नियम कॉन्ग्रेस के कम्युनल वॉयलेंस बिल जैसा: जनरल कैटेगिरी के लोगों से भेदभाव, झूठी शिकायतों की नहीं कोई जवाबदेही, जानें इससे जुड़ी हर बात

यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन (यूजीसी) ने मंगलवार (13 जनवरी 2026) को हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस में इक्विटी प्रमोशन रेगुलेशंस 2026 का ऐलान किया, जो 2012 के पुराने फ्रेमवर्क की जगह लेगा। यह नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (एनईपी) 2020 के ‘इक्विटी और इनक्लूजन’ की जगह लेगा और इसका दावा है कि इसका मकसद भारतीय कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज में भेदभाव से निपटने के लिए प्रक्रियाओं को संस्थागत बनाना है।

रेगुलेशन का बताया गया लक्ष्य है- “केवल धर्म, नस्ल, लिंग, जन्म स्थान, जाति या विकलांगता के आधार पर भेदभाव को खत्म करना। खासकर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, विकलांग व्यक्तियों या इनमें से किसी के खिलाफ और हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस में स्टेकहोल्डर्स के बीच पूर्ण इक्विटी और इनक्लूजन को बढ़ावा देना।”

हालाँकि इस साधारण सी लाइन से शायद ही कोई भौंह चढ़ाए क्योंकि देश में दशकों से सकारात्मक कार्रवाई ऐसी ही रही है। लेकिन नोटिफिकेशन की आगे की शब्दावली इसे ‘खासकर खिलाफ’ नहीं बल्कि ‘सिर्फ’ एससी/एसटी/ओबीसी वर्ग के लोगों के लिए बनाती है और सामान्य जाति के लोगों को उनकी जाति की वजह से भेदभाव का शिकार मानने से पूरी तरह बाहर कर देती है।

इस बताए गए लक्ष्य को पूरा करने के लिए यूजीसी ने देश के सभी हायर एजुकेशन संस्थानों में इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर्स, इक्विटी कमेटियाँ, 24 घंटे हेल्पलाइन और तय समय में शिकायत निपटाने की व्यवस्था बनाने का आदेश दिया है। ये नियम संस्थान के अधिकारियों की भूमिका को काफी बढ़ाते हैं, खासकर व्यवहार की निगरानी, शिकायतों का फैसला और नियम लागू करने में। ऐसे समय में जब कैंपस सामाजिक, राजनीतिक और विचारधारा के झगड़ों का अखाड़ा बनते जा रहे हैं। ये सलाह देने वाले दिशानिर्देशों से बदलकर सख्त अनुपालन वाले फ्रेमवर्क की ओर ले जाते हैं।

ऐसे नियमों के डिजाइन और अमल का ड्यू प्रोसेस, एकेडमिक आजादी और संस्थान की तटस्थता पर गहरा असर पड़ता है।

भेदभाव कम करने का लक्ष्य तो ठीक और जरूरी है, लेकिन ‘हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस में इक्विटी प्रमोशन रेगुलेशंस 2026’ के तहत बने नियमों की इन प्रावधानों की वजह से कड़ी आलोचना हो रही है जो एक खतरनाक परंपरा को और मजबूत करते हैं कि सामान्य जाति (जनरल कास्ट) के लोग जाति की वजह से भेदभाव के शिकार कभी नहीं हो सकते। ये नियम जाति भेदभाव की झूठी शिकायतों पर कोई सजा नहीं देते, जिससे ये बिल्कुल गलत धारणा और बढ़ती है कि एससी/एसटी वर्ग के किसी व्यक्ति की शिकायत अपने आप सच्ची होती है और सामान्य जाति का कोई व्यक्ति शुरू से ही अपराधी है। इससे ये नियम बेहद सख्त और अन्यायपूर्ण हो जाते हैं।

क्या कहते हैं नियम

यूजीसी के इक्विटी प्रमोशन नियम भारत के सभी हायर एजुकेशन संस्थानों पर लागू होते हैं- सेंट्रल, स्टेट, प्राइवेट और डीम्ड यूनिवर्सिटीज सहित। ये सभी लोगों को कवर करते हैं- स्टूडेंट्स, टीचर्स, स्टाफ और संस्थान के अधिकारी। ये ऑफिशियल गजट में छपते ही लागू हो गए।

नियम भेदभाव की बहुत व्यापक परिभाषा अपनाते हैं – स्पष्ट और छिपे हुए दोनों तरह के काम जो बराबरी के इलाज को खराब करें या इंसान की इज्जत को ठेस पहुँचाएँ। भेदभाव जाति, धर्म, लिंग, दिव्यांगता और जन्म स्थान जैसे आधारों पर बताया गया है, लेकिन खास और सिर्फ जोर एससी, एसटी, ओबीसी, ईडब्ल्यूएस और दिव्यांग लोगों पर है।

इन प्रावधानों को लागू करने के लिए हर संस्थान को इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर (ईओसी) बनाना होगा। ईओसी इक्विटी बढ़ाने, काउंसलिंग देने, बाहर की एजेंसियों से तालमेल करने, शिकायत पोर्टल चलाने और इनक्लूजन की पहलों की निगरानी करने का मुख्य केंद्र होगा। अगर कॉलेज में पर्याप्त टीचर्स नहीं हैं तो ये काम जुड़ी हुई यूनिवर्सिटी करेगी।

हर ईओसी इक्विटी कमेटी के जरिए काम करेगा। कमेटी की अध्यक्षता संस्थान का हेड करेगा और इसमें टीचर्स, स्टाफ, स्टूडेंट्स और सिविल सोसाइटी के लोग होंगे, वंचित ग्रुप्स से जरूरी प्रतिनिधित्व के साथ। कमेटी भेदभाव की शिकायतों की जांच करेगी और कार्रवाई की सिफारिशें देगी।

नियमों में ‘इक्विटी स्क्वाड्स’ और ‘इक्विटी एम्बेसडर्स’ भी लाए गए हैं जो कैंपस की निगरानी करेंगे और संभावित गलतियों की रिपोर्ट करेंगे। साथ ही 24×7 इक्विटी हेल्पलाइन सभी के लिए होगी। शिकायतें ऑनलाइन, लिखित या हेल्पलाइन से की जा सकती हैं, गोपनीयता के साथ। अगर शिकायत में शुरू से ही अपराध दिखे तो पुलिस को भेजी जाएगी।

नियमों में मुख्य संरचनात्मक कमियाँ

यूजीसी इक्विटी प्रमोशन रेगुलेशंस 2026 का संरचनात्मक डिजाइन प्रक्रिया की संतुलन और संस्थान की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाता है। फ्रेमवर्क स्पीड, लोगों की धारणा और अनुपालन को तरजीह देता है लेकिन सुरक्षा, स्पष्टता और सही प्रक्रिया में बड़ी खामियाँ छोड़ देता है। इससे खतरनाक रूढ़ियाँ बढ़ती हैं, एक तरफ की गिल्ट मान ली जाती है और सामान्य वर्ग के लोगों को बदनाम किया जाता है, जबकि झूठी शिकायतों और मासूम स्टूडेंट्स की जिंदगी पर उनके असर को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

झूठी SC-SC शिकायतों के खिलाफ कोई सुरक्षा नहीं यानी सामान्य जाति को शुरू से अपराधी मानना

नियमों की सबसे बड़ी कमी ये है कि जानबूझकर झूठी शिकायतों को रोकने का कोई साफ प्रावधान नहीं है। फ्रेमवर्क शिकायत करने वालों को गोपनीयता, तेज जाँच और बदले की कार्रवाई से सुरक्षा देने पर बहुत जोर देता है। गलत इस्तेमाल के नतीजों पर पूरी तरह चुप है।

झूठे आरोपों का निपटारा अस्पष्ट संस्थान नियमों और अफसरों की मर्जी पर छोड़ दिया गया है। मूल रूप से नियम सिर्फ इतना कहते हैं कि कमेटी की रिपोर्ट से नाराज कोई व्यक्ति 30 दिन में अपील कर सकता है और ओम्बड्सपर्सन को 30 दिन में अपील निपटानी होगी।

झूठी शिकायतों पर कोई सजा या कीमत नहीं है। इससे एससी/एसटी वर्ग का कोई व्यक्ति बिना सबूत के आरोप लगा सकता है और सामान्य जाति के व्यक्ति को जेल भिजवा सकता है, बहुत कम या बिना सबूत के।

इससे जोखिम का असंतुलन हो जाता है: शिकायत करने की कीमत कम है लेकिन आरोपी के लिए नाम खराब होना, पढ़ाई बर्बाद होना, मानसिक तनाव और जेल भी हो सकती है।

ऐसे झूठे आरोपों से मासूम लोगों की लंबी जेल होने के ढेरों सबूत हैं।

जनवरी 2025 में जबलपुर में एससी/एसटी एक्ट और उसके अमल पर हुए वर्कशॉप में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जज विवेक अग्रवाल ने इस एक्ट के बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल पर चिंता जताई। उन्होंने महिलाओं के खिलाफ अपराधों वाले कानूनों के गलत इस्तेमाल पर भी चिंता दिखाई।

12 जनवरी 2025 को हुए कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जस्टिस अग्रवाल ने एससी/एसटी एक्ट के मामलों में ईमानदार जांच और ईमानदार मुकदमा चलाने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने पुलिस और अभियोजन अधिकारियों से कहा कि असली और झूठे आरोपों को अच्छे से अलग करें। उन्होंने कहा, “अगर हमारे पास अधिकार है तो ये ड्यूटी भी है कि कोई मासूम गलत सजा न पाए। गड़बड़ियां छाननी होंगी और सच्चाई सामने लानी होगी।”

जस्टिस अग्रवाल ने पुलिस और अभियोजन को चेताया कि एससी/एसटी एक्ट में मुआवजे का प्रावधान है। इसलिए जैसे ही ऐसे मामले सामने आते हैं, बिचौलिए सक्रिय हो जाते हैं और मुआवजा दिलाने के नाम पर मासूमों को फंसाते हैं। उन्होंने बताया कि कैसे दलाल फर्जी केस दर्ज कराकर मुआवजा लेते हैं और अपना हिस्सा काटते हैं।

जस्टिस अग्रवाल ने कहा, “बहुत बार लोगों को एससी/एसटी में झूठा फँसाया जाता है। जाँच अधिकारी ध्यान रखें कि मासूम न फँसें और दोषी न बचें। इसमें कहीं न कहीं प्रशासन, पुलिस और न्यायपालिका कमी कर रही है। इसलिए जाँच में ध्यान रखें कि दलालों के चलते हमारी साख न खराब हो। अधिकार है तो ड्यूटी भी है कि मासूम गलत सजा न पाए। गड़बड़ियाँ छानकर सच्चाई सामने लानी होगी।”

साल 2024 में एक केस सामने आया जिसमें जज ने सामान्य जाति के व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा रद्द कर दिया, कहा कि सख्त एससी/एसटी एक्ट का इस्तेमाल जमीन माफिया की रक्षा के लिए हो रहा था।

अलीगढ़ में एक परिवार ने झूठे एससी/एसटी केस दर्ज करके लाखों रुपए ऐंठे। 10 साल में 15 फर्जी केस करके सामान्य जाति वालों से पैसे वसूले।

ये तो बस कुछ ही मामले हैं।

दरअसल एससी/एसटी एक्ट में झूठी शिकायतें बढ़ने से अदालतें भी सतर्क हो गई हैं और कई मामलों में शिकायत करने वाले को झूठ के लिए जेल भेजा है।

अक्टूबर 2025 में लखनऊ की स्पेशल एससी/एसटी कोर्ट ने एक महिला को झूठी शिकायत करने के लिए 3 साल की सजा दी, कहा कि ऐसे केस बढ़ रहे हैं।

महिला को आईपीसी की धारा 182 (सरकारी अफसर को झूठी जानकारी देना) में 6 महीने और धारा 211 (नुकसान पहुँचाने के इरादे से झूठा आरोप) में 3 साल की सजा हुई।

जुलाई 2025 में पूर्व चीफ जस्टिस बीआर गवई ने कहा कि एससी/एसटी एक्ट का इस्तेमाल निजी दुश्मनी निपटाने के लिए नहीं हो सकता। केस दो एससी ग्रुप्स के बीच जमीन का था लेकिन शिकायतकर्ता ने एससी/एसटी एक्ट लगा दिया।

बेंच ने कहा, “जहाँ मुकदमे में साफ कानूनी कमी हो या पूरा केस निजी दुश्मनी निपटाने का हथियार हो, वहाँ शुरुआत में ही मुकदमा रद्द करना चाहिए ताकि आरोपी को अनावश्यक परेशानी न हो।”

एससी/एसटी एक्ट में दर्ज ज्यादातर केस झूठे होने के ढेर सबूत हैं। कई निजी दुश्मनी, न्याय को अपने पक्ष में झुकाने या सामान्य जाति वालों से जाति की नफरत की वजह से होते हैं।

ऐसे में कोई तर्क नहीं बनता कि हायर एजुकेशन में इक्विटी प्रमोशन रेगुलेशंस 2026 में झूठी शिकायतों के खिलाफ कोई प्रावधान या सख्त सजा क्यों नहीं है। गलत इरादे वाली शिकायतों को रोकने का कोई स्पष्ट तरीका नहीं है।

ये नियम गलत इस्तेमाल को बढ़ावा देने का खतरा पैदा करते हैं।

‘भेदभाव’ की परिभाषा में चुनिंदा तटस्थता, लिंग में बराबरी लेकिन जाति में नहीं

कानून भेदभाव की बहुत चौड़ी परिभाषा लेता है- छिपा पूर्वाग्रह और ऐसा व्यवहार भी जो बराबरी या इज्जत को ठेस पहुँचाए। इससे व्यक्तिपरकता और व्याख्या की अनिश्चितता बढ़ती है। सबसे जरूरी बात, नियम तटस्थता को चुनिंदा तरीके से लागू करते हैं। कानून में ‘लिंग’ का मतलब पुरुष, महिला और थर्ड जेंडर है। लिंग में फ्रेमवर्क पूरी तरह तटस्थ है, बिना किसी शर्त के, सभी को कवर करता है बिना किसी को अपराधी बनाए। ये खास बात है क्योंकि आम नीतियाँ लिंग की सुरक्षा महिलाओं के पक्ष में ज्यादा करती हैं।

लेकिन जाति के मामले में ऐसी तटस्थता नहीं है।

नियमों में ‘जाति आधारित भेदभाव’ का मतलब सिर्फ अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के खिलाफ भेदभाव है। रोजमर्रा की जिंदगी में लोग सरनेम से जाति के आधार पर पहचाने जाते हैं। जैसे रोहित शर्मा नाम वाला स्टूडेंट जाति की वजह से ज्यादा कैटेगरी में डाला जाएगा लिंग की बजाय। फिर भी नियम जाति भेदभाव को सिर्फ पहले से तय वंचित ग्रुप्स तक सीमित रखते हैं, बिना ये माने कि जाति पूर्वाग्रह इनके बाहर भी हो सकता है।

जब लिंग में तटस्थता मुमकिन और अच्छी है तो जाति में वैसी ही स्पष्ट तटस्थता न होना डिजाइन की गलती या जानबूझकर हकीकत न देखना दिखाता है।

यानी अगर नियम मान सकते हैं कि पुरुष और महिला दोनों लिंग की वजह से भेदभाव के शिकार हो सकते हैं तो सवाल ये है कि हर जाति के लोग जाति भेदभाव के शिकार हो सकते हैं, ये क्यों नहीं माना। नियम लगभग साफ कहते हैं कि अगर शिकार की जाति ‘ऐतिहासिक रूप से दबी हुई’ नहीं है तो वो कभी भेदभाव का शिकार नहीं हो सकता – जो हकीकत से मेल नहीं खाता। ऐसा भेदभाव का फ्रेम इक्विटी या न्याय नहीं लाता, बल्कि बाँटता है, खतरा पैदा करता है और उकसाता है।

संस्थान के अंदर ही सारी ताकत

शिकायत निपटाने की व्यवस्था में सारी बड़ी ताकत संस्थान के अंदर ही है। संस्थान का हेड इक्विटी कमेटी बनाता और देखता है जो पूर्वाग्रह के आरोपों की जाँच करती है। वही हेड कमेटी के फैसले पर कार्रवाई भी करता है।

बाहर की निगरानी सिर्फ अपील में ओम्बड्सपर्सन (यूजीसी द्वारा नियुक्त व्यक्ति) से आती है। तब तक शुरुआती फैसले और कार्रवाई से नुकसान हो चुका होता है। ये व्यवस्था संस्थान की डर, राजनीतिक दबाव या विचारधारा से प्रभावित होने का खतरा पैदा करती है। पहले चरण में स्वतंत्र बाहर के सदस्य न होना पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता और निष्पक्षता को कमजोर करता है।

इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर- एनजीओ और ‘सिविल सोसाइटी सदस्यों’ का शामिल करने वाली समस्या

नियम कहते हैं कि “हर हायर एजुकेशन संस्थान को वंचित ग्रुप्स के लिए नीतियों और प्रोग्राम्स के अच्छे अमल की निगरानी के लिए इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर बनाना होगा; पढ़ाई, पैसा, सामाजिक और दूसरे मामलों में सलाह और मदद देना होगा; और कैंपस में विविधता बढ़ानी होगी। अगर कॉलेज में कम से कम पाँच टीचर्स नहीं हैं तो उसका काम जुड़ी यूनिवर्सिटी का सेंटर करेगा।”

इसके लिए नियम कहते हैं कि ये सेंटर “सिविल सोसाइटी, लोकल मीडिया, पुलिस, जिला प्रशासन, इस क्षेत्र में काम करने वाले गैर-सरकारी संगठनों, टीचर्स, स्टाफ और अभिभावकों के साथ मिलकर बनाए जाएंगे ताकि नियमों के उद्देश्य पूरे हों।”

सिविल सोसाइटी सदस्यों और एनजीओ को शामिल करना समस्या पैदा करता है क्योंकि इतिहास में ऐसे संगठन राजनीतिक फायदे के लिए हिंदू समाज में फूट ही डालते रहे हैं।

मिसाल के लिए ‘दलित राइट्स’ संगठन इक्वैलिटी लैब्स लें। नए नियमों में इक्वैलिटी लैब्स सिविल सोसाइटी और एनजीओ के रूप में क्वालिफाई करेगी और नियमों के उद्देश्य पूरे करने में मदद करेगी।

इक्वैलिटी लैब्स अमेरिका में एक कट्टर वामपंथी संगठन है जो कई सालों से हिंदुओं के खिलाफ काम कर रहा है। डिसइंफो लैब ने ‘ऑपरेशन TUPAC’ पर विस्तृत रिपोर्ट छापी जिसमें भारत की कमजोर कड़ियों का फायदा उठाने वाले संगठनों को समझाया गया। इसमें इक्वैलिटी लैब्स का अच्छा खासा जिक्र है।

रिपोर्ट कहती है–

अमेरिका में जाति की कमजोरी पर काम करने वाला मुख्य संगठन इक्वैलिटी लैब्स है। ये 2016 में बना, अम्बेडकरवादी साउथ एशियन पावर बनाने वाला संगठन, ‘जाति भेदभाव’ से लड़ने के नाम पर। इसकी संस्थापक थेन्मोझी साउंदराराजन हैं। वो अमेरिका में जन्मी-पली दलित टेक विशेषज्ञ, कलाकार और एक्टिविस्ट है।। संगठन खुद को प्रोग्रेसिव बताता है और जाति भेदभाव से लड़ने का दावा करता है लेकिन भारत को जाति की बीमारी और दमन वाला देश दिखाने की कोशिश करता है- ब्रिटिशों वाला पुराना नैरेटिव जो पश्चिमी मूल्यों को थोपने के लिए इस्तेमाल होता था। दूसरी सह-संस्थापक शर्मिन हुसैन हैं, बांग्लादेशी अमेरिकन, जो मार्च 2021 तक पॉलिटिकल डायरेक्टर रहीं। अप्रैल 2021 में उन्होंने क्वियर क्रेसेंट नाम का नया संगठन बनाया जो एलजीबीटीक्यूआई+ मुस्लिम्स का पॉलिटिकल घर है।

साल 2018 में इक्वैलिटी लैब्स ने अमेरिका में जाति रिपोर्ट छापी, कई संगठनों की मदद से जैसे आईएएमसी, ओएफएमआई और एलाइंस फॉर जस्टिस एंड अकाउंटेबिलिटी (एजेए)- दलित संगठनों का गठबंधन आईएएमसी, ओएफएमआई और हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स के साथ।

जुलाई 2020 में कैलिफोर्निया के फेयर एम्प्लॉयमेंट डिपार्टमेंट और दो इंडियन ओरिजिन कर्मचारियों ने सिस्को कंपनी पर जाति भेदभाव का मुकदमा किया। आरोप था कि एक दलित कर्मचारी (जॉन डो) को दो इंडियन सहकर्मियों सुंदर अय्यर और रमना कोम्पेला ने 2016 से भेदभाव किया। मुकदमे में इक्वैलिटी लैब्स की 2018 रिपोर्ट का जिक्र था। उसके बाद थेन्मोझी साउंदराराजन ने मीडिया पर आकर मुद्दा और उछाला।

जाति के अलावा इक्वैलिटी लैब्स भारत के अंदरूनी मामलों में गहरी दिलचस्पी लेती है और ऐसी लाइनों पर काम करती है जो भारत की कमजोरियाँ हैं। सीएए प्रोटेस्ट के समय ये सक्रिय हुई। तब इसने सीएए, एनआरसी और एनपीआर को भारत में नरसंहार से जोड़ा और एक पेज का पैम्फलेट छापा और उसे हर तरफ बाँटा।

इसने प्रोटेस्ट और ऑनलाइन कैंपेन के लिए ‘हिंदू फासिज्म के खिलाफ ऑर्गनाइजिंग’ नाम का टूलकिट भी जारी किया। इसमें सैंपल ट्वीट्स और तरीके थे। पासवर्ड था ‘RejctCAA’। टूलकिट में ऑल्टन्यूज, इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन और सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर जैसे प्लेटफॉर्म्स को सपोर्ट करने को कहा गया।

डिसइंफो लैब की रिसर्च के मुताबिक, 14 नवंबर 2017 को थेन्मोझी साउंदराराजन और पीटर फ्राइडरिच ने भारत के कास्ट सिस्टम को कैलिफोर्निया के कोर्स से बदलने के खिलाफ कैलिफोर्निया एजुकेशन डिपार्टमेंट में प्रोटेस्ट किया। ओएफएमआई की स्थापना पीटर फ्राइडरिच ने की जो साउथ एशिया का खुद को विशेषज्ञ बताता है और खालिस्तानी आतंकी भजन सिंह भिंडर का साथी है। ओएफएमआई भजन सिंह भिंडर और उसके कर्मचारी पीटर फ्राइडरिच चलाते थे, जो 1990 में आईएसआई के साथ मिलकर भारत में आतंक के लिए हथियार भेजता था।

मई 2019 में इक्वैलिटी लैब्स की संस्थापक ने खालिस्तानी आतंकी संगठन सिख्स फॉर जस्टिस के गुरपतवंत पन्नू के साथ कार्यक्रम किया। हिंदूपैक्ट ने फोटो शेयर की जो 22 मई 2019 की बताई गई। ये लोकसभा 2019 नतीजों से एक दिन पहले था। उसी दिन थेन्मोझी की इक्वैलिटी लैब ने अमेरिका में जाति भेदभाव पर कॉन्ग्रेस ब्रीफिंग की, जो उनके संदिग्ध सर्वे पर आधारित थी। वही सर्वे एसबी403 बिल तक पहुँचा।

अब नए नियमों के मुताबिक ये जमात-ए-इस्लामी, खालिस्तानी और एंटी-हिंदू ताकतों वाला संगठन भारतीय यूनिवर्सिटीज में बराबरी और निष्पक्षता लाने का सही साथी होगा क्योंकि ये दलित अधिकारों पर काम करने का दावा करता है। सभी तरह की शिकायतों के खिलाफ सुरक्षा न होने और गिल्ट पहले से मान लेने की वजह से नियम ऐसे संगठनों को स्वीकार करेंगे जो भारत और हिंदुओं के खिलाफ काम करते हैं और अन्याय को बढ़ावा देंगे।

सबूत का कोई तय मानक नहीं, सामान्य जाति को नकारात्मक साबित करना, शिकायतकर्ता की कोई जवाबदेही नहीं

नियमों में जाँच के लिए सबूत का कोई मानक नहीं बताया गया। कोई स्पष्टता नहीं कि कितना सबूत चाहिए, बोझ किस पर है या गवाही, दस्तावेज या परिस्थितिजन्य सबूत का वजन कितना होगा। ऐसे में जाँचें सबूतों पर नहीं बल्कि कहानी पर चलेंगी, फैसले तथ्यों से नहीं धारणा से होंगे। इससे सही प्रक्रिया का आधार कमजोर होता है और अलग-अलग संस्थानों में अलग फैसले हो सकते हैं, इससे निष्पक्षता और कानूनी मजबूती दोनों कमजोर होती है।

जब नियम एक पक्ष (सामान्य जाति) को पहले से अपराधी मानते हैं तो सबूत का बोझ बदल जाता है और मानक कम हो जाता है। शिकायत करने वाले को साबित नहीं करना पड़ता कि भेदभाव हुआ, बल्कि आरोपी को साबित करना पड़ता है कि उसने वो नहीं किया- जो लगभग नामुमकिन है क्योंकि नकारात्मक साबित करना मुश्किल होता है और वो पहले से अपराधी माना जा चुका है।

तेज प्रक्रिया और उसके नतीजे

नियम तेज कार्रवाई पर जोर देते हैं ताकि संस्थान सुस्ती न करें, लेकिन सख्त समयसीमा प्रक्रिया की गहराई से ज्यादा स्पीड को तरजीह देती है। गंभीर आरोपों, पढ़ाई के फैसले, व्यक्तिगत झगड़े या अलग कहानियों वाले कॉम्प्लेक्स केस में समय और सावधानी से जाँच चाहिए।

गाइडलाइंस के मुताबिक कमेटी 24 घंटे में मिलेगी कार्रवाई के लिए; इक्विटी कमेटी 15 काम के दिनों में रिपोर्ट देगी; संस्थान हेड 7 काम के दिनों में आगे कार्रवाई शुरू करेगा।

इससे ओवरकरेक्शन का खतरा है। संस्थान अनुपालन के लिए डिफेंसिव फैसले लेंगे। समय के साथ पढ़ाई की बातचीत ठंडी पड़ सकती है, खुली चर्चा कम हो सकती है और सावधानी वाले फैसले की जगह डर से कार्रवाई होगी।

क्या बेहतर हो सकता था

नियम एससी/एसटी या ओबीसी शिकायतकर्ताओं को मजबूत प्रक्रिया सुरक्षा देते हैं लेकिन सामान्य वर्ग के लिए वैसी सुरक्षा नहीं। गलत शिकायतों को रोकने का स्पष्ट तरीका, सबूत का मानक या पहले चरण में स्वतंत्र निगरानी न होना सभी को प्रभावित करता है।

ज्यादा मजबूत फ्रेमवर्क सख्त रुख से बचता और दोनों तरफ सुरक्षा देता। इसमें गलत इरादे वाली शिकायतों का स्पष्ट प्रावधान, सबूत के साफ मानक और सभी वर्गों में तटस्थता होती। लिंग की तरह जो बिना पूर्वाग्रह के सभी को कवर करता है। ऐसे कदम नियमों की विश्वसनीयता बढ़ाते और चुनिंदा निष्पक्षता की शिकायत कम करते।

भेदभाव से सुरक्षा और प्रक्रिया के गलत इस्तेमाल से सुरक्षा को साफ अलग न करके नियम अविश्वास और गलत समझ पैदा करते हैं। इस कमी को दूर करने से इक्विटी के उद्देश्य कमजोर नहीं होते, बल्कि मजबूत होते क्योंकि निष्पक्षता दोनों तरफ काम करती।

इरादा बनाम डिजाइन, कम्युनल वायलेंस बिल की याद

यूजीसी इक्विटी प्रमोशन रेगुलेशंस 2026 का उद्देश्य है कि कैंपस संविधान की बराबरी और इज्जत की गारंटी निभाएँ और टीचर्स, स्टाफ, स्टूडेंट्स को गलत व्यवहार से बचाएँ।

लेकिन अच्छा इरादा अकेला अच्छा डिजाइन नहीं बनाता। हर व्यक्ति के अधिकार बचाने वाला फ्रेमवर्क खुद सही प्रक्रिया, सबूत की स्पष्टता और संतुलन पर टिका होना चाहिए। स्पीड, धारणा और अनुपालन को तरजीह देकर जरूरी सुरक्षा छोड़ने से नियम एक गलत को दूसरे से बदलने का खतरा पैदा करते हैं। बिना साफ मानक, दोनों तरफ सुरक्षा या गलत इस्तेमाल से बचाव के इक्विटी तंत्र अनजाने में डर, खुद सेंसरशिप और डर से फैसले पैदा कर सकते हैं।

दरअसल ये यूजीसी नियम उस कम्युनल वायलेंस बिल से बेहतर नहीं हैं जिसे कॉन्ग्रेस की सरकार लाना चाहती थी।

कम्युनल वायलेंस बिल का ड्राफ्ट, आधिकारिक नाम प्रिवेंशन ऑफ कम्युनल एंड टारगेटेड वायलेंस (एक्सेस टू जस्टिस एंड रेपरेशंस) बिल 2011, अगर पास होता तो सबसे खराब कानूनों में होता। बिल मानता था कि कम्युनल हिंसा के शिकार सिर्फ धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक और एससी-एसटी हो सकते हैं, हकीकत को नजरअंदाज करके। तब अरुण जेटली ने सही कहा था कि बिल बहुसंख्यक विरोधी है और मानता है कि कम्युनल हिंसा में हमेशा बहुसंख्यक दोषी होता है। मौजूदा नियम उसी सख्त कम्युनल वायलेंस बिल की कॉपी लगते हैं जिसे 32 ‘सिविल सोसाइटी सदस्यों’ और विदेशी कनेक्शन वाले एनजीओ ने मिलकर लिखा था।

हाल के समय में ब्राह्मण विरोधी बातें उफान पर हैं और भेदभाव का पलड़ा सामान्य जाति कहे जाने वालों के खिलाफ झुक गया है। 2024 की एक रिसर्च ने कहा कि नाजियों की यहूदियों से नफरत वैसी ही डीईआई प्रोग्राम्स से ब्राह्मणों के खिलाफ नॉर्मल की जा रही है।

नाजियों वाली नफरत ब्राह्मणों पर: एक रिसर्च पेपर ने क्या कहा

रटगर्स यूनिवर्सिटी और नेटवर्क कंटेजियन रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनसीआरआई) की हालिया स्टडी का नाम है इंस्ट्रक्टिंग एनिमोसिटी: हाउ डीईआई पेडागॉजी प्रोड्यूसेज द होस्टाइल एट्रिब्यूशन बायस। इसमें पाया गया कि डीईआई प्रोग्राम्स ब्राह्मणों जैसे कुछ धार्मिक, नस्ली और जाति ग्रुप्स के खिलाफ गलत धारणाएँ और नफरत फैला रहे हैं जबकि मुस्लिमों के लिए बेवजह हमदर्दी पैदा कर रहे हैं।

जाति संवेदनशीलता ट्रेनिंग के असर की जाँच में रिसर्च ने एंटी-ब्राह्मण एक्टिविस्ट ग्रुप इक्वैलिटी लैब्स की ट्रेनिंग सामग्री को प्रयोग के रूप में इस्तेमाल किया। न्यूट्रल एकेडमिक सोर्स को कंट्रोल के रूप में। दो ग्रुप्स थे- एक को-इक्वैलिटी लैब्स वाला टेक्स्ट, दूसरे को न्यूट्रल।

दोनों ग्रुप्स ने टेक्स्ट पढ़ने के बाद बिना जाति संकेत वाला सिनेरियो देखा। स्टडी में पाया गया कि इक्वैलिटी लैब्स वाला टेक्स्ट पढ़ने वालों में माइक्रोएग्रेशन, नुकसान और इंटरव्यू में पूर्वाग्रह की धारणा काफी ज्यादा थी (क्रमशः 32.5%, 15.6% और 11% ज्यादा)।

आगे पता चला कि इक्वैलिटी लैब्स टेक्स्ट पढ़ने वाले 19% ज्यादा तैयार थे सिनेरियो के एडमिनिस्ट्रेटर को सजा देने को और 47% ने हिंदुओं को “नस्लवादी” माना। ये दिखाता है कि डीईआई कंटेंट पूर्वाग्रह हटा नहीं रहा बल्कि हिंदुओं, खासकर ऊपरी जाति कहे जाने वाले ब्राह्मणों के खिलाफ पैदा कर रहा है जो पहले से एंटी-हिंदू ताकतों की नफरत के शिकार हैं।

इसी तरह जब डीईआई वाला मैटेरियल पढ़ने वालों ने हिटलर के स्टेटमेंट्स और माइन कैंपफ के बदले वर्जन देखे जिसमें ‘ज्यू’ की जगह ‘ब्राह्मण’ था, तो वे ज्यादा सहमत थे कि ब्राह्मण ‘परजीवी’ (+35.4%), ‘वायरस’ (+33.8%) और ‘शैतान का अवतार’ (+27.1%) हैं।

रटगर्स-एनसीआरआई की रिसर्च बताती है कि डीईआई प्रोग्राम्स के दावे के उलट नाजियों की यहूदियों से नफरत कुछ डीईआई प्रोग्राम्स से ब्राह्मणों के खिलाफ नॉर्मल हो रही है। नाजी जर्मनी में यहूदी नरसंहार रातोंरात नहीं हुआ, ये धीरे-धीरे प्रोपगैंडा और नफरत के फैलाव का नतीजा था। यहूदियों को सदियों से दुनिया में निकाला गया, अलग किया गया और हिंसा का शिकार बनाया गया। प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी की हार और 1929 की मंदी के बाद यहूदियों से नफरत बेकाबू हो गई। भाषणों, पैम्फलेट्स से लेकर 1935 के नूरेम्बर्ग कानून तक जो नागरिकता छीनते थे, यहूदी विरोधी हिंसा, अलगाव और आखिर में कंसंट्रेशन कैंप्स में गैस से मारना-नफरत को सिस्टेमैटिक तरीके से फैलाया गया और ये नरसंहार तक पहुँची। याद रखें कि इंसानियत खत्म करने वाली बातें हमेशा नरसंहार से पहले आती हैं।

ऑपइंडिया ने तब लिखा था कि इस्लामी-लेफ्ट गठजोड़ ब्राह्मणों के अस्तित्व और नरसंहार के खतरे को खारिज कर देगा, हिंदू धार्मिक लोग भी इसे बढ़ा-चढ़ाकर बताया हुआ मानेंगे। लेकिन यहूदियों की तरह ब्राह्मणों ने भी काफी दुख और उत्पीड़न झेला है। एक बड़ा उदाहरण 1948 में महाराष्ट्र में एंटी-ब्राह्मण दंगे थे, गाँधीजी की हत्या के बाद चितपावन ब्राह्मण नाथूराम गोडसे द्वारा। तब गाँधी समर्थकों और कॉन्ग्रेस नेताओं ने ब्राह्मणों पर हमला किया, नरसंहार जैसी हिंसा हुई। दंगाइयों ने कई ब्राह्मण मारे और उनके घर-प्रॉपर्टी तबाह की।

1980 के दशक में इस्लामिस्टों के हाथों कश्मीरी पंडितों की हत्याएँ और पलायन याद दिलाता है कि आजाद भारत में एंटी-ब्राह्मण हिंसा मुमकिन थी, हुई और अगर ब्राह्मणों से नफरत अनियंत्रित फैलती रही और ‘सोशल जस्टिस’ के नाम पर सेलिब्रेट हुई तो फिर हो सकती है।

ब्राह्मणों से नफरत करने वाले एक्टिविस्ट और संगठन सिनेमा, मीडिया, राजनीति से लेकर डीईआई प्रोग्राम्स तक हर तरीके से ब्राह्मणों से नफरत को सामान्य बना रहे हैं भले जरूरत न हो। रटगर्स-एनसीआरआई रिसर्च से पता चला कि हिटलर की यहूदी नफरत वाली बातें ब्राह्मणों पर लगाई जाएँ तो ठीक लगती हैं, इससे समझ आता है कि एंटी-ब्राह्मण ताकतें न्यूट्रल लोगों के दिमाग में हिटलर-नाजी स्तर की नफरत पैदा कर रही हैं।

आज भी ब्राह्मणों के खिलाफ हिंसा के बुलावे बिना सख्त सजा के दिए जाते हैं। ब्राह्मणों को बदनाम करना, गलत चित्रण और शैतानीकरण को लेफ्ट-लिबरल सिस्टम में प्रोग्रेसिव, लिबरल और बराबरी वाली सोच का चिह्न माना जाता है।

सच्ची बराबरी प्रक्रिया के असंतुलन या नाम और संस्थान को नुकसान के डर पर नहीं टिक सकती। ये दोनों तरफ निष्पक्षता पर टिकी होनी चाहिए- भेदभाव झेलने वालों की रक्षा करते हुए बिना सबूत या गलत इरादे के आरोपों से भी बचाव। इज्जत बचाने वाला नियम खुद स्पष्टता, संयम और सही प्रक्रिया के सम्मान से चलना चाहिए।

(नोट: हमने यूजीसी चेयरमैन डॉ. विनीत जोशी को विस्तृत सवाल भेजे हैं। जवाब मिलने पर यह लेख अपडेट किया जाएगा।)

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित की गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

कहीं पिटाई, कहीं गिरफ्तारी और कहीं छापेमारी: पंजाब में मीडिया की आवाज दबा रही AAP सरकार, पढ़ें 11 घटनाएँ जब निशाना बनाए गए पत्रकार

आम आदमी पार्टी (AAP) ने राजनीति में पारदर्शिता, अभिव्यक्ति की आजादी और सत्ता से सवाल पूछने के अधिकार को अपना मूल मंत्र बताया था। लेकिन बीते कुछ वर्षों, खासकर पंजाब में भगवंत मान के नेतृत्व वाली AAP सरकार के दौरान, ऐसे अनेक घटनाक्रम सामने आए हैं, जिनमें सरकार पर आरोप लगा है कि वह अपने खिलाफ आवाज उठाने वालों, मीडिया संस्थानों, पत्रकारों, यूट्यूबर्स और असहमत सुरों पर सरकारी मशीनरी के जरिए दबाव बना रही है।

छापेमारी, गिरफ्तारियाँ, विज्ञापनों पर रोक, अखबार वितरण में बाधा, चैनलों पर कथित ब्लैकआउट और पुलिस कार्रवाई, ये सब ऐसे कदम बताए जा रहे हैं जिन्हें ‘डराने-धमकाने’ की रणनीति के तौर पर देख जा रहा है। नीचे उन प्रमुख मामलों का क्रमवार संकलन है, जिनमें AAP सरकार पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने के आरोप लगे हैं।

पंजाब केसरी पर छापेमारी: निशाने पर मीडिया हाउस

15 जनवरी 2026 की रात पंजाब केसरी की बठिंडा और जालंधर (सूरानुसी) स्थित प्रिंटिंग प्रेसों पर पुलिस और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की संयुक्त कार्रवाई हुई। अखबार के अनुसार, बिना नोटिस घुसकर गेट तोड़े गए, सैंपल जबरन भरे गए, कर्मचारियों से बदसलूकी हुई और कुछ को हिरासत में लिया गया। मारपीट में घायल कर्मचारियों का इलाज सिविल अस्पताल में कराया गया। आरोप है कि पूछताछ पर ‘ऊपर से आदेश’ का हवाला दिया गया।

सीएम और राज्यपाल को पत्र: ‘बदले की कार्रवाई’ का आरोप

पंजाब केसरी समूह ने मुख्यमंत्री भगवंत मान और राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया को पत्र लिखकर कहा कि 31 अक्टूबर 2025 को AAP के राष्ट्रीय नेतृत्व से जुड़े आरोपों पर निष्पक्ष रिपोर्टिंग के बाद से अखबार को निशाना बनाया जा रहा है।

पत्र में यह भी आरोप लगाया गया कि सरकार ने समूह के सभी सरकारी विज्ञापन रोक दिए और 10 से 15 जनवरी 2026 के बीच लगातार छापेमारी कराई गई। समूह ने निष्पक्ष जाँच और तत्काल कार्रवाई की माँग की।

हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सैनी ने छापेमारी की निंदा करते हुए कहा कि AAP सरकार जनआक्रोश से घबराकर मीडिया को डराने पर उतर आई है। नायब सैनी ने इसे लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता पर सुनियोजित हमला बताया।

वहीं, BJP के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने कहा कि पंजाब में AAP सरकार उन मीडिया संस्थानों पर कार्रवाई कर रही है जो सरकार से कठिन सवाल पूछते हैं। अमित मालवीय ने छापों, बिजली कटौती और पुलिस तैनाती को बदले की कार्रवाई बताया और इसे इमरजेंसी जैसे हालातों से जोड़ा।

AAP दफ्तर पर पत्रकार से बदसलूकी

सितंबर 2025 में दिल्ली हाई कोर्ट ने AAP मीडिया कोऑर्डिनेटर विकास कुमार योगी के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया था। हालाँकि, कोर्ट ने आम आदमी पार्टी की कार्यशैली पर कड़े सवाल उठाए थे। अदालत ने मामले की गंभीरता को कम नहीं माना और इस पर कड़ी टिप्पणी भी की थी।

एक मामला मई 2024 का है, जब AAP कार्यालय के बाहर कथित विदेशी फंडिंग से जुड़ी खबर कवर करने पहुँची वरिष्ठ महिला पत्रकार के साथ बदसलूकी हुई थी। FIR के मुताबिक, विकाश कुमार योगी के इशारे पर 8-10 पार्टी के कार्यकर्ताओं ने पत्रकार और उनके कैमरा-पर्सन को घेर लिया था, कैमरा छीनने की कोशिश की, धक्का-मुक्की की और आपत्तिजनक नारे लगाए थे।

इसके बाद जून 2025 में आपसी समझौते के बाद AAP मीडिया कोऑर्डिनेटर विकास कुमार ने बिना शर्त माफी माँगी थी। पत्रकार ने भी कोर्ट को बताया था कि अब उनकी कोई शिकायत नहीं थी। इसके बाद हाई कोर्ट ने FIR रद्द की थी, जिससे AAP नेताओं के रवैये पर राजनीतिक और मीडिया हलकों में तीखी चर्चा हुई थी।

अजीत भारती ने पंजाब पुलिस की कार्रवाई से सुरक्षा के लिए किया था हाई कोर्ट का रुख

28 अक्टूबर 2025 को यूट्यूबर अजीत भारती ने पंजाब पुलिस की संभावित कार्रवाई से सुरक्षा की माँग को लेकर पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में अजीत भारती ने कहा था कि इंटरनेट मीडिया पर की गई उनकी टिप्पणियों को लेकर पंजाब पुलिस द्वारा FIR दर्ज की गई थी, लेकिन उन्हें अब तक कोई आधिकारिक सूचना या विवरण नहीं दिया गया था।

मीडिया रिपोर्टों के माध्यम से ही उन्हें यह जानकारी मिली थी कि उनके खिलाफ सख्त धाराओं और एससी/एसटी एक्ट के तहत मामले दर्ज किए गए थे। अजीत भारती ने आशंका जताई थी कि बिना पूर्व सूचना और सुनवाई के उनके खिलाफ दमनात्मक कदम उठाए जा सकते थे।

मुजफ्फरनगर से यूट्यूबर रचित कौशिक की गिरफ्तारी, पंजाब पुलिस पर किडनैपिंग जैसे आरोप

6 फरवरी 2024 की रात सोशल मीडिया पर दिल्ली के एक पत्रकार के मुजफ्फरनगर से किडनैप होने की खबरें सामने आई थीं। बाद में स्पष्ट हुआ था कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति यूट्यूबर रचित कौशिक थे, जिन्हें आम आदमी पार्टी शासित पंजाब पुलिस अपने साथ ले गई थी।

रचित कौशिक ‘सब लोकतंत्र’ नाम से सोशल मीडिया चैनल चलाते थे और दिल्ली के शाहदरा में रहते थे। वे उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में अपनी भांजी की शादी में शामिल होने आए थे।

परिजनों के अनुसार, 6 फरवरी की शाम करीब 7 बजे सफेद स्कॉर्पियो में आए 4 सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों ने उन्हें जबरन उठा लिया था। न तो पुलिस वर्दी में थी और न ही स्थानीय पुलिस मौजूद थी। बाद में पता चला कि लुधियाना में दर्ज एक FIR के आधार पर उनकी गिरफ्तारी की गई थी।

रचित कौशिक के इंस्टाग्राम से की गई पोस्ट के अनुसार, उन्होंने AAP नेताओं के भ्रष्टाचार को लेकर एक वीडियो बनाया था जिसके बाद उनकी गिरफ्तारी हुई है। उनके परिवार ने आरोप लगाया है कि ऐसा उनसे बदला लेने के लिए किया गया था।

पंजाब में जी मीडिया चैनलों पर प्रतिबंध, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उठे सवाल

28 मई 2024 को पंजाब सरकार ने राज्य में जी मीडिया के सभी चैनलों के प्रसारण पर प्रतिबंध लगा दिया था। ZEE न्यूज हिंदी की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान जी न्यूज द्वारा जनहित से जुड़े मुद्दे उठाने और राज्य सरकार की कमियों पर सवाल खड़े करने के बाद यह कार्रवाई की गई थी।

उस समय जी मीडिया ने इस प्रतिबंध को लेकर सवाल उठाया था कि क्या पंजाब में आपातकाल जैसी स्थिति है और इसलिए सरकार से सवाल नहीं किया जा सकता और अगर किया गया तो ये अंजाम भुगतने होंगे।

मामले को लेकर जी न्यूज से बातचीत में भाजपा नेता जवाहर यादव ने कहा था कि आम आदमी पार्टी के नेतृत्व वाली पंजाब सरकार की अनुमति के बिना राज्य में सच्चाई दिखाने की इजाजत नहीं है। उन्होंने मीडिया को निशाना बनाने वालों से इस कथित प्रतिबंध पर खुलकर सामने आने की अपील की थी।

इस पूरे मामले पर भगवंत मान सरकार ने उस समय कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया था। वहीं, 27 मई 2024 को भाजपा नेता तजिंदर बग्गा द्वारा AAP मंत्री बलकार सिंह पर लगे आरोपों के वीडियो के बाद सरकार पहले से ही विवादों में घिरी हुई थी।

टाइम्स नाउ की पत्रकार भावना किशोर की गिरफ्तारी, जमानत के बाद सामने आई हिरासत की पीड़ा

टाइम्स नाउ नवभारत की महिला पत्रकार भावना किशोर को 5 मई 2023 को पंजाब पुलिस ने उनके दो सहयोगियों के साथ गिरफ्तार किया था। यह गिरफ्तारी आम आदमी पार्टी के एक कार्यक्रम की कवरेज के दौरान की गई थी। बाद में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने इसे गैर-कानूनी बताते हुए तीनों को जमानत दे दी थी।

जमानत के बाद 9 मई 2023 को ग्रुप एडिटर नविका कुमार और एंकर सुशांत सिन्हा से बातचीत में भावना किशोर ने हिरासत के दौरान हुई कथित मानसिक प्रताड़ना का खुलासा किया था। उन्होंने बताया कि उनसे जाति पूछी गई और वॉशरूम का इस्तेमाल दरवाजा खुला रखकर करने को कहा गया था।

भावना ने बताया कि ये सब उन पर दिल्ली सीएम अरविंद केजरीवाल के बंगले को लेकर किए गए खुलासे ‘ऑपरेशन शीशमहल’ को हटाने का दबाव बनाने के लिए किया गया था।

केजरीवाल-मान प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकार से बदसलूकी

30 अप्रैल 2022 को दिल्ली के द इम्पीरियल होटल में आयोजित दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक पत्रकार के साथ बदसलूकी का मामला सामने आया था। पत्रकार नरेश वत्स ने इस संबंध में कनॉट प्लेस थाने में शिकायत दर्ज कराई थी।

नरेश वत्स का कहना था कि जब वह कार्यक्रम कवर करने पहुँचे थे, तब एंट्री गेट पर तैनात सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें रोक लिया था। उन्होंने अपना PIB कार्ड दिखाया था, लेकिन जाँच के बहाने कार्ड लेकर कुछ देर बाद यह कहकर लौटा दिया गया कि वह रिपोर्टर नहीं हैं और उन्हें अंदर जाने नहीं दिया जाएगा।

नरेश वत्स ने आरोप लगाया था कि जब उन्होंने रिपोर्टर होने की कसौटी पूछी, तो पंजाब पुलिस के अफसरों ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया था और उन्हें गिरफ्तार करने की धमकी दी गई थी। विरोध करने पर उन्हें घसीटकर बाहर निकाला गया था, जो सीसीटीवी में दर्ज था।

ऑक्सीजन संकट पर सवाल उठाने की सजा

दिल्ली में कोविड-19 महामारी के दौरान ऑक्सीजन संकट को लेकर आम आदमी पार्टी सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाना पत्रकारों को भारी पड़ा था। 6 मई 2021 को दिल्ली सरकार के मीडिया सेल ने हिंदुस्तान टाइम्स के सात पत्रकारों को उस आधिकारिक व्हाट्सऐप ग्रुप से हटा दिया था, जिसके जरिए प्रेस नोट, प्रेस कॉन्फ्रेंस की सूचनाएँ और रोजाना स्वास्थ्य बुलेटिन साझा किया जाता था।

यह कार्रवाई दिल्ली सरकार के चीफ मीडिया कोऑर्डिनेटर विकास योगी द्वारा की गई थी, लेकिन पत्रकारों को हटाने का कोई आधिकारिक कारण नहीं बताया गया था। मीडिया से जुड़े सूत्रों के अनुसार, यह कदम हिंदुस्तान टाइम्स की 6 मई की एक रिपोर्ट के बाद उठाया गया था, जिसमें दिल्ली सरकार के ऑक्सीजन संकट से निपटने में हुई विफलताओं को उजागर किया गया था।

रिपोर्ट में बताया गया था कि सरकार के पास क्रायोजेनिक टैंकरों की कमी थी, अस्पतालों के लिए दैनिक ऑक्सीजन आवंटन की कोई ठोस योजना नहीं थी, ऑक्सीजन प्लांट लगाने में देरी हुई और केंद्र सरकार से मदद भी देर से माँगी गई थी।

ग्रुप से हटाए जाने के बाद कई पत्रकारों ने इसका विरोध किया था और स्पष्टीकरण माँगा था, लेकिन सरकार की ओर से चुप्पी साध ली गई थी। पत्रकारों का कहना था कि प्रेस कॉन्फ्रेंस अब सिर्फ रिकॉर्डेड वीडियो तक सीमित हो गई थीं, जहाँ सवाल पूछने की कोई गुंजाइश नहीं बची थी।

इस घटना को मीडिया की आवाज दबाने और सरकार की आलोचना करने वालों को हाशिये पर डालने की कोशिश के रूप में देखा गया था।

स्टिंग विवाद में AAP का पत्रकार और न्यूज चैनल पर मानहानि का मुकदमा

25 नवंबर 2013 को आम आदमी पार्टी (AAP) ने पत्रकार अनुरंजन झा और न्यूज चैनल ‘इंडिया न्यूज’ के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया था। यह कार्रवाई उस स्टिंग ऑपरेशन के सामने आने के एक दिन बाद हुई थी, जिसमें AAP के कई प्रमुख नेताओं को बिना उचित पृष्ठभूमि जाँच के चंदा स्वीकार करने को तैयार दिखाया गया था।

यह स्टिंग ‘मीडिया सरकार’ द्वारा किया गया था और दिल्ली विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सामने आया था, जब AAP अपना पहला चुनावी डेब्यू करने जा रही थी। AAP ने दावा किया था कि स्टिंग की CD से महत्वपूर्ण हिस्से काटे गए थे और फुटेज को एडिट कर पार्टी नेताओं को गलत रोशनी में दिखाया गया था।

स्टिंग में शाजिया इल्मी सहित कई नेता शामिल बताए गए थे, लेकिन AAP ने उस समय न तो इल्मी का इस्तीफा स्वीकार किया था और न ही स्टिंग के आधार पर उम्मीदवारों के खिलाफ कोई कार्रवाई की थी। विपक्ष और आलोचकों ने इसे पारदर्शिता के दावों के विपरीत कदम बताया था।

पंजाब में ‘मूक आपातकाल’: AAP सरकार पर प्रेस की आवाज दबाने का आरोप

पंजाब में आम आदमी पार्टी (AAP) की सरकार पर उस समय भी गंभीर आरोप लगे थे, जब 3 नवंबर 2025 को पंजाब पुलिस ने राज्य के कई हिस्सों में अखबार वितरण करने वाले वाहनों को रोककर तलाशी ली थी। यह कार्रवाई सुबह के करीब 4 बजे शुरू हुई थी, ठीक उसी समय जब प्रिंटिंग प्रेसों से अखबारों की खेप निकलती है।

इसके कारण कई इलाकों में अखबार पाठकों तक पहुँच ही नहीं पाए थे, जबकि कुछ स्थानों पर वितरण घंटों देरी से हुआ था। ड्राइवरों के मोबाइल फोन जब्त कर लिए गए थे, जिससे अखबार प्रबंधन और कर्मचारियों में भारी अफरा-तफरी मची थी। कई वाहन सुबह 8 बजे के बाद छोड़े गए थे, जिससे पूरी व्यवस्था चरमरा गई थी।

चंडीगढ़ प्रेस क्लब ने इस कार्रवाई की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला बताया था। विपक्षी दलों ने इसे ‘शीश महल’ रिपोर्ट्स से घबराई AAP सरकार की बौखलाहट करार दिया था। भाजपा, कॉन्ग्रेस और अकाली दल के नेताओं ने कहा था कि पंजाब के इतिहास में आपातकाल और आतंकवाद के दौर में भी कभी अखबारों को नहीं रोका गया था।

लोकतंत्र की कसौटी पर सरकार

इन तमाम घटनाओं के संकलन से एक गंभीर सवाल खड़ा होता है कि क्या सत्ता में आने के बाद AAP ने आलोचना सहने की अपनी क्षमता खो दी है? मीडिया, पत्रकारों और असहमत आवाजों पर बार-बार कार्रवाई के आरोप लोकतंत्र की बुनियाद पर चोट माने जाते हैं। सरकार का दायित्व है कि वह निष्पक्ष जाँच, पारदर्शिता और कानून के शासन से संदेह दूर करें। क्योंकि जब सवाल पूछने वालों को डराया जाता है, तो नुकसान केवल किसी एक संस्था का नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र का होता है।

BMC चुनाव के नतीजे देख X पर ट्रेंड हुई ‘रसमलाई’: जानिए क्या है वजह, नेटीजन्स से लेकर भाजपा क्यों ले रहे महागठबंधन की चुटकी

महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों में बीजेपी के नेतृत्व वाली महायुति को ऐतिहासिक जीत की ओर बढ़ता देख सोशल मीडिया पर अचानक ‘रसमलाई’ ट्रेंड होने लगी है। सोशल मीडिया ऐसे कई मीम सामने आए हैं जिसमें विपक्ष पर तंज कसने के लिए लोग इस मिठाई की तस्वीर को शेयर कर रहे हैं।

देख सकते हैं कि नीचे कैसे राज ठाकरे-उद्धव ठाकरे की तस्वीरों के साथ प्रयोग करके तंज कसे गए हैं।

फोटो-वीडियो एडिट करके दिखाया जा रहा है जैसे कहीं जीत की खुशी में भाजपा नेता अन्नामलाई ठाकरे ब्रदर्स को अपने हाथ से रसमलाई खिला रहे हो या कहीं वो लोग खुद रसमलाई में नहा रहे हैं।

बता दें कि ये मीम सिर्फ नेटीजन्स ही सोशल मीडिया पर शेयर नहीं कर रहे, बल्कि कई भाजपा नेता व कार्यकर्ता भी इसे साझा करके चुटकी ले रहे हैं।

भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या ने कहा कि बृहन्मुंबई नगर निगम चुनाव में भाजपा की जीत बहुत खुशी की बात है और इसे उन्होंने ‘रस मलाई जैसी मीठी जीत’ बताया।

अब ये सब देख किसी के मन में आ सकता है कि आखिर ये सब क्यों हो रहा है, क्यों सिर्फ रसमलाई ही साझा की जा रही है। तो बता दें ऐसा सिर्फ इसलिए है क्योंकि कुछ समय पहले महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) के प्रमुख राज ठाकरे ने भाजपा नेता अन्नामलाई का ‘रसमलाई’ कहकर ही मजाक उड़ाया था।

ठाकरे ने मराठी एकता के लिए समर्थन जुटाने के नाम पर स्थानीय मुद्दों में बाहरी लोगों के हस्तक्षेप की आलोचना की थी। साथ ही मुंबई में अन्नामलाई की उपस्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा था, “एक रसमलाई तमिलनाडु से मुंबई आया है।” इसके बाद उन्होंने अन्नामलाई पर तंज कसते हुए “हटाओ लुंगी, बजाओ पुंगी” जैसी बातें भी कही थी।

उस समय अन्नामलाई ने सिर्फ ये कहकर प्रतिक्रिया दी थी कि मुंबई सिर्फ महाराष्ट्र का नहीं बल्कि भारत और दुनिया का अंतरराष्ट्रीय शहर है। हालाँकि अब नतीजे आए हैं तो रसमलाई को एक जवाब के प्रतीक के तौर पर साझा किया जा रहा है।

हालाँकि भारत में यह पहली बार नहीं है जब चुनाव और मिठाई जुड़ी हो। 2024 हरियाणा विधानसभा चुनाव में, कॉन्ग्रेस की शुरुआती बढ़त के दौरान ‘हैप्पी जलेबी डे’ पोस्ट किया गया था, और बाद में भाजपा ने अपनी जीत के दौरान जलेबी का जिक्र किया।

सुप्रीम कोर्ट ने विधवा बहू को ससुर की संपत्ति में अधिकार दिलाने के लिए ‘मनुस्मृति’ का लिया सहारा, जानें- कैसे प्राचीन हिंदू ग्रंथ बना SC के लिए मार्गदर्शक

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (13 जनवरी 2026) को एक ऐतिहासिक फैसले में विधवा बहू को उसके दिवंगत ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण (मेंटेनेंस) पाने के अधिकार को मान्यता दी। फैसले में कोर्ट ने पारिवारिक दायित्वों के बारे में बताने के लिए मनुस्मृति का हवाला दिया। स्पष्ट है कि आधुनिक हिंदू कानून की व्याख्या में प्राचीन ग्रंथों की भूमिका आज भी बनी हुई है।

यह फैसला इस बात का भी उदाहरण है कि किस तरह हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 (HAMA) जैसे कानूनों की व्याख्या करते समय कोर्ट प्राचीन धर्मशास्त्रों को नैतिक और ऐतिहासिक संदर्भ के रूप में देखते हैं।

क्या है पूरा मामला?

डॉ. महेंद्र प्रसाद का निधन 27 दिसंबर 2021 को हुआ था और उन्होंने 18 जुलाई 2011 की पंजीकृत वसीयत छोड़ी थी। उनके तीन बेटे थे। 2 मार्च 2023 को बेटे रणजीत शर्मा की मौत हो गई, जिसके बाद उनकी पत्नी गीता शर्मा ने खुद को आश्रित बताते हुए हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम (HAMA) के तहत ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण माँगा। फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि ससुर की मृत्यु के समय गीता विधवा नहीं थीं और इसलिए वह कानून के तहत आश्रित नहीं मानी जा सकतीं।

20 अगस्त 2025 को हाई कोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए कहा कि गीता शर्मा अब ससुर के बेटे की विधवा हैं और इस आधार पर उन्हें HAMA के तहत आश्रित माना जा सकता है। कोर्ट ने मामले को दोबारा सुनवाई के लिए भेज दिया। इस फैसले को कंचना राय और उमा देवी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। दोनों ने दावा किया कि वे लगभग 40 सालों से डॉ प्रसाद के साथ रह रही थीं। सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य कानूनी प्रश्न यह रखा गया कि क्या ससुर की मृत्यु के बाद विधवा हुई बहू, हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम की धारा 21(vii) के तहत आश्रित की श्रेणी में आती है या नहीं?

कानून की व्याख्या

जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस वी एन भट्टी ने अपने फैसले में HAMA की सीधी (literal) व्याख्या अपनाई। कोर्ट ने कहा कि धारा 21(vii) में ‘बेटे की कोई भी विधवा’ लिखा है, इसमें यह शर्त नहीं है कि पति ससुर से पहले मरा हो। इसलिए समय अप्रासंगिक है और गीता शर्मा कानूनन आश्रित मानी जाएँगी। धारा 22 के अनुसार, ऐसे आश्रितों का भरण-पोषण संपत्ति पाने वाले वारिसों को करना होगा, खासकर तब जब आश्रित को विरासत में हिस्सा न मिला हो।

पीठ ने चेताया कि संकीर्ण व्याख्या करना अनुच्छेद 14 के तहत समानता का उल्लंघन होगा क्योंकि इससे विधवाओं को पति की मृत्यु के समय के आधार पर मनमाने ढंग से अलग किया जाएगा। साथ ही, कानून का उद्देश्य कल्याणकारी है और इसलिए अनुच्छेद 21 के तहत सम्मानजनक जीवन के अधिकार को ध्यान में रखते हुए कमजोर महिलाओं को संरक्षण देना जरूरी है।

मनुस्मृति का जिक्र

कोर्ट ने कहा कि जहाँ कानून में कमियाँ हो, वहाँ HAMA का सेक्शन 4 बिना कोड वाले सिद्धांतों (पारंपरिक सिद्धांत) को बनाए रखता है। कोर्ट ने मनुस्मृति अध्याय 8, श्लोक 389 का जिक्र किया जिसमें कहा गया है कि ‘किसी भी पत्नी, बेटे, पिता या माँ को नहीं छोड़ा जाना चाहिए। जो कोई भी इन बेगुनाह परिवार वालों को छोड़ता है, राजा उस पर छह सौ यूनिट का जुर्माना लगाए’। इसका आशय यह है कि परिवार के मुखिया और उसके उत्तराधिकारियों पर आश्रित महिला सदस्यों, विशेष रूप से स्वयं का भरण-पोषण न कर पाने वाली बहू की देखभाल का नैतिक और सामाजिक दायित्व होता है।

स्पष्ट है कि ससुर की यह जिम्मेदारी उसकी मृत्यु के बाद भी संपत्ति के उत्तराधिकारियों के माध्यम से जारी रहती है। HAMA की धारा 22, धारा 19 का विस्तार करते हुए ससुर की मृत्यु के बाद भी भरण-पोषण के दावे को मान्यता देती है। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया और सभी अपीलों को खारिज कर दिया।

मौजूदा कानून और मनुस्मृति

मौजूदा कानून में मनुस्मृति का इस्तेमाल एक संदर्भ के रूप में किया जाता है। अदालतें इसे परंपरा, नैतिक मूल्यों और सामाजिक संदर्भ को समझाने के लिए उद्धृत करती हैं, खासकर परिवार, महिलाओं की गरिमा और सामाजिक सुधार से जुड़े मामलों में। डॉ. भीमराव अंबेडकर भी इसी बात के पक्षधर थे।

1927 के महाड़ आंदोलन में उन्होंने जातिगत अन्याय के विरोध में मनुस्मृति जलाई लेकिन बाद में हिंदू कोड बिल की बहस के दौरान उन्होंने मनुस्मृति के उन विचारों का उल्लेख भी किया जो समानता और महिलाओं के संपत्ति अधिकारों जैसे प्रगतिशील सिद्धांतों की बात करते थे।

धर्मशास्त्र से हिंदू कानून तक

धर्मशास्त्र से आधुनिक हिंदू कानून तक की यात्रा में मनुस्मृति की भूमिका ऐतिहासिक रही है। दायभाग और मिताक्षरा जैसे हिंदू कानून के विद्यालय मनुस्मृति पर आधारित थे और विजयनश्वर जैसे टीकाकारों के माध्यम से इसका प्रभाव औपनिवेशिक हिंदू पर्सनल लॉ तक पहुँचा।

1950 के बाद बने हिंदू विवाह अधिनियम, उत्तराधिकार अधिनियम और HAMA ने पुरानी कुरीतियों को दूर किया लेकिन विरासत, संयुक्त परिवार और भरण-पोषण जैसी व्यवस्थाओं को संवैधानिक सिद्धांतों के अधीन ही संरक्षित भी रखा। कोर्ट ने 2019 से पहले 7 बार मनु का उल्लेख किया है।

हाई कोर्ट ने दोहराई परंपरा

कई हाईकोर्ट भी मनुस्मृति का संदर्भ लेते रहे हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने नारंग वर्सेज नारंग मामले में मनुस्मृति अध्याय 9, श्लोक 108 का हवाला देते हुए परिवार के कर्ता की आश्रितों खासकर पत्नी के प्रति जिम्मेदारी की बात कही। झारखंड हाई कोर्ट ने 2024 में एक मामले में यह पंक्ति उद्धृत की कि ‘जहाँ महिलाओं का सम्मान नहीं होता, वहाँ परिवार नष्ट हो जाता है’।

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दास वर्सेज दास केस में पति-पत्नी के आपसी दायित्वों को तलाक के बाद भरण–पोषण से जोड़कर देखा। अदालतों के बाहर भी कई बार जज महिलाओं की ‘सम्मानजनक स्थिति’ की बात करते हैं या मनुस्मृति को सांस्कृतिक ग्रंथ के रूप में संदर्भित करते हैं।

विरासत और समानता में संतुलन

यह फैसला दिखाता है कि मनुस्मृति को कानून नहीं बल्कि संदर्भ के रूप में इस्तेमाल किया गया। वह भी संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 की कसौटी पर। धर्मशास्त्र से HAMA तक की यह सोच सुनिश्चित करती है कि परंपरा आधुनिक न्याय को दिशा दे, उस पर हावी न हो और गीता जैसी विधवाओं के अधिकार सुरक्षित रहें।

हालाँकि, मनुस्मृति पर पितृसत्ता को लेकर आलोचना होती है लेकिन ऐसे फैसले सामाजिक भेदभाव को कमजोर करते हैं और आंबेडकर के सुधारवादी दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते हैं। इससे साफ है कि भारतीय न्याय व्यवस्था में परंपरा की छाया तो है लेकिन वह लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुसार बदली हुई है।

यह फैसला केवल एक परिवार तक सीमित नहीं है। यह दिखाता है कि मनुस्मृति, जिसे अंबेडकर पितृसत्तात्मक मानते थे, अब महिलाओं के अधिकारों के समर्थन में रूप से उपयोग किया जा सकता है।

ऐसे उद्धरण यह दर्शाते हैं कि मनुस्मृति आज भी मार्गदर्शक है और यह न्याय के लिए काम करता है। गीता शर्मा की जीत यह संदेश देती है कि भारतीय न्यायपालिका सदियों पुराने सिद्धांतों को भी लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप ढालकर कमजोर वर्गों की रक्षा करने से नहीं हिचकती है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में दिव्यांश तिवारी ने लिखी है, जिसे विस्तार से पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)


‘क्या मर्द भी हो सकते हैं प्रेग्नेंट?’: US में छिड़ी ‘Woke’ बहस, जानिए क्या कहता है विज्ञान

अमेरिका की सीनेट में गर्भपात (Abortion) दवाओं की सुरक्षा पर चल रही एक सुनवाई अचानक उस वक्त सुर्खियों में आ गई, जब रिपब्लिकन सीनेटर जोश हॉली ने भारतीय मूल की प्रसिद्ध स्त्री रोग विशेषज्ञ (गायनोकॉलोजिस्ट) डॉ निशा वर्मा से सीधा सवाल कर दिया, “क्या पुरुष प्रेग्नेंट हो सकते हैं?”। यह सवाल एक नहीं, बार-बार दोहराया गया। डॉक्टर ने सीधे ‘हाँ या ना’ में जवाब देने से इनकार किया और कहा कि वह अलग-अलग जेंडर पहचान वाले मरीजों का इलाज करती हैं।

इसी पल का वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल है। कोई इसे वोक पॉलिटिक्स बता रहा है, तो कोई इसे बायोलॉजिकल सच्चाई की अनदेखी कह रहा है। सवाल सीधा था, लेकिन उसके पीछे राजनीति, जेंडर आइडेंटिटी और मेडिकल साइंस की एक जटिल बहस छिपी हुई है।

मामला क्या था और बहस क्यों भड़की?

यह सुनवाई अमेरिकी सीनेट की हेल्थ, एजुकेशन, लेबर एंड पेंशन (HELP) कमेटी में हो रही थी। विषय था ‘महिलाओं की सुरक्षा और केमिकल अबॉर्शन ड्रग्स के खतरे’। ऑब्स्टेट्रिशियन-गायनेकोलॉजिस्ट डॉ निशा वर्मा ने गर्भपात (Abortion) की दवाओं का बचाव करते हुए कहा कि इन पर 100 से ज्यादा पीयर-रिव्यू रिसर्च हो चुकी हैं और साल 2000 से अब तक अमेरिका में 75 लाख से ज्यादा लोग इनका सुरक्षित इस्तेमाल कर चुके हैं।

यहीं से सीनेटर हॉली ने बहस का रुख बदल दिया। उन्होंने डॉक्टर से बार-बार पूछा, “क्या पुरुष प्रेग्नेंट हो सकते हैं? यह हाँ या ना का सवाल है।” सीनेटर हॉली का तर्क था कि अगर डॉक्टर बुनियादी बायोलोजिक सच्चाई भी स्वीकार नहीं कर रहीं, तो उनकी मेडिकल गवाही पर भरोसा कैसे किया जाए। वहीं डॉ वर्मा ने कहा कि ऐसे सवाल असल मुद्दे से ध्यान भटकाने और मरीजों की जटिल वास्तविकताओं को नजरअंदाज करने का तरीका हैं।

बायोलॉजी और हार्मोन: महिलाएँ ही क्यों गर्भवती हो सकती हैं?

प्रकृति ने स्त्री और पुरुष के शरीर की बनावट अलग-अलग कामों के लिए की है। महिलाओं के शरीर में बच्चे दानी (गर्भाशय) और अंडाशय (Ovary) जैसे विशेष अंग होते हैं, जो पुरुषों के शरीर में नहीं पाए जाते। बच्चा पैदा करने के लिए इन अंगों का होना सबसे जरूरी है। इसके साथ ही, महिलाओं के शरीर में कुछ खास हार्मोन (जैसे एस्ट्रोजन) होते हैं, जो बच्चे को पेट में पालने और उसे सुरक्षित रखने का काम करते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, पुरुषों के शरीर में बच्चे दानी नहीं होती, इसलिए वहाँ भ्रूण (बच्चा) के ठहरने और बढ़ने के लिए कोई जगह नहीं है। बच्चे को जीवित रहने के लिए माँ के शरीर के भीतर जिस पोषण और सुरक्षा की जरूरत होती है, वह केवल महिलाओं के बच्चे दानी (गर्भाशय) में ही मिल सकती है। पुरुषों के शरीर में वह जैविक सिस्टम ही नहीं है जो नौ महीने तक बच्चे का बोझ उठा सके या उसे विकसित कर सके।

गर्भधारण (Pregnancy) के लिए शरीर में अंडे (Eggs) का बनना जरूरी है, जो केवल महिलाओं के अंडाशय (Ovary) में ही बनते हैं। पुरुषों के शरीर में मुख्य रूप से ‘टेस्टोस्टेरोन’ हार्मोन होता है, जो दाढ़ी-मूँछ और शारीरिक मजबूती के लिए होता है। उनके शरीर में वह हार्मोनल चक्र नहीं चलता, जो एक अंडे को विकसित करने और फिर उसे एक बच्चे का रूप देने के लिए जरूरी होता है। इसी कारण से, एक जैविक पुरुष प्राकृतिक रूप से कभी प्रेग्नेंट नहीं हो सकता।

ट्रांस-प्रेग्नेंसी का सच: जेंडर पुरुष का, लेकिन अंग महिला के

अक्सर जब हम खबरों में पढ़ते हैं कि ‘एक पुरुष ने बच्चे को जन्म दिया’, तो यह सुनकर हैरानी होती है। लेकिन चिकित्सा और विज्ञान की भाषा में इसका मतलब उन लोगों से होता है जिन्हें हम ट्रांसजेंडर पुरुष कहते हैं। इसे समझना बहुत आसान है। ये वे लोग होते हैं जिनका जन्म तो एक लड़की के रूप में हुआ था और उनके शरीर में जन्म से ही महिलाओं वाले अंग (जैसे बच्चा दानी और अंडाशय) मौजूद थे, लेकिन बड़े होने पर उन्होंने खुद को पुरुष के रूप में पहचान दी और पुरुषों की तरह रहना शुरू किया।

ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी की रिपोर्ट बताती है कि वैज्ञानिक रूप से देखा जाए, तो सारा खेल शरीर के अंगों का है। बहुत से ट्रांसजेंडर पुरुष अपनी पहचान बदलने के लिए सर्जरी करवाते हैं या पुरुषों वाले हार्मोन (टेस्टोस्टेरोन) के इंजेक्शन लेते हैं, लेकिन वे अपने शरीर से बच्चा दानी (गर्भाशय) को बाहर नहीं निकलवाते। जब ऐसे लोग बच्चा पैदा करना चाहते हैं, तो वे कुछ समय के लिए हार्मोन लेना बंद कर देते हैं। ऐसा करने से उनका शरीर वापस उसी तरह काम करने लगता है जैसे एक महिला का शरीर करता है और वे प्राकृतिक रूप से गर्भवती हो सकते हैं। यानी भले ही वे दुनिया के सामने एक पुरुष की तरह रहते हों, लेकिन उनके शरीर के अंदर मौजूद ‘महिला अंग’ उन्हें माँ बनने (या तकनीकी रूप से पिता बनने) की शक्ति देते हैं।

इसका सबसे मशहूर उदाहरण थॉमस बीटी हैं, जिन्हें दुनिया का पहला ‘प्रेग्नेंट फादर’ कहा जाता है। द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि थॉमस ने एक महिला के शरीर के साथ जन्म लिया था, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी पहचान बदल ली और दाढ़ी-मूँछ वाले पुरुष बन गए। उनकी पत्नी बच्चा पैदा करने में असमर्थ थीं, इसलिए थॉमस ने फैसला किया कि वे खुद बच्चे को जन्म देंगे। चूँकि उन्होंने अपने बच्चे दानी को शरीर से अलग नहीं किया था, इसलिए वे गर्भवती हो सके और एक नहीं बल्कि तीन बच्चों को जन्म दिया। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि विज्ञान के हिसाब से थॉमस इसलिए प्रेग्नेंट हो सके क्योंकि उनके पास जन्मजात महिला अंग थे, किसी जैविक पुरुष (सिसजेंडर) के लिए ऐसा करना फिलहाल मुमकिन नहीं है।

द गार्जियन‘ की रिपोर्ट बताती है कि जेसन बार्कर एक ट्रांसजेंडर पुरुष हैं। इसका सरल मतलब यह है कि उनका जन्म एक लड़की के रूप में हुआ था, लेकिन बड़े होकर उन्होंने खुद को पुरुष के रूप में पहचाना और दाढ़ी-मूँछ वाले व्यक्ति बन गए। जेसन और उनकी पार्टनर ट्रेसी कई सालों से बच्चा चाहते थे, लेकिन ट्रेसी माँ नहीं बन पा रही थीं। तब जेसन ने एक साहसी फैसला लिया। चूंकि उन्होंने सर्जरी के बाद भी अपनी ‘बच्चा दानी’ (गर्भाशय) शरीर से नहीं हटवाई थी, इसलिए उन्होंने खुद बच्चे को जन्म देने का निर्णय किया।

जेसन ने पुरुषों वाले हार्मोन (टेस्टोस्टेरोन) लेना बंद कर दिया, जिससे उनका शरीर फिर से गर्भधारण के लिए तैयार हो गया। अपनी गर्भावस्था के दौरान, जेसन बाहर से एक दाढ़ी वाले ‘मोटे आदमी’ जैसे दिखते थे, इसलिए बस या दुकानों में किसी को अंदाजा ही नहीं होता था कि वे प्रेग्नेंट हैं। उन्होंने इस पूरे अनुभव पर एक फिल्म भी बनाई, जिसमें उन्होंने दिखाया कि कैसे एक पुरुष की पहचान रखते हुए भी उन्होंने माँ बनने का सुख पाया। आज उनका बेटा बड़ा हो चुका है और जेसन उसे एक पिता की तरह पाल रहे हैं।

यह उदाहरण साफ करता है कि ‘ट्रांस-प्रेग्नेंसी’ का मतलब किसी बायोलॉजिकल पुरुष का प्रेग्नेंट होना नहीं है, बल्कि उन लोगों का माँ बनना है जिनके पास जन्म से महिला अंग मौजूद थे। जेसन की कहानी दिखाती है कि भले ही समाज के लिए यह एक अजीब बात हो, लेकिन विज्ञान के लिए यह अंगों और हार्मोन का एक तालमेल है, जिसने एक पिता को अपनी संतान को जन्म देने की शक्ति दी।

कोख का ‘ट्रांसप्लांट’: क्या भविष्य में बायोलॉजिकल पुरुष भी दे पाएँगे बच्चे को जन्म?

नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन की रिपोर्ट बताती है कि विज्ञान आज इतनी तरक्की कर चुका है कि अब उन महिलाओं के लिए भी माँ बनना मुमकिन हो गया है, जिनके पास जन्म से गर्भाशय (बच्चा दानी) नहीं था या किसी बीमारी के कारण उसे हटाना पड़ा था। इसे ‘यूटरस ट्रांसप्लांट’ यानी गर्भाशय प्रत्यारोपण कहते हैं। इस तकनीक की सफलता के बाद अब दुनिया भर में यह चर्चा छिड़ गई है कि क्या भविष्य में यह तकनीक किसी बायोलॉजिकल पुरुष (सिसजेंडर पुरुष) के लिए भी काम कर सकती है? क्या सर्जरी के जरिए किसी पुरुष के शरीर में कोख लगाई जा सकती है? हालाँकि, सुनने में यह किसी चमत्कार जैसा लगता है, लेकिन विज्ञान के सामने इसके लिए बहुत बड़ी चुनौतियाँ खड़ी हैं।

पहली और सबसे बड़ी मुश्किल शरीर की बनावट यानी ‘पेल्विस’ (कूल्हे की हड्डी) के ढाँचे को लेकर है। कुदरत ने महिलाओं के कूल्हे की हड्डियों को चौड़ा और लचीला बनाया है, ताकि गर्भ में बच्चा बढ़ सके और जन्म के समय आसानी से बाहर आ सके। इसके उलट, पुरुषों के कूल्हे का ढाँचा संकरा (Narrow) और सख्त होता है। पुरुष के शरीर में न तो बढ़ते हुए बच्चे के लिए पर्याप्त जगह होती है और न ही वहाँ वैसी नसें मौजूद होती हैं, जो गर्भाशय को भारी मात्रा में खून की सप्लाई दे सकें। सिर्फ सर्जरी से बच्चा दानी फिट कर देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि पूरे शरीर के आंतरिक ढाँचे को बदलना पड़ेगा, जो फिलहाल नामुमकिन जैसा है।

दूसरी बड़ी चुनौती हार्मोनल सिस्टम की है। एक महिला का शरीर गर्भावस्था के दौरान प्राकृतिक रूप से ढेरों हार्मोन पैदा करता है, जो बच्चे को नौ महीने तक जिंदा रखने के लिए जरूरी होते हैं। पुरुषों के शरीर में ये हार्मोन नहीं होते। अगर किसी पुरुष को प्रेग्नेंट करने की कोशिश की जाती है, तो उसे बाहर से भारी मात्रा में दवाओं और हार्मोन के इंजेक्शन देने पड़ेंगे। इतने ज़्यादा हार्मोन पुरुष शरीर के अंगों (जैसे लीवर और दिल) पर बुरा असर डाल सकते हैं और इसके नतीजे बहुत खतरनाक हो सकते हैं। यही वजह है कि आज तक दुनिया में ऐसा कोई भी मामला सामने नहीं आया है जहाँ किसी जैविक पुरुष ने बच्चे को जन्म दिया हो। यह तकनीक फिलहाल केवल महिलाओं के लिए ही एक वरदान साबित हुई है।

विज्ञान और विचारधारा का टकराव

अमेरिकी सीनेट में हुई यह बहस सिर्फ एक डॉक्टर और एक नेता की नोकझोंक नहीं है, बल्कि यह इस दौर की एक बड़ी वैचारिक जंग है। एक तरफ वह लोग हैं जो मानते हैं कि विज्ञान और शरीर की बनावट कभी नहीं बदलती, और दूसरी तरफ वे हैं जो मानते हैं कि इंसान की अपनी पसंद और पहचान सबसे ऊपर है। सीनेटर जोश हॉली जैसे लोगों का मानना है कि जो सच है उसे वैसे ही कहना चाहिए। उनका कहना है कि अगर कोई डॉक्टर यह बुनियादी बात मानने से ही इनकार कर दे कि केवल महिलाएँ ही गर्भवती हो सकती हैं, तो फिर उनकी डॉक्टरी और उनके ज्ञान पर भरोसा कैसे किया जा सकता है? उनके लिए यह भावनाओं का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर विज्ञान का सवाल है।

दूसरी तरफ, डॉ निशा वर्मा और उनके जैसे विचार रखने वाले लोगों का तर्क अलग है। उनका कहना है कि आज के समय में इलाज करते वक्त हमें मरीज की भावनाओं और उसकी पसंद का ख्याल रखना चाहिए। वे ‘गर्भवती महिला’ की जगह ‘गर्भवती व्यक्ति’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना चाहते हैं, ताकि ट्रांसजेंडर लोगों को बुरा न लगे। लेकिन यहीं से विवाद शुरू होता है। आलोचकों का मानना है कि किसी को खुश करने या उनकी भावनाओं का सम्मान करने के चक्कर में हम उन वैज्ञानिक सच्चाइयों को नहीं झुठला सकते जिन्हें दुनिया सदियों से जानती है।

कुल मिलाकर, यह विवाद हमें एक बड़ी बात समझाता है। पुरुष और महिला के शरीर की अपनी-अपनी सीमाएँ और पहचान होती हैं, जो कुदरत ने तय की हैं। जब राजनीति और अलग-अलग विचारधाराएँ विज्ञान के काम में दखल देने लगती हैं, तो असली सच कहीं खो जाता है। यह बहस चेतावनी देती है कि समाज में सबको साथ लेकर चलना अच्छी बात है, लेकिन ऐसा करते समय हमें उन बुनियादी तथ्यों को नहीं भूलना चाहिए जो जीवन का आधार हैं। विज्ञान सबूतों पर चलता है, और सबूत यही कहते हैं कि कोख कुदरत ने सिर्फ महिला शरीर को ही दी है।