Home Blog Page 1222

घसीट कर सड़क पर ले गए, एक के सीने और एक के सिर में मारी गोली: राम मंदिर के लिए बलिदान हो गए कोठारी बंधु, सेवा कार्यों से अब भी उनके मिशन को आगे बढ़ा रही बहन

अयोध्या में सोमवार (22 जनवरी, 2024) को रामलला अपने भव्य मंदिर में विराजमान हो गए हैं। 500 वर्षों के संघर्ष के बाद हुई प्राण प्रतिष्ठा से भाव विभोर लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए अयोध्या की तरफ कूच कर गए हैं। इस अवसर पर देश और दुनिया का हिन्दू समाज उन कारसेवकों को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है जिन्होंने मुगल से मुलायम काल तक चली जद्दोजहद में खुद को राम के नाम पर न्योछावर कर दिया। उन तमाम ज्ञात और अज्ञात बलिदानियों में कोठारी बंधुओं का नाम सबसे प्रमुखता से लिया जाता है।

ऑपइंडिया ने बलिदानी रामकुमार और शरद कोठारी की बहन पूर्णिमा से मिल कर वर्तमान हालातों की जानकारी जुटाई। पूर्णिमा कोठारी राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में आमंत्रित थीं। वो इस ऐतिहासिक समय की साक्षी बन कर बेहद खुश हैं। फिलहाल वो और उनके सहयोगी अयोध्या में टेढ़ी बाजार के पास एक कैम्प लगा कर दूर-दराज से आ रहे श्रद्धालुओं की सेवा में व्यस्त हैं। यहाँ वो न सिर्फ श्रद्धालुओं बल्कि आसपास तैनात पुलिस के जवानों को अपने खर्च पर चाय-नाश्ता करवा रहीं हैं। यह कैम्प ‘राम शरद कोठारी स्मृति मंच’ के बैनर तले हो रहा है।

श्रद्धालुओं और पुलिसकर्मियों को जलपान कराते ‘राम शरद स्मृति मंच’ के सदस्य

मूलतः राजस्थान के, व्यापार के चलते बसे कोलकाता में

कोठारी परिवार मूल रूप से राजस्थान के बीकानेर का रहने वाला है। पूर्णिमा के पिता अपनी युवावस्था में ही व्यापार के सिलसिले में पश्चिम बंगाल चले गए थे। यहाँ पर उन्होंने छोटा सा आयरन प्लांट खोला था। परिवार की आजीविका का साधन वही था। कालांतर में वो 3 बच्चों के पिता बने। इसमें रामकुमार और शरद नाम के 2 बेटे और एक बेटी पूर्णिमा शामिल हैं। शरद और राम कुमार अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने के साथ पिता के कारोबार में हाथ बँटा रहे थे। पूर्णिमा भी पढ़ाई करने के साथ घर के कार्यों में अपनी माता का हाथ बँटाती थीं।

किशोरावस्था में ही जुड़ गए थे ‘बजरंग दल’ से

पूर्णिमा कोठारी ने ऑपइंडिया को बताया कि हिन्दू संगठन से जुड़ने वाली उनकी पहली पीढ़ी उनके बलिदानी भाई ही थे। रामकुमार और शरद की आरंभिक शिक्षा-दीक्षा मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में हुई थी। यहाँ दोनों भाई विद्या भारती द्वारा संचालित भारत भारती स्कूल के छात्र थे। ‘भारत भारती विद्यालय’ की शिक्षा-दीक्षा से प्रभावित होकर दोनों भाई कोलकाता में भी ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’ (RSS) की शाखाओं में जाने लगे थे। रामकुमार और शरद अपने साथ चचेरे भाई को भी शाखाओं में ले जाते थे और पढ़ाई व कारोबार के बाद मिले समय में धर्म प्रचार किया करते थे।

अयोध्या की ट्रेन में खुद बिठा कर आए थे माता-पिता

पूर्णिमा बताती हैं कि जब 1990 में अयोध्या में कारसेवा का ऐलान हुआ तो रामकुमार और शरद वहाँ जाने की तैयारी करने लगे। परिजनों को उन दोनों ने खुद ही तैयार किया था। बचपन से ही साथ रहने की वजह से दोनों भाई हर कहीं एक साथ ही जाते थे। आखिरकार 22 अक्टूबर, 1990 को रामकुमार और शरद कोठारी अयोध्या के लिए ट्रेन पकड़ कर निकल गए। बकौल पूर्णिमा, उनके माता-पिता अपने दोनों बेटों को छोड़ने रेलवे स्टेशन तक गए थे।

पानी माँगने के बहाने पुलिस ने मारी गोली

पूर्णिमा कोठारी ने बताया कि उन्हें घटना की जानकारी 2 नवंबर, 1990 को अयोध्या में मौके पर मौजूद एक पत्रकार से मिली थी। तब कोठारी बंधु अन्य कारसेवकों के साथ लाल कोठी के पास एक मकान में छिपे हुए थे। इस दौरान किसी मुस्लिम अधिकारी का नाम लिया जा रहा था जो रामभक्तों पर बड़ी क्रूरता से पेश आ रहा था। जिस घर में रामकुमार और शरद छिपे थे, उसमें थोड़ी देर बाद दरवाजे पर दस्तक हुई। किसी ने बाहर से पानी माँगा तो 19 वर्षीय शरद को लगा कि शायद कोई कारसेवक बाहर फँस गया है।

पूर्णिमा ने हमें आगे बताया कि शरद ने पानी माँग रहे व्यक्ति के कारसेवक होने के भ्रम में दरवाजा खोला दिया। बाहर से पुलिस वालों द्वारा शरद को गिरेबान पकड़ कर खींच लिया गया और घसीट कर सड़क पर ले जाया गया। यहाँ शरद के सीने में गोली मार दी गई और वो तड़पने लगे। छोटे भाई को तड़पता देख कर लगभग 23 वर्षीय रामकुमार भी बाहर निकल गए। वो और गोलियाँ लगने से बचाने के लिए अपने भाई के ऊपर लेट गए। तभी आसपास खड़े जवानों ने रामकुमार कोठारी के भी सिर में सटा कर बंदूक से फायर कर दिया। छोटे और बड़े भाई ने एक साथ ही एक ही जगह प्राण त्याग दिए।

अयोध्या में ही हुआ अंतिम संस्कार

भावुक हो कर पूर्णिमा कोठारी ने हमें बताया कि 1 नवंबर, 1990 को उनके भाइयों ने घर के पास लगे एक लैंडलाइन पर अयोध्या से कॉल किया गया था। तब उन्होंने खुद को सुरक्षित बताते हुए जल्द लौट आने का वादा किया था। 2 नवंबर, 1990 को दोनों भाइयों के बलिदान होने के कुछ ही देर बाद उनके साथी संगठन वालों ने फोन पर पूर्णिमा को सूचित कर दिया था। हालाँकि, पूर्णिमा ने अपनी माँ को अगले दिन बहुत संकोच के बाद 3 नवंबर को अपने भाइयों की वीरगति के बारे में बताया था। कोलकाता से अयोध्या आ कर परिजनों ने दोनों रामभक्त भाइयों का अंतिम संस्कार अयोध्या में करवाया।

माता-पिता भी चल बसे, कारोबार भी बंद

अपने 2 बेटों के एक साथ बलिदान होने के बाद उनके माता-पिता मानसिक तौर पर काफी व्यथित रहते थे। आखिरकार 16 जनवरी, 2002 को पूर्णिमा के पिता का देहांत हो गया। ऐसे में घर में सिर्फ पूर्णिमा और उनकी माँ बचीं। पूर्णिमा का विवाह हुआ और अब वो 1 बेटी की माँ हैं। राम मंदिर की बाट जोहते साल 2016 में पूर्णिमा की माता का भी देहांत हो गया। हालाँकि, अंतिम समय में उन्होंने इस आशा से प्राण त्यागे थे कि नरेंद्र मोदी आज नहीं तो कल राम मंदिर ज़रूर बनवाएँगे।

कोठारी परिवार की आजीविका का साथ रही आयरन फैक्ट्री भी कोरोना काल में बंद हो गई है। फिलहाल पूर्णिमा की बेटी की जॉब से परिवार का गुजारा चल रहा है।

भाई का दुःख निजी, पर मंदिर की ख़ुशी सामूहिक

अपने बलिदान हुए दोनों भाइयों को याद कर के पूर्णिमा कोठारी थोड़े समय के लिए भावुक हो गईं। खुद को संभाल कर बोलीं, “मेरे दोनों भाई अब नहीं रहे। ये मेरा निजी दुःख है जो जीवन भर रहेगा पर भगवान राम का मंदिर मैं बनते देख कर बेहद खुश हूँ। ये सामूहिक ख़ुशी पूरे देश और दुनिया के हिन्दू समाज की है। मेरे भाइयों के इसी के लिए तो बलिदान दिया था जो अब सार्थक हो गया।” पूर्णिमा को इस बात का भी बेहद संतोष है कि जब तक इतिहास में भगवान राम और अयोध्या जन्मभूमि आंदोलन का जिक्र होगा तब तक रामकुमार और शरद कोठारी को लोग याद करेंगे।

बकौल पूर्णिमा, मुलायम सिंह का चैलेन्ज कि ‘अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार सकता’ ही रामभक्तों को सबसे ज्यादा अखरा था और आखिरकार रामभक्तों ने मुलायम के अहंकार को तोड़ दिया था।

मुलायम सिंह के बयान का दिया जवाब

तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव द्वारा ‘ज़रूरी होता तो और कारसेवकों को मारते’ वाले बयान को याद दिलाते ही पूर्णिमा कोठारी को गुस्सा आ गया। उन्होंने कहा, “उनके अपने खुद के घर में आज तक कोई देश या धर्म के लिए जान देने वाला नहीं जन्मा। अगर अपनों को खोने का दुःख खुद उन्होंने कभी सहा होता तो शायद वो हमारी पीड़ा को महसूस कर पाते।” मुलायम सिंह के बुढ़ापे में हुई हालत, पारिवारिक कलह और उनकी पार्टी की वर्तमान हालत को पूर्णिमा रामभक्तों के परिजनों का शाप मानती हैं।

ऑपइंडिया से बात करतीं पूर्णिमा कोठारी

भाइयो की याद में रक्तदान सहित कई अन्य कार्य करती हैं बहन

कोठारी बंधुओ की याद में उनकी बहन रक्तदान सहित कई अन्य सामाजिक कार्य करती हैं। ‘राम शरद कोठारी स्मृति मंच’ के अंतर्गत यह परिवार जरूरतमंदों को रक्तदान, गरीबों को यथासंभव मदद, उनके बच्चों की पढ़ाई और देश या धर्म के लिए अच्छा कार्य करने वाली विभूतियों को समय-समय पर सम्मानित करता है। इन सभी कामों में आने वाले खर्चों को खुद पूर्णिमा कोठारी अपने शुभचिंतकों और सहयोगियों सहित उठाती हैं।

बाप तो बाप बेटी सुभानअल्लाह: राम मंदिर के विरोध में 3 दिन तक अनशन पर बैठी मणिशंकर अय्यर की बेटी, कहा- ये मैंने मुस्लिमों के लिए किया

कॉन्ग्रेस के वयोवृद्ध नेता मणिशंकर अय्यर अक्सर अपनी अनर्गल बयानबाजी के कारण जाने जाते रहे हैं। अब उनकी बेटी सुरन्या भी चर्चा में हैं। असल में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के खिलाफ सुरन्या अय्यर ने उपवास किया था। उन्होंने फेसबुक पर एक लंबा-चौड़ा पोस्ट लिख कर इस बारे में बताया भी है। प्राण प्रतिष्ठा के अगले दिन उनकी माँ ने एक चम्मच शहद पिला कर उनका अनशन तुड़वाया। उन्होंने दावा किया कि हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई एक दिन अपना खोया हुआ लहलहाता वसंत फिर से प्राप्त करेंगे।

अनशन शुरू करते हुए उन्होंने लिखा था कि पहले से ही प्रदूषित दिल्ली की हवा में उग्र हिंदूवाद, दुर्भावना और जोर-जबरदस्ती भर गई है, और इसमें ‘आध्यात्मिक ज़हर’ घुल गया है। उन्होंने लिखा था कि वो ये अनशन भारत के मुस्लिम नागरिकों के लिए कर रही हैं। उन्होंने कहा था कि अयोध्या में हिन्दू राष्ट्रवाद के नाम पर जो भी हो रहा है उसकी वो निंदा करती हैं। उन्होंने इस दौरान ‘मुग़ल विरासतों’ से प्यार की बात करते हुए कहा था कि मुगलिया संरचनाओं के बिना वो दिल्ली की कल्पना भी नहीं कर सकतीं।

फेसबुक पर सुरन्या ने लिखा था, “दिल्ली सल्तनत ने भी भारत को बेशकीमती चीजें दी हैं, क्योंकि सूफी और अमीर खुसरो के अब्बा उनके साथ ही आए थे। उत्तर भारत की भाषा और संस्कृति खुसरो की एहसानमंद है। मुग़ल यहाँ मुस्लिमों को ही हरा कर आए थे। बाबर ने पंजाब में दौलत खान और दिल्ली में इब्राहिम लोदी को हराया। मुगलों ने राजपूतों के साथ वैवाहिक संबंध बनाए। मुगलों की नीति मंदिर तोड़ने की नहीं थी, उन्होंने तो मंदिर बनवाए। झूठ, हिंसा, द्वेष और प्रतिशोध पर बने मंदिर पर कोई कैसे ख़ुशी बना सकता है?”

सुरन्या अय्यर की बहन यामिनी ने भी ‘X’ पर भारतीय संविधान की प्रति शेयर की, कुछ ऐसा ही अभिनेत्री सुष्मिता सेन ने किया था। सुरन्या खुद को बैरिस्टर बताती हैं और कहती हैं कि वो विदेशी एजेंसियों द्वारा प्रताड़ित किए जा रहे बच्चों को बचाती हैं, उनके अधिकार के लिए लड़ती हैं। सुरन्या अय्यर ने ‘यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफ़ोर्ड’ से कानून की पढ़ाई की है, वहीं उन्होंने सेंट स्टीफेंस कॉलेज से गणित में BA की डिग्री ली। सुरन्या ने अब भरोसा जताया है कि एक दिन ‘दयालु सूर्य’ समान रूप से अपनी चमक बिखेरेगा और ये जगह फिर से हमारी अपनी होगी।

‘जब वक्त हमारा आएगा, सर धड़ से अलग हो जाएगा’: हमजा, फैजान और जुनैद ने ‘राम मंदिर तोड़ने’ की दी धमकी, पुलिस ने शुरू की जाँच

गुजरात के वडोदरा में तीन मुस्लिम युवकों ने राम मंदिर को लेकर धमकी भरी पोस्ट की है। उन्होंने इसे गिराने की धमकी दी है। इसके अलावा ‘सर तन से जुदा’ वाली धमकियाँ भी पोस्ट की हैं। पुलिस ने इस मामले की जाँच चालू कर दी है। इससे पहले गुजरात के ही मेहसाणा और वडोदरा में राम मंदिर के लिए निकाली गई हिन्दू शोभा यात्रा पर मुस्लिमों ने पथराव किया था।

जानकारी के अनुसार वडोदरा के साधली गाँव के मुस्लिम युवक हमजा खत्री, फैजान नानियो और जुनेद कुरैशी ने 22 जनवरी 2024 को राम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा के साथ ही इन्स्टाग्राम पर धमकी भरे पोस्ट किए। उन्होंने इन्स्टाग्राम पर एक पोस्ट में लिखा, “जब वक्त हमारा आएगा, तब सर धड़ से अलग किया जाएगा।”

इसके साथ ही इन मुस्लिम युवकों ने विवादित बाबरी ढाँचे की फोटो लगा रखी थी। पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पुलिस ने संज्ञान लेकर मामले की जाँच शुरू कर दी है। ऑपइंडिया ने पुलिस से बात करने का प्रयास किया, लेकिन सम्पर्क नहीं हो पाया। पुलिस से बात होते ही खबर अपडेट की जाएगी।

वडोदरा में इससे पहले हिन्दुओं की शोभा यात्रा पर हमला भी हुआ था। यहाँ के भोज गाँव में राम मंदिर में होने वाली प्राण-प्रतिष्ठा को लेकर शोभा यात्रा निकाली जा रही थी। इस पर पथराव किया गया था। इसमें कई लोग घायल हुए थे। घायलों में महिलाएँ भी हैं। इस मामले में 26 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।

इससे पहले गुजरात के मेहसाणा से भी हिंसा की खबर आई थी। मेहसाणा के खेड़ालू में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा से पहले भगवान राम की निकाली गई शोभा यात्रा पर छतों से पत्थरबाजी हुई थी। हिंदुओं पर ये हमले इतनी तेजी से हो रहे थे कि पुलिस को स्थिति काबू करने के लिए आँसू गैस के छोड़ने पड़े थे।

गुजरात के अलावा मुंबई के नयानगर इलाके में भी 21 जनवरी 2024 को शोभा यात्रा निकाल रहे हिन्दुओं पर इस्लामी भीड़ ने हमला कर दिया था। यहाँ शोभा यात्रा निकाल रहे हिन्दुओं की गाड़ियों को रोक कर उन पर हमला किया गया और बजरंग बली के पोस्टर फाड़े गए। इस मामले में पुलिस ने बुलडोजर कार्रवाई की है।

बंगाल में बज गया INDI गठबंधन का बाजा: ममता बनर्जी ने अकेले लोकसभा चुनाव लड़ने का किया ऐलान, कहा- काॅन्ग्रेस का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ऐलान किया है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस पार्टी आगामी लोकसभा चुनाव में अकेले लड़ेगी। इस ऐलान से विपक्ष के इंडी गठबंधन को करारा झटका लगा है। बताया जा रहा है कि टीएमसी ने कॉन्ग्रेस को दो सीटें देने की बात कही थीं जबकि कॉन्ग्रेस ने उनसे 10-12 सीट माँगी थी। सहमति न बनने पर ममता बनर्जी ने रास्ते अलग करने की बात कही।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ममता बनर्जी ने बताया कि उन्होंने गठबंधन की बैठक में कॉन्ग्रेस को जो भी प्रस्ताव दिया, उन सब पर कॉन्ग्रेस नहीं मानी। इसके बाद ही उन्होंने निर्णय लिया कि वो बंगाल में अकेले ही चुनाव लड़ेंगे।

उन्होंने कहा, “हमने सीट शेयरिंग को लेकर बात नहीं की। लेकिन हमारी पार्टी ने उन्हें (कॉन्ग्रेस) को प्रपोजल दिया था जो नकार दिया गया। इसलिए हमने अकेले जाने का निर्णय लिया है। कॉन्ग्रेस को 300 सीट पर लड़ने दो। क्षेत्रीय पार्टी एक होकर लड़ेंगी। हम कॉन्ग्रेस का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करेंगे।”

उन्होंने राहुल गाँधी की न्याय यात्रा पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “शिष्टाचार के नाते उन्होंने मुझे ये जानकारी भी नहीं दी कि वह बंगाल में यात्रा करने जा रहे हैं। मैं इंडी गठबंधन का पार्ट हूँ। उन्हें मुझे कहना चाहिए था- दीदी मैं आपके राज्य में आ रहा हूँ।”

उन्होंने इंडी गठबंधन में वामपंथी दलों के होने पर भी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा विपक्षी समूह की बैठक के दौरान उन्होंने INDIA नाम का सुझाव दिया था। हालाँकि जब वह बैठक में शामिल हुईं तो देखा लेफ्ट इसे कंट्रोल करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने इस स्थिति को अस्वीकार्य बताया और कहा जिन लोगों से उन्होंने 34 सालों से लड़ाई लड़ी है उससे वो अब सहमत नहीं हो सकते।

गौरतलब है कि ममता के इस बयान से पहले कॉन्ग्रेस और टीएमसी में खटास की खबरें आ गई थीं। कॉन्ग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने मीडिया में ममता को अवसरवादी कह दिया था। उन्होंने कहा था, “हम ममता बनर्जी की दया पर चुनाव नहीं लड़ेंगे। कॉन्ग्रेस अपने दम पर चुनाव लड़ना जानती है और हमने जो दो सीटें (पश्चिम बंगाल में 2019 के लोकसभा चुनाव में) जीती हैं, वे ममता और भाजपा को हराकर जीती हैं। ममता अवसरवादी हैं; वह स्वयं कॉन्ग्रेस की कृपा से 2011 में सत्ता में आईं।”

जो थे ‘जननायक’ उसे लालू कहते थे ‘कपटी ठाकुर’, भारत रत्न मिलते ही बना लिया ‘गुरु’: जो आज बनते हैं सामाजिक न्याय के ‘मसीहा’ उन्हें मिला था ‘लंपट’ का तमगा

मोदी सरकार ने बिहार के दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को ‘भारत रत्न’ सम्मान दिए जाने की घोषणा की है। कर्पूरी ठाकुर को सामाजिक न्याय के लिए ‘जननायक’ कहा गया। वो बिहार में पहली गैर-कॉन्ग्रेसी सरकार के मुखिया थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बताया है कि उन्हें कभी कर्पूरी ठाकुर के साथ कार्य करने का मौका तो नहीं मिला, लेकिन उन्होंने भाजपा के दिवंगत नेता कैलाशपति मिश्र से उनके बारे में काफी सुना था। कैलाशपति मिश्र बिहार के वित्त मंत्री रहे थे और बाद में गुजरात एवं राजस्थान के राज्यपाल भी बने।

कर्पूरी ठाकुर की सरल जीवनशैली और विनम्र स्वभाव की चर्चा करते हुए पीएम नरेंद्र मोदी ने याद किया कि कैसे वे इस बात पर जोर देते थे कि उनके किसी भी व्यक्तिगत कार्य में सरकार का एक पैसा भी इस्तेमाल ना हो। नेताओं के लिए कॉलोनी बनाने का निर्णय हुआ तो उन्होंने जमीं तक नहीं ली। उनके निधन के बाद श्रद्धांजलि देने उनके गाँव पहुँचे नेताओं ने जब उनका घर देखा तो उनकी आँखों में आँसू आ गए। पीएम मोदी ने बताया कि कर्पूरी ठाकुर वे स्थानीय भाषाओं में शिक्षा देने के बहुत बड़े पैरोकार थे, ताकि गाँवों और छोटे शहरों के लोग भी अच्छी शिक्षा प्राप्त करें।

इसी बीच कर्पूरी ठाकुर को मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किए जाने के बाद इसका श्रेय लूटने के लिए बिहार के अवसरवादी नेता पिल पड़े। इसमें सबसे आगे रहे बिहार की गठबंधन सरकार में शामिल राजद के मुखिया लालू प्रसाद यादव। वही लालू यादव, जिन्होंने जीते-जी कर्पूरी ठाकुर का जम कर विरोध किया, लेकिन अब खुद को उनके लिए लड़ाई लड़ने वाला बता रहे हैं। बिहार को ‘जंगलराज’ में धकेलने वाले लालू यादव के चेहरे पर चढ़ा ये नकाब भी हम उतारेंगे, लेकिन उससे पहले जानते हैं कि कर्पूरी ठाकुर कौन थे।

कौन थे बिहार के कर्पूरी ठाकुर, जिन्हें मिला ‘भारत रत्न’

कर्पूरी ठाकुर की जन्मतिथि को लेकर काफी संशय है, लेकिन माना जाता है कि 24 जनवरी, 1924 को उनका जन्म हुआ था। समस्तीपुर जिले के पितौंझिया में गोकुल ठाकुर और रामदुलारी देवी के बेटे के रूप में उनका जन्म हुआ था। उस गाँव को अब ‘कर्पूरी ग्राम’ के नाम से जाना जाता है। कर्पूरी ठाकुर एक नाई परिवार से ताल्लुक रखते थे, जो पिछड़े समाज में आता है। दरभंगा स्थित CM कॉलेज में उनकी उच्च शिक्षा हुई, जो अधूरी रही। इसका कारण था – 1942 में वो महात्मा गाँधी के ‘करो या मारो’ आंदोलन में कूद पड़े थे और भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया।

कर्पूरी ठाकुर के परिवार की बात करें तो उनके दादाजी का नाम था प्यारे ठाकुर। कर्पूरी ठाकुर 6 भाई और 2 बहन थे। उनके एक भाई का नाम था – रामस्वारथ ठाकुर। उनकी बहनें थीं – गाल्हो, सिया, राजो, सीता, पार्वती और शैल। जमीन-जायदाद के नाम पर एक फूस का घर और 3 एकड़ खेत थे। 1938 में उन्होंने अपने गाँव में ही ‘नवयुवक संघ’ की स्थापना की थी। 1940 में उन्होंने मैट्रिक पास की। वो आज़ादी से पहले जेपी-लोहिया की ‘कॉन्ग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ के सदस्य थे।=

महात्मा गाँधी और सुभाष चंद्र बोस के व्यक्तित्व का उन पर प्रभाव था। कर्पूरी ठाकुर ने समाजवाद के प्रखर नेता राम मनोहर लोहिया के शिष्य के रूप में अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया था। 1952 से लेकर अपनी मृत्यु तक कर्पूरी ठाकुर लगातार विधानसभा या लोकसभा के लिए चुने जाते थे। बिहार के शिक्षा मंत्री के रूप में कर्पूरी ठाकुर ने मैट्रिक की परीक्षा तक अंग्रेजी की अनिवार्यता ख़त्म कर दी। इससे कई गरीब छात्रों को पास होने का मौका मिला, जो अंग्रेजी न आने के कारण पीछे रह जाते थे।

कर्पूरी ठाकुर पंचायती राज व्यवस्था के हिमायती थे। जब वो 1971 में और फिर 1978 में मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने बिहार में पंचायत चुनाव कराया। इसके बाद 2 दशक तक राज्य में पंचायत चुनाव ही नहीं हुए। उन्होंने आरक्षण के भीतर आरक्षण को लागू किया, जिसके तहत पिछड़ों को 8% और अत्यंत पिछड़ों को 12% आरक्षण दिया गया। गरीब सवर्णों और महिलाओं के लिए भी उन्होंने 3-3 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया।

कर्पूरी ठाकुर ने 1952 में ताजपुर से पहली बार विधानसभा चुनाव जीता। 1957 में उन्होंने यहीं से प्रजा-सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर कॉन्ग्रेस प्रत्याशी को हराया। 50 के दशक में उन्होंने पश्चिमी एशिया और यूरोप के कई देशों का दौरा किया। 1962 में भी वो यहीं से जीते। 1967 में उन्होंने ‘संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी’ के टिकट पर चुनाव जीता। 1967 में जब महामाया प्रसाद के नेतृत्व में सरकार बनी, तब कर्पूरी ठाकुर उप-मुख्यमंत्री बने। उन्हें शिक्षा और वित्त जैसे बड़े विभाग मिले।

1969 में बिहार में मध्यावधि चुनाव हुए और कर्पूरी ठाकुर फिर ताजपुर से ही जीते। 22 दिसंबर, 1970 को बिहार का मुख्यमंत्री बनने से पहले उन्होंने जमशेदपुर के मजदूरों के लिए 28 दिनों का आमरण अनशन किया था। टाटा फैक्ट्री के माँगें मंजूर की, जिसके बाद मजदूरों ने कर्पूरी ठाकुर को अपना नेता माना। गोमिया की एक्सप्लोसिव फैक्ट्री के मजदूरों के लिए भी उन्होंने अनशन किया। 1972 में भी उन्होंने ताजपुर से जीत दर्ज की। हालाँकि, तब तक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में छात्र आंदोलन उग्र हो चुका था और विरोधी नेताओं के इस्तीफे के क्रम में मई 1974 में उन्होंने भी विधायकी छोड़ दी।

फिर आपातकाल लगा। इंदिरा गाँधी के तानाशाही वाले काल में उन्होंने नेपाल से ही आपातकाल विरोधी गतिविधियाँ चालू कीं। 1977 के लोकसभा चुनाव में कर्पूरी ठाकुर ने ‘जनता पार्टी’ के टिकट पर समस्तीपुर से बड़ी जीत दर्ज की। जून 1977 में वो फिर से बिहार के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने मधुबनी के फुलपरास से कॉन्ग्रेस के रामजयपाल सिंह यादव को मात दी और विधायक बने, क्योंकि मुख्यमंत्री का 6 महीने के भीतर CM अनिवार्य है। 1980 में जब ताजपुर क्षेत्र को बाँट दिया गया तो वो समस्तीपुर से खड़े हुए और जीत दर्ज की।

बिहार में कॉन्ग्रेस की सरकार बनी और कर्पूरी ठाकुर नेता प्रतिपक्ष बने। चौधरी चरण सिंह से मतभेद के बाद उन्होंने ‘लोक दल (क)’ का गठन किया। 1985 के संसदीय चुनाव में कर्पूरी ठाकुर इंदिरा गाँधी के निधन की सहानुभूति लहर में हार गए, लेकिन जो जीवन में उनकी पहली हार थी, लेकिन 2 महीने बाद ही विधानसभा चुनाव में सीतामढ़ी के सोनबरसा से उन्होंने बड़ी जीत दर्ज की। ‘लोक दल’ और ‘जनता पार्टी’ का विलय न हो सका, लेकिन फिर भी उस चुनाव में कर्पूरी ठाकुर ने 47 सदस्यों को जिता कर अपने ‘लोक दल’ को सबसे बड़ी विरोधी पार्टी बनाया।

लालू यादव ने कर्पूरी ठाकुर को कहा था ‘कपटी’

अब आते हैं लालू यादव पर। आपातकाल के दौरान जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुए छात्र आंदोलन ने लालू यादव को भी बड़ा नेता बना दिया था। गोपालगंज के फुलवरिया में जन्मे लालू यादव बचपन से ही ड्रामा करने में दक्ष थे और गाँव में होने वाले छोटे-मोटे कार्यक्रमों में अभिनय करते थे। भले ही अब वो 75 वर्ष के हो गए हैं, लेकिन बचपन में भैंस पर बैठ कर करने वाली नाटकबाजी वाला खेल अब भी वो खेल लेते हैं, लेकिन दूसरे रूप में। अब वो कर्पूरी ठाकुर को ‘भारत रत्न’ दिए जाने का श्रेय ले रहे हैं।

लालू यादव ने एक ट्वीट कर के लिखा, “मेरे राजनीतिक और वैचारिक गुरु कर्पूरी ठाकुर जी को भारत रत्न अब से बहुत पहले मिलना चाहिए था। हमने सदन से लेकर सड़क तक ये आवाज़ उठाई, लेकिन केंद्र सरकार तब जागी जब सामाजिक सरोकार की मौजूदा बिहार सरकार ने जातिगत जनगणना करवाई और आरक्षण का दायरा बहुजन हितार्थ बढ़ाया। डर ही सही राजनीति को दलित बहुजन सरोकार पर आना ही होगा।” लालू यादव ने मोदी सरकार को न सिर्फ ‘डरा हुआ’ बता दिया, बल्कि कर्पूरी ठाकुर को अपना गुरु घोषित कर दिया।

क्या कोई व्यक्ति अपने गुरु को ‘कपटी’ कह सकता है? लालू यादव आज जिन्हें अपना गुरु बता रहे हैं और मोदी सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि उसने ‘डर कर’ जिन्हें सम्मान दिया, उन्हीं कर्पूरी ठाकुर को लालू यादव ने ‘कपटी’ कहा था। संकर्षण ठाकुर ने अपनी पुस्तक ‘द ब्रदर्स बिहारी‘ और अरुण सिन्हा की किताब ‘नीतीश कुमार और उभरता बिहार‘ में इसका स्पष्ट जिक्र है। फरवरी 1988 में कर्पूरी ठाकुर के निधन को लालू यादव ने अपने लिए मौके के रूप में लिया था और बिहार में लगभग मृतप्राय विपक्ष के सबसे बड़े नेता के रूप में खुद को उभारा।

लालू यादव भले ही छात्र नेता थे और आपातकाल में जेल भी गए थे, लेकिन मुख्यधारा की राजनीति में उन्हें लेन का श्रेय कर्पूरी ठाकुर को ही जाता है। 1977 में कर्पूरी ठाकुर ही थे, जिन्होंने मात्र 29 साल के लालू यादव को ‘भारतीय लोक दल’ के टिकट पर छपरा से लोकसभा का टिकट दिलाया था। लालू यादव को इस चुनाव में 85% वोट मिले और जीत का अंतर 77% रहा। इसके बाद उन्हें पार्टी से विधानसभा चुनाव का टिकट भी कर्पूरी ठाकुर ने ही दिलवाया।

1980 में कॉन्ग्रेस की बड़ी जीत के बावजूद बिहार में समाजवादी राजनीति को जीवित रखने वाले कर्पूरी ठाकुर ने ऐसे कई युवाओं को उस दौर में आगे बढ़ाया। लालू यादव ने भले ही खुद को कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद उनका उत्तराधिकारी भले ही घोषित कर दिया, लेकिन कर्पूरी ठाकुर खुद ऐसा कभी नहीं चाहते थे। पत्रकार संकर्षण ठाकुर अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि कर्पूरी ठाकुर अक्सर लालू को ‘लम्पट’ (आवारा) कहते थे। इसी किताब में जिक्र है कि कैसे लालू यादव अक्सर कर्पूरी ठाकुर को ‘कपटी’ कहा करते थे (सार्वजनिक तौर पर नहीं)।

लोहियावादी लक्ष्मी साहू, जो कर्पूरी ठाकुर क लाइफ-टाइम प्राइवेट सेक्रेटरी थीं, जिन्होंने एक वाकया सुनाया था। उस समय कर्पूरी ठाकुर नेता प्रतिपक्ष थे, लेकिन वो काफी बीमार थे। घर में आराम कर रहे थे। लेकिन, विधानसभा में एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर चर्चा आन पड़ी और उन्हें उसमें जाना था। उन्होंने शिवनंदन पासवान से गाड़ी का जुगाड़ करने को कहा। उस दौरान लालू यादव सेकेण्ड हैण्ड Willys जीप का इस्तेमाल करते थे, जिसे वो खुद ड्राइव करते थे।

किस्सा कुछ यूँ है कि जब शिवनंदन पासवान ने लालू यादव से कहा कि वो कर्पूरी ठाकुर को उनके घर से विधानसभा लेकर जाएँ, तब लालू यादव ने कहा, “मेरी गाड़ी में तेल नहीं है। आप कर्पूरी जी को एक कार खरीद लेने के लिए क्यों नहीं कहते? वो इतने बड़े नेता हैं!” लक्ष्मी साहू बताती हैं कि लालू यादव ने सीएम बनने के बाद कर्पूरी ठाकुर का नाम तक लेना बंद कर दिया था, क्योंकि उन्हें लगता था कि ऐसे में वो हमेशा उनकी छाया में रहेंगे। उन्होंने कर्पूरी ठाकुर की याद में मेमोरियल बनाने का वादा भी पूरा नहीं किया।

लालू यादव ने देशरत्न मार्ग स्थित जिस घर में कर्पूरी ठाकुर का निधन हुआ वहाँ बाहर सिर्फ एक दीवार बनवाई, और कुछ नहीं। वो हमेशा कर्पूरी ठाकुर मेमोरियल के निर्माण की माँग को टालते रहे। लालू यादव उन दिनों VP सिंह और देवी लाल के दरबार में हाजिरी लगाते थे और शायद इसीलिए पटना में बीमार कर्पूरी ठाकुर के करीब रहने में या उनकी मदद करने में उन्हें कोई फायदा नहीं दिखता था। आखिरकार इन दोनों के आशीर्वाद से ही लालू यादव ने कर्पूरी ठाकुर के निधन के अगले वर्ष मार्च 1989 में उनका पद ग्रहण किया, बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बने।

अरुण सिन्हा अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि लालू यादव को ये पसंद नहीं था कि कर्पूरी ठाकुर पिछड़े समाज की सभी जातियों को हिस्सेदारी देना चाहते थे और अपनी योजनाओं के बारे में सबको खुल कर नहीं बताते थे। इसीलिए, उन्होंने कर्पूरी ठाकुर को ‘कपटी ठाकुर’ कहना शुरू कर दिया था। उसी समय एक अन्य युवा नेता नीतीश कुमार ने लालू यादव के समर्थन के लिए गैर-यादव विधायकों को मनाया और इस तरह लालू यादव नेता प्रतिपक्ष बने। आज अवसरवादी लालू यादव खुद को कर्पूरी ठाकुर का शिष्य बता रहे।

अवसरवादी लालू यादव ने समाजवादी के लिए क्या किया?

लालू यादव के समर्थक भले ही उन्हें ‘सामाजिक न्याय’ और समाजवाद के पुरोधा के रूप में पेश करते हों और उनकी गिनती राम मनोहर लोहिया व कर्पूरी ठाकुर के क्रम में करते हों, लेकिन लालू यादव ने ‘भूरा बाल साफ़ करो’ (कुछ विशेष जातियों के सफाये के लिए) का नारा लगाने और जातीय जनगणना की बातें कर के हिन्दुओं को बाँटने की कोशिश करने के अलावा और किया ही क्या है? श्रेय लेने की होड़ में वो जिस तरह की हरकत कर रहे हैं, उससे ‘जियति ना दिहिन कौरा, मरे डोलावय चौरां’ वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है।

अवसरवादी लालू यादव कहते थे कि नीतीश कुमार के पेट में दाँत है, आज उनकी पार्टी उन्हीं की सरकार का हिस्सा है। कारण? कारण ये कि लालू यादव के एक बेटे तेजस्वी इस सरकार में उप-मुख्यमंत्री हैं, दूसरे बेटे तेज प्रताप भी मंत्री हैं। बिहार में श्रेय लेने की होड़ में नीतीश कुमार भी शामिल हैं, जिन्होंने इसे अपनी पुरानी माँग करार दिया। कइयों को इसमें चुनावी फायदे के लिए लिया गया फैसला दिख रहा है, तो कुछ मोदी सरकार को झुका लेने के दावे कर रहे हैं।

अब देखना ये है कि 2024 के लोकसभा चुनावों और 2025 के विधानसभा चुनावों में बिहार में कर्पूरी ठाकुर का नाम उनके निधन के 36-37 वर्ष बाद किस तरह फिर से प्रासंगिक बनता है। लालू-नीतीश इसे अपने ‘गुरु’ को मिला सम्मान दिखा कर मोदी सरकार को झुका लेने का दम भरेंगे, वहीं भाजपा समाजवाद के एक पुरोधा को सम्मान दिए जाने की बात कहेगी। हालाँकि, बिहार की राजनीति पारंपरिक राजनीति व देश के अन्य क्षेत्रों की राजनीति से अलग है, यहाँ कब क्या हो जाए किसी को अंदाज़ा नहीं।

असम में शांति का नया अध्याय, खत्म हो गया का ULFA का अस्तित्वः अब करेंगे समाज सेवा, मोदी सरकार ने डलवाए थे हथियार

44 साल बाद असम में उग्रवादी समूह यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (ULFA) का अस्तित्व समाप्त हो गया है। इसकी स्थापना 1979 में की गई थी। उग्रवादी संगठन ने अपने लड़का विंग को भंग करने का फैसला असम और भारत सरकार के साथ हुए हालिया समझौते के बाद किया है।

उल्फा के लड़ाका विंग को खत्म करने का निर्णय असम के दारांग जिले के चमुआपाड़ा गाँव में हुई बैठक में लिया गया। इस दौरान उल्फा के 900 लड़ाके मौजूद थे। अब ये लड़ाके सामान्य जीवन में लौट कर समाज सेवा का काम करेंगे।

उल्फा के संस्थापक सदस्यों में से एक अनूप चेतिया ने मीडिया से बातचीत में कहा, “यह हमारे लिए एक भावुक और पीड़ादायक दिन है। हमने 1979 में जिस संगठन को जन्म दिया उसे इस तरह से खत्म किया गया जबकि यह अपना उद्देश्य भी नहीं पूरा कर पाया। हमें अपनी सशस्त्र लड़ाई परिस्थितियों के कारण छोड़नी पड़ी। हमारे पास इस समझौते से लोगों को जो मिला वह स्वीकार करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था।” चेतिया ने बताया है कि वह अब अहोम विकास मोर्चा नामसे संगठन बनाएँगे।

उल्फा का समाप्त करने का निर्णय दिसम्बर 2023 में उग्रवादी समूह द्वारा भारत सरकार और असम सरकार के साथ समझौते करने के बाद हुआ है। 29 दिसंबर 2023 को नई दिल्ली में केंद्र सरकार, असम सरकार और उल्फा के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत उल्फा ने अपने सभी हथियार और गोला-बारूद सरकार को सौंप दिए थे। उल्फा के 750 कैडर ने भी हथियार डाल दिए थे। अब तक उल्फा के 9000 से अधिक कैडर हथियार डाल चुके हैं।

उल्फा के मुख्यधारा में जुड़ने के बाद अब असम में शान्ति का माहौल बनने की उम्मीद है। हालाँकि, उल्फा एक अन्य गुट, जिसका मुखिया परेश बरुआ है, अब भी सशस्त्र लड़ाई में जुटा हुआ है। वह भारत सरकार के साथ बातचीत का भी विरोधी है। वह लम्बे समय से फरार है और बाहर से ही अपनी उग्रवादी गतिविधियों को चला रहा है।

केंद्र सरकार ने बताया था कि 1979 में उल्फा के गठन के बाद से इसकी हिंसा से 10 हजार लोगों की मौत हो चुकी है। इसके अलावा उल्फा के हमलों में सुरक्षा बलों को भी काफी नुकसान उठाना पड़ा। केंद्र सरकार ने बताया था कि उल्फा के हमलों में चार दशक में सुरक्षाबलों के करीब 700 जवान बलिदान हुए थे।

IAS-IPS, डाॅक्टर… कुछ भी बने मुस्लिम औरत पर रहे हिजाब में ही: सांसद बदरुद्दीन अजमल ने खुले बाल को बताया ‘शैतान की रस्सी’, मेकअप लगाने से भी मना किया

असम के मुस्लिम नेता और सांसद बदरुद्दीन अजमल ने मुस्लिम महिलाओं के पहनावे को लेकर विवादित बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि अच्छे पेशों वाली महिलाओं को हिजाब पहनना चाहिए वरना उन्हें कोई मुस्लिम के तौर पर नहीं पहचानेगा। उनके इस बयान पर विवाद हो गया है।

AIUDF सुप्रीमो बदरुद्दीन ने यह बयान असम के करीमगंज में एक जनसभा में दिया। उन्होंने कहा कि अच्छे पेशे में लगी महिलाएँ जैसे कि IAS, IPS और डॉक्टरों के लिए हिजाब पहनना अनिवार्य किया जाना चाहिए। इससे उनकी मुस्लिम पहचान का पता लगेगा।

उन्होंने कहा, “अगर मुस्लिम महिलाएँ अपने बाल नहीं ढकेंगी या हिजाब नहीं पहनेंगी तो उन्हें मुस्लिम के तौर पर कैसे पहचाना जाएगा?”

उन्होंने बताया कि हिजाब मुस्लिम महिलाओं के लिए एक विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि खुले बाल शैतान की रस्सी होते हैं और महिलाओं का मेकअप लगाना शैतानों वाला काम है।

बदरुद्दीन अजमल ने कहा, “मैं जब बाहर जाता हूँ तो देखता हूँ कि मुस्लिम लडकियाँ हिजाब पहने हुए होती हैं और सर नीचे की तरफ करके आँखे झुका कर चलती हैं। असम में मुस्लिम लड़कियाँ ऐसा नहीं करती, सर के बाल छुपा के रखना इस्लाम में है।”

बता दें कि अजमल ने करीमगंज में एक मस्जिद और कब्रिस्तान का शिलान्यास करने के दौरान यह विवादित बयान दिया। इससे पहले उन्होंने एक बयान में कहा था, “ज्यादातर मुसलमान आपराधिक प्रवृति के पृष्ठभूमि के क्यों हैं? डकैती, बलात्कार, लूट जैसे अपराधों में मुसलमान नंबर वन क्यों हैं? हम जेल जाने में नंबर वन क्यों हैं? क्योंकि ज्यादातर मुस्लिम पढ़ाई नहीं करना चाहते हैं।”

इस मामले में इंडिया टुडे से बातचीत में बदरुद्दीन अजमल ने बाद में अपनी सफाई पेश की थी। उन्होंने कहा था, “मैंने दुनिया भर के मुसलमानों में शिक्षा की कमी देखी है। मुझे बहुत दुख है कि मुस्लिम पढ़ाई नहीं करते, उच्च शिक्षा के लिए नहीं जाते। यहाँ तक कि मैट्रिक की परीक्षा तक पास नहीं कर पाते। इसीलिए वो अपराध की दुनिया में निकल जाते हैं।” उन्होंने आगे कहा, “मैं चाहता हूँ कि मुस्लिम बच्चे ज्यादा से ज्यादा पढ़ाई करें और अच्छे रास्ते पर चलें।”

‘प्राण प्रतिष्ठा से मुर्दा क्यों नहीं चल सकता है?’: सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने रामलला को बताया ‘पत्थर’, बोले – ये ढोंग है, पाखंड है, आडम्बर है

समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने शायद अयोध्या में राम मंदिर बनने से बौरा गए हैं। अक्सर ही हिंदू देवी-देवताओं और सनातन पर विवादास्पद बयान देकर सुर्खियों बटोरने वाले मौर्य ने रामलला प्राण प्रतिष्ठा को ढोंग और आडंबर कहा है।

दरअसल मंगलवार (23 जनवरी, 2024) को सपा नेता ‘कर्पूरी ठाकुर सेना’ के गाजीपुर लंका मैदान में जननायक कर्पूरी ठाकुर जी के जन शताब्दी वर्ष समारोह में मौजूद थे। इस दौरान कभी बीजेपी में रहे मौर्य ने रामलला प्राण प्रतिष्ठा को लेकर अभद्र और आपत्तिजनक बात कही।

स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा, “देखो-सुनो, पूरी दुनिया में भारत एक ऐसा देश है जहाँ पत्थरों में प्राण प्रतिष्ठा किया जाता है। हमारे समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता हैं भाटी जी, जिन्होंने कहा कि संत जी वो तो अच्छा है, अपने परिवार में मरने वाले लोगों की जनवासे होती हैं। उसमें भी प्राण प्रतिष्ठा कर दो। हमेशा जिंदा रहा करेंगे, फिर मरेंगे ही नहीं अमर हो जाएँगे।”

सपा नेता ने आगे कहा, “अगर प्राण प्रतिष्ठा करने से पत्थर सजीव हो जाता है तो प्राण प्रतिष्ठा करने से मुर्दा क्यों नहीं चल सकता है। यहाँ पर पाखंड है, ढोंग है, आडंबर है। और वैसे भी जो खुद भगवान है, जो सबका कल्याण करता है। हम इंसान की क्या हैसियत की हम उसको प्राण प्रतिष्ठा करें।”

बताते चलें कि ये पहली बार नहीं है जब स्वामी प्रसाद मौर्य के मुँह से सनातन और हिंदू देवी-देवताओं के लिए अपशब्द निकले हैं। इसके पहले सपा नेता मौर्य ने 22 जनवरी, 2023 को कहा था कि अब करोड़ों लोग रामचरितमानस को नहीं पढ़ते, इसमें सब बकवास है। स्वामी प्रसाद ने सरकार से रामचरितमानस में कुछ अंश को आपत्तिजनक बताते हुए उसे हटाने की माँग तक कर डाली थी।

उन्होंने कहा था कि अगर वो अंश न हट पाए तो पूरी किताब को ही प्रतिबंधित कर देना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि वो रामचरितमानस को धर्म ग्रंथ नहीं मानते क्योंकि इस किताब को तुलसीदास ने अपनी खुद की खुशी के लिए लिखा था।

स्वामी प्रसाद ने 25 जनवरी, 2023 को भी साधु-संतों का अपमान किया था। तब सपा नेता ने कहा था कि उनके कहने पर जनजाति, दलित, पिछड़े, और महिलाएँ मंदिर में आना बंद कर दें तो चढ़ावा बंद हो जाएगा। इससे उनकी (संत) पेट पूजा बंद हो जाएगी। इसलिए, वे (संत) पागलों की तरह भौंक रहे हैं।

इससे पहले स्वामी प्रसाद मौर्य ने 27 जनवरी, 2023 को ट्वीट किया था, “हाल ही में मेरे द्वारा दिए गए बयान पर कुछ धर्म के ठेकेदारों ने मेरी जीभ काटने एवं सिर काटने वालों को इनाम घोषित किया है। अगर यही बात कोई और कहता तो यही ठेकेदार उसे आतंकवादी कहते। किंतु अब इन संतों, महंतों, धर्माचार्यों व जाति विशेष लोगों को क्या कहा जाए – आतंकवादी, महाशैतान या जल्लाद?”

सपा नेता मौर्य बयान का ही दुष्प्रभाव था कि 29 जनवरी, 2023 में उनके समर्थन में देवेंद्र यादव और सुरेश यादव ने रामचरितमानस की फोटो कॉपी किए पेज जलाए गए थे। इन दोनों पर ही हिंदू महाकाव्य रामचरितमानस की प्रतियों का अनादर करने और उन्हें जलाने के आरोप हैं।

इलाहबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने जनवरी 2024 को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत हिरासत में रखे जाने के खिलाफ दोनों आरोपितों द्वारा दायर याचिकाओं को भी खारिज कर दिया है।

शिवभक्ति में लीन सारा अली खान पहुँचीं घृष्णेश्वर मंदिर, हाथ जोड़ की प्रार्थना: इस्लामी कट्टरपंथी बिलबिलाकर बोले- मुस्लिम होने के नाम पर धब्बा हो तुम

बॉलीवुड अभिनेत्री सारा अली खान समय-समय पर अपनी शिवभक्ति प्रदर्शित करती रहती हैं। इस क्रम में कभी उनकी तस्वीरें केदारनाथ से देखने को मिलती हैं तो कभी उज्जैन के महाकाल से। हाल में वह एक और घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में दर्शन करने गईं थीं। इसकी तस्वीर भी उन्होंने शेयर की। फोटो में उन्हें माथे पर चंदन लगाकर शिवलिंग के आगे बैठे देखा जा सकता है। वह आँख बंद करके भक्ति में लीन हैं और सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम भी करती हैं।

उनकी तस्वीर देख सोशल मीडिया यूजर्स हर बार की तरह उनकी तारीफ करते नहीं रुक रहे हैं। यूजर्स उन्हें कह रहे हैं कि मुस्लिम पिता होने के बावजूद सना ये नहीं भूलीं हैं कि उनकी माँ हिंदू हैं। लोग उनका ये रूप देख ये भी कह रहे हैं कि सना एक ही तो दिल है कितनी बार जीतोगी।

तस्वीर साभार:सारा अली खान का इंस्टा अकॉउंट

उनकी तस्वीर जहाँ ज्यादातर यूजर्स को पसंद आ रही है वहीं सारा अली खान से इस्लामी कट्टरपंथी हर बार की तरह नाराज भी हैं। हुसैन नाम का लड़का पूछता है उनसे- क्या तुम्हें कब्र में नहीं जाना? एक यूजर कहता है- अस्तागफिरउल्लाह कयामत करीब है।

शानू खान कहता है, “दिल से नफरत करता हूँ। पहले आपकी इज्जत करता था।” गुलजार हसन उन्हें अनफॉलो करने की बात कहता है। वहीं कंवल राजा कहता है, “सजदा सिर्फ अल्लाह के आगे झुकते हैं शिर्क। क्या आपने इस उम्र में हज करा। इतनी दौलत होने क बाद भी अल्लाह के घर न जाओ तो सब बर्बाद है।”

तस्वीर साभार:सारा अली खान का इंस्टा अकॉउंट

अकील कहता है- ये मुसलमान नहीं कर सकता कभी भी लेकिन भारतीय एक्टर और एक्ट्रेस फेम और पैसे के लिए ये सब कर लेते हैं। शर्मनाक।

अजनूर कहता है- कुछ भी कर लो फ्लॉप मूवीज ही बनाओगी। फारवा कहती है- मुस्लिम के नाम पर धब्बा हो तुम।

तस्वीर साभार: सारा अली खान का इंस्टा अकॉउंट

बता दें कि सारा अली खान को इस्लामी कट्टरपंथी आए दिन निशाना बनाते रहते हैं। गणेश पूजा पर गणपति के साथ फोटो डालने पर उन्हें जाहिल, गवार कहा जाता है। मंदिर जाने पर उन्हें लानतें भेजी जाती हैं। केदारनाथ जाती हैं तो उन्हें कहा जाता है कि अल्लाह से बड़ा कोई नहीं है। शिवरात्रि की पूजा करने पर उन्हें कहा जाता है कि मूर्ति पूजा हमेशा से हराम थी और रहेगी।

‘मानो हनुमान जी रामलला के दर्शन करने आए हों’: राम मंदिर के बाहर जब कतार में खड़े थे लाखों भक्त, गूढ़ मंडप से गर्भगृह में बंदर ने किया प्रवेश

22 जनवरी 2024 को अयोध्या के भव्य राम मंदिर में भगवान रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा हुई। इसके अगले ही दिन लाखों लोग अपने अराध्य के दर्शन को उमड़ पड़े। इसी दौरान एक बंदर भी गर्भगृह में प्रवेश कर गया। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने एक्स/ट्विटर पर इसके बारे में जानकारी साझा करते हुए कहा है कि वहाँ तैनात सुरक्षाकर्मियों का कहना है, “ये हमारे लिए ऐसा ही है, मानो स्वयं हनुमान जी रामलला के दर्शन करने आए हों।”

यह घटना 23 जनवरी को शाम के करीब 5 बजकर 50 मिनट की है। उस समय तक करीब 3 लाख भक्त रामलला का दर्शन कर चुके थे और करीब दो लाख भक्त बाहर कतार में थे। पहले दिन 5 लाख से अधिक भक्तों ने राम मंदिर में दर्शन किया।

ट्रस्ट की ओर से किए गए पोस्ट में बताया गया है, “एक बंदर दक्षिणी द्वार से गूढ़ मंडप से होते हुए गर्भगृह में प्रवेश करके उत्सव मूर्ति के पास तक पहुंचा। बाहर तैनात सुरक्षाकर्मियों ने उसे देखा। वे बंदर की ओर यह सोच कर भागे कि कहीं वह उत्सव मूर्ति को जमीन पर न गिरा दे। परंतु जैसे ही पुलिसकर्मी बंदर की ओर दौड़े, वैसे ही बंदर शांतभाव से भागते हुए उत्तरी द्वार की ओर गया। द्वार बंद होने के कारण पूर्व दिशा की ओर बढ़ा और दर्शनार्थियों के बीच में से होता हुआ, बिना किसी को कष्ट पहुँचाए पूर्वी द्वार से बाहर निकल गया।”

वैसे अयोध्या में वानर की इस तरह उपस्थिति की यह कोई पहली घटना नहीं है। राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के दौरान कई प्रमुख मोड़ो पर इसी तरह वानर की उपस्थिति देखी गई है।

इसका एक प्रमाण पत्रकार हेमंत शर्मा की किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में मिलता है। फैजाबाद जिला अदालत ने 1 फरवरी 1986 को विवादित स्थल का ताला खोलने का आदेश दिया था। जिला जज कृष्णमोहन पांडेय के इस आदेश के पीछे एक काले बंदर की दैवीय प्रेरणा को माना जाता है। दरअसल उस दिन एक काला बंदर सारा दिन फैजाबाद की जिला अदालत की छत पर बैठा रहा था।

जज कृष्णमोहन पांडेय 1991 में प्रकाशित अपनी आत्मकथा में लिखा है, “जिस रोज मैं ताला खोलने का आदेश लिख रहा था, मेरी अदालत की छत पर एक काला बंदर पूरे दिन फ्लैग पोस्ट को पकड़कर बैठा रहा। वे लोग जो फैसला सुनने के लिए अदालत आए थे, उस बंदर को फल और मूँगफली देते रहे, पर बंदर ने कुछ नहीं खाया। चुपचाप बैठा रहा। फैसले के बाद जब डीएम और एसएसपी मुझे मेरे घर पहुँचाने गए, तो मैंने उस बंदर को अपने घर के बरामदे में बैठा पाया। मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने उसे प्रणाम किया। वह कोई दैवीय ताकत थी।”

मुंबई की 96 साल की कारसेवक शालिनी रामकृष्ण दबीर ने विवादित ढाँचा विध्वंस की साक्षी रही हैं। उन्होंने 6 दिसंबर 1992 के दिन भी वानर की उपस्थिति के बारे में बताया था। उन्होंने कहा था, “वो पल याद आता है जब वो एक दीवार टूटती ही नहीं थी। हम सुबह से मारुति स्त्रोत बोलते थे, लेकिन कुछ हो नहीं रहा था। क्या करें क्या न करें की स्थिति थी, क्योंकि 5 बजे सूर्यास्त हो जाता तो हम कुछ नहीं कर पाते। फिर वहाँ पास के पेड़ से एक वानर आया वो दीवार पर बैठा। हम सब देखने लगे कि क्या बात है ये। वानर ने इधर-उधर सिर घुमाकर देखा और वहाँ से चला गया और फिर धड़ से दीवार गिरी। इसके बाद दो घंटे तक धूल के गुबार से हमें वहाँ कुछ दिखाई नहीं दिया था।”

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र की इस पोस्ट पर यूजर ने भी ऐसे कॉमेंट किए हैं जो इस कलयुग में भी राम भक्त हनुमान के होने का प्रमाण देते नजर आ रहे हैं। यूजर समीरा ने दुनिया की सबसे खूबसूरत तस्वीर,’श्री राम और बजरंग बली एक साथ’ लिख रामजी जी की तस्वीर वाले भगवा झंडे को निहारते एक बंदर वाली तस्वीर पोस्ट की है।

उधर दूसरी तरफ Secular Chad नाम के एक यूजर ने ‘हम इतने खुश हैं तो हमारे बजरंग बली कितने होंगे जय श्री राम’ लिखकर एक वीडियो पोस्ट किया है। इस वीडियो में एक बंदर तूफान और हवा के बीच एक लकड़ी के पोल पर लगे रामजी की तस्वीर वाले भगवा झंडे की तरफ बढ़ते देखा जा सकता है।